विज्ञान क्षेत्र में हिंदी

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विज्ञान क्षेत्र में हिंदी
किंकिणी दासगुप्ता मिश्रा
१०वाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन, भोपाल

जिस देश की जनसंख्या 55 प्रतिशत से ज्यादा हिन्दी लिखना और पढ़ना जानती हो उस देश में हिन्दी भाषा का प्रचलन होना जरूरी है। विश्व में मौजूद किसी भी देश की प्रगति को देखा जाये तो वहाँ की राष्टंभाषा ने उस देश को ऊंचाई हासिल करने में मदद की है। आज के समय देश की भाषा और विज्ञान का महत्व शायद ही बहस का विषय है। जहां तक भारत का सवाल है, आज हम आजादी के 68 साल बाद भी हिन्दी और विज्ञान के महत्व को न समझने के कारण भारत की प्रगति में जनमानस की भागीदारी को साथ नहीं ले पा रहे हैं।

पाश्चत्यात् संस्कृति का प्रभाव होने के कारण आज का जनमानस जो अपनी भाषा में अच्छे तरीके से विचारों का आदान प्रदान कर सकता है वह अंग्रेजी के कारण कहीं न कहीं बाधा और चुनौतियों में फंसा रहता है। आज के समय हिन्दी भाषा के माध्यम से इन युवा बुद्धि और हुनर को प्रगति के राह पर लाया जा सकता है। इसमें हमें हिन्दी भाषा में अनुसंधानिक लेखों का प्रकाशन को प्रोत्साहन देना चाहिए, मौलिक लेखन के लिये प्रोत्साहित करना चाहिए और साथ ही साथ में विश्व में मौजूद अलग अलग नवीनतम जानकारी को हिन्दी में उपलब्ध करने की आवश्यकता है। भाषा और शब्दों की जटीलता में न अटकते हुए अलग अलग पारिभाषिक शब्दों को हिन्दी में यथाचित प्रचलित करना चाहिए। विज्ञान क्षे़ त्र के विद्यार्थियों को अपने प्रबंध हिन्दी में प्रकाशित करनें के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए और शायद इन प्रयासों की वजह से भविष्य में मौलिक विज्ञान लेखन कि और शोध कार्य का अन्य देश अपनी भाषा में भाषांतर करते हुए नजर आएगें। आज विश्व में जो देश की मातृ भाषा में संचार और प्रचार कर रहें हैं वह ना सिर्फ वहां के लोगों का आत्मसम्मान बढ़ा रहें हैं बल्कि उस देश को अपने प्रगति पथ पर लाने में अपना योगदान दे रहें हैं। अंततः भारत को भी विज्ञान को हिन्दी के माध्यम से लोगों तक पहुंचाने का प्रयास मौलिक लेखन एवं मौलिए चितंन के माध्यम से करना चाहिए।

10 वां विश्व हिन्दी सम्मेलन में पहली बार ‘विज्ञान क्षेत्र में हिन्दी’ सत्र का आयोजन किया गया है। इस सत्र का उद्देशय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विषयों को हिन्दी में सरल एवं रुचिपूर्ण तरीके से जनमानस में पहुंचाने के प्रयासों को प्रोत्साहित करना है। इस सत्र की अध्यक्षता केन्द्रीय मंत्री, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय, माननीय डॉ. हर्षवर्धन ने की और सत्र संचालन एवं कार्यभार विज्ञान प्रसार की वैज्ञानिक श्रीमती किंकिणी दासगुप्ता मिश्रा ने किया।

‘विज्ञान क्षेत्र में हिन्दी’ विषय को दो सत्रों के माध्यम से पूरा किया गया। देश के विख्यात वैज्ञानिकों एवं एवं विज्ञान संचारकों ने इन सत्रों में अपने विचार रखते हुए हिन्दी में विज्ञान की उपलब्धता के संबंध में चुनौतियों और अवसरों पर विस्तार से चर्चा की। विज्ञान को सरल, बोधगम्य एवं प्रभावशाली बनाने के लिए अपने विचार रखे। विज्ञान क्षेत्र में हिंदी विषयक सत्र का उद्देश्य विज्ञान, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा एवं अभियांत्रिकी विषयों में पाठ्यक्रम सामग्री का हिंदी में विकास एवं हिंदी में विज्ञान लोकप्रियकरण एवं विज्ञान संचार को प्रोत्साहन देना था। इन दोनों सत्रों में कुल पांच वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किए, जिसमें शामिल थे, डॉ. शिवगोपाल मिश्र, प्रधानमंत्री, विज्ञान परिषद् प्रयाग, इलाहबाद, डॉ. एन. के. सहगल, पूर्व सलाहकार, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार, प्रो. मोहनलाल छीपा, कुलपति, अटलबिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय, भोपाल, डॉ. बी.के. सिन्हा, पूर्व वैज्ञानिक अधिकारी, वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग एवं डॉ. सुभाष लखेड़ा, पूर्व वैज्ञानिक, डीआरडीओ। तीसरे दिन 12 सितंबर, 2015 को पिछले दोनों सत्रों की संक्षिप्त रपट प्रस्तुत की गई।

सत्र के दौरान वक्ताओं के व्याख्यानों और प्रतिभागियों के विचार-विमर्श के बाद माननीय डॉ. हर्षवर्धन द्वारा प्रतिभागियों के साथ तकनीकी सत्रों पर विस्तार पूर्वक चर्चा के उपरांत निम्नांकित अनुसंशाओं का अनुमोदन किया गया :

चिकित्सा क्षेत्र में नियामक संस्थाओं द्वारा एक निश्चित समयसीमा में सभी चिकित्सा परीक्षाओं में हिंदी भाषा में लिखने की छूट प्राप्त हो। चिकित्सा शिक्षण द्विभाषीय माध्यम से हो।

  • स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत केन्द्रीय हिंदी चिकित्सा प्रकोष्ठ का गठन किया जाए।
  • उच्च चिकित्सा व तकनीकी शिक्षा लेखन मिशन की स्थापना की जाए। अवकाश प्राप्त चिकित्सकों को शिक्षण संस्थानों में लोकप्रिय व्याख्यानों के लिए आमंत्रित किया जाए।
  • वैज्ञानिक एवं शब्दावली आयोग, वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली का निर्माण एवं परिभाषा कोश का निर्माण कार्य करता है। इस कार्य को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत संचालित किया जाए।
  • मौलिक विज्ञान लेखन को हिंदी में प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के नवीन एवं समसामायिक विषयों पर योजनाबद्ध तरीके से पुस्तकों को विकसित किया जाए।
  • हिंदी में लेखन करते हुए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के लोकप्रिय एवं प्रचलित अंतर्राष्ट्रीय शब्दों के यथारूप देवनागरी लिपि में मानक शब्दों के साथ दिए जाने की स्वीकार्यता मिले।
  • हिंदी में विज्ञान लेखन के क्षेत्र में संस्थागत और व्यक्तिगत रूप से किए जाने वाले प्रयासों का संकलन किया जाए ताकि वर्तमान स्थिति का आंकलन हो सके और भविष्य में किए जाने वाले कार्यों की रूपरेखा स्पष्ट हो सके।
  • हिंदी भाषा में विज्ञान विषयों पर वैज्ञानिक संस्थानों द्वारा शोध पत्रिकाओं का प्रकाशन अनिवार्य किया जाए। ऐसी शोध पत्रिकाओं को अन्य विदेशी भाषाओं के समकक्ष ही मान्यता मिले।
  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण के प्रसार की रणनीति के तहत विज्ञान विधि का प्रचार-प्रसार विद्यालय स्तर से ही मातृभाषा में हो।
  • डिजिटल इंडिया के तहत प्राचीन भारत के वैज्ञानिक ज्ञान पर आधारित दुर्लभ ग्रंथों जैसे ‘‘भारत की संपदा’’ आदि साहित्य को निःशुल्क वेबसाइट पर उपलब्ध कराया जाए इसके अलावा विज्ञान विश्वकोश का प्रकाशन हिंदी में किया जाए।
  • देश के सभी वैज्ञानिक, चिकित्सा एवं अभियांत्रिकी प्रयोगशालाओं एवं संस्थानों में विज्ञान संचार इकाई की स्थापना की जाए एवं विज्ञान संचार के लिए विज्ञान प्रयोगशालाओं में पदों का सृजन किया जाए।
  • विज्ञान एवं तकनीकी प्रयोगशालाओं द्वारा सोशल मीडिया पर हिंदी में विज्ञान सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
  • हिन्दी में दैनिक विज्ञान समाचार पत्र का प्रकाशन आरंभ किया जाए। जिन दो विषयों जैसे सूचना प्रौद्योगिकी एवं अंतरिक्ष, में भारत का कार्य महत्वपूर्ण है, उसमें अधिकाधिक मूल जानकारी हिन्दी में प्रकाशित की जाना चाहिए।