शिशुपालवधम् महाकाव्य में राजनैतिक स्थिति का वर्णन

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शिशुपालवधम् महाकाव्य में राजनैतिक स्थिति का वर्णन
राजेन्द्र यादव

राजधर्म का विकास[सम्पादन]

राजधर्म की महत्ता का प्रतिपादन करने वाले अनेक उद्धरण भारतीय राजनीतिक चेतना के उज्ज्वल दर्पण है। इसमें राजा को व्यवस्था स्थापित करने, आर्थिक प्रगति का निर्देशन करने तथा सामाजिक व्यवहार का नियन्त्रण करने के द्वारा क्रमशः धर्म, अर्थ और काम इन तीनों पुरुषार्थों की साधना के द्वारा चौथे पुरुषार्थ मोक्ष की प्राप्ति के लिये मार्ग प्रशस्त करने वाला कहा गया है। इस प्रकार प्रकर्षति का रंजन करने के कारण ही उसे राजा बतलाया गया है और यह विचार सम्पूर्ण संस्कृत साहित्य में एक सूक्ति की तरह स्वीकार कर लिया गया है।1 राजनीतिशास्त्र अथवा राजधर्म की महत्त्वा को स्वीकार करते हुए यहां तक कहा गया है कि ‘दण्डनीति’ (राजा की नियामक शक्ति) के नष्ट होने पर तीनों वेद डूब जायेंगे, सभी कर्तव्य कर्म एवं धर्म (सभ्यता के आधार) चाहे वे कितने ही विकसित और उन्नत क्यों न हो, क्षीण हो जायेगे तथा परम्परागत प्राप्त राजधर्म के त्याग दिये जाने पर सभी आश्रम धर्म नष्ट हो जायेगे। राजधर्म में ही सम्पूर्ण त्यागों की पूर्ति होती है, सभी दीक्षायें राजधर्मों में संयुक्त होती है और सभी विद्याओं का समन्वय राजधर्म में ही होता है। सभी लोक (लोक तथा परलोक आदि) इस राजधर्म में केन्द्रित है।2 इन उक्तियों से भारतीय राजनीतिक चिन्तन की व्यापकता पर प्रकाश पड़ता है।

प्राचीन मनुस्मृति आदि धर्म शास्त्रों में मनुष्य के वैयक्तिक और सामाजिक व्यवहार के सम्पूर्ण क्षेत्र को दृष्टि में रखते हुए वेदों के अनुकूल शाश्वत धर्मों और अपने युग के अनुरूप युग धर्मों की व्यवस्था का प्रतिपादन किया गया। महाभारत और अर्थशास्त्र में राजनीतिशास्त्र और अर्थ का विवेचन करने वाले अनेक विचारक विद्वानों और ऋषियों के नाम उपलब्ध होते हैं जो उस बात के प्रमाण हैं कि उन विषयों के सांगोपाग विवेचन की परम्परा भारत वर्ष में बहुत पुरानी है। यह हमारा दुर्भाग्य है कि अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ आज उपलब्ध नहीं है। तो भी जो सामग्री आज उपलब्ध है वह भी उतनी प्रचुर और महत्त्वपूर्ण है कि प्राचीन शास्त्रों में दर्शन शास्त्र के बाद राजनीतिशास्त्र का ही ऐसा सोपत्तिक वर्णन मिलने के कारण उसे एक पूर्ण विद्या का गौरव दिया जा सकता है। भारतीय राजनीति शास्त्र के सैद्धान्तिक पक्ष की ऐतिहासिकता और समीचीनता का वैज्ञानिक परीक्षण करने के लिये पर्याप्त सामग्री ऐतिहासिक साक्ष्य के रूप में भी उपलब्ध है। पौराणिक बौद्ध और जैन साहित्य उसके व्यवहारिक ऐतिहासिक पहलू पर बड़ी समृद्ध पूरक सामग्री प्रस्तुत करते हैं। उस प्रकार से ग्रन्थों अर्थात् महाभारत और रामायण आदि के द्वारा अनेक शासन संस्थाओं पर विशद प्रकाश पड़ा है।

इस प्रकार प्राचीन भारतीय साहित्य के वैदिक काल से लेकर लौकिक संस्कृत के महाकाव्य काल तक प्राप्त सामग्री के सूक्ष्म सर्वेक्षण के द्वारा यह निर्णय निकाला जा सकता है कि प्राचीन भारतीय राजशास्त्र के अध्ययन में रुचि रखने का विशाल भण्डार सुरक्षित है। इसके अतिरिक्त व्याकरण साहित्य के अध्ययन के द्वारा भी डॉ0 वासुदेव शरण अग्रवाल जैसे मनीषियों ने हिन्दू राजशास्त्र के नितान्त व्यवहारिक और वैज्ञानिक पहलुओं पर अमूल्य माननीय सामग्री प्रस्तुत की है।

इस प्रकार प्राचीन भारतीय साहित्य के वैदिक काल से लेकर लौकिक संस्कृत के महाकाव्य काल तक प्राप्त सामग्री के समक्ष सर्वेक्षण के द्वारा हम सभी निर्णय पर पहुँचते हैं कि प्राचीन भारतीय राजशास्त्र के अध्याय में रुचि रखने वाले के लिये सामग्री का विशाल भण्डार सुरक्षित है।

राजनीतिशास्त्र का अवलोकन करने पर यह स्पष्ट तथा परिलक्षित होता है कि सुरक्षा की भावना और राज्य संस्था की उत्पत्ति अर्थात् समाज के राजनीतिक संगठन का साहचर्य मौलिक है। यही मानव के सामाजिक प्राणी होने का मूल भी है और यही व्यक्ति क्रमशः परिवार, कुल, जनपद और राष्ट्र के सदस्यों के रूप में में बने रहने की आवश्यकता का कारण थी। इसी रक्षा के उद्देश्य से मानव को अनुरोध एवं दण्डभय के द्वारा शासित करना अनिवार्य आवश्यकता बन जाती है। शासन सत्ता के अधिकार और दण्ड प्रयोग की प्रभुता की स्वीकृति इसी परम् उद्देश्य की पूर्ति के लिये मानी गई है तथा मानव की व्यक्तिगत और समष्टिगत रक्षा की इस उत्कृष्ट प्रवृत्ति और इसके समुचित प्रबन्ध के बिना मानव समाज की स्थिति असम्भव है। आधुनिक राजनीति शब्दावली में ‘विधि’ रीति, रिवाज कर्तव्य-अधिकार तथा पाप एवं सत्य आदि शब्दों का जिन अर्थां में प्रयोग होता है प्राचीन काल में ये सब विशाल धर्म वृत्त की ही शाखायें मानी जाती थी।

राज्य की उत्पत्ति का यह निगमात्मक सिद्धान्त ही वैदिक साहित्य और धर्म शास्त्रों के समान शिशुपालवधम् में भी राजा की प्रभु शक्ति का आधार है। राजा की उत्पत्ति के परम्परा प्राप्त इतिहास में यह प्रतिपादित किया गया है कि यद्यपि राजनीतिक दृष्टि से संगठित होने के पहले अनेक सामाजिक इकाईयां मानवीय प्रकर्षति की धर्मशीलता के कारण आपस में एक दूसरे की रक्षा करते हुए सुख से रहती थी, परन्तु सामाजिक जीवन की प्रगति के साथ अनेक कई सम्पत्ति ग्रहस्थ विवाह आदि संस्थाओं से उत्पन्न जटिल परिस्थितियों में किसी नियमानक दण्ड शक्ति के बिना जीवन दूभर हो गया था। अतः राजशाही की उत्पत्ति एक अनिवार्य आवश्यकता थी।

शिशुपाल में क्षत्रिय शब्द कई स्थानों पर राजा के पर्याय के रूप में प्रयुक्त हुआ है कहा गया है कि क्षत्रिय की राजनीति प्रभुता के दो आधार है। एक तो उसका परम पुरुष विराट की भुजाओं से रक्षा के लिए ही उत्पन्न होना और दूसरा उसका धर्म की रक्षा के लिए राज्य की दण्ड शक्ति के द्वारा दुर्बलों की रक्षा करना/पितामह भीष्म ने शान्तिपर्व में राज्य संस्था की उत्पत्ति का वर्णन करते हुए कहा है कि उसे सम्पूर्ण प्रजाओं का रंजन करने वाला ‘राजा’ तथा ब्राह्मणों को क्षत्रि से बचाने वाला होने के कारण क्षत्रिय कहा गया है।3 क्षत्रिय शब्द की उत्पत्ति के विषय में इससे पहले शान्तिपर्व से ही अपेक्षाकृत और अधिक अच्छी परिभाषा देते हुए कहा गया है कि महाराज प्रभु ही सर्वप्रथमराजा इसीलिये कहलाये क्योंकि ये क्षत अर्थात् दुःख से सबका ऋण करने वाले थे।4

क्षत्रियों के आचरण की सर्वप्रथम विशेषता उनकी अतिथि सत्कार की भावना दिखाई देती है। शिशुपालवधम् में देवर्षि नारद के आगमन पर श्रीकृष्ण अपने आसन से उठकर उनका स्वागत करते हैं-

पतत् पत¯प्रतिमस्तपोनिधिः पुराऽस्य यावन्न भुविव्यलीयत।
गिरेस्तडित्वानिव तावदुच्चकैर्जवेन पीठादुदतिष्ठदच्युतः॥5

इसके अतिरिक्त कृतज्ञता और मित्र कामता क्षत्रिय के दो विशेष गुण माने जाते है। अकृतज्ञता और मित्र द्रोह ऐसे पाप बतलाये गये हैं जिनका कोई प्रायश्चित भी नहीं हो सकता।

अन्यत्र सरल शब्दों में ब्राह्मण और क्षत्रिय स्वभाव का विश्लेषण इन शब्दों में किया गया है कि ब्राह्मण का हृदय नवनीत की तरह अत्यन्त कोमल किन्तु वाक्य अर्थात् कठोर और स्पष्ट होता है तथा इसके विपरीत क्षत्रिय का हृदय अति कठोर प्रभावशाली वाणी मृदु एवं कोमल होती है

राजा का राज्य के प्रति नतिगत निर्णय[सम्पादन]

नीतिज्ञों की राज्य के सुव्यवस्थित संचालन के लिए आवश्यक नीतियों को प्रतिपादित करते हुए कवि माघ ने कहा है कि सहायादि समस्त कार्यों में पाँच अंगों के अतिरिक्त राजा का उस प्रकार दूसरा कोई मन्त्र नहीं है, जिस प्रकार उस शरीर में पाँच स्कन्धों के अतिरिक्त बौद्धों के मत से दूसरा कोई आत्मा नहीं है। राजा के पाँच अंग हैं-

1. कार्यों के आरम्भ करने का उपाय,
2. कार्यों की सिद्धि में उपयोगी वस्तुओं का संग्रह,
3. देश तथा काल (स्थान और समय) का यथा योग्य विभाजन,
4. विपत्तियों के दूर करने के उपाय,
5. कार्यों की सिद्धि।
सर्व कार्यषरीरेषु मुक्त्वाङ्गस्कन्धपञ्चकम्।
सौगतानामिवात्मान्यो नास्ति मन्त्रों महीभृतांम्॥6

राजाओं के सहाय आदि में पाँच अंग समायोजित रहते हैं तो उनके सन्धि, विग्रह के साथ मन्त्रणा करने की आवश्यकता नहीं रहती है। प्रत्येक राजा को अपने राज्य में इन पाँचों अंगों पर ही विशेष ध्यान देना चाहिए। कवि माघ ने पूर्व बौद्ध दर्शन की मान्यता को प्रतिपादित करते हुए राजनीति का यह उपदेश दिया है। रूपस्कन्ध, वेदना स्कन्ध, विज्ञान स्कन्ध, संज्ञा स्कन्ध तथा संस्कार स्कन्ध ये पाँच स्कन्ध कहे गये हैं। उनका मानना है कि इन पाँच स्कन्धों के अतिरिक्त शरीर में आत्मा नाम की कोई वस्तु नहीं है, किन्तु इन स्कन्ध पञ्चक से परिवर्तन होता हुआ ज्ञान सन्तान ही आत्मा है। राजाओं को भी पाँच अंगों के अलावा अन्य किसी की मंत्रणा की आवश्यकता नहीं होती है। ऐसा राज्य स्वमेव सफलता अर्जित कर लेता है।

मन्त्रोयोध इवाधीरः सर्वाङ्गैः कल्पितैरपि।
चिरं न सहते स्थातुं पेरभ्यो भेदषङ्कया॥7

शिशुपालवधम् महाकाव्य में बलराम जी श्रीकृष्ण से कहते हैं कि मन्त्रणा करने के बाद कार्य में विलम्ब करना अहित का सिद्ध हो जाता है। हमने जो शिशुपाल को मारने के लिए उस पर आक्रमण करने का निर्णय लिया है, युधिष्ठिर के यज्ञ में सम्मिलित न होकर हमें शिशुपाल पर शीघ्रतम चढ़ाई कर देना चाहिए विलम्ब करने में किसी प्रकार यदि यह बात किसी अन्य को ज्ञात हो जायेगी तो हम लोगों का निर्णय कार्य साधक नहीं होगा। जिस प्रकार कातर योद्धा छाती, हाथ, पैर आदि सम्पूर्ण अंगों को कवचादि से सुरक्षित करने पर शत्रु के भेदन करने के भय से युद्ध में बहुत देर तक नहीं ठहरता है, उसी प्रकार पञ्चागों से सुरक्षित होते हुए भी शत्रुओं के गुप्तचरों द्वारा योजना ज्ञात कर लिये जाने के भय से बुद्धिमान राजा नहीं ठहर सकता है, मन्त्रणा के बाद शीघ्र ही अपनी योजना क्रियान्वयन कर देता है क्योंकि मन्त्रणा के बाद किसी भी प्रकार का विलम्ब न करना ही श्रेयस्कर होता है।

आत्मोदयः परज्यानिर्द्धयं नीतिरितीयती।
तदूरीकृत्य कृतिभिर्वाचस्पत्यं प्रतायते॥8

नीति के विषय में विचार-विमर्श के साथ परामर्श करने पर भी राजाओं के लिए विलम्ब करना उचित सिद्ध नहीं होता है। राजनीति के स्वरूप को प्रतिपादित करते हुए कवि माघ ने कहा है अपनी-उन्नति और शत्रु की हानि बस इतनी ही राजनीति है। उसे स्वीकार कर कुशल पुरुष अपनी वास्तविकता ही विस्तार करते हैं। राजनीति पूर्णतः राजा के स्वयं के राज्य के सुसंचालन में अपनायी जाने वाली यह पद्धति है। जो मन सामान्य के हित में कार्य करे। किसी भी राज्य में सुरक्षा के लिए अपनायी जाने वाली राजनीति के दो ही लक्ष्य रहते हैं 1.स्वयं की उन्नति, 2. शत्रु की अवनति। राजनीति को अपना कार्य क्षेत्र स्वीकार करने वाले कुशल राजनीतिज्ञ अपनी वागमिता को अवश्य विकसित करते हैं क्योंकि नेतृत्व को वक्तृत्व में भी निपुण होना चाहिए। वस्तुतः नीतिगत व्यवहार से अपनी उन्नति और शत्रु की अवनति ही राजनीति का मूल है।

समूलाघातमध्रन्तः परात्रोद्यन्ति मानिनः।9

ज्ञानीपुरुष शत्रुओं का समूल नष्ट किये बिना उदित नहीं होता है। अपने शत्रु राजाओं को पूर्णतः नष्ट करके ही कोई भी राजा अपनी विजय स्थापित कर सकता है। समूल नष्ट न होने वाला शत्रु अवसर पाते ही पुनः अपनी प्रभुता स्थापित करने लगता है। भारत ने शत्रु अंग्रेजों को समूल नष्ट करके विश्वमंच पर पुनः अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया। कवि माघ ज्ञानियों के स्वभाव को वर्णित करते हुए कहा है कि जैसे शत्रु रूप प्रगाढ़ अन्धकार को पूर्णतः नष्ट करने वाला सूर्य उदित होकर सारे संसार को प्रकाशित कर देता है, उसी प्रकार मानी पुरुष सदैव शत्रुओं को समूल नष्ट करके ही उदीयमान होते हैं।

विपक्षमखिलाकृत्य प्रतिष्ठा खलु दुर्लभा।
अनीत्वा पप्रतां धूलिमुदकं नावतिष्ठते॥10

महाकवि माघ ने उदाहरण देते हुए कहा है कि धूलि को बिना कीचड़ बनाये पानी भूमि पर नहीं ठहरता है अपनी धूलि को कीचड़ में बदल कर ही पानी अपनी प्रभुता स्थापित कर लेता है। प्रत्येक मनुष्य को स्वयं स्थापित करने के लिए सदैव अग्रणी बने रहने के लिए अपने विपक्ष और प्रतिस्पर्धियों को पराजित करना ही आवश्यक है। कला, साहित्य, राजनीति का अन्य किसी भी क्षेत्र में मनुष्य की अवनति करके ही अपनी उन्नति प्राप्त कर सकता है। सामान्यतः प्रतिष्ठा सहजता से ही अर्जित नहीं हो पाती है। मनुष्य भले ही कितना ही सार्थक प्रयास कर ले, किन्तु शत्रु उसे हमेशा आगे आने से रोकता है उसकी प्रगति में विघ्न उपस्थित करता है अतः कवि माघ ने राजनीति लाभ के लिये शत्रु को समूल नष्ट करने की आवश्यकता पर बल दिया है।

ध्रियते यावदेकोऽपि रिपुस्तावत्कुतः सुखम्।
पुरः किदनाति सोयं हि सैहिकेयोऽसुरदुहाम्॥11

कवि माघ का कथन है कि जब तक एक ही शत्रु बना रहता है तब तक सुख कहा से हो सकता है ? शत्रुओं के विद्यमान रहते कोई भी सुखी नहीं रह पाता है। विष की बूंद आज अमृत के अमृत्व को नष्ट कर देती है। खटाई का अंश आज दूध के मधुर स्वाद एवं स्वरूप को परिवर्तित कर देता है। इसीलिये यह कथन सत्य प्रतीत होता है कि सुख पाने के लिए शत्रु भी समय आने पर गहन विपत्ति का कारण बन जाता है जैसे असुर वैरी देवताओं के देखते-देखते ही शत्रु राहु शनि में सम्पूर्ण अंधकार को नष्ट करने वाले चन्द्रमा को पीड़ित करता ही है क्योंकि शत्रु का यह स्वभाव ही होता है कि किसी भी अवसर को पाते ही वह अपने विपक्षी की हानि का कारण बन सकता है।

पकर्त्राऽरिणा सन्धिर्न मित्रेणापकारिणा।
उपकारापकारौ हि लक्ष्यं लक्षणमेतयोः॥12

कुशल राजनीतिज्ञ अपने राज्य के सुसञ्चालन के लिये साम, दाम, दण्ड और भेद की नीति का अनुसरण करते हैं यद्यपि आचार्य मनु ने कहा है कि-

सारना दानेन समस्तैरूत वा पृथक्।
विजेतुं प्रयतेतारीत्र युद्धेन कदाचन॥13

अर्थात् राजा को साम, दाम, दण्ड और भेदादि से किसी एक अथवा समस्त नीतियों के द्वारा शत्रु को जीतने का प्रयास करना चाहिए, युद्ध से नहीं। लेकिन कवि माघ की मान्यता है कि दण्ड के द्वारा वश में करने योग्य शत्रु के साथ साम अर्थात् प्रेम प्रदर्शन और शान्ति का व्यवहार हानिकारक होता है। प्रायः सरलता पूर्ण व्यवहार कुटिल लोगों की बुराइयों को बढ़ने के अवसर प्रदान करता है। समय पर दिया गया दण्ड उसे कुमार्ग पर आगे बढ़ने से रोक सकता है। इसीलिये कवि माघ ने कहा है कि दण्ड के द्वारा वश में करने योग्य शत्रु के साथ प्रेम और शान्ति पूर्ण व्यवहार हानिकारक सिद्ध होता है, अतः कुटिलजनों के प्रति कुटिलतापूर्ण व्यवहार ही उचित है।

गुणानामायथातभ्यादर्थ विप्लावयन्ति ये।
अमातयव्यञ्जना राज्ञां दूध्यास्ते शत्रुसंज्ञिता॥14

किसी भी राज्य की सफलता का आधार मात्र उस राज्य का राजा ही नहीं होता है वरन् मंत्री, सेना और प्रजा आदि सभी राज्य के प्रमुख अंगराज्य को सफलता अथवा असफलता प्रदान करते हैं। राजा के बाद राज्य का दायित्व प्रमुख रूप से मंत्री पर निर्भर होता है मेरूतुंगाचार्य ने कहा है-

अकरात् कुरूते कोषम् अथवा देषरक्षणम्।
देषवृद्धिमयुद्धाष्य स मंत्री बुद्धिमांष्य स॥

वस्तुतः बुद्धिमान मंत्री वही है जो बिना कर लगाये कोष की वृद्धि करता है, बिनाकिसी की हिंसा किये देश की रक्षा करता है तथा बिना युद्ध किये ही राज्य का विस्तार करता है। महाकवि माघ का कथन है कि सन्धि विग्रहादि गुणों का यथा योग्य विभाजन नहीं करके जो राज्य कार्य को बिगाड़ते हैं, उन कपटपूर्ण मंत्री वेश धारण करने वाले सहायक अंग का शत्रुतुल्य त्याग कर देना चाहिये क्योंकि प्रत्येक राज्य की सुख समृद्धि के लिये मात्र राजा को ही नहीं वरन् अमात्यादि को भी उचित नीति का क्रियान्वयन करना आवश्यक है।

प्रत्येक राज्य प्रमुख को चाहिए कि यदि उनके अधीनस्थ मंत्री योग्य नीति के प्रतिकूल कार्य करके राज्य में विपत्तियों को जन्म देते हैं, राज्य व्यवस्था को दूषित करते हैं तो ऐसे मंत्रियों को तत्काल शत्रु के समान त्याग देना चाहिए।

नतिरापदि यद्गम्यः परस्तनमानिनोहिये।15

‘‘मानषरीराहिराजानः’’ अर्थात् मान ही राजाओं का शरीर है। ये मानी जन बिना पुरुषार्थ के कुछ भी अर्जित नहीं करना चाहते हैं। मानी पुरुषों के करने की विषय में कवि माघ ने कहा है कि आपत्ति में फंसे हुए शत्रु पर आक्रमण करने की जो नीति है, वह मानी पुरुषों के लिए लज्जाजनक है क्योंकि मानी पुरुष आपत्ति ग्रस्त कमजोर शत्रु पर आक्रमणनहीं करते हैं वरन् वे तो ससैन्य शत्रु पर आक्रमण कर विजय की अभिलाषा करते हैं। प्रकृति स्वयं इस कथन की उदाहरण है। राहु ग्रह भी पूर्ण चन्द्रमा पर ही आक्रमण करता है, मानी पुरुष भी समृद्ध शत्रु पर आक्रमण करके ही हर्ष का अनुभव करते हैं। वस्तुतः विजय का आनन्द तभी आता है जब युद्ध समकक्ष शत्रु के साथ हो। आपत्ति ग्रस्त, सैन्याभाव अस्त्र-शस्त्रादि रहित अथवा अन्य किसी दुर्बलता वाले शत्रु राजा पर आक्रमण करना मानियों के लिये अपमान जनक होता है। वीर पुरुष दुर्बल पर कभी वार नहीं करते हैं, वे शक्ति हीनों को क्षमा कर देते हैं।

प्रज्ञोत्साहालतः स्वामी यतेताधातुमाग्मनि।
तौ हि मूलमुदेष्यन्त्या जिगीषोरात्मसम्पदः॥16

राजनीतिक कौशल को प्रतिपादित करते हुए कवि माघ ने कहा है कि राजा को अपने में बुद्धि तथा उत्साह दोनों को रखने का प्रयत्न करना चाहिए, क्योंकि वे दोनों विजयाभिलाषी राजा के भविष्य में काम आने वाली आत्म सम्पत्ति की जड़ है। उत्साह के विषय में कहा भी गया है-

अनिर्वेदः श्रियोमूलभनिदः परं सुखम्।17

उत्साह ही श्री का कारण है और उत्साह ही परम् सुख है। उत्साह हीन मनुष्य किसी भी क्षेत्र में अग्रसर नहीं हो पाता है, इसीलिये महाकवि माघ ने की कहा है-

कतरायेऽव्यषक्ता वा नोत्साहस्तेषु जायते।
प्रायेण हि नरेन्द्र श्री सोत्साहैरेव भुज्यते॥18

जो अधीर और असमर्थ होते हैं उनमें उत्साह उत्पन्न नहीं होता है। प्रायः उत्साही पुरुष ही राजलक्ष्मी का उपभोग करते हैं। आपत्ति और कष्ट से भी बुद्धिमान उत्साह को नहीं छोड़ते हैं, क्योंकि उत्साह में बल होता है, उत्साह के आरम्भ मात्र से ही सम्पदाओं का आगमन प्रारम्भ होता है। पाश्चात्य लेखक एमर्सन का तो कथन है-

Nothing great was ever achived without enthusiasm. (एसेज सर्किल्स)

अर्थात् बिना उत्साह के कोई महान् उपलब्धि कभी नहीं हुई। उत्साह के साथ ही कवि माघ ने राजा में बुद्धि को भी आवश्यक माना है। बुद्धि के अभाव में मात्र उत्साह समृद्धि प्रदान करने में समर्थ नहीं होता है। वस्तुतः कर्तव्य का ज्ञान ही बुद्धि कहलाता है। यदि बुद्धि और उत्साह दोनों के सहयोग से प्रयास किया जाये तो किसी भी राजा की विजय अवश्यंहावी है। महर्षि वेद व्यास ने आचार्य मनु का सन्दर्भ देते हुए कहा है-

बुद्धिमूलं तुविजयं मनुरब्रवीत्।19

क्योंकि प्रभावशाली बुद्धि बलवान को भी पछाड़ देती है। बुद्धि के द्वारा वर्तमान बल का पालन होता है। बढ़ता हुआ शत्रु भी बुद्धि के समान परास्त होकर कष्ट को प्राप्त करता है। सोच समझकर बुद्धि से किया गया काम सर्वोत्तम होता है महर्षि वेदव्यास ने महाभारत में कहा है कि जो काम बुद्धि से सम्भव है वह बल से भी सम्भव नहीं है।20 बुद्धि कठिन कार्य का साधन है-

दुष्करं साधनम् प्रज्ञा।21

अतएव विजयाभिलाषी राजा में बुद्धि और उत्साह दोनों आवश्यक है। एक दूसरे के अभाव में सफलता संभव नहीं है क्योंकि अकेली बुद्धि अथवा अकेला उत्साह विजय प्राप्ति के लिये पर्याप्त नहीं होता है।

तेजः क्षमा वा नेकान्तात कालज्ञस्य महीपतेः।22

प्रायः कहा जाता है कि वही राजा श्रेष्ठ राजा है जो वीर हो, तेजस्वी हो। किन्तु वीर होते हुए भी जो क्षमाशील हो वही वस्तुतः श्रेष्ठ राजा है इस विजय में महाकवि माघ का मन्तव्य है कि समयज्ञ राजा के लिये केवल तेज या क्षमा धारण करने का नियम नहीं है वरन् समयानुकूल दोनों का ही आश्रय राजा के लिये आवश्यक है। केवल तेज अर्थात् बल और दण्ड प्रयोग से ही राज्य में सुख-शान्ति स्थापित नहीं की जा सकती है, इसीलिये विश्व में सर्वत्र जहाँ भी तानाशाही शासन व्यवस्था है, अनुशासित होते हुए भी प्रजा सुखी नहीं रह पाती है और न ही उस राष्ट्र को विश्व राजनीति में प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। दूरी और क्षमाकरण करने वाले राजा का राज्य कभी शत्रुओं से सुरक्षित रह पाता है, क्योंकि शत्रु राजा क्षमाशील राजा के राज्य को अधिक सुलभता से अधिग्रहीत कर सकता है। कहा गया है-

क्षमया तु बिना भूपो न भाव्याविह्लसद्गुणैः।23

सम्पूर्ण गुणों से युक्त भी राजा क्षमा रहित हो तो सुशोभित नहीं होता है। अतः प्रत्येक राजा में यथा समय तेज और क्षमा दोनों का ही विद्यमान रहना आवश्यक है। जिस प्रकार शृं¯ारादि रसों के विषय में जानने वाला कवि तदनुसार ओजगुण से युक्त प्रौढ़ रचना करता है किसी एक ही गुण का आश्रय नहीं करता है। उसी प्रकार किस समय में कौन सा कार्य करना चाहिए इसे जानने वाले राजा को कार्यानुसार तेज अर्थात् दण्ड और बल या क्षमा का प्रयोग करना चाहिए।

तन्त्रालापविदा योगैर्मण्ऽलान्यधितिष्ठता।
सुनिग्रहा नरेन्द्रेण फणीन्द्रा इव शत्रवः॥24

शत्रुन्दमन और राष्ट्रोत्थान के लिये प्रत्येक राजा को तत्र और अवाय का ज्ञान होना चाहिए। तत्र अर्थात् अपने राष्ट्र का चिन्तन अपनी शक्ति का सृजन और वर्द्धन तथा अवाप अर्थात् पर राष्ट्र का चिन्तन और दूसरों की शक्ति का अपने में अध्यारोप करना। इन दोनों ही ज्ञात तथा योगों अर्थात् सामादि उपायों और गुप्तचरों द्वारा अपने राष्ट्र को वशीभूत करता हुआ राजा सरलता है शत्रुओं का दमन उस प्रकार करता है जिस प्रकार तन्त्र अर्थात् मारूडिकादि शस्त्र तथा अवाय अर्थात् औषध प्रयोग या सरसो आदि फेंक कर सर्प के आकर्षण को जानने वाला और योगों (देवतारि के ध्यानों) से मण्डलों (माहेन्द्र, वायव्य आदि देवतायतनों) को आक्रान्त करता हुआ सपेरा सांपों को सरलता से वशीभूत कर लेता है प्रत्येक राज्य में गुप्तचरों की नियुक्ति का प्रयोजन यही होता है कि वे अपने राष्ट्र और शत्रु राष्ट्र की विशेषताओं और न्यूनतओं की जानकारी से राजा को अवगत कराए जिससे राजा योग्य मार्ग अपना सके।

कर प्रचेयामुत्तुङ्गः प्रभुषक्तिं प्रथीयसीम्।
प्रज्ञाबलवृहन्मूलः फलत्युत्साह पादपः॥25

प्रभुता राजा की प्रसिद्धि का कारण होती है। प्रभुता में बुद्धि के साथ राजा की कीर्ति भी प्रसारित होती है। अपनी प्रभुता स्थापित करने के लिए राजा में उत्साह और शक्ति के साथ ही मन्दशक्ति अर्थात् बुद्धिबल भी परमावश्यक है।

महाकवि माघ का कथन है कि बुद्धि बल रूपी लम्बी जड़ वाला उत्साहरूपी वृक्ष पर अर्थात् राजदेय भाग से बढ़ने वाली प्रभु शक्ति अर्थात् राजकोष और चतुरि¯णी सेना रूप तेज विशेष को फैलाता है। जिस प्रकार ऊँंचे तथा लम्बी जड़ वाले पेड़ में बड़े-बड़े और हाथ में तोड़ने योग्य फल होते हैं। उसी प्रकार श्रेष्ठ तथा मन्त्र शक्ति युक्त उत्साह होने से राजा के तेज विशेष में बुद्धि होती है। अतः प्रभुता में विस्तार के इच्छुक राजा में उत्साह के साथ बुद्धि भी परमावश्यक है।

अनल्पत्वात्प्रधानात्वाद्वंष स्येवेतरे स्वराः।
विजिगीषोर्नृपतयः प्रयान्ति परिवारताम्॥26

यशस्वी, श्रेष्ठ राजा का अन्य राजा गण भी अनुकरण करते हैं। विजयेन्द्र राजा के प्रज्ञा तथा उत्साह से परिपूर्ण होने पर अन्य राजा लोग उस प्रकार परिपारता को पाते हैं और राजाओं की कार्य सिद्धि में सहायक होते हैं, जिस प्रकार अधिक उच्चस्वर तथा मुख्य स्वर होने से दूसरे स्वर अर्थात् वीणा, गानादि के स्थर बांस (बंशीनाम बाध) के परिवारत्व को प्राप्त होते हैं। जैसे मुख्य स्वर के साथ दूसरे गौड़ स्वर भी मिल कर एक स्वर हो जाते हैं, जैसे छोटी-छोटी नदियाँ बड़ी नदी में मिलकर एकाकार हो जाती है। उसी प्रकार प्रज्ञा और उत्साह युक्त विजयार्थी में सहायक बन जाते हैं। वैशिष्ट्य के अभाव में कोई किसी का अनुकरणीय नहीं बन सकता है अतः अन्य को सहायक बनाने के लिये भी राजा में प्रज्ञा और उत्साहवादी विशेष गुण आवश्यक कहे गये हैं।

अप्यनारभमाणस्य विभोरुत्यादिताः परैः।
व्रजन्ति गुणतामर्थाः शब्दा इव विहायसः॥27

बहुगुणवान राजा में प्रज्ञा, उत्साह आदि के साथ शक्ति अर्थात् बल होना भी आवश्यक है। यद्यपि नीतिज्ञों का कथन है कि- ‘‘यः क्रियावान स पण्डितः’’ किन्तु राजाओं के विषय में कवि माघ का चिन्तन कुछ भिन्न है। वे कहते हैं-स्वयं क्रिया शून्य भी सर्व समर्थ विजिगीषु राजा के दूसरे अर्थात् अन्यथा राजाओं या गुप्तचरादि के द्वारा सम्पादित प्रयोजन उस प्रकार गुण बन जाते हैं, जिस प्रकार स्वयं कुछ नहीं करने वाले भी व्यापक आकाश के दूसरे पटहादि के द्वारा पैदा किये गये शब्द गुण बन जाते हैं। समर्थ राजा स्वयं निष्क्रिय होकर भी दूसरे से साधित कार्य को वैसे अपना गुण बना लेते हैं। ‘‘षब्द आकाष का गुण है’’ यह तर्कसम्भव सिद्धान्त है। अतः राजा को शक्तिमान होना आवश्यक है।

सामर्थ्यवान् के लिये कुछ भी असम्भव नहीं। शक्ति और सामर्थ्य के रहते निष्क्रिय राजा के भी सारे कार्य अन्य राजाओं और मंत्रियों की सहायता से सिद्ध हो जाते हैं। इस प्रकार सामर्थ्य निष्क्रिय राजाअें को भी प्रभाव पूर्ण बना देता है।

यातव्यपाषि्र्र्णप्र्राहादिमालायामाधिकद्युतिः।
एकार्थतन्तुप्रोतायां नायाको नायकायते॥28

‘नायको नेतरि श्रेष्ठे हारमध्यमणावपि’ कहकर विद्वानों ने यह स्वीकार किया है कि नायक नेताओं में वैसे ही अग्रणी होता है जैसे हार में मणि। तेजस्वियों की गणना हमेशा उग्र राज्यों में होती है। पृथ्वी पर सर्वाधिक तेजस्वी राजा ही सम्राट होता है। अतएव प्रत्येक राजा को अपनी तेजों वृद्धि का सर्वदा प्रयास करते रहना चाहिए। कवि माघ का कथन है कि एक प्रयोजन रूपी धागे में ग्रथित तथा यातस्य (शत्रु) और परिस्थिग्रह (पीछे रहने वाला राजा) आदि की श्रेणियों में अधिक तेजस्वी नायक ही नायक (प्रमुख) के समान आचरण करता है।

षाड्गुण्यमुपयुञ्जीत शक्त्यपेक्षा रसायनम्॥29

प्रत्येक मनुष्य सदैव अपने जीवन में सफलता प्राप्त करने की अभिलाषा रखता है। किसी भी सफलता की पृष्ठभूमि में मनुष्य के अन्तर्वाह्य अर्थात् शारीरिक और मनोबल दोनों ही निहित रहते हैं। राजनीति के परिप्रेक्ष्य में शक्ति और सफलता की अपेक्षा करने वाले राज प्रमुख (राजा) को षड्गुण रूपी रसायन का सेवन करना चाहिए। महाकवि माघ ने राजा को अपनी शक्ति वर्द्धन के लिये षड्गुण अर्थात् सन्धि विग्रह आसन, यान, संश्रय और द्वैधीभाग का समयानुकूल उपयोग करने पर बल दिया है। जिस प्रकार सामान्यतः शक्ति वर्द्धन औषधि के रूप में रसायन का उपयोग करने पर मनुष्य की शक्ति में वृद्धि और बल की पुष्टि होती है, उसी प्रकार राज्य संचालन में उन षङ्गों का उपयोग करने में राजा की शक्तित्रय अर्थात् प्रभुशक्ति, मन्त्रशक्ति तथा उत्साह शक्ति में भी वृद्धि होती है। तथा स्वामी, अमात्यादि सत्तप्रकृति भी स्थिर तथा शत्रु पीड़न में समर्थ होती हुई बलवती होती जाती है। अतः प्रत्येक राजा को अपने और प्रजाहित में शक्ति की अपेक्षा को पूर्ण करने हेतु षङ्गरूपी रसायन का सेवन करते रहना चाहिए।

स्थाने शमवतां शक्त्या व्यायामें वृद्धिरङ्गिनाम्।
अयथा वलमारम्भो निदानं क्षयसम्पदः॥30

राज्य के प्रमुख अंग[सम्पादन]

नीतिज्ञों ने राज्य के प्रमुख अंगों के विषय में विस्तारपूर्वक प्रतिपादित करते हुए कहा है-

स्वामी जनपदोऽमात्यः कोष्ते दुर्ग बल सुखम्।
राज्यं सत्त प्रकृतयङ्गं नीतिज्ञाः समप्रचक्षते।

स्वामी, जनपद, अमात्य, कौश, दुर्ग, बल और सुख ये सातों राज्य के प्रकृत्यंग कहे जाते हैं। इस विषय में महाकवि माघ ने कहा है कि शक्य विषय में शान्त और क्षमाशील सत्तांग वाले राजा अपनी प्रभुशक्ति, मन्त्रशक्ति तथा उत्साह शक्ति के अनुसार सन्धि आदि षङ्गुणों के उपयोग रूप व्यायाम करे तब ही उसकी राज्य शक्ति में वृद्धि होती है तथा अपनी शक्ति से अधिक क्षमता वाले कार्य को प्रारम्भ कर देने से राजशक्ति का क्षय होने लगता है। कवि ने अत्यन्त सुन्दर उपमान का प्रयोग करते हुए कहा कि जिस प्रकार उचित विधि से व्यायामक रने से शरीर की शक्ति बढ़ती है और यदि शक्ति की तुलना में अधिक व्यायाम कर लिया जाये तो शारीरिक शक्ति का क्षय होने लगता है। उसी प्रकार राज्य शक्ति भी राज्य षङ्गुणों का उपभोग करने से बुद्धि को प्राप्त होती है और प्रतिकूल स्थिति में राज्य की प्रगति बाधित होने लगती है। अतः प्रत्येक विजयाभिलाषी राजा को अपनी शक्ति और सामर्थ्य को ध्यान में रखकर ही आगे बढ़ना चाहिये।

चिरादपि बलात्कारों बलिनः सिद्धयेऽरिषु।31

विद्वानों ने समय की महत्त्वा को स्वीकार करते हुए कहा है कि समय पर प्रारम्भ किया गया कार्य ही फलित होता है, समय चूक जाने से सफलता भी हाथ नहीं लग पाती है। समय पर किया गया आक्रमण ही शत्रु को पराजित कर सकता है परन्तु कवि माघ का मानना है कि बल शाली के लिये शत्रु पर विलम्ब से किया गया भी बल प्रयोग सिद्धि के लिये होता है। शक्तिशाली को सफलता अवश्य मिलती है। अतः राजा को सदैव अपन शक्ति त्रय बढ़ाने का प्रयास करते रहना चाहिए। माघ के इस कथन को पूर्णतः स्वीकार न करते हुए यह कहना अनुचित नहीं होगा कि शक्ति के साथ समय का सुसंयोजन भी आवश्यक है, अन्यथा राज्य की उन्नति असंभव होती है।

कृत्वा कृत्यविदस्तीर्थेत्सन्तः प्रणिधयः पदम्।
विदांकुर्वन्तु महतस्तलं बिद्धिषदम्भसः॥32

राजाओं को ‘चारचक्षुः’ पद से भी संबोधित किया जाता है क्योंकि राजा अपने सम्पूर्ण राज्य की व्यवस्था को गुप्तचरों के नेत्रों से ही देखते है। गुप्तचरों द्वारा दी गयी जानकारी और किये गये कार्यों के द्वारा ही राजा दूसरे देशों के साथ क्रिया कलाप प्रारम्भ करते हैं। अतएव कवि माघ ने कहा है कि कार्यज्ञ गुप्तचर लोग तीर्थों में निवास कर बड़े शत्रु रूपी पानी के तल को मालूम करे। जिस प्रकार एक कुशल तैराक पानी में पैर रखते ही उसकी अगाधता को जान लेता है उसी प्रकार राजा के श्रेष्ठ गुप्तचर मन्त्र आदि अट्ठारह तीर्थों में अवस्थित होकर शत्रु के प्रति अनुरक्त और विरक्त जन का पता लगाये। पंचतंत्र के तृतीय तन्त्र में शत्रु पक्ष के 18 तीर्थ कहे गये हैं-मंत्री, पुरोहित, सेनापति, युवराज, द्वारपाल, आर्न्वसिक, प्रकाशक लाने वाले, रखने वाले तथा बतलाने को लायक, रनाधनाध्यक्ष, गजाध्यक्ष, कोषाध्यक्ष, किलाध्यक्ष,कराध्यक्ष, सीमारक्षक और उद्धत भृत्य। इनमें भेद करने से शत्रु शीघ्र ही वशीभूत हो जाता है। राजा के स्वयं के पक्ष के 15 तीर्थ कहे गये हैं- पटरानी, माता कंञ्चुकी भालाकार, शय्यापटक, ज्योतिषी, राजबोध, पानी लाने वाला, पान लाने वाला, आचार्य अंगरक्षक स्थानचिन्तक, छत्रधर और विसिनी। इन सबके विपरीत हो जाने पर राजा पराजय का पात्र बन जाता है। अतएव राज्य में नियुक्त गुप्तचरों को स्वयं के राज्य तथा शत्रु राज्य की भी वास्तविक जानकारी से सरल को अवगत कर देना चाहिये।

गुप्तचरों के द्वारा सही जानकारी न मिलने या मिलकर भी राजा द्वारा यथोचित उपाय न किये जाने के परिणाम स्वरूप ही भारत ने अनेक राजनेता खो दिये है। साथ ही गुप्तचरों की कार्य के प्रति उपेक्षा के कारण ही अनेक बार देश को सामरिक, राजनीतिक तथा आर्थिक क्षति भी उठानी पड़ती है।

अज्ञात दोषौर्दोषज्ञैरूद्दूष्योमयपेतनैः।
मेद्या शात्रोरपित्यक्तषासनैः सामवायिका॥33

जहाँ नीतिशास्त्र के विरुद्ध एक पद भी रखने का विधान नहीं है, ऐसी सुन्दर जीविका वाली, उचित परितोषिक वाली राजनीति में गुप्तचरों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। राजा को चतुर्विद्य नीति साम, दाम, दण्ड, भेदादि का यथोचित उपयोग करने में गुप्तचरों का भी पर्याप्त सहयोग अपेक्षित होता है। कवि माघ का मानना है कि जिनमें दोषों को दूसरा नहीं जानता तथा जो दूसरों को जानते हैं ऐसे दोनों ओर से वेतन लेने वाले गुप्तचरों द्वारा कपटलेखादि को दिखाकर शत्रु के मंत्री सेवक आदि समूहों का भेदन कराना चाहिए, क्योंकि भेद की यही नीति है। लोक में प्रसिद्ध उक्ति यह भी है कि युद्ध और राजनीति में सब कुछ क्षम्य है, अतः राजा को समय और परिस्थिति के आधार पर गुप्तचरों का यथायोग्य और यथाशक्ति सहयोग प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए।

परिभवोऽरिभवो हि सुदुःसहः।34

राजाओं के जीवन में यश अथवा कीर्ति महत्त्वपूर्ण स्थान रहती है। उनकी प्रभुता, उनकी शक्ति, उनकी विजय और उनकी क्षमा शीलता आदि ही यश के आधार होते हैं। राजनीति में राजा के शत्रु और मित्र की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण होती है। सन्मार्ग और प्रगति के पथ पर बढ़ने में सहायक मित्र राज्य के सदैव हितैषी होते हैं। किन्तु शत्रु सदैव राजा की प्रगति के विघ्न कारक होते हैं वे एन-केन-प्रकारेण अपने विपक्षी का तिरस्कार करने की योजना बनाते रहते हैं। स्वाभिमानी राजा ऐसे शत्रुओं के द्वारा किये गये अपमान को सफल नहीं कर पाते हैं। राजा के लिये शत्रु द्वारा पराभव को प्राप्त करना सर्वाधिक दुःसह होता है। स्वाभिमानी राजा पराभव की उपेक्षा मृत्यु का वरण करना अधिक श्रेष्ठ समझते हैं।

अनन्तर प्रकृतिः शत्रुः।35

कहकर चाणक्य ने कहा है कि अपने देश से जिस देश की सीमा सटी होती है, वहाँ का राजा स्वभावतः शत्रु को जाता है। शत्रुता किसी भी कारण से हो, कोई भी पराक्रमी और मनस्वी राजा अपने शत्रु द्वारा किये गये अपमान और पराजय को सहन नहीं कर पाता है।

निरसितुमरिमिच्छोर्य तदीयाप्तयेणानिय माधिगत वन्त स्तेऽपि हन्तव्यपक्षे।36

यह सामान्य राजनीति है कि विजयेच्छु राजा अपने शत्रु-बिनाश के लिये उसके आभिंतों के साथ नष्ट कर दे। महाकवि माघ का कथन है कि धने भयंकर को नष्ट करने के लिये उदय को प्राप्त किये सूर्य ने रमणीय तारा समूहों को भी बलात्कार पूर्वक नष्ट कर दिया क्योंकि शत्रु का नाश करने की इच्छा करने वाले व्यक्ति के लिये जो शत्रु के आशय से श्री और समृद्धि को पाये हुए हैं वे भी नष्ट करने योग्य ही हुआ करते हैं। अतः शत्रु के आश्रितों को भी नष्ट कर दिया जाना राजनीति दृष्टि कोण से उचित एवं आवश्यक है।

प्रभुचित्तमे हि जनोऽनुवर्तते।37

सुप्रसिद्ध कहावत है- ‘‘यथा राजा तथा प्रजा’’ वस्तुतः प्रत्येक राष्ट्र की प्रजा अपने राजा की ही क्रियाओं का अनुकरण करती है, क्योंकि राजा सभी दृष्टियों में प्रजा के प्रमुख और अपने सेवकों के स्वामी होते हैं। सेवक तो सदैव अपने स्वामी के चरित्र का ही अनुसरण करते है उन्हीं की चित्तवृत्ति के अनुसार काम करते हैं।

दैनिक व्यवहार में भी यह कथन सर्वथा सिद्ध होता है, क्योंकि जो भी सेवक स्थायी रहकर स्वामी की अनुकम्पा का अभिलाषी होता है, वह अपने प्रभु की इच्छा का पूर्णतः अनुकरण करता हुआ कभी उसके प्रतिकूल व्यवहार का प्रयोग नहीं करता है। यही कारण है कि सम्पूर्ण शासन प्रणाली क्षेत्र विशेष के प्रमुख के आदेशों के पालन से ही संचालित होती है। आदेशों के विपरीत काम करने वाले अथवा आदेशों की अवहेलना करने वाले सेवक अंततः स्वामियों के कोप भाजन ही बनते हैं शिशुपालवधम् महाकाव्य में श्रीकृष्ण की निन्दा करते हुये भी शिशुपाल पर श्रीकृष्ण के संकेत से अपने विचारों को रोके हुये यदुवंशी राजा कुछ नहीं हुये। इसीलिये भारतीय प्रजातन्त्र में भी शासन व्यवस्था के अन्तर्गत मंत्री एवं अधिकारियों के अधीनस्थ काम करने वाले उच्चधिकारियों की आज्ञा पालन में भी सदैव तत्पर रहते हैं।

भवति स्फुटमागतो विपक्षान्न सपेक्षाऽपि हि निवृत्तेविधता।38

शत्रु स्वभाव से ही परहित-वाधक होता है। राजा के लिये तो अपने शत्रु के मित्र भी शत्रु की भांति होते हैं। इसीलिये कवि माघ ने कहा है कि शत्रु पक्ष से आया हुआ सपक्ष अर्थात् मित्र भी सुख देने वाला नहीं होता है। यद्यपि मित्र हितैषी होता है परन्तु हितघ्न शत्रु का साथ देने के कारण वह मित्र भी सुखकारी नहीं होता है अतः कवि ने राजाओं के लिये संकेत किया है कि जब शत्रु पासे आया हुआ अपना मित्र भी हितकारी नहीं होता है तो समय पर चलाये गये शत्रुओं के बाणादि तो निस्सन्देह द्यातक ही होते हैं। शत्रु का प्रतिनिधित्व करने वाला अपना मित्र किसी भी राजा के लिये विश्वसनीय नहीं हो सकता।

राजा का विनम्र भाव होना[सम्पादन]

मानव स्वाभाव को अत्यन्त सहज रूप में व्यक्त करते हुए भारवि ने कहा है कि इस लोक में धनवानों से दो प्रकार से धन लिया जा सकता है- प्रथम तो ग्रहीला प्रबल हो तथा दूसरे उसका उसमें घनिष्ट प्रेम हो। इसके विपरीत निर्बल या अप्रिय व्यक्ति की प्रार्थना विपत्ति रूप फल की उत्पादि का है। यह व्यवहारिक सत्य है कि जब भी किसी सामाजिक कार्य के लिये किसी धनवान से सहयोग राशि एकत्रित करनी होती है तब उस धनी व्यक्ति से यही मनुष्य धन प्राप्त कर सकता है जो स्वयं अटल हो धन प्राप्त किये बिना जो घनिक के सामने से हटने को तैयार ही न हो या फिर ग्रहीता की उस धनी से घनिष्टता हो। जहाँ घनिष्टता होती है वहाँ सम्बन्ध और व्यवहार ही प्रमुख होते हैं, धन-दौलत और अप्रिय व्यक्ति को कमी भी धनवानों के धन की प्राप्ति नहीं हो सकती है, प्रबल और प्रिय गृहीता ही किसी भी धनिक से धन ले पाने की सामर्थ्य रखता है।

गृहानुपैत प्रणयादमीप्सवों भवन्ति नापुण्यकृतां मनीषिणः39

सामन्त लोक में लोगों का जीवन मनीषियों के दर्शन मात्र से धन्य माना जाता है और ऐसे महात्मा की चरण रज यदि किसी संसारी के घर पहुँच जाती है तो वह घर परम पावन माना जाने लगता है। यद्यपि दर्शनार्थी महात्माओं के दर्शन पाने के लिये स्वयं उनके समीप आ जाते हैं, स्वार्थ न होने के कारण महात्माओं को कभी किसी के निवास पर जाना नहीं पड़ता है। परन्तु भोजनादि के लिये जब भी मनीषिगण कहीं जाते हैं तो वह घर किसी पुण्यात्मा गृहस्वामी का ही होता है क्योंकि अपुण्ययात्माओं अर्थात् द दुराचारी एवं कुमार्ग गांमियों के घर वे प्रेम अथवा स्वेच्छा से कदापि नहीं जाते हैं। ‘अतिथिदेवा भव’ की संस्कृति वाले भारत देशमें सामान्य अतिथि का भी आदर और सम्मान किया जाता है तब फिर महात्मा जैसे विशिष्ट अतिथियों के आदर की तो बात ही कुछ और है। परन्तु स्वभावतः श्रेष्ठ आचरण और अपुण्यात्माओं के घर अपने चरण नहीं रखते हैं क्योंकि वे सदैव सन्संगति में रत रहते है, असज्जनों का समागम उन्हें प्रिय नहीं होता है।

ग्रहीतुमार्यान्परिचर्यया मुहुर्महानुभावा हि नितान्त मार्थिनः।40

महाप्रभावी लोग पूजा-अर्चना द्वारा स्वयं से श्रेष्ठ जनों की बारम्बार आराधना करने के लिये अत्यधिक अभिलाषी होते है। श्रेष्ठ जनों के प्रति आराधना के प्रभुखतः दो कारण होते हैं। प्रथम तो अपने किसी स्वार्थ की सिद्धि करना और द्वितीय अपने प्रभाव में और अधिक वृद्धि करना। किन्तु महान कहे जाने वाले दया दक्षिपयादि गुण सम्पन्न महापुरुषों का यह स्वभाव ही रहता है कि वे अपने गुरुजनों का सदैव आदर करते हैं। उनका शुभाशीष पाने के लिये ही वे एक नहीं वरन् अनेक बार उनकी आराधना करते हैं। शिशुपालवध महाकाव्य में प्रसंग आता है कि विधिवत् यज्ञकर्ताओं के प्रिय श्रीकृष्ण भी उन प्रसन्न नारद की पूजा कर अत्यन्त हर्षित हुए। यहाँ श्रीकृष्ण जैसे प्रभावपूर्ण व्यक्ति भी पूज्य देवर्षि नारद ऋषि की पूजा कर अत्यन्त हर्षित हुए। यहाँ श्रीकृष्ण जैसे प्रभावपूर्ण व्यक्ति भी पूज्य देवर्षि नारद ऋषि की पूजा करके आनन्द को प्राप्त हुए हैं क्योंकि वही वस्तुतः प्रभावी भी हैं जो अपने से श्रेष्ठ और उत्कृष्ट जन का सदैव आदर-सत्कार कर उन्हीं की प्रसन्नता में आनन्द का अनुभव करे।

सदाभिमानकधना हि मानिनः।41

संसार में सर्वदा मानी लोगों का एक मात्र धन अभिमान ही होता है। तेलगू कवि अरयलयिड ने लिखा है- देखा जाये तो गौरव प्राणों के समान है। अपना गौरव ही अपना सखा है अपना मान ही अपना धन है, मान को छोड़ने से अधिक अच्छा यही है कि प्राणों को ही छोड़ दे। वस्तुतः मानरूपी धन के समक्ष सभी धन मनस्वी लोगों के लिये तुच्छ है। स्वाभिमानी मनुष्य मर मिटता है, किसी के समान दीन बनता है। आम बुझे मले ही जाये किन्तु जीवित रहते हुए वह शीतल कभी नहीं होती।

मनस्वी ग्रियते कामं कार्यण्य न तु गच्छति।
अपि निर्वाणमायाति नानलो याति शीतताम।42

परतन्त्र भारत में अंग्रेजों की पराधीनता के अधीन जीने वाले लोगों में स्वाभिमान ने ही स्वतन्त्रता की ज्योति जगाई। स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों ने ‘‘सर कटा सकते हैं लेकिन सर झुका सकते नहीं’’ जैसे नारों को आदर्श बनाकर फिरंगियों का डटकर मुकाबला किया और अंततः स्वाधीनता प्राप्त की। मानी लोग कभी किसी के समस्त झुकते नहीं। वनराज सिंह से मनस्वी लोगों की तुलना करते हुए कहा गया है- सिंघ यथा पर पराक्रमसाधितानि

खादन्ति नैव पिषितानि बुमुक्षयार्ताः।
दुःख महत्यपि तथैव परेण लब्थान,
वान्छन्त्यसूनपि न मानथना महान्तः॥43

जिस प्रकार भूख से व्याकुल होने पर भी सिंह दूसरों के पराक्रम से प्रस्तुत मांस नहीं खाते हैं, उसी प्रकार महान दुःख उपस्थित हो जाने पर भी स्वाभिमानी मनुष्य दूसरों के द्वारा लाया गया धन नहीं चाहते हैं। स्वाभिमान ही उनका परम धर्म होता है। मनस्वियों के लिये तो प्राणों की उपेक्षा करके भी स्वाभिमान ग्रह्य होता है-

सतु प्राणानुपेक्ष्यापि ग्राह्ययक्षे।44
सतीव योषिप्प्रकृतिः सुनिखला पुमासमम्पेति भवान्तेरष्वपि।45

जिस प्रकार दूसरे जन्मों में भी सती स्त्री उसी पति को प्राप्त करती हैं उसी प्रकार प्रकृति (स्वभाव) भी जन्मान्तरों में भी नहीं बदलते है- यही आशय है।

शुमेतराचार विपलिमापदो विपादनीया हि सतागसादव।46

जगत् में सदाचारी मनुष्य ही सज्जन कहलाने के अधिकारी हैं और इसके विपरीत कदाचरण करने वाले, दुर्व्यसन लिप्त तथा पराडारत लोग सदैव दुर्जनों की गणना में आते हैं अपने अशुभचरण द्वारा बुराईयों को जन्म देने वाले ये दुर्जन क्षम्य नहीं होते है। वे सज्जनों द्वारा वध्य ही होते हैं। ऐसे अनेक पौराणिक उदाहरण है जिनमें सज्जनों द्वारा दुर्जनों का नाश किया गया है।

सार्वजनिक हित की दृष्टि से दुष्ट व्यक्तियों का वश किया जाना भी क्षम्य होता है क्योंकि एक बुराई को नष्ट कर दिये जाने पर अनेक संभावित बुराई जड़ से नष्ट हो जाती है। ठीक ही है विषवेल को अधिक फैलने से रोकने के लिये उसकी न केवल शाखाएं काटना वरन् उसे जड़ से उखाड़ फेंक दिया जाना ही आवश्यक है, उपयुक्त है।

ज्ञातसारों खतवेक सन्दिग्धे कार्यवस्तुनि।

इस विशाल संसार में सारे विषय सभी लोगों के लिये श्रेय नहीं है इसलिए ये संसार का परे है। इतना अवश्य है कि विभिन्न विषयों में लोगों के ज्ञान का अल्पत्य अथवा आधिक्य हो सकता है। महाकवि माघ कहते हैं कि सारभूत तत्त्व को जानता हुआ भी एक विद्वान व्यक्ति कर्तव्य कार्य में सन्देस युक्त रहता है। महाकवि कालिदास ने भी इसी आशय को व्यक्त करते हुए कहा है-

आपरितोषाद् विदूषा न साधु मन्ये विज्ञानम्।47

विद्वान् मनुष्य को भी अपने कार्य में तब तक सन्देह बना रहता है जब कि अन्य विशिष्ट कार्य न लोग उसके कर्तव्य कार्य को सही प्रमाणित नहीं कर देते हैं। सामान्य व्यवहार में भी प्रत्येक व्यक्ति अपने कार्य के विषय में स्वयं से श्रेष्ठ किसी अन्य की प्रतिक्रिया की सदैव अपेक्षा रखता है।

महीयांसः प्रकृत्या मितभाषिषः।

एक प्रसिद्ध मराठी कथन है-

परमितीखणे बोलते ते बाया।48

अर्थात् आवश्यकता से अधिक बोलना व्यर्थ है। इसीलिये कवि माघ भी कहते हैं कि बड़े लोग अर्थात् महान् लोग स्वभाव से ही थोड़ा बोलते हैं। वैसे भी अल्प बोलने वाले ही वाक्पटु कहलाते हैं। श्रीहर्ष ने भी कहा है-

मित च सारं च वचो हि वाग्मिता।49

महापुरुष अनर्गल नहीं करते हैं वे कभी भी प्रलाप करने में अपना समय नहीं मानते है। शेक्सपियर ने कहा भी है-

Brevity is the soul of wit .50
(संक्षिप्तता वार्गहादेग्येता अर्थात् का प्राण है। )

शिशुपालवध महाकाव्य में जब श्रीकृष्ण परिमित अर्थ पद वाला कहकर चुप हो जाते हैं तभी कवि माघ कहते हैं- ‘‘बड़े लोग स्वभाव से ही अल्प भाषी होते हैं।

विरोधिवचसो मूकान्वागीषानपि कुर्वते।
जड़ानप्यनुलोमार्थान्प्रवाचः कुतिना गिरः॥51

कार्यज पुरुष सदैव अपने कार्यों में सफलता प्राप्त करते हैं क्योंकि कार्य को भली भांति जानने वाले और उसका उचित प्रकार से निष्पादन करने वाले व्यक्ति के किसी भी कार्य में कभी भी विघ्न नहीं आते हैं और यदि कभी विघ्न आते भी हैं तो चतुर लोग सावधानी पूर्वक उन विघ्नों का निवारण कर लेते है। ऐसे चतुर कार्याज लोगों के वचन विरोधी वागीशों को भी मूक बना देते हैं। तथा मूकजनों को वृहस्पति तुल्य वाग्मी बना देते हैं।

अनिलोडित कार्यस्थ वाग्जाल वाग्भिनो वृथा।
निमित्तादपराद्धेषोर्धानुष्कस्येव वाल्गितम्॥52

संसार का कोई भी धनुर्धर तब तक श्रेष्ठ धनुर्धर नहीं हो सकता है जब तक वह निर्धारित लक्ष्य को अपने बाण का सही निशाना नहीं बना सके। सही निशाने पर फेका गया बाण ही धनुर्धर को सार्थकता प्रदान करता है। महाभारत में लक्ष्य के प्रति एकाग्रचित धनुर्धर अर्जुन के अतिरिक्त कौरवों और पाण्डवों में से कोई भी धनुर्धारी वृक्ष की शाखा पर बैठे पक्षी को अपना निशाना बनाने में सफल नहीं हो सका। यद्यपि वे सभी घनुविद्या की शिक्षा प्राप्त कर चुके थे परन्तु उस विद्या का सही उपयोग करने में वे सब अर्जुन की भांति निपुण नहीं थे। लोक में कार्य का अवलोकम नहीं करने वाले अर्थात् कर्त्तव्याकर्तव्य को नहीं जानने वाले वाग्मी पुरुषों के वचन समूह भी निरर्थक सिद्ध हो जाते हैं क्योंकि विद्या के साथ विवेक होना अधिक आवश्यक है। कहा भी गया है-

वरं बुद्धिर्न सा विधा।

बुद्धि के अभाव में विधा निष्फल होती है, चाहे फिर कार्य करने वाला बोलने में कितना चतुर क्यों न हो। इसीलिये महाकवि माघ ने अविवेकी वक्ता के वचनों को लक्ष्य भ्रष्ट बाण वाले धनुर्धारी के उछलने और कूटने के समान व्यर्थ अथवा निरर्थक कहा है।

तृप्तियोगःपरेणापि महिम्ना न महात्मनाम्।53

विद्वज्जनों की मान्यता है- असंतुष्ट द्विजा नष्टा सन्तुष्टाश्व महीमुज। इसीलिये जंगल में प्रायः समृद्धि के अभिलाषी लोगों को बड़ी समृद्धि से भी तृप्ति नहीं है। जितना प्राप्त है मनुष्य उससे भी अधिकाधिक प्राप्त करने की इच्छा करता है। प्राचीन समय में राजाओं के राज्यों का विस्तार उनकी इसी मनोवृत्ति के आधार पर हुआ करता था। राज्य के अतिरिक्त किसी भी क्षेत्र जैसे विद्या, कला, साहित्य आदि में मनुष्य कभी भी अपनी उपलब्धियों को संतुष्ट नहीं होता है। इस विषय मेंं चन्द्रमा के उदय को चाहने वाला पूर्ण महासमुद्र दृष्टान्त है।

संपदा सुस्थितं मन्यो भवति स्वलपऽपय यः।
कृत कृत्यो विधिर्मन्ये न वर्धक्षति तस्यताम्।54

महर्षि वेदव्यास ने कहा है-

संतोषो वै स्वर्गतमः संतोषः परम सुन्दरम्
तुष्टेर्न किञ्चत् परतः सा सम्यक् प्रतिष्ठिति।55

अर्थात् मनुष्य के मन में संतोष होना स्वर्ग की प्राप्ति से भी है संतोष ही सबसे बड़ा सुख है। संतोष यदि मन में भली भांति प्रतिष्ठित हो जाये तो उससे बढ़कर संसार में कुछ भी नहीं है। महाकवि माघ ने भी इसलिये कहा है कि जो थोड़ी भी सम्पत्ति से अपने को सुस्थिर मानता है कृतकृतय ब्रह्म (विधि) उसकी उस सम्पत्ति को बढ़ाते नहीं, इसीलिये संतोषी प्राणी सदैव सुखी रहता है। इसके विपरीत शब्द आदि विषयों में आसक्त रहने वाला व्यक्ति कभी संतोष नहीं करता है-

सद्ेद अतिन्ते य परिग्गहम्मि
सत्तोसकतो न उवेइ तुट्ठि॥56

आचारांग चूर्णि में कहा गया है-

असंतुष्ट व्यक्ति को यहां वहाँ सर्वत्र भरा रहता है। (1-3-2)

लोकोत्तर राजा का वैशिष्ट्य[सम्पादन]

पाश्चात्य लेखक एमर्सन का कथन है-

अर्थात् प्रत्येक महान् व्यक्ति विलक्षण होता है। संसार में जन्म लेने वाले सभी जीवों में परस्पर भिन्नता विद्यमान है। सभी की विचारशीलता, क्रियाशीलता एवं व्यवहार आदि स्वभाव की भिन्नता को प्रकट करते हैं सामान्यतः महान् लक्ष्य रखने वाले विषम परिस्थितियों से भी अविलक्षित रहने वाले स्वार्थ को त्याग पर हित निरत रहकर लोक कल्याण में संलग्न तथा सद्गुणों के धारक मनुष्य ही जगत में महान् कहलाते हैं। विद्वानों ने इन्हें ही सन्त की संज्ञा भी दी है। प्रकृत्या महानपुरुषों के तेज को किसी आकार-प्रकार की अपेक्षा नहीं होती है। इसीलिये ‘‘सर्व हि महत’’ कहकर बड़े लोगों की सभी बाते सही कही गयी है। माघ कवि माघ ने महज्जनों के इसी वैशिष्ट्य को प्रतिपादित करते हुए कहा है कि बड़े लोगों के सब कार्य लोकोत्तर होते हैं, सामान्य मनुष्य के कार्यों से भिन्न होते है। ये लोकोत्तर पुरुष समयानुकूल बज्र से भी कठोर और पुष्प से भी कोमल रूप वाले होते हैं। इनका चरित्र अति विचित्र होता है। इसीलिये नीतिकार चाणक्य ने भी कहा है।

अहो बत विचित्राणि चरितानि महात्मनाम्।
लक्ष्मी तृणाय मन्यन्ते तर्दमारण नमन्ति॥57

महात्माओं के चरित्र का वेचित्रय यही है कि वे लक्ष्मी को तिनके के समान लघु मानते हैं परन्तु उसके भार के भार से झुक जाते हैं।

महतीमपि श्रियमवाप्य विस्मयः सुजनों न विस्मरति जातु किञ्चन 58

संसार में सज्जनों की महिमा ही निराली है। वस्तुतः जो भला बुरा कहे जाने पर भी क्रोधित नहीं होते हैं, न अनुचित बोलते हैं, शौर्य र्धर्यादि धर्मी से युक्त होने पर भी जो घमण्ड नहीं करते है और निरन्तर विपत्तियां आने पर भी जो कातर नहीं होते हैं वे ही सुजन कहलाते हैं। सम्पत्ति और विपत्ति में समदृष्टि रखने वाले सज्जन ही हुआ करते हैं। अंहकार रहित थे सज्जन महान ऐश्वर्य पाकर भी कभी छोटी-छोटी बातों को विषयों की उपेक्षा नहीं करते हैं, किसी के सत्कारों को भूलते नहीं है। सामान्यतः ऐश्वर्य पाकर मनुष्य इतना अधिक गर्वयुक्त हो जाता है कि अपने अधीनस्थ अथवा छोटे लोगों को नगण्य समझने लगता है, परन्तु सुजन ऐश्वर्ययुक्त होने पर भी अपने उत्कृष्ट व्यवहार को सुरक्षित रखते हैं। कविवर सोमदेव ने कहा है कि-

मजन्यात्मम्मरित्व हि दुर्लभेऽपि न साहावः।59

अर्थात् साधुजन दुर्लभ वस्तु प्राप्त करके भी स्वार्थ सिद्धि में प्रवृत्त नहीं होते हैं। नीतिकार भलृहष्टि का कथन है,

अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः।60

उदारचित सज्जन तो दूसरों के परमाणुतुल्य अत्यल्प गुण को भी पर्वत की भांति विशाल बनाकर प्रस्तुत करते हैं। सम्पत्तिशाली होने पर भी महा पुरुषों का चित्त फूलों की भांति कोमल होता है-

सामान्यतः प्रशंसा सभी को प्रिय होती है परन्तु दिखावे के इस युग में मिध्या प्रशंसा का बोलबाला हो गया है। इस विषय में विद्वानों का कथन है कि अधिक मिध्या प्रशंसा कहने पर बोलने वाला भले ही लज्जित होने की अपेक्षा झूठी प्रशंसा को सुनकर अति प्रसन्न हुआ करते हैं, भले ही प्रशंसक झूठी प्रशंसा करने की विवशता से दुःखी होता है।

प्रायः लोग झूठी प्रशंसाओं से सन्तुष्ट होते हैं और वे प्रशंसाएं प्राणियों द्वारा सुलभ भी हो जाती है। किन्तु लोक में महपुरुष सदैव किसी प्रशंसा की अपेक्षा से कोई महान कार्य नहीं करते। शिशुपालवधर्म में श्रीकृष्ण के प्रति कहागया कथन इसी आशय को प्रगट करता है स्तुति योग्य (श्रीकृष्ण)। आपके लिये कहे गये प्रशंसात्मक वचन झूठे नहीं है और आप उन वचनों से संतुष्ट भी नहीं होते हैं, अर्थात् आप उसे सुनने में सर्वथा उदासीन रहते हैं। निस्सन्देह महापुरुष प्रशंसा के अभिलषा नहीं होते हैं। किसी भी अपेक्षा से रहित वे सदैव अपने कार्यों में लीन रहते हैं।

एक एव गुणवतमोऽथ वा पूज्य इत्ययमपीष्यते विधिः।61

अधिक गुणवान एक ही व्यक्ति पूज्य होता है, यह भी शास्त्रानुमोछित विधि है।

परिवृद्धिमत्सरि मनो हि मानिनाम्।62

अभिमानियों का मन दूसरों की समृद्धि में सदैव मासर्य युक्त होता है। अभिमानी मनुष्य किसी अन्य की विशेष रूप से अपने प्रतिस्पर्द्धा की सफलता या प्रगति को सहन नहीं कर पाता है समृद्ध के प्रति उसके मन में ईर्ष्या जन्म ले लेती है। अभिमानियों की ईर्ष्या के कारण ही वर्तमान में भौतिक साधन सुविधाओं को जुटाने की प्रतिस्पर्द्धा सी होने लगी है। क्षेत्र धार्मिक हो अथवा राजनीतिक, साहित्यिक हो या सामाजिक अथवा कोई अन्य, सर्वत्र ही अभिमानी लोगों का मन अपने प्रतिस्पर्द्धा के प्रति ईर्ष्याग्रस्त हो जाता है। कवि क्षेमेन्द्र ने अभिमान के हेतुओं की गणना करते हुए कहा है-

कुलं वित्तं श्रुतं रूपं शौर्य दानं तपस्तथा।
प्राधान्येन मनुष्याणां सप्तैते मदहेतवः।63

कुल, धन, ज्ञान, रूप, पराक्रम, दान और तप से सात मुख्य रूप से मनुष्यों के अभिमान के हेतु है। आचार्य विनोबा भावे का मानना है कि सत्ता, सम्पत्ति, बल, रूप, कुल, विद्धता, अनुभव, कर्तव्य तथा चरित्रय का अभिमान के नौ प्रकार हैं। अभिमान के इन विदिध कारणों में उलझ कर मनुष्य ईर्ष्यालु बन जाता है।

महत्तदहो! दयितं जनः खलु गुणीति मन्यते।64

नाटककार भवभूति का कथन है-

गुणाः पूजास्थानं गुणिषु न लिङ्गं न च बयः।65

बुद्धि, कुलीनता, इन्द्रियनिग्रह, शास्वज्ञान, पराक्रम, शक्ति में अनुसार दान और कृतज्ञता आदि गुण मनुष्य की ख्याति बढ़ा देते हैं। इन्हीं गुणों से यह सम्पन्न मनुष्य गुणी कहलाने का अधिकारी होता है। परन्तु यह भी सत्य है कि संसार में लोग अपने गुणहीन ही प्रियजन को गुणवान मानते हैं। सामान्त जो गुणी है ये प्रिय होना चाहिये किन्तु तीव्रता से बदल रहे युग के साथ यह धारणा भी बदलती जा रही है। इसीलिये जो प्रिय है वे गुणी माने जाने लगते हैं इसका मनोवैज्ञानिक कारण यह भी है कि दोषयुक्त होने पर भी अपने प्रिय व्यक्ति में कोई अवगुण दिखाई नहीं देते हैं, वे इसीलिये गुणीजन की श्रेणी में गिने जाते हैं। महाकवि माघ यही कहना चाहते हैं कि कितने आश्चर्य की बात है कि इस संसार में लोग गुणहीन प्रियजनों को ही गुणवान मानते हैं।

अहो तिष्ष्चि सहजैव मूढ़ता।66

इस चराचर जगत में अनन्तानन्त देहधारी जन्म लेते हैं, मरते हैं, जन्म-मरण की यह प्रक्रिया सृष्टि की शाश्वत प्रक्रिया है सांसारिक जीवों के वैशिष्ट्य पर विचार किया जाये तो यह अनुभव जनित तथ्य है कि मनुष्य और तिर्यवों में शारीरिक भिन्नता घटक है मनुष्य का ज्ञान से मनुष्य को सोच-विचार करने की क्षमता प्राप्त है जबकि मनवेतर जीवों मेंं इसका अभाव होता है। इसीलिये नीतिकार ने कहा भी है-

आहार निद्रा भयसन्ततित्व सामान्यमेतद् पषभिर्नराणाम्।

ज्ञानं हि तोषामधिवो विशेषो ज्ञानेनहीनाः पशुमिःसमाना ज्ञान से ही मनुष्य मनुष्य है; ज्ञानहीन मनुष्य पशुओं की भांति होते हैं। इसीलिये महाकवि माघ भी कहते हैं कि पशु में मूर्खता स्वाभाविक ही होती है क्योंकि उसमें हित अहित कर्तव्य कर्तव्य की क्षमता का अभाव होता है। विवेक शून्य होने के कारण ही पशुओं को मूर्खों की श्रेणी में गिना जाता है। जन्मतः अज्ञानी होने के कारण वे मूढ़ होते हैं।

स्मर्तुमधिगतगुणस्मरणाः पटवो न दोषमखिल खलूत्तमाः।67

लोक में श्रेष्ठ जन सदैव अपने परिचितों के गुणों को ही प्रकट करते हैं, उनके दोषों के विषय में कभी विचार नहीं करते हैं। गुण-दोषों को देखने की भिन्न प्रकृति के कारण ही जल से आधे भरे पात्र को कुछ लोग तो भला सोचते हैं जबकि कुछ उतना खाली सोचते हैं। यह विचार शैली ही सकारात्मक और नकारात्मक चिन्तन की व्यक्त करती है। श्रेष्ठ उन अर्थात् सज्जनों का चिन्तन सदैव सकारात्मक होता है, फलता वे गुणान्वेषी कहलाते है, हिन्द्रान्वेषी नहीं। छोटे से गुण को भी वे ‘‘परगुणपरमाणून पर्वतीकृत्य’’ वर्णित करते हैं।

शिशुपालवधम् महाकाव्य में परमशत्रु (शिशुपाल) के पूर्वकृत अपराधों का उन्होंने (श्रीकृष्ण) स्मरण नहीं किया, क्योंकि परिचितों के गुणों का ही स्मरण करने में चतुर श्रेष्ठ लोग दोषों की ओर ध्यान नहीं देते हैं। गुणों के स्मरण से मनःस्थिति स्वस्थ रहती है जबकि विकार दर्शन से मनःस्थिति विकार युक्त हो जाती है।

सुकुमारमहो लघीयसां हृदय तद्गतमप्रियं यतः
सहदैव समुद्धिख्त्यमी न्त्येव जरयन्त्येव हि तन्मनीषिणः।68

संसार में महान् पुरुष जितने उदार हृदय वाले होते हैं तुच्छ व्यक्तियों का हृदय उतनी ही संकुचित विचारधारा का होता है। यही कारण है कि तुच्छ हृदयी लोग अपने मनःरथ अप्रिय भावों और विचारों को प्रकट नहीं करते हैं उन्हें मन में ही दबाए रखते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि क्षुद्र मन वाले लोगों के पेट में कोई बात टिकती नहीं है और उदारमन वाले हृदयस्थ बुरी से बुरी बातों को भी बड़ी ही सहजता से पचा लेते हैं, औरों के सामने व्यक्त नहीं करते हैं।

उपकारपरः स्वभावतः सततं सर्वजनस्य सज्जन
असतामनिष तथाप्यहो! गुरुहृद्रोगकरी तदुन्नतिः।69

सज्जनों के विषय में किसी कवि ने अति सुन्दर शब्दों में कहा है-

पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः
श्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः।
नादन्ति सस्यं खलु वारिवाहाः
परोपकाराय सतां विमूतयः॥

परोपकार निरत सज्जन विमूतियों के हृदय में अपने प्रयोजन के लिये तनिक भी स्थान नहीं होता है। ऐसे निःस्वर्थ परोपकारियों की उन्नति से भी दुर्जन लोग के भी प्रसन्न नहीं होते हैं। वरन् उन सज्जनों की प्रगति से वे सन्तप्त हो जाते हैं। वृक्ष परोपकार करने वालों का उत्कृष्ट उदाहरण है, जो काटने वालों को भी अपनी छाया देकर शान्ति प्रदान करता है, पत्थर फेंकने वाले युजनों को भी बदले में फल देता है, फूलों से सुन्दर वृक्ष पूरे वातावरण को सुगन्धित कर देता है उसका प्रत्येक रूप परोपकार के लिये होता है क्योंकि वह परोपकारी है। सज्जन भी परोपकार में सदैव संलग्न होते हैं पण्डित विष्णु शर्मा ने इस विषय में कहा है

उपकारेषु यः साधु साबुत्ते तस्य को गुणः।
अपकारिषु यः साधु स साधु-सदिमरूचयतेः॥70

शिशुपालवधम् महाकाव्य में महाकवि माघ ने सज्जन और दुर्जन के स्वरूप का विशद् चित्रण करते हुए कहा है कि सज्जन स्वभाव से ही दूसरों के उपकार में सदैव तत्पर रहते हैं तथापि सज्जनों की उन्नति दुर्जनों की सदा सन्तप्त करने वाली होती है, यह आश्चर्य है ? वस्तुतः परोपकार करने वालों से तो सभी प्रसन्न रहते हैं। किन्तु दुर्जनों का असंतुष्ट हृदय उनकी प्रगति से भी, उनके गुणों से भी ईर्ष्या ग्रस्त होकर पीड़ित रहता है। दुर्जन किसी की भी प्रगति सहन नहीं कर पाते हैं।

परितप्यत एव नोत्तमः परितप्तोऽष्यपरः सुसंवृतिः
परिवृद्धिभिराहितव्यथः स्फुट निर्भिन्न दुराषयोऽधमः।71

इस लोक में मनुष्य जाति को विद्धज्जनों ने तीन श्रेणियों में विभक्त किया है। स्वभाव एवं व्यवहार के आधार पर ये मनुष्य उत्तम मध्यम तथा अधम कहलाते हैं। कवि माघ के शब्दों में उत्तम व्यक्ति दूसरों की उन्नति से कभी संतप्त नहीं होता है, मध्यम व्यक्ति संतान्त होकर भी अपने संताप को छिपा लेता है और निम्न व्यक्ति व्यथित होकर अपने सन्ताप को स्पष्ट रूप में पूर्णतः प्रकाशित कर देता है। वस्तुतः निम्न पुरुषों की प्रकृति ही ऐसी होती है कि वे दूसरों की उन्नति भी प्रशंसा योग्य न समझ कर व्यर्थ पीड़ित होते रहते हैं जबकि श्रेष्ठ कोटि के मनुष्य स्वयं के आचरण को महत्त्व देते हुए सदैव प्रगति के मार्ग का अनुगमन करते हैं अन्य लोगों की उन्नति उनके मन को भी व्यथित नहीं करती है। मध्यम श्रेणी के लोग भले ही दूसरों की उन्नति से दुःखी हो जाए किन्तु अपने सन्ताप को अभिव्यक्त नहीं करते हैं, अपने में नही मन में रखते हैं, ईर्ष्या को प्रगट नहीं करते हैं।

अनिराकृततायसम्पद फलहीना सुमनोभिरूज्झिताम
खलतां खलतामिवासतीं प्रतिपधेत कथंबुधो जनः।72

महर्षि वेदव्यास ने कहा है-

असंता शीलमेतद् वै परिवादोऽभ पैषुनम्73

अर्थात् दूसरों की निन्दा करना या चुगली खाना दुष्टों का स्वभाव ही होता है। किन्तु छिद्रन्वेषी दुर्जनों के वचनों से सज्जनों के गुणों का मूल्य कम नहीं हो जाता है। निन्दा किये जाने पर भी सज्जनों की गुणवत्ता ज्यों की त्यों बनी रहती है। क्षणिक बदली छा जाने पर सूर्य और चन्द्रमा का प्रकाश समाप्त नहीं हो जाता है, उनका प्रकाश तो यथावत् सृष्टि को प्रकाशित करता रहता है। इसी आशय को महाकवि माघ ने शिशुपालवधम् में प्रस्तुत करते हुए कहा है कि दुर्जनों के उद्धत वचनों से बहुत बड़े लोगों का गौरव कम नहीं होता है क्योंकि पृथ्वी की धूलियों से ढके हुए रत्न की बहु मूल्यता नष्ट हो जाती है क्या ? नहीं, वरन् धूलि से ढके हुए भी रतन का मूल्य पूर्ववत् रहता है। दुर्जनों के द्वारा कहे गये निन्दा बचनों से सज्जनों की महिमा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। यश अर्जित करते हुए सज्जन सदैव गुणार्जनौ में रत रहते हैं। इसी विषय में गोवर्धनाचार्य ने कहा है

दुर्जनसह्वासादपि शीलात्कर्षः न सज्जनस्त्यति।74
परितोषमिता न कष्चन स्वगतो यस्य गुणोऽस्ति देहिनः।
परदोषकथाभिरल्पकः स्वजनं तोषयितुं किलेच्छति॥
सहजान्घदृषः स्वदुर्नये परदोषेक्षणदिव्यचक्षुषः।
स्वगुणोच्चगिरो मुनिव्रताः परवर्ण ग्रष्णेषसाधवाः॥75

रण भूमि में सेना की निपुणता एवं वैदुर्स्य[सम्पादन]

विलम्बितु न खलु सदा मनस्विनोविधत्सतः कलहमवेक्ष्य विद्धिपः।76

धीर-वीर पुरुष युद्ध करने के लिये इच्छुक शत्रुओं को देखकर विलम्ब नहीं सहते हैं। इसीलिये भारतीय सैनिक ‘‘युद्धाय कृतनिश्चयः’’77 का ध्येय लेकर प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। वीर पुरुष शत्रु सेना के सामने शीघ्र ही पराक्रम प्रदर्शन के लिए आतुर हो शत्रु को नष्ट करते है। वे या तो शत्रु को मारते हैं या स्वयं मरना पसन्द करते है, युद्ध से कभी पलायन नहीं करते है।

सुसंहतैवर्धदपि धाम नीयते तिरस्कृतिं बहुभिरसंषर्य परैः।78

भारत की वर्तमान परिस्थिति महाकवि माघ की इसी उक्ति को चरितार्थ करती है जहां शनैः-शनैः शान्ति का स्थान अशान्ति और अराजकता ने ले लिया है, जहाँ मनस्वी जनों का सम्मान अपेक्षाकृत कम होता जारहा है, धन के पीछे मनुष्य विराम किये बिना दौड़ा जा रहा है, उसका एक मात्र ध्येय येन-केन-प्रकारेण धनार्जन करना ही रह गया है, अपनी स्वार्थपूर्ति के लिये मनुष्य आदरणीयों का आदर करना भी भूलने लगा है इतना ही नहीं ऐसे अनेक स्वार्थी जन संगठित होकर तेजस्वियों को भी तिरस्कृत कर देते हैं जैसे कि अत्यन्त सूक्ष्म भी पृथ्वी की धूलियों से तेजोनिधि सूर्य का भी बिम्ब ढक जाता है। निस्सन्देह बहुत सी बुराईयों के एकत्रित हो जाने पर अच्छाइयां दब जाती हैं, स्पष्ट प्रगट नहीं हो पाती है।

महाकवि माघ ने पूर्व कथन में इस आशय का विपरीत अर्थ प्रतिपादित किया है। उन्होंने कहा है कि दुर्जनों के उद्धत वचनों से सज्जनों का गौरव वैसे ही कम नहीं होता है जैसे पृथ्वी की धूलियों से ढके हुए रत्न की बहुमूल्यता नष्ट नहीं होती है।79

भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में माघ के ये दोनों ही कथन सत्य सिद्ध होते हैं। पुनरपि चिन्तन से यही सार सामने आता है कि दर्जनों पुरुष संगठित होकर तेजस्वी मनुष्य का प्रभाव कुछ समय के लिए भले ही निरुद्ध कर दे, परन्तु तेजस्वियों के गौरव को मूलत नष्ट करने में समर्थ नहीं हो पाते हैं। का च लोकानुवृतिः।80 शिशुपालवधम् महाकाव्य में श्रीकृष्ण और शिशुपाल की सेना के मध्य प्रारम्भ हुए धनधोर युद्ध के प्रसंग मेंं महाकवि माघ ने कहा कि गहरी चोट से मूर्च्छित कोई शूरवीर चैतन्य होने पर वहाँ से हटाकर ले जाने वाले मित्र के उच्च स्वर से कही गयी युद्ध में न जाने और लौट आने की बात नहीं मानते हुए युद्धभूमि में चला गया और मर गया। उसने यह ठीक ही किया क्योंकि कीर्ति चाहने वाले लोगों के लिये मित्रादि का अनुरोध तथा वस्तु है अर्थात् कुछ भी नहीं।

योग्येनार्थः कस्य न स्माज्जनेन।81

मनुष्य सामाजिक प्राणी है। लोक में अकेला किसी कार्य को करने में समर्थ नहीं हो पाता है। यही करण है कि प्रत्येक मनुष्य किसी न किसी योग्य का आश्रय चाहता है जिनके माध्यम से वह अपना कार्य सिद्ध कर सके वही व्यक्ति योग कहलाता है। जो विधिपूर्वक किसी भी कार्य को सहजता से सम्पन्न करने की क्षमता रखता हो। प्रत्येक विद्यार्थी कुशल शिक्षक चाहता है जनता योग्य नेता चाहती है, स्वामी और सेवक दोनों ही परस्पर योग्य व्यक्ति को पाना चाहते हैं, क्योंकि योग्य आश्रय ही सफलता में सहायक सिद्ध होते हैं, अयोग्य का आश्रय सदैव अहितकारी सिद्ध होता है।

उपकृत्य निसर्गतः परेषामुपरोधं न हि कुर्वते महान्तः।82

शिशुपालवधम् महाकाव्य के एक प्रसंग में जब बरसने वाले मेघ समूह अग्नि को बूझाकर विशाओं में सहसा विलीन हो गये तो महाकवि माघ ने कहा कि बड़े लोग स्वभाव से ही दूसरों का उपकार करके उपरोध नहीं करते है। उपकार प्राप्त करने वालों की राह का रोड़ा नहीं बनते हैं स्वभाव से निःस्वार्थ परोपकारी मनुष्य उपकार करके बहुधा प्रदर्शित भी नहीं करना चाहते है और न ही उपकार करने के बाद स्वयं वहां उपस्थित रहते हैं। किन्तु धीरे-धीरे समाज में निःस्वार्थ स्पष्टतः प्रदर्शित होता है। इसीलिए वृक्ष, नदी, सूर्यबादल आदि परोपकार के श्रेष्ठ उदाहरण है जो बिना प्रत्युपकार की अभिलाषा के परोपकार में लीन रहते हैं। बल्लभदेव कृत सुभाषितावलि में संकलित श्लोक में कहा गया है कि सत्तपुरुष परोपकार के लिये स्वाभावतः कटिबद्ध रहते हैं तथा प्रत्युपकार की अपेक्षा नहीं रखते हैं।