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1965 ईस्वी में प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री थे। अफवाह फैल गई थी कि अब 15 वर्ष की अवधि समाप्त हो गई है। अंग्रेजी की सखी राजभाषा वाली स्थिति समाप्त कर दी जाएगी। दिल्ली हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने इस अवसर पर शानदार आयोजन किया था। राजभाषा वाले प्रसंग में ही किसी सभा में प्रो0 सुकुमार सेन ने कलकत्ता विश्वविद्यालय के तत्कालीन हिन्दी विभागाध्यक्ष को अपने पास बुलाते हुए कहा- आशुन राजपुत्र! आओ राजपुत्र! अंग्रेजी की सखी-भाषा वाली स्थिति अभी भी समाप्त नहीं हुई। व्यवहार में अंग्रेजी ही भारतीय गणतंत्र की राज भाषा है। राज भाषा शब्द-संयोग का प्रयोग सरकारी काम काज की भाषा के लिए होता है किंतु यह शब्द संयोग अनर्थक भी है। अनेक हिन्दी विरोधियों ने कहा- जब राज भाषा है तब अन्य भाषाएं प्रजा-भाषा होंगी। एक अनर्थक भ्रम और पाला-पोसा गया। शायद अतिरिक्त उत्साह या अनजाने में कि हिंदी को अंग्रेजी की जगह लेनी है। आशय यह रहा होगा कि अंग्रेजी केंद्रीय सरकार की राजकाज की भाषा के रूप में समाप्त कर दी जाएगी और उसकी जगह हिन्दी आ जाएगी। लेकिन अंग्रेजी साम्राज्यवादी सत्ता द्वारा केंद्रीय सरकारी भाषा के रूप में थोपी गई थी। हिन्दी को लोकतांत्रिक प्रक्रिया के उस रूप में आना है- यह अंतर इस बात से छिप जाता है कि अंग्रेजी की जगह हिंदी को लेनी है। अंग्रेजी सभी भारतीय भाषाओं को दबा कर आसीन है। उसने भारत में ही भारतीय भाषाओं को अधिकारहीन बना रखा है- हिंदी को अंग्रेजी नहीं बनाना है। यदि हिंदी अंग्रेजी बनने का आग्रह करती है कि प्रत्येक भारतवासी का कर्तव्य है कि यह हिंदी का विरोध करे। हिंदी को अंग्रेजी की जगह लेनी है- यह उक्ति व्याघात से ग्रस्त है। हिंदी भाषा-आंदोलन के संदर्भ में स्वाधीनता-आंदोलन का वातावरण याद आना स्वाभाविक है। हिंदी को भारत की एकता का प्रतीक भक्ति आंदोलन और स्वाधीनता आंदोलन ने बनाया है। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान अपनी अस्मिता के संकट का जो अनुभव हुआ उसने देश को जोड़ने वाली भाषा के रूप में हिंदी की पहचान बनाई थी। हिंदी की यह भूमिका इतिहास ने विशेषत: भक्ति आंदोलन और व्यापारिक पूंजीवाद ने बनाई थी। स्वाधीनता आंदोलन ने सिर्फ उसे पहचाना था। जैसे देश को, जाति को, राष्ट्र को उसी तरह भाषा को भी। ‘हम कौन थे, क्या हो गया और क्या होंगे अभी‘ में- हिंदी की पहचान की खोज भी थी। हिंदी साहित्य-सम्मेलन से प्रकाशित होने वाली दैनिन्दनी में जो उक्तियां पृष्ठों के ऊपर तीज-त्यौहारों के साथ दी जाती हैं उन्हें देखने से यह बात स्पष्ट हो जाती है। जैसे कांग्रेस बहुत दिनों तक- संस्था और मंच दोनों थी, वैसे हिंदी भी। कांग्रेस में समाजवादी, नर्म, गर्म, दक्षिण पंथी, वामपंथी- सभी विचारों के लोग थे, वैसे हिंदी आंदोलन में भी- दयानंद, गांधी, तिलक, मदनमोहन मालवीय, सुभाष, राजगोपालाचारी, सावरकर, गोलवलकर, नम्बूदरीपाद- सब हिंदी प्रेमी थे। स्वतंत्र भारत में यह स्थिति नहीं रही। क्यों नहीं रही? इस पर थोड़ी देर बाद विचार करेंगे।ं' जवाहरलाल नेहरू, गांधी जैसे लोग अंग्रेजी-विरोधी नहीं थे, न बालकृष्ण शर्मा नवीन जैसे हिंदी प्रेमी। लेकिन वे शपथ हिंदी में लेते थे, विदेशों में भारतीय नागरिकों को हिंदी (अपनी हिंदी) में सम्बोधित करते थे और समाजवादी देशों में स्वागत-उत्तर हिंदी में देते थे। चूंकि सोवियत संघ में उनका स्वागत रूसी भाषा में किया जाता था तो वहां वे हिंदी में बोलते थे। यह कम लोगों को ज्ञात है कि उन्होंने एक पुस्तक हिंदी में लिखनी शुरू की थी, सेठ गोविन्द दास के इस आरोप के उत्तर में कि आप ऐसे प्रधानमंत्री हैं कि अपने देश की भाषा में एक भी पुस्तक नहीं लिखी। इस सबसे नेहरू का हिंदी प्रेम नहीं प्रकट होता- लेकिन वह जन-तांत्रिक आग्रह प्रकट होता है कि हम चाहें या न चाहें लेकिन यदि बहुमत हिंदी चाहता है तो हमें उसे स्वीकारना चाहिए। हिंदी समर्थकों में ऐसे लोग थे और हैं जो हिंदी के विकास को भारतीय भाषाओं के विकास से नहीं जोड़ते। वस्तुत: समस्या एकता की अवधारणा की है। ऐसे लोग एकता को एकरूपता समझते हैं। मूलत: एक प्रवृत्ति पूंजीवादी साम्राज्यवादी है। एकता और एकरूपता, भिन्न और परस्पर विपरीत हैं। एकता भिन्न घटकों के बीच, भिन्नता के बरकरार और फलने-फूलने के साथ होती है। एकरूपता अन्य सभी घटकों की निजता समाप्त करके स्थापित होती है। यह अन्तर जनतांत्रिक और एकधिकारवादी या फासीवादी प्रवृत्तियों का है। हिंदी के विकास का जनतांत्रिक आशय तमिल, बांग्ला, पंजाबी आदि- और सिर्फ भाषाओं नहीं बल्कि अगणित भारतीय बोलियों का भी विकास है। इस विषय में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने एक बार कहा था- जैसे हम कश्मीर की या भारत के किसी प्रदेश की एक-एक इंच भूमि की रक्षा करते हैं। थोड़ी-सी भूमि की रक्षा में पूरा देश सामूहिक रूप से युद्धरत होता है, वैसे ही अपने देश की कम-से-कम बोली जाने वाली भाषा या बोली की रक्षा के लिए पूरे देश को सन्नद्ध होना देशभक्ति है। हिंदी प्रेम देश का पर्याय है। सभी हिंदी प्रेमियों पर यह बात लागू नहीं होती। भाषा-उन्माद को भाषा प्रेम नहीं कहते। भाषा-चिन्तन करते समय ध्यान यथार्थ पर न जाए तो बहुत बातें छूट जाती हैं। अक्सर भारत की भाषा-समस्या को हिंदी और अंग्रेजी के द्वंद्व के रूप में देखा जाता है। अन्य भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी या हिंदी के संदर्भ में कम। मैं कुछ दिनों पूर्व धारवाड़ गया था। वहां से इरुकल, जो बुनकरी के लिए प्रसिद्ध है। वहां के महाविद्यालय में हिंदी दिवस मनाने के लिए आए हुए विद्यार्थियों से विशाल सभा-कक्ष भरा था। मीरा और कबीर के भजन छात्राओं ने कन्नड़-लिपि में पढ़कर गाए। कन्नड़-भाषी निम्नमध्यवर्गीय छात्र-छात्राओं को न हिंदी आती थी न अंग्रेजी। अध्यापकों की स्थिति वैसी ही थी। एक कपड़ा-व्यापारी का लड़का कॉमर्स पढ़ता था वह दिन भर मुझसे कहता रहा, मैं इनकम टैक्स इंसपेक्टर बनना चाहता हूं। दिल्ली से मेरे लिए किताब भिजवा दीजिए। मेरा अनुमान है कि हिंदी की तुलना में अन्य भारतीय भाषा-भाषी सामान्य जनता पर अंग्रेजी का आतंक और जुल्म ज्यादा है। कभी-कभी तो यह लगता है कि निम्न वर्ग के लिए हिंदी भी अंग्रेजी ही है। लेकिन उच्चवर्ग को छोड़ दें तो मध्यवर्ग और निम्न-मध्यवर्ग के लिए अंग्रेजी हिंदी के फर्क से बहुत बड़ा फर्क पड़ता है। न्यायपालिका, अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवाओं, उच्च शिक्षा के माध्यम आदि में हिंदी और अंग्रेजी का द्वंद्व और उसका परिणाम निर्णायक है और भारत के भविष्य को दिशा देने वाला है। इस विषय में कुछ वर्षों पूर्व प्रो- यूआर अनन्तमूर्ति ने काशी विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में बोलते हु

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