संस्कृति का संकट और साहित्य का दायित्व
संस्कृति का संकट और
साहित्य का दायित्व'
रामनाथ शिवेंद्र

जाहिर है आज के समय को पहचानना आसान नहीं है। आज के समय की पहचान इस लिए भी कठिन है क्योंकि तमाम वैचारिक आख्यानों से लैश आज का समय एकरेखीय नहीं है। हमारा समय बाजार की चकाचौंध में ऑखें मिचमिचा रहा है तो आज्ञाकारी उपभोक्ता की तरह बाजार में छितराये कार्टूनों के हसीन करतबों में गोते लगा रहा है। कुछ लोग आज के समय के करतबों पर मुग्ध होकर नारे लगा रहे हैं कि यह समय खुद के वैभव व पराक्रम को प्रमाणित करने का समय है, यानि खुद में जीने मरने और बाजार का वसंत पीने का समय है यह। तो इस तरह से समय बदल रहा है सो संस्कृति भी प्रकृति की कुदरती भूमिकाओं को छलांगते हुए अपने मूल रूपों को लगातार बदल रही है। समय के हिसाब से बदल जाना संस्कृति की मजबूरी है। संस्कृति की सारी सीखें समय की गिरफ्त में किसी बंधुआ मजूर की तरह फंसा दी जाती हैं ऐसी स्थिति में संस्कृति किसी बेजान वस्तु की तरह विवश होकर समय की आज्ञाकारिता के अलावा कुछ कर नहीं सकती। ऐसी सूरत में कहा जाना चाहिए कि संस्कृति का जो रूप, जो ताल व लय तथा राग, उपनिवेशी सत्ता के विरोध वाला था, आज कहीं नहीं दिख रहा। उपनिवेशी समय का केवल आज्ञाकारी वाला भाव ही राजनीति हो या नौकरशाही हो, उसमें दीख रहा है। सत्ता को विनम्र बनाने वाला जनशक्ति का प्रतिरोधी भाव तो सिरे से गायब हैं। सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा, हड़ताल, घेराव, सत्याग्रह जैसे जनविरोध की अभिव्यक्ति वाले प्रतिरोधी आन्दोलन तो अतीत की बातें हैं। सत्ता के निष्ठुर स्वभावों को परिवर्तित कराने तथा सत्ता को विनम्र बनाने के लिए जनविरोध तो हमारी सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा है पर वह चेतना जन की धारणाओं से लगातार विलुप्त होती जा रही है। लोक संस्कृति से प्रकृति का तथा मानव की कृति का अब दूर दूर तक कोई नाता नहीं। हम आज के जटिल समय में विज्ञान के कौतुकों को सामाजिक परिवर्तनों से अलहदा करके संस्कृति या सभ्यता के बारे में सोच नहीं सकते। जाहिर है कि राजनीति हो या साहित्य वह वैज्ञानिक बदलावों से अलग नहीं हो सकता। चाहे मामला कहानी का हो या कविता का सभी पर समाज के बदलते रूपों का असर पड़ता ही है। यह जो संस्कृति है, अब केवल प्रकृति के बदलते रूपों पर ही केन्द्रित नहीं रह सकती, उसे विज्ञान की मनोरम उपलब्धियों का सहभागी बनना ही होगा। सो संस्कृति खुद को बदलते हुए नये आयामों व अवधारणाओं को सिरज रही है। हमें मालूम है कि संस्कृति का मामला केवल संस्कार वाला मामला नहीं रह गया है। ‘जैसा संस्कार वैसी संस्कृति’ यह एक कल्पना है यथार्थ से कोसों दूर। जाहिर है, जब समय बदल रहा है फिर तो संस्कृति को बदलना ही होगा, संस्कृति बदल भी रही है, उस बदलाव में सहभागिता पूर्ण अर्थनियोजन व समान सामाजिकप्रबंधन का अभाव पूरी तरह से है फिर भी उन बदलावों की तरफ हम ऑखें मूंदे हुए हैं। जबकि हमारी संस्कृति तो अपने विकास क्रम में सदैव वन्धुत्व, सहभागिता, तथा पीर पराई वाली रही है, जिसका अब दूर दूर तक पता नहीं। आत्मकेन्द्रीयता के बादलों में करूणा, दया, सहानुभूति जैसे शब्द और इनके सरोकार बेमतलब जैसे दीखने लगे हैं। जबकि औद्योगिक क्रान्ति के पहले, अपने देश में आजादी के पहले मनुष्यता बचाये रखने के वे ही कुदरती भाव "वसुधैव कुटुम्बकम्" को प्रमाणित करने वाले हुआ करते थे। हमें ध्यान रखना होगा कि हम आज के हम हैं, पहले वाले हम नहीं, पहले वाले हम में मैं भी था पर आज की तरह विकृत और खुद में केन्द्रित नहीं था। आज का समय गोदान, कामायनी, प्रिय प्रवास वाला नहीं है, न ही कामरेड की कोट वाला है। गुलामी के दौर में किसान आन्दोलनों के संदर्भ में प्रेमचन्द प्रेमाश्रम तथा रंगभूमि लिख रहे थे तो नागार्जुन बलचनवा लिख रहे थे। यह भी ध्यान रखना होगा कि उसी समय के आसपास नागार्जुन का "नई पौध" उपन्यास आता है जो मिथिला के ब्राह्मणों की उस परंपरा के विरोध पर केन्द्रित था जिसके तहत वे बालिकाओं का क्रय बिक्रय किया करते थे। विधवाओं को केन्द्र में रख कर प्रेमचंद जी निर्मला लिख रहे थे और आज। आज के समय को अगर हमें देखना है फिर तो ‘पीली छतरी वाली लड़की’ से होते हुए हमें ‘हासिल’ तक जाना होगा। पर क्या यह जो हम देख रहे हैं या हमें जो दिखाया जा रहा है, यही हमारे समय का सच है? या हमें आतंकवादियों के सफाये वाले कथानक पर केन्द्रित सुन्दर ठाकुर के उपन्यास पत्थर पर दूब को भी देखना होगा और जनगणना की पोल खोलने वाले वीरेन्द्र सारंग के उपन्यास हाता रहीम को भी देखना चाहिए कि यह जो हमारा समय है वह पीछे ठहरा हुआ नहीं है, आगे भी है। कथाक्रम के अंक अक्टूबर -दिसंबर 2015 में एक कहानी प्रकाशित हुई है, शीर्षक है..‘यस वी कैन’ सुभाष रंजन ने इस कहानी को कंपोज किया है। हम क्या कर सकते है, या हमें क्या करना चाहिए, इन सवालों से टकराते हुए कथा आगे बढ़ती है। कथा एक माओवादी पर केन्द्रित है पर पूरी तरह नहीं, इस कथा में अदालत और वकील भी हैं गोया न्यायशास्त्र का पूरा ढांचा इस कथा में खड़ा है। हमें ध्यान रखना होगा कि यह न्यायशास्त्र का वही ढांचा है जिसमें हमें रहना है और उसी के संतुलन के सहारे जीवन जीने की कलाओं को सीखना है। कथा में अखबार भी आता है उसकी सूचना है कि एक माओवादी सलाखों के पीछे से आई.ए.एस. बन गया है और वही माओवादी जो सलाखों में है जाहिर है उसे बिना अदालती कार्यवाहियों के सजा नहीं दी जा सकती, सो उसे अदालत के समक्ष भी प्रस्तुत किया जाता है। माओवादी कहता है कि.... ‘माफ कीजिए वकील साहब! अभी दो रोज पहले की बात है, समाचार पत्रों में आया था कि आप ही के कोर्ट परिसर में उनके (नक्सलाइटों) कुछ इश्तेहार पाये गये थे तथा उनका साहित्य भी बरामद हुआ था, क्या यह मान लिया जाय कि आप भी... हम तो भूख और भय के साये में जीते हैं, भूख और भय के साये में उनके हिमायती भी तो पनाह पाते हैं, और उनके साहित्य भी। हम पढ़े लिखे हैं, हमें माओ साहित्य पढ़ाना उनकी राजनीतिक मजबूरी है पर आपने कितनों को इसी बहाने सलाखों के पीछे डाल रखा है, पता नहीं, जिन्होंने ककहरा भी नहीं पढ़ा है उन्हें भी.. ‘आदिवासी होना अपने आप में एक बड़ा अपराध है वकील साहब! आप आदिवासी नहीं हैं न इसलिए’ मैं न्यायालय पर नहीं अपने आप पर हस रहा हूं, अपने आदिवासी होने पर, मैं जब भी जहां भी गया हूं मुझसे माओवाद पर प्रश्न पूछे गये, कालेज में सहपाठी मित्रों ने पूछा, प्रोफेसरों की जिज्ञासा रही। अभी यू.पी.एस.सी. में साक्षात्कार के दरम्यान भी घंटों मुझसे इन्हीं से संबधित प्रश्न पूछा जाता रहा’ तो "यस वी कैन" की कथा में अदालत, अखबार, वकील, तथा एकेडेमिक बहसों को आयोजित करने वाले वौद्धिकों के संस्थान सभी को केन्द्र में रख कर सुभाष रंजन ने एक साथ सभी पर कथा के माध्यम से क्या होना चाहिए और क्या हो रहा है, की घुमावदार बहस को खोलने का सफल प्रयास किया है। हम कह सकते हैं कि यस वी कैन आज के जटिल समय की जटिलताओं पर प्रहार करने वाली कथा है। कथायें तो माओवाद को छूती, व सहलाती हुई कई हैं पर उनमें पूंजी तथा पूंजी पर खड़े संस्थानों के बाबत बहसें बहुत कम हैं या नहीं के बराबर हैं। सुभाष रंजन की चिन्ता है (वस्तुतः आदिवासियों, दलितों, व प्रताड़ितों व वंचितो की भी वही चिंता है) कि यह जो समाज है, जो कई, कई खानों में बंटा हुआ है, कई, कई आर्थिक व सामाजिक स्थितियों परिस्थितियों वाला है, हर क्षेत्र मंे विषम स्थितियां परिस्थितियां हैं, क्या ऐसे समाज में हम जो अधिकार और अस्मिता की बातें करते हैं उसका कुछ मतलब है या मतलब नहीं है। अदालत, अखबार, वकील, विश्वविद्यालय ये जो संस्थान हैं आखिर ये किसके लिए और किस बुनियाद पर खड़े हैं? क्या इन्हें पूंजीवादी गतिविधियों को चालित, संचालित या बचाये रखने वाले उपक्रम के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए? अदालत, वकील अखबार तथा दूसरे तरह के वौद्धिक संस्थानों के बारे में गांधी जी के विचारों को 1909 में लिखी उनकी एक छोटी सी पुस्तिका हिन्द स्वराज्य में देखना आज के जटिल समय में अनिवार्य लगता है.. ‘.....वकील कैसे पैदा हुए, उन्होंने कैसी धांधली मचायी, अगर यह सब आप समझ सकंेे तो मेरे जैसी ही नफरत आपको भी इस पेशे के लिए होगी। अंग्रंेजी सत्ता की मुख्य कुजी उनकी अदालतंे हैं और अदालतों की कंुजी वकील हैं।’ पृ..58 मतलब साफ है किसी भी तरह की सत्ता हो उसकी कुजी अदालतें और वकील हैं, आज भी वैसा ही देखा जा रहा है। वकील कानूनों के बाहर नहीं जा सकता और अदालतें भी। दोनों बंधे हुए अपने करतबों पर आहंे भरने के लिए विवश हैं। सामान्य रूप से अदालतों की कुछ प्रक्रियाओं को देखा जा रहा है कि अदालतें आरोपियों को जमानतें देने के मामले में हिचकिचाती हैं। वे समझती हैं कि जमानतें काहे देना, आरोपी को जेल भेज दो, जमानते देने की जबाबदेही कौन अपने सिर पर लादे? तो यह है व्यवस्था। जमानत अगर अदालतें दे देती हैं अपने विवेक से, तो उन्हें जमानत देने का कारण बताना पड़ता है और जमानत न देने पर उन्हें कुछ नहीं करना पड़ता। ऐसी प्रक्रिया का एक अर्थ यह भी निकलता है कि पुलिस गलत कर ही नहीं सकती जैसे एक समय था कि राजा गलत कर ही नहीं सकता तो हमारा यह जो कानूनी समाज है ऐक्ट आफ गाड वाला है। सत्ता का हर कार्य ऐक्ट आफ गाड़ यानि ईश्वर का कार्य माना जाता है। गांधी जी ने तो कानून बनाने वाली संस्था अंग्रेजी पार्लियामेंन्ट के बारे में कहा था पर उनकी सुनता कौन है? ...‘इतना तो सब कबूल करते हैं कि पार्लियामेन्ट मेम्बर दिखावटी और स्वार्थी पाये जाते हैं, सब अपना मतलब साधने की सोचते हैं। सिर्फ डर के कारण ही कुछ काम करती हैं। जो काम आज किया कल उसे रद्द करना पड़ता है। आज तक एक भी चीज को पार्लियामेन्ट ने ठिकाने लगाया हो ऐसी कोंई मिसाल देखने में नहीं आती। बड़े सवालों पर जब चर्चा पार्लियामेन्ट में चलती है तब उसके मेम्बर पैर फैलाकर लेटते हैं या बैठे, बैठे झपकियां लेते हैं। एक महान लेखक ने उसे (पार्लियामेन्ट) बातूनी कहा है। किसी ने कहा है कि पार्लियामेन्ट बच्चा है..आज सात सौ साल भी पार्लियामेन्ट बच्चा ही हो तो वह बड़ी कब होगी? पृ...34. गांधी जी ने साफ कहा था कि हमें सुधरना होगा और यह जो स्वराज्य का सत्याग्रह है वही हमें सुधारेगा पर स्वराज्य को सत्ता तथा सत्ताओं ने अपने निहित स्वार्थों के अनुरूप परिभाषित कर लिया कि केवल अंग्रेज चले जायें वही हुआ उनकी संस्कृति, उनके कानून, उनके आचरण जस के तस रह गये, उन्हें हमने सगर्व अपना लिया। स्वराज्य का मतलब था, अपना राज्य, अपना कानून, देशी कानून, बुनियादी शिक्षा यानि सबका राज्य। सबका कानून, जनता का राज्य, स्वराज्य में कुछ चुने हुए लोगों का ही राज्य कैसे आ गया, कैसे आ गया उनका राज्य जो परीक्षा देकर नौकरशाही की जमात बनाते हैं। लोकशाही हो या नौकर शाही अगर ये दोनों जनता के प्रति जबाबदेह नहीं हैं तो कहां है स्वराज्य? पर गांधी जी की सुनता कौन है? ‘हमें अंग्रेजी राज्य तो चाहिए पर अंग्रेज (शासक) नहीं चाहिए। आप बाध का स्वभाव तो चाहते हैं लेकिन बाघ नहीं चाहते हैं’ पृ..33 आजादी मिली और हमने बाघ (अंग्रेज) की संस्कृति, सभ्यता, कानून अपना लिया। आजादी के बाद हुआ क्या, हमने क्या हासिल किया? क्या हमें हमारा स्वराज्य मिला, हमारा कानून, हमारी संस्कृति मिली, हमें तो वही अंग्रेजी राज्य ही मिला, उसके कानून मिले करीब करीब उन्हीं का संविधान भी मिला। हां अंग्रेज चले गये पर देशीअंग्रेज सत्ता पर काबिज हो गये। आखिर क्या हुआ गांधी जी की चेतावनियों का, उनकी शिक्षा का? तो एक तरह से अदालत, अखबार, विधायिका, विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों की कार्यसंस्कृति में वही अंग्रेजों वाले दिशानिर्देश काम कर रहे हैं। एक तरह से आज का समय भी अंग्रेजी हकूमत वाला ही है। हमें नहीं लगता कि जब तक सरकारी, गैर सरकारी, कानूनी, शैक्षिक, सांस्कृतिक, व्यावसायिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक सस्थानों की कार्यसंस्कृति नहीं बदलती तब तक कुछ बदलने वाला है। साहित्य में भी आज के समय के अनुसार हो सकने वाले बदलावों को हम रेखांकित नहीं कर पा रहे हैं। जैसा कि ऊपर हम लिख चुके हैं कि एक समय था जब प्रेमचंद जी किसान आन्दोलनों के संदर्भों को अपने उपन्यासों में दर्ज कर रहे थे और नागार्जुन जी ने तो खुद मैथिल ब्राह्मण होते हुए भी नई पौध उपन्यास लिख कर अपने सजातियों की कुत्सित परंपराओं का विरोध कर रहे थे, पर आज हम क्या कर रहे हैं? तो आजादी के पहले तथा बाद के कुछ समय तक के लिखे गये उपन्यासों में समय की मुखरता साफ साफ दिखती थी। जातिभेद, लिंगभेद श्रेणीभेद जैसे जरूरी सामाजिक सरोकारों को केन्द्र में रख कर साहित्य सृजित किये जा रहे थे। पर आज लगता है कि हम साहित्य के मूल सरोकारों से खुद को अलगिया चुके हैं और बाजारू ढंग से विषयों को चुनने की आजादी में डूब चुके हैं। विषय वही हो जो बिक सके, जिसका मूल्य मिल सके। हम यह तो मानते हैं कि आज का समय बाजारू है, आज का समय पूंजी के विविध खेलों का है, आज का समय इतिहास और कविता के अन्तों वाला है पर हम उस बाबत कोई महत्वपूर्ण कृति नहीं दे पा रहे हैं। अगर कोई कृति आ भी जाती है तो साहित्य के समय के संचालकों के लिए उस कृति का कोई मूल्य नहीं होता। अगर ऐसा होता तो हाता रहीम की चर्चा हो रही होती जो जनगणना की प्रक्रिया को खोलने वाली कृति है। वन प्रबंधन के धोखों पर केन्द्रित मेरे उपन्यास हरियल की लकड़ी की चर्चा हो रही होती, या तीसरा रास्ता उपन्यास की। जो स्वयं सेवीसंगठनों की कार्यशैली के धोखों को उजगर करने वाली रचना है, पर हम ऐसा नहीं कर रहे। हम जानते है कि आज का समय पूजी के कौतुकों, अचरजों तथा मुद्रा बाजारों का है। हमें समय को पूंजी तथा शेयर व मुद्रा बाजार के संदर्भा में देखना चाहिए, हम बाजार तथा उपभोक्ता की तमाम बातें करते हैं, पर उसके करतबों के बारे कोई प्रामाणिक कृति नहीं दे पा रहे हैं, हमें इस बाबत गंभीरता से गुनना होगा। यह जो बाजार है, और बाजार में निर्वाध प्रवाहित होने वाली पूंजी है, धन का केन्द्रीयण है, और सर्वजन के नाम पर पूंजी का वैयक्तिक संचालन व नियंत्रण है या जो जनकल्याण के कार्यक्रम हैं, सार्वजनिक वितरण प्रणाली का ढांचा है, किसानों के अनाजों के उत्पादनों के खरीद फरोख्त का विषय है, इन विषयों पर दूसरे देशों में लिखीं किताबें हमारी ऑखें खोल सकती हैं। भले ही वे किताबे विदेशियों द्वारा लिखी गयी हों। किताबें देशी, विदेशी नहीं हुआ करतीं। बाजार के बारे में एक बात साफ है कि वह चढ़ता है तो उतरता भी है। प्रकृति के नियमों की तरह जो पेड़ खड़ा है वह कल भहरायेगा ही। तो यह जो बाजार है जिसके चकाचौध में हम गोते लगा रहे हैं, हमें उसके स्थायित्व पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। एमिला जोला का एक उपन्यास है मनी इस उपन्यास में एमिला ने ला नामक एक ऐसे व्यक्ति के चरित्र तथा उसकी कंपनी के बारे में विस्तार से लिखा है कि कैसे ला ने अपनी कंपनी को पूंजी नियंत्रण के शिखर पर बिठा दिया। कुछ समय बाद ही ला का जादू खतम हो गया और अचानक शेयर गिरने लगे पता चला कि ला की कंपनी के सारे वादे झूठे थे। ऐसा तो होना ही था। हमारे देश में भी पूंजीपति विजय माल्या उदाहरण हैं। यह जो शेयरों के उतार चढ़ाव का मामला है, या जो शेयर बाजार है जो बाजार को चलाते हैं, उनके बारे में बतौर साहित्यकार हमारी समझ नहीं के बराबर है। हम तो आज भी रीतिकाल के मनोरमों को चूमने में मगन हैं। "एमिला जोला" को "ला" के धोखेपूर्ण वित्तीय कारनामें प्रेरित करते हैं फिर "मनी" नामक उपन्यास आकार पाता है। पर हम साहित्यकारों को भारत के वित्तीय घोटलों की चिन्ता नहीं। यह "ला" वही है जिसे उस समय ‘विश्व का महानतम वित्त विशेषज्ञ’ बताया गया था। उसने अपनी कंपनी के द्वारा वर्तमान संयुक्त राज्य अमेरिका के लगभग आधे भू भाग फ्रेंच ईस्ट इण्डिया कंपनी, फ्र्रेंच ईस्ट चाइना कंपनी, तम्बाकू की इजारेदारी, टकसाल, कर वसूली, और राष्ट्रीय बैंक पर नियंत्रण कर लिया था। वह लोगों को कागजी मुद्रा छाप कर बतौर ऋण भी दिया करता था। गोया वह एक संपूर्ण संप्रभुता संपन्न व्यक्ति बन चुका था। उसका काम किसी देश की संप्रभुता जैसा था तो यह होता है वित्तीय प्रबंधन जो सत्ता के सारे तंत्रों को बौना बना देता है। फिर हम लोग अर्थप्रबंधन के ककहरों को नहीं जानते, अर्थव्यवस्था का सारा कार्य अर्थशास्त्रियों के हवाले सौंप कर हम मस्त हैं। वैसे इतना तो हमें पता है कि पहले बाजार समाज का ही हिस्सा था पर अब स्वतंत्र है अपना नियामक है और उत्पादन तथा वितरण के करिश्मों पर आधारित है। और ये उत्पादन तथा वितरण सामाजिक आवश्यकताओं तथा सामाजिक प्रबंधनों के लिए नहीं किये जा रहे बल्कि केवल और केवल मुनाफा कमाने के लिए किये जाने लगे हैं। मोटेतौर पर समझ लेना चाहिए कि शेयर खरीदने के लिए कंपनी को आवेदन देना यह प्राथमिक बाजार है और खरीदे हुए शेयरों को बेचना यह द्वितियक बाजार है। एक्सट्रा आर्डिनरी पापुलर डेल्यूजन्स एन्ड मैडनेश आफ क्राउड्स में किया है। पूंजी के चरित्र को खोलती चार्ल्स पी. किंडलबर्गर की एक पुस्तक है बाजार के कारनामों तथा उससे उत्पन्न संकटों की विस्तृत चर्चा चार्ल्स मैंके ने अपनी पुस्तक मेनियाज, पैनिक्स, एन्ड क्रैशेज, उसका हिन्दी रूपांतरण है उन्माद भगदड़, और विध्वंश शेयर । ये तीनों शब्द बहुत ही आकर्षक हैं हालांकि अर्थशास़्त्र के हैं फिर भी इन शब्दों को अर्थशास्त्र से उधार लेकर हम साहित्य के रूपों के भीतरी विषयों के तहों को खंगालें तो हमारे साहित्य में भी चाहे मामला कविता, कहानी,, निबंधों में उन्माद, भगदड़ और विध्वंश दीखते हैं। कथा की बात करें तो भूख और भोजन के बीच की दूरी नाप सकने वाली कथायें सिरे से गायब हैं। आर्थिक प्रपंचों व उसके धोखों पर कुछ लिखना हम जानते ही नहीं। हमारे कथासाहित्य में उन्माद की स्थिति के कारण ही एक समय था जब अधिकांश कवितायें मॉ, पिता, पर केन्द्रित लिखी जाने लगीं थीं। चाहे कवि खास का मॉ, बाप से कुछ लेना देना रहा हो न रहा हो फिर भी। एक समय ऐसा भी आया कि गांव के गोबर, कीचड़ तथा उसकी गलियां भी कथाओं का पात्र बन गये। पर कृषितंत्र के साजिशों को छोड़ दिया जा रहा है। उसी तरह बाजार को केन्द्र में रख कर बड़े बड़े शहरों के कंकरीटों के भीतर की खुमारी को लेकर बरबस ही कथायें रची गयीं पर उनमें अर्थतंत्र के धोखों का खुलासा नहीं किया गया। श्लीलता और अश्लीलता तथा नारी शुचिता पर भी कथायें रची गयीं पर उनमें उस नारी का कहीं अता पता नहीं जो त्रिशूल लेकर शिव (अपने पति) को दौड़ा लेती है। कुछ कथायें हों भी तो वे पूरे भारतीय कथासाहित्य का प्रतिनिधित्व तो नहीं कर सकतीं। इससे इतर सवाल है क्या हुआ मनरेगा का और क्या हो रहा है मेक इन इन्डिया का तथा इससे जुड़े विकास का। हमें महसूस करना चाहिए कि यह जो ईस्ट इन्डिया कंपनी से लेकर मेक इन इन्डिया तक का रंगीन कंपनियों वाला भारत है, इसी भारत में किये जाने वाले गरीबों, आदिवासियों आदि के विस्थापन और विकास के अन्तर्संबधों को खोलती कथाओं का न लिखा जाना, क्या हमें बौना और नकारा प्रमाणित नहीं करता है? हम देख रहे हैं कि साहित्य के लिए आज का समय संकटों से भरा हुआ है, और हमें चुनौतियां दे रहा है कि हम आज के आर्थिक करतबों को केन्द्र में रख कर विकास के नारे को समझने का प्रयास करें और बतायें कि यह जो भूख और भोजन के बीच के दूरी है क्यों नहीं पाटी जा सकती? प्रकृति के उपहारों पर सर्वजन का अधिकार क्यों नहीं दिया जा रहा? भूख मुक्त समाज ही भयमुक्त हो सकता है। आखिर समाज को भय में क्यों रखा जा रहा है? अधिकारों के उपयोगों की सार्थकता तो कुदरती न्याय तथा शिक्षा से ही प्रमाणित हो सकती है। कुदरती न्याय तथा शिक्षा की तरफ दो कदम चल कर ही हम आशा कर सकते हैं कि हम साहित्यिक दायित्वों को पूरा करने के प्रयासों में हैं।