सदस्य:दिनेश श्रीनेत
गायिका इकबाल बानो हमेशा के लिए खामोश हो गईं। उनके चाहने वालों के लिए उनको भूल पाना नामुमकिन होगा और रहते जमाने तक उनकी सदाबहार ग़ज़लें और नज्में गूंजती रहेंगी। इकबाल बानो का निधन मंगलवार, 21 अप्रैल को हुआ। वे इस वक्त 73 की हो चली थीं।
उस्ताद की शागिर्दी और आल इंडिया रेडियो
[सम्पादित करें]दिल्ली में सन् 1935 में पैदा हुईं बानो को दिल्ली घराने के उस्ताद चांद खां की शागिर्दी हासिल हुई। बचपन में उनकी आवाज की कशिश और संगीत के प्रति दीवानगी देखकर बानो के पिता ने उन्हें संगीत सीखने की पूरी आजादी दी। उन्होंने शास्त्रीय संगीत पर आधारित सुगम संगीत की विधा ठुमरी और दादरा में खासी महारत हासिल कर ली थी। वे आल इंडिया रेडियो, दिल्ली के लिए गाने लगीं।
महज सत्रह बरस की उम्र में उनका निकाह हो गया मगर उनके शौहर ने वचन दिया कि वे बानो को कभी गाने से नहीं रोकेंगे। कहना न होगा कि सन् 1980 में अपनी मृत्यु तक उन्होंने यह वचन बखूबी निभाया।
इक़बाल बसीं पाकिस्तान
[सम्पादित करें]इकबाल सन् 1952 में पाकिस्तान चली गई थीं। वहां पाकिस्तान रेडियो ने उन्हें गाने के लिए बुलाया। उन्होंने अपनी गायकी का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन पांच वर्ष बाद लाहौर आर्ट काउंसिल में किया। बानो ने गुमनाम (1954), कातिल (1955), इंतकाम (1955), सरफरोश (1956), इश्क-ए-लैला (1957) और नागिन (1959) जैसी पाकिस्तानी फिल्मों के लिए भी अपनी आवाज दी।
गायकी के जानकारों का कहना है कि इकबाल बानो की आवाज़ की एक लिमिटेड रेंज थी, मगर भारत के कुमार गंधर्व की तरह वे अपने गले की हदों के भीतर जो करिश्मा कर गुजरती थीं, वो बड़े-बड़े गायक भी नहीं कर पाए।
नज्म बनी दिल की आवाज़
[सम्पादित करें]बगावत करने को उकसाती उनकी एक नज्म पाक में काफी मशहूर हुई। इसे उन्होंने करीब 50 हजार लोगों की भीड़ के सामने गाया था। यह दरअसल पाकिस्तान में याह्या खां की हुकूमत के खिलाफ यह वहां के आवाम की आवाज बन गई। कहते हैं जब भी किसी मंच पर इकबाल बानो इस नज्म को गाते हुए जब ये कहतीं 'सब ताज उछाले जाएंगे, सब तख्त गिराए जाएंगे....' दर्शक दीर्घा से समवेत स्वर में आवाजें आतीं '....हम देखेंगे'। इन सबके पीछे का रहस्य यह था कि पाकिस्तानी शासन के प्रति नाराज प्रजा को फैज अहमद फैज के इस गीत में उनके दिल की आवाज सुनाई पड़ रही थी।
पाठकों के लिए प्रस्तुत है उनकी गाई और फैज़ की लिखी सबसे मशहूर नज्म-
हम देखेंगे लाज़िम है कि हम भी देखेंगे हम देखेंगे .......
वो दिन कि जिसका वादा है जो लौह-ए-अजल में लिखा है हम देखेंगे .......
जब जुल्म ए सितम के कोह-ए-गरां रुई की तरह उड़ जाएँगे हम महकूमों के पाँव तले जब धरती धड़ धड़ धड़केगी और अहल-ए-हक़म के सर ऊपर जब बिजली कड़ कड़ कड़केगी हम देखेंगे .......
जब अर्ज़-ए-खुदा के काबे से सब बुत उठवाये जायेंगे हम अहल-ए-सफा, मरदूद-ए-हरम मसनद पे बिठाए जाएंगे सब ताज उछाले जाएंगे सब तख्त गिराए जाएंगे हम देखेंगे .......
बस नाम रहेगा अल्लाह का जो गायब भी है हाजिर भी जो नाजिर भी है मंज़र भी उठेगा अनलहक का नारा जो मैं भी हूँ और तुम भी हो और राज करेगी ख़ल्क-ए-ख़ुदा जो मैं भी हूँ और तुम भी हो हम देखेंगे...
--दिनेश श्रीनेत ११:२९, २२ अप्रैल २००९ (UTC)