सदस्य:Ramnathshivendra
आदिवासी कानून
रामनाथ शिवेन्द्र
जनजाति या आदिवासी दोनों न तो एक दूसरे के पूरक हैं और न ही पर्याय। आदिवासी का अर्थ मूल निवासी से ही लगाया जा सकता है, जबकि जनजाति में रहवास की मूल व्यवस्था का अर्थ किसी से छिपा नहीं है। जनजाति का अर्थ एक ऐसा वंशमूल या एक ऐसी प्रजाति जो सीधे तौर पर लोकसंस्कृति तथा लोककला व लोकविद्या से जुड़ी हुई हो, लगाया जा सकता है पर केवल ‘आदि’ या ‘मूल’ तथा रहवास से नहीं आदिवासीका सीधा अर्थ है ऐसा जनसमूह जो आदिकाल से ही निवासी हो कहीं बाहर से आकर बसाहट न किया हो। जाहिर है, ‘जन’ को ‘अभिजन’ से पूर्णतः अलग कोटि में मान लेने की परंपरा विकसित हो चुकी है। विडम्बना देखें जब से इतिहास में आर्य तथा द्रविण का संघर्ष उभरा है, तब से यह सिद्ध नहीं हो पा रहा है कि यहां के मूल निवासी कौन थे? ‘वनआर्य’ जातियां या ‘द्रविणआर्य’ जातियां, किसे मूल निवासी माना जाये, यह आज भी विवादास्पद बना हुआ है। लगभग इसी झगड़े के प्रारंभ से ही आदिवासियों को अंग्रेजों की शोषणकारी तर्ज पर एक अलग किस्म का नाम हासिल कराया गया है, वह है ‘वनवासी’, ‘गिरिवासी’ जिसका सीधा और स्पष्ट अर्थ है, ऐसी मानव प्रजातियां जो वनों तथा पहाड़ों पर निवास करती हों। अंग्रेजों ने साजिश के तौर पर आदिवासियों को जनजाति का नाम दिया था। जिसका अर्थ था एक ऐसा मानव समूह, जो हैं तो दूसरे मनुष्यों की तरह ही पर उनमें मुक्त जीवन जीने संबधी कुछ ऐसी भिन्नतांए व असमानतांए हैं जो सभ्य समाज के लिए अहितकर हैं। इस अंग्रेजी सोच ने जनजातीय समूहों को मानव समाज के दूसरे समूहों से अलग थलग कर दिया और उनसे उनके मूल निवासी होने के कुदरती अधिकारों को भी छीन लिया, इतना ही नहीं सके लिए कानूनी प्राविधानों को भी अपने तरीके से सृजित कर लिया। वनवासी या गिरिवासी नामकरण का भी यही अर्थ था। जनजातीय समूहों को तत्कालीन मानव सभ्यता से अलग करना। ऐसा करने से आदिवासी का मूल अर्थ ही समाप्त हो गया। आदिवासी का गंभीर अर्थ होता है यानि मूल निवासी, अंग्रेजों या मुगलों की तरह बाहरी नहीं, वे यहीं के हैं तथा इस देश पर उनका पूराअधिकार है, पर अंग्रेजों को तो मूल निवासी के अर्थ को पलट कर भ्रम पैदा करना था कि सभी जातियां आर्य हैं, और यहीं की हैं,देश में रहने वाली जातियों में जो भी फर्क दिखता है, वह नागर एवं अरण्यक सभ्यता के विभेदों के कारण दिखता है। लगभग सभी कालों में नागर तथा अरण्यक सभ्यता का भेद तो रहा ही है। यह निर्विविवादित सत्य है कि आदिम जनजाति समूह सदैव शोध व जिज्ञासा का विषय रहा है। इन्हें समझने वालों ने भी इन्हें समरूप न मान कर अलग अलग किस्म से समझने का प्रयास किया है। उसी के अनुसार व्याख्या भी की हैं। आदिवासियों के बारे में बौद्धिक मत-भिन्नताओं ने भी आदिवासियों को समझने में भ्रम फैलाने का ही काम किया है। आदिवासियों का समूह पूरी तरह से प्रकृति पर आधारित तथा प्रकृति की ही तरह हमेशा प्रसन्नचित्त रहने वाला, एक ऐसा समूह है जो सभ्यता की कुटिल कलाओं, वौद्धिक प्रपंचों तथा तार्किक विखंडनों के काल्पनिक स्वर्गों से पूरी तरह अलग है। आदिम समूह अपने जीवन निर्वाह तथा जीवन की शाश्वस्तता की ऊर्जा प्रकृति से हासिल कर पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर रहने वाला समूह है। सही अर्थों में, यह समूह न जनजाति की श्रेणी में आता है और न ही वनवासी की श्रेणी में, सीधे तौर पर ऐसे समूह को वनजीवी या प्रकृतिजीवी ही कहा जाना चाहिए, यह अलग बात है कि वनों से इन्हें लगातार बेदखल किया जाता रहा है, शायद इन्हें वनों से बेदखल करने के लिए ही वनजीवी नहीं माना गया। वनजीवी कहने से तो यह अर्थ निकलता ही कि ये वनजीवी हैं, वनों को सुरक्षित रखने वाली जातियां यही हैं। इनसे वनों की निर्भरता छीन कर ही इन्हें आदिवासी ;tribal नाम दिया गया जिससे प्रमाणित न हो कि वन इनके थे तथा ये वन-जीवी व वन-उपासक समूह ही वनों के रक्षक थे। और आज भी ये समूह ही वनों की सुरक्षा कर सकते हैं। आदिवासी समूहों का अध्ययन करने वालों ने अदिवासियों की संस्कृति से अलग से अलग जिन ‘घोटुलों’, ‘रोरुओं’ तथा ‘घुमकुरियाओं’ की कल्पना की है वे सर्वथा गलत जान पड़ती हैं। उन्होंने घोटुलों में स्वच्छन्द यौनाचार तथा मनोरंजन के ही चिन्ह पाये जबकि ऐसा नहीं है। घोटुल जैसे युवागृह आदिवासियों के सांस्कृतिक केन्द्रों की अभिव्यक्ति देते हैं तथा साबित करते हैं कि नर-नारी के रिश्तों को ठीक ढंग से समझने के लिए घोटुल जैसे यौन-प्रशिक्षण गृहों का होना आवश्यक है। घोटुल युवा वर्ग के लिए एक आवश्यक सांस्कृतिक प्रशिक्षण केन्द की तरह है। यह बात जाने कब से आदिवासी समूहों में सहज रूप से स्वीकृत तथा प्रचलित है। जबकि आज की सभ्य दुनिया काम शिक्षा sex education की अनिवार्यता पर अभी भी बहस कर रही है। नैतिकतावादियों के दबाव से काम शिक्षा का कार्यक्रम काफी हद तक प्रभावित हो रहा है। यह त्रासदपूर्ण विडम्बना है कि जिस आदिम प्रजाति में ‘घोटुल’ जैसे युवा गृह का सांस्कृतिक एवं सामाजिक रूप से प्रचलन हो वह समाज रोजी-रोटी के लिए परेशान हो, जिसके यहां दो जून का खाना भी न बनता हो, जिनकी जमीनें छीन ली गई हों, जिनका विस्थापन दर विस्थापन किया जा चुका हो, फिर भी वह समूह जीवित हो, आखिर वह जीवन जीने की आकांक्षा कहां से हासिल करता है? घोटुल जैसे युवागृह जिस सामूहिक अस्तित्व तथा सामूहिक कल्पनाशीलता की सूचना देते हैं उनकी तुलना में कथित सभ्यों के रात्रि क्लब वगैरह का कोई अर्थ नहीं। अशोक से लेकर मुगल काल तक, आदिवासी प्रजाति के प्रभावकारी स्वरूप का पता तो चलता है पर ऐसा नहीं मालूम होता है कि उन कालों में आदिवासियों की मूल व्यवस्था में, किसी भी तरह का कोई हस्तक्षेप न किया गया हो। स्वतंत्राता के पूर्व अंग्रेजों ने निश्चित रूप से इन भोली जनजाति प्रजातियों पर वैधानिक हमले किए तथा यह साबित करने कराने का कार्य किए कि ये प्रजातियां अन्य प्रजातियों के लिए काफी सीमा तक खतरनाक हैं। आदिवासी प्रजातियों को दूसरी अन्य प्रजातियों से अलग alliniate करने के उनके अपने लक्ष्य थे, जिससे उनकी एकता खण्डित रहे, कम से कम भारत में तो दो समूह रहें जो अलग अलग खानों में साफ तौर से विभक्त हों। ऐसा करने के लिए अग्रंेजों ने अलगाववाद के तमाम तर्कों को गढ़ा तथा जनजातीय समूहों को पूरी तरह से समाज की मुख्य-धारा से अलग कर दिया। आदिवासी समूहों को अलग करने का कारण देश में उभरने वाले अन्तर्विरोध भी रहे हैं। अंग्रेजी सत्ता-प्रबंधन चाहता था कि सामान्य व विशिष्ट रूप से चलने वाले सत्ताप्रबंधन के विरोध में आदिवासियों की कोई भूमिका न हो। अंग्रेजों ने इन आदिवासी समूहों का भलीभांति अध्ययन किया था तथा उन्हें इनकी वीरता तथा वलिदान का आभास था, खासतौर से 1857 के बाद तो अंग्रेज पूरी तरह सावधान हो चुके थे। इस काल में तमाम आदिवासी विद्रोह प्रकाश में आ चुके थे। 1855-56 में संथाल विद्रोह हो चुका था। कोल विद्रोह की पूरी लाक्षणिकता तथा व्यापकता से अंग्रेज वाकिफ थे, जो 1830 में हुआ था। 1897 के विद्रोह में मुण्डाओं ने ग्रामीणों के सुधार कार्यक्रमों में लगे ईसाई मिशनिरियों को भी नहीं छोड़ा। जमीनदार तो मारे ही गये, संथाल विद्रोह ने अंग्रेजों के कान खड़े कर दिए थे तथा अंग्रेजों को बता दिया था कि जमीन संथालों के लिए कोई विक्रय या विनिमय की वस्तु नहीं है जिसे जब चाहा जिसे दे दिया। 1855-56 का संथाल विद्रोह सशस्त्रक्रान्ति का पहला अध्याय था जो जमीनदारी व्यवस्था तथा अंग्रेजी व्यवस्था के खिलाफ आयोजित किया गया था। संथाल जनजाति समूह अपनी भूसंपदा की हिफाजत के लिए जिस तरह से मरने मिटने के लिए तत्पर हो गया था वह अंग्रेजों के लिए न केवल विस्मयकारी था वरन् एक पाठ भी था। सो अंग्रेजों ने आदिवासी समूहों को अन्य समूहों से अलग थलग रखना आवश्यक समझा। राष्ट्रीय आन्दोलनों से आदिवासी समूहों को किसी भी हाल में वंचित रखने का लक्ष्य, अंग्रेजों ने बना लिया। उनका मानना था ये जनजाति तथा वनवासी समूह अगर राष्ट्रीय आन्दोलनकारियों के साथ हो जाते हैं फिर तो पूरा देश ही स्वाधीनता आन्दोलन के पक्ष में खड़ा हो जायेगा। आनन फानन में अंग्रेजों ने आदिवासियों के क्षेत्रों को निषिद्ध क्षेत्रा घोषित कर दिया तथा उन क्षेत्रों में दूसरों के प्रवेश को रोक दिया। अंग्रेज अधिकारियों तथा ईसाई मिशनरी वालों को ही उन क्षेत्रों में जाने की छूट थी। आदिवासी क्षेत्रों को देश के दूसरे क्षेत्रों से अलग करने का यह अंग्रेजों का प्राथमिक प्रयास था, जिसे वे कानूनी भी बना रहे थे, पर वे पूरे देश के आदिवासी क्षेत्रों को अलग करने के बारे में पूरे तौर पर निर्णय नहीं ले पाये थे। फिलहाल यह आंशिक अलगाव था। इस क्रम को आगे बढ़ाते हुए अंग्रेजों ने प्रयोग के तौर पर राजमहल के पहड़िया, मलेरों व दुद्धी (सोनभद्र) के धांगरों, बैगाओं के आदिवासी बहुल क्षेत्रा को चुना। अंग्रेजों ने इन आदिवासी समूहों को मुख्यधारा में लाने का प्रयास करना शुरू कर दिया पर वह सारा कुछ दिखावा था असल बात तो आदिवासियों को अन्य समाजों से अलग करना था। उनके क्रान्तिकारी संपर्कों को तोड़ना था। अंग्रेजांे ने पहड़िया तथा मलेरों को मुख्यधारा में लाने के लिए एक अलग न्यायालय की भी स्थापना की तथा आदिवासियों को जमीन का सनद भी दिया। अंग्रेजों ने पहड़िया तथा मलेरों को सनद बांटने के बाद एक और काम किया वह यह कि मलेरों तथा पहड़िया आदिवासी क्षेत्रा को घेर कर उनके गांवों के किनारों की जमीनों को सैनिकों तथा उनके आश्रितों के बीच आवंटित कर दिया, एक तरह से बाड़ लगा दिया। पूरे राजमहल आदिवासी क्षेत्रा को अंग्रेजों ने घेरे में ले लिया जिससे वे विद्रोह न कर सकें।अंग्रेजों ने अलग ढंग से जिस न्यायलय की व्यवस्था की थी उसमें आदिवासीनेताओं की भी भागीदारी सुनिश्चित किया। अंग्रेजों द्वारा स्थापित उक्त न्यायालय आदिवासी समूहों के मुकदमों का निर्णय भी करता था इसका परिणाम सकारात्मक निकला पर वह कुछ ही समय के लिए था। इस सफलता से उत्साहित हो कर अंग्रेजों ने फैसला लिया कि आदिवासी क्षेत्रों में बाहरियों के प्रवेश को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए, बाहरियों को राकने के लिए अंग्रेजों ने समूचे क्षेत्रा को आदिवासियों में आवंटित कर दिया। एक प्रकार से आदिवासियों के लिए यह स्थानीय सत्ता-प्रबंधन का एक रूप था। इतना ही नहीं अंग्रेजों ने उस क्षेत्रा को राजस्व से भी मुक्त कर दिया। इसका प्रभाव आदिवासियों पर अच्छा पड़ा, आदिवासियों ने अंग्रेजांे की वफादारी करना तथा उनके कानूनों को मानना शुरू कर दिया। इस पूरी व्यवस्था को अंग्रेजो ने 1796 के रेगुलेशन में ढाल दिया, इतना ही नहीं एक पहाड़ी परिषद की भी स्थापना किया, पर इस तरह का छलावा पूर्ण प्रबंधन बहुत प्रभावकारी नहीं रह सका, फलस्वरूप अंग्रेजों ने इस रेगुलेशन पर 1827 के रेगुलेशन के द्वारा रोक लगा दी। 1827 के रेगुलेशन के अंग्रेजी रोक के बाद सिंहभूमि में हो विद्रोह 1831 में तथा कोलविद्रोह 1830, खोड उत्थान 1846, तथा क्रान्तिकारी संथाल विद्रोह 1855 में प्रारंभ हो जाता है। इन सभी विद्रोहों का मूल कारण था,अपने स्वामित्व तथा अस्मिता की रक्षा करना तथा आत्मस्वतंत्राता की हिफाजत करना। अंग्रेजी व्यवस्था के जरिए नये जमीनदारों व सौदागरों का एक ऐसा वर्ग तैयार हो गया था जो जंगली जनजाति क्षेत्रों में जा कर लूटपाट ही नहीं नीलामी भी लेने लग गया था। जमीनदारी नीलाम लेने के बाद जबरिया लगान वसूलना भी शुरू कर दिया था। लगान वसूली का कोई न्यायिक आधार नहीं था, वे में तथा कोलविद्रोह 1830, खोड उत्थान 1846, तथा क्रान्तिकारी संथाल विद्रोह 1855 में प्रारंभ हो जाता है। इन सभी विद्रोहों का मूल कारण था,अपने स्वामित्व तथा अस्मिता की रक्षा करना तथा आत्मस्वतंत्राता की हिफाजत करना। अंग्रेजी व्यवस्था के जरिए नये जमीनदारों व सौदागरों का एक ऐसा वर्ग तैयार हो गया था जो जंगली जनजाति क्षेत्रों में जा कर लूटपाट ही नहीं नीलामी भी लेने लग गया था। जमीनदारी नीलाम लेने के बाद जबरिया लगान वसूलना भी शुरू कर दिया था। लगान वसूली का कोई न्यायिक आधार नहीं था, वे जितना धन वसूलना चाहते थे, वसूलने लगे थे। वे इस बात की चिन्ता भी नहीं करते थे कि जमीन में फसलें कितनी उत्पादित हुई हैं। लगान वसूल करने के लिए जमीनदार क्रूरतम तरीकों का प्रयोग करता था जो सभी जनजाति समूहों के लिए उनकी निश्छल स्वतंत्राता के विपरीत होता था। फलस्वरूप दो दशक के भीतर ही हर क्षेत्रा में जनजाति समूहों ने सशत्रा विद्रोह कर दिया। अंग्रेजों ने जनजाति के विद्रोहों को गंभीरता से लिया तथा निश्चित किया कि इनके क्षेत्रों को पहले की तरह नहीं वरन पूरी तरह से अलग कर दिया जाना चाहिए। मनोवैज्ञानिकों तथा अनुसूचित जनजाति के अंग्रेजी कमीशन ने भी इसकी संस्तुति कर दी। फिर तो अंग्रेजों ने जनजाति समूहों के क्षेत्रों को अन्य समूहों से पूरी तरह से अलग करने के लिए 1874 में एक अधिनियम पारित कर दिया। इस अधिनियम के आधार पर जनजाति क्षेत्रों को अनुसूचित जिलों के रूप में विभाजित कर दिया गया। बाद में चल कर 1919 में एक दूसरा अधिनियम भी लाया गया। इस अधिनियम के तहत अधिकारियों की नियुक्तियां की गई तथा उन्हें राजस्व वसूली के साथ साथ दीवानी एवं फौजदारी के मुकदमों का निपटारे काम भी दिया गया तथा अनुसूचित जिलों के प्रशासन की जिम्मेदारी भी उन पर डाल दी गई। 1857 के स्वतंत्राता संग्राम ने अंग्रेजों को सचेत कर दिया फलस्वरूप वे हर हाल में जनजाति क्षेत्रों को अलग करने का निर्णय ले लिए। साइमन कमीशन ने भी सुझाव दिया कि अनुसूचित जिलों की जिम्मेदारी केन्द्र पर होनी चाहिए तथा इन्हें प्रान्तों से अलग कर देना चाहिए। 1947 तक अंग्रेजों ने जनजाति क्षेत्रों के लिए कई नियम व उपनियम पारित किए, तथा क्रूरतम व सख्त रास्ते अख्तियार किए जिससे जनजाति समूह दूसरे क्षेत्रों से अलग-थलग हो जायें। 1935 के अधिनियम के द्वारा जनजाति क्षेत्रों को पूर्ण व आंशिक रूप से अलग क्षेत्रों में परिवर्तित कर दिया गया। जनजाति क्षेत्रों पर प्रशासन स्थापित करने की अंग्रेजी इच्छाशक्ति को उनके विभाजन व राज करो की नीति से ही समझा जाना चाहिए। हालांकि अंग्रेज हमेशा जनकल्याण की ही बातें करते थे तथा संदेश देना चाहते थे कि वे जनजाति समूहों का भला करना चाहते हैं पर ऐसा नहीं था। उनके सामने अपनी सत्ता को स्थायित्व प्रदान करने का एक साम्राज्यवादी कार्यभार था। इसलिए वे भारत को सांस्कृतिक व सामाजिक रूप से बंटा हुआ रखना चाहते थे। अपने राजनीतिक व आर्थिक विस्तार के लिए भी वे काफी चिन्तित रहते थे तथा उनका प्रयास होता था कि किसी भी हाल में भारतीयों में एकता न स्थापित हो। भारतीय समाज हर हाल में विभाजित रहे। मीरजापुर व सोनभद्र में 1795 का भूमि स्थायी बन्दोबस्त पूरी तरह लागू नहीं किया गया तथा सिंगरौली व दुद्धी की भूमि कोे बिना बन्दोबस्ती के ही छोड़ दिया गया। इस क्षेत्रा में जनजातियों का बाहुल्य था, बाद में चल कर दुद्धी को अंग्रेजी जैक (ब्रिटिश राज) के अधीन कर लिया गया तथा इसे एक अलग क्षेत्रा मान कर तमाम कानूनी सुविधाओं से वंचित कर दिया गया वैसे भी संपूर्ण मीरजापुर जनपद 1830 के पहले बनारस के ही अधीन था गजेटियर 1911पृ.165 बताता है- special arrangement wera made for Rajas of Kantit, Agori and Barahar आदिवासी क्षेत्रों को अलग करने के लक्ष्य से अगोरी, बड़हर, कन्तित तथा सिंगरौली के लिए नये प्रकार के कानूनी प्रबंध किए गये। पूरे क्षेत्रा की भूमि संपदा को बिना बन्दोबस्ती के छोड़ दिया गया। अंग्रेजों ने दुद्धी, बड़हर तथा सिंगरौली रियासतों को आदिवासी बहुल क्षेत्रा मान कर बन्दोबस्ती से अलग रखा। उसका कारण था कि क्षेत्रा में भूमि बन्दोबस्ती को ले कर अन्तर्विरोध न उभरने पायंे। आदिवासी क्षेत्रों के अलगाव की कहानी को इस प्रकार समझा जा सकता है कि बनारस राज का स्थायी बन्दोबस्त 1795 में कर दिया जाता है तथा 1830 में मीरजापुर को अलग जनपद का दर्जा मिलता है, 1989 तक सोनभद्र मीरजापुर का ही एक हिस्सा था फिर भी अंग्रेजी व्यवस्था 1849 तक दुद्धी सिंगरौली तथा बड़हर के लिए कोई नई व्यवस्था नहीं कर पाती। किसी तरह उन क्षेत्रों की भूमि बन्दोबस्ती 1876-77 तक हो पाती है। इस बन्दोबस्ती का परिणाम दुद्धी, सिंगरौली तथा बड़हर के लिए बहुत ही विनाश-कारी साबित हुआ क्योंकि वन क्षेत्रा को बन्दोबस्त के लिए बहुत सीमित कर दिया गया और सारे वन क्षेत्रा को अंग्रेजी हुकूमत में मिला लिया गया। वनक्षेत्रों के अधिग्रहणका मतलब था उसके भीतर पड़ने वाले जोतों को नियंत्रित करना तथा लगान का निर्धारण करके नये सिरे से लगान वसूलना। एक प्रकार से सुरक्षित वन क्षेत्रा स्थापित कर दिया गया जो आज के सुरक्षित वन क्षेत्रा की जमीनदारी की तरह से ही था। आइए देखते हैं अंग्रेजों ने वन क्षेत्रों को क्यों तथा कैसे सुरक्षित किया? यह जान लेना आवश्यक होगा कि इससे आदिवासियों को जंगली क्षेत्रों सेबुरी तरह विस्थापित होना पड़ा। लार्ड डलहौजी जो मध्यभारत का गवर्नर था उसने 1855 के एक वननीति के जरिए वनजीवी तथा आदिवासी समुदाय के लिए खतरनाक संकट पैदा कर दिया। इस वन नीति के तहत उसने वनक्षेत्रों का सीमांकन करा दिया तथा वनक्षेत्रों में पायी जाने वाली ईमारती लकड़ियों को राज्य सरकार की संपत्ति घोषित कर दिया। इस प्रकार से भारतीय नागरिकों के वन क्षेत्रों के दावों पर नियंत्राण लगा दिया। इतना ही नहीं 1855 की डलहौजी की वन-नीति के तहत एक सर्वथा नया विभाग वन विभाग भी कायम करके उसका विनाशकारी ढांचा भी खड़ा कर दिया गया। इस विभाग का सबसे बड़ा अधिकारी वन महानिरीक्षक बनाया गया। इस वन महानिरीक्षक का मुख्य कार्य वन साधनों की सुरक्षा के साथ साथ वन क्षेत्रों का अंग्रेजों के हित में व्यापक स्तर पर दोहन करना था। अंग्रेजों को अपनी आमदनी बढ़ानी थी, इसीलिए अंग्रेजों ने स्थानीय राजाओं के वन पर पहले से स्थापित सारे हक हकूकों को निरस्त करवा दिया। इस प्रकार से वन को कानून के मकड़जाल में फसा कर अंग्रेजों ने आदिवासियों को ही नही राजाओं को भी वन क्षेत्रों से बेदखल कर दिया और जनता के अधिकारों को छीन लिया। अंग्रेजों की यह वननीति वनविभाग की स्थापना के साथ साथ आदिवासियों तथा वनवासियों को राजाओं की अधीनता से अलग करने की लक्ष्यगत योजना थी, जिसमें अंग्रेजों को आशातीत सफलता भी मिली तथा वन संपदा का निजी क्षेत्रा की तरह अकूत लाभ ;नदअंसनंइसमद्ध भी मिला। 1855 की वन नीति के बाद 1865 में पहला वन कानून बनाया व लागू किया, जिसका आशय था वन जीवियों तथा आदिवासियों द्वारा जंगल की वस्तुओं को एकत्रा करने तथा प्रयोग करने के अधिकारों को एक दमनकारी कानून के अन्तर्गत लाना। अंग्रेजों ने इस वन कानून के द्वारा जंगल वासियों एवं वन जीवियों के सामान्य व पारंपरिक आचरण को सख्ती के साथ प्रतिबंधित कर दिया। 1878, 1894 की वननीतियां भी वन जीवियों व आदिवासियों को नियंत्रित करने तथा उनके पारंपरिक अधिकारों को छीनने के लिए ही लाई गई थीं। बाद में चल कर 1878-1894 की वन नीतियों को 1927 के अधिनियम के द्वारा और भी कठोर बना दिया गया। इस कानून के जरिए अंग्रेजों ने वन तथा उसके अन्दर निहित भूमि पर नियंत्राण को राज्य सरकार के अधीन करके वनभूमि तथा वनसंपदा पर पारंपरिक व कुदरती अधिकार भी प्रतिबंधित कर दिया तथा वन-कानून को तोड़ना जुर्म तथा अपराध के दायरे में ला दिया गया तथा दण्ड का विधान किया गया। वनविभाग के लिए सख्त व ताकतवर कार्यपालिका की स्थापना की गई जिसके तहत वन सेवा अधिकारी, रंेजर, फारिस्टर आदि पदों का सृजन किया गया। फारेस्ट आफिसर को दण्ड देने जैसे अधिकार दिए गये, वह किसी को भी वन से संबधित अपराध पर गिरफ्तार कर सकता था, उसके लिए केवल इतना साबित करना था कि अपराधी व्यक्ति द्वारा वन को क्षति पहुंचाई गई। इसी अधिनियम की धारा 70 के अनुसार 1871 वाला अतिचार कानून लागू रहने दिया गया कि अतिचारी पशुओं को पकड़ने तथा उन्हें जब्त करने का अधिकार वन विभाग के पास सुरक्षित रहेगा। जाहिर है ये सारे कानून वनवासियों तथा आदिवासियों को नियंत्रित करने के लिए ही अधिनियमित किए गये थे। अंगेजों को राजाओं से ही नहीं आदिवासियों के कब्जों से भी वन-क्षेत्रों को अलगियाना था तथा उसका दोहन करना था, जाहिर है ऐसे अत्याचारी कानून का विरोध होना था और हुआ भी। ऐसे विरोधों का दमित करने के लिए इसी कानून में धारा 70 को प्राविधानित किया गया कि वन अतिक्रमणकारियों को दण्डित या नियंत्रित करने के दौरान किए गये कार्यों के लिए वनविभाग के कर्मचारियों तथा अधिकारियों पर मुकदमे कायम नहीं किए जा सकते उनके कार्य को सद्भावना तथा वन-हित में माना जाना चाहिए। सोनभद्र के बारे में विशेष रूप सेे सोचना होगा कि इस जनपद को अनुसूचित जनजाति जनपद होने के बाद भी अनुसूचित जनजाति क्षेत्रा के रूप में कभी मान्यता क्यों नहीं मिली? आजादी के बाद से ले कर आज तक यह परिक्षेत्रा अनुसूचित जाति के विधायकों तथा सांसद का क्षेत्रा रहा है फिर भी इसे संविधान की अनुसूची पांच के अधीन नहीं रखा गया। यहां की कई जनजातियों को प्रारंभ में जनजाति भी नहीं माना गया था। इक्कीसवीं शदी के पहले दशक में यहां की कुछ जनजातियों को उ.प्र.सरकार नेजनजातियों में शामिल तो करवा दिया पर उन्हें जनजाति होने का लाभ नहीं मिला, उनके लिए पंचायत या किसी भी चुनाव के लिए सीटें आरक्षित नहीं की गईं। 2011 के पंचायत चुनाव में आदिवासियों के लिए एक भी चुनाव क्षेत्रा आरक्षित नहीं किया गया। लम्बे समय तक आदिवासियों के लिए आदिवासी बहुल दुद्धी क्षेत्रा को आरक्षित नहीं किया था पर अब जनवरी 2017 में सोनभद्र के दुद्धी तथा ओबरा विधायक क्षेत्रा को अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित कर दिया गया है, यह आदिवासियों के लम्बे व सतत प्रतिरोध की जीत है। सोनभद्र की जनजातियों को अनुसूचित जाति में न बदला गया होता तब इस जनपद पर भी अनुसूचित क्षेत्रा होने के विशेष नियम प्रभावी होते तथा केन्द्रसरकार द्वारा उन्हें विशेष लाभ मिले होते। ऐसा कृत्य संवैधानिक अवमानना का है कि संविधान के कथित अनुपालकों ने सोनभद्र को जनजाति क्षेत्रा क्यों नहीं घोषित किया? खरवार, बैगा, धांगर, कोल, चेरो, माझी, पनिका जैसी जनजातियां जब दूसरे प्रदेशों में जनजाति मानी जाती हैं फिर सोनभद्र में क्यों नही मानी गईं? इन्हें सोनभद्र में आजादी के बाद ही अनुसूचित जाति घोषित कर दिया गया, लम्बे समय बाद इन्हें जनजाति माना गया।संविधान का अनुच्छेद- जो आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिए संविधापित किए गये हैं, आइए देखें.... 15(4)- आदिवासियों के लिए आर्थिक व शैक्षणिक हितों को प्रोत्साहित करता है। अनुच्छेद 16(4)- पदों व नौकरियों में आरक्षण तथा 19(5)- संपत्ति के मामलों में जनजातीय हितों की सुरक्षा की व्यवस्था करता है। अनुच्छेद 23- मानव के बलात श्रम को प्रतिबंधित करता है, अनुच्छेद 29- शैक्षिक व सांस्कृतिक अधिकार प्रदान करता है। अनुच्छेद 49- अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जन जातियों एवं अन्य दुर्बल वर्गों की शिक्षा तथा आर्थिक अभिवृद्धि की बात करता है। अनुच्छेद 330, 332 व 334 लोकसभा तथा विधानसभाओं में सीटों के आरक्षण को प्राविधानित करता है तो अनुच्छेद 335-आरक्षण के दावों की पुष्टि करता है। जनजातीय क्षेत्रों के लिए विशेष आयोगों के गठन के लिए अनुच्छेद 339(1) का प्राविधान किया गया है, आर्थिक विकास पर विशेष घ्यान देने के लिए अनुच्छेद 275 तथा 339 में व्यवस्था की गई है। यहां यह जान लेना उचित ं होगा कि अनुसूचित जनजाति क्षेत्रों के गठन का प्राविधान हमारी संसद ने क्यों किया था? संसद ने प्राविधानित किया है- क-बिना किसी विघ्न बाधा के जनजाति के लोगों को अपने मौजूदा अधिकारों का पूरा पूरा लाभ उठाने में सहायता करना, ख-अनुसूचित जनजाति क्षेत्रों का विकास करना तथा उनके हितों का सरंक्षण करना। राष्ट्रपति जी की आज्ञा से आन्ध्र प्रदेश, बिहार, गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराश्ट्र उड़ीसा, राजस्थान तथा हिमांचल प्रदेश के कुछ क्षेत्रों को अनुसूचित क्षेत्रा घोषित भी किया जा चुका है पर सोनभद्र को क्यों छोड़ दिया गया बात समझ में नहीं आती। दर असल आदिवासियों को आदिवासी होने का दर्जा न दिया जाना तथा संविधान के नियमों की अनदेखी करना या उसकी गलत व्याख्या करना यह आदिवासियों के साथ किया गया विधिक कदाचार है। सामाजिक रूप से आदिवासियों के साथ किये गये अत्याचारों से विधिक उपेक्षा कहीं अधिक विपथगामी है। उपरोक्त संवैधानिक व्यवस्थाओं के तहत हम देख सकते हैं तथा मूल्यांकन कर सकते हैं कि आदिवासी हितों के प्रति हमारी सरकारों ने घृणित स्तर तक कदाचार किया है जिसे इतिहास कभी क्षमा नहीं करेगा। हमारा सोनभद्र तो संवैधानिक कदाचारों का जीता जागता उदाहरण है।