सदस्य:Seema 2239
गीत-फरोश
गीत फरोश कविता में भवानी प्रसाद गीत के चरित्र दर्शन जाते हैं चाहते हैं साथ ही जो गीत के रचनाकार हैं उनको भी यह वाणी की वे कब कहां और कैसे गीत की रचना करें।
कविता कर्म को लेकर कवि की मनोदशा कैसी है। आज का तभी किस प्रकार से लाचार और विवश हो गया है कवि की कविता मैं आज के कवि की लाचार गी परिलक्षित होती है कवि कभी कहता है कि वह हर तरह के गीत बेचता है।
कवि विवश और चिंतित हो गया है की गीत कई बार बाजारू उत्पाद की तरह देखे जाते हैं कई बार काम से जोड़कर देखा जाता है। कभी गीत खुशी में लिखा जाता है कई बार जीवन के मुश्किल क्षणों में लिखा जाता है। कभी यह गीत शरीर के कष्टों से निजात दिलाता है कई बार हमारे प्रिया को हमारे पास बुलाता है। कभी कहता है कि लोगों ने तो अपने ईमान बेच दिए दिए हैं मैं तो केवल गीत ही भेजता हूं।
कोई गीत भोर का है तो किसी में राग तत्व ज्यादा है। कोई गीत अकेले में लिखा गया है तो कोई गीत पूर्ण में लिखा गया है कोई गीत पहाड़ों का है तो किसी गीत में चार बोल अपनी तरफ से जुड़ जाते हैं। और किसी गीत से तो हमारी भूख प्यास सब मर जाती है तो कोई गीत श्मशान में भूतों के लिए है। इस तरह कवि का मानना है कि वहां तरह-तरह के गीत बेचता है।
यह गीत छंद वृद्ध भी है और छन से परे भी है कुछ गीतों अमर गीत बन गए यानी लोगों की जुबां पर हमेशा के लिए रट गए और कुछ गीत गीतों को किसी ने भी याद नहीं रखा कभी कहता है कि आपकी पसंद के अनुभव भी गीत लिखे जा सकते हैं यह गीत जन्म जीत रेशम और खादी कुछ का भी हो सकता है।
कवि का मूल भावार्थ यह है कि गीत रचना स्वभाविक ना होकर व्यावसायिक होता जा रहा है।
भवानी प्रसाद जी की कविता गीत फरोश की कुछ पंक्तियां:
जी हां हुजूर मैं गीत बेचता हूं। मैं तरह-तरह के गीत भेजता हूं; मैं सभी किस्म के गीत भेजता हूं।
जी माल देखिए दाम बताऊंगा,
बे काम नहीं है काम बताऊंगा;
कुछ गीत लिखे हैं मस्ती में मैंने
कुछ गीत लिखे हैं बस्ती में मैंने
यहां गीत सख्त सर दर्द बुलाएग;
यह गीत पिया को पास बुलाएगा
जी पहले दिन शर्म लगी मुझको
पर पीछे-पीछे में अक्ल जगी मुझको
जिन लोगों ने तो बेच दिए ईमान।
जी आप ना हो सुनकर ज्यादा हैरान।
मैं सोच समझकर आखिर
अपने गीत बेचता हूं;
जी हां हुजूर मैं गीत बेचता हूं।