सामान्य अध्ययन२०१९/आधारिक संरचना:ऊर्जा,बन्दरगाह,सड़क,विमानपत्तन,रेलवे

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जागरूक एप-केंद्र सरकार के नेशनल इनफॉरमेटिक्स सेंटर (NEC)द्वारा 24 घंटे बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित करने हेतु नागरिकों के लिए तैयार किया गया है,जिसके ज़रिये उपभोक्ता आपूर्ति में बाधा, कम वोल्टेज जैसी शिकायतें तुरंत दर्ज करा सकेंगे।यह एप बिजली आपूर्ति और उपलब्धता को लेकर उपभोक्ताओं का फीडबैक लेने का काम करेगा और शिकायतों के निवारण पर अधिकारी रियल टाइम में नज़र रख सकेंगे। इसका पायलट प्रोजेक्ट जल्द ही बिहार, ओडिशा, उत्तराखंड और असम के साथ कुछ केंद्रशासित प्रदेशों में शुरू किया जाएगा।

  • 18 अक्तूबर, 2019 को नई दिल्ली में 11वें परमाणु ऊर्जा सम्‍मेलन का आयोजन किया गया।

इस सम्मलेन का विषय ‘परमाणु ऊर्जा का अर्थशास्त्र’ (Economics of Nuclear Power) था। सम्मेलन में सरकार द्वारा विभिन्न सामाजिक क्षेत्रों में परमाणु ऊर्जा के अनुप्रयोगों में विविधता लाने की बात कही गई जिससे सुरक्षित और किफायती प्रौद्योगिकियों की दिशा में नवाचार को बढ़ावा दिया जा सकता है।

  • भारत ऊर्जा प्रारूपण फोरम (India Energy Modelling Forum) हाल ही में नीति आयोग और संयुक्‍त राज्‍य अंतर्राष्‍ट्रीय विकास एजेंसी ने भारत ऊर्जा प्रारूपण फोरम (IEMF) की पहली कार्यशाला आयोजित की।

पैसिफिक नॉर्थ-वेस्‍ट नेशनल लैबोरेटरी (PNNL) के सहयोग से इस दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया था। यह फोरम भारत के ऊर्जा भविष्‍य के संबंध में विचारों के आदान-प्रदान, परिदृश्‍य परिचर्चा व योजना निर्माण के लिये एक मंच उपलब्‍ध कराता है। कार्यशाला में आठ विशेषज्ञ-सत्र आयोजित किये गए। इन सत्रों में भारत-केंद्रित ऊर्जा प्रारूपण पर चर्चा हुई। पैनल विशेषज्ञों ने इस कार्यशाला में ग्रामीण-शहरी विभेद को कम करने पर विशेष ज़ोर दिया। फोरम का लक्ष्‍य भारत सरकार तथा नीति निर्माताओं व विशेषज्ञों के बीच आपसी सहयोग और समन्‍वय को बेहतर बनाना तथा भारतीय संस्‍थानों के क्षमता निर्माण और शोध के लिये भविष्‍य के क्षेत्र की पहचान करना है।

भारत सरकार ने तटीय नियमन क्षेत्र (Coastal Regulation Zone-CRZ) अधिसूचना, 2018 को मंजूरी[सम्पादन]

CRZ अधिसूचना, 2018 की प्रमुख विशेषताएँ

  1. फ्लोर एरिया रेश्यो: 2011 की अधिसूचना में CRZ-II (शहरी) क्षेत्रों के लिये फ्लोर एरिया रेश्यो को 1991 के विकास नियंत्रण नियमन के स्‍तरों के अनुसार यथावत रखा गया था। लेकिन CRZ, 2018 में इन स्‍तरों को यथावत न रखने और निर्माण परियोजनाओं के लिये उस फ्लोर एरिया रेश्यो को तय करने की अनुमति देने का निर्णय लिया गया जो नई अधिसूचना की तिथि पर मान्‍य या प्रचलित होगी। इससे निकट भविष्य में सामने आने वाली जरूरतों को पूरा करने के लिये इन क्षेत्रों का पुनर्विकास संभव हो पाएगा।
  2. घनी आबादी वाले क्षेत्रों का विकास: CRZ-III (ग्रामीण) क्षेत्रों के लिये अब दो अलग-अलग श्रेणियाँ बनाई गई हैं: 1. CRZ-III A– इसमें 2011 की जनगणना के अनुसार प्रति वर्ग किलोमीटर 2161 जनसंख्‍या घनत्‍व के साथ घनी आबादी वाले ग्रामीण क्षेत्र हैं। 2. CRZ-III B– इसमें 2011 की जनगणना के अनुसार प्रति वर्ग किलोमीटर 2161 से कम जनसंख्‍या घनत्‍व वाले ग्रामीण क्षेत्र शामिल हैं।

पर्यटन से जुड़े बुनियादी ढाँचे का विकास: समुद्र तटों पर अब पर्यटन से जुड़ी Hut या छोटे कमरों, शौचालय ब्‍लॉकों, चेंज रूम के साथ-साथ पेयजल इत्यादि जैसी अस्‍थायी सुविधाओं की अनुमति दी गई है।

  1. CRZ मंजूरी की प्रक्रिया सुव्‍यवस्थित की गई: CRZ मंज़ूरियों से जुड़ी प्रक्रिया को सरल कर दिया गया है। केवल CRZ-I (पारिस्थितिकीय दृष्टि से संवेदनशील माने जाने वाले क्षेत्र) एवं CRZ- IV (निम्‍न ज्‍वार रेखा और समुद्र की ओर 12 समुद्री मील के बीच अवस्थित क्षेत्र) में अवस्थित इस तरह की परियोजनाओं संबंधी गतिविधियों के लिये CRZ मंज़ूरी पाने हेतु पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से संपर्क करना होगा। CRZ-II और CRZ-III के संबंध में मंज़ूरी का अधिकार आवश्‍यक मार्गदर्शन के साथ राज्‍य स्‍तर पर दिया गया है।
  2. सभी द्वीपों के लिये 20 मीटर का NDZ (कोई विकास जोन नहीं): मुख्‍य भूमि तट के निकट स्थित द्वीपों और मुख्‍य भूमि पर अवस्थित सभी ‘बैकवाटर द्वीपों’ के लिये 20 मीटर का कोई विकास क्षेत्र नहीं (No Development Zone-NDZ) निर्दिष्‍ट किया गया है। उपलब्‍ध स्‍थल के सीमित रहने के साथ-साथ इस तरह के क्षेत्रों की विशिष्‍ट भौगोलिक स्थिति को ध्‍यान में रखकर ही ऐसा किया गया है। इसका एक अन्य उद्देश्य इस तरह के क्षेत्रों के मामले में एकरूपता लाना भी है।
  3. पारिस्थितिकीय दृष्टि से संवेदनशील:-अधिसूचना में ऐसे सभी क्षेत्रों के लिये एक हिस्‍से के रूप में उनके संरक्षण एवं प्रबंधन योजनाओं से संबंधित विशिष्‍ट दिशा-निर्देश तैयार किये गए हैं।
  4. प्रदूषण में कमी पर फोकस: तटीय क्षेत्रों में प्रदूषण की समस्‍या से निपटने के लिये CRZ-1B क्षेत्र में शोधन संबंधी सुविधाओं को स्‍वीकार्य गतिविधियाँ माना गया है। हालाँकि, इस संबंध में कुछ आवश्‍यक सुरक्षा व्‍यवस्‍थाओं को ध्‍यान में रखना होगा।
  • सागरमला राष्ट्रीय परियोजना (अप्रैल 2016 में प्रारंभ)के तहत 14 तटीय आर्थिक क्षेत्रों को चिन्हित किया गया है। इस कार्यक्रम के तहत 600 से अधिक परियोजनाओं की पहचान की गई है, जिनमें 2020 तक लगभग 8 लाख करोड़ रुपए के निवेश का लक्ष्य रखा गया है।

तटीय आर्थिक क्षेत्रों की परिकल्पना स्थानिक आर्थिक क्षेत्र के रूप में की गई है, जिसका 300-500 किलोमीटर के समुद्र तट और तट से करीबन 200 से 300 किलोमीटर अंतर्देशीय क्षेत्रों तक विस्तार किया जा सकता है।

प्रत्येक तटीय आर्थिक क्षेत्र राज्‍य के भीतर तटीय ज़िलों का क्लस्टर होगा। सागरमाला कार्यक्रम के तहत तटीय आर्थिक जोन विकसित करने के लिये प्रत्येक स्थल के संबंध में 150 मिलियन डॉलर का निवेश प्रस्तावित है।

इससे देश में लॉजिस्टिक लागतों में प्रतिवर्ष 6 बिलियन डॉलर की बचत होगी और 10 मिलियन नए रोज़गार के अवसर पैदा होंगे। बंदरगाहों की क्षमता प्रतिवर्ष 800 मिलियन मीट्रिक टन से बढ़कर 3500 मिलियन मीट्रिक टन हो जाएगी।

तटीय क्षेत्रों के संरक्षण एवं सुरक्षा के उद्देश्‍य को ध्‍यान में रखते हुए पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 1991 में CRZ अधिसूचना जारी की थी, जिसे समय-समय पर प्राप्‍त ज्ञापनों और सुझावों को ध्‍यान में रखते हुए 2011 में संशोधित किया गया था।

डॉ. शैलेश नायक की अध्‍यक्षता में जून 2014 में एक समिति गठित की थी जिसे CRZ अधिसूचना, 2011 में उपयुक्‍त बदलावों की सिफारिश करने के लिये तटीय राज्‍यों/ केंद्रशासित प्रदेशों और अन्‍य हितधारकों की चिंताओं के साथ-साथ विभिन्‍न मुद्दों पर भी गौर करने की ज़िम्‍मेदारी सौंपी गई थी।

बन्दरगाह[सम्पादन]

  • सतत् तटीय प्रबंधन के लिये राष्ट्रीय केंद्र(National Centre for Sustainable Coastal Management-(NCSCM) पर्यावरण,वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के द्वारा चेन्नई में तटीय संसाधनों और पर्यावरण सहित तटीय प्रबंधन के क्षेत्र में अध्ययन और अनुसंधान के लिये सतत् तटीय प्रबंधन के लिये राष्ट्रीय केंद्र (National Centre for Sustainable Coastal Management- NCSCM) की स्थापना की गई है।

इसका उद्देश्य पारंपरिक तटीय और द्वीपीय समुदायों के लाभ और कल्याण के लिये भारत में तटीय और समुद्री क्षेत्रों के एकीकृत एवं स्थायी प्रबंधन को बढ़ावा देना है। इसका उद्देश्य जनभागीदारी, संरक्षण प्रथाओं, वैज्ञानिक अनुसंधान और ज्ञान प्राप्ति के माध्यम से स्थायी तटों को बढ़ावा देना और वर्तमान तथा भावी पीढ़ी का कल्याण करना है। भूमिका इसमें भू-स्थानिक विज्ञान, रिमोट सेंसिंग और भौगोलिक सूचना प्रणाली, तटीय पर्यावरण प्रभाव आकलन, तटीय एवं समुद्री संसाधनों का संरक्षण आदि विभिन्न अनुसंधान विभाग शामिल हैं। सर्वे ऑफ इंडिया (Survey Of India) और NCSCM ने बाढ़, कटाव तथा समुद्र-स्तर में वृद्धि की भेद्यता के मानचित्रण (Mapping) को शामिल करते हुए भारतीय तटीय सीमाओं के लिये खतरे की सीमा की मैपिंग की है। यह केंद्र, राज्य सरकारों और नीति निर्माण से संबद्ध अन्य हितधारकों को एकीकृत तटीय क्षेत्र प्रबंधन (Integrated Coastal Zone Management- ICZM) से संबंधित वैज्ञानिक मामलों में भी सलाह देता है।

  • कृष्णापट्टनम पोर्ट (Krishnapatanam Port):- अडानी समूह ने इस पोर्ट के पूर्वी क्षेत्र के विस्तार के लिये अपनी रुचि प्रकट की है।

कृष्णापट्टनम पोर्ट चेन्नई से लगभग 180 किमी. दूर आंध्र प्रदेश के नेल्लोर ज़िले में अवस्थित है। यह आधुनिक सुविधाओं के साथ गहरे पानी वाला पोर्ट है। पिछले वर्ष इस पोर्ट से लगभग 54 मिलियन टन कार्गो का आयात-निर्यात किया गया था।

इस पोर्ट का नामकरण विजयनगर साम्राज्य के सम्राट कृष्णदेवराय के नाम पर किया गया है।

1980 के दशक में,भारत सरकार ने इस पोर्ट को छोटे पोर्ट की श्रेणी में शामिल कर दिया था। केंद्र सरकार बड़े पोर्ट के विकास के लिए ज़िम्मेदार है जबकि छोटे पोर्ट,संबंधित राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।

  • समुद्री संचार सेवा की शुरुआत राष्ट्रीय रेडियो और इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी (National Radio & Electronics Company- Nelco) द्वारा मुंबई में की गई। इसके तहत उपग्रह प्रौद्योगिकी (Satellite Technology) का उपयोग करते हुए क्रूज़ लाइनरों (Cruise Liners) और समुद्री जहाज़ों को वॉयस, डेटा तथा वीडियो सेवाओं तक पहुँच स्थापित करने हेतु उच्च गुणवत्तायुक्त इंटरनेट सेवाएँ प्रदान की जाएंगी।
इसका उद्देश्य समुद्री जहाज़ों को गुणवत्तायुक्त इंटरनेट सेवाएँ प्रदान करना है न समुद्री यात्रा के दौरान आने वाली संचार बाधाओं को कम करना।
  • पर्यावरण मंत्रालय ने समुद्री तटों के किनारे स्थित आधारिक संरचना परियोजनाओं (Infrastructure Projects) को मंज़ूरी देने से पूर्व उनका आकलन करने के लिये एक मसौदा तैयार किया है।

इस मसौदे में तटीय राज्यों के लिये समुद्र के आस-पास वाले क्षेत्रों में परियोजनाओं को स्वीकृति प्रदान करने हेतु दिशा-निर्देश जारी किये गए हैं।

इस मसौदे का मुख्य उद्देश्य एकीकृत तटीय प्रबंधन दृष्टिकोणों (Integrated Coastal Management Approaches) को अपनाने और लागू करने के लिये सामूहिक क्षमता का निर्माण कर तटीय संसाधनों की दक्षता बढ़ाने में भारत सरकार की सहायता करना है।

विशेष आर्थिक क्षेत्र अथवा सेज़ (SEZ) उस भौगोलिक क्षेत्र को कहते हैं, जहाँ से व्यापार,आर्थिक क्रियाकलाप, उत्पादन तथा अन्य व्यावसायिक गतिविधियों को संचालित किया जाता है। ये क्षेत्र देश की सीमा के भीतर विशेष आर्थिक नियम-कायदों को ध्यान में रखकर व्यावसायिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के लिये विकसित किये जाते हैं। भारत उन शीर्ष देशों में से एक है, जिन्होंने उद्योग तथा व्यापार गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिये विशेष रूप से ऐसी भौगोलिक इकाइयों को स्थापित किया। भारत पहला एशियाई देश है, जिसने निर्यात को बढ़ाने के लिये वर्ष 1965 में कांडला में एक विशेष क्षेत्र की स्थापना की थी। इसे एक्सपोर्ट प्रोसेसिंग ज़ोन (EPZ) नाम दिया गया था।

  • आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में स्थित HSL देश की प्रमुख जहाज़ निर्माता कंपनी है। इसकी स्थापना वर्ष 1941 में भारत के उद्योगपति और दूरदर्शी सेठ वालचंद हीराचंद ने ‘सिंधिया स्टीम नेविगेशन कंपनी लिमिटेड’ के नाम से की थी। वर्ष 1952 में भारत सरकार ने इस कंपनी के दो-तिहाई भाग पर अधिग्रहण प्राप्त किया तथा 21 जनवरी, 1952 को इसे हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड के नाम से निगमित किया गया।

HSL भारत के पहले मिसाइल ट्रैकिंग जहाज़ का समुद्री परीक्षण कर रही है। इस जहाज़ के निर्माण की शुरुआत 30 जून, 2014 को की गई थी। भारतीय नौसेना में शामिल होने के बाद इसका नामकरण किया जाएगा। फिलहाल, इसे केवल VC 11184 नाम दिया गया है।

आंतरिक जलमार्ग का विकास[सम्पादन]

  • प्रधानमंत्री ने गंगा नदी पर पर बने भारत के दूसरे मल्टी-मॉडल टर्मिनल (Multi-Modal Terminal) का उद्घाटन किया। यह भारत का दूसरा और झारखंड का पहला मल्‍टी-मॉडल टर्मिनल है।

दूसरे मल्‍टी-मॉडल टर्मिनल का निर्माण विश्व बैंक द्वारा सहायता प्राप्त जल मार्ग विकास परियोजना (Jal Marg Vikas Project-JMVP) के तहत राष्ट्रीय जलमार्ग-1 (यानी गंगा नदी) पर किया जा रहा है। भारत के पहले मल्‍टी-मॉडल टर्मिनल का निर्माण वाराणसी में गंगा नदी पर किया गया था।

  • केंद्रीय शिपिंग मंत्रालय ने केंद्रीय क्षेत्र की योजना के तहत मणिपुर में लोकटक अंतर्देशीय जलमार्ग परियोजना के विकास को मंज़ूरी दी है।

इस परियोजना पर 25.58 करोड़ रुपए की लागत आने का अनुमान है। लाभ:-पूर्वोत्‍तर अत्‍यंत आकर्षक भू-परिदृश्‍य वाला एक मनोरम क्षेत्र है और यहाँ पर्यटन के लिये अपार अवसर हैं। इस परियोजना के तहत पूर्वोत्‍तर राज्‍यों में अंतर्देशीय जल परिवहन कनेक्टिविटी को विकसित किया जाएगा और इससे पर्यटन क्षेत्र को भी बढ़ावा मिलेगा। लोकटक झील पूर्वोत्तर में ताज़े पानी की सबसे बड़ी झील है। यह मणिपुर के मोइरंग (Moirang) शहर में स्थित है। तैरते हुए द्वीप इस झील की मुख्य विशेषता है। विश्व का एकमात्र तैरता हुआ कीबुल लामजाओ राष्ट्रीय उद्यान (Keibul Lamjao National Park) इसी झील में स्थित है। यह आर्द्र्भूमियों की रामसर सूची में भी शामिल है। इस झील को ‘लाइफलाइन ऑफ मणिपुर’ (Life Line Of Manipur) भी कहा जाता है।

सड़क[सम्पादन]

25 दिसंबर को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती के अवसर पर सरकार ने रोहतांग दर्रे के नीचे की रणनीतिक सुरंग का नाम ‘अटल सुरंग’ रखा। 8.8 किलोमीटर लंबी यह सुरंग 3,000 मीटर की ऊँचाई पर दुनिया की सबसे लंबी सुरंग है। यह सुरंग पीर पंजाल रेंज से होकर गुज़रेगी। यह सुरंग मनाली और लेह के बीच की दूरी में 46 किलोमीटर की कमी करेगी और परिवहन लागत में करोड़ों रुपए की बचत करेगी। यह 10.5 मीटर चौड़ी दो लेन वाली सुरंग है। इसमें आग से सुरक्षा के सभी उपाय मौजूद हैं,साथ ही आपात निकासी के लिये सुरंग के साथ ही बगल में एक और सुरंग बनाई गई है। इस सुरंग का निर्माण हिमाचल प्रदेश और लद्दाख के सुदूर सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वालों को सदैव कनेक्टिविटी उपलब्ध कराने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है जो शीत ऋतु के दौरान लगभग 6 महीने तक लगातार शेष देश से कटे रहते हैं। सेरी नुल्लाह डिफ़ॉल्ट ज़ोन इस सुरंग के अंदर है। पृष्ठभूमि रोहतांग दर्रे के नीचे रणनीतिक महत्त्व की सुरंग बनाए जाने का ऐतिहासिक फैसला 3 जून, 2000 को लिया गया था जब श्री अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री थे। सुंरग के दक्षिणी हिस्‍से को जोड़ने वाली सड़क की आधारशिला 26 मई, 2002 को रखी गई थी।

  • केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय द्वारा संसद के शीतकालीन सत्र-2019 के दौरान लोकसभा में केंद्रीय सड़क और बुनियादी ढाँचा निधि के बारे में चर्चा की गई।

केंद्रीय सड़क और बुनियादी ढाँचा निधि को पूर्व में केंद्रीय सड़क निधि के नाम से जाना जाता था तथा इसे वर्ष 2000 में केंद्रीय सड़क निधि अधिनियम, 2000 के तहत स्थापित किया गया था। इस निधि में पेट्रोल और डीज़ल पर लगाए गए उत्पाद शुल्क के साथ उपकर भी शामिल है। CRIF का प्रशासनिक नियंत्रण वित्त मंत्रालय के अंतर्गत है। पूर्व में CRIF, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के अधीन था। केंद्रीय सड़क निधि अधिनियम (संशोधन), 2018 इस संशोधन के तहत केंद्रीय सड़क निधि का नाम बदलकर केंद्रीय सड़क और बुनियादी ढाँचा निधि कर दिया गया था। इसके अलावा CRIF के तहत सड़क उपकर से प्राप्त आय के उपयोग की अनुमति अन्य अवसंरचना परियोजनाओं जैसे- जलमार्ग, रेलवे बुनियादी ढाँचे का कुछ हिस्सा और यहाँ तक कि कुछ सामाजिक बुनियादी संबंधी ढाँचे की परियोजनाओं जैसे- शिक्षा संस्थान, मेडिकल कॉलेज आदि के वित्तपोषण के लिये दी गई।

  • ऑल वेदर रोड परियोजना’ को उत्तराखंड में केंद्र सरकार द्वारा शुरू किया जा रहा है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने इसे मंज़ूरी दी है।

चार धाम परियोजना का उद्देश्य सभी मौसमों में उत्तराखंड के चार पवित्र स्थलों- यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ को जोड़ना है।

  • फास्ट टैग एक रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन (RFID) कार्ड होता है जिसे वाहन की विंडस्क्रीन पर लगाया जाता है।

वाहनों को रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन (RFID) कार्ड के रूप में एक रेडियो फ्रीक्वेंसी टैग (Radio Frequency Tag) जारी किया जाता है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने इस वर्ष 1 दिसंबर, 2019 से देश के सभी राष्ट्रीय राजमार्गों पर स्थित टोल फ्री प्लाज़ा पर सभी लेन को ‘फास्टैग लेन’ (FASTag Lanes) घोषित करने का निर्णय किया है। प्रत्येक टोल प्लाज़ा पर एक RFID रीडर लगा होता है जो एक सेंसर के रूप में कार्य करता है और रेडियो फ्रीक्वेंसी द्वारा कार्ड की वैधता एवं धनराशि की जाँच करता है। यदि कार्ड में धनराशि उपलब्ध है तो टोल शुल्क का भुगतान स्वतः ही कार्ड से हो जाता है और वाहन टोल पर बिना रुके वहाँ से गुज़र जाता है।

  • भारतमाला परियोजनाके तहत मार्च 2019 तक कुल 225 सड़क परियोजनाओं (कुल 9,613 किलोमीटर) को मंज़ूरी दी गई। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री द्वारा राज्यसभा में एक लिखित जवाब में यह जानकारी दी।

वर्ष 2017- 18 से चलाये जा रहे यह योजना भारत सरकार की फ्लैगशिप राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना के बाद देश की दूसरी सबसे बड़ी राजमार्ग परियोजना है। इसके अंतर्गत आर्थिक गलियारे, फीडर कॉरीडोर और इंटर कॉरीडोर, राष्ट्रीय कॉरीडोर, तटवर्ती सड़कें, बंदरगाह संपर्क सड़कें आदि का निर्माण किया जा रहा है। इस कार्यक्रम की अवधि वर्ष 2017-18 से वर्ष 2021- 22 तक है। चरण-1 में कुल 34,800 किलोमीटर सड़कों का निर्माण किया जाना है जिसमें शामिल हैं: 5,000 किलोमीटर राष्ट्रीय कॉरीडोर। 9,000 किलोमीटर आर्थिक गलियारे। 6,000 किलोमीटर फीडर कॉरीडोर और इंटर कॉरीडोर। 2,000 किलोमीटर सीमावर्ती सड़कें। 2,000 किलोमीटर तटवर्ती सड़कें एवं बंदरगाह संपर्क सड़कें। 800 किलोमीटर हरित क्षेत्र एक्सप्रेस वे। 10,000 किलोमीटर अधूरे सड़क निर्माण कार्य। इसमें निर्माण कार्य करने वाली मुख्य एजेंसियाँ हैं: भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग, राष्ट्रीय राजमार्ग और औद्योगिक विकास निगम तथा लोक निर्माण विभाग। इस परियोजना का वित्तीयन ऋण फंड, बजटीय आवंटन, निजी निवेश, टोल ऑपरेटर आदि के माध्यम से किया जा रहा है।

लाभ
  1. पूरे देश में सड़क संपर्क में सुधार।
  2. आर्थिक गलियारों से कार्गो की त्वरित आवाजाही में वृद्धि।
  3. अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में वृद्धि।
  4. निवेश में तेज़ी एवं रोज़गार सृजन में वृद्धि होने की संभावना।

एम्सटर्डम स्थित लोकेशन टेक्नोलॉजी कंपनी टॉमटॉम (Tom Tom) द्वारा जारी ट्रैफिक इंडेक्स, 2018 के अनुसार, देश की आर्थिक राजधानी मुंबई विश्व के सर्वाधिक ट्रैफिक कंजेशन वाले शहरों में प्रथम स्थान पर है जबकि कोलंबिया के बोगोटा शहर को दूसरे तथा पेरू के लीमा शहर को तीसरे व दिल्ली को चौथे स्थान पर रखा गया है।

इंटरनेशनल सेंटर फॉर ऑटोमोटिव टेक्‍नोलॉजी(ICAT) सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय द्वारा प्राधिकृत प्रमुख परीक्षण एवं प्रमाणन एजेंसी है। ICAT भारत और विदेश में वाहनों और उनके कल-पुर्जों के विनिर्माताओं को परीक्षण एवं प्रमाणन की सुविधा उपलब्‍ध कराती है। इसमें उत्सर्जन के नवीनतम मानदंडों के लिये इंजन और वाहनों को विकसित करने, सत्यापन, परीक्षण और प्रमाणित करने तथा क्रैश लैब (Crash Lab- यूनाइटेड किंगडम का एक स्वतंत्र वीडियो गेम डेवलपर कंपनी), एनवीएच लैब (Noise, Vibration, and Harshness Lab), ईएमसी लैब (Electromagnetic Compatibility Lab) और परीक्षण पटरियों जैसी कई अन्य सुविधाओं के लिये नवीनतम उपकरण, सुविधाएँ और क्षमता मौज़ूद है।

  1. BOT मॉडल (Build-Operate-Transfer Model)निजी-सार्वजनिक भागीदारी के इस मॉडल के अंतर्गत निजी साझेदार को अनुबंधित अवधि के दौरान ढाँचागत परियोजना के डिज़ाईन, निर्माण एवं परिचालन की पूरी ज़िम्मेदारी होती है।इसके तहत बनने वाली परियोजनाओं में सरकार को अपने खजाने से पूँजी लगाने की आवश्यकता नहीं होती है।इसके तहत निजी निवेश में वृद्धि होगी।ढाँचागत क्षेत्र में बढ़ते व्यय को देखते हुए सरकार ने राजमार्ग परियोजनाओं के सफल क्रियान्वयन हेतु को पुनः अपनाने का फैसला किया है।
  2. HAM मॉडल वर्ष 2015 में लाया गया था। बैंकों द्वारा दिये जा रहे ऋण के कारण यह मॉडल सफल रहा परंतु ऋण अदा करने में कोताही बरतने के साथ ही इसका महत्त्व कम हो गया।

बैंकों द्वारा ऐसे परियोजनाओं को ऋण प्रदान करना आरक्षण के दायरे में आता था। परंतु मामला तब विपरीत हो गया जब बैंकों को इस बात का पता चला कि बगैर इक्विटी के ये निजी कंपनी अपने संपूर्ण 60 प्रतिशत हिस्सेदारी के लिये ऋण की माँग कर रहे हैं। कंपनी के इस रवैये के विरुद्ध बैंकों ने ऋण जारी करने पर आपत्ति करनी शुरू कर दी। इसके तहत, केंद्र सरकार राजमार्ग परियोजना लागत का 40 प्रतिशत स्वयं वहन करती है जबकि 60 प्रतिशत राशि की व्यवस्था डेवलपर द्वारा की जाती है। BOT के विपरीत सड़क का रखरखाव, टोल संग्रह या स्वामित्व निजी कंपनी के पास ना होकर सरकार के पास होती है।

रेलवे[सम्पादन]

  • पश्चिमी समर्पित फ्रेट कॉरिडोर (Western Dedicated Freight Corridor)-रेवाड़ी (हरियाणा) से मदार (राजस्थान) के बीच:-

डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (Dedicated Freight Corridor Corporation of India Ltd.- DFCCIL) द्वारा हाल हीं में इसके 300 किलोमीटर से अधिक का खंड व्यावसायिक परीक्षण के लिये खोला है। यह निर्माणाधीन 1,500 किलोमीटर के पश्चिमी फ्रेट कॉरिडोर का पहला खंड है।

1,504 किलोमीटर का पश्चिमी फ्रेट कॉरिडोर उत्तर प्रदेश के दादरी से शुरू होकर देश के सबसे बड़े कंटेनर पोर्ट - जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट, मुंबई तक फैला हुआ है। यह कॉरिडोर यूपी,हरियाणा,राजस्थान,गुजरात और महाराष्ट्र राज्यों से होकर गुजरेगा।

इसे 100 किलोमीटर प्रति घंटे की अधिकतम गति को ध्यान में रखते हुए बनाया है। DFCCIL रेल मंत्रालय के अधीन एक ‘विशेष प्रयोजन माध्यम’ (Special Purpose Vehicle) संस्था है जिसे पश्चिमी फ्रेट कॉरिडोर और पूर्वी फ्रेट कॉरिडोर (DFCs) को मिलाकर 3,306 किलोमीटर की योजना को पूरा करने का काम सौंपा गया है।

  • सबसे लंबी विद्युतीकृत रेलवे सुरंग

दक्षिण मध्य रेलवे ने आंध्र प्रदेश राज्य में चेरलोपल्ली (Cherlopalli) और रापुरु स्टेशनों के बीच 6.6 किमी की सबसे लंबी विद्युतीकृत सुरंग का निर्माण किया था। यह सुरंग हाल ही में पूर्ण हुई ओबुलावरिपल्ली-वेंकटचलम नई रेलवे लाइन का हिस्सा है। नई लाइन प्रत्यक्ष और व्यवहार्य रूप में दक्षिण तट (South Coast) और पश्चिम तट (West Coast) को आपस में जोड़ती है। यह कृष्णापटनम बंदरगाह (Krishnapatnam Port) और मालगाड़ी सेवाओं को आंतरिक भागों में रेल संपर्क को व्यस्थित करती है।

विमानपत्तन[सम्पादन]

  • ग्लोबल एविएशन समिट का आयोजन नागरिक उड्डयन मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (FICCI) के सहयोग से मुंबई में किया जा रहा है। इसकी थीम है-‘फ्लाइंग फॉर ऑल-स्पेशली द नेक्स्ट 6 बिलियन’।
Air traffic services.jpg
  • देश के सबसे ऊँचे एयर ट्रैफिक कंट्रोल (ATC) टॉवर का दिल्ली हवाई यातायात सेवा परिसर [Delhi Air Traffic Service (DATS) Complex] का उद्घाटन नई दिल्ली में इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर एयर ट्रैफिक कंट्रोल टॉवर- किया गया।

यह आदर्श अवसंरचना कुशल, सुचारू और निर्बाध हवाई यातायात प्रबंधन को सुनिश्चित करने के लिये सेवाओं तथा प्रणालियों को उन्नत बनाने की दिशा में एक आवश्यक कदम है। विशेषताएँ 102 मीटर की ऊँचाई वाला यह टॉवर भारत में सबसे ऊँचा एयर ट्रैफिक कंट्रोल टॉवर है तथा विश्व के सबसे ऊँचे कंट्रोल टॉवरों में शामिल है। कंट्रोलर के उत्तरदायित्व वाले क्षेत्र में उन्नत VHF (Very High Frequency) कवरेज़ के लिये इंटरनेट प्रोटोकॉल आधारित संचार प्रणाली। उन्नत राडार और ADS सक्षम ऑटोमेशन प्रणाली। कागजी स्ट्रिप के स्थान पर ATG इकाइयों में इलेक्ट्रानिक उड़ान स्ट्रिप। ऑनलाइन उड़ान प्लान फिलिंग सुविधा के साथ IP आधारित स्वचालित संदेश स्विचिंग प्रणाली। 350 करोड़ रुपए की लागत से निर्मित प्रणाली में अत्याधुनिक उपकरण।