सामान्य अध्ययन२०१९/कृषि क्षेत्रक

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  • पंजाब कृषि विश्वविद्यालय ने व्यावसायिक खेती के लिये प्रोसेसिंग-ग्रेड व्हाइट ओनियन {Processing-grade White Onion (PWO-2)किस्म विकसित की है। अभी तक पंजाब के किसान मुख्यतः लाल रंग वाली प्रो-6 (PRO-6) और पंजाब नारोया (Punjab Naroya) किस्म का उत्पादन करते हैं। प्रो-6 किस्म की प्याज 120 दिनों में तैयार होती थी,साथ ही औसतन 175 क्विंटल प्रति एकड़ पैदावार होती है।
पंजाब नारोया किस्म 145 दिनों में तैयार होती है,साथ ही इसकी पैदावार औसतन 150 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

नई किस्म PWO-2 की औसत उपज 165 क्विंटल प्रति एकड़ है और यह लगभग 140 दिनों में तैयार होती है। विश्वविद्यालय ने वर्ष 1994 में पंजाब व्हाइट (Punjab White) नामक एक प्याज की किस्म विकसित की थी। इसकी औसत उपज 135 क्विंटल प्रति एकड़ थी हालाँकि इसमें किसानों ने दिलचस्पी नहीं दिखाई थी। पंजाब में 2-2.1 लाख टन प्याज का उत्पादन होता है, जो राज्य की आवश्यकता का एक तिहाई हिस्सा पूरा करता है। वर्तमान में प्याज की बढ़ती कीमतों को देखते हुए PWO-2 जैसी किस्मों की आवश्यकता है क्योंकि जिनके बल्बों (Bulbs) को परिवर्तित किया जा सकता है और संसाधित रूप में संग्रहीत किया जा सकता है।

  • दिल्ली में कृषि सांख्यिकी पर 8वाँ अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय,अंतर्राष्ट्रीय सांख्यिकी संस्थान,कृषि सांख्यिकी समिति,खाद्य और कृषि संगठन,विश्व बैंक तथा विभिन्न अन्य संगठनों के सहयोग से किया गया।
थीम:-‘सतत् विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु कृषि परिवर्तन के आँकड़े’ है। यह देश में कृषि सांख्यिकी से संबंधित इस तरह का पहला सम्मेलन है। सम्मेलन का उद्देश्य सतत् विकास लक्ष्यों और विभिन्न अग्रणी अनुसंधानों पर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिये डेटा के उत्पादन में आने वाली विभिन्न चुनौतियों का समाधान करने तथा कृषि सांख्यिकी के क्षेत्र में सर्वोत्तम प्रथाओं को चुनकर उन्हें अंतिम रूप देना है।

इसके अलावा यह भारत में सांख्यिकीविदों, युवा वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं को कृषि में आधुनिक प्रथाओं जैसे- बिग डेटा विश्लेषण, भावनात्मक बुद्धिमत्ता आदि को अपनाने का अवसर प्रदान करेगा।

ICAS दुनिया भर में कृषि सांख्यिकी से संबंधित सम्मेलनों की एक शृंखला है जिसे वर्ष 1998 में शुरू किया गया था।

यह सम्मेलन प्रत्येक तीन साल में आयोजित किया जाता है, इससे पहले इस सम्मेलन का आयोजन वर्ष 2016 में रोम में किया गया था। इस सम्मेलन के एजेंडे में खाद्य और कृषि सांख्यिकी से संबंधित कार्यप्रणाली, प्रौद्योगिकी तथा प्रक्रियाओं के क्षेत्र शामिल हैं।

  • अफ्रीका के मलावी से महाराष्ट्र के लिये अल्फांसो आम (Alphonso Mango) का प्रतिदिन निर्यात किया जा रहा है। भारत में अक्तूबर से दिसंबर माह के दौरान आम उपलब्ध नहीं होता है, परंतु इस अवधि में अफ्रीका के मलावी में आम की पैदावार की जाती है। इसका निर्यात भारत तथा अन्य देशों को किया जाता है। इस आम की गंध और स्वाद अफ्रीका से आने के बावजूद भी महाराष्ट्र के देवगड ज़िले के अल्फांसो की तरह ही है।
अल्फांसो आम को फलों का राजा माना जाता है तथा महाराष्ट्र में इसे ‘हापुस’ नाम से भी जाना जाता है।

अपनी सुगंध और रंग के साथ-साथ अपने स्वाद के चलते इस आम की मांग भारतीय बाज़ारों के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों में भी है। महाराष्ट्र के रत्नागिरि, सिंधुदुर्ग, पालघर, ठाणे और रायगढ़ ज़िलों के अल्फांसो आम को भौगोलिक संकेत (GI) टैग प्रदान किया जा चुका है। भारत से इसका निर्यात जापान, कोरिया तथा यूरोप को किया जाता है।

  • भारत के खाद्य सुरक्षा नियामक प्रमुख ने यह आशा व्यक्त की है कि केंद्रीय कृषि मंत्रालय की भागीदारी गारंटी योजना (Participatory Guarantee Scheme-PGS) अधिक-से-अधिक किसानों को जैविक फसल उगाने के लिये प्रोत्साहित करेगी। यह जैविक उत्पादों को प्रमाणित करने की एक प्रक्रिया है, जो सुनिश्चित करती है कि उनका उत्पादन निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुसार किया गया है अथवा नहीं।
  • कृषि ऋण माफी के कारण सरकार के संसाधनों में कमी आती है। इसके अतिरिक्त इससे सरकार के उत्पादन में भी किसी प्रकार की वृद्धि नहीं होती है, इसलिए यह राजस्व व्यय है जिसमें खर्च से न तो दायित्त्व में कमी आती है और न ही संपत्ति का सृजन होता है।
  • इंस्टीट्यूट फॉर स्टेम सेल साइंस एंड रीजेनरेटिव मेडिसिन, बंगलूरु के शोधकर्त्ताओं ने पॉली-ऑक्सिम (Poly-Oxime) जैल विकसित किया है जो विषाक्त रसायनों को निष्क्रिय करता है तथा उन्हें त्वचा और अंगों में गहराई तक जाने से रोकता है। भारतीय किसान आमतौर पर खेतों में रसायनों का छिड़काव करते समय कोई सुरक्षात्मक वस्त्र/कपड़े नहीं पहनते हैं। इस कारण वे कीटनाशकों में निहित हानिकारक विषाक्त पदार्थों के संपर्क में आ जाते हैं, जिसका उनके स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है और यहाँ तक कि कुछ मामलों में उनकी मृत्यु भी हो सकती है।
  • कृषि अपशिष्ट से जैव ईंधन के उत्पादन को बढ़ाने वाले एंज़ाइमों के सम्मिश्रण (Cocktail of Enzymes) को अमेरिकी पेटेंट और ट्रेडमार्क कार्यालय से पेटेंट प्राप्त हुआ। नई दिल्ली स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर जेनेटिक इंजीनियरिंग एंड बायोटेक्नोलॉजी (ICGEB)[1983 में UNIDO के तहत स्थापित(I-industrial)] के एक माइक्रोबियल :इंजीनियरिंग शोधकर्त्ता सैयद शम्स याज़दानी द्वारा विकसित यह नवाचार, वाणिज्यिक सेल्युलस एंज़ाइम (Cellulase Enzyme) बनाने के लिये एक बेहतर विकल्प प्रदान कर सकता है।

एंज़ाइमों का यह सम्मिश्रण कृषि बायोमास को दक्षता के साथ तोड़ सकता है। इन एंज़ाइमों की क्रियाविधि के माध्यम से शर्करा को दूसरी पीढ़ी (G2) के जैव ईंधन या किसी अन्य जैव रासायनिक उत्पादन में इथेनॉल हेतु किण्वित किया जा सकता है। इसके माध्यम से चावल और गेहूंँ के भूसे सहित कृषि अपशिष्ट पदार्थों से उच्च मात्रा में 2G इथेनॉल का उत्पादन किया जा सकेगा जिससे पराली जलाने जैसी गतिविधियों को सीमित करने में मदद मिलेगी। वैज्ञानिकों ने चयापचय गतिविधि को नियंत्रित करने वाले कवक पेनिसिलियम फनिकुलोसम (Penicillium Funiculosum- PF) में पाए जाने वाले नियंत्रण तंत्र को बाधित कर दिया। कार्बन कैटोबाइट (Carbon Catabolite) नामक इस तंत्र को बाधित करने से उन एंज़ाइमों के उत्पादन को बढ़ाया जा सकेगा जो सेल्यूलोज़ को शर्करा में परिवर्तित करते हैं।

  • देशज फसलों के संरक्षण हेतु बीज बैंकर कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा राज्यसभा में दी गई जानकारी के अनुसार, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो अपने राष्ट्रीय जीन बैंक में बीजों के दीर्घकालिक संरक्षण के लिये उनके जर्मप्लाज़्म का संरक्षण कर रहा है। इस तकनीकी के तहत बीजों को संरक्षित करने के लिये उन्हें लगभग -20 डिग्री सेल्सियस तापमान पर स्टोर किया जाता है।
राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो और राष्ट्रीय सक्रिय जर्मप्लाज़्म साइट्स, विभिन्न राज्यों में जीन बैंकों के रूप में प्रचालित हैं।जिनका उद्देश्य कृषि अनुसंधान उद्देश्य हेतु सब्जियों,अनाजों की देशी किस्मों सहित विभिन्न फसलों की वन्य प्रजातियों की परंपरागत किस्मों और भूमि किस्मों, वन्य किस्मों के साथ-साथ उनके जर्मप्लाज़्म को एकत्र करना, उनकी विशिष्टता बताना, मूल्यांकन तथा संरक्षण करना और उसे उपलब्ध कराना है। ये जीन बैंक स्थानीय किस्मों को भी संरक्षित करते हैं।

इन बैंकों में रखे जाने वाले बीज फसलों की लघु और मध्यमावधि किस्म के होते हैं जो क्षेत्र के अनुकूल होते हैं और आकस्मिक स्थिति में आवश्यकता को पूरा करते हैं।

इन बीज बैंकों का उद्देश्य प्राकृतिक आपदाओं और अन्य अप्रत्याशित स्थितियों, जैसे- सूखा, बाढ़ की स्थिति की चलते बीज की आवश्यकता को पूरा करना है।
  • प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों पर मंत्रिमंडलीय समिति (Cabinet Committee on Economic Affairs-CCEA) द्वारा 4 मिलियन टन के आपातकालीन चीनी रिज़र्व (Sugar Reserve) बनाने के प्रस्ताव को मंज़ूरी दी गई है। साथ ही यह भी तय किया गया है कि चीनी मिलें गन्ना किसानों को 275 रुपए प्रति क्विन्टल का भुगतान करेंगी।

लाभ:

  1. चीनी मिलों की तरलता में सुधार होगा।
  2. चीनी इंवेन्ट्री में कमी आएगी।
  3. घरेलू चीनी बाज़ार में मूल्य भावना बढ़ाकर चीनी की कीमतें स्थिर की जा सकेंगी और परिणामस्वरूप किसानों के बकाया गन्ना मूल्य का भुगतान समय से किया जा सकेगा।
  4. चीनी मिलों के गन्ना मूल्य बकायों की मंज़ूरी से सभी गन्ना उत्पादक राज्यों में चीनी मिलों को लाभ होगा।
  • नीति आयोग ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है,जो भारत के कृषि क्षेत्र में सुधार हेतु सुझाव देगी।इस समिति में देवेंद्र फड़नवीस के अतिरिक्त कर्नाटक के मुख्यमंत्री एच. डी. कुमारस्वामी, हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर, अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू, गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर भी शामिल हैं।
  • कृषि निर्यात को दोगुना करने तथा भारतीय किसानों और कृषि उत्पादों को वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं से जोड़ने के लक्ष्य वाली कृषि निर्यात नीति, 2018 के अनुरूप प्रथम भारतीय अंतर्राष्ट्रीय सहकारी व्यापार मेला (India International Cooperatives Trade Fair- IICTF) का आयोजन नई दिल्ली के प्रगति मैदान में 11 से 13 अक्तूबर, 2019 तक किया जाएगा। इस तीन दिवसीय मेले में बड़ी संख्या में भारतीय सहकारी समितियों और अंतर्राष्ट्रीय सहकारी संगठनों के भाग लेने की संभावना है।इस व्यापार मेले का उद्देश्य ग्रामीण और कृषि समृद्धि में वृद्धि के लिये भारत और विदेशों में कोऑपरेटिव-टू-कोऑपरेटिव व्यापार (Cooperative to Cooperative Trade) को बढ़ावा देना है।
  • हरियाणा के एक ज़िले में ट्रांसजेनिक बैगन की किस्म (Transgenic Brinjal Variety) की खेती किये जाने की जानकारी प्राप्त हुई है। हालाँकि भारत में अभी तक इसकी खेती की अनुमति नही दी गई है।इसके लिए जिम्मेदार जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति(Genetic Engineering Appraisal Committee- GEAC)पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत कार्य करता है। इसकी अध्यक्षता पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के विशेष सचिव द्वारा की जाती है,जैव प्रौद्योगिकी विभाग का एक प्रतिनिधि इसका सह-अध्यक्ष होता है।वर्तमान में इसके 24 सदस्य हैं।

नियमावली 1989 के अनुसार, यह समिति अनुसंधान और औद्योगिक उत्पादन के क्षेत्र में खतरनाक सूक्ष्मजीवों एवं पुनः संयोजकों के बड़े पैमाने पर उपयोग संबंधी गतिविधियों का पर्यावरणीय दृष्टिकोण से मूल्यांकन करती है। यह समिति प्रायोगिक क्षेत्र परीक्षणों सहित आनुवंशिक रूप से उत्पन्न जीवों और उत्पादों के निवारण से संबंधित प्रस्तावों का भी मूल्यांकन करती है।

  • परिवहन एवं विपणन सहायता योजना-वाणिज्य मंत्रालय द्वारा कृषि क्षेत्र के लिये प्रारंभ इस योजना का उद्देश्य यूरोप और उत्तरी अमेरिका के देशों में कृषि निर्यात को बढ़ावा देना है जिसके तहत कृषि उत्पादों के परिवहन और विपणन हेतु वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी।
इसके तहत सरकार कृषि उत्पादों की ढुलाई के खर्च का कुछ हिस्सा वहन करेगी एवं कृषि उपज के विपणन में सहायता करेगी।

यह योजना समुद्र और वायु दोनों माध्यमों द्वारा परिवहन पर लागू होगी।[१]

शून्य बजट प्राकृतिक कृषि(ZBNF)[सम्पादन]

  • शून्य बजट खेती बाज़ार में उपलब्ध आगतों जिसमें रासायनिक उर्वरक और खाद शामिल है, के उपयोग के बिना प्राकृतिक आगतों द्वारा खेती पर बल देता है। इससे इस कृषि पद्धति में खर्च शून्य हो जाता है।

भारत में इस कृषि पद्धति का प्रचलन दक्षिण के क्षेत्रों में प्रमुख रूप से कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में है। इसको पहचान दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका श्री सुभाष पालेकर की मानी जाती है। शून्य बजट प्राकृतिक कृषि के चार स्तंभ

  1. जीवामृत: इसमें पालतू पशुओं के गोबर, मल-मूत्र आदि को किण्वित करके उपयोग में लाया जाता है। इससे मिट्टी में सूक्ष्म जीवों को एक अनुकूल स्थिति प्राप्त होती है।
  2. बीजामृत: इसमें भी जीवामृत के समान सामग्री होती है। यह अंकुरों को मिट्टी एवं बीज जनित बीमारियों से बचाती है।
  3. आच्छादन (Mulching): इसके माध्यम से मृदा में आदृता तथा वातन (Aeration) में सहायता मिलती है।
  4. वाष्प (Moisture): वाष्प एक ऐसी स्थिति है जिसमें वायु एवं जल के कण मृदा में उपस्थित होते हैं। इससे अति सिंचाई में कमी आती है तथा कम समय के लिये ही निश्चित अंतराल पर सिंचाई की आवश्यकता होती है।

महत्त्व:-ZBNF वर्तमान में उच्च लागत वाले रसायन आधारित कृषि का एक बेहतर विकल्प है। यह जलवायु परिवर्तन की अनिश्चितताओं को दूर करने में बहुत प्रभावी है, साथ ही ZBNF कृषि पारिस्थितिकी के अनुरूप है।

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय के आँकड़ों के अनुसार, कृषक परिवारों में लगभग 70% परिवार आय से अधिक व्यय करते हैं और आधे से अधिक परिवार कर्ज़ में हैं। आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में ऋणग्रस्तता का स्तर लगभग 90% है, जहाँ प्रत्येक परिवार पर कर्ज़ का अत्यधिक बोझ है।

ZBNF की आलोचना:-ZBNF पूरी तरह से शून्य बजट कृषि नहीं है। इसमें कई तरह की लागतें शामिल होती हैं, जैसे- गायों के रखरखाव, सिंचाई हेतु बिजली और पम्पों की लागत, श्रम आदि। ऐसा कोई अध्ययन नहीं है जो यह प्रमाणित करे कि ZBNF में प्रयुक्त भूमि अपेक्षाकृत अधिक उत्पादक होती है। भारतीय मिट्टी कार्बनिक पदार्थों की दृष्टि से कम गुणवत्ता वाली है और कई अन्य सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की मात्रा मिट्टी के प्रकार के आधार पर भिन्न-भिन्न होती है। ZBNF अलग-अलग प्रकार की मिट्टी की समस्या के लिये एक ही तरह के सुझाव पर ज़ोर देता है, जबकि भारत में अत्यधिक भौगोलिक विविधता विद्यमान है। औद्योगिक इकाइयों और नगरपालिका के कचरे से रासायनिक संदूषण या उर्वरकों एवं कीटनाशकों का अत्यधिक प्रयोग, मिट्टी की विषाक्तता का कारण है।

  • आर्थिक और सामाजिक अध्ययन केंद्र (Centre for Economic and Social Studies-CESS) द्वारा किये गए एक हालिया अध्ययन में बहुफसली पद्धति (Multi-Cropping System) के महत्त्व पर प्रकाश डाला गया है। CESS की स्थापना वर्ष 1980 में एक स्वायत्त अनुसंधान केंद्र के रूप में की गई थी। 1986 में इसे भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (Indian Council of Social Science Research-ICSSR) द्वारा एक राष्ट्रीय संस्थान के रूप में मान्यता दी गई।

इस केंद्र को विदेशी योगदान (विनियमन) अधिनियम, 1976 की धारा 6 (1) (a) के तहत पंजीकृत किया गया था।

अंतर्राष्ट्रीय प्रयास[सम्पादन]

  • 5 दिसंबर- को विश्व मृदा दिवस (World Soil Day)का उद्येश्य स्वस्थ्य मृदा के महत्व पर ध्यान केंद्रित करने और मृदा संसाधनों के स्थायी प्रबंधन हेतु जागरूकता फैलाना है। वर्ष 2019 के लिये इसकी थीम - ‘मृदा का कटाव बंद करो,हमारे भविष्य को बचाओ’ (Stop Soil Erosion, Save Our Future) है।
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) ने जून 2013 में विश्व मृदा दिवस का समर्थन किया था। संयुक्त राष्ट्र महासभा के 68वें सम्मलेन में इसे आधिकारिक रूप से स्वीकार किया गया तथा दिसंबर 2013 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 5 दिसंबर को विश्व मृदा दिवस घोषित किया तथा 5 दिसंबर,2014 को पहला आधिकारिक विश्व मृदा दिवस मनाया गया।
  • अंतर्राष्ट्रीय बीज परीक्षण संघ (International Seed Testing Association- ISTA) का 32वाँ सम्मेलन हैदराबाद में संपन्न हुआ। इस अवसर पर भारत सरकार ने कहा कि भारत में वर्ष 2022 तक किसानो की आय दोगुना करने में गुणवत्तापूर्ण बीजों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रहेगी और किसानो को गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध कराने का प्रयास भी राज्य सरकारों के साथ मिलकर किया जा रहा है। विभिन्न चुनौतियों के बावजूद भारत के किसानों ने दुनिया में सबसे ज्यादा कपास का उत्पादन किया है ।

वर्तमान में तेलांगना वैश्विक बीज हब के रूप में विकसित हो रहा है एवं भारत के पास यह अवसर है कि वह यूरोप के समकक्ष देशो की तरह बीज निर्यात कर सके। इसी उद्देश्य से केंद्र सरकार की बीज गुणवत्ता सुधार योजना के तहत बीज की गुणवत्ता का पता लगाने के लिये बार कोड और क्यूआर कोड को जून 2020 तक अनिवार्य कर दिया जायेगा । ISTA के अधिकारियों की सदस्य संख्या बढ़ाने के बजाय बीज परीक्षण प्रयोशालाओं पर अधिक ध्यान की बात कही गयी । भारत में कृषि संभावनाओं के मद्देनजर उपयुक्त कृषि जलवायु , 130 बीज परीक्षण प्रयोगशालाएँ , 25 बीज प्रमाणीकरण प्राधिकरण मौजूद हैं, इसके अलावा भारत दुनिया का 5वाँ सबसे बड़ा बीज बाजार भी है।

अंतर्राष्ट्रीय बीज परीक्षण संघ (International Seed Testing Association-ISTA) वर्ष 1924 में स्थापित एक गैर लाभकारी स्वायत्त संगठन है। बीज परीक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय रूप से सहमत मानक प्रक्रियाओं (नियमों) को विकसित एवं प्रकाशित करता है साथ ही बीज विश्लेषण प्रमाण पत्र और प्रशिक्षण पाठ्यक्रम उपलब्ध कराता है। इसका सचिवालय स्विट्ज़रलैंड में स्थित है।
  • अंतर्राष्ट्रीय बीज संधि- खाद्य और कृषि के लिये वनस्पति आनुवंशिक संसाधनों की अंतर्राष्ट्रीय संधि के शासी निकाय का आठवाँ सत्र (रोम) इटली में 11 से 16 नवंबर, 2019 तक आयोजित किया जा रहा है। इसका शासी निकाय सत्र अर्द्धवार्षिक रूप से आयोजित किया जाता है। भारत द्वारा संबंधित मुद्दों को दूर करने के लिये वनस्पति आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण और भारतीय कानून संरक्षण की विविधता और किसानों के अधिकार (Protection of Plant Varieties and Farmers’ Rights- PPV&FR) अधिनियम की विशिष्टता पर चर्चा की गई।
खाद्य और कृषि के लिये वनस्पति आनुवांशिक संसाधनों पर अंतर्राष्ट्रीय संधि(International Treaty of Plant Genetic Resources for Food and Agriculture- ITPGRFA)को 3 नवंबर 2001 को संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन( FAO) के 31वें सत्र सम्मेलन में अपनाया गया था। उद्देश्य:-
  1. किसानों का योगदान: फसलों की विविधता को पहचानने के लिये किसानों का योगदान।
  2. पहुँच और लाभ साझा करना (Access and Benefit Sharing): किसानों, पौधों के प्रजनकों (Breeders) और वैज्ञानिकों को आनुवंशिक सामग्री के उपयोग की सुविधा प्रदान करने के लिये एक वैश्विक प्रणाली स्थापित करना।
  3. संधारणीयता (Sustainability): खाद्य और कृषि के लिये संयंत्र आनुवंशिक संसाधनों (Plant Genetic Resource) का संरक्षण और निरंतर उपयोग करना तथा उनके उपयोग से होने वाले लाभों का उचित- न्यायसंगत साझाकरण एवं जैविक विविधता पर सम्मेलन (Convention on Biological Diversity) के साथ स्वभाव।

यह बीज संधि के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि यह विश्व के खाद्य और कृषि के लिये वनस्पति आनुवंशिक संसाधन के संरक्षण, विनिमय और स्थायी उपयोग के माध्यम से खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये एक व्यापक अंतर्राष्ट्रीय समझौता है।

भारत इस संधि का हस्ताक्षरकर्त्ता (Signatory) देश है।पौधों की विविधता और किसानों के अधिकार अधिनियम, 2001(Protection of Plant Varieties and Farmers’ Rights (PPV&FR) Act, 2001) का उद्देश्य किसानों और प्रजनकों (Breeder’s) के अधिकारों की रक्षा करना है।

अधिनियम के अनुसार, एक किसान ब्राॅण्ड (Brand) के नाम को छोड़कर PPV&FR अधिनियम, 2001 के तहत संरक्षित किस्म के बीज सहित अपने खेत की उपज को सुरक्षित करने (Save), उपयोग करने, बोने, विनिमय करने, साझा करने या बेचने का हकदार है। यह अधिनियम अंतर्राष्ट्रीय संधि के अनुच्छेद-9 के अनुरूप है। इस अधिनियम के प्रावधानों के तहत, 138 कृषकों/कृषक समुदायों को पादप किस्मों और किसानों के अधिकार प्राधिकरण द्वारा संयंत्र जीनोम उद्धारकर्त्ता पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। यह पुरस्कार प्रतिवर्ष किसानों को आनुवंशिक संसाधनों (एक संवर्द्धित पौधे की गतिशील जनसंख्या) और वाणिज्यिक पौधों को नुकसान पहुँचाने वाले आक्रामक पौधों के उन्मूलन में लगे किसानों को दिया जाता है।

बीज विधेयक 2019 का मसौदा तैयार[सम्पादन]

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा तैयार यह मसौदा किसानों को आधुनिक और उच्च गुणवत्ता वाले बीजो की आपूर्ति सुनिश्चित करने हेतु एक महत्त्वपूर्ण कानून है जो उन्हें अपनी उत्पादकता और लाभप्रदता बढ़ाने में मदद करेगा।

  1. बीज समिति का गठन
  2. बीज के विभिन्न किस्मों का पंजीकरण
  3. विक्रेताओं को बिक्री के लिये मौजूद सभी बीजों का पंजीकरण कराना होगा
  4. रियायतें:-मसौदे के तहत किसानों को उनके द्वारा विकसित किस्मों के लिये पंजीकरण प्राप्त करने से छूट दी गई है। हालाँकि यदि किसान वाणिज्यिक लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से उसे बेचता है तो उसके लिये पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा।
  5. इसके अलावा किसानों को अपने खेत के बीज और रोपण सामग्री को बोने, आदान-प्रदान करने या बेचने की अनुमति है। लेकिन

वे किसी ब्रांड नाम के तहत कोई बीज नहीं बेच सकते हैं।

  1. अनुसंधान-आधारित कंपनियाँ:-लाइसेंस के उद्देश्य के लिये बीज उत्पादक, बीज प्रोसेसर और बीज डीलर के बीच अंतर को स्पष्ट किया गया है। जबकि मसौदे के अंतर्गत अनुसंधान और विकास (R&D) क्षमताओं वाली राष्ट्रीय स्तर की एकीकृत बीज कंपनियों की कोई मान्यता नहीं है।
  2. नर्सरी:- केवल फलों से संबंधित नर्सरी के लिये ही लाइसेंस लेना या पंजीकरण कराना अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त सभी नर्सरियों को पंजीकृत होने की आवश्यकता नहीं है।
  3. मूल्य नियंत्रण:-बीज विधेयक मसौदे में सरकार को आकस्मिक स्थितियों जैसे- बीज की कमी, मूल्य में असामान्य वृद्धि, एकाधिकार मूल्य निर्धारण, मुनाफाखोरी आदि के मामले में कुछ चयनित किस्म के बीजो के मूल्य निर्धारण में हस्तक्षेप का अधिकार दिया गया है।
  4. शिकायतों की समीक्षा:-मसौदे के अनुसार, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 का उपयोग भविष्य में बीज के संबंध में आने वाली विभिन्न शिकायतों से निपटने के लिये किया जाएगा।

कृषकों को वित्पोषण[सम्पादन]

  • किसानों के लिये पेंशन योजना- सभी लघु और सीमांत किसानों (Small and Marginal Farmers- SMF) के लिये एक स्वैच्छिक और अंशदायी पेंशन योजना को मंज़ूरी दी गई है। इस योजना में प्रवेश की आयु 18 से 40 वर्ष निर्धारित की गई है तथा 60 वर्ष की आयु प्राप्त करने पर संबंधित व्यक्ति को 3,000 रुपए प्रतिमाह की न्यूनतम निर्धारित पेंशन दी जाएगी।
लाभार्थी किसान को 29 वर्ष की आयु में योजना में प्रवेश करने पर प्रतिमाह 100 रुपए का योगदान करना आवश्यक है। केंद्र सरकार द्वारा भी पेंशन फंड में उतनी ही राशि का योगदान किया जाएगा जितना कि पात्र किसान द्वारा दिया जाता है।
यदि पेंशन प्राप्ति के दौरान अभिदाता (Subscriber) की मृत्यु हो जाने पर SMF लाभार्थी का जीवनसाथी (Spouse) पारिवारिक पेंशन के रूप में अभिदाता को प्राप्त होने वाली पेंशन का 50% प्राप्त करने का हकदार होगा, बशर्ते वह पहले से ही इस योजना के तहत SMF लाभार्थी न हो।
यदि अंशदाता की मृत्यु अंशदान की अवधि के दौरान होती है, तो पति या पत्नी के पास नियमित योगदान देकर योजना को जारी रखने का विकल्प होगा।
योजना की एक प्रमुख विशेषता यह है कि किसान सीधे प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (Pradhan Mantri Kisan Samman Nidhi, PM-KISAN) योजना से प्राप्त होने वाले लाभ से इस योजना में मासिक योगदान का विकल्प चुन सकते हैं।
वैकल्पिक रूप से एक किसान इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन सामुदायिक सेवा (Common Service Centres- CSCs) के माध्यम से पंजीकरण करके अपने मासिक योगदान का भुगतान कर सकता है।

अशोक दलवाई समिति ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लिये अपनी सिफारिशें प्रस्तुत की हैं।

  • केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के अनुसार 31 अक्तूबर,2019 तक विभिन्न राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में लगभग 24,321 सक्रिय किसान क्लब (Farmers Clubs) मौजूद थे।फार्मर्स क्लब,नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट का एक अनौपचारिक मंच है। 5 नवंबर,1982 को नाबार्ड को राष्ट्र को समर्पित करते हुए भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री ने‘क्रेडिट के माध्यम से विकास’के पाँच सिद्धांतों’ को प्रचारित करने के लिये ‘विकास स्वयंसेवक वाहिनी’ (Vikas Volunteer Vahini-VVV) कार्यक्रम शुरू किया। वर्ष 2005 में VVV कार्यक्रम को किसान क्लब कार्यक्रम (FCP) के रूप में नामांकित किया गया। किसान क्लब गाँव में किसानों का ज़मीनी स्तर का एक अनौपचारिक मंच है। बैंकों और किसानों के पारस्परिक लाभ के लिये नाबार्ड के समर्थन एवं वित्तीय सहायता के साथ बैंकों की ग्रामीण शाखाओं द्वारा इस तरह के क्लबों का आयोजन किया जाता है। उद्देश्य:-
  1. इन्हें बैंकों और किसानों के आपसी लाभ के लिये कार्यान्वित किया जा रहा है।
  2. इसका उद्देश्य किसानों के लिये तकनीकी के हस्तांतरण, साख (क्रेडिट) के माध्यम से विकास,जागरूकता और क्षमता निर्माण करना है।
  3. फार्मर्स क्लब, बैंकों और राज्यों के संबंधित विभागों द्वारा प्रायोजित/कार्यान्वित कार्यक्रमों/योजनाओं के अभिसरण हेतु भी लाभदायक हैं।
  • प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति (CCEA) ने कृषि-बाज़ार अवसंरचना कोष (AMIF) के लिये 2000 करोड़ रुपए की निधि के सृजन को स्वीकृति प्रदान कर दी है।

ग्रामीण कृषि बाज़ारों एवं व्यवस्थित थोक बाज़ारों में कृषि विपणन अवसंरचना के विकास एवं उन्नयन के लिये इस कोष की स्थापना राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (NABARD) के साथ मिलकर की जाएगी। केंद्रीय बजट 2018-19 में 22 हज़ार ग्रामीण कृषि बाजारों तथा 585 APMCs में कृषि विपणन अवसंरचना के विकास के लिये इसकी स्थापना का प्रावधान किया गया था। कृषि-बाज़ार अवसंरचना कोष (AMIF) राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों की सरकारों को 585 कृषि उपज विपणन समितियों (Agriculture Produce Market Committees- APMCs ) एवं 10,000 ग्रामीण कृषि बाज़ारों (Grameen Agricultural Markets-GrAMs) में विपणन की ढाँचागत व्यवस्था विकसित करने के लिये उनके प्रस्ताव पर वित्तीय छूट प्राप्त ऋण मुहैया कराएगा। राज्य हब (Hub) एवं स्पोक प्रणाली (Spoke Mode) तथा PPP प्रणाली समेत उन्नत एकीकृत बाज़ार अवसंरचना परियोजनाओं के लिये इस कोष से सहायता प्राप्त कर सकेंगे। इन ग्रामीण कृषि बाज़ारों में मनरेगा एवं अन्य सरकारी योजनाओं का उपयोग कर भौतिक एवं आधारभूत अवसंरचना को सुदृढ़ किया जाएगा। अनुमति प्राप्त होने के बाद इस योजना को कृषि सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग द्वारा राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) को 2018-19 एवं 2019-20 के साथ-साथ 2024-25 तक के दौरान जारी वार्षिक बजट के अनुरूप ब्याज सब्सिडी उपलब्ध कराई जाएगी। योजना के मांग आधारित होने से इसकी प्रगति राज्यों की मांग एवं उनसे प्राप्त होने वाले प्रस्तावों का विषय होगी।

  • बैंकों ने किसान क्रेडिट कार्ड (Kisan Credit Card-KCC) सेचुरेशन कैंपेन (Saturation campaign) शुरू किया है, इसका उद्देश्य ऐसे किसानों जिन्हें अभी तक ऋण प्रदान नहीं किया जा सका है, को उनकी ऋण की आवश्‍यकताओं (कृषि संबंधी खर्चों) की पूर्ति के लिये पर्याप्‍त एवं समय पर ऋण की सुविधा प्रदान करना है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अनुसार, वर्तमान में 14.5 करोड़ परिचालन भूमि जोत (Operational Landholdings) के मुकाबले 6.92 करोड़ KCCs हैं। KCC के तहत उधारकर्त्ता को एक ATM सह-डेबिट कार्ड जारी किया जाता है (स्‍टेट बैंक किसान डेबिट कार्ड) ताकि वे ATMs एवं POS टर्मिनलों से आहरण कर सकें। KCC एक विविध खाते का स्‍वरूप है। इस खाते में कोई जमा शेष रहने की स्‍थिति में उस राशि पर बचत खाते के समान ब्‍याज मिलता है। KCC में 3 लाख रुपए तक की राशि पर प्रसंस्‍करण शुल्‍क नहीं लगाया जाता है।

सेचुरेशन को सुनिश्चित करने के साथ-साथ, बैंक आधार कार्ड को बैंक खातों से तत्काल लिंक करने के लिये भी कदम उठा रहे हैं क्योंकि KCC खातों के साथ आधार संख्या के लिंक न होने पर कोई ब्याज सबवेंशन नहीं दिया जाएगा। इसके अलावा सरकार ने KCC के सेचुरेशन के लिये कई पहलें की हैं जिसमें पशुपालन और मत्स्यपालन के कार्य में लगे किसानों को जोड़ना, KCC के तहत ऋण का कोई प्रक्रिया शुल्क नहीं देना और संपार्श्विक मुक्त (Collateral Free) कृषि ऋण की सीमा को 1 लाख रुपए से बढ़ाकर 1.6 लाख रुपए करना शामिल है।

किसान क्रेडिट कार्ड योजना की शुरुआत वर्ष 1998 में की गई थी। किसानों की ऋण आवश्‍यकताओं (कृषि संबंधी खर्चों) की पूर्ति के लिये पर्याप्‍त एवं समय पर ऋण की सुविधा प्रदान करना, साथ ही आकस्‍मिक खर्चों के अलावा सहायक कार्यकलापों से संबंधित खर्चों की पूर्ति करना। यह ऋण सुविधा एक सरली कार्यविधि के माध्‍यम से यथा- आवश्‍यकता के आधार पर प्रदान की जाती है।

KCC में फसल कटाई के बाद के खर्चों, विपणन हेतु ऋण, किसान परिवारों की उपभोग संबंधी आवश्यकताओं, कृषि परिसंपत्तियों के रखरखाव के लिये कार्यशील पूंजी और कृषि से संबद्ध गतिविधियों, कृषि क्षेत्र में निवेश ऋण की आवश्यकता को शामिल किया गया है। किसान क्रेडिट कार्ड योजना (KCC) को वाणिज्यिक बैंकों, RRBs, लघु वित्त बैंकों (Small Finance Banks) और सहकारी संस्थाओं द्वारा कार्यान्वित किया जाता है।

  • ब्याज सबवेंशन (छूट) योजना(Interest Subvention Scheme) का लक्ष्य किसानों को 7 प्रतिशत प्रतिवर्ष की ब्याज दर पर 3 लाख रुपए तक का अल्पकालिक फसली ऋण प्रदान करना है। ऋणदाता (उधार देने वाले) संस्थान जैसे- PSBs और निजी क्षेत्र के वाणिज्यिक बैंक सरकार द्वारा प्रस्तावित 2 प्रतिशत का ब्‍याज सबवेंशन (छूट) प्रदान करते हैं। यह नीति वर्ष 2006-07 से लागू हुई। क्रियान्वयन नाबार्ड और RBI द्वारा किया जा रहा है।
  • झारखंड सरकार द्वारा 10 अगस्त को मुख्यमंत्री कृषि आशीर्वाद योजना लॉन्च किया गया। प्रदेश के किसानों की आमदनी बढ़ाने हेतु लॉन्च इस योजना के तहत राज्य के सभी लघु एवं सीमांत किसान, जिनके पास अधिकतम 5 एकड़ तक कृषि योग्य भूमि है, उन्हें 5000 रुपए प्रति एकड़ प्रतिवर्ष की दर से सहायता अनुदान दिया जाएगा, जिससे उनकी ऋण पर निर्भरता कम होगी। यह राशि दो किस्तों में दी जाएगी। इस योजना से सभी योग्य किसानों को प्रतिवर्ष न्यूनतम 5000 तथा अधिकतम 25 हज़ार रुपए मिलेंगे।

कृषि में तकनीक[सम्पादन]

  • सीएचसी-फार्म मशीनरी एवं कृषि किसान एप(CHC Farm Machinery and Krishi Kisan App) भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा लॉन्च।सीएचसी-फार्म मशीनरी एप कस्टम हायरिंग सेंटर (Custom hiring centres- CHC) को किसानों से जोड़ेगा जिससे उन्नत तकनीक से युक्त कृषि यंत्रों तक छोटे व सीमांत किसानो की पहुँच आसान होगी। इस एप के माध्यम से किसानों को 50 किमी की परिधि में स्थित कस्टम हायरिंग सेंटर से उचित मूल्य पर कृषि यंत्र व उपकरण किराये पर प्राप्त हो सकेंगे। इस एप का प्रयोग किसानों की आय में वृद्धि व कृषि के मशीनीकरण में सहायक होगा।
कृषि किसान एप फसल की जियो-टैगिंग (Geo-Tagging) एवं जियो-फेंसिंग में मदद करेगा और किसानों को मौसम का पूर्वानुमान प्रदान करेगा। यह एप किसानों को उनके निकटतम क्षेत्र में उच्च उपज वाली फसलों और बीज के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन की जानकारी प्रदान करेगा। किसी किसान द्वारा उच्च उपज प्राप्त करने की नवीन या पारंपरिक ज्ञान आधारित पद्धति को अन्य किसानों के साथ साझा करने हेतु मंच प्रदान करेगा।
  • तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय ने नैनो प्रौद्योगिकी-आधारित दो उत्पादों को जारी किया है। इसका उद्देश्य बागवानी उत्पादों के भंडारण एवं उपयोग होने तक की अवधि का विस्तार (शेल्फ लाइफ) करना है। इसके तहत ‘नैनो उत्पादों का व्यवसायीकरण एवं बाज़ार संचालित नैनो अनुसंधान को बढ़ावा देना’ सुनिश्चित किया जा सकेगा। नैनो प्रौद्योगिकी-आधारित उत्पादों जैसे- फ्रूटी फ्रेश, नैनो स्टीकर और नैनो पेलेट्स (Nano Stickers and Nano Pellets) के प्रयोग से फलों एवं सब्जियों की शेल्फ लाइफ बढ़ जाएगी, साथ ही फसल उत्पादों को सड़ने-गलने एवं अन्य रोगों से से भी बचाया जा सकेगा। फ्रूटी फ्रेश, का प्रयोग कर स्थानीय स्तर पर फलों और शब्जियों की शेल्फ लाइफ 10 - 15 दिनों के लिये बढ़ाई ।
वहीं नैनो स्टीकर और नैनो पेलेट्स को विक्रेता या निर्यातक द्वारा शिपमेंट के लिये उपयोग किये गए बक्से के अंदर रखकर वस्तुओं की शेल्फ लाइफ बढ़ाई जा सकती है।
  • किसानों की सहायता के लिये मोबाइल एप सरकार ने किसानों को अत्याधुनिक तकनीक तक सस्ती पहुँच उपलब्ध कराने के लिये देश में ट्रैक्टरों को उबर जैसी सुविधा देने हेतु एक एप लॉन्च करना सुनिश्चित किया है। इस एप के आधिकारिक रूप से लॉन्च हो जाने पर जो किसान उपकरण किराये पर लेना चाहते हैं, वे अपने नाम, पते और मोबाइल नंबर का उपयोग करके पंजीकरण कर सकते हैं तथा अपनी आवश्यकता के अनुसार उपकरण किराये पर ले सकते हैं। किसानों को उनके आस-पास के 20 से 50 किलोमीटर के दायरे में उपकरण उपलब्ध कराए जाएंगे।
यह एप उसी प्रकार आधुनिक तकनीकों तक किसानों की पहुँच सुनिश्चित करेगा जैसे उबर एप लोगों को कैब की सुविधा प्रदान करता है। इसके तहत एक लेज़र गाइडेड तकनीकी/मशीन जो भूमि को समतल करती है को लिया गया है इसका उपयोग कर किसान कीमती भूजल को बचा सकते हैं तथा उत्पादकता में 10 से 15% की वृद्धि कर सकते हैं। इस तरह के हाईटेक लेवलर्स (hitech levellers) की कीमत कम-से-कम 3 लाख रुपए है, जो औसत एवं लघु कृषकों की पहुँच से परे है।
वर्तमान में देश भर में 38,000 से अधिक कस्टम हायरिंग सेंटर (Custom Hiring Centres- CHC) हैं जो प्रत्येक वर्ष 2.5 लाख कृषि उपकरण किराये पर लेते हैं। किसानों, समाजों और उद्यमियों द्वारा पंजीकरण के लिये CHC एप पहले से ही खुला है जो इन केंद्रों को चलाते हैं। अब तक लगभग 26,800 CHC ने एक लाख से अधिक उपकरण किराये पर देने की पेशकश की है।
  • मेघदूत मोबाइल एप का प्रारंभ भू-विज्ञान एवं कृषि मंत्रालय द्वारा डिजिटल इंडिया के तहत किसानों को तकनीक से जोड़ने के लिये किया गया। यह एप किसानों को उनके क्षेत्र के हिसाब से कृषि एवं मवेशियों के लिये मौसम आधारित सलाह उनकी स्थानीय भाषा में उपलब्ध कराएगा जिसकी सहायता से किसान फसल और मवेशियों की बेहतर तरीके से देखभाल कर सकेंगे। इसकी सहायता से किसान तापमान,वर्षा,नमी एवं वायु की तीव्रता तथा दिशा के बारे में जान सकते हैं। एप की सूचनाएँ सप्ताह में दो दिन मंगलवार एवं शुक्रवार को अपडेट की जाएंगी। शुरुआत में यह एप देश के 150 ज़िलों के स्थानीय मौसम के बारे में जानकारी प्रदान करेगा। तत्पश्चात् आने वाले एक साल में इसकी सेवा का विस्तार किया जाएगा।
मेघदूत एप को भारत मौसम विज्ञान विभाग, भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (Indian Institute of Tropical Meteorology) तथा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने मिलकर विकसित किया है। एप पर सूचनाओं को चित्र और मैप के रूप में दिया जाएगा है इसे व्हाट्सएप और फेसबुक से जोड़ा गया है। भविष्य में इसे यू-ट्यूब से भी जोड़ दिया जाएगा। देश में 44 फीसदी लोग कृषि क्षेत्र में रोज़गार प्राप्त करते हैं।
इससे पहले किसानों के लिये किसान सुविधा एप और पूसा कृषि मोबाइल एप लाया गया था। किसान सुविधा एप पर मौसम, बाज़ार मूल्य, बीज, उर्वरक, कीटनाशक और कृषि मशीनरी के बारे में जानकारी मिलती है। पूसा कृषि मोबाइल एप भारतीय कृषि शोध संस्थान द्वारा लाई गई नई तकनीक के बारे में बताता है।
  • भारतीय चाय बोर्ड (Tea Board of India) थोक चाय की ई-नीलामी प्रणाली' में सुधार के लिये जापानी ई-नीलामी प्रणाली को अपनाने पर विचार कर रहा है। जापानी ई-नीलामी प्रणाली एक आरोही प्रक्रिया है जो उत्तरोत्तर गतिशील रहती है। प्रस्तावित सुधार को IIM बंगलुरु द्वारा सुझाया गया है। बेहतर मूल्य प्राप्त होने की संभावना है। इसके तहत खरीदारों के लिये समान अवसर प्रदान करने की आवश्यकता को संदर्भित करते हुए छोटे खरीदारों के लिये एक अलग विपणन चैनल की व्यवस्था करने का प्रस्ताव दिया गया है। चाय की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिये व्यापक दिशा-निर्देशों एवं मानकों के विकास पर जोर दिया गया है।
  • आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडल समिति ने वर्ष 2019-20 के लिये फॉस्फोरस और पोटाश उर्वरकों के लिये पोषण आधारित सब्सिडी (NBS) दरों के निर्धारण हेतु उर्वरक विभाग के प्रस्ताव को मंज़ूरी दी है। यह योजना उर्वरक और रसायन मंत्रालय के उर्वरक विभाग द्वारा अप्रैल 2010 से लागू की जा रही है।
NBS में अनुमोदित दरें नाइट्रोजन के लिये 18.90 रुपए प्रति किलोग्राम,फॉस्फोरस के लिये 15.21 रुपए प्रति किलोग्राम, पोटाश के लिये 11.12 रुपए प्रति किलोग्राम और सल्फर के लिये 3.56 रुपए प्रति किलोग्राम होंगी।
सरकार उर्वरक विनिर्माताओं/आयातकों के मायम से किसानों को रियायती दरों पर उर्वरक, यूरिया और 21 ग्रेड के पोटाश एवं फॉस्फोरस उर्वरक उपलब्‍ध कराती है।
  • इलेक्ट्रॉनिक-नेशनल एग्रीकल्चर मार्केट एक अखिल भारतीय इलेक्ट्रॉनिक व्यापार पोर्टल है जो कृषि से संबंधित उपजों हेतु एक एकीकृत राष्ट्रीय बाजार का निर्माण करने के लिये मौजूदा APMC मंडियों का विस्तार है।

भारत सरकार ने लघु कृषक कृषि व्यवसाय कंसोर्टियम (SFAC) को e-NAM की प्रमुख कार्यान्वयन एजेंसी के रूप में नियुक्त किया है।

  • 1 फरवरी को वर्तमान केंद्र सरकार ने वर्ष 2019-20 के लिये अंतरिम बजट पेश किया। अंतरिम बजट में पिछले बजट की तुलना में कृषि के लिये करीब-करीब ढाई गुना अधिक प्रावधान किया गया है। इस बार कृषि के लिये 1,40,763 करोड़ रुपए रखे गए हैं साथ ही किसान सम्मान निधि योजना शुरू करने की घोषणा की गई है।

इस योजना के तहत 2 हेक्टेयर तक भूमि वाले छोटी जोत वाले किसान परिवारों को 6000 रुपए प्रतिवर्ष की दर से प्रत्यक्ष आय सहायता उपलब्ध कराई जाएगी। यह आय सहायता 2000 रुपए की तीन समान किस्तों में लाभान्वित होने वाले किसानों के बैंक खातों में सीधे हस्तांतरित कर दी जाएगी। इस योजना का वित्त पोषण भारत सरकार द्वारा किया जाएगा और इससे लगभग 12 करोड़ छोटे और सीमांत किसान परिवारों के लाभान्वित होने की उम्मीद है। यह योजना 1 दिसंबर, 2018 से लागू मानी जाएगी और 31 मार्च, 2019 तक की अवधि के लिये पहली किस्त का इसी वर्ष के दौरान भुगतान कर दिया जाएगा। इस योजना पर 75 हज़ार करोड़ रुपए का सालाना खर्च आएगा और इससे छोटे किसान परिवारों को एक निश्चित पूरक आय प्राप्त होगी।

  • इलेक्ट्रॉनिक-नेशनल एग्रीकल्चर मार्केट एक अखिल भारतीय इलेक्ट्रॉनिक व्यापार पोर्टल है जो कृषि से संबंधित उपजों हेतु एक एकीकृत राष्ट्रीय बाजार का निर्माण करने के लिये मौजूदा APMC मंडियों का विस्तार है।

भारत सरकार ने लघु कृषक कृषि व्यवसाय कंसोर्टियम (SFAC) को e-NAM की प्रमुख कार्यान्वयन एजेंसी के रूप में नियुक्त किया है। ग्लोबल इकोनॉमिक प्रॉस्पेक्ट्स विश्व बैंक समूह की एक प्रमुख रिपोर्ट है जो वैश्विक आर्थिक विकास और संभावनाओं की जाँच करती है, जिसमें उभरते बाज़ार तथा विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर विशेष ध्यान दिया जाता है। विश्व बैंक द्वारा जारी की जाने वाली अन्य रिपोर्टों में ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस रिपोर्ट, ह्यूमन कैपिटल इंडेक्स और विश्व विकास रिपोर्ट शामिल हैं।

पशुपालन संबंधी आर्थशास्त्र[सम्पादन]

  • प्रत्येक 5 वर्ष में एक बार जारी किए जानेवाले मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय ने 20वीं पशुधन गणना रिपोर्ट 17 अक्टूबर को जारी की। पशुधन गणना-2018 के अनुसार देश में कुल पशुधन आबादी 535.78 मिलियन है,जिसमें पशुधन गणना- 2012 की तुलना में 4.6% की वृद्धि हुई है।पश्चिम बंगाल में पशुओं की संख्या में सबसे अधिक (23%) की वृद्धि हुई, उसके बाद तेलंगाना (22%) का स्थान रहा। देश में कुल मवेशियों की संख्या में 0.8% की वृद्धि हुई है। यह वृद्धि मुख्य रूप से वर्ण शंकर मवेशियों और स्वदेशी मादा मवेशियों की आबादी में तेज़ी से वृद्धि का परिणाम है।

उत्तर प्रदेश में मवेशियों की आबादी में सबसे ज़्यादा कमी देखी गई है,हालाँकि राज्य ने मवेशियों को बचाने के लिये कई कदम उठाए हैं। कुल विदेशी/क्रॉसब्रीड मवेशियों की आबादी में 27% की वृद्धि हुई है। 2018-19 में भारत के कुल दूध उत्पादन में क्रॉस-ब्रीड मवेशियों का योगदान लगभग 28% था। जर्सी या होलेस्टिन जैसे विदेशी दुधारू की क्षमता अधिक है, इसलिये कृषकों द्वारा इन मवेशियों को अधिक पसंद किया जा रहा है।

राष्ट्रीय गोकुल मिशन के माध्यम से देशी नस्लों के संरक्षण को बढ़ावा देने के सरकार के प्रयासों के बावजूद, भारत के कुल देशी मवेशियों की आबादी में 6% की गिरावट देखी गई है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र आदि राज्यों में सबसे अधिक गिरावट देखी गई है, जिसका कारण बहुत हद तक गौहत्या कानून है। कुल दुधारू मवेशियों में 6% की वृद्धि देखी गई है। देश में कुल मवेशियों का लगभग 75% मादा (गाय) हैं, यह दुग्ध उत्पादक पशुओं के लिये डेयरी किसानों की वरीयताओं का एक स्पष्ट संकेत है। गायों की संख्या में वृद्धि का कारण सरकार द्वारा किसानों को उच्च उपज वाले बैल के वीर्य के साथ कृत्रिम गर्भाधान की सुविधा प्रदान करना है।
बेकयार्ड पोल्ट्री में लगभग 46% की वृद्धि हुई है। यह वृद्धि गरीबी उन्मूलन के संकेत को दर्शाता है।

कुल गोजातीय जनसंख्या (मवेशी, भैंस, मिथुन और याक) में लगभग 1% की वृद्धि देखी गई है। भेड़, बकरी और मिथुन की आबादी दोहरे अंकों में बढ़ी है जबकि घोड़ों, सूअर, ऊँट, गधे, खच्चर और याक की गिनती में गिरावट आई है।

वर्ष 1919-20 से समय-समय पर पशुधन की गणना आयोजित की जाती है। इसमें सभी पालतू जानवरों की कुल गणना को शामिल किया गया है। राज्य सरकारों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के साथ मिलकर मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी विभाग द्वारा अब तक ऐसी 19 गणनाएँ की जा चुकी हैं। 20वीं पशुधन जनगणना में पहली बार फील्ड से ऑनलाइन प्रसारण के माध्यम से घरेलू स्तर के डेटा का उपयोग किया गया है। जनगणना केवल नीति निर्माताओं के लिये ही नहीं बल्कि किसानों,व्यापारियों,उद्यमियों,डेयरी उद्योग और आम जनता के लिये भी फायदेमंद है।
  • हनी मिशन की शुरुआत खादी और ग्रामोद्योग आयोग (KVIC)द्वारा शहद उत्पादन और किसानों की आय बढ़ाने के उद्येश्य से की है। इसके तहत दो साल से भी कम समय में देश भर के किसानों और बेरोजगार युवाओं के बीच एक लाख से अधिक मधुमक्खियों के बक्से वितरित किये हैं। किसानों को प्रशिक्षण के साथ ही मधुमक्खियों के पालन हेतु बक्से भी प्रदान किया जाएगा। इसको अगस्त 2017 में ‘स्वीट रिवोल्यूशन’ के अनुरूप ही लॉन्च किया गया था। मधुमक्खी पालन और इससे जुड़ी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिये वर्ष 2016 में 'स्वीट रिवोल्यूशन' की शुरुआत की गई थी। इस मिशन की मदद से 10,000 से अधिक नए रोज़गार पैदा किये गए हैं। यह खादी और ग्रामोद्योग आयोग अधिनियम, 1956 के तहत स्थापित एक वैधानिक निकाय है।
  • बिबेक देवरॉय की अध्यक्षता में गठित मधुमक्खी पालन विकास समिति की रिपोर्टमें मधुमक्खियों को कृषि उत्पाद के रुप में पहचान प्रदान किेए जाने तथा भूमिहीन मधुमक्खी पालकों को किसान का दर्जा प्रदान करने की अनुशंसा की है। भारत में पाए जाने वाले मधुमक्खी की चार प्रमुख प्रजातियां हैं:-दो भारतीय घरेलू प्रजातियां या एशियाई मधुमक्खी और यूरोपीय मधुमक्खी(20वीं शताब्ती में भारत लाई गई)तथा दो जंगली प्रजातियां -रॉक हनी बी एवं ड़्वार्फ हनी बी।
शहद और मोम की प्राप्ती इसके प्राथमिक उत्पाद हैं,जबकि परागकण,प्रोपोलिस ,रॉयल जेली और मधुमक्खी का विष भी इससे संबंधित विपणन योग्य प्राथमिक उत्पाद हैं।
2017-18में शहद उत्पादन के मामले में भारत(64.9हजार टन) विश्व में आठवें स्थान पर रहा,जबकि चीन(551हजार टन ) के साथ प्रथम स्थान पर रहा।
2005 में इसको राष्ट्रीय बागवानी मिशन(NHM)के अंतर्गत एक पूरक गतिविधि के रुप में सम्मिलित किया गया।
इसके प्रोत्साहन हेतु भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(ICAR),खादी और ग्रामोद्दोग आयोग(KVIC),राष्ट्रीय मधुमक्खी बोर्ड(कृषि मंत्रालय के अंतर्गत) आदि एजेंसियां कार्यरत हैं।
  • सुअर पालन विकास परियोजना-केंद्र सरकार द्वारामेघालय में राज्य सरकार के सहयोग से प्रारंभ इस परियोजना का वित्तपोषण राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम द्वारा किया जाएगा। इसका उद्देश्य पूर्वोत्तर राज्यों में मांस की उपलब्धता को बढ़ाना, निर्यात में वृद्धि और आजीविका के अवसरों को उपलब्ध करवाना है। इस परियोजना के द्वारा बेहतर प्रजनन स्टॉक के साथ सुअर पालन शुरू करने के लिये ग्रामीणों के बीच जागरूकता बढ़ाई जाएगी। इस परियोजना से नागरिकों में पोषण स्तर में वृद्धि होगी तथा राष्ट्र्रीय पोषण मिशन जैसे प्रयासों के लक्ष्यों की प्राप्ति होगी ।
  • पश्मीना उत्पादों को मिला BIS प्रमाणपत्र-भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने पश्मीना उत्पादों की शुद्धता प्रमाणित करने के उद्देश्य से उसकी पहचान और लेबलिंग की प्रक्रिया को भारतीय मानक (Indian Standards) के दायरे में रख दिया है।
इस प्रमाणीकरण से पश्मीना उत्पादों में होने वाली मिलावट पर रोक लगेगी।
कच्चा माल तैयार करने वाले घुमंतू कारीगरों तथा स्थानीय दस्तकारों के हितों की रक्षा होगी।
उपभोक्ताओं के लिये पश्मीना की शुद्धता भी सुनिश्चित होगी।

क्यों लिया गया निर्णय? भारत में जगह-जगह असली पश्मीना के नाम पर नकली और घटिया माल की बिक्री की जाती है, इस पहल के परिणामस्वरूप उस पर रोक लगेगी और लद्दाख के बकरी पालक समुदाय तथा असली पश्मीना बनाने वाले स्थानीय हेंडलूम दस्तकारों को अपने माल की उचित कीमत प्राप्त होगी।

घुमंतू पश्मीना बकरी पालक समुदाय छांगथांग के दुर्गम स्थानों में रहते हैं और आजीविका के लिये पश्मीना पर ही निर्भर हैं।
इस समय 2400 परिवार ढाई लाख बकरियों का पालन कर रहे हैं। पश्मीना के BIS प्रमाणीकरण से इन परिवारों के हितों की रक्षा होगी और युवा पीढ़ी भी इस व्यवसाय की ओर आकर्षित होगी। इसके अलावा अन्य परिवार भी इस व्यवसाय को अपनाने के लिये प्रोत्साहित होंगे।

पश्मीना उत्पाद :-लद्दाख विश्व में सर्वाधिक (लगभग 50 मीट्रिक टन) और सबसे उन्नत किस्म के पश्मीना का उत्पादन करता है। असली पश्मीना उत्पादों को छांगथांगी या पश्मीना बकरी के बालों से बनाया जाता है। छांगथांगी या पश्मीना बकरी लद्दाख के ऊँचे क्षेत्रों में पाई जाती हैं। छांगथांगी बकरी के बाल बहुत मोटे होते हैं और इनसे विश्व का बेहतरीन पश्मीना प्राप्त होता है जिसकी मोटाई 12-15 माइक्रोन के बीच होती है। इन बकरियों को घर में पाला जाता है और ग्रेटर लद्दाख के छांगथांग क्षेत्र में छांगपा नामक घुमंतू समुदाय इन्हें पालता है। छांगथांगी बकरियों की बदौलत ही छांगथांग, लेह और लद्दाख क्षेत्र में अर्थव्यवस्था बहाल हुई है।

  • मध्य प्रदेश सरकार द्वारा स्थापित भारत के पहले गौ अभयारण्य (Cow Sanctuary) का निजीकरण किया जाएगा। 32 करोड़ रुपए की लागत सेवर्ष 2017 में आगर मालवा ज़िले (मध्य प्रदेश) में निर्मित इस कामधेनु गौ अभ्यारण्य(472 हेक्टेयर क्षेत्र)में लगभग 4,000 गायें रह रही हैं। इसमें मुख्य रूप से ऐसी गायें हैं जो बूढ़ी और बीमार हैं या जिन्होंने दूध देना बंद कर दिया है।
पिछले एक साल में मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण 600 से अधिक गायों की मौत हो गई। सरकार को इस समस्या से निपटना मुश्किल हो रहा है। निजीकरण का यह निर्णय वित्तीय संकट के कारण भी लिया गया है।सरकार अभयारण्य के प्रबंधन और गायों की सेवा के लिये एक सामाजिक या धार्मिक संगठन की तलाश कर रही है।
  • ओंगोल नस्ल की गाय- भारत के उपराष्ट्रपति ने विजयवाड़ा स्थित स्वर्ण भारत न्यास में आयोजित एक कार्यक्रम में ओंगोल नस्ल की गाय (Ongole Cattle Breed) पर एक विवरणिका जारी की। यह विवरणिका 1200 पन्नों की है जिसमें वर्ष 1885 से 2016 तक पशुओं का इतिहास दिया गया है। इस पुस्तक में ओंगोल गाय पर किये जाने वाले अनुसंधान को भी शामिल किया गया है। ओंगोले नस्ल का नामकरण आंध्र प्रदेश के भौगोलिक क्षेत्र ओंगोल के नाम पर किया गया है।

इसे नेल्लोर नस्ल भी कहा जाता है क्योंकि पूर्व में ओंगोल तालुक नेल्लोर ज़िले का हिस्सा था, लेकिन अब यह गुंटूर ज़िले में शामिल है। यह नस्ल मूल रूप से आंध्र प्रदेश के तटीय ज़िलों- गुंटूर, प्रकाशम और नेल्लोर में पाई जाती है। इसका उपयोग दूध उत्पादन के साथ-साथ खेतों की जुताई में भी उपयोग किया जा सकता है।


उच्च न्यायालय द्वारा पोल्ट्री फार्मों में क्रूरता के संबंध में दिये गए एक निर्देश के पश्चात् पशुओं के प्रति क्रूरता का रोकथाम नियम, 2019 के तहत मसौदा नियमों को रखा गया है इस मसौदा नियम के अंतर्गत निम्नलिखित बिंदु शामिल हैं-

  1. देश में पोल्ट्री फार्मों का न्यूनतम स्थान 550 वर्ग सेमी. से कम नहीं होना चाहिये।
  2. 6-8 अधिक-से-अधिक पक्षियों को एक पिंजरे में रखा जा सकता है।
  3. एंटीबायोटिक्स का उपयोग केवल चिकित्सीय उद्देश्यों की पूर्ति के लिये किया जाना चाहिये और वह भी पशुचिकित्सक के देखरेख

में।

एक्वा एक्वारिया इंडिया 2019(Aqua Aquaria India 2019))[सम्पादन]

उपराष्ट्रपति ने हैदराबाद में समुद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (Marine Products Export Development Authority- MPEDA) द्वारा आयोजित भारत के अंतर्राष्ट्रीय एक्वा इंडिया 2019 के 5वें संस्करण का उद्घाटन किया। इस वर्ष की थीम थी ‘भारत के अंतर्क्षेत्र में नीली क्रांति पहुँचाना’। (Taking Blue Revolution to India’s Hinterland)’। फिट इंडिया के लिये प्रधानमंत्री द्वारा किये गए आह्वान का समर्थन करते हुए उपराष्ट्रपति ने एक्वा इंडिया को समय की जरूरत बताया तथा इसे एक राष्ट्रीय आंदोलन बनाने की बात कही। जल में पाए जाने वाले जीवों एवं वनस्पतियों में भरपूर प्रोटीन पाया जाता है जो अच्छे स्वास्थ्य के लिये महत्त्वपूर्ण हैं। वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के सरकार के संकल्प में मत्स्य पालन से किसानों को आर्थिक लाभ प्राप्त हो सकता है। हालाँकि सीमित संसाधनों को ध्यान में रखते हुए विशेष रूप से लुप्तप्राय समुद्री प्रजातियों के शोषण को सख्ती से रोका जाना वर्तमान की सबसे बड़ी चुनौती है। वर्ष 2018-19 के दौरान भारत ने लगभग 7 बिलियन डॉलर के समुद्री उत्पादों का निर्यात अमेरिका, चीन, यूरोप और जापान को किया है। समुद्री उत्पाद निर्यात के मामले में भारत दूसरे स्थान पर है।

  • महासागर विश्व के सबसे बड़े पारिस्थितिकी तंत्र हैं, साथ ही ये पृथ्वी के तीन-चौथाई हिस्से में फैले हुए हैं। महासागर वैश्विक GDP में 5 प्रतिशत का योगदान देते हैं तथा 350 मिलियन लोगों को महासागरों से जीविका प्राप्त होती है।

इस संदर्भ में ये क्षेत्र जलवायु परिवर्तन, आजीविका, वाणिज्य तथा सुरक्षा से संबंधित विभिन्न संभावनाएँ एवं चुनौतियाँ उत्पन्न करते हैं। विश्व बैंक के अनुसार महासागरों के संसाधनों का उपयोग जब आर्थिक विकास, आजीविका तथा रोज़गार एवं महासागरीय पारिस्थितिक तंत्र के स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर किया जाता है तो वह नीली अर्थव्यवस्था (Blue Economy) के अंतर्गत आता है।

सन्दर्भ[सम्पादन]

  1. https://navbharattimes.indiatimes.com/business/business-news/transport-plan-to-increase-agricultural-exports-will-be-freight-cost-transfer/articleshow/68276252.cms