सामान्य अध्ययन२०१९/जनजाति

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  • 19 दिसंबर, 2019 को मेघालय विधानसभा ने राज्य में इनर लाइन परमिट को लागू करने के लिये केंद्र से आग्रह करने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया। इससे पहले 11 दिसंबर को राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षर किये जाने के बाद इनर लाइन परमिट प्रणाली को मणिपुर तक बढ़ा दिया गया था।
इनर लाइन परमिट की अवधारणा औपनिवेशिक काल से उत्पन्न हुई। बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर नियमन अधिनियम, 1873 के तहत ब्रिटिश शासन ने बाहरी लोगों के प्रवेश निषेध एवं निर्दिष्ट क्षेत्रों में बाहरी लोगों के रहने को विनियमित किया।

चार पूर्वोत्तर राज्यों - अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मिजोरम और मणिपुर में इनर लाइन परमिट प्रणाली लागू है। कोई भी भारतीय नागरिक इन राज्यों में से किसी में भी बिना परमिट के प्रवेश नहीं कर सकता है जब तक कि वह उस राज्य से संबंधित नहीं हो और न ही वह ILP में निर्दिष्ट अवधि से अधिक रह सकता है।

  • गोल कार्यक्रम जनजातीय मामलों के मंत्रालय द्वारा शुरू किया गया कार्यक्रम है।

यह कार्यक्रम फेसबुक द्वारा शुरू किया गया है और इसका उद्देश्य देश भर की जनजातीय युवा महिलाओं को डिजिटल प्रशिक्षण हेतु प्रोत्साहित करना है।

  • खोंड जनजाति विशेष तौर पर ओडिशा राज्य की पहाड़ियों और जंगलों में निवास करती है।

ये कुई (Kui) (द्रविड़ भाषा) और इसकी दक्षिणी बोली कुवी (Kuwi) बोलती है। अधिकांश खोंड अब चावल की खेती करते हैं,लेकिन कुट्टिया खोंड जैसे कुछ समूह अभी भी झूम कृषि करते हैं। ओडिशा की नियामगिरी पहाड़ियों में डोंगरिया खोंड निवास करते हैं,जो‘विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूह’ (Particularly Vulnerable Tribal Groups- PVTGs) है।

विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूह (PVTGs):-

आदिवासी समूहों में PVTGs अधिक कमज़ोर हैं। वर्ष 1973 में धेबर आयोग ने आदिम जनजाति समूह (Primitive Tribal Groups-PTGs) को एक अलग श्रेणी के रूप में वर्गीकृत किया था । वर्ष 2006 में भारत सरकार ने PTG का नाम बदलकर PVTG कर दिया था। गृह मंत्रालय द्वारा 75 जनजातीय समूहों को विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूहों (PVTG) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। 75 सूचीबद्ध PVTGs में से सबसे अधिक संख्या ओडिशा में पाई जाती है। PVTGs की कुछ बुनियादी विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. इनमें अधिकतर समरूपता पाई जाती है।
  2. इनका शारीरिक कद अपेक्षाकृत अलग होता है।
  3. इनकी कोई लिखित भाषा नहीं होती है।
  • संविधान के अनुच्छेद 46 में राज्यों से अपेक्षा की गई है कि वह समाज के कमज़ोर वर्गों,विशेषकर अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के शैक्षणिक और आर्थिक हितों का ध्यान रखते हुए उन्हें सामाजिक अन्याय एवं सभी प्रकार के शोषण से संरक्षित रखेगा।
मूल अधिकारों के अलावा अनुच्छेद 330,332 और 335 में केंद्र और राज्यों की विधायिकाओं में इन समुदायों के लिये विशेष प्रतिनिधित्व एवं सीटों के आरक्षण के लिये तात्कालिक प्रावधान हैं।
पदों एवं सेवाओं में आरक्षण का प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 16(4),16(4क)और16(4ख) में किया गया है।
अनुच्छेद 338 से 342 और संविधान की पाँचवीं और छठी अनुसूची अनुच्छेद 46 में दिये गए लक्ष्यों हेतु विशेष प्रावधानों के संबंध में कार्य करते हैं।

शैक्षणिक संस्‍थानों में आरक्षण का प्रावधान अनुच्‍छेद 15(4) में किया गया है।

  • कोंडा रेड्डी आदिवासी (Konda Reddy Tribe) आंध्र प्रदेश और तेलंगाना राज्यों में सबसे पिछड़े प्राचीन आदिवासी समूहों में से एक है।

यह आदिवासी समूह गोदावरी नदी के दोनों किनारों (पूर्व और पश्चिम गोदावरी ज़िलों) पर,खम्मम (तेलंगाना) और श्रीकाकुलम (आंध्र प्रदेश) के पहाड़ी क्षेत्रों में निवास करता है। वे मुख्य रूप से आंतरिक वन क्षेत्रों में समाज की मुख्यधारा से कटे हुए रहते हैं। हाल ही में इस समूह ने परंपरागत काश्तकारियों को स्थानांतरित करके कृषि और बागवानी व्यवसाय को अपनाया लिया है। गैर लकड़ी वन उत्पादों का संग्रह और टोकरी बनाना इस आदिवासी समूह की आजीविका के अन्य स्रोत हैं। उनकी मातृभाषा एक अद्वितीय उच्चारण के साथ तेलुगु है। इनको आदिम जनजाति समूह (अब विशेष रूप से कमजोर आदिवासी समूह) के रूप में मान्यता दी गई है। इन्हे उनके पर्यावरण के अनुकूल प्रथाओं जैसे कि बांस,बोतल लौकी और बीज से बने घरेलू लेखों का उपयोग के लिये जाना जाता है।

  • हाल ही में मेघालय सरकार ने ‘अनारक्षित जनजातियों’ (Unrepresented Tribes) को संविधान की छठी अनुसूची ( Sixth Schedule) के प्रावधानों से बाहर करने का निर्णय लिया है।

पाँच अल्पसंख्यक जनजातियों- बोडो-कछारी, हाज़ोंग, कोच, मान तथा राभा को मेघालय की स्वायत्त आदिवासी परिषदों में ‘अनारक्षित जनजातियों’ के रूप में नामांकित किया गया है।

  • चकमा समुदाय(Chakma communit)के 34 छात्रों ने सुरक्षा की कमी के कारण मिज़ोरम स्थित एक जवाहर नवोदय विद्यालय का छात्रावास छोड़ दिया।

मुख्यतः बौद्ध धर्म का अनुयायी यह समुदाय बांग्लादेश में स्थित चटगाँव पहाड़ी क्षेत्रों के स्थानिक हैं। मिज़ोरम के स्थानीय समुदायों और बांग्लादेश से प्रवास करके आए चकमा समुदाय के बीच संघर्ष होता रहता है।

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार,मिज़ोरम की 11 लाख जनसंख्या में से चकमा समुदाय की जनसंख्या लगभग 1 लाख है।

मिज़ो समुदाय से संघर्ष के कारण चकमा समुदाय के बहुत सारे लोग त्रिपुरा के राहत शिविरों में रह रहें हैं। चटगाँव पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले इस समुदाय ने वर्ष 1964-65 में कर्णफुली नदी पर कपाई बांध के विकास की वजह से अपनी ज़मीन खोने और धार्मिक उत्पीड़न (क्योंकि वे गैर-मुस्लिम थे और बंगाली नहीं बोलते थे) के कारण बांग्लादेश (तात्कालिक पूर्वी पाकिस्तान) से भारत में प्रवास किया। चकमा समुदाय ने भारत में शरण मांगी, जिसके बाद भारत सरकार ने उनके लिये अरुणाचल प्रदेश में राहत शिविर स्थापित किये। वर्ष 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने चकमा समुदाय द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र को चकमा समुदाय को नागरिकता देने का निर्देश दिया।

  • दर्द आर्यन-लद्दाख जो कि अपनी उदार परंपराओं के लिये जानी जाती है,को आर्यों का वंशज माना जाता है। कई शोधकर्त्ताओं का मानना है कि 'लद्दाख के आर्य' (Aryans of Ladakh) या 'ब्रोकपास' (Brokpas) सिकंदर (Alexander) की सेना का हिस्सा थे और 2,000 साल पहले इस क्षेत्र में आए थे।
चकमा जनजाति पूर्वोत्तर के कुछ हिस्सों और बांग्लादेश के चटगाँव पहाड़ी इलाकों में पाई जाती है।
भारिया जनजाति-मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा, सिवनी, मण्डला और सरगुजा ज़िले हैं। इस अपेक्षाकृत बड़े भाग में फैली जनजाति का एक छोटा सा समूह छिंदवाड़ा ज़िले के पातालकोट नामक स्थान में सदियों से रह रहा हैं।
  • गालो जनजाति-अरुणाचल प्रदेश की प्रमुख जनजाति है,जो अपनी वंश वृतांत (Genealogical) परंपरा के लिये जाना जाता है। गालो,तिब्बती और मंगोलियाइड वंश से संबंधित हैं। ये मूलतः तिब्बत से प्रवास करके यहाँ आए हैं। अरुणाचल प्रदेश का चौथा बड़ा समुदाय है।

लगभग 1.5 लाख की जनसंख्यावाले इस समुदाय की अरुणाचल प्रदेश के पश्चिम सियांग, लेपा राडा (Lepa Rada), लोअर सिक्यांग, पूर्वी सिक्यांग, ऊपरी सुबनसिरी और नामसाई (Namsai) ज़िलों में बड़ी आबादी है।

असम,अरुणाचल और तिब्बत में निवास करनेवाली,तानी समुदाय से संबंधित है।

दोनों समुदाय आबोतनी (Abotani) तथा पेडोंग नेने (Pedong Nene) को अपना पूर्वज मानते हैं। गालो जनजाति अपने पूर्वजों के नाम को आने वाली पीढ़ियों के नाम से जोड़ती है जैसे पिता का नाम पुत्र के नाम से पूर्व लगता है एवं पिता के पूर्वजों का नाम उसके बाद लगाया जाता है। यह समुदाय की आजीविका का प्रमुख स्रोत कृषि है। इस जनजाति की महिलाएँ कृषि अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। आदि भाषा (Adi language) में इस कबीले या बहिर्जात समूह को ओपिन (Opins) और अल्ट (Alt) कहा जाता है। गालो समुदाय में सभी अनुष्ठान संस्कार न्यीबो (पुजारी) नामक एक वर्ग द्वारा करवाया जाता है। सैद्धांतिक तौर पर किसी महिला के न्यीबो (Nyibo) बनने पर कोई प्रतिबंध नहीं है लेकिन सामान्यतः किसी महिला के पुजारी बनने के कोई उदाहरण नहीं हैं। संविधान आदेश, 1950, भाग- XVIII में संशोधन के अनुसार गालो समुदाय को अनुसूचित जनजाति (ST) के रूप में मान्यता दी गई है। मोपिन इनका प्रमुख त्योहार है जो गाँवों की समृद्धि के लिये मनाया जाता है। गालो जनजाति के लोग पोपिर नृत्य करते हैं।

  1. अरुणाचल प्रदेश की अन्य जनजातियाँ
  2. मिशिंग (Mising)
  3. आदी (Adi)
  4. अपतानी (Apatani)
  5. निशि (Nyishi)
  6. तागिन (Tagin)


तिवा जनजाति (लालुंग) असम और मेघालय राज्य की पहाड़ियों और मैदानों में निवास करती है। इसे असम राज्य में अनुसूचित जनजाति के रूप में मान्यता प्राप्त है। यह जनजाति अप्रैल के महीने में फसलों की कटाई के पश्चात् खेचवा त्योहार मनाती है। पहाड़ी तिवा के ग्रामीण झूम कृषि एवं बागवानी करते हैं साथ ही सब्जियाँ भी उगाते हैं। इस जनजाति के लोग तिब्बती-बर्मन भाषा बोलते हैं।


हाल ही में 4,700 कोनयाक नगा महिलाओं ने विश्व रिकॉर्ड बनाने के लिये एक साथ नृत्य किया। वसंत ऋतु के प्रारंभ में स्वागत के रूप में प्रत्येक वर्ष 1 से 3 अप्रैल के बीच कोनयाक जनजाति द्वारा यह डांस आयोजित किया जाता है। इनका रंगीन पारंपरिक परिधान में नृत्य करना ही इस नृत्य की विशेषता है।[१] यह नृत्य नागालैण्ड क्षेत्र के सबसे आक्रमक समुदाय ‘कोनयाक’ द्वारा आयोजित किया जाता है। कोनयाक जनजाति,16 नगा जनजातियों में से एक है और इस समुदाय के लोग मुख्य रूप से नगालैंड के मोन ज़िले में रहते हैं। यह जनजाति पूर्वोत्तर भारत के नागालैंड राज्य के नगा समुदाय का एक प्रमुख उप समुदाय है। यह समुदाय सभी नगा शाखाओं में सबसे बड़ा माना जाता है। कोनयाक अपने चहरे पर गोदाई की स्याही से पहचाने जा सकते हैं।

तेलंगाना के आदिलाबाद ज़िले में निवास करनेवाली कोलम आदिवासी समुदाय[सम्पादन]

ये महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ एवं मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में भी निवास करते हैं। इनकी भाषा गोंडी (गोंड समुदाय की भाषा) से मिलती जुलती है। यह एक विवाह में विश्वास रखते हैं एवं इसके लिये डंडारी-घुसाड़ी नृत्य उत्सव आयोजित करते हैं। इस नृत्य उत्सव में अविवाहित लड़की एवं लड़का अपने लिये वर एवं वधू चुनते हैं। 2018 में सरकार ने महाराष्ट्र राज्य में कटकारिया (कठोडिया), कोलम और मारिया गोंड को विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूह (Particularly Vulnerable Tribal Groups- PVTGs) के रूप में चिह्नित किया है। PVTGs जनजातीय कार्य मंत्रालय “विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूहों (पी.वी.टी.जी.) का विकास” योजना कार्यान्वित करता है, जो विशेष रूप से उनके लिये ही है। इस योजना के तहत प्रत्येक राज्य/संघ राज्य-क्षेत्र द्वारा उनकी आवश्यकता के आकलन के आधार पर अपने पीवीटीजी के लिये संरक्षण-सह-विकास (सी.सी.डी.)/वार्षिक योजनाएँ तैयार की जाती हैं। तत्पश्चात् मंत्रालय की परियोजना आकलन समिति द्वारा आकलन तथा अनुमोदन किया जाता है। पीवीटीजी के विकास के लिये शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका एवं कौशल विकास, कृषि विकास, आवास तथा अधिवास, संस्कृति का संरक्षण आदि क्षेत्रों में क्रियाकलाप किये जाते हैं।

  • तेलंगाना के दूरदराज़ के क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी कलाकारों द्वारा बनाई गई पेंटिंग्स/चित्रों को पहली बार वैश्विक ई-कॉमर्स बाज़ार अमेज़न द्वारा वैश्विक मंच प्रदान किया गया।
  • आदिवासी कलाकारों की सभी पेंटिंग्स में सरलता, अद्वितीय पैटर्न और प्रकृति से प्रेरित संदर्भ प्रदर्शित हैं।
  • गोंड पेंटिंग्स (Gond Paintings) में चमकीले रंगों और जटिल रेखाओं का उपयोग किया जाता है।
  • इस चित्रकला में ज़्यादातर पक्षियों और जानवरों जैसे- बैल, घोड़े, हिरन, मोर इत्यादि की आकृतियों से पेड़-पौधों को उगते हुए दर्शाया जाता है।

अपतानी जनजाति(APATANI TRIBE)[सम्पादन]

अपतानी पूर्वी हिमालय के प्रमुख जनजातीय समूहों में से एक है। येजनजाति अरुणाचल प्रदेश के लोअर सुबनसिरी के जीरो वैली में निवास करती है। अपतानी जनजाति के लोग एक अलग धर्म, दोन्यी पोलो, का पालन करते हैं। इसमें यह सूर्य एवं चाँद की पूजा करते हैं और अपने पारंपरिक देवताओं को खुश करने के लिए जानवरों की बलि चढ़ाते हैं। इनकी एक अलग भाषा भी है, जिसे ‘तानी’ या ‘अपतानी’ के नाम से जाना जाता है। यह सीनो-तिब्बती समूह की भाषा है। द फर्स्ट पीपल्स कल्चरल कौंसिल (The First Peoples’ Cultural Council) एवं हवाई यूनिवर्सिटी की Endangered Languages Catalogue/ (ELCat) टीम द्वारा चलाए जा रहे प्रोजेक्ट ‘Endangered Languages Project’ के अंतर्गत इस भाषा को ‘VULNERABLE’ की श्रेणी में रखा गया है। इस जनजाति के लोगों को विभिन्न रोगों के इलाज में प्रयुक्त होने वाली जड़ी-बूटियों एवं प्राकृतिक औषधियों की अच्छी जानकारी होती है। ‘ड्री’ और ‘म्योको’ इनके प्रमुख त्योहार हैं। ड्री एक कृषि पर्व है जबकि म्योको, दोस्ती और भाईचारे के लिए मनाया जाता है। ये लोग मुख्यतः चावल की खेती जानवरों व मशीनों के प्रयोग के बिना करते हैं। अपनी ‘अत्यंत उच्च उत्पादकता’ और पारिस्थितिकी को संरक्षित करने के ‘अनोखे’ तरीके के लिए ‘अपतानी घाटी’ विश्व धरोहर स्थल के रूप में शामिल करने के लिए प्रस्तावित है।

मध्य प्रदेश में आदिवासी समुदाय के परंपरागत पर्व भगोरिया महोत्सव की शुरुआत 14 मार्च से हुई। होली के सात दिन पहले साप्ताहिक हाटों में इस पर्व की शुरुआत हो जाती है। पारंपरिक भगोरिया महोत्सव में इस क्षेत्र की संस्कृति, परिवेश, रहन-सहन, वेषभूषा, वाद्ययंत्र प्रमुख आकर्षण होते हैं। आदिवासी समुदाय मान्यतानुसार दलिया, खजूर, काकनी, माजक आदि की खरीदारी करते हैं और इसे पर्व की मिठाई कहा जाता है। भगोरिया त्योहार में आदिवासी लोग भागोरादेव की पूजा करते हैं। झाबुआ, धार, अलीराजपुर और खरगोन जैसे क्षेत्रों में यह सबसे पुराने त्योहारों में से एक है।

सन्दर्भ[सम्पादन]

  1. https://navbharattimes.indiatimes.com/state/other-states/other-cities/4700-konyak-naga-tribal-women-danced-to-create-a-world-record/articleshow/68745648.cms