सामान्य अध्ययन२०१९/त्योहार एवं संस्कृति

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प्रमुख त्योहार[सम्पादन]

  • भारत मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार 21 दिसंबर से 30 जनवरी की अवधि [40 दिन की अवधि] को कश्मीर की स्थानीय भाषा में चिल्ले/चिल्लाई- कलां कहा जाता है।

21 दिसंबर का दिन उत्तरी गोलार्द्ध में शीतकालीन संक्रांति के रुप में मनाया जाता है। इन 40 दिनों में बर्फबारी की संभावना सबसे अधिक होती है और तापमान में अधिकतम गिरावट होती है अर्थात यह लगभग शून्य डिग्री के नीचे या उसके आस- पास आ जाता है। इन 40 दिनों के बाद शीत लहर जारी रहती है इसलिए चिल्ले/चिल्लाई- कलां के बाद 20 दिन चिल्ले/चिल्लाई- खुर्द (Chillai Khurd) तथा उसके बाद के 10 दिन चिल्ले/चिल्लाई- बच्चा (Chillai Baccha) के नाम से जाना जाता है।

  • नगालैंड राज्य के स्थापना दिवस (1 दिसंबर,1963)के अवसर पर हर साल 10 दिवसीय हॉर्नबिल महोत्सव का आयोजन किया जाता है।

इस बार आयोजित 20वें हॉर्नबिल महोत्सव में सिंगल यूज़ प्लास्टिक (Single Use Plastic) पर प्रतिबंध है। हॉर्नबिल पक्षी के नाम पर इस महोत्सव का नामकरण किया गया है तथा इस महोत्सव की शुरुआत वर्ष 2000 में की गई थी। इस उत्सव का आयोजन राज्य पर्यटन और कला एवं संस्कृति विभागद्वारा किया जाता है। यह सांस्कृतिक महोत्सव नृत्य,संगीत और पारंपरिक भोजन के साथ-साथ वर्षों से अपनाई गई नगा समुदाय की समृद्ध संस्कृति एवं परंपराओं का कलात्मक प्रदर्शन है, जो कि नगा समाज की विविधताओं को प्रदर्शित करता है। इसे ‘त्योहारों का त्योहार’ भी कहा जाता है। इस महोत्सव का उद्देश्य नगालैंड की समृद्ध संस्कृति को पुनर्जीवित करने तथा सुरक्षा प्रदान करने के साथ-साथ इसकी परंपराओं को प्रदर्शित करना है।

  • ‘ब्रह्मपुत्र पुष्करम उत्सव’ का आयोजन असम राज्य में 5 से 16 नवंबर तक [12 दिवसीय नदी उत्सव] किया गया।

सर्वप्रथम वर्ष 2018 में तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले में तामिरापर्णी के तट पर पुष्करम उत्सव मनाया गया था। पुष्करम उत्सव नदियों का एक उत्सव है जो भारत की 12 महत्त्वपूर्ण नदियों से संबंधित है।

नमामि ब्रह्मपुत्र उत्सव के बाद यह असम का दूसरा सबसे बड़ा उत्सव है।

ब्रह्मपुत्र नदी की सौंदर्यता को नमामि ब्रह्मपुत्र उत्सव के रुप में प्रदर्शित किया जाता है। जिसका आयोजन असम सरकार द्वारा किया जाता है। यह पाँच दिवसीय उत्सव है जिसमें असम की कला, विरासत और संस्कृति को प्रदर्शित किया जाता है।

  • भीमली उत्सव-2019 आंध्रप्रदेश में विशाखापट्टनम ज़िले के भीमुनिपत्तनम में दो दिनों तक मनाया जाता है। बैलगाड़ी दौड़ इस उत्सव का मुख्य आकर्षण है।

उत्सव के दौरान लोक कलाकारों और मछुआरों द्वारा पारंपरिक नृत्य 'पुली वेशलु' (Puli Veshalu) का आयोजन किया गया।

  • तवांग महोत्सव (Tawang Festival)अक्टूबर में अरुणाचल प्रदेश में तवांग महोत्सव संपन्न हुआ।

अरुणाचल प्रदेश के इस वार्षिक उत्सव की शुरुआत वर्ष 2012 में की गई थी। महोत्सव में अरुणाचल प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत जिसमें बौद्ध धर्म से जुड़े कार्यक्रम,पारंपरिक नृत्य,देशी खेल,फिल्में और वृत्तचित्र (Documentaries)आदि का प्रदर्शन किया जाता है। इसकी शुरुआत एक धार्मिक परंपरा सेबंग (Sebung) से की जाती है जिसके अंतर्गत भिक्षुओं को रैलियों के रूप में तवांग मठ से तवांग शहर के उत्सव स्थल तक जाना होता है। महोत्सव का मुख्य आकर्षण याक नृत्य और अजी-लामू नृत्य हैं।

  • चवांग कुट महोत्सव (Chavang Kut Festival) प्रत्येक वर्ष मणिपुर,मिज़ोरम,असम तथा देश के अन्य हिस्सों में प्रचुर मात्रा में फसल की उपज के लिये कृतज्ञता प्रकट करने हेतु मनाया जाता है।
एंग्लो-कूकी युद्ध की शताब्दी वर्ष का प्रतीक यह महोत्सव फसल कटाई के उपलक्ष्य में कूकी-चिन-मिज़ो समुदाय द्वारा मनाया जाता है।
मणिपुर में इस दिन राजकीय अवकाश होता है।
मिज़ोरम में इस वर्ष यह महोत्सव तीसरी बार मनाया गया।

महोत्सव के दौरान चिन-कूकी-मिज़ो आदिवासी समूह द्वारा पारंपरिक सामाजिक कार्यक्रमों का प्रदर्शन, पारंपरिक संगीत और भोजन आदि कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।

  • छत्तीसगढ़ राज्य में गौरा-गौरी उत्सव (Gaura-Gauri festival)28 अक्टूबर को धूमधाम से मनाया गया।
यह उत्सव दीपावली के अगले दिन मनाया जाता है जहाँ गौरा का तात्पर्य भगवान् शिव से तथा गौरी का तात्पर्य पार्वती से होता है।
इस उत्सव के दौरान छत्तीसगढ़ के लोगों के ग्रामीण जीवन को दर्शाया जाता है।[१]
इसमें लोक नृत्यों के रूप में गेडी,कर्मा,सुआ, राउत नाचा, पंथी नृत्य और गौरी गौरा आदि का प्रदर्शन किया जाता है।

उत्सव के दौरान लोक गीतों की प्रस्तुति के लिये पारंपरिक वाद्ययंत्र जैसे झांझर, मंदर और गुदुम बाजा आदि का प्रयोग किया जाता है। छत्तीसगढ़ राज्य के सुरती, हरेली, पोला और तीजा आदि कुछ अन्य त्योहार हैं।

  • बथुकम्मा, तेलंगाना राज्य का त्यौहार है और यह त्योहार राज्य की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है।

यह ‘फूलों का त्यौहार’ (Festival Of Flowers) है। जिसे पारंपरिक रूप से राज्य की महिलाओं द्वारा मनाया जाता है। इस त्यौहार में 'गुनुका पूलू' और 'तांगेदु पूलू' जैसे फूलों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त बांटी, केमंती और नंदी-वर्द्धनम जैसे अन्य फूलों का भी प्रयोग किया जाता है। यह त्यौहार प्रत्येक वर्ष हिंदू कैलेंडर के तेलुगु संस्करण के अनुसार भाद्रपद अमावस्या को शुरू होता है जो नवरात्रि के नौ दिनों तक चलता है। महिलाएँ पूरे सप्ताह छोटे-छोटे बथुकम्मा बनाती हैं, प्रत्येक शाम उनके चारों ओर खेलती हैं और उन्हें पास के पानी के तालाब में विसर्जित कर देते हैं। बथुकम्मा तेलंगाना का राज्य त्यौहार है। तेलुगु में बथुकम्मा का अर्थ साक्षात् मातृ देवी को बुलाना है।

  • लद्दाख महोत्सव(Ladakh Festival) हर साल लेह और उसके आसपास के गांवों में मनाया जाता है।

एक सप्ताह तक मनाये जानेवाले इस त्योहार में तीरंदाजी, पोलो और मुखौटा नृत्य को शामिल किया जाता है। इसके अंतर्गत गांवों के सांस्कृतिक मंडलियों द्वारा किये जाने वाले नृत्य भी शामिल होते हैं।

  • छाम नृत्य लद्दाख का एक प्रसिद्ध मुखौटा नृत्य है जो इस त्योहार का प्रमुख आकर्षण है।

यह नृत्य त्सुचू त्यौहार (Tsechu Festival) पर भी किया जाता है जो लद्दाख के कई मठों में किया जाने वाला एक वार्षिक आध्यात्मिक त्यौहार है। यह नृत्य देखने वाले लोगों के लिये बहुत सौभाग्यशाली माना जाता है। यह नृत्य बौद्ध संस्कृति से प्रभावित है। इस नृत्य में सामान्यतः पारंपरिक तिब्बती वाद्ययंत्रों का उपयोग करते हुए भिक्षुओं द्वारा संगीत के साथ नृत्य किया जाता है।

  • आदि महोत्सवलेह-लद्दाख में 17 से 25 अगस्त, 2019 तक जनजातीय कार्य मंत्रालय भारत सरकार और भारतीय जनजातीय सहकारी विपणन विकास संघ (ट्राइफेड) की ओर से किया गया।

इस महोत्सव का विषय ‘जनजातीय कला, संस्कृति और वाणिज्य की भावना का उत्सव’ है। इसमें ट्राइफेड ‘सेवा प्रदाता’ एवं ‘मार्केट डेवलपर’ की भूमिका निभाएगा। इस महोत्सव में देश भर के 20 से ज्यादा राज्यों के लगभग 160 जनजातीय कारीगर सक्रिय रूप से भाग लेंगे और अपनी उत्कृष्ट कारीगरी का प्रदर्शन करेंगे। इस दौरान प्रदर्शित किए जाने वाले उत्पादों में राजस्थान, महाराष्ट्र, ओड़िशा, पश्चिम बंगाल के जनजातीय वस्त्र; हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश और पूर्वोत्तर के जनजातीय आभूषण; मध्य प्रदेश की गोंड चित्रकला जैसी जनजातीय चित्रकारी; महाराष्ट्र की वर्ली कला, छत्तीसगढ़ की धातु शिल्प, मणिपुर की ब्लैक पॉट्ररी और उत्तराखंड, मध्य प्रदेश और कर्नाटक के ऑर्गेनिक उत्पाद शामिल हैं। इस आयोजन के दौरान दो प्रतिष्ठत स्थानीय सांस्कृतिक समूह लद्दाखीलोक नृत्य- जाबरो नृत्य और स्पाओ नृत्य प्रस्तुत करेंगे। इस महोत्सव के दौरान (क) जनजातीय कार्य मंत्रालय की वन धन योजना के अंतर्गत मूल्यवर्द्धन और विपणन योग्य खाद्य एवं वन उत्पादों और (ख) ट्राइब्स इंडिया के आपूर्तिकर्ताओं के रूप में पैनल में शामिल कारीगर और शिल्पकार तथा लद्दाख की महिलाओं की पहचान की जाएगी। इन उत्पादों को देश भर में ट्राइब्स इंडिया द्वारा संचालित 104 खुदरा दुकानों और दुनिया भर के 190 देशों में एमेजॉन के माध्यम से बेचा जाएगा, जिसके साथ ट्राइब्स इंडिया का करार है।


महेश रथ यात्रा 4 जुलाई 2019 पश्चिम बंगाल के हुगली ज़िले में इसके 623वें संस्करण का आयोजन किया गया। यह पश्चिम बंगाल की सबसे पुरानी रथ यात्रा है, जिसे वर्ष 1396 से पुरी रथ यात्रा के रूप में मनाया जाता है। यह हुगली ज़िले के श्रीरामपुर में आयोजित होने वाली महेश रथ यात्रा है, जिसे दुनिया का दूसरा सबसे पुराना रथ उत्सव कहा जाता है।

किंवदंतियों के अनुसार, एक बार बंगाली साधु द्रुबानंद ब्रह्मचारी (Drubananda Brahmachari) को भगवान जगन्नाथ को भोग चढ़ाने से रोक दिया गया जिससे आहत होकर उन्होंने उपवास शुरू कर दिया, उपवास के तीसरे दिन स्वयं भगवान् जगन्नाथ ने उनके स्वप्न में आकर डारू-ब्रह्मा (नीम के तने) से बलराम, जगन्नाथ एवं सुभद्रा की मूर्तियाँ बनाने का निर्देश दिया। भगवान के निर्देश का पालन करते हुए द्रुबानंद ब्रह्मचारी ने महेश में नीम के तने से मूर्तियाँ बनाईं।

फलस्वरूप महेश के द्रुबानंद मंदिर की स्थापना हुई। चैतन्य महाप्रभु ने भी महेश को नब नीलाचल (नई पुरी) के रूप में संबोधित किया था।

जगन्नाथ रथ यात्रा (पुरी) प्रत्येक वर्ष आषाढ़ में शुक्ल पक्ष की द्वितीया को मनाया जाता है और इस दौरान हर साल बारिश होती है।14 जुलाई, 2019 को आयोजित इस त्योहार मंदिर के तीनों देवता (जगन्नाथ, सुभद्रा और बलभद्र) इस त्योहार के दौरान तीन अलग-अलग रथों में यात्रा करते हैं। यही कारण है कि इसे रथों का त्योहार भी कहा जाता है। जगन्नाथ, सुभद्रा और बलभद्र के रथों को क्रमशः नंदीघोष (Nandighosha), तलध्वज (Taladhwaja) और देवदलना (Devadalana) कहा जाता है। तीनों देवताओं के लिये प्रत्येक वर्ष नए रथों का निर्माण किया जाता है।प्रत्येक रथ में लकड़ी के चार घोड़े जुड़े होते हैं।


अंबुबाची मेला 22 से 26 जून तक पांच दिवसीय यह त्योहार गुवाहाटी (असम) के नीलाचल पहाड़ियों पर स्थित कामाख्या मंदिर(51 शक्तिपीठों में से एक)में वार्षिक रूप से आयोजित किया जाता है। इस मेले का आयोजन देवी की रजस्वला अवधि के दौरान किया जाता है।देवी कामख्या को सिद्ध कुबजिका के रूप में भी जाना जाता है। इनकी पहचान काली और महा त्रिपुर सुंदरी के रूप में भी है। इसे पूर्व का 'महाकुंभ' भी कहा जाता है,क्योंकि यह दुनिया भर से लाखों भक्तों को आकर्षित करता है।देवी कामाख्या की प्रजनन क्षमता का प्रतीक यह मेला मासिक धर्म स्वच्छता के बारे में जागरूकता को बढ़ावा देने का भी एक अवसर है। रजस्वला के समय को अनुष्ठान के रूप में मनाने के कारण भारत के अन्य हिस्सों की तुलना में असम में मासिक धर्म से जुड़ी वर्जनाएँ कम हैं। असम में लड़कियों को नारीत्व की प्राप्ति को भी उत्सव/रस्म के रूप में मनाया जाता है जिसे 'तुलोनी ब्या' कहा जाता है, इसका अर्थ है छोटी शादी।

खीर भवानी मेला’का आयोजन जम्मू-कश्मीर के गांदरबल ज़िले में खीर भवानी मंदिर में ज्येष्ठ अष्टमी(वसंत ऋतु में) पर वार्षिक उत्सव के रूप में किया जाता है। कश्मीर के पंडितों और मुसलमानों के बीच संबंधों में तेज़ी से सुधार लाने का माध्यम बनकर उभर रहा है।एक पवित्र झरने पर निर्मित देवी खीर भवानी (मूल रूप से सिर्फ भवानी) को समर्पित यह मंदिर श्रीनगर से 14 मील की दूरी पर तुलमूल गाँव के पास स्थित है। खीर भवानी देवी की पूजा लगभग सभी कश्मीरी हिन्दू करते हैं।

‘वलसा देवरालु’ आंध्र प्रदेश के चित्तूर ज़िले में मनाया जाने वाला सदियों पुराना एक त्योहार है। यह एक पारंपरिक अनुष्ठान (कुछ लोगों के अनुसार एक ‘त्योहार’) है जिसकी शुरुआत सम्राट श्रीकृष्ण देवरयालु या कृष्ण देवराय के शासन काल में हुई थी। ग्रामीण इलाकों में सूखे की स्थिति का सामना करने के लिये यह तब मनाया जाता है जब बुआई के लिये कुछ ही हफ्ते शेष बचे हों।


13 मई 2019 से केरल का प्रसिद्ध उत्सव त्रिशूर पूरम आरंभ हुआ।इसे लगातार 36 घंटे तक मनाया जाता है। यह वल्लुनावाडु क्षेत्र में स्थित देवी दुर्गा और भगवान शिव को समर्पित है। केरल स्थित दस मंदिरों को शामिल करके इस उत्सव को मनाया जाता है । उत्सव में 30 हाथियों को पूरी साज-सज्जा के साथ शामिल किया जाता है। इसकी शुरुआत शक्थान थम्पूरन द्वारा की गई थी।


तिरुपति गंगा जात्रा, तिरुपति, आंध्र प्रदेश का वार्षिक लोक उत्सव है। यह उत्सव एक सप्ताह तक चलता है जो हर साल मई के पहले और दूसरे सप्ताह के बीच आता है। इस उत्सव में तिरुपति की देवी गंगम्मा, ग्रामदेवता (गाँव की देखरेख करने वाली देवी) की पूजा अर्चना की जाती है। तिरुपति बालाजी मंदिर की शुरुआत वैष्णववाद में हुई है, जो समानता और प्रेम के सिद्धांतों की वकालत तथा बलि देने की प्रथा को प्रतिबंधित करता है। पवित्र गर्भगृह (जिसमें सात पहाड़ियों के भगवान की विस्मयकारी मूर्ति है) तिरुमाला के मुख्य मंदिर परिसर में स्थित है। श्री वेंकटेश्वर का प्राचीन और पवित्र मंदिर शेषाचलम पर्वतमाला के सातवें शिखर, वेंकटचला (वेंकट पहाड़ी) और श्री स्वामी पुष्करिणी के दक्षिणी तट पर स्थित है।


ईसा मसीह के दोबारा जीवित होने की खुशी के अवसर पर ईस्टर (Easter) मनाया जाता है। यह ईसाई धर्म का दूसरा सबसे बड़ा त्योहार है, जो गुड फ्राइडे के बाद आने वाले रविवार को मनाया जाता है। इस साल ईस्टर 21 अप्रैल को मनाया गया। इसे Date Sunday भी कहते हैं। यह त्योहार जीवन में बदलाव के प्रतीक रूप में मनाया जाता है। 'ईस्टर' शब्द जर्मन के ईओस्टर शब्द से लिया गया है, जिसका अर्थ है 'देवी'। यह वसंत की देवी मानी जाती थी। मान्यता के अनुसार सलीब (Cross) पर लटकाए जाने के तीसरे दिन यानी ईस्टर के दिन ईसा मसीह फिर से जीवित हो गए थे और इसके बाद 40 दिन तक अपने शिष्यों और दोस्तों के साथ रहे और अंत में स्वर्ग चले गए। अनुयायियों ने प्रभु यीशु के पुनः जीवित होने को ईस्टर घोषित कर दिया। ईस्टर पर सजी हुई मोमबत्तियाँ अपने घरों में जलाने और दोस्तों को बाँटने की भी परंपरा है। ईसाई धर्म को मानने वाले इस दिन व्रत रखते हैं और अपने घरों में रंगीन अंडे (Easter Egg) छिपा देते हैं ताकि सुबह बच्चे उन्हें ढूंढ सकें।

  • गरिया पूजा (Garia Puja) त्रिपुरा का एक प्रमुख त्योहार है।हिंदू कैलेंडर के अनुसार, यह पर्व चैत्र माह के अंतिम दिन से लेकर वैशाख महीने के सातवें दिन तक आयोजित किया जाता है।

त्रिपुरी और रियांग जनजातियाँ इसे फसल के त्योहार के रूप में मनाती हैं। इस त्योहार में एक बाँस के खंभे की फूलों और मालाओं से पूजा की जाती है जो कि भगवान गरिया का प्रतीक होता है।

  • 'वसंतोत्सवम'आंध्र प्रदेश के तिरुमाला में भगवान वेंकटेश्वर के मंदिर में आयोजित वार्षिक त्योहार।प्रतिवर्ष चैत्र (मार्च/अप्रैल) के महीने में 3 दिनों त्रयोदशी,चतुर्दशी और पूर्णमी तक वसंतोत्सवम मनाया जाता है।ऐसा माना जाता है कि 1460 में राजा अच्युतराय ने वसंत ऋतु के आगमन को चिह्नित करने के लिये इस उत्सव की शुरुआत की थी।
  • वसंतोत्सवम 2 शब्दों ‘वसंत’ (संस्कृत में वसंत का मौसम) और ‘उत्सवम’ (संस्कृत में त्योहार) से मिलकर बना है।

हाल ही में ‘उगादि,गुड़ी पड़वा चैत्र सुकलादि और चेटी चंद’ पर्व का शुभारंभ हुआ।[सम्पादन]

  • गुड़ी पड़वा महाराष्ट्र में नव वर्ष के आगमन के उपलक्ष्य मनाया जाता है।इसी दिन चैत्र नवरात्रि का प्रारम्भ होता है।
  • उगादी या फिर जिसे समवत्सरदी युगादी के नाम से भी जाना जाता है दक्षिण भारत का एक प्रमुख पर्व है। इसे कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगानाजैसे राज्यों में यह पर्व चैत्र माह के पहले दिन मनाया
  • जाता है। ग्रागेरियन कैलेंडर के हिसाब से यह पर्व मार्च या अप्रैल में आता है। दक्षिण भारत में इस पर्व को काफी धूम-धाम के साथ मनाया जाता है क्योंकि वसंत आगमन के साथ ही किसानों के लिए यह पर्व नयी फसल के आगमन का भी अवसर होता है।[२]
  • एक मान्यता के अनुसार शिवजी ने ब्रम्हा जी को श्राप दिया था कि कही भीं उनकी पूजा नही कि जायेगी,लेकिन आंध्रप्रदेश में उगादी अवसर पर ब्रम्हाजी की ही पूजा की जाती है। ऐसा इसलिए क्योंकि ऐसी मान्यता है कि इसी दिन ब्रम्हा जी ब्रह्माण्ड की रचना शुरु की थी।
  • इसी कारण इस दिन को कन्नड़ तथा तेलगु नववर्ष के रुप में भी मनाया जाता है। इसके साथ ही पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु मतस्य अवतार में अवतरित हुए थे।
  • उगादी को लेकर कई सारे ऐतहासिक तथा पौराणिक वर्णन मिलते हैं। ऐसा माना जाता है कि उगादि के दिन ही भगवान श्री राम का राज्याभिषेक भी हुआ था। इसके साथ ही इसी दिन सम्राट विक्रमादित्य ने शकों पर विजय प्राप्त की थी।[३]
  • इस दिन एक विशेष पेय बनाने की भी प्रथा है, जिसे पच्चड़ी नाम से जाना जाता है। पच्चड़ी नामक यह पेय नई इमली, आम, नारियल, नीम के फूल, गुड़ जैसे चीजों को मिलाकर मटके में बनायी जाती है।
  • चेटीचंदसिंधी समाज अपने इष्टदेव भगवान झूलेलाल की जंयती को चेटीचंड के रूप में तथा सिंधी नववर्ष के रूप में मनाता है। चेटी चंड हिंदू कैलेंडर के अनुसार नवरात्रि के दूसरे दिन अर्थात चैत्र शुक्ल द्वितीया को मनाया जाता है। सिंधी समाज में मान्यता है कि जल से ही सभी सुखों और मंगलकामना की प्राप्ति होती है इसलिए इसका विशेष महत्व है।
  • 7 अप्रैल 2019 को झूलेलाल जयंती मनाई गई। हिंदू पंचांग के अनुसार झूलेलाल जयंती चैत्र मास की द्वितीया तिथि को मनाई जाती है। झूलेलाल भगवान वरुणदेव के अवतार है। [४]
  • मान्यता-सिंधी समाज के अनुसार सिंधु प्रांत में मिरखशाह नामक शासक राज करता था उसके द्वारा अत्याचार से तंग आकर,सिंधी समाज ने 40 दिनों तक कठिन साधना की थी। तब सिंधु नदी में से भगवान झूलेलाल प्रकट हुए और कहा मैं 40 दिन बाद जन्म लेकर मिरखशाह के अत्याचारों से प्रजा को मुक्ति दिलाउंगा।चैत्र माह की द्वितीया तिथि को एक बालक ने जन्म लिया जिसका नाम उडेरोलाल रखा गया।
  • ओडिशा के बेरहामपुर में द्विवार्षिक ठकुरानी जात्रा उत्सव के जश्न का आयोजन 29 मार्च से 29अप्रैल तक होगा।
  • 32 दिनों तक चलने वाले इस त्योहार के दौरान देवी बुद्धी ठकुरानी को ठकुरानी मंदिर स्ट्रीट के मुख्य मंदिर से देसी बेहरा स्ट्रीट में उनके अस्थायी निवास स्थान पर ले जाया जाता है, जहाँ वह उत्सव समाप्त होने तक रहती हैं।[५]
  • पहली ठकुरानी यात्रा का आयोजन अप्रैल 1779 में किया गया था।
  • देवी बुद्धी ठकुरानी को डेरा समुदाय (जिसने बेरहामपुर को रेशम शहर के रूप में प्रसिद्धि दिलाई) के नेता देसीबेहरा के परिवार का एक सदस्य माना जाता है।

संस्कृति या स्मारक संबंधी सरकारी प्रयास[सम्पादन]

बंगाल विभाजन Partition of Bengal हाल ही में पश्चिम बंगाल विरासत आयोग (West Bengal Heritage Commission) ने वर्ष 1947 में देश के विभाजन के दौरान हुए बंगाल विभाजन को समर्पित एक संग्रहालय स्थापित करने का प्रस्ताव रखा है।

संग्रहालय में बंगाल विभाजन के ऐतिहासिक तथ्यों तथा उसके प्रभावों को विस्तारपूर्वक प्रदर्शित किया जाएगा। संग्रहालय को अलीपुर जेल में स्थापित किया जाएगा जिसे अब एक विरासत भवन में बदला जा रहा है। वर्ष 1947 में भारत के विभाजन के कारण पाकिस्तान के निर्माण के दौरान बंगाल और पंजाब प्रांतों का विभाजन हुआ। इसने न केवल हिंसा को बढ़ावा दिया बल्कि मानव इतिहास के सबसे बड़े सामूहिक प्रवास का उदाहरण बना। विभाजन के बाद, बंगाल को पूर्वी बंगाल और पश्चिम बंगाल में विभाजित किया गया। पूर्वी बंगाल पाकिस्तान का हिस्सा बन गया और वर्ष 1956 में पूर्वी पाकिस्तान के रूप में इसका नामकरण किया गया। वर्ष 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध (Bangladesh liberation War) के बाद यह बांग्लादेश के रूप में यह एक स्वतंत्र राष्ट्र बना। प्रस्तावित संग्रहालय में विभाजन पर आधारित दस्तावेजों, लेखों, वृत्तचित्रों और फिल्मों का प्रदर्शन किया जाएगा तथा उसके माध्यम से बंगाल विभाजन के कारण तथा उसके प्रभावों को दर्शाया जाएगा।

  • राष्ट्रीय संस्कृति महोत्सव (Rashtriya Sanskriti Mahotsav)

14 से 21 अक्तूबर,2019 तक जबलपुर (मध्य प्रदेश) में संस्कृति मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय संस्कृति महोत्सव के 10 वें संस्करण का उद्घाटन किया गया है। इसका आयोजन एक भारत श्रेष्ठ भारत पहल के अंतर्गत किया जाता है। वर्ष 2015 में इसके प्रथम आयोजन के पश्चात्,अब तक नौ राष्ट्रीय संस्कृति महोत्सव आयोजित किये गए हैं,जिसमें से दिल्ली और कर्नाटक में 2-2 बार, उत्तर प्रदेश, पूर्वोत्तर, गुजरात, मध्यप्रदेश एवं उत्तराखंड में 1-1 बार आयोजन किया गया है। पिछले राष्ट्रीय संस्कृति महोत्सव का आयोजन उत्तराखंड (टिहरी ) में किया गया था। कार्यक्रम: इस कार्यक्रम में कुछ प्रसिद्ध कलाकार प्रतिभाग करेंगे, साथ ही माटी के लाल थीम के साथ स्थानीय कलाकार भी अपनी प्रतिभा/कला का प्रदर्शन करेंगे। राष्ट्रीय संस्कृति महोत्सव 2019 में असम, कर्नाटक, हरियाणा, गुजरात, राजस्थान, गोवा, तमिलनाडु, मणिपुर, केरल, जम्मू-कश्मीर, लेह, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब और पश्चिम बंगाल आदि राज्यों/संघशासित प्रदेशों के कलाकार भारतीय संस्कृति के विभिन्न पहलुओं को प्रदर्शित करेंगे। इसमें भारतीय संस्कृति के विभिन्न पहलुओं जैसे- लोक संगीत, नृत्य, हस्तशिल्प एवं पाक-कला के जरिये भारत की सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित किया जाएगा। उद्देश्य: विभिन्न राज्यों/ संघशासित प्रदेशों के लोगों के बीच सद्भाव को बढ़ाना। देश की विभिन्न संस्कृतियों के लोगों के बीच परस्पर समझ और रिश्तों को बढ़ावा देना। भारत की एकता और अखंडता सुनिश्चित करना। भारतीय विश्व संस्कृति संस्थान(Indian Institute of World Culture- IIWC) अगस्त 2019 में भारतीय विश्व संस्कृति संस्थान (IIWC) ने अपने 75वें वर्ष में कदम रखा।

भारतीय विश्व संस्कृति संस्थान की स्थापना बी.पी. वाडिया ने 11 अगस्त, 1945 को बंगलूरु शहर के बसवनगुड़ी उपनगर में हुई थी। IIWC के पुस्तकालय में विभिन्न विषयों पर लगभग 1.5 लाख पुस्तकें उपलब्ध हैं। इस संस्थान की पत्रिका 'बुलेटिन' नि:शुल्क वितरित की जाती है, जिसमें लेख और महत्त्वपूर्ण घटनाओं सूची होती है। इसके पत्रिका अनुभाग में दुर्लभ संग्रह उपस्थित हैं। पढ़ने के कमरे में 400 पत्रिकायें और 30 समाचार पत्र हैं। यहाँ औसतन 150 कार्यक्रम प्रतिवर्ष आयोजित किये जाते है। कारगिल विजय दिवस Kargil Vijay Diwas 26 जुलाई, 1999 को कारगिल युद्ध (Kargil War) में विजय हासिल करने के उपलक्ष्य में प्रत्येक वर्ष कारगिल विजय दिवस (Kargil Vijay Diwas) मनाया जाता है।इस वर्ष कारगिल विजय दिवस की 20वीं वर्षगाँठ मनाई जा रही है जिसकी थीम 'रिमेंबर, रिजॉइस एंड रिन्यू' (Remember, Rejoice and Renew) है। कारगिल युद्ध को ऑपरेशन विजय के नाम से भी जाना जाता है। भारत और पाकिस्तान के बीच मई से जुलाई 1999 के बीच कश्मीर के कारगिल क्षेत्र में हुए सशस्त्र संघर्ष को ही कारगिल युद्ध (Kargil War) कहा जाता है। यह लगभग 60 दिनों तक चला तथा 26 जुलाई, 1999 को समाप्त हुआ था। इस युद्ध को जीतने के लिये भारतीय सेना ने दुर्गम बाधाओं, दुश्मन के इलाकों, विपरीत मौसम एवं अन्य कठिनाइयों को पार करते हुए विजय प्राप्त की थी। इस युद्ध में भारतीय सेना के बहुत से जवान शहीद और घायल हुए। सेना के अदम्य साहस एवं बलिदान के सम्मान में यह दिवस मनाया जाता है।

एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड ने पंजाब स्थित विरासत-ए-खालसा संग्रहालय में एक दिन में अधिकतम पर्यटकों द्वारा भ्रमण करने के रिकॉर्ड की पुष्टि की है। इस प्रकार यह संग्रहालय एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में एक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर सकता है। यह संग्रहालय पंजाब के आनंदपुर साहिब शहर में स्थित है। पर्यटन और सांस्कृतिक मामलों के विभाग (पंजाब) के अनुसार, इस संग्रहालय में 20 मार्च को 20,569 आगंतुकों का रिकॉर्ड स्तर देखा गया था जो एक दिन में भारतीय उपमहाद्वीप में सबसे अधिक पर्यटकों द्वारा भ्रमण किया जाने वाला संग्रहालय बन गया है। विरासत-ए-खालसा को पंजाब और सिख धर्म के समृद्ध इतिहास तथा संस्कृति के स्मरण के लिये बनाया गया था जिसका उद्घाटन नवंबर 2011 में किया गया था। प्रतिदिन औसतन 5,000-6,000 आगंतुक इस संग्रहालय में आते हैं, जो अन्य सभी संग्रहालयों के दर्शकों के सापेक्ष सबसे अधिक संख्या है। आदर्श स्मारक योजना हाल ही में केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय (Union Ministry of Culture) ने अपना 100 दिवसीय एजेंडा जारी किया है जिसमें आदर्श स्मारक योजना के तहत शामिल 100 से अधिक प्रमुख स्मारकों के आस-पास वर्षा जल संचयन हेतु गड्ढों की खुदाई करना भी शामिल है।

अन्य पहलों में दो दर्ज़न स्थानों, जहाँ बड़ी संख्या में भक्त प्रार्थना अथवा आरती के लिये एकत्रित होते हैं, पर बड़ी स्क्रीन और ऑडियो सिस्टम स्थापित करना तथा ग्रामीण छात्रों तक पहुँच स्थापित करने के लिये के 25 चलते-फिरते विज्ञान संग्रहालयों (Science Museum on Wheels) को शुरू करना शामिल है। योजना के बारे में इस योजना की शुरुआत वर्ष 2014 में ऐतिहासिक स्मारकों में आगंतुकों (मुख्यतः शारीरिक रूप से अक्षम लोग) को बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध कराने लिये की गई थी।

यह योजना संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत आती है। भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण ( Archaeological Survey of India-ASI) द्वारा संरक्षित कुल 100 स्मारकों को इस योजना के तहत आदर्श स्मारक के रूप में विकसित किया जा रहा है। इन स्थलों पर नागरिक सुविधाओं में वृद्धि का प्रयास किया जा रहा है। उद्देश्य: स्‍मारकों को पर्यटक अनुकूल बनाना। प्रसाधन कक्ष, पेय जल, कैफेटेरिया और वाई-फाई सुविधाएँ उपलब्ध कराना और यदि ये सुविधाएँ पहले से ही मौजूद हैं तो उन्हें अपग्रेड करना। व्‍याख्‍यान और ऑडियो-वीडियो केंद्रों की व्‍यवस्‍था की करना। गंदे पानी और अपशिष्टों के निस्‍तारण एवं रेन वाटर हार्वेस्टिंग प्रणाली की व्‍यवस्‍था करना। स्‍मारकों को दिव्यांगों के अनुकूल बनाना। स्‍वच्‍छ भारत अभियान को कार्यान्‍वनित करना।

कारगिल विजय दिवस Kargil Vijay Diwas वर्ष 2019 ऑपरेशन विजय की सफल परिणति की 20वीं वर्षगाँठ है, जिसमें भारतीय सेना के बहादुर जवानों ने कारगिल युद्ध में विजय प्राप्त की थी। कारगिल विजय दिवस की 20वीं वर्षगाँठ की थीम 'रिमेंबर, रिजॉइस एंड रिन्यू' (‘Remember, Rejoice and Renew’) को जीवंत करती है। इस युद्ध को जीतने के लिये सेना ने दुर्गम बाधाओं, दुश्मन के इलाकों, विपरीत मौसम एवं अन्य कठिनाइयों को पार करते हुए दुश्मन के नापाक इरादों को नाकाम कर दिया था। राष्ट्रीय युद्ध स्मारक, नई दिल्ली से कारगिल युद्ध स्मारक, द्रास तक एक विजय मशाल की यात्रा (रिले) निकाली जाएगी। विजय मशाल कारगिल युद्ध के शहीदों के बलिदान का प्रतीक है। यह मशाल यात्रा भारतीय सेना के उत्कृष्ट खिलाड़ियों और युद्ध नायकों के संचालन में उत्तर भारत के नौ प्रमुख कस्बों एवं शहरों से होते हुए अंत में 26 जुलाई, 2019 को द्रास स्थित कारगिल युद्ध स्मारक पर समाप्त होगी। विजय मशाल विजय मशाल का डिज़ाइन भारतीय सेना में मातृभूमि के लिये सर्वोच्च बलिदान देने वाले अमर सैनिकों के धैर्य, हिम्मत और गौरव से प्रेरित है। मशाल तांबे, पीतल और लकड़ी से बनी है जो हमारे बहादुर नायकों के तप एवं दृढ़ संकल्प का प्रतीक है। मशाल के ऊपरी हिस्से में धातु की अमर जवान नक्काशी है, जो शहीद सैनिकों का प्रतीक है। मशाल के लकड़ी वाले निचले हिस्से में अमर जवान के 20 स्वर्ण शिलालेख हैं जो कारगिल विजय के 20 गौरवशाली वर्षों को दर्शाते हैं।

केंद्रीय लोक निर्माण विभाग ने तीन मूर्ति भवन परिसर में ‘भारत के प्रधानमंत्रियों पर संग्रहालय’ को पूरा करने की समय-सीमा 1 मार्च, 2020 निर्धारित की है। लगभग 66 करोड़ रुपए व्यय से निर्मित इस संग्रहालय के बनने पर इसे संस्कृति मंत्रालय को सौंप दिया जाएगा। तीन मूर्ति मेमोरियल का निर्माण वर्ष 1922 में जोधपुर, हैदराबाद और मैसूर की रियासतों ने भारतीय सैनिकों की याद में किया था। प्रतिष्ठित तीन मूर्ति भवन पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का आधिकारिक निवास था और बाद में केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के तहत एक स्वायत्त संस्थान के रूप में उनकी स्मृति में इसे नेहरू मेमोरियल म्यूज़ियम एंड लाइब्रेरी (Nehru Memorial Museum and Library- NMML) के रूप में स्थापित कर दिया गया। दलाई लामा का उत्तराधिकारी हाल ही में चीन ने भारत से तिब्बती गुरु दलाई लामा के उत्तराधिकारी को मान्यता नहीं देने का आग्रह किया।

चीन के वरिष्ठ अधिकारियों और विशेषज्ञों के अनुसार, दलाई लामा के उत्तराधिकारी को चीन की सरकार की मान्यता मिलनी चाहिये और दलाई लामा का चयन देश के भीतर 200 वर्ष पुरानी ऐतिहासिक प्रक्रिया के तहत ही होना चाहिये। उत्तराधिकार के मुद्दे पर भारत के किसी भी प्रकार के दखल का प्रत्यक्ष प्रभाव दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ सकता है। दलाई लामा के उत्तराधिकारी का चुनाव एक ऐतिहासिक,धार्मिक एवं राजनीतिक मुद्दा है। अतः इनके उत्तराधिकार पर निर्णय उनकी निजी इच्छा अथवा दूसरे देशों में रहने वाले लोगों के गुट द्वारा नहीं लिया जाता है। दलाई लामा दलाई लामा तिब्बती बौद्ध धर्म के सबसे नए विद्यालयों में से एक गेलुग या ‘येलो हैट’ तिब्बती बौद्ध धर्म स्कूल के अग्रणी आध्यात्मिक नेता को तिब्बती लोगों द्वारा दी गई एक उपाधि है। 14वें तथा वर्तमान दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो (Tenzin Gyatso) हैं। दलाई लामाओं को अवलोकितेश्वरा या चेनरेज़िग, कम्पासियन के बोधिसत्व और तिब्बत के संरक्षक संत की अभिव्यक्ति माना जाता है। बोधिसत्व सभी संवेदनशील प्राणियों के लाभ के लिये बुद्धत्व प्राप्त करने की इच्छा से प्रेरित हैं, जिन्होंने मानवता की मदद के लिये दुनिया में पुनर्जन्म लेने की कसम खाई है।

  1. https://www.bhaskar.com/chhattisgarh/dhamtari/news/chhattisgarh-news-gaura-gauri-procession-with-traditional-baje-gaje-immersion-of-idols-continued-till-late-night-064643-5823423.html
  2. https://www.officeholidays.com/holidays/ugadi
  3. https://www.hindikiduniya.com/festivals/ugadi-festival-in-hindi/
  4. https://www.coolthoughts.in/sitala-mata-vrat-katha
  5. https://orissadiary.com/maa-budhi-thakurani-jatra-will-commence-march-29-till-april-29/