सामान्य अध्ययन२०१९/न्यायपालिका

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पुलिस व्यवस्था[सम्पादन]

  • आंध्र प्रदेश के प्रकाशम् (Prakasham) ज़िले के पुलिस अधीक्षक को स्पंदन (SPANDANA) परियोजना के लिये 7वाँ जी-फाइल (G-Files) पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। जुलाई,2019 में प्रारंभ इस परियोजना का उद्येेेश्य राज्य के पुलिस स्टेशनों को जनता की पहुँच के लिये विशेषकर महिलाओं के लिये सुगम बनाना है। इसमें लगभग 52% शिकायतकर्त्ता महिलाएँ थीं। इसके द्वारा उस ज़िले,राज्य या देश से बाहर रह रहे लोग भी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पुलिस से बातचीत कर सकते हैं और अपनी शिकायतें दर्ज करा सकते हैं।

जी-फाइल पुरस्कार के अलावा,स्पंदन को ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट (BPR&D)द्वारा भी नामित किया जा चुका है। स्पंदन परियोजना के सफल होने के दो व्यापक कारण हैं-

  1. इसके क्रियान्वयन में प्रौद्योगिकी का उपयोग। महिला शिकायतकर्ताओं पर विशेष ध्यान।

जी-फाइल पुरस्कार शासन में अभिनव सुधारों के लिये सिविल सेवकों को प्रत्येक वर्ष दिया जाता है। BPR&D गृह मंत्रालय के तहत कार्यरत एक परामर्शदायी संगठन है,जिसकी स्थापना पुलिस बलों के आधुनिकीकरण के उद्देश्य से 28 अगस्त,1970 को की गई थी।

  • आंध्र प्रदेश में कृष्णा ज़िले के कांचीचेरला में नंदीगामा उपखंड के तहत पहली ज़ीरो एफआईआर (Zero FIR) दर्ज की गई है।

ज़ीरो एफआईआर किसी भी पुलिस स्टेशन द्वारा किसी संज्ञेय अपराध के लिये पंजीकृत की जा सकती है, बिना इस बात की परवाह किये कि मामला उनके अधिकार क्षेत्र में है या नहीं और उसे एक उपयुक्त पुलिस स्टेशन में स्थानांतरित किया जाता है।

भारत में स्थिति:-भारत में ज़ीरो एफआईआर की अवधारणा का सर्प्रथम सुझाव,आपराधिक कानूनों में संशोधन की समीक्षा के लिये गठित जस्टिस वर्मा समिति ने दिया था।

इसके अलावा 12 अक्तूबर,2015 को गृह मंत्रालय द्वारा सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को एक एडवाइज़री जारी की गई ताकि संबंधित विभागों को अनिवार्य रूप से एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिये जा सकें। ज़ीरो एफआईआर इससे पहले भी दर्ज की जा चुकी है लेकिन यह इस तरह का पहला मामला था जिसमें त्वरित कार्रवाई के लिये ज़ीरो एफआईआर दर्ज की गई। जो पुलिस अधिकारी ज़ीरो एफआईआर के पंजीकरण का पालन करने में विफल रहते हैं, उन पर आईपीसी की धारा 166 ए के तहत मुकदमा दर्ज कर विभागीय कार्रवाई भी की जा सकती है।

न्यायपालिका[सम्पादन]

  • अयोध्या फैसले पर उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी की तुलना वर्ष 1992 में गठित लिब्रहान आयोग (Liberhan Commision) की रिपोर्ट से की गई। न्यायालय ने कहा कि बाबरी मस्जिद गिराया जाना एक ‘सोचा-समझा कृत्य’ था।

लिब्रहान आयोग का गठन न्यायमूर्ति मनमोहन सिंह लिब्रहान की अध्यक्षता में वर्ष 1992 के बाबरी विध्वंस मामले की जाँच के लिये किया गया था। इस रिपोर्ट के अनुसार,अयोध्या में सारा विध्वंस ‘योजनाबद्ध’ तरीके से किया गया था। इस आयोग की रिपोर्ट जून 2009 में तत्कालीन प्रधानमंत्री को सौंपी गई। लिब्रहान आयोग देश में अब तक का सबसे लंबा चलने वाला जाँच आयोग है, जिस पर करीब 8 करोड़ रुपए खर्च हुए थे।

  • लोकसभा ने देश की शीर्ष अदालत अर्थात् सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या को वर्तमान में 31 (मुख्य न्यायाधीश सहित) से बढ़ाकर 34 (मुख्य न्यायाधीश सहित) करने के लिये एक विधेयक पारित किया।

वर्ष 2009 के बाद यह पहला अवसर है जब सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि की जाएगी। क्यों लिया गया यह निर्णय? वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय में लगभग 59,331 मामले लंबित हैं। मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India-CJI) रंजन गोगोई के अनुसार, भारत में न्यायाधीशों की कमी के कारण कई महत्त्वपूर्ण मामलों का फैसला करने के लिये उचित संवैधानिक पीठों की संख्या भी पूरी नहीं हो पा रही है। न्यायाधीशों की संख्या को बढ़ाने के लिये CJI ने भारतीय प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखा था जिसके बाद सरकार ने यह निर्णय लिया है।

  • सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court-SC) ने हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा काला धन (अघोषित विदेशी आय और संपत्ति) कर अधिरोपण अधिनियम 2015 [Black Money (Undisclosed Foreign Income and Assets) and Imposition of Tax Act] पर लगाई गई रोक को हटा दिया गया है। इसके पश्चात अधिनियम भूतलक्षी प्रभाव/बैक डेट से आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही करने की स्थिति बहाल हो जाएगी।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा था कि 2016 का काला धन कानून के तहत जुलाई 2015 से भूतलक्षी प्रभाव (Retrospective Effect) के साथ अपराधियों को आरोपी बनाने और उनकी जाँच हेतु कार्यवाही करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। वर्ष 2015 में अधिनियमित,इस अधिनियम में यह स्पष्ट किया गया था कि यह अधिनियम 1अप्रैल, 2016 से लागू होगा। हालाँकि 1 जुलाई, 2015 को सरकार द्वारा अधिनियम की धारा 86 (मतभेदों को दूर करने की शक्ति) के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करने के लिये एक अधिसूचना जारी की, जिसमें अधिनियम को लागू करने की पूर्वनिर्धारित तिथि को बदलकर 1 जुलाई, 2015 कर दिया गया था। इस अधिनियम में भारतीय निवासियों को अपनी अघोषित विदेशी आय और संपत्ति को घोषित करने का एक अवसर देने का प्रावधान किया गया था।

काला धन (अघोषित विदेशी आय और संपत्ति) एवं कर अधिरोपण अधिनियम, 2015 का प्रभाव
  1. यह विदेशी आय को छिपाने के लिये दंड का प्रावधान करता है और विदेशी आय के संबंध में कर से बचने के प्रयास को आपराधिक दायित्व के दायरे में शामिल करता है।
  2. यदि किसी व्यक्ति के पास अघोषित विदेशी संपत्ति होने का प्रत्यक्ष प्रमाण प्राप्त होता है तो संबंधित व्यक्ति को 30% की दर से कर का भुगतान और इसी के बराबर दंड राशि का भुगतान करना पड़ता था।
  3. इसके इतर संपत्ति को घोषित न करने के मामले में 30% की दर से कर अधिरोपण के साथ-साथ छिपाये गए कर की राशि की तीन गुना राशि का भुगतान या अघोषित आय के 90% भाग या परिसंपत्ति के मूल्य का भुगतान का प्रावधान किया गया है।
  4. अधिनियम में जानबुझकर की गई कर चोरी के लिये 3-10 साल की जेल की सजा का प्रावधान है।
  5. इस अधिनियम में विदेशों में अर्जित परिसंपत्तियों की घोषणा करने के लिये एकमुश्त अनुपालन विंडो उपलब्ध कराने और इस प्रकार घोषित परिसंपत्तयों के मूल्य पर निर्धारित कर और जुर्माने का भुगतान करने का प्रावधान है।
  • उच्चतम न्यायालय ने कहा कि न्यायपालिका का न्यायिक प्रशासन सार्वजनिक प्राधिकरण होने के कारण RTI के अंतर्गत आएगा, न कि संपूर्ण न्यायपालिका RTI के दायरे में शामिल होगी।
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति करते समय,राष्ट्रपति को भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करना अनिवार्य है।

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत लोक प्राधिकरण में संविधान द्वारा या उसके अधीन गठित निकाय शामिल हैं।

  • सितंबर 2019 में केरल उच्च न्यायालय ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता के अधिकार के साथ-साथ शिक्षा के मौलिक अधिकार के एक हिस्से के रूप में इंटरनेट तक पहुँच के अधिकार को बरकरार रखा। न्यायालय ने कहा कि इंटरनेट एक शिक्षा के उपकरण के रूप में कार्य करता है और कोई भी अनुशासन का हवाला देते हुए इस पर प्रतिबंध नहीं लगा सकता है।

न्यायालय के समक्ष याचिकाकर्त्ता ने तर्क दिया कि इंटरनेट के उपयोग पर प्रतिबंध संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (a) के तहत बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। इसके उत्तर में केरल उच्च न्यायालय ने एस. रंगराजन और अन्य बनाम पी. जगजीवन राम मामले (1989) में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अनुच्छेद 19 (1) (a) के तहत मौलिक अधिकारों के अंतर्गत दी गई स्वतंत्रता केवल अनुच्छेद 19 (2) में उल्लेखित उद्देश्यों के लिये ही प्रतिबंधित की जा सकती है। इसके तहत प्रतिबंध को आवश्यकता के आधार पर उचित ठहराया जाना चाहिये, न कि सुविधा या शीघ्रता के आधार पर। उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र का मानवाधिकार परिषद भी इंटरनेट के अधिकार को मौलिक स्वतंत्रता और शिक्षा के अधिकार को सुनिश्चित करने के उपकरण के रूप में मानता है।

  • सर्वोच्च न्यायालय ने प्रशांत कनौजिया नामक पत्रकार को जमानत पर तुरंत रिहा करने का आदेश देते हुए कहा कि पत्रकार ने किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करने के उद्देश्य से सोशल मीडिया पर पोस्ट नहीं किया था।

प्रशांत कनौजिया ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर एक आपत्तिजनक वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था। भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) की धारा 505 (सार्वजनिक दुर्व्यवहार की निंदा करने वाले बयान) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (Information Technology Act) की धारा 67 (इलेक्ट्रॉनिक रूप में अश्लील सामग्री का प्रकाशन या प्रसारण) के तहत गिरफ्तारी के लिये असाधारण कारण लिखित रूप में अपेक्षित हैं।

  • पिछले वर्ष सुप्रीम कोर्ट की 5 न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ के फैसले के अनुसार ज़मीन, सार्वजनिक व्यवस्था और पुलिस से संबंधित मामलों को छोड़कर दिल्ली सरकार के फैसलों में उपराज्यपाल की सहमति की आवश्यकता नहीं होगी। लेकिन इस फैसले में सेवाओं और अन्य मुद्दों को लेकर कुछ नहीं कहा गया था। इस संबंध में दिल्ली सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में किये गए अपील के फलस्वरूप दो न्यायाधीशों की बैच ने पाँच महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर फैसला दिया है-
  1. ट्रांसफर और पोस्टिंग: राज्य सूची में राज्य पब्लिक सर्विसेज की एंट्री 41 के अधीन दिल्ली सरकार की कार्यकारी शक्तियों के संबंध में दोनों जस्टिस की राय विपरीत थी।
  2. जाँच आयोग का गठन: कमीशन ऑफ इंक्वायरी एक्ट, 1952 के तहत दिल्ली सरकार जाँच आयोग का गठन नहीं कर सकती,लेकिन उपराज्यपाल के बजाय अब दिल्ली सरकार के पास लोक अभियोजकों या कानूनी अधिकारियों को नियुक्त करने का अधिकार होगा।
  3. ज़मीन और राजस्व: जमीन का सर्कल रेट दिल्ली सरकार तय करेगी और मुआवजे का अधिकार भी उसी के पास रहेगा, जबकि रेवेन्यू के मामले में सरकार को उपराज्यपाल की सहमति लेनी होगी।
  4. एंटी करप्शन ब्रांच: चूँकि दिल्ली विशेष स्थिति वाला राज्य है और यहाँ की पुलिस केंद्र के अधीन है, इसलिये भ्रष्टाचार की जाँच के मामले भी उपराज्यपाल के अधीन होंगे।
  5. बिजली बोर्ड पर अधिकार: बिजली बोर्ड से जुड़े कार्य दिल्ली सरकार को सौंपे गए हैं।
  • श्रेया सिंघल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया कि धारा 66A संविधान के अनुच्छेद 19 (मुक्त भाषण) और 21 (जीवन के अधिकार) दोनों के विपरीत है। पूरे प्रावधान को सर्वोच्च न्यायालय ने रोक दिया। इसे सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बोलने की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन बताया गया है।


दिल्ली उच्च न्यायालय की प्रायोगिक परियोजना रिपोर्ट प्रस्तुत की गई जिसमें कहा गया कि न्यायालय में लंबित सभी मुकदमों को एक वर्ष में निपटाने हेतु वर्तमान न्यायाधीशों की संख्या में बढ़ोतरी करने की आवश्यकता है। ज़ीरो पेंडेंसी कोर्ट प्रोजेक्ट (Zero Pendency Courts Project) अपनी तरह की एकलौती ऐसी योजना है जिससे विभिन्न प्रकार के मामलों हेतु समयसीमा तथा न्यायाधीशों की संख्या निश्चित करने में सहायता मिलेगी।

1990 में सर्वोच्च न्यायालय के दो फैसलों के बाद यह व्यवस्था बनाई गई थी। कॉलेजियम व्यवस्था के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व में बनी वरिष्ठ जजों की समिति जजों के नाम तथा नियुक्ति का फैसला करती है। सर्वोच्च न्यायालय तथा हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति तथा तबादलों का फैसला भी कॉलेजियम ही करता है। हाईकोर्ट के कौन से जज पदोन्नत होकर सर्वोच्च न्यायालय जाएंगे यह फैसला भी कॉलेजियम ही करता है। कॉलेजियम व्य‍वस्था का उल्लेख न तो मूल संविधान में है और न ही उसके किसी संशोधन प्रावधान में

केंद्र सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति और तबादले के लिये बनाये गए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी। वर्ष 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस अधिनियम को यह कहते हुए असंवैधानिक करार दिया था कि ‘राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग’ अपने वर्तमान स्वरूप में न्यायपालिका के कामकाज में एक हस्तक्षेप मात्र है।

टाटा ट्रस्ट्स (Tata Trusts) द्वारा जारी ‘इंडिया जस्टिस रिपोर्ट’ के अनुसार, पूरे देश में लोगों को न्याय दिलाने के मामले में महाराष्ट्र सबसे आगे[सम्पादन]

महाराष्ट्र के बाद केरल और तमिलनाडु का स्थान है। इसके अलावा न्याय दिलाने के मामले में उत्तर प्रदेश का प्रदर्शन बड़े राज्यों में सबसे खराब रहा है। भारतीय न्याय प्रणाली के मुख्यतः 4 स्तंभों (1) पुलिस, (2) न्यायतंत्र, (3) कारागार या जेल और (4) कानूनी सहायता का आकलन किया गया है। यह पहली बार है जब भारतीय न्याय प्रणाली की समग्र तस्वीर प्रस्तुत करते हुए कोई रिपोर्ट सामने आई है। रिपोर्ट के दौरान दी गई रैंकिंग में राज्यों को मुख्यतः 2 भागों में बाँटा गया है (1) 18 बड़े या मध्यम आकार वाले राज्य जिनमें जनसंख्या 10 मिलियन से अधिक है और (2) 7 छोटे राज्य जिनमें 10 मिलियन या उससे कम लोग रहते हैं।

आंतरिक सुरक्षा की चुनौती को देखते हुए नगालैंड, मणिपुर, असम और जम्मू और कश्मीर (केंद्रशासित प्रदेश होने से पूर्व) का अध्ययन नहीं किया है।

न्याय वितरण के मामले में महाराष्ट्र, केरल और तमिलनाडु ने काफी अच्छा प्रदर्शन किया है, जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड का प्रदर्शन काफी निराशाजनक रहा है। पुलिस क्षमता के मामले में तमिलनाडु और उत्तराखंड पहले और दूसरे स्थान पर रहे, जबकि इस क्षेत्र में राजस्थान और उत्तर प्रदेश की स्थिति सबसे खराब आँकी गई। वहीं छोटे राज्यों में सिक्किम पहले स्थान पर रहा और मिज़ोरम अंतिम स्थान पर।

केरल समग्र रैंकिंग में दूसरे स्थान पर है, जबकि पुलिस कार्यप्रणाली के मामले में वह 13वें स्थान पर रहा।

आँकड़ों के अनुसार, भारत में प्रत्येक 100000 नागरिकों पर मात्र 151 पुलिसकर्मी ही मौजूद हैं, विदित हो कि यह अनुपात दुनिया भर के अन्य देशों के मुकाबले काफी खराब है। भारत के ब्रिक्स साझेदारों जैसे- रूस और दक्षिण अफ्रीका में यह अनुपात भारत से 2-3 गुना अधिक है। पुलिस विभाग में विभिन्न जाति, धर्म और संप्रदायों के लोगों की भर्ती से संबंधित विविधता कोटे का भी काफी सीमित उपयोग किया गया है। कर्नाटक एकमात्र ऐसा राज्य है जो इस कार्य में सफल हुआ है।

रिपोर्ट में दिये गए पुलिस अनुसंधान और विकास ब्यूरो (BPRD) के आँकड़ों के अनुसार, देश के कुल पुलिस बल में महिलाओं का प्रतिनिधित्व मात्र 7 प्रतिशत है, जो कि महिला सशक्तीकरण के नज़रिये से एक अच्छी स्थिति नहीं है।

न्यायपालिका की क्षमता के मामले में तमिलनाडु अव्वल स्थान पर रहा और पंजाब को दूसरा स्थान हासिल हुआ। वहीं छोटे राज्यों में सिक्किम पहले स्थान पर रहा और अरुणाचल प्रदेश अंतिम स्थान पर। वर्ष 2013-2017 के मध्य तमिलनाडु ने उच्च और अधीनस्थ न्यायालयों में लंबित मामलों को निपटाने में काफी सुधार किया। साथ ही न्यायाधीशों की संख्या की दृष्टि से भी तमिलनाडु ने अच्छा कार्य किया था। न्यायतंत्र के मामले में सबसे खराब प्रदर्शन बिहार और उत्तर प्रदेश का रहा। रिपोर्ट के अनुसार, देश भर में न्यायाधीशों के कुल स्वीकृत पदों में से लगभग 23 प्रतिशत पद खाली हैं। उल्लेखनीय है कि भारत अपने कुल बजट का मात्र 0.08 प्रतिशत हिस्सा ही न्यायतंत्र पर खर्च करता है। दिल्ली के अतिरिक्त कोई भी अन्य राज्य अथवा केंद्रशासित प्रदेश अपने क्षेत्र में न्यायतंत्र पर बजट का 1 प्रतिशत से अधिक खर्च नहीं करता है। रिपोर्ट के अनुसार, नवगठित राज्य तेलंगाना के अधीनस्थ न्यायालयों में महिलाओं की भागीदारी सबसे अधिक तकरीबन 44 प्रतिशत पाई गई। बिहार के अधीनस्थ न्यायालयों में लगभग 39.5 प्रतिशत मामले 5 वर्षों से भी अधिक समय से लंबित हैं। कारागार या जेल कारागार या जेल के मामले में सबसे अच्छा प्रदर्शन केरल और महाराष्ट्र का रहा, जिन्होंने विगत कुछ वर्षों में कारागार से संबंधित कई संकेतकों पर सुधार किया। वहीं छोटे राज्यों में गोवा पहले स्थान पर रहा और सिक्किम अंतिम स्थान पर। गौरतलब है कि विश्लेषण की अवधि के दौरान केरल, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, गुजरात, पश्चिम बंगाल, हरियाणा, बिहार और महाराष्ट्र ने अधिकारी एवं कैडर स्टाफ दोनों स्तरों पर रिक्तियों को कम कर दिया। रिपोर्ट के अनुसार, जेल प्रशासन के सभी स्तरों पर लगभग 9.6 प्रतिशत कर्मचारी महिलाएँ हैं। देश के केवल 6 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में महिला प्रतिनिधित्व 15 प्रतिशत से अधिक है। नगालैंड (22.8%), सिक्किम (18.8%), कर्नाटक (18.7%), अरुणाचल प्रदेश (18.1%), मेघालय (17%) और दिल्ली (15.1%)। जेल कर्मचारियों में महिला प्रतिनिधित्व के मामले में गोवा (2.2%) और तेलंगाना (2.3%) का प्रदर्शन काफी खराब रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय कारागारों या जेलों में क्षमता से अधिक कैदियों की समस्या सबसे प्रमुख है और इनमें सबसे अधिक वे विचाराधीन कैदी होते हैं जो जाँच, पूछताछ या परीक्षण का इंतज़ार कर रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में प्रत्येक एक दोषी कैदी पर 2 विचारधीन कैदी हैं। राष्ट्रीय स्तर पर 19 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में सालाना 20,000 से 35,000 रुपए प्रति कैदी खर्च होता है। उल्लेखनीय है कि यह एक कैदी पर 100 रुपए प्रतिदिन से भी कम है। कानूनी सहायता कानूनी सहायता का उद्देश्य समाज के गरीब वर्गों की कानूनी मदद करना है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी व्यक्ति न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित न रह जाए। आम नागरिकों को क़ानूनी सहायता प्रदान करने के मामले में केरल और हरियाणा सबसे अव्वल स्थान पर हैं, जबकि इस सूची में उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश सबसे निचले स्थान पर रहे। वहीं छोटे राज्यों में गोवा पहले स्थान पर रहा और अरुणाचल प्रदेश अंतिम स्थान पर। रिपोर्ट में सामने आया है वर्ष 2017-18 में देश में कानूनी सहायता पर प्रति व्यक्ति खर्च मात्र 0.75 रुपए प्रतिवर्ष था। उल्लेखनीय है कि देश के किसी भी राज्य या केंद्रशासित प्रदेश ने नालसा (NALSA) के तहत आवंटित बजट का पूर्णतः उपयोग नहीं किया।

वर्ष 2018 के केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध पुनर्विचार याचिका[सम्पादन]

  • सर्वोच्च न्यायालय ने 14 नवंबर 2019 को इस पुनर्विचार याचिका को पाँच जजों की पीठ से सात जजों की बड़ी पीठ के पास भेज दिया है। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाले पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने फरवरी 2019 में ही पुनर्विचार याचिका की सुनवाई करने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था।

4:1 के बहुमत से हुए फैसले में पाँच जजों की संविधान पीठ ने स्पष्ट किया था कि हर उम्र की महिलाएँ सबरीमाला मंदिर में प्रवेश कर सकेंगी। इसके साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने केरल उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ द्वारा वर्ष 1991 में दिये गए उस फैसले को भी निरस्त कर दिया था जिसमें कहा गया था कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं को प्रवेश करने से रोकना असंवैधानिक नहीं है।

सर्वोच्च न्यायालय ने ‘केरल हिंदू प्लेस ऑफ पब्लिक वर्शिप रूल’, 1965 (Kerala Hindu Places of Public Worship Rules, 1965) के नियम संख्या 3 (b) जो मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाता है को संविधान की कानूनी शक्ति से परे घोषित कर दिया था।

सबरीमाला कार्यसमिति का पक्ष सबरीमाला कार्यसमिति ने आरोप लगाया था कि सर्वोच्च न्यायालय ने सभी आयु की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति देकर उनके रीति-रिवाज तथा परंपराओं को नष्ट किया है। लोगों की मान्यता है कि भगवान अयप्पा ब्रह्मचारी हैं। जिस कारण से मंदिर में 10 साल से 50 साल की महिलाओं का प्रवेश वर्जित किया गया था। पृष्ठभूमिसबरीमाला मंदिर में परंपरा के अनुसार, 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध है। मंदिर ट्रस्ट के अनुसार, यहाँ 1500 वर्षों से महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध है। इसके लिये कुछ धार्मिक कारण बताए जाते हैं। सबरीमाला मंदिर में हर साल नवंबर से जनवरी तक श्रद्धालु भगवान अयप्पा के दर्शन के लिये आते हैं, इसके अलावा पूरे साल यह मंदिर आम भक्तों के लिये बंद रहता है। भगवान अयप्पा के भक्तों के लिये मकर संक्रांति का दिन बहुत खास होता है, इसीलिये उस दिन यहाँ सबसे ज़्यादा भक्त पहुँचते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, अयप्पा को भगवान शिव और मोहिनी (भगवान विष्णु का एक रूप) का पुत्र माना जाता है। केरल के ‘यंग लॉयर्स एसोसिएशन’ ने इस प्रतिबंध के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में वर्ष 2006 में जनहित याचिका दायर की थी।

उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का (Chief Justice of India- CJI) कार्यालय सार्वजनिक प्राधिकरण होने के कारण RTI के दायरे में[सम्पादन]

13 नवंबर, 2019 को पाँच न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ ने सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक निर्णय में मुख्य न्यायाधीश सहित दिया है। इस पीठ में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई, एन.वी. रमन्ना, डी. वाई. चंद्रचूड, दीपक गुप्ता एवं संजीव खन्ना शामिल थे। इस निर्णय के बाद अब ‘सूचना का अधिकार’ (Right to Information- RTI) के तहत आवेदन देकर CJI के कार्यालय से सूचना मांगी जा सकती है। हालाँकि सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि गोपनीयता, स्वायत्तता एवं पारदर्शिता में संतुलन जरूरी है।

दरअसल न्यायिक व्यवस्था के दो पक्ष होते हैं- एक न्यायपालिका दूसरा न्यायपालिका का प्रशासन। उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि न्यायपालिका RTI के दायरे में न तो पहले आती थी न अब। किंतु न्यायपालिका का न्यायिक प्रशासन सार्वजनिक प्राधिकरण होने के कारण RTI के अंतर्गत आता है।

पृष्ठभूमि

यह निर्णय आरटीआई कार्यकर्त्ता सुभाष अग्रवाल के वर्ष 2009 में सूचना के अनुरोध से संबंधित है। आरटीआई कार्यकर्त्ता ने पूछा था कि “क्या सुप्रीम कोर्ट के सभी न्यायाधीशों ने 1997 में पारित एक प्रस्ताव के बाद CJI के समक्ष अपनी संपत्ति और देनदारियों की घोषणा की थी?” सर्वोच्च न्यायालय के महासचिव और केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी (Secretary General and the Central Public Information Officer- CPIO) ने यह कहते हुए कि CJI का कार्यालय RTI अधिनियम के तहत एक सार्वजनिक प्राधिकरण नहीं है, सूचना देने से मना कर दिया था। यह मामला मुख्य सूचना आयुक्त के पास पहुँचा, जहाँ 6 जनवरी, 2009 को तत्कालीन मुख्य सूचना आयुक्त की अध्यक्षता में एक पूर्ण पीठ ने सूचना देने का निर्देश दिया। मुख्य सूचना आयुक्त के इस आदेश के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय के केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी ने दिल्ली उच्च न्यायालय में अपील की। जहाँ दिल्ली उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि भारत के मुख्य न्यायाधीश का कार्यालय RTI अधिनियम के तहत एक सार्वजनिक प्राधिकरण है। वर्ष 2010 में सर्वोच्च न्यायालय के केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी ने पुन: दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की जिसकी सुनवाई करते हुए संवैधानिक पीठ ने उपरोक्त निर्णय दिया है।

स्वतंत्र न्यायपालिका v/s पारदर्शिता

स्वतंत्र न्यायपालिका की अवधारणा को केशवानंद भारती मामले में “संविधान के आधारभूत ढाँचे” के अंतर्गत रखा गया था। अत: किसी भी रूप में इसमें हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने इसे ध्यान में रखते हुए स्पष्ट किया कि पारदर्शिता के नाम पर न्यायपालिका को नष्ट नहीं किया जा सकता है, पारदर्शिता स्वतंत्र न्यायपालिका के कार्य में बाधक नहीं है बल्कि यह स्वतंत्र न्यायपालिका की अवधारणा को और सशक्त बनाती है। पारदर्शिता रहने से कोई भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से न्यायिक स्वायत्तता को संकुचित करने का प्रयास नहीं कर सकता।

निजता का अधिकार v/s पारदर्शिता एवं सूचना का अधिकार

न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि RTI के अंतर्गत न्यायाधीशों की संपत्ति आदि की जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती है क्योंकि इससे न्यायाधीशों के निजता का अधिकार प्रभावित होगा। न्यायालय ने कहा है कि प्रत्येक RTI के अंतर्गत ‘मोटिव’ या ‘उद्देश्य’ को ध्यान में रखना होगा। अगर कहीं जनहित में सूचनाओं की मांग हो, वहीं दूसरी ओर स्वतंत्र न्यायपालिका की अवधारणा हेतु किसी मामले में गोपनीयता की आवश्यकता होगी तो गोपनीयता को वरीयता दी जाएगी।

कॉलेजियम व्यवस्था v/s सूचना का अधिकार

कॉलेजियम व्यवस्था के संबंध में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कॉलेजियम में सूचनाओं को दो रूपों में देखा जा सकता है - प्रथम ‘इनपुट’ एवं दूसरा ‘आउटपुट’। कॉलेजियम का ‘आउटपुट’ न्यायाधीशों के चयन से संबंधित अंतिम निर्णय है जो सार्वजनिक होती है किंतु ‘इनपुट’ के अंतर्गत न्यायाधीशों की विभिन्न सूचनाओं का डेटा होता है जिसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता है क्योंकि इससे न्यायाधीशों की निजता के अधिकार का हनन होगा।

धारा 124A और राजद्रोह से संबंधित मामले[सम्पादन]

  • सितंबर 2019 सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने एक कार्यशाला में कहा है कि कार्यपालिका, न्यायपालिका और नौकरशाही की आलोचना को देशद्रोह नहीं कहा जा सकता है।

देशद्रोह (Sedition): भारतीय दंड संहिता की धारा 124 (A) में देश की एकता और अखंडता को व्यापक हानि पहुँचाने के प्रयास को देशद्रोह के रूप में परिभाषित किया गया है। देशद्रोह के अंतर्गत निम्नलिखित गतिविधियाँ शामिल हैं- सरकार विरोधी गतिविधि और उसका समर्थन। देश के संविधान को नीचा दिखाने का प्रयास। कोई ऐसा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, लिखित या मौखिक कृत्य जिससे सामाजिक स्तर पर देश की व्यवस्था के प्रति असंतोष उत्पन्न हो।

  • बिहार की एक निचली अदालत ने चर्चित इतिहासकार रामचंद्र गुहा सहित 49 प्रतिष्ठित व्यक्तियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 124A के तहत राजद्रोह का मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। उल्लेखनीय है कि उपरोक्त सभी व्यक्तियों ने भारत के प्रधानमंत्री को भीड़ संबंधी हिंसा अथवा मॉबलिंचिंग पर चिंता ज़ाहिर करते हुए पत्र लिखा था। अदालत ने यह निर्णय उस याचिका की सुनवाई करते हुए दिया, जिसमे आरोप लगाया गया था कि इस पत्र से अंतर्राष्ट्रीय पटल पर देश की छवि खराब हो रही है। इस पूरे घटनाक्रम ने राजद्रोह से जुड़ी धारा 124A को पुनः चर्चा का विषय बना दिया है और वर्तमान समय में इस कानून की प्रासंगिकता पर विचार करना अनिवार्य हो गया है।
अनुच्छेद 19 के तहत लिखित और मौखिक रूप से अपना मत प्रकट करने हेतु अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का प्रावधान किया गया है।

किंतु अभियक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार निरपेक्ष नहीं है इस पर युक्तियुक्त निर्बंधन हैं। भारत की एकता, अखंडता एवं संप्रभुता पर खतरे की स्थिति में, वैदेशिक संबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव की स्थिति में, न्यायालय की अवमानना की स्थिति में इस अधिकार को बाधित किया जा सकता है।

भारत में राजद्रोह को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124A में परिभाषित किया गया है। इसके अनुसार, बोले या लिखे गए शब्दों या संकेतों द्वारा या दृश्य प्रस्तुति द्वारा, जो कोई भी भारत में विधि द्वारा स्थापित सरकार के प्रति घृणा या अवमान पैदा करेगा या पैदा करने का प्रयत्न करेगा, असंतोष (Disaffection) उत्पन्न करेगा या करने का प्रयत्न करेगा, उसे आजीवन कारावास या तीन वर्ष तक की कैद और ज़ुर्माना अथवा दोनों से दंडित किया जाएगा।

IPC की इस धारा में स्पष्ट किया गया है कि सरकार या प्रशासन के विरुद्ध किसी भी प्रकार की आलोचनात्मक टिप्पणी करना अपराध नहीं है। भारत में राजद्रोह एक संज्ञेय अपराध है अर्थात् इसके तहत गिरफ्तारी के लिये वारंट की आवश्यकता नहीं होती है, साथ ही इसके तहत दोनों पक्षों के मध्य आपसी सुलह का भी कोई प्रावधान नहीं है। धारा 124A के अनुसार, यह एक गैर-ज़मानती अपराध है। इस धारा के तहत सज़ा तब तक नहीं दी जा सकती, जब तक कि अपराध सिद्ध न हो जाए। मुकदमे की पूरी प्रक्रिया के दौरान जिस व्यक्ति पर भी आरोप लगे हैं उससे उसका पासपोर्ट ज़ब्त कर लिया जाता है, इसके अलावा वह इस दौरान कोई भी सरकारी नौकरी प्राप्त नहीं कर सकता। साथ ही उसे समय-समय पर कोर्ट में भी हाज़िर होना पड़ता है।

राजद्रोह कानून का इतिहास

भारत में सेडिशन कानून की उत्पत्ति 19वीं शताब्दी के वहाबी आंदोलन से जुड़ी है। यह एक इस्लामी पुनरुत्थानवादी आंदोलन था जिसका नेतृत्व सैयद अहमद बरेलवी ने किया। मूल रूप से यह कानून वर्ष 1837 में ब्रिटिश इतिहासकार और राजनीतिज्ञ थॉमस मैकाले द्वारा तैयार किया गया था, लेकिन जब वर्ष 1860 में IPC लागू किया गया, तो इस कानून को उसमें शामिल नहीं किया गया। जब वर्ष 1870 में सर जेम्स स्टीफन को अपराध से निपटने के लिये एक विशिष्ट खंड की आवश्यकता महसूस हुई तो उन्होंने आईपीसी (संशोधन) अधिनियम, 1870 के तहत धारा 124A को IPC में शामिल किया।

सर्वप्रथम इस कानून का प्रयोग वर्ष 1891 में एक अखबार के संपादक जोगेंद्र चंद्र बोस के विरुद्ध किया गया, क्योंकि उन पर आरोप था कि उन्होंने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध लेख लिखा था।
वर्ष 1922 में यंग इंडिया में उनके लेखों के कारण जब महात्मा गांधी पर राजद्रोह का मुकदमा दायर किया गया, तब उन्होंने कहा था कि “मैं जानता हूँ इस कानून के तहत अब तक कई महान लोगों पर मुकदमा चलाया गया है और इसलिये मैं इसे स्वयं के लिये सम्मान के रूप में देखता हूँ।”

वर्ष 2014 में झारखंड में तो विस्थापन का विरोध कर रहे आदिवासियों पर भी देशद्रोह कानून चलाया गया था। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संसद में स्पष्ट किया था कि धारा 124A का संबंधित दंडात्मक प्रावधान "अत्यधिक आपत्तिजनक और अप्रिय है एवं जितनी जल्दी हम इससे छुटकारा पा लें उतना बेहतर होगा।"

वर्ष 1968 में अपनी 39वीं रिपोर्ट में विधि आयोग ने खंड को निरस्त करने के विचार को खारिज कर दिया था। वर्ष 1971 की अपनी 42वीं रिपोर्ट में विधि आयोग चाहता था कि संविधान, विधायिका और न्यायपालिका को कवर करने के लिये इस खंड का दायरा बढ़ाया जाए। अगस्त 2018 में भारत के विधि आयोग ने एक परामर्श पत्र प्रकाशित किया जिसमें सिफारिश की गई थी कि यह समय देशद्रोह से संबंधित भारतीय दंड संहिता की धारा 124A पर पुनः विचार करने और उसे निरस्त करने का है।

सन्दर्भ[सम्पादन]