सामान्य अध्ययन२०१९/पर्यावरण-भारत

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  • आईबीएम कंपनी ने पूरे विश्व के लिये एक उच्च-रिज़ॉल्यूशन मौसम पूर्वानुमान मॉडल ‘IBM GRAF’ तैयार किया है।

यह एक मौसम पूर्वानुमान टूल है जो उच्च-रिज़ॉल्यूशन मौसम पूर्वानुमान से संबंधित जानकारी प्रदान करता है। वैश्विक स्तर पर वर्तमान मौसम पूर्वानुमान मॉडलों में ज़्यादातर 9-13 किलोमीटर की दूरी तक के रिज़ॉल्यूशन पर आधारित हैं और हर छह घंटे में अपडेट होते हैं। ‘IBM GRAF’ 3 किलोमीटर की दूरी तक के रिज़ॉल्यूशन पर पूर्वानुमान प्रदान करता है और प्रति घंटा अपडेट किया जाता है। यह तकनीक वायुमंडलीय और महासागरीय डेटा को सुपर कंप्यूटर के माध्यम से विश्लेषित करके वांछित समय सीमा में पूर्वानुमान जारी करती है। यह भारतीय मौसम विज्ञान विभाग द्वारा उपयोग किये जाने वाले 12 किलोमीटर रिज़ॉल्यूशन के मॉडल की तुलना में काफी उन्नत है। यह मॉडल भारत में उपलब्ध मौसम से संबंधित डेटा का उपयोग करके मौसम पूर्वानुमानों की सटीकता में सुधार लायेगा।

  • भारत का पहला ई-कचरा क्लिनिक स्थापना के लिये केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और भोपाल नगर निगम के बीच समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये गए।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की स्थापना जल(प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण)अधिनियम,1974 के अंतर्गत सितंबर 1974 को एक सांविधिक संगठन के रूप में किया गया। वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 के अंतर्गत शक्तियाँ व कार्य सौंपे गए। यह बोर्ड पर्यावरण (सुरक्षा) अधिनियम,1986 के प्रावधानों के अंतर्गत पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को तकनीकी सेवाएँ भी उपलब्ध कराता है
  • केंद्रीय मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति (CCEA) द्वारा मंज़ूरी दिये जाने के बाद केंद्र सरकार अब बांध सुरक्षा विधेयक, 2019 को संसद में पेश करने की तैयार कर रही है। इस विधेयक का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भारत के 5,600 बांधों को सुरक्षित बनाए रखा जाए। बांध सुरक्षा विधेयक,2018 के प्रावधानों से केंद्र और राज्यों में बांध सुरक्षा की संस्थागत व्यवस्थाओं को शक्तियाँ प्राप्त होंगी और इससे पूरे देश में मानकीकरण एवं बांध सुरक्षा व्यवस्था में सुधार करने में मदद मिलेगी। विधेयक में बांध सुरक्षा संबंधी सभी विषयों को शामिल किया गया है। इसमें बांध का नियमित निरीक्षण, आपात कार्य-योजना, विस्‍तृत सुरक्षा के लिये पर्याप्‍त मरम्‍मत और रख-रखाव कोष, इंस्‍ट्रूमेंटेशन तथा सुरक्षा मैनुअल शामिल हैं।

इसमें बांध सुरक्षा का दायित्‍व बांध के स्‍वामी पर है और विफलता के लिये दंड का प्रावधान भी है।

  • लोअर सुबनसिरी जलविद्युत परियोजना असम एवं अरुणाचल प्रदेश की सीमा के साथ सुबनसिरी नदी पर एक निर्माणाधीन ग्रेविटी बांध है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal- NGT) द्वारा लोअर सुबनसिरी जलविद्युत परियोजना (Lower Subansiri Hydroelectric Project- LSHEP) में सुरक्षा मुद्दों को हल करने तक निर्माण कार्य शुरू नहीं करने के आदेश दिये जाने के बावजूद हाल ही में इस पर काम करने पर बड़े पैमाने पर सहमति व्यक्त की गई है।
  • पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन एक ऐसा दस्तावेज़ है जो किसी परियोजना हेतु पर्यावरणीय मंज़ूरी की प्रक्रिया का निर्धारण करता है। इसके अनुसार, ऐसे सभी विकासकर्त्ताओं, जिनकी परियोजनाओं में वनों, नदियों एवं उसके किनारों और अन्य पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों को प्रभावित एवं परिवर्तित करने की शक्ति है, को केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय (MoEF) या इसके द्वारा नियुक्त विशेषज्ञों से अनुमति लेनी होगी।

EIA 2019 अभी पूर्णतया तैयार नहीं हुआ है। अभी राज्यों को सिर्फ ‘ज़ीरो ड्राफ्ट’ ही भेजा गया है, जिसका अर्थ है कि राज्य के अधिकारियों से अभी इस संदर्भ में टिप्पणी माँगी जा रही है जिसके बाद इसे संशोधित किया जाएगा और फिर इसे सार्वजनिक टिप्पणी के लिये आमंत्रित किया जाएगा।

  • इलेक्ट्रिक वाहनों पर GST दरों में भारी छूट दी गई है। विद्युत मंत्रालय ने इलेक्ट्रिक वाहनों की चार्जिंग के लिये 'सेवा' के रूप में विद्युत् विक्रय की अनुमति दी है। यह चार्जिंग व्यवस्था बुनियादी ढाँचे में निवेश हेतु एक बड़ा प्रोत्साहन प्रदान करेगी। सड़क परिवहन राजमार्ग मंत्रालय ने बैटरी चालित वाहनों के मामले में अधिसूचना जारी कर परमिट में छूट दी है।

राज्य परिवहन विभागों/उपक्रमों आदि द्वारा 5000 इलेक्ट्रिक बसें चलाने के लिये प्रस्ताव आमंत्रित करना।

  • नेशनल ई-मोबिलिटी प्रोग्राम के तहत भारत सरकार ने 2030 तक 30% इलेक्ट्रिक वाहन सुनिश्चित करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके लिये बड़े स्तर पर चार्जिंग अवसरंचना की आवश्यकता होगी। सामान्य कारों के लिये प्रति किलोमीटर 6.5 रुपए की लागत की तुलना में इलेक्ट्रिक कारों हेतु यह मात्र 85 पैसे ही है।
  • आंध्र प्रदेश के पोलावरम बहुउद्देशीय परियोजना के निर्माण कार्य की अवधि केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा दो साल आगे बढ़ा दिया गया है। इस परियोजना के तहत गोदावरी नदी पर मिट्टी एवं पत्थर युक्त बांध बनाने की परिकल्पना की गई है।

बांध की अधिकतम ऊँचाई 48 मीटर निर्धारित है। इस परियोजना से लगभग 3 लाख हेक्टेयर भूमि सिंचित होगी, 960 मेगावाट की स्थापित क्षमता के साथ पनबिजली उत्पन्न की जाएगी। इस परियोजना के आसपास के 540 गाँवों में पेयजल सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी जिससे विशाखापत्तनम, पूर्वी गोदावरी एवं पश्चिमी गोदावरी और कृष्णा ज़िलोंमें रहने वाले लगभग 25 लाख लोग शामिल होंगे।

वर्ष 2011 में तत्कालीन सरकार ने आंध्र प्रदेश सरकार को परियोजना का निर्माण कार्य करने से रोक देने का आदेश दिया था।

वर्ष 2014 में सरकार ने पोलावरम परियोजना को एक राष्ट्रीय परियोजना घोषित कर दिया तथा मंत्रालय ने निर्माण कार्यों की अनुमति देकर ‘काम रोकने के आदेश’ को ठंडे बस्ते में डाल दिया।

  • कैबिनेट सचिवालय में एक राष्ट्रीय संकट प्रबंधन समिति (National Crisis Management Committee-NCMC) का गठन किया गया है। जिसके अध्यक्ष कैबिनेट सचिव हैं। इसका उद्देश्य प्राकृतिक आपदा के समय राहत कार्यों का प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित करना है।इसमें कैबिनेट सचिव और सभी संबंधित मंत्रालयों/विभागों के सचिवों के साथ-साथ अन्य संगठन भी शामिल हैं।

जल संरक्षण[सम्पादन]

  • जल ही जीवन है योजना- हरियाणा सरकार द्वारा प्रारंभ इस योजना का उद्देश्य भूमि के गिरते जल स्तर को रोकना है। साथ हीं किसानों को फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित करते हुए पानी की अधिक खपत वाली फसलों (जैसे धान) के बजाय कम खपत वाली फसलों (जैसे- मक्का, अरहर आदि) को अपनाने के लिये प्रोत्साहित करना है।

इस राज्य में धान का लगातार उत्पादन किये जाने के कारण जल का स्तर प्रतिवर्ष एक मीटर तक गिरता जा रहा है। इसके तहत किसानों को 2000 रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से राशि उनके खाते में हस्तांतरित किया जाएगा और इसे दो चरणों में पूरा किया जाएगा। पहले चरण में 200 रुपए पंजीकरण के समय तथा शेष 1800 रुपए दो महीने के भीतर बुवाई के आँकड़ों के सत्यापन के बाद। इस योजना के तहत मुफ्त में संकर बीज भी प्रदान किया जाएगा।

  • रिज़वानी प्रणाली राजस्थान का एक पारंपरिक जल संरक्षण अभ्यास है। राजस्थान में पानी रेत के माध्यम से फैलता है और जिप्सम की परत के रूप में स्थिर हो जाता है, और बेरी नामक एक जटिल केशिका प्रणाली द्वारा उपयोग में लाया जाता है।

पारिस्थितिकी और पर्रयावरण[सम्पादन]

  • गो ग्रीन पहल भारतीय सेना द्वारा प्रारंभ एक पर्यावरण संरक्षण पहल है,जिसमें जागरुकता सृजन के साथ-साथ अन्य परियोजनाएं शामिल हैं,जैसे -2 मेगावाट के सौर ऊर्जा संयंत्र की स्थापना।
  • दिसंबर 2019 को “EChO Network” नामक एक राष्ट्रीय कार्यक्रम का आरंभ भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार प्रो. कृष्णसामी विजयराघवन ने नई दिल्ली में किया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य नागरिकों, सरकार को बढ़ते अनुसंधान, ज्ञान एवं भारतीय पारिस्थितिकी और पर्यावरण के क्षेत्रों में समस्याओं को हल करने के बारे में जागरूकता लाना है। यह भारत सरकार, उद्योग और शिक्षाविदों का एक सहयोगी प्रयास है।[१] यह पारिस्थितिकी और पर्यावरण से संबंधित क्षेत्रों में अंतःविषयक तरीकों से शिक्षकों तथा छात्रों को प्रशिक्षित करने हेतु एक राष्ट्रीय कार्यक्रम है।

इस नेटवर्क का उद्देश्य सभी को ज्ञान साझा करने और प्रयासों को समन्वित करने के लिये विज्ञान के क्षेत्र में एक साथ लाना है तथा इसके लिये ऐसे लीडर की आवश्यकता है जो समाज के विभिन्न क्षेत्रों में संचार करने हेतु प्रशिक्षित हो।

  • ई-कार (E-Cars) पहल की शुरुआत भारतीय सेना ने पर्यावरण पारिस्थितिकी में सहयोग के उद्देश्य से नई दिल्ली में अपने अधिकारियों के उपयोग के लिये की है। विश्व पर्यावरण दिवस पर इस पहल की शुरुआत हुई थी और 1 अगस्त, 2019 को भारतीय सेना के लिये पहली बार ई-कार को हरी झंडी दिखाकर लॉन्च किया गया।

पायलट परियोजना के रूप में 10 ई-कारें चलाई जाएंगी तथा विकास, दक्षता तथा न्यूनतम उत्सर्जन सुनिश्चित करने के बाद दिल्ली में ई-कारों की संख्या में वृद्धि की जाएगी। भारतीय सेना हमेशा ही पर्यावरणीय पहल में सबसे आगे रही है। वर्तमान में भारतीय सेना के पास बड़ी संख्या में टेरिटोरियल आर्मी बटालियन (Territorial Army Battalions- ECO) हैं जिन्होंने वन संरक्षण जैसे पर्यावरण संरक्षण की पहल की है।

  • गुजरात के केवडिया में 20-21 दिसंबर तक राष्ट्रीय हरित कोर ‘इकोक्लब’ (Eco Club) कार्यक्रम को लागू करने वाली राज्य नोडल एजेंसियों की पहली बैठक का आयोजन किया गया। MoEFCC के तहत कार्यरत पर्यावरण शिक्षा प्रभाग द्वारा गुजरात पारिस्थितिक शिक्षा और अनुसंधान के सहयोग से किया गया। एजेंसियों को प्रशंसा प्रमाण पत्र भी दिये गए। इसके अलावा, राष्ट्रीय स्तर पर सर्वश्रेष्ठ इकोक्लब पुरस्कार क्रमशः छत्तीसगढ़ (प्रथम स्थान), केरल (द्वितीय स्थान) और तेलंगाना (तृतीय स्थान) के छात्रों को दिये गए।सांत्वना पुरस्कार गुजरात, सिक्किम और कर्नाटक के इकोक्लब को प्रदान किये गए।
वर्ष 2001-2002 में पर्यावरण शिक्षा जागरूकता और प्रशिक्षण (Environment Education Awareness and Training- EEAT) योजना के तहत इस कार्यक्रम को शुभारंभ किया गया था।

EEAT, वर्ष 1983- 84 में स्थापित एक केंद्रीय क्षेत्र योजना है इसका उद्देश्य पर्यावरण जागरूकता को बढ़ावा देने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण के लिये छात्रों की भागीदारी को बढ़ाना है। EEAT उद्देश्यों को चार कार्यक्रमों के कार्यान्वयन के माध्यम से प्राप्त किया जाता है:

  1. राष्ट्रीय हरित कोर (National Green Corps- NGC)
  2. राष्ट्रीय पर्यावरण जागरूकता अभियान (National Environment Awareness Campaign)
  3. सेमिनार/कार्यशालाएँ (Seminars/Workshops)
  4. राष्ट्रीय प्रकृति शिविर कार्यक्रम (National Nature Camping Programme)
  • एमहरियाली(mHariyali)मोबाइल एप 11 अक्तूबर, 2019 को नई दिल्ली में आवास एवं शहरी विकास मंत्रालय द्वारा लॉन्च किया गया। इसका उद्येश्य सरकारी कालोनियों के पर्यावरण को संरक्षित करना तथा लोगों को पौधे लगाने और इस तरह के अन्य हरित उपाय करने के लिये प्रेरित करना। लोग अब अपने द्वारा किये गए किसी भी प्रकार के पौधारोपण की जानकारी/फोटो अपलोड कर सकते हैं जो एप से जुड़ी होगी और यह वेबसाइट www.epgc.gov.in पर दिखाई देगी।

एप स्वत: ही पौधों की जियो-टैगिंग (Geo-Tagging) करता है।

जियो-टैगिंग (Geo-Tagging) मेटा डेटा के रूप में भौगोलिक जानकारी को विभिन्न प्रकार से मीडिया से जोड़ने की प्रक्रिया है।इस मेटा डेटा में आमतौर पर अक्षांश और देशांतर जैसे निर्देशांक होते हैं, लेकिन इसमें दिक्कोण, ऊँचाई, दूरी और स्थान का नाम भी शामिल हो सकता है।
  • उत्तराखंड राज्य सरकार ने डीम्ड फ़ॉरेस्ट (Deemed Forests) की एक नई परिभाषा दी जिसे केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा वर्ष 1996 में वनों के बारे में दिए गए एक निर्णय दायरे से बाहर बताया है।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि वन का मतलब उसके शाब्दिक अर्थ से है यानी वह जगह जहाँ पेड़-पौधों की उपस्थिति हो, भले ही वहाँ किसी का भी स्वामित्व हो। आदेश के अनुसार, वन संरक्षण अधिनियम, 1980 हर उस वन पर लागू होता है, जो वन के शाब्दिक अर्थ की परिभाषा के तहत आता है। सर्वोच्च न्यायालय ने सभी राज्यों को वन की पहचान करने और उन्हें सूचित करने को भी कहा था। कुछ राज्यों में डीम्ड वन पहले से ही वनों की एक कानूनी श्रेणी है और उन्हें शब्दकोष की परिभाषा के अनुसार परिभाषित नहीं किया गया है। उत्तराखंड राज्य द्वारा दी गई परिभाषा के अनुसार, वहाँ के राजस्व आँकड़ों में दर्ज 10 हेक्टेअर क्षेत्र या उससे अधिक क्षेत्र के वन जिनका वितान घनत्व (Canopy Density) 60% से अधिक हो, वे ही डीम्ड फ़ॉरेस्ट माने जाएंगे। साथ ही यह भी कहा गया कि इनमें 75% स्थानीय प्रजातियों के पेड़-पौधे होने चाहिये। मुद्दा:-राज्य के रिज़र्व और संरक्षित वनों में भी 60% वितान घनत्व (Canopy Density) वाले वन कम ही हैं ऐसे में राजस्व आँकड़ों में दर्ज भूमि पर आच्छादित वनों के अस्तित्व पर खतरा उत्पन्न होने की संभावना है।

  • तेलंगाना सरकार ने जापानी वृक्षारोपण ‘मियावाकी पद्धति’ की तर्ज़ पर तेलंगानाकु हरिता हरम (Telanganaku Haritha Haaram- TKHH) योजना की शुरुआत की है।
मियावाकी पद्यति के प्रणेता जापानी वनस्पति वैज्ञानिक अकीरा मियावाकी है। यह पद्यति बहुत कम समय में घने जंगलों को उगाने में मदद प्रदान करती है। इस पद्धति में देशी प्रजाति के पौधे बहुत पास-पास लगाए जाते हैं, जो कम स्थान घेरने के साथ ही अन्य पौधों की वृद्धि में भी सहायक होते हैं।
  • भारत का पहला ज़ियोकेमिकल बेसलाइन एटलस (Geochemical Baseline Atlas) जारी किया गया है। CSIR के तहत कार्यरत राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान (National Geophysical Research Institute- NGRI) द्वारा जारी किया गया है। इसका उपयोग नीति निर्माताओं द्वारा पर्यावरणीय क्षति का आकलन करने हेतु किया जाएगा। इस एटलस में लगभग 45 मानचित्र शामिल हैं जिनमें देश में मृदा की सतह और उसके नीचे की धातुओं,ऑक्साइड्स एवं तत्त्वों के बारे में जानकारी उपलब्ध है। पृथ्वी की सतह पर होने वाले रासायनिक संरचना और परिवर्तन के आकलन में यह जानकारी देश की भावी पीढ़ी के लिये सहायक होगी। ये मानचित्र, उद्योगों या अन्य निकायों से निकलने वाले संदूषकों के कारण भविष्य में प्रदूषण स्तर का पता लगाने में भी मददगार साबित होंगे।
  • मार्च 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों में निर्माण कार्य की अनुमति देने से संबंधित हरियाणा विधानसभा द्वारा पारित संशोधित नए कानून को लागू करने पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि वह संशोधित कानून की प्रति कोर्ट में पेश करे और फिलहाल इस कानून के आधार पर कोई कार्रवाई नहीं करे। सुप्रीम कोर्ट ने 60 हज़ार एकड़ वन क्षेत्र में निर्माण की इज़ाजत देने वाले इस कानून को न्यायालय की अवमानना बताया।
हरियाणा सरकार ने 27 फरवरी को हरियाणा विधानसभा में पंजाब भूमि परिरक्षण संशोधन विधेयक, 2019 पारित कर अरावली संरक्षित क्षेत्र में अवैध निर्माण के एक बड़े हिस्से को वैध बनाने और इस क्षेत्र में पेड़ काटने और निर्माण करने की अनुमति दे दी थी। हरियाणा विधानसभा ने पंजाब भूमि परिरक्षण कानून (हरियाणा संशोधन अधिनियम 2019) की धारा 2, 3, 4 और 5 में संशोधन किया था जिसके ज़रिये अरावली पहाड़ियों की संरक्षित 29682 हेक्टेयर भूमि को विकास के लिये खोल दिया गया। इसमें गुरुग्राम की 6869 हैक्टेयर और फरीदाबाद की करीब 4227 हेक्टेयर भूमि भी शामिल है। इसका असर फरीदाबाद के कांत एन्क्लेव पर भी पड़ेगा, जिसके मामले में सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने यह आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न आदेशों के तहत अरावली के संरक्षित वन क्षेत्र में किसी भी तरह के निर्माण या खनन की अनुमति नहीं है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने पिछले हफ्ते तटीय विनियमन क्षेत्र के नियमों का उल्लंघन करने के आरोप में केरल के एर्नाकुलम में मरादु नगरपालिका में पाँच अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स को एक महीने के भीतर गिराने का आदेश दिया। CRZ को ‘पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986’ के तहत पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा फरवरी-1991 में अधिसूचित किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य देश के संवेदनशील तटीय क्षेत्रों में गतिविधियों को नियमित करना है। तटीय क्षेत्र का हाई टाइड लाइन (HTL) से 500 मीटर तक का क्षेत्र तथा साथ ही खाड़ी, एस्चूरिज, बैकवॉटर और नदियों के किनारों को CRZ क्षेत्र माना गया है, लेकिन इसमें महासागर को शामिल नहीं किया गया है।

स्वच्छ भारत मिशन[सम्पादन]

  • 'अंगीकार'अभियान (‘Angikaar’ Campaign) की शुरुआत केंद्रीय आवास एवं शहरी मामलों के राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) ने 29 अगस्त,2019 को प्रबंधन परिवर्तन के लिये की। सामाजिक व्यवहार में परिवर्तन के लिये इस अभियान को शुरू किया गया है। इसमें प्रधानमंत्री आवास योजना (अर्बन) के तहत बनाए गए घरों के लाभार्थियों के लिये जल एवं ऊर्जा संरक्षण, अपशिष्ट प्रबंधन, स्वास्थ्य, वृक्षारोपण, सफाई एवं स्वच्छता जैसे मुद्दों पर सामुदायिक लामबंदी और आयात निर्यात कोड (Import Export Code- IEC) गतिविधियों के माध्यम से ध्यान केंद्रित किया गया है।
  • वेस्ट टू वेल्थ के लिये ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ की स्थापना करने के लिये आईआईटी दिल्ली और केंद्र सरकार के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार ने नई दिल्ली में सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किये। इस योजना का प्रमुख उद्देश्य विभिन्न राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय शिक्षण संस्थानों, उद्योगों, अनुसंधान प्रयोगशालाओं तथा अन्य एजेंसियों के पास उपलब्ध तकनीक का प्रयोग करते हुए पायलट परियोजनाओं की स्थापना कर भारतीय परिस्थितियों के अनुसार प्रौद्योगिकी का सर्वश्रेष्ठ प्रयोग करना है।
इसके तहत आईआईटी दिल्ली में वेस्ट टू वेल्थ (Waste to Wealth) कार्यक्रम प्रबंधन केंद्र की स्थापना की जाएगी।

‘वेस्ट टू वेल्थ मिशन’ को हाल ही में गठित प्रधानमंत्री की वैज्ञानिक प्रौद्योगिकी और नवाचार सलाहकार परिषद (Prime Minister’s Science, Technology & Innovation Advisory Council- PM-STIAC) द्वारा अनुमति प्रदान की गई है। आईआईटी, दिल्ली कूड़ा प्रबंधन के क्षेत्र में दिल्ली में पहले से ही कार्यरत है और कूड़ा प्रबंधन से जुड़े मुद्दों पर दिल्ली प्रशासन के साथ काम कर रहा है।

  • 19 नवंबर,2019 को विश्व शौचालय दिवस के अवसर पर, जल शक्ति मंत्रालय द्वारा द्वारा स्वच्छ सर्वेक्षण ग्रामीण पुरस्कार- 2019 प्रदान किये गए। शीर्ष स्थान तमिलनाडु को प्राप्त हुआ है तथा इसके बाद रैंकिंग में क्रमशः हरियाणा तथा गुजरात राज्य हैं। ज़िलों की श्रेणी में शीर्ष स्थान पेडापल्ली (तेलंगाना) का है इसके बाद क्रमशः फरीदाबाद तथा रेवाड़ी (हरियाणा) हैं। उत्तर प्रदेश अधिकतम जन भागीदारी वाला राज्य रहा है।

इस वर्ष प्रभावी प्लास्टिक कचरा प्रबंधन के लिये स्वच्छता ही सेवा अभियान के तहत, निगमों को भी उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया जिनमे सीमेंट निर्माता संघ, हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड तथा अमूल शामिल हैं। पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय ने एक स्वतंत्र सर्वेक्षण एजेंसी के माध्यम से मात्रात्मक और गुणात्मक स्वच्छता मानकों के आधार पर भारत के सभी ज़िलों की रैंकिंग तय करने के लिये "स्वच्छ सर्वेक्षण ग्रामीण- 2019" (SSG 2019) की शुरुआत की थी। इस सर्वेक्षण में भारत के सभी गाँवों के सार्वजनिक स्थानों जैसे- स्कूल, आँगनवाड़ी, सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्र, हाट/बाज़ार/धार्मिक स्थानों आदि का सर्वेक्षण किया।

  • लीचेट ट्रीटमेंट प्लांट(Leachate Treatment Plant) दक्षिणी दिल्ली नगर निगम द्वारा मानसून के दौरान सीपेज (Seepage) की समस्या को दूर करने के लिये ओखला लैंडफिल में लगाया है। लीचेट काले रंग का, दुर्गंध युक्त, विषैला तरल पदार्थ है जो लैंडफिल (कूड़े का ढेर) में कचरे के सड़ने से निकलता है,इसमें कवक और बैक्टीरिया के अलावा हानिकारक रसायन भी मौज़ूद होते हैं। यह लैंडफिल के तल पर जमा हो जाता है तथा भूजल को दूषित करने वाली मिट्टी के माध्यम से नीचे की ओर रिसकर चला जाता है।

यह सतह के पानी को भी दूषित करता है।

  • स्वच्छ- निर्मल तट अभियानपर्यावरण,वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा 11 से 17 नवंबर,2019 तक चलाया जा रहा है। इस अभियान का उद्देश्य 50 समुद्र तटों को चिह्नित करके समुद्र तटों में तटीय पारिस्थितिकी प्रणालियों के महत्त्व के बारे में लोगों में जागरूकता पैदा करना है। इस अभियान के क्रियान्वयन की ज़िम्मेदारी MoEFCC के तहत कार्यरत पर्यावरण शिक्षा प्रखंड और एकीकृत तटीय प्रबंधन सोसायटी (Society of Integrated Coastal Management- SICOM) को सौंपी गई है।
  • पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने ‘ब्लू फ्लैग’ प्रमाणन के लिये भारत में 12 समुद्र तटों का चयन किया है, इन तटों को स्वच्छता और पर्यावरण अनुकूलता के अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप तैयार किया जाएगा। ब्लू फ्लैग प्रमाण-पत्र अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक गैर सरकारी संगठन फाउंडेशन फॉर इनवॉयरमेंटल एजूकेशन (Foundation for Environmental Education-FEE) द्वारा प्रदान किया जाता है। वर्ष 1985 में फ्राँस में स्थापित इस संस्था ने वर्ष 1987 से यूरोप में अपना कार्य शुरू किया।
  • पाँचवें वार्षिक स्वच्छता सर्वेक्षण 'स्वच्छ सर्वेक्षण 2020’ की शुरुआत आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय द्वारा संचालित की गई। जनवरी 2020 से इसका संचालन करना सुनिश्चित किया गया है।
स्वच्छ सर्वेक्षण 2020 टूलकिट,स्वच्छ भारत मिशन वॉटर प्लस प्रोटोकॉल एवं टूलकिट,एकीकृत कचरा प्रबंधन एप- स्वच्छ नगर तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) युक्त mSBM एप की शुरुआत भी की गई है।

टूलकिट में विस्तृत सर्वेक्षण पद्धति एवं स्कोर के साथ घटक संकेतक हैं ताकि इस सर्वेक्षण के लिये शहरों को तैयार करने में मदद की जा सके। त्रैमासिक आधार पर स्वच्छता मूल्यांकन करके इस सर्वेक्षण के 5वें संस्करण के साथ एकीकृत किया जाएगा। स्वच्छता संबंधी कार्यों में सेवा स्तर के प्रदर्शन की निरंतर निगरानी के साथ शहरों के वास्तविक प्रदर्शन को बनाए रखना रैंकिंग:-दो श्रेणियों में।

  1. एक लाख व उससे अधिक जनसंख्या वाले शहरों तथा
  2. एक लाख से कम जनसंख्या वाले शहरों

महत्व:-जनवरी 2020 के वार्षिक सर्वेक्षण में शामिल तिमाही आकलन के 25% भारांक दिए जाएंगे।

  • स्वच्छ शक्ति 2019 का आयोजन पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय ने हरियाणा सरकार के साथ मिलकर किया।स्वच्छ शक्ति के इस तीसरे सम्मेलन का आयोजन हरियाणा के कुरुक्षेत्र में किया गया।

इसका उद्देश्य स्वच्छ भारत मिशन में ग्रामीण महिलाओं द्वारा निभाई गई नेतृत्वकारी भूमिका पर प्रकाश डालना था। इस आयोजन में पूरे देश की महिला सरपंच और पंच शामिल हुईं। लगभग 15,000 महिलाओं ने इस कार्यक्रम में भाग लिया तथा स्वच्छ भारत के लिये ग्रामीण क्षेत्रों में ज़मीनी स्तर पर अपनाई गई बेहतरीन पद्धतियों को साझा किया। इस कार्यक्रम में स्वच्छ भारत की उपलब्धियों और हाल ही में आयोजित स्वच्छ सुंदर शौचालय, (Neat and Clean Toilet) जो कि विश्व में अपनी तरह का एक अनूठा अभियान है का भी पहली बार इसमें प्रदर्शन किया गया।

  • गंगा आमंत्रण अभियान(Ganga Aamantran Abhiyan)-जल शक्ति मंत्रालय द्वारा प्रारंभ एक राफ्टिंग और नौका चालन अभियान है। उत्तराखंड के देवप्रयाग से लेकर पश्चिम बंगाल के गंगा सागर तक क्रियान्वित इस अभियान में थल सेना, जल सेना और वायु सेना के कुछ सैनिक शामिल होंगे, जिनका नेतृत्व विंग कमांडर परमवीर सिंह द्वारा किया जाएगा। इस समूह में राष्ट्रीय आपदा अनुक्रिया बल (NDRF) और CSIR के सदस्य भी शामिल होंगे। CSIR के सदस्य अभियान के दौरान विभिन्न स्थानों से गंगा के पानी का सैंपल एकत्र कर अनुसंधान कार्य भी करेंगे।[२]

उद्देश्य:-

  1. गंगा नदी को प्रदूषण रहित बनाने और जल संरक्षण के संदेश को व्यापक पैमाने पर प्रसारित करना।
  2. गंगा नदी में प्रदूषण के कारण हो रहे पारिस्थितिकी बदलाओं से लोगों को जागरूक किया जाएगा।
  • 'ग्लोबल गोलकीपर अवार्ड'बिल एवं मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन द्वारा प्रदत। वर्ष 2019 का यह पुरस्कार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को स्वच्छ भारत अभियान(शुरुआत 2 अक्तूबर 2014 को) के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और नेतृत्व के लिये चुना गया है।

यह अवॉर्ड पाँच श्रेणियों के तहत किसी नेता द्वारा अपने देश में या वैश्विक स्तर पर सतत् विकास लक्ष्य को प्राप्त करने के प्रयासों के लिये दिया जाता है।इस पुरस्कार की पाँच श्रेणियाँ ‘प्रोग्रेस’, ‘चेंजमेकर’, ‘कैम्पेन’, ‘गोलकीपर्स वॉइस’ और ‘ग्लोबल गोलकीपर’ है।

  • फिट इंडिया प्लॉगिंग रन (Plogging Run) के लिये रिपु दमन बेवली को भारत का प्लॉगिंग दूत घोषित किया गया। पहले फिट इंडिया प्लॉगिंग रन की शुरुआत 2 अक्तूबर, 2019 को हुई थी जिसमें देश भर के 62 हज़ार स्थानों से 36 लाख से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया था। इसका समापन दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में हुआ। इसका आयोजन भारतीय खेल प्राधिकरण,नेहरू युवा केंद्र संगठन,राष्ट्रीय सेवा योजना,गैर- सरकारी संगठनों,केंद्रीय विद्यालय और कई अन्य संगठनों ने मिलकर किया था। इस कार्यक्रम के तहत युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय ने देशव्यापी प्लॉगिंग दूत अभियान की शुरुआत भी की,इसके तहत जो भारतीय दौड़ते हुए अपने शहरों, नगरों और ज़िलों को स्वच्छ बना रहे हैं, उन्हें अपने क्षेत्रों का प्लॉगिंग दूत नामित किया गया है।
श्री रिपु दमन बेवली ने 2017 में प्लॉगिंग शुरू की थी। बेवली और उनके दल ने लगभग दो महीने के दौरान 1,000 किलोमीटर की दौड़ पूरी की और 50 शहरों को स्वच्छ बनाया। इस दौरान उन्होंने 2.7 टन कचरा जमा किया।
  • भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मामल्लपुरम् के समुद्र तट पर अपनी सुबह की सैर के दौरान कचरा उठाते (इस प्रकार की गतिविधि को प्लॉगिंग कहते हैं) देखा गया। प्लॉगिंग (Plogging) दो शब्दों, स्वीडिश वाक्यांश प्लोकाअप (Plocka Upp) और जॉगिंग (Jogging) का एक संयोजन है। प्लॉगिंग एक प्रकार की अंतर्राष्ट्रीय फिटनेस प्रवृत्ति है, जिसमें टहलना और कचरा उठाना शामिल है।

वर्ष 2016 में स्वीडन में एरिक अह्लस्ट्रॉम (Erik Ahlström) द्वारा इसकी शुरुआत की गई। अपने कार्य पर जाते समय एरिक सड़क पर फैला कचरा उठाते थे, धीरे-धीरे यह उनकी आदत बन गई। बहुत सारे लोग भी इस कार्य को करने लगे और यह एक व्यायाम के रूप में स्थापित हो गया। स्वीडन से प्रारंभ होकर यह आंदोलन सोशल मीडिया के माध्यम से पूरे विश्व में फ़ैल गया है।

  • मार्च 2019 में बायो-डाइजेस्टर प्रौद्योगिकी का विकास रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) द्वारा किया गया। इस तकनीकी से आने वाले वर्षों में स्वच्छता क्षेत्र में अभूतपूर्व परिवर्तन की संभावना है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी कर्नाटक के परिसर में दक्षिण कन्नड़ निर्मिथि केंद्र में बायो डाइजेस्टर प्रौद्योगिकी का प्रदर्शन किया गया। एमएम इंडस्ट्रियल कंट्रोल्स प्राइवेट लिमिटेड (MM Industrial Controls Pvt Ltd.) के प्रबंध निदेशक ने इस बायो-डाइजेस्टर प्रौद्योगिकी से संबंधित महत्त्वपूर्ण जानकारी दी।

इनके अनुसार, इस तकनीकी में बायो-डाइजेस्टर टैंक के साथ संलग्न एक जैव-शौचालय होता है जो मानव मल को बायोगैस और पुन: उपयोग किये जा सकने वाले जल में परिवर्तित करता है। इसका उपयोग भारतीय रेलवे और सशस्त्र बलों द्वारा सफलतापूर्वक किया जा रहा है। इसमें एनएरोबिक माइक्रोबियल इनोकुलम (Anaerobic Microbial Inoculum) तकनीकी का उपयोग किया गया है ताकि जीवों को बायोगैस और पानी में परिवर्तित किया जा सके। इसका उपयोग कृषि एवं बागवानी प्रयोजनों के लिये भी किया जा सकता है। इस प्रौद्योगिकी का उपयोग पारंपरिक शौचालयों में भी किया जा सकता है। इस प्रौद्योगिकी को स्थापित करने में पारंपरिक शौचालयों के टैंको की तुलना में कम स्थान की जरूरत होती है। रखरखाव और स्थापना की लागत भी कम होती हैं। टंकियों को स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर अनुकूलित किया जा सकता है और माइनस (-) 20 डिग्री से लेकर 50 डिग्री तक के तापमान में संचालित किया जा सकता है।

बायो-डाइजेस्टर टैंक जीवनभर के लिये रखरखाव-मुक्त होते हैं, क्योंकि एनएरोबिक माइक्रोबियल इनोकुलम को टैंक में केवल एक ही बार डाला जाता है।

मरूस्थलीकरण[सम्पादन]

  • केंद्र सरकार गुजरात से दिल्ली-हरियाणा सीमा तक 1,400 किमी. लंबी और 5 किमी. चौड़ी हरित पट्टी (Green Belt) बनाने की महत्त्वाकांक्षी योजना पर विचार कर रही है। यह योजना वर्ष 2007 से लागू अफ्रीका की ‘ग्रेट ग्रीन वॉल परियोजना’ (Great Green Wall Project) से प्रेरित है, जिसमें सेनेगल (Senegal) से ज़िबूती (Djibouti) तक एक ‘ग्रीन वॉल’ का निर्माण किया जा रहा है। यह हरित पट्टी पोरबंदर से पानीपत तक बनाई जाएगी जो अरावली पर्वत में वनीकरण के माध्यम से निम्नीकृत भूमि के पुनर्निर्माण में सहायक होगी।

भारत ने भूमि पुनर्स्थापना के लक्ष्यों को प्राथमिक स्तर पर रखा है जिसके अंतर्गत भारत का प्रयास वर्ष 2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर निम्नीकृत भूमि को पुनर्स्थापित करना है।

अरावली क्षेत्र की पहचान उन प्रमुख निम्नीकृत भूमि वाले क्षेत्रों में से की गई है जिन्हें वर्ष 2030 तक पुनर्स्थापित किया जाना है।

वर्तमान में भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र (328.7 मिलियन हेक्टेयर) का 29.3% भाग (96.4 मिलियन हेक्टेयर) निम्नीकृत है। इसरो की 2016 की एक रिपोर्ट (The desertification and land degradation atlas of India) में यह संकेत दिया था कि दिल्ली, गुजरात और राजस्थान में 50% से अधिक भूमि का क्षरण पहले ही हो चुका है। अफ्रीका की ग्रेट ग्रीन वॉल परियोजना(Great Green Wall of Africa Project)का उद्देश्य अफ्रीका की निम्नीकृत भूमि का पुनर्निर्माण करना तथा विश्व के सर्वाधिक गरीब क्षेत्र, साहेल (Sahel) में निवास करने वाले लोगों के जीवनस्तर में सुधार लाना है। योजना के पूर्ण हो जाने पर यह वॉल पृथ्वी पर सबसे बड़ी जीवित संरचना होगी। इस परियोजना को अफ्रीकी संघ द्वारा UNCCD, विश्व बैंक और यूरोपीय आयोग सहित कई भागीदारों के सहयोग से शुरू किया गया था। संयुक्‍त राष्‍ट्र मरुस्‍थलीकरण रोकथाम कन्वेंशन, कांफ्रेंस ऑफ़ पार्टीज़- 14 (UN Convention to Combat Desertification- UNCCCD, COP14) के दौरान अफ्रीकी देशों ने वर्ष 2030 तक महाद्वीप के साहेल क्षेत्र में योजना को लागू करने हेतु वित्त के संदर्भ में वैश्विक समर्थन की मांग की थी। अफ्रीकी देशों के प्रयासों के अतिरिक्त COP14 में शांति वन पहल (Peace Forest Initiative-PFI) की शुरुआत की गई, जिसका उद्देश्य संघर्षग्रस्त सीमावर्ती क्षेत्रों में भूमि क्षरण के मुद्दे को संबोधित करना है। शांति वन पहल पेरू और इक्वाडोर के बीच स्थापित पीस पार्क (Peace Park) पर आधारित है। साहेल क्षेत्र (Sahel Region) पश्चिमी और उत्तर-मध्य अफ्रीका का एक अर्ध-शुष्क क्षेत्र (Semiarid Region) है जो पूर्व सेनेगल (Senegal) से सूडान (Sudan) तक फैला हुआ है। यह उत्तर में शुष्क सहाराई रेगिस्तान तथा दक्षिण में आर्द्र सवाना के बीच एक संक्रमणकालीन क्षेत्र का निर्माण करता है।

  • केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री ने बंजर भूमि एटलस-2019 (Wastelands Atlas– 2019) का विमोचन किया। राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग सेंटर (National Remote Sensing Centre- NRSC) द्वारा भारतीय दूरसंवेदी उपग्रह डेटा का उपयोग करते हुए बंजर भूमि मानचित्रण को इस एटलस के रुप में पाँचवें संस्करण के रूप में प्रकाशित किया गया है। इससे पहले भूमि संसाधन विभाग ने अंतरिक्ष विभाग (Space Department) के NRSC के सहयोग से भारत के बंजर भूमि एटलस के वर्ष 2000, 2005, 2010 और 2011 के संस्करण को प्रकाशित किया था।
इसमें जम्मू-कश्मीर के अब तक के सर्वेक्षण नहीं किए गए 12.08 मिलियन हेक्‍टेयर क्षेत्र को भी शामिल किया गया है। इसके अलावा एटलस में बंजर भूमि की विभिन्न श्रेणियों के ज़िले और राज्यवार विभाजन को प्रकाशित किया गया है।

इस एटलस में वर्ष 2008-09 से वर्ष 2015-16 के बीच हुए परिवर्तनों को शामिल किया गया है। इसके अनुसार राजस्थान, बिहार, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, मिज़ोरम, मध्य प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और पश्चिम बंगाल राज्यों में बड़े पैमाने पर बदलाव आया है।

  • [2001 से प्रत्येक 2 वर्षों में इसका आयोजन]2-13 सितंबर, 2019 को नई दिल्ली में संयुक्त राष्ट्र मरूस्थलीकरण रोकथाम अभिसमय’(UNCCD) के पार्टियों का 14वां सम्मेलन(COP14)का आयोजन किया गया। इस अवसर पर ‘सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये भूमि पुनर्स्थापन’ नामक रिपोर्ट जारी की गई थी। इस बैठक में रेत और धूल भरे तूफान का सामना करने के लिये एक नए वैश्विक गठबंधन की शुरुआत की गई।
रेत और धूल के तूफानों को सिरोको (Sirocco), हबूब (Haboob),येलो डस्ट (Yellow Dust),व्हाइट स्टॉर्म (White Storms) और हारमटन (Harmattan) के रूप में भी जाना जाता है। यह भूमि एवं जल प्रबंधन तथा जलवायु परिवर्तन से जुड़ी एक प्राकृतिक घटना है। इन तूफानों की तीव्रता, परिमाण या एक-दूसरे के साथ संबद्धता इन्हें अप्रत्याशित और खतरनाक बना सकती है
UNCCD द्वारा 45 देशों को इन तूफानों के स्रोतों के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

सदस्य राज्यों के आग्रह के बाद संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) द्वारा संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण प्रबंधन समूह (UN Environment Management Group) के माध्यम से सितंबर 2018 में बनाए गए गठबंधन की स्थापना और शुरुआती उपलब्धियों हेतु आवश्यक योगदान दिया गया है। नवगठित गठबंधन के प्रमुख लक्ष्य:-वैश्विक, क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय स्तरों पर प्रभावित देशों एवं संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों के बीच भागीदारों को संलग्न करने तथा संवाद और सहयोग को बढ़ावा देने के लिये एक मंच प्रदान करना।

भारत ने इस विषय पर अपने राज्यों के मार्गदर्शन हुए एक योजना प्रस्तुत की।

हालाँकि ईरान ने इस बात पर बल दिया कि रेत और धूल भरे तूफान वाले हॉटस्पॉट पर पारंपरिक और आधुनिक ज्ञान के समृद्ध समन्वय का प्रयोग करके सशक्त क्षेत्रीय पहल की जा सकती है।

इस समारोह के दौरान केंद्रीय मंत्री ने वन भूमि पुनर्स्थापन और भारत में बॉन चुनौती (Bonn Challenge) पर अपनी क्षमता बढाने के लिये एक फ्लैगशिप परियोजना (Flagship Project) की शुरुआत की।

पर्यावरण मंत्री के अनुसार,भूमि के क्षरण से देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 30 प्रतिशत प्रभावित हो रहा है। भारत लक्ष्यों को प्राप्त करने के साथ-साथ इस समझौते के प्रति संकल्‍पबद्ध है।

फ्लैगशिप परियोजना (Flagship Project) 3.5 वर्षों की पायलट चरण की होगी,जिसे हरियाणा,मध्य प्रदेश,महाराष्ट्र,नागालैंड और कर्नाटक में साढ़े तीन साल के पायलट चरण के दौरान लागू किया जाएगा।

परियोजना का उद्येश्य भारतीय राज्यों के लिये उत्तम कार्य प्रणाली और निगरानी प्रोटोकॉल को विकसित करना तथा अनुकूल बनाना और पांच पायलट राज्यों के भीतर क्षमता का निर्माण करना है। परियोजना के आगे के चरणों में पूरे देश में इसका विस्‍तार किया जाएगा।

UNCCD एकमात्र अंतर्राष्ट्रीय समझौता है जो पर्यावरण एवं विकास के मुद्दों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी है। मरुस्थलीकरण की चुनौती से निपटने के लिये अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों के बारे में लोगों में जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से प्रत्येक वर्ष 17 जून को ‘विश्व मरुस्थलीकरण और सूखा रोकथाम दिवस’ मनाया जाता है।

भारत में भू-क्षरण का दायरा 96.40 मिलियन हेक्टेयर है जो कुल भौगोलिक क्षेत्र का 29.30 प्रतिशत है। 70 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र शुष्क भूमि के रूप में है, जिसमें से 30 प्रतिशत भूमि भू-क्षरण की प्रक्रिया में तथा 25 प्रतिशत भूमि मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया में है। विज्ञान और पर्यावरण केंद्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2003-05 और 2011-13 के बीच 18.7 लाख हेक्टेयर भूमि का मरुस्थलीकरण हुआ है। हर साल लगभग 20 मिलियन टन के बराबर अनाज के उत्पादन में कमी आ रही है। विश्व के कुल क्षेत्रफल का पाँचवां भाग अर्थात् 20% हिस्सा मरुस्थल है।

  • 17 जून को ‘विश्व मरुस्थलीकरण और सूखा रोकथाम दिवस’मरुस्थलीकरण की चुनौती से निपटने के लिये अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से इस दिवस को 25 साल पहले शुरू किया गया था। वर्ष 2019 में इस विश्व दिवस पर इसकी थीम ‘लेट्स ग्रो द फ़्यूचर टुगेदर’ (Let's Grow the Future Together) है।

इस वर्ष इसमें भूमि से संबंधित तीन प्रमुख मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है- सूखा, मानव सुरक्षा और जलवायु।

जलवायु परिवर्तन तथा हरित गृह गैसों को कम करने के उपाय[सम्पादन]

  • फायेंग मणिपुर के इम्फाल ज़िले के इस छोटे से गाँव को भारत के पहले कार्बन पॉज़िटिव गाँव के रूप में विकसित किया गया है।

यदि कोई गाँव ग्रीनहाउस गैसों के संचय को कम करने के लिये वातावरण में उपस्थित कार्बन को कम करता है तो उसे कार्बन-पॉजिटिव टैग दिया जाता है। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप जलवायु परिवर्तन का प्रभाव कम होता है।

1970 और 80 के दशक में शुष्क और बदहाल पड़े इस गाँव के कायाकल्प हेतु वित्तपोषित राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन अनुकूलन निधि(NAFCC) के तहत किया गया।

राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन अनुकूलन निधि (NAFCC) की स्थापना अगस्त 2015 में की गई थी, इसका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन के विपरीत परिणामों के प्रति (विशेष रूप से संवेदनशील राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों हेतु) जलवायु परिवर्तन अनुकूलन लागत को पूरा करना था।

नाबार्ड इसकी राष्ट्रीय कार्यान्वयन इकाई है।
  • प्रथम'रिजिलिएंट केरल'कार्यक्रम के लिए भारत सरकार,केरल सरकार और विश्व बैंक ने मिलकर 250 मिलियन अमरीकी डॉलर के ऋण समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसका उद्देश्य प्राकृतिक आपदाओं और जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से निपटने में राज्य की सुदृढ़ क्षमता में वृद्धि करना है। यह भारत सरकार द्वारा केरल सरकार के 'केरल का पुनर्निर्माण विकास कार्यक्रम'को प्रदत सहायता का एक भाग है। यह कार्यक्रम भारत में विश्व बैंक की प्रथम राज्य साझेदारी को दर्शाने वाला दो विकास नीतिगत परिचालनों में से प्रथम है।
  • नई दिल्ली में भारत के पहले सबसे बड़े जैव प्रौद्योगिकी सम्मेलन ग्लोबल बायो-इंडिया समिट- 2019 (Global Bio-India Summit- 2019) का आयोजन किया गया।

क्रियान्वयन: इसका आयोजन भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत कार्यरत जैव-प्रौद्योगिकी विभाग ने अपने सार्वजनिक उपक्रम जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद के साथ मिलकर किया। इस आयोजन में भारतीय उद्योग परिसंघ (CII),एसोसिएशन ऑफ बायोटेक्नोलॉजी लेड एंटरप्राइज़ेज़ (Association of Biotechnology Led Enterprises- ABLE) और इन्वेस्ट इंडिया (Invest India) भी भागीदार थे। इस तीन दिवसीय सम्मलेन का आयोजन 21- 23 नवंबर, 2019 तक किया गया। प्रमुख बिंदु इस शिखर सम्मेलन ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को भारत के जैव-प्रौद्योगिकी क्षेत्र की क्षमता प्रदर्शित करने का अवसर प्रदान किया। जैव-प्रौद्योगिकी तेज़ी से उभरने वाला क्षेत्र है जो वर्ष 2025 तक भारत की अर्थव्‍यवस्‍था को 5 ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य तक पहुँचाने में उल्‍लेखनीय योगदान कर सकता है।

  • CPCB की बायोलॉजिकल हेल्थ ऑफ रिवर गंगा नामक रिपोर्ट में कहा गया है कि औसत तापमान में लगभग एक डिग्री तक की वृद्धि से ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार बढ़ी है। ग्लेशियर नेशनल पार्क एक अमेरिकी राष्ट्रीय उद्यान है जो कनाडा-संयुक्त राज्य अमेरिका की सीमा पर, उत्तर-पश्चिमी मोंटाना में स्थित है, जो कि अल्बर्टा और ब्रिटिश कोलंबिया के कनाडाई प्रांतों से सटा हुआ है। यहाँ वर्ष 1910 में 150 से अधिक ग्लेशियर थे और आज इनकी संख्या 30 से भी कम रह गई है।
  • सुप्रीम कोर्ट द्वारा ताज़ ट्रेपेज़ियम ज़ोन (TTZ) में किसी भी तरह के निर्माण पर लगाई गई रोक को हटा दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन में निर्माण पर मार्च 2018 में रोक लगाई थी। ताज ट्रैपेज़ियम ज़ोन (TTZ) स्मारक को प्रदूषण से बचाने के लिये ताजमहल के चारों ओर 10,400 वर्ग किमी. का परिभाषित क्षेत्र है।

यह उत्तर प्रदेश के आगरा,फिरोजाबाद,मथुरा,हाथरस एवं एटा और राजस्थान के भरतपुर ज़िले में फैला हुआ है। ताजमहल के चारों ओर स्थित एक समलम्ब (Trapezoid) के आकार का होने के कारण इसे ताज ट्रैपेज़ियम ज़ोन (TTZ) का नाम दिया गया है। इसमें तीन विश्व धरोहर स्थल ताजमहल,आगरा का किला और फतेहपुर-सीकरी शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय:-

एक जनहित याचिका के जवाब में ताजमहल को पर्यावरण प्रदूषण से बचाने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने 30 दिसंबर,1996 को ताज ट्रैपेजियम ज़ोन (TTZ) के तहत आने वाले उद्योगों के बारे में एक फैसला सुनाया जिसके तहत- TTZ में स्थित उद्योगों में कोयले / कोक के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया गया। कहा गया है कि उद्योगों में कोयला / कोक को प्राकृतिक गैस से प्रतिस्थापित किया जाए। या उद्योगों को TTZ के बाहर स्थानांतरित या बंद किया जाए। आगे की राह सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक हटाने के बाद अब सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी की अनुमति से ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन में बुनियादी सुविधाओं के लिये गैर-प्रदूषणकारी निर्माण कार्य किये जा सकेंगे।

  • स्टबल कटिंग मशीन(Stubble Cutting Machines)- पंजाब,हरियाणा,उत्तर प्रदेश एवं राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में फसल अवशेषों के स्व-स्थाने (In-situ) प्रबंधन हेतु कृषि यंत्रीकरण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने दो वर्षों के लिये एक नई केंद्रीय क्षेत्र की योजना को मंज़ूरी दी है।

इसके तहत किसानों को फसल के अवशेषों के स्व-स्थाने प्रबंधन के लिये आवश्यक मशीनरी में सब्सिडी प्रदान की जाएगी।

योजना का उद्देश्य
  1. वायु प्रदूषण को कम करना तथा फसल अवशेषों को जलाने से होने वाले पोषक तत्त्वों एवं मृदा के सूक्ष्मजीवों की हानि को रोकना।
  2. उचित मशीनीकरण के माध्यम से फसल अवशेषों के स्व-स्थाने प्रबंधन को बढ़ावा देना।
  3. फसल अवशेष प्रबंधन विधियों का प्रदर्शन, क्षमता निर्माण गतिविधियाँ तथा फसल अवशेषों के प्रभावी उपयोग एवं प्रबंधन हेतु शिक्षा-संचार रणनीतियों के माध्यम से हितधारकों के बीच जागरूकता पैदा करना।
  • दिल्ली में भीषण गर्मी के कारण भारतीय मौसम विभाग द्वारा रेड कलर वार्निंग जारी :- 31 मई को मौसम विभाग ने राजधानी में अधिकतम तापमान 46.8 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया,जो पिछले पाँच साल में सबसे अधिक तापमान है।
इनमें हरा रंग सामान्य मौसम का परिचायक है;
पीला रंग मौसम से सावधान रहने और उस पर निगाह रखने की सलाह देता है;

संतरी रंग का अलर्ट तब जारी किया जाता है जब अधिकतम तापमान लगातार दो दिन तक सामान्य से पांच डिग्री तक अधिक बना रहता है। उस स्थिति में लू चलने की घोषणा की जाती है।

  • लाल रंग का अलर्ट जारी होने का मतलब है कि अधिकतम तापमान सामान्य से पाँच डिग्री से भी अधिक रह सकता है।

जल एवं वायु प्रदूषण एवं संरक्षण कार्यक्रम[सम्पादन]

  • काले तेल से सने हुए कुछ गोले या टारबॉल्स (Tarballs)

दक्षिण मुंबई के एक प्रसिद्ध पर्यटक स्थल, गिरगाँव चौपाटी में रेतीले समुद्र के तट पर बड़े दिखाई दिये थे। टारबॉल्स गहरे काले रंग की गेंदे होती हैं, जिनका निर्माण समुद्री वातावरण में कच्चे तेल के अपक्षय (Weathering) के कारण होता है। एक हालिया शोध-पत्र के मुताबिक चारकोल की इन गेंदों को तटों तक लाने का काम समुद्री लहरों द्वारा किया जाता है। टारबॉल्स आमतौर पर सिक्के के आकार के होते हैं और समुद्र तटों पर बिखरे हुए पाए जाते हैं। हालाँकि बीते कुछ वर्षों में ये बास्केटबॉल के आकार के हो गए हैं और इनका वजन लगभग 6-7 किलोग्राम तक पहुँच गया है। टारबॉल्स की उपस्थिति समुद्र में तेल के रिसाव का ही संकेत देती हैं, परंतु हर बार मानसून के दौरान पश्चिमी तटों पर इनकी उपस्थिति की वार्षिक घटना समुद्री जीव वैज्ञानिकों के लिये परीक्षण का एक प्रमुख विषय बन गया है। इस संदर्भ में विशेषज्ञों ने अधिकारियों से सतर्कता बरतने और इस बात की जाँच करने के लिये कहा है कि कहीं समुद्री जहाज़ अपने जले हुए तेल का कचरा समुद्रों में ही तो नहीं फेंक रहे हैं। तेल के कुओं में दरारें, जहाज़ो की तली से अचानक तथा स्वयं होने वाला रिसाव, नदियों का अपवाह, नगरपालिकाओं के सीवेज़ के ज़रिये निर्मुक्त होने वाला मल-जल तथा औद्योगिक प्रदूषक आदि भी टारबॉल्स के निर्माण का कारण हैं। टारबॉल्स को तोड़ना मुश्किल है और इसलिये ये समुद्र में लंबी दूरी तक यात्रा कर सकते हैं। वर्ष 2010 से ही गोवा, दक्षिण, मंगलुरु और लॉस एंजेल्स में समुद्र तटों पर टारबॉल्स की घटनाओं के मामले दर्ज किये गए हैं। भारत में अभी तक समुद्री टारबॉल्स के कारण समुद्री तट को बंद करने का मामला सामने नहीं आया है।

  • नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (NMCG) नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी का कार्यान्वयन विंग है। 12 अगस्त,2011 को सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के तहत पर्यावरण,वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा बनाई गई है।

लेकिन अब NGRBAऔर NMCG दोनों को जल शक्ति मंत्रालय (Ministry of Jal Shakti) को आवंटित किया गया है। नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा ने सभी त्योहारों के दौरान गंगा या उसकी सहायक नदियों में मूर्तियों के विसर्जन को रोकने के लिये 15 सूत्री निर्देश जारी किये हैं।

  • जलदूत’(Jaldoot) नामक प्रारंभ अभियान का उद्देश्य जल संरक्षण के संदेश को जन-जन तक पहुँचाना है।

इस का आयोजन क्षेत्रीय आउटरीच ब्यूरो (Regional Outreach Bureau-ROB), पुणे द्वारा महाराष्ट्र राज्य सड़क परिवहन निगम (Maharashtra State Road Transport Corporation- MSRTC) के सहयोग से किया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि क्षेत्रीय आउटरीच ब्यूरो सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के तहत कार्य करता है। ROB ने ‘जलदूतः जलशक्ति अभियान पर यात्रा प्रदर्शनी’ के लिये एक बस को खासतौर पर डिज़ाइन किया है। इस प्रदर्शनी में विभिन्न सूचनाओं के साथ डिस्प्ले पैनल और ऑडियो-विजुअल उपकरण लगाए गए हैं। इस बस से कर रहे संगीत एवं नाटक प्रभाग के सांस्कृतिक दल और कलाकार सरकार की पहल के बारे में जागरूकता पैदा करेंगे। यह बस अगले 2 महीनों में महाराष्ट्र के 8 ज़िलों का दौरा करेगी। इसके तहत विभिन्न जगहों पर आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में प्रतियोगिता, रैली, सांस्कृतिक कार्यक्रम आदि शामिल हैं जो जल संरक्षण प्रयासों पर जागरूकता पैदा करने पर केंद्रित होंगे। ध्यातव्य है कि देश में बढ़ते जल संकट से निपटने के लिये भारत सरकार ने जलशक्ति अभियान भी शुरू किया है। यह एक जल संरक्षण अभियान है जो देश भर में 256 ज़िलों के 1592 दबावग्रस्त ब्लॉकों (Stressed Blocks) पर केंद्रित है।

  • आवास और शहरी कार्य मंत्रालय द्वारा प्रदत स्वच्छ सर्वेक्षण पुरस्कार 2019 के तहत इंदौर (मध्य प्रदेश) को लगातार तीसरी बार सबसे स्वच्छ शहर चुना गया है वहीं अंबिकापुर (छत्तीसगढ़) और मैसूर (कर्नाटक) क्रमश: दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं। नई दिल्ली नगरपालिका परिषद (NDMC) क्षेत्र को 'सबसे साफ छोटा शहर' का पुरस्कार दिया गया एवं उत्तराखंड के ‘गौचर’ को 'सर्वश्रेष्ठ गंगा टाउन' घोषित किया गया है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार गंगा नदी का पानी सीधे पीने यानी बिना शुद्ध किये पीने लायक नहीं है।कुल 86 स्थानों पर स्थापित किये गए लाइव निरीक्षण केंद्रों में से केवल सात ऐसे स्थान पाए गए, जहाँ का पानी शुद्ध करने की प्रक्रिया के बाद पीने योग्य है,Coliform जीवाणु का स्तर बहुत बढ़ा हुआ।

वायु प्रदूषण एवं संरक्षण कार्यक्रम[सम्पादन]

  • सतत परिवेशी वायु गुणवत्ता निगरानी प्रणाली (CAAQMS) भारतीय सेना द्वारा फोर्ट विलियम मिलिट्री स्टेशन में अपने देशव्यापी 'गो ग्रीन ' पहल के एक भाग के रूप में अधिकृत किया गया। इसके पूर्वी कमान मुख्यालय में वास्तविक समय के आधार पर परिवेशी वायु गुणवत्ता का मापम करेगी।
  • केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 19 राज्यों में 270 टायर पायरोलिसिस इकाइयों की जाँच की और पाया कि ये इकाइयाँ प्रदूषण को बढ़ावा दे रही हैं। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (NGT) ने अप्रैल 2019 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा दी गई रिपोर्ट में माना था कि टायर पायरोलिसिस इकाइयों में 40% से अधिक इकाइयाँ नियमों का अनुपालन नहीं कर रही हैं।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि 19 राज्यों में स्थित कुल 637 इकाइयों मे से 251 इकाइयाँ नियमबद्ध थीं, वहीं 270 इकाइयाँ नियमों का पालन नहीं कर रही थीं, जबकि 116 इकाइयाँ बंद थीं।

टायर पायरोलिसिस अपशिष्ट टायरों को उपयोगी संसाधनों जैसे-ईंधन तेल,कार्बन ब्लैक,स्टील वायर आदि में बदलने की तकनीक है। इस तकनीक में अपशिष्ट टायरों को 250-500ºC तापमान पर गर्म किया जाता है जिससे कार्बन पदार्थ,पायरो-गैस एवं तेल अवशेष के रूप में उत्सर्जित होते है वहीं इन उत्सर्जित पदार्थों का पर्याप्त प्रबंधन न होने से मानव स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचता है। यह तकनीक टायर जलाने की तुलना में अधिक सुरक्षित मानी जाती है।
भारत पुनर्चक्रण और निपटान के लिये ऑस्ट्रेलिया एवं यू.के. से इस्तेमाल किये गए टायरों का आयात भी करता है।

भारत में प्रतिदिन लगभग 100 मिलियन टायरों का अपशिष्ट उत्पन्न होता है जिसमें कुछ का ही पुनर्नवीनीकरण हो पाता हैं। NGT ने विषाक्त पदार्थों के उत्सर्जन के कारण वर्ष 2014 में इस्तेमाल हुए टायरों को खुले में जलाने या ईंट भट्टों में ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने पर रोक लगा दी थी।

  • गुजरात सरकार ने वायु प्रदूषण को कम करने के लिये एक बाजार-आधारित व्यापार प्रणाली की शुरुआत 5 जून को की। सरकार ने प्रदूषण के उत्सर्जन के लिये एक सीमा (Cap) निर्धारित की है। साथ ही इसके दायरे में रहने के लिये परमिट खरीदने और बेचने की अनुमति दी है।
उत्सर्जन कारोबार कार्यक्रम (Emissions Trading Programme) को उत्सर्जन,उद्योग लागत और नियामक लागतों पर इसके प्रभावों को समझने के लिये प्रयोगात्मक परीक्षण के तौर पर किया जा रहा है।
इसके अंतर्गत सरकार द्वारा उत्सर्जन पर अधिकतम सीमा तय की गई है तथा उद्योगों को इस सीमा के नीचे रहने के लिये परमिट खरीदने और बेचने की अनुमति भी प्रदान की गई है।
कणिका वायु प्रदूषण (Particulate Air Pollution) को रोकने के लिये भारत सहित दुनिया का यह प्रथम कारोबारी कार्यक्रम (Trading Programme) है जिसे सूरत में शुरू किया गया है।
गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड(GPCB) ने EPIC (Electronic Portfolio of International Credentials) और अन्य संस्थानों जैसे- हार्वर्ड कैनेडी स्कूल (Harvard Kennedy School), येल विश्वविद्यालय और अब्दुल लतीफ जमील पॉवर्टी एक्शन लैब के शोधकर्त्ताओं के साथ मिलकर कार्यक्रम के लाभों और लागतों का मूल्यांकन किया है।
कैप एंड ट्रेड सिस्टम (Cap And Trade System)में विनियामक द्वारा सर्वप्रथम किसी निश्चित अवधि में सभी उद्योगों के लिये वायु प्रदूषण उत्सर्जन की अधिकतम सीमा (Cap)तय की जाती है।
  1. इसके बाद परमिट सृजित किया जाता है जिसमें प्रत्येक को कुछ सीमा तक प्रदूषण उत्सर्जन की अनुमति होती है तथा कुल परमिट अधिकतम तय प्रदूषण उत्सर्जन के बराबर होता है।
  2. सामान्यतः यह परमिट एक संख्या में होता है जिसे खरीदा या बेचा जा सकता है।
  • पर्यावरणीय प्रदूषण को कम करने तथा टिकाऊ आवास हेतु कृषि-अपशिष्ट से जैव-ईंटों को निर्मित करने की दिशा में विचार किया जा रहा है। इसे गेहूँ के तिनकों,धान के पुआल तथा अन्य कृषि-अपशिष्टों द्वारा बनाया जा सकता है।
यह किसानों द्वारा खेतों को साफ करने की प्रक्रिया को आर्थिक रूप से आसान बनाएगा, साथ ही इससे किसान अवशेषों को जलाने की बजाय काटेंगे।
जैव-ईंटों का उपयोग ऊर्ध्वाधर धातु या लकड़ी के स्तंभों के साथ कम लागत वाले आवासों के निर्माण के लिये किया जा सकता है।
इन ईंटों में पारंपरिक ईंटों की तुलना में कम भार-वहन करने की शक्ति होती है। अतः उन्हें दीवारों तथा स्तंभ बीम संरचनाओं में प्रयोग किया जा सकता है।
ये ईंट न केवल अच्छे इन्सुलेटर हैं,बल्कि अग्निरोधी भी हैं।

आवश्यकता क्यों?

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, भारत में 66 मिलियन टन CO2 उत्सर्जन करने वाले लगभग 1,40,000 ईंट भट्टे हैं जो हानिकारक प्रदूषकों का उत्पादन करते हैं।
भारत में कुल ग्रीनहाउस उत्सर्जन का लगभग 9% का उत्पादन ईंट भट्टों द्वारा किया जाता है।
जैव-ईंटें मिट्टी की ईंटों की तुलना में अधिक टिकाऊ होती हैं।

इसके माध्यम से आवास को गर्म-आर्द्र जलवायु के लिये अधिक उपयुक्त बनाया जा सकता है।

  • समीर एप्लीकेशन (SAMEER Application) वायु प्रदूषण शमन उपायों में से एक है जो राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता सूचकांक की वास्तविक जानकारी उपलब्ध कराता है।

इसे केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण ब्यूरो (CPCB) द्वारा विकसित किया गया है जो देश भर के 100 से अधिक शहरों की वायु गुणवत्ता की जानकारी प्रदान करता है। यह एप्लीकेशन चिह्नित किये गए शहरों को वायु गुणवत्ता सूचकांक के आधार पर एक कोड (Code) रंग के प्रारूप में प्रदर्शित करता है। वायु गुणवत्ता सूचनाओं का संग्रहण और प्रसार एक केंद्रीकृत स्थान से किया जाता है। इस एप्लीकेशन का प्रयोग किसी क्षेत्र विशेष में कचरा डंपिंग, सड़क की धूल, वाहनों के उत्सर्जन या अन्य प्रदूषण के मुद्दों से संबंधित शिकायतों को दर्ज करने या ट्रैक करने के लिये भी किया जा सकता है।

  • इसरो के इनसैट 3D और 3DR (INSAT-3D & 3DR) उपग्रहों पर लगे हुए इमेज़र पेलोड द्वारा ज्ञात हुआ है कि गंगा के मैदान,दिल्ली,उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे क्षेत्रों में अक्तूबर तथा नवंबर के दौरान एरोसोल ऑप्टिकल डेप्थ,PM2.5 एवं PM10 की सांद्रता सबसे अधिक है।

इनसैट 3D और 3DR के बारे में: इसरो के इनसैट-3D और 3DR उपग्रहों पर लगे इमेज़र पेलोड का उपयोग एरोसोल ऑप्टिकल डेप्थ Aerosol Optical Depth- AOD) की निगरानी के लिये किया जाता है AOD, जैवभार के जलने से होने वाले कणों और धुएँ का सूचक है जो दृश्यता को प्रभावित करता है तथा वातावरण में PM2.5 व PM10 की सांद्रता के बढ़ने का कारक है। इसके अलावा इस उपग्रह आधारित जलवायु वैज्ञानिक अध्ययन से पता चलता है कि वर्ष 2003 से 2017 के मध्य अक्तूबर-नवंबर के दौरान पंजाब और हरियाणा क्षेत्र में आग की घटनाओं में 4% की वृद्धि हुई।

  • नवंबर में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में वायु प्रदूषण की गंभीर स्थिति के कारण वायु और हेपा एयर प्यूरिफायर्स (WAYU and HEPA air Purifiers) उपकरणों ने काम करना बंद कर दिया है।
  • वायु(WAYU) वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) की नागपुर स्थित राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (NEERI) प्रयोगशाला द्वारा ‘वायु’ का विकास किया गया है।

यह उपकरण लगभग आधे घंटे में पीएम 10 (PM10) को 600 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर (ug/m3) से घटाकर 100 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर तथा PM2.5 को 300 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर से माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर कर सकता है। यह उपकरण लगभग 500 वर्ग मीटर तक के दायरे में वायु को शुद्ध कर सकता है। इसमें एक पंखा लगा होता है जो हवा को सोखकर उसमे से धूल तथा PM तत्त्वों को अलग करता है। इस प्रक्रिया में कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन का टाइटेनियम डाइऑक्साइड के साथ सक्रिय कार्बन का लेप करके कम हानिकारक कार्बन डाइऑक्साइड में ऑक्सीकरण किया जाता है। फिर शुद्ध वायु को वापस वायुमंडल में छोड़ दिया जाता है।

हेपा के बारे में:-यह उपकरण 0.3 माइक्रोन के 99.9% कणों को शुद्ध करने में सक्षम है।

यह वायु संदूषकों को तंतुओं के एक ज़टिल ज़ाल में फँसा लेता है।

  • राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम की शुरुआत जनवरी 2019 में की गई थी। इसका प्रमुख लक्ष्य वायु प्रदूषण की रोकथाम, नियंत्रण और उन्मूलन के लिये काम करना है।

यह वायु प्रदूषण की रोकथाम के लिये व्यापक और समयबद्ध रूप से बनाया गया पाँच वर्षीय कार्यक्रम है। इसमें संबद्ध केंद्रीय मंत्रालयों, राज्य सरकारों, स्थानीय निकायों और अन्य हितधारकों के बीच समन्वय से प्रदूषण के सभी स्रोतों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। देश की नदियों को प्रदूषण मुक्त बनाने की दिशा में पहल करते हुए राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने केंद्रीय निगरानी कमेटी का गठन किया है। यह कमेटी देश भर की 350 से अधिक नदियों को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिये एक योजना तैयार करेगी। इस कमेटी में नीति आयोग के प्रतिनिधि,जल संसाधन,राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा अभियान के महानिदेशक, शहरी विकास और पर्यावरण मंत्रालयों के सचिव तथा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के चेयरमैन शामिल किये जाएंगे। यह कमेटी राज्यों की नदी पुनरुर्द्धार कमेटियों के साथ सामंजस्य स्थापित कर कार्ययोजना के क्रियान्वयन की निगरानी करेगी। NGT ने कमेटी से 31 जुलाई तक अपनी रिपोर्ट देने को कहा है।

  • दिल्ली में ओज़ोन प्रदूषण की समस्या- लोकसभा में प्रस्तुत आँकड़ों के अनुसार,ओज़ोन (Ozone) से होने वाले प्रदूषण के मामले में NCR के शहरों (गुरुग्राम, फ़रीदाबाद, नोएडा और गाज़ियाबाद) के बीच दिल्ली सर्वाधिक प्रदूषित शहर रहा है।
वर्ष 2016 से 2018 के बीच दिल्ली में कम-से-कम 95 दिन ऐसे रहे जब ‘ओज़ोन’, शहर के वातावरण में प्रदूषण का मुख्य कारण रहा।
दिल्ली की तुलना में नोएडा ने 49, गुरुग्राम ने 48, फ़रीदाबाद ने 11 और गाज़ियाबाद ने 8 ऐसे ही दिनों का सामना किया।
वर्ष 2019 में 31 मार्च तक दिल्ली को कुल 23 ऐसे दिन को सामना करना पड़ा जब ओज़ोन की अधिकता थी, वहीं इस वर्ष ओज़ोन की अधिकता के मामले में फ़रीदाबाद ऐसे 55 दिनों के साथ शीर्ष पर रहा है। इसके अतिरिक्त गुरुग्राम और गाज़ियाबाद ने भी इस प्रकार के कुछ दिनों का सामना किया।

नोएडा एक मात्र ऐसा शहर है जहाँ अभी तक ऐसा कोई दिन नहीं रहा है जब ओज़ोन प्रदूषण का कारण रहा हो।पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन कार्यरत प्रदूषण का पूर्वानुमान लगाने वाली एजेंसी ‘SAFAR’ बीते कई हफ़्तों से ओज़ोन प्रदूषण के संदर्भ में चेतावनी जारी कर रही है।

  • वायु गुणवत्ता एवं मौसम पूर्वानुमान और अनुसंधान प्रणाली (SAFAR)की शुरुआत जून 2015 में दिल्ली और मुंबई के लिये की गई थी।

इस प्रणाली के ज़रिये अग्रिम तीन दिनों के लिये वायु प्रदूषण (स्थान-विशेष) का अनुमान लगाने के साथ ही लोगों को आवश्यक परामर्श देना संभव हो पाया है। 'सफर' (SAFAR) के माध्यम से लोगों को वर्तमान हवा की गुणवत्ता, भविष्य में मौसम की स्थिति, खराब मौसम की सूचना और संबद्ध स्वास्थ्य परामर्श के लिये जानकारी तो मिलती ही है, साथ ही पराबैंगनी/अल्ट्रा वायलेट सूचकांक (Ultraviolet Index) के संबंध में हानिकारक सौर विकिरण (Solar Radiation) के तीव्रता की जानकारी भी मिलती है। ओज़ोन के अंत:श्वसन पर सीने में दर्द, खाँसी और गले में दर्द सहित कई स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

  • प्रदूषण के मापदंड के आधार पर उद्योगों का नया वर्गीकरण जारी

जल(प्रदूषण की रोकथाम एवं नियंत्रण) उपकर (संशोधन)अधिनियम,2003 से संदर्भ लिये गए हैं।तथा पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने पर्यावरण (संरक्षण) कानून 1986 एवं दून घाटी अधिसूचना, 1989 के अंतर्गत विभिन्न प्रदूषकों के लिये मापदंड निर्धारित किये हैं।

प्रदूषण सूचकांक पर निर्धारित मापदंड
श्रेणी प्रदूषण सूचकांक के आँकड़ों वाले औद्योगिक क्षेत्र औद्योगिक क्षेत्र की संख्या
लाल रंग 60 और उससे अधिक 60
नारंगी रंग 41 से 59 के बीच 83
हरे रंग 21 से 40 के बीच 63
सफ़ेद रंग 20 तक 36
  • वायु गुणवत्ता और मौसम पूर्वानुमान तथा अनुसंधान प्रणाली (The System of Air Quality and Weather Forecasting And Research- SAFAR) के वायु गुणवत्ता सूचकांक के अनुसार, वर्ष 2019 के नवंबर माह में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली, पिछले वर्षो की तुलना में कम प्रदूषित रहेगा।

सफर-पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा महानगरों के किसी स्थान-विशिष्ट के समग्र प्रदूषण स्तर और वायु गुणवत्ता को मापने के लिये शुरू की गई एक राष्ट्रीय पहल है।

यह भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (Indian Institute of Tropical Meteorology- IITM) पुणे द्वारा निर्मित एक स्वदेशी प्रणाली है।
इसका संचालन भारत मौसम विभाग (India Meteorological Department-IMD) द्वारा किया जाता है।
दिल्ली में भारत की पहली वायु गुणवत्ता आरंभिक चेतावनी प्रणाली (Air Quality Early Warning System) का एक अभिन्न अंग है।

सफर यह मौसम के सभी मापदंडों जैसे- तापमान, वर्षा, आर्द्रता, हवा की गति एवं दिशा, पराबैंगनी किरणों और सौर विकिरण आदि की निगरानी करता है। इसमें हवा की गुणवत्ता का आकलन 1 से लेकर 500 अंकों तक किया जाता है।

वायु गुणवत्ता सूचकांक के मानक
शुरुआती 100 अंकों को ‘अच्छा’ (Good)
100 से 200 तक ‘ठीक-ठाक’ (Average)
200 से 300 तक ‘खराब’ (Poor)
300 से 400 तक ‘बहुत खराब’ (Very Poor)
400 से 500 तक ‘खतरनाक’ (Severe)

भारत के प्रमुख पर्यावरणीय संस्धान[सम्पादन]


अंतर्राष्ट्रीय अर्द्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान’ (International Crops Research Institute for the Semi-Arid Tropics-ICRISAT) एक गैर-लाभकारी, गैर-राजनीतिक संगठन है जो एशिया और उप-सहारा अफ्रीका के शुष्क इलाकों में कृषि के विकास हेतु अनुसंधान करता है। इसकी स्थापना 1972 में की गई तथा इसका मुख्यालय हैदराबाद, तेलंगाना राज्य में स्थित हैं। इसकी दो अन्य क्षेत्रीय शाखाएँ भी हैं जो नैरोबी (केन्या) और बमाको (माली) में स्थित हैं।‘अंतर्राष्ट्रीय अर्द्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान’ शुष्क जलवायु के लिये उपयुक्त छह अत्यधिक पौष्टिक फसलों पर शोध करता है, जिन्हें स्मार्ट फूड भी कहा जाता है। जैसे- काबुली चना, अरहर, बाजरा, रागी, चारा और मूँगफली।

  • केंद्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान (Central Marine Fisheries Research Institute- CMFRI) और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन(ISRO) ने तटीय आर्द्रभूमि को संरक्षित करने के लिये एक समझौते पर हस्ताक्षर किया है।

केंद्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान, भारत सरकार द्वारा 3 फरवरी, 1947 को कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के तहत स्थापित किया गया था। यह 1967 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) में शामिल हो गया। CMFRI दुनिया में एक प्रमुख उष्णकटिबंधीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान है।जिसका मुख्यालय कोच्चि, केरल में है।

सन्दर्भ[सम्पादन]

  1. https://pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=1597013
  2. https://economictimes.indiatimes.com/hindi/news/ganga-amantran-abhiyan-inaugurated-know-its-benefits/articleshow/71487313.cms?from=mdr