सामान्य अध्ययन२०१९/महत्वपूर्ण व्यक्तित्व

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  • 25 दिसंबर, 2019 को पंडित मदन मोहन मालवीय (Pandit Madan Mohan Malviya) की 158वीं जयंती मनाई गई।

मालवीय जी का जन्म 25 दिसंबर,1861 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में हुआ था। इन्होने ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई और वर्ष 1916 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की। इन्हें विशेष रूप से कैरिबियन क्षेत्र में भारतीय करारबद्ध प्रणाली (Indian Indenture System) को समाप्त करने में, उनकी भूमिका के लिये भी याद किया जाता है- यह एक प्रकार की श्रम बंधुआ मजदूरी प्रणाली थी जिसे वर्ष 1833 में दासता उन्मूलन के बाद स्थापित किया गया था। इसके तहत वेस्टइंडीज, अफ्रीका और दक्षिण पूर्व एशिया की ब्रिटिश उपनिवेशों में चीनी, कपास, चाय बागानों तथा रेल निर्माण परियोजनाओं में काम करने के लिये अप्रत्यक्ष रुप से श्रमिकों की भर्ती की जाती थी।

इन्होंने 'सत्यमेव जयते' शब्द को लोकप्रिय बनाया। हालाँकि,यह वाक्यांश मूल रूप से मुंडको उपनिषद से लिया गया है।

इन्हें रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा 'महामना' की तथा भारत के दूसरे राष्ट्रपति डॉ. एस. राधाकृष्णन द्वारा 'कर्मयोगी' की उपाधि दी गई। मालवीय जी ने ब्रिटिश सरकार के साथ मिलकर देवनागरी को ब्रिटिश-भारतीय न्यायालयों में प्रमुख स्थान दिलाया। इसे उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक माना जाता है। जातिगत भेदभाव और ब्राह्मणवादी पितृसत्ता पर अपने विचार व्यक्त करने के लिये मदन मोहन मालवीय को ब्राह्मण समुदाय से निकाल दिया गया था। इन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता को बढावा देने के लिये बहुत काम किया। मालवीय जी को सांप्रदायिक सद्भाव पर प्रसिद्ध भाषण देने के लिये याद किया जाता है। इन्होंने वर्ष 1915 में हिंदू महासभा की स्थापना में अहम भूमिका निभाई की। जिसके द्वारा विभिन्न स्थानीय हिंदू राष्ट्रवादी आंदोलनों को एक पटल पर लाने में आसानी हुई।

मालवीय जी के द्वारा संपादित पत्र: हिंदी-भाषा साप्ताहिक अभ्युदय (1907), हिंदी मासिक पत्रिका मर्यादा (1910) तथा अंग्रेजी में दैनिक द लीडर (1909)

इन्होंने हिंदुस्तान टाइम्स के अध्यक्ष पद पर भी कार्य किया और इसके हिंदी संस्करण को भी प्रकाशित करने में मदद की। 12 नवंबर, 1946 को 84 वर्ष की आयु में इनका निधन हो गया। वर्ष 2014 में मालवीय जी को मरणोपरांत देश के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भारत रत्न से सम्मानित किया गया था।

  • राज्यसभा के एक सदस्य ने महाराजा दलीप सिंह के अवशेषों को इंग्लैंड से भारत लाने की मांग की है।

दलीप सिंह,महाराजा रणजीत सिंह के सबसे छोटे पुत्र और पंजाब के अंतिम शासक थे। इन्हें वर्ष 1843 में पंजाब का महाराजा (पाँच वर्ष की उम्र में) घोषित किया गया था। द्वितीय आंग्ल- सिख युद्ध के बाद वर्ष 1849 में महाराजा दलीप सिंह को प्रतिवर्ष £40,000 की पेंशन के बदले संप्रभुता का दावा छोड़ने के लिये मजबूर किया गया था, उस समय उनकी उम्र मात्र 10 वर्ष की थी। वर्ष 1853 में उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया तथा वर्ष 1854 में ब्रिटेन में बस गए। वर्ष 1999 की बीबीसी की एक रिपोर्ट में सिंह को इंग्लैण्ड का पहला सिख अधिवासी (Settler) बताया गया है। वर्ष 1893 में 55 साल की उम्र में दलीप सिंह का पेरिस में निधन हो गया तथा उन्हें इंग्लैंड में दफनाया गया था।

कोहिनूर शब्द कोह-ए-नूर शब्द से बना है जिसका अर्थ होता है - प्रकाश का पहाड़ (Mountain Of Light)

वर्ष 1849 में अंग्रेज़ों द्वारा सिखों को युद्ध में हराने के बाद, दलीप सिंह को एक कानूनी दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने के लिये बाध्य किया गया जिसमें लाहौर की संधि में संशोधन किया गया था। सिंह को इस क्षेत्र की संप्रभुता ही नहीं बल्कि कोहिनूर (Koh-i-Noor) हीरे पर दावा भी छोड़ना था। यह हीरा अब लंदन के टॉवर में रखे ब्रिटिश क्राउन ज्वेल्स का एक हिस्सा है।

  • सुब्रह्मण्य भारती तमिलनाडु के एक कवि,स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक थे। उन्हें ‘महाकवि भारतियार’ के नाम से जाना जाता था।

इनका जन्म 11 दिसंबर,1882 को तमिलनाडु के तिरूनेलवेल्ली ज़िले में एट्टियापुरम नामक गाँव में हुआ था। ये तमिल साहित्य में एक नए युग का सूत्रपात करने वाले महत्त्वपूर्ण कवि माने जाते हैं। इनकी रचनाएँ राष्ट्र प्रेम,भक्ति और रहस्यवादी विषयों से संबंधित हैं।

भारती मुख्य रूप से एक गीतकार थे। उनकी महान काव्यात्मक रचनाओं में ‘‘कन्नम पट्टू’’, ‘‘नीलवम वम्मिनुम कत्रम’’, ‘‘पांचाली सबतम’’, ‘‘कुयिल पट्टु’’ शामिल हैं।

भारत की स्वतंत्रता और राष्ट्रवाद संबंधी इनके गीतों ने तमिलनाडु में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिये जन समर्थन जुटाने में मदद की थी। भारती ने मई 1906 में ‘‘इंडिया’’ का प्रकाशन तमिल में आरंभ किया। इस प्रकाशन में फ़्रांस की क्रांति के तीन नारों- स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा, को अपना लक्ष्य घोषित किया गया। वर्ष 1908 में इनकी एक क्रांतिकारी रचना ‘‘स्वदेश गीतांगल’’ प्रकाशित हुई। भारती ने भारतीय राष्ट्रीय काँन्ग्रेस के बनारस अधिवेशन (1905) और सूरत अधिवेशन (1907) में हिस्सा लिया। भारती वर्ष 1919 में मद्रास के राजाजी गृह में महात्मा गांधी से मिले।

भारती:एक समाज सुधारक:- ये जाति-व्यवस्था के खिलाफ थे। उन्होंने घोषणा की थी कि केवल दो जातियाँ हैं - पुरुष और महिला अन्य कोई जाति नहीं है। इन्होंने महिलाओं के अधिकारों और लैंगिक समानता के लिये काम किया। इन्होंने बाल विवाह और दहेज का विरोध किया तथा विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया।
  • 19 नवंबर, 2019 को रानी लक्ष्मीबाई की 191वीं जयंती मनाई गई।

इनका जन्म 19 नवंबर, 1828 को वाराणसी के एक मराठी परिवार में हुआ था तथा इनके बचपन का नाम मणिकर्णिका था। वर्ष 1842 में 14 वर्ष की उम्र में इनका विवाह झाँसी के महाराजा गंगाधर राव के साथ कर दिया गया उसके बाद से इन्हें लक्ष्मीबाई के नाम से जाना गया। 1857 के विद्रोह में इनकी भूमिका: इस विद्रोह का आरंभ 10 मई, 1857 को मेरठ में कंपनी के भारतीय सिपाहियों द्वारा किया गया, तत्पश्चात यह कानपुर, बरेली, झाँसी, दिल्ली, अवध आदि स्थानों तक फैल गया। झाँसी में जून 1857 में रानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व में विद्रोह प्रारंभ हुआ। लार्ड डलहौजी की राज्य हड़प नीति या व्यपगत के सिद्धांत द्वारा अंग्रेज़ों ने राजाओं के दत्तक पुत्र लेने ले अधिकार को समाप्त कर दिया तथा वैध उत्तराधिकारी नहीं होने की स्थिति में राज्यों का विलय अंग्रेज़ी राज्यों में कर दिया गया। रानी लक्ष्मीबाई द्वारा इस व्यवस्था का विरोध किया गया।

  • गुरु नानक देव जी की 550वीं जयंती 12 नवंबर 2019(कार्तिक पूर्णिमा)को प्रकाश पर्व के रुप में मनाया गया।

गुरु नानक देव जी का जन्म 1469 में कार्तिक महीने में पूर्णिमा के दिन ननकाना साहिब (वर्तमान में पाकिस्तान में स्थित है) में हुआ था। वे सिख धर्म के संस्थापक और 10 सिख गुरुओं में से पहले थे। वे एक दार्शनिक,समाज सुधारक,चिंतक और कवि थे। इन्होने समानता और भाईचारे पर आधारित समाज तथा महिलाओं के सम्मान की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। गुरु नानक देव जी ने विश्व को 'नाम जपो,किरत करो,वंड छको' का संदेश दिया जिसका अर्थ है- ईश्वर के नाम का जप करो,ईमानदारी और मेहनत के साथ अपनी ज़िम्मेदारी निभाओ तथा जो कुछ भी कमाते हो उसे ज़रूरतमंदों के साथ बाँटो। ये एक आदर्श व्यक्ति थे, जो एक संत की तरह रहे और पूरे विश्व को 'कर्म' का संदेश दिया। उन्होंने भक्ति के 'निर्गुण' रूप की शिक्षा दी। इसके अलावा उन्होंने अपने अनुयायियों को एक समुदाय में संगठित किया और सामूहिक पूजा (संगत) के लिये कुछ नियम बनाए।

  • 15 नवंबर 2019 को झारखंड राज्य का 19वाँ स्थापना दिवस तथा बिरसा मुंडा जयंती मनाई गई।

झारखंड राज्य के बारे में: 15 नवंबर, 2000 को बिहार के दक्षिणी हिस्से को काटकर झारखंड की स्थापना भारत संघ के 28वें राज्य के रूप में हुई थी। इसके क्षेत्र में छोटा नागपुर का पठार तथा संथाल परगना के वन क्षेत्र आते हैं। इसके पूर्व में पश्चिम बंगाल, पश्चिम में उत्तर प्रदेश एवं छत्तीसगढ़, उत्तर में बिहार तथा दक्षिण में ओडिशा राज्य स्थित हैं। बिरसा मुंडा के बारे में: बिरसा का जन्म 15 नवंबर को एक मुंडा परिवार में हुआ था, इसलिये इन्हें बिरसा मुंडा कहा गया। मुंडा छोटा नागपुर में रहने वाला एक जनजातीय समूह है। बिरसा का मानना था कि उन्हें भगवान ने लोगों की भलाई और उनके दुःख दूर करने के लिये भेजा है, इसलिये वे स्वयं को भगवान मानते थे। इन्हें जगत पिता (धरती आबा) भी कहा जाता था। बिरसा मुंडा के नेतृत्व में वर्ष 1899-1900 में हुआ मुंडा विद्रोह छोटा नागपुर (झारखंड) के क्षेत्र में सर्वाधिक चर्चित विद्रोह था। इस विद्रोह की शुरुआत मुंडा जनजाति की पारंपरिक व्यवस्था खूंटकटी की ज़मींदारी व्यवस्था में परिवर्तन के कारण हुई। इस विद्रोह में महिलाओं की भूमिका भी उल्लेखनीय रही। फरवरी 1900 में बिरसा मुंडा को सिंहभूम में गिरफ्तार कर राँची ज़ेल में डाल दिया गया जहाँ जून 1900 में उनकी मृत्यु हो गई थी।

  • सरदार वल्लभभाई पटेल के जन्मदिवस 31 अक्तूबर को भारत में प्रतिवर्ष राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाया जाता है।
वर्ष 2014 में पहली बार 'भारत के लौह पुरुष' को श्रद्धांजलि देने के उद्देश्य से मनाया गया था।
इस दिन सरदार पटेल के राष्ट्रीय अखंडता और एकता में योगदान के विषय में जागरूकता फैलाने के लिये ‘रन फॉर यूनिटी (Run For Unity)’ जैसे विभिन्न आयोजन किये जाते हैं।
वर्ष 2018 में भारत सरकार ने सरदार वल्लभभाई पटेल के सम्मान में गुजरात में स्टैच्यू ऑफ यूनिटी (Statue Of Unity) का अनावरण किया जो विश्व की सबसे ऊँची प्रतिमा है।

सरदार वल्लभभाई पटेल

31 अक्तूबर, 1875 को नाडियाड गुजरात में जन्में पटेल भारत के प्रथम गृहमंत्री और उप-प्रधानमंत्री थे।
भारतीय राष्ट्र को एक संघ बनाने तथा भारतीय रियासतों के एकीकरण में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी।
स्वतंत्रता के समय विभिन्न रियासतों को भारतीय संघ में शामिल होने के लिये राज़ी करने में सरदार पटेल की मुख्य भूमिका थी।

उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिये सामाजिक नेता के रूप में अथक प्रयास किये।

बारदोली की महिलाओं ने उन्हें ‘सरदार’ की उपाधि दी। जिसका अर्थ होता है।‘प्रमुख या नेता’

भारत को एकीकृत (एक भारत) और एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाने में उनके महान योगदान के लिये उन्हें भारत की एकजुटता के वास्तविक सूत्रधार के रूप में जाना जाता है। उन्होंने आधुनिक अखिल भारतीय सेवा प्रणाली की स्थापना भी की। जिसके कारण उन्हें ‘भारत के सिविल सेवकों के संरक्षक संत’ (Patron saint of India’s civil servants) के रूप में भी याद किया जाता है।

  • 'आज़ाद हिंद सरकार' की स्थापना के 76वें वर्ष के उपलक्ष्य में केंद्रीय संस्कृति और पर्यटन मंत्रालय द्वारा 21 अक्तूबर, 2019 को दिल्ली के लाल किले में एक समारोह का आयोजन किया गया।
आज़ाद हिंद सरकार की स्थापना अस्थायी रूप से वर्ष 1943 में सुभाष चंद्र बोस द्वारा सिंगापुर में की गई थी।
इस सरकार को जापान, जर्मनी, इटली जैसी ध्रुवीय शक्तियों द्वारा मान्यता प्रदान की गई थी।

इस सरकार में सुभाष चंद्र बोस प्रधानमंत्री थे और उनके पास ही युद्ध तथा विदेश मामलों से संबधित विभाग का प्रभार था। कैप्टन लक्ष्मी सहगल महिला संगठन की अध्यक्षा थीं, जबकि एस. ए. अय्यर को प्रचार और प्रसार विंग का प्रमुख नियुक्त किया गया था। क्रांतिकारी नेता रास बिहारी बोस को सर्वोच्च सलाहकार नियुक्त किया गया था।

वर्ष 2018 में इसकी 75वीं वर्षगाँठ के उपलक्ष्य में पट्टिका (Plaque) का अनावरण किया गया।
23 जनवरी, 2019 को सुभाष चंद्र बोस की 122वीं जयंती के उपलक्ष्य में लाल किले में सुभाष चंद्र बोस संग्रहालय का उद्घाटन किया गया।

12 अगस्त, 1919 को वैज्ञानिक विक्रम साराभाई की 100वीं जयंती के मौके पर गूगल ने डूडल बनाकर उन्हें याद किया।

डॉ. साराभाई को भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक माना जाता है, उल्लेखनीय है कि इनकी I00वीं जयंती के कुछ दिन पूर्व ही चंद्रयान -2 मिशन लॉन्च किया गया था। वर्ष 1919 में अहमदाबाद में जन्मे डॉ. साराभाई ने कैम्ब्रिज में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। नवंबर 1947 में उन्होंने अहमदाबाद में भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (Physical Research Laboratory- PRL) की स्थापना की। रूस के स्पुतनिक के लॉन्च होने के बाद वे भारत की आवश्यकता को देखते हुए एक विकासशील देश भारत में अपना खुद का अंतरिक्ष कार्यक्रम आयोजित करने में सफल रहे। इन्होंने वर्ष 1962 में भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति (Indian National Committee for Space Research) की स्थापना की, जिसे बाद में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (Indian Space Research Organization- ISRO) नाम दिया गया। उपलब्धियाँ ISRO और PRL के अलावा उन्होंने कई संस्थानों जैसे- अहमदाबाद में भारतीय प्रबंधन संस्थान, सामुदायिक विज्ञान केंद्र तथा अपनी पत्नी मृणालिनी के साथ प्रदर्शन कला के लिये डारपॉन अकादमी की स्थापना की। इन्होंने भारत के पहले उपग्रह आर्यभट्ट पर काम किया था, लेकिन वर्ष 1975 में इस उपग्रह के लॉन्च होने से पहले ही इनकी मृत्यु (30 दिसंबर, 1971 को) हो गई। उन्हें वर्ष 1966 में पद्मभूषण प्राप्त हुआ और वर्ष 1972 में मरणोपरांत पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया। वर्ष 1973 में चंद्रमा पर एक गड्ढे का नाम उनके नाम पर रखा गया था।


भारत रत्न 2019 Bharat Ratna 2019 8 अगस्त, 2019 को देश के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, समाजसेवी नानाजी देशमुख और गायक व संगीतकार भूपेन हज़ारिका को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया।

यह सम्मान उन व्यक्तियों को दिया जाता है जिन्होंने देश के किसी भी क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य किये हों, अपने-अपने क्षेत्रों में उत्‍कृ‍ष्‍ट कार्य करते हुए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश का गौरव बढ़ाया हो। ‘भारत रत्‍न’ कला, साहित्‍य, विज्ञान के क्षेत्र में तथा किसी राजनीतिज्ञ, विचारक, वैज्ञानिक, उद्योगपति, लेखक और समाजसेवी को असाधारण सेवा हेतु व उच्च लोक सेवा को मान्‍यता देने के लिये भारत सरकार की ओर से दिया जाता है। प्रणब मुखर्जी करीब पाँच दशकों तक देश की राजनीति में सक्रिय रहे प्रणब मुखर्जी भारत के 13वें राष्ट्रपति रहे हैं। हालाँकि पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद दो बार राष्ट्रपति रहे, इसलिये वे इस पद पर आसीन होने वाले 12वें व्यक्ति हैं। प्रणब मुखर्जी ने 25 जुलाई, 2012 को राष्ट्रपति पद की शपथ ली। वह इस पद पर 25 जुलाई, 2017 तक रहे। 1984 में प्रणव मुखर्जी वित्त मंत्री रह चुके हैं। नानाजी देशमुख 11 अक्तूबर, 1916 को महाराष्ट्र के हिंगोली में जन्मे नानाजी देशमुख मुख्य रूप से समाजसेवी थे। वर्ष 1980 में सक्रिय राजनीति से उन्होंने संन्यास ले लिया लेकिन दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना करके समाजसेवा से जुड़े रहे। वर्ष 1999 में उन्हें राज्यसभा का सदस्य बनाया गया और उसी साल समाज सेवा के लिये उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था। नानाजी देशमुख का निधन 27 फरवरी, 2010 को 95 वर्ष की उम्र में चित्रकूट में हुआ था। भूपेन हज़ारिका भूपेन हज़ारिका गायक एवं संगीतकार होने के साथ ही एक कवि, फिल्म निर्माता, लेखक और असम की संस्कृति तथा संगीत के अच्छे जानकार थे। उनका निधन पाँच नवंबर, 2011 को हुआ था। उन्हें दक्षिण एशिया के सबसे नामचीन सांस्कृतिक कर्मियों में से एक माना जाता था। अपनी मूल भाषा असमी के अलावा भूपेन हज़ारिका ने हिंदी, बांग्ला समेत कई अन्य भारतीय भाषाओं में गाने गाए। उन्हें पारंपरिक असमिया संगीत को लोकप्रिय बनाने का श्रेय भी दिया जाता है। हज़ारिका को पद्म विभूषण और दादा साहेब फाल्के जैसे पुरस्कारों से भी नवाज़ा गया था।


27 जून 2019 को महाराजा रणजीत सिंह की 180वीं पुण्यतिथि मनाई गई।इन्होंने पंजाब में लगभग चार दशकों (1801-39) तक शासन किया।इस अवसर पर लाहौर में इनकी मूर्ति/प्रतिमा का उद्घाटन किया गया।
  • आठ फीट ऊंची इस प्रतिमा में जिसमें रणजीत सिंह को घोड़े पर चढ़ा हुआ दिखाया गया है।
  • यह मूर्ति लाहौर किले में माई जिंदियन हवेली के बाहर एक खुली जगह में स्थित है,जिसमें रणजीत सिंह समाधि और गुरु अर्जुन देव के गुरुद्वारा डेरा साहिब की इमारत है।
  • रणजीत सिंह की सबसे छोटी रानी के नाम पर स्थित हवेली में अब सिख कलाकृतियों की एक स्थायी प्रदर्शनी सिख गैलरी है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • महाराजा रणजीत सिंह का जन्म 13 नवंबर, 1780 को गुजरांवाला (अब पाकिस्तान में स्थित) में हुआ था। उस समय पंजाब पर शक्तिशाली सरदारों का शासन था जिन्होंने इस क्षेत्र को मिसल्स में विभाजित किया था।
  • मुगल साम्राज्य के पतन के बाद भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी भाग में पंजाब क्षेत्र उभर कर आया।
  • इन्होंने युद्धरत मिसल को उखाड़ फेंका और वर्ष 1799 में लाहौर पर विजय प्राप्त करने के बाद एक एकीकृत सिख साम्राज्य (Unified Sikh Empire) की स्थापना की।
  • रणजीत सिंह को पंजाब का शेर (शेर-ए-पंजाब) की उपाधि दी गई थी क्योंकि इन्होंने लाहौर से अफगान आक्रमणकारियों को निकाल दिया था, लाहौर इनके मृत्यु तक राजधानी बनी रही।
9 मई, 2019 को भारत के प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता सेनानी गोपाल कृष्ण गोखले को उनकी 153वीं जयंती पर श्रद्धांजलि दी।

उनका जन्म 9 मई, 1866 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी में हुआ था। वह वर्ष 1889 में भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस में शामिल हुए। वर्ष 1905 में गोखले को भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष का चुना गया था। उन्होंने 1905 में सर्वेंट्स ऑफ़ इंडियन सोसाइटी की स्थापना की थी। इस सोसाइटी का मुख्य उद्देश्य भारतीयों को सामाजिक बुराइयों के खिलाफ आवाज़ उठाने और अपने देश की सेवा के लिये प्रशिक्षित करना था। उन्हें महात्मा गांधी के गुरु के रूप में जाना जाता है। महात्मा गांधी ने 'गोखले, मेरे राजनीतिक गुरु' नामक एक पुस्तक भी लिखी थी।


संत बासवन्ना (भगवान बसवेश्वर) लिंगायत संप्रदाय के संस्थापक एवं 12वीं सदी के कवि और दार्शनिक थे। बासवन्ना जयंती विशेष रूप से कर्नाटक और महाराष्ट्र राज्य में मनाया जाता है। गुरु बसवेश्वर का जन्म 1131 ईसवी में बागेवाड़ी (कर्नाटक के अविभाजित बीजापुर ज़िले में) नामक स्थान पर हुआ था। इनके पिता का नाम मदरासा तथा माता मदालाम्बिके थी। इनका जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। आठ वर्ष की आयु में एक धार्मिक परंपरा के अंतर्गत इनका ‘जनिवारा’ (यज्ञोपवीत संस्कार) भी किया गया। बासवन्ना ने इस परंपरा के खिलाफ विद्रोह किया एवं अपने जनेऊ को काट दिया और घर छोड़कर कुडलसंगम चले गए जहाँ से उन्होंने सभी आयामों में शिक्षा प्राप्त की। बाद में वह कल्याण गए जहाँ कलचुरि राजा बिज्जाला (1157- 1167 ईसवी) का शासन था। उनके विद्वल से प्रभावित होकर प्रारंभ में राजा ने उन्हें अपने दरबार में कर्णिका (लेखाकार) नियुक्त किया। तदुपरांत प्रशासनिक कौशल का परिचय देकर उन्होंने प्रधानमंत्री का पद प्राप्त किया। बासवन्ना के उपदेश- बासवन्ना के उपदेशों एवं शिक्षाओं को उपन्यास के रूप में लिपिबद्ध किया गया है जिसे वचन (कविता) कहा जाता है। "शरण आंदोलन" के नवीन साहित्यिक रूप में इनका मुख्य योगदान रहा जिसके माध्यम से उन्होंने अपनी क्रांतिकारी और सुधारवादी विचारधारा को बहुत ही सरल ढंग से कन्नड़ भाषा में व्यक्त किया। संत बसवेश्वर द्वारा चलाए गए 'वचन आंदोलन' का मुख्य लक्ष्य समाज के हर वर्ग का कल्याण था। सकलः जीवतमृग लेसु (सभी का कल्याण हो) उनकी उद्घोषणा थी। उन्होंने दो प्रमुख विचार दिये-‘स्थावर एवं जंगम’ इनके अर्थ क्रमशः ‘स्थिर’ एवं ‘गतिशील’ हैं। ये दोनों ही विचार क्रांतिकारी विचारधारा के आधार थे। उन्होंने सामाजिक-लोकतांत्रिक व्यवस्था का समर्थन किया,साथ ही 12वीं सदी में मानवाधिकार की भी बात की।

धार्मिक सुधार- उन्होंने मंदिर की अवधारणा को बदलने की कोशिश की जो विभिन्न प्रकार के उत्पीड़न का मुख्य केंद्र था। उन्होंने कहा कि पुजारी और अमीर लोग भगवान और मंदिर के नाम पर आम लोगों का शोषण करते हैं। संत बासवन्ना ने एक नया आयाम दिया जिसके अंतर्गत उन्होंने मानव शरीर और आत्मा (आंतरिक आत्मा) को महत्त्वपूर्ण बताया जिससे सभी मनुष्यों के आत्म-सम्मान को बढ़ावा मिला। बासवन्ना के सम्मान में एक स्मारक सिक्का जारी किया गया । भारत के प्रधानमंत्री ने 2015 में लैम्बेथ में टेम्स नदी के किनारे उनकी प्रतिमा का उद्घाटन किया।