साहित्य और सत्ता/रामकथा में सत्ता-विमर्श

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सत्ता-विमर्श के परिप्रेक्ष्य में रामकथा हर काल मे एक रोचक पाठ रही है। वाल्मीकि रामायण, रघुवंशम्, उत्तररामचरितम्, रामचरितमानस से लेकर राधेश्याम कथावाचक रचित रामायण तक में वर्णित रामकथा की परंपरा हमें सत्ता के संदर्भ में कुछ महत्त्वपूर्ण सूत्र प्रदान करती है। पारंपरिक हिंदी आलोचना में राधेश्याम रचित रामायण एक उपेक्षित पाठ रहा है। बीसवीं सदी के पहले दशक में ही रचे जाने के बावजूद यह द्विवेदी युगीन मुख्यधारा के साहित्य और हिंदी विभागों के पाठ्यक्रम में स्थान पाने से वंचित रहा। कामिल बुल्के ने भी हिंदी में रामकथा की परंपरा में इसे स्थान नहीं दिया। रामकथा और राजनीतिक व्यवस्था के आदर्श के तौर पर तुलसी के रामचरितमानस और रामराज्य का उल्लेख किया जाता है। रामकथा के आदि-स्रोत के रूप में वाल्मीकि के रामायण का उल्लेख किया जाता है। हालांकि वाल्मीकि रामायण का कथा विस्तार, रघुवंशम् और उत्तररामचरितम् का नाट्य-विधान और रामचरितमानस का आदर्श कहीं एक साथ देखना हो तो वह राधेश्याम कथावाचक के रामायण में देखा जा सकता है। इस आलेख में सत्ता-विमर्श के परिप्रेक्ष्य में परंपरित पाठों और रामकथा संबंधित आलोचनात्मक शोधों के साथ राधेश्याम रामायण के तुलनात्मक अध्ययन का प्रयास किया गया है।

सत्ता-विमर्श[सम्पादन]

सत्ता-विमर्श को साहित्य और सामाजिक-राजनीतिक दर्शन में एक पद्धति और प्रविधि के तौर पर व्यवहृत करने का श्रेय मिशेल फूको दिया जाता है। सत्ता किस प्रकार व्यवस्था को प्रभावित करती है, इसका उल्लेख मिशेल फूको ने अपने लेख ‘द सब्जेक्ट एण्ड पॉवर’ में किया है – “व्यवहार में देखा जाए तो सत्ता से संबंधित कार्य प्रणाली दूसरों पर सीधे-सीधे प्रभाव नहीं डालती। बल्कि यह उन्हीं क्रियाओं पर असर करती है जो प्रभावी हों अथवा उन पर जो वर्तमान में या फिर भविष्य में सिर उठा सकती हैं।”[१] फूको का मानना है कि सत्ता के सवाल से महत्वपूर्ण सवाल व्यक्ति की पराधीनता का सवाल है। इसी कारण उन्होंने अपने शोध की केंद्रीय चिंता ‘सत्ता’ (पॉवर) के बजाय ‘पराधीनता’ (सब्जेक्शन) की व्यक्त की है।[२] फूको के सत्ता संबंधी इन सूत्रों को साहित्य में तलाशने पर कई महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आ सकते हैं।

रामकथा में सत्ता-विमर्श संबंधी महत्वपूर्ण संदर्भ[सम्पादन]

सीता की अग्नि-परीक्षा और परित्याग[सम्पादन]

युद्धकाण्ड की समाप्ति के समय सीता को अपने समीप आया देखकर राम कहते हैं -
"एषासि निर्जिता भद्रे शत्रुं जित्वा रणाजिरे।
पौरुषाद् यदनुष्ठेयं मयैतदुपपादितम्।।" अर्थात् युद्धभूमि में शत्रु को पराजित करके मैंने तुम्हें उसके चंगुल से मुक्त कराके पुरुषार्थ द्वारा साध्य को सिद्ध कर लिया है।
फिर राम कहते हैं -
"प्राप्तचारित्रसन्देहा मम प्रतिमुखे स्थिता।
दीपो नेत्रातुरस्येव प्रतिकूलासि में दृढ़ा।।" अर्थात तुम्हारे चरित्र में संदेह है फिर भी तुम मेरे सामने उपस्थित हो। मैं तुम्हें चाहकर भी नहीं अपना सकता। अतः तुम्हें यथेष्ट कहीं भी जाने की स्वतंत्रता देता हूँ।

विचारणीय है कि ऐसा कौन सा स्वाभिमानी और तेजस्वी पुरुष होगा, जो दूसरे के घर में रही स्त्री को मोहवश अपनाने को उद्यत हो जाएगा? रावण तुम्हें अपनी गोद में उठाकर ले गया और बहुत दिनों तक तुम्हें देख-देख जीता रहा। मैंने कायरता के कलंक से मुक्ति पाने के लिए राक्षस कुल का विनाश करके तुम्हें उसके बंधन से छुड़ाकर अपने कर्तव्य का पालन किया है।
"कः पुमांस्तु कुले जातः स्त्रियं परगृहोषिताम्।
तेजस्वी पुनरादद्यात् सुहृल्लोभेन चेतसा।।"[३]

राम के सामने जब चयन की स्थिति आयी, तब कालिदास के शब्दों में राम पर 'दोलाचलचित्तवृत्तिः' हावी हो गई अर्थात् वे संशयग्रस्त हो जाते हैं। लोगों की बात सुनकर सीता का त्याग या सीता का सम्मान करके लोकापवाद की उपेक्षा करें? एक ओर राजधर्म था तो दूसरी ओर प्रेमधर्म। भवभूति ने जिसे 'लोकस्याराधनं'[४] कहा है, यहाँ उस राजधर्म की विजय होती है और प्रेमधर्म को पराजित होना पड़ता है। [५]

राधेश्याम कथावाचक के रामायण में जब लक्ष्मण सीता को छोड़कर वापस आते हैं तब राम उनसे अपने राजा होने का 'सुख' बतलाते हैं -

ज्यों ही लक्ष्मण पर दृष्टि पड़ी चौंके, फिर बोले - "सिया कहाँ?
जिसके विराग में प्राण दुखी - वह ही प्राणों की प्रिया कहाँ?
फिर संभले, कहा - छोड़ आए! जो हुआ उचित था उचित हुआ।
राजा होने में क्या सुख है यह राजा होकर विदित हुआ।।"[६]

शंबूक वध[सम्पादन]

जनपद का निवासी एक बूढ़ा ब्राह्मण अपने पुत्र का शव लिए राम दरबार में उपस्थित होता है। वह विलाप करते हुए राम से कहता है -

"किं नु मे दुष्कृतं कर्म पुरा देहान्तरे कृतम्।
यदहं पुत्रमेकं तु पश्यामि निधनं गतम्।।"

श्रीराम के राज्य में अकाल मृत्यु जैसी घटना पहले कभी न तो देखी गयी और न ही सुनी गयी। निस्संदेह राजा राम ने कोई दुष्कर्म किया है, जिससे उनके राज्य में बालकों की मृत्यु जैसी दुर्घटना होने लगी है -

"नेदृशं दृष्टपूर्व मे श्रुतं वा घोरदर्शनम्।
मृत्युरप्राप्तकालानां रामस्य विषये ह्ययम्।।"[७]

राजा के दुराचारी होने पर ही प्रजा की अकाल मृत्यु होती है। बालक की मृत्यु इस तथ्य का स्पष्ट संकेत है कि राजा से कोई न कोई अपराध अवश्य हुआ है। राम ने वृद्ध ब्राह्मण की करुण कथा और द्वार पर उसके धरना देने की घटना से परिचित कराया, तो नारद ने ब्राह्मण के पुत्र के कारण का उल्लेख करते हुए कहा -- सतयुग में तप का अधिकार केवल ब्राह्मणों को था, त्रेतायुग में तप का अधिकार क्षत्रियों को भी प्राप्त हो गया। अन्य दोनों - वैश्य और शूद्र - वर्णों के लोग सेवाकार्य से आत्मकल्याण करते थे। इन दोनों वर्णों को तप का अधिकार प्राप्त नहीं हुआ। हीनवर्ण के किसी व्यक्ति का तप करना व्यवस्था का भंग होना है और मुझे लगता है कि आपके राज्य में निश्चित रूप से कोई-न-कोई शूद्र घोर तप कर रहा है। यही बालक की मृत्यु का कारण है -

"स वै विषयपर्यन्ते तव राजन् महातपाः।
अद्य तप्यति दुर्बुद्धिस्तेन बालवधो ह्ययम।।"

राम पूछते हैं कि आखिर हमारे राज में अकाल और अकाल मृत्यु का क्या कारण है? तब उन्हें गुरू वशिष्ठ बताते हैं कि शंबूक नामक एक शूद्र तपस्या कर रहा है और इन सभी समस्याओं का यही कारण है। कहना न होगा कि सत्ता के सलाहकार भी बहुधा मूल प्रश्न को ही परिदृश्य से गायब कर शासन के विघटन में योगदान देते हैं।

"वास्तव में एक शूद्र बैठा- अत्यंत अधर्म कर रहा है।
विन्ध्याचल के गह्वर बन में ब्राह्मण का कर्म कर रहा है।।
इस अनाधिकार ही के कारण-सब नियमित क्रम संवरण हुआ।
दुर्भिक्ष अयोध्या में आया, ब्राह्मण बेटे का मरण हुआ।।"

वाल्मीकि रामायण में राम चमचमाती तलवार निकालकर शंबूक को सिर धड़ से अलग कर देते हैं। हालांकि जनमानस में राम की छवि तीर धनुष वाली ही है जिसका निर्वाह राधेश्याम ने अपने रामायण में भी किया है।

"गुरुवर के यह वाक्य सुन, प्रभु हो गए अधीर।
तुरत चढ़ाया क्रुद्ध हो - निज धन्वा पर तीर।।
एक बाण से शूद्र का जभी चढ़ाया शीश।
ब्राह्मण का बेटा उठा, कहता जय जगदीश।।"[८]

आगे कारणों की और भी जाँच पड़ताल होती है। वशिष्ठ फिर कहते हैं कि दरअसल राम ने जो रावण का वध किया है वह ब्राह्मण वध होने के कारण ही समस्त दोषों का कारण बन रहा है। अश्वमेध यज्ञ से इस समस्या का समाधान हो सकता है। हालांकि राधेश्याम रामायण में लक्ष्मण इन समस्त समस्याओं के मूल में निर्दोष सीता का परित्याग ही मानते रहे। वे गुरु वशिष्ठ से सहमत होते हुए भी राम से स्पष्ट तौर पर कहते हैं -

"गुरुवर का कथन सत्य ही है, मति-गति भी यह ही कहती है।
पर मुझे और ही एक बात-अवनति का मूल दीखती है।।
निर्दोषिनि सीता त्यागी है यह बात आप भी जान रहे।
सतवन्ती के निर्वासन पर-राजाधिराज कुछ ध्यान रहे।।
उन गीली दुखती आँखों को करुणेश भूल ही जाएंगे।
सौ अश्वमेध करने पर भी- कोशल में कुशल न पाएंगे।।"

सामान्य पुरुष की गलतियों को क्षमा किया जा सकता है। सीता ने किया भी। किन्तु सत्ताधीश की गलतियाँ अक्षम्य होती हैं। राम का अश्वमेध करना सत्ता को अक्षुण्ण बनाने का ही अनुष्ठान था। प्रजानुरंजन को वरीयता देकर अपनी गर्भिणी पत्नी का परित्याग करना सत्ता के चरित्र को अनावृत्त करता है तथा कदाचित राम के महानायकत्व के विघटन का कारण भी बनता है।

सर्वार्थसिद्धि का कालंजर का कुलपति बनाया जाना[सम्पादन]

सत्ता के संदर्भ में ही एक प्रक्षिप्त प्रसंग का उल्लेख है जिसमें एक कुत्ता राम के दरबार में फरियादी बनकर आता है। सर्वार्थसिद्धि नाम के एक ब्राह्मण द्वारा एक कुत्ते के सिर पर चोट किया जाता है। कुत्ता राम से ब्राह्मण के लिए दंड की बात करता है। राम के मंत्री और सलाहकार कहते हैं कि ब्राह्मण अवध्य है अतः इसे कोई शारीरिक दंड नहीं दिया जाना चाहिए। कुत्ता सारी बात सुन रहा था। उसने राम से अनुरोध किया - "यदि आपको इसे सजा देनी ही हो तो इसे कुलपति (वाइस-चांसलर) बना दीजिए। मैं भी पूर्वजन्म में कालंजर का कुलपति था।"

तुलसी का रामराज्य[सम्पादन]

तुलसीदास के रामराज्य के प्रभाव में १९४०-४५ के दौरान 'रामराज्य' नाम से ही एक बेहद लोकप्रिय सिनेमा का निर्माण हुआ। गुणवंत शाह ने अपनी पुस्तक 'रामायण : मानवता का महाकाव्य' में इस प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया है कि यह सिनेमा महात्मा गांधी ने भी देखा था। कदाचित इसी से प्रभावित होकर उनके यहाँ आदर्श राज्य के साथ रामराज्य जुड़ गया। तुलसी भी लिखते हैं - रामराज बैठे त्रैलोका। हरषित भये गए सब सोका। तथा बयरू न कर काहू सन कोई। राम प्रताप विषमता खोई।। (पृ ५३२)

रामावतार की समाप्ति पर राम की मुद्रिका का गिरना और उनकी जल समाधि[सम्पादन]

३०० रामायण नामक लेख में रामानुजन ने इस लोककथा का वर्णन किया है। इस लोककथा में बताया गया है कि प्रयोजन सिद्धि के पश्चात सत्ता का वियोजित होना आवश्यक है। जब जब राम का अवतार समाप्त होने को होता है उनकी मुद्रिका नीचे गिरती है। कहने की आवश्यकता नहीं कि ऐसी कई रामकथाएं घटित हुई हैं। सत्ता विमर्श के आलोक में रामकथा का पुनर्पाठ हर काल में प्रासंगिक है और बना रहेगा।

संदर्भ[सम्पादन]

  1. Mitchell Foucault (1994). "The Subject and Power", in John Scott (ed.). Power: Critical Concepts-1. Psychology Press. p. 228. ISBN 978-0-415-07938-9.
  2. Mitchell Foucault (1994). "The Subject and Power", in John Scott (ed.). Power: Critical Concepts-1. Psychology Press. p. 212. ISBN 978-0-415-07938-9.
  3. वाल्मीकीय रामायण, अनुवादक एवं व्याख्याकार - डॉ रामचंद्र वर्मा शास्त्री, परंपरा बुक्स प्राइवेट लिमिटेड, २००७, पृष्ठ - ३३५
  4. स्नेहं दयां च सौख्यं च यदि वा जानकीमपि। आराधनाय लोकस्य मुञ्चतो नास्ति मे व्यथा।।१२।। (प्रथम अंक, उत्तररामचरितम्)
  5. रामायण : मानवता का महाकाव्य, गुणवन्त शाह, भारतीय ज्ञानपीठ, २०१५, पृष्ठ - ५५३
  6. रामायण, राधेश्याम रामायण, सीता-बनवास, पृष्ठ - ५२९
  7. वाल्मीकीय रामायण, डॉ रामचंद्र वर्मा शास्त्री, पृष्ठ- ३८१
  8. रामायण, राधेश्याम कथावाचक, रामाश्वमेध, पृष्ठ - ५४२