सिविल सेवा मुख्य परीक्षा विषयवार अध्ययन/भारतीय संवैधानिक योजना की अन्य देशों के साथ तुलना

विकिपुस्तक से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ

संसदीय बनाम अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली[सम्पादन]

संसदीय शासन प्रणाली (parliamentary system) लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की वह प्रणाली है जिसमें कार्यपालिका अपनी लोकतांत्रिक वैधता विधायिका के माध्यम से प्राप्त करती है और विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती है। इस प्रकार संसदीय प्रणाली में कार्यपालिका और विधायिका एक-दूसरे से परस्पर संबंधित होते हैं। इस प्रणाली में राज्य का मुखिया (राष्ट्रपति) तथा सरकार का मुखिया (प्रधानमंत्री) अलग-अलग व्यक्ति होते हैं। भारत की संसदीय व्यवस्था में राष्ट्रपति नाममात्र की कार्यपालिका है तथा प्रधानमंत्री तथा उसका मंत्रिमंडल वास्तविक कार्यपालिका है। संसदीय प्रणाली में प्रधानमंत्री देश की शासन व्यवस्था का सर्वोच्च प्रधान होता है, हालाँकि संविधान के अनुसार राष्ट्र का सर्वोच्च प्रधान राष्ट्रपति होता है लेकिन देश की शासन व्यवस्था की बागडोर प्रधानमंत्री के हाथों में ही होती है। सरकार के गठन की प्रक्रिया:-भारतीय संविधान में संसदीय शासन व्यवस्था के अंतर्गत मंत्रिमंडल के गठन से संबंधित संविधान के अनुच्छेद 74 और 75 बेहद महत्त्वपूर्ण हैं। अनुच्छेद 74: अनुच्छेद 74 के तहत राष्ट्रपति द्वारा मंत्रिपरिषद का गठन किया जाता है, जिसके प्रमुख प्रधानमंत्री होते हैं। उनकी सहायता और सुझाव के आधार पर राष्ट्रपति मंत्रिमंडल पर सहमति देते हैं। अनुच्छेद 75: प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा की जाती है; वह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 75(i) की शक्तियों का प्रयोग करते हुए देश का प्रधानमंत्री नियुक्त करते हैं। संसदीय प्रणाली की विशेषताएँ बहुमत प्राप्त दल का शासन: आम (लोकसभा) चुनाव में सर्वाधिक सीटों पर जीत दर्ज करने वाला राजनीतिक दल सरकार बनाता है। भारत में राष्ट्रपति, लोकसभा में बहुमत प्राप्त राजनीतिक दल के नेता को सरकार बनाने के लिये आमंत्रित करते हैं। राष्ट्रपति बहुमत प्राप्त राजनीतिक दल के नेता को प्रधानमंत्री के रूप में नियुक्त करते हैं और शेष मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री की सलाह पर करते हैं। लोकसभा के प्रति सामूहिक उत्तरदायित्व: मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है। संसद का निम्न सदन अविश्वास प्रस्ताव पारित कर सरकार को बर्खास्त कर सकता है। जब तक सरकार को लोकसभा में बहुमत रहता है तभी तक सरकार को सदन में विश्वास प्राप्त रहता है। नाममात्र एवं वास्तविक कार्यपालिका: भारत की संसदीय व्यवस्था में राष्ट्रपति नाममात्र की कार्यपालिका है तथा प्रधानमंत्री तथा उसका मंत्रिमंडल वास्तविक कार्यपालिका है। केंद्रीय नेतृत्व: संसदीय शासन प्रणाली में प्रधानमंत्री वास्तविक कार्यकारी होते हैं। वे मंत्रिपरिषद के प्रमुख होते हैं। दोहरी सदस्यता: मंत्रिपरिषद के सदस्य विधायिका व कार्यपालिका दोनों के सदस्य होते हैं। द्विसदनीय विधायिका: संसदीय प्रणाली वाले देशों में द्विसदनीय विधायिका की व्यवस्था को अपनाया जाता है। भारत में भी लोकसभा (निम्न सदन) तथा राज्यसभा (उच्च सदन) की व्यवस्था की गई है। स्वतंत्र लोक सेवाः संसदीय प्रणाली में मेधा आधारित चयन प्रक्रिया के आधार पर लोक सेवकों की स्थायी नियुक्ति की जाती है। गोपनीयता: संसदीय शासन प्रणाली में कार्यपालिका के सदस्यों को कार्यवाहियों, कार्यकारी बैठकों, नीति-निर्माण आदि मुद्दों पर गोपनीयता के सिद्धांत का पालन करना पड़ता है। संसदीय शासन व्यवस्था के दोष

अस्थायित्व: संसदीय शासन व्यवस्था में सरकार का कार्यकाल तो 5 वर्ष निर्धारित है, परंतु वह कार्य तभी तक कर सकती है जब तक उसे लोकसभा में विश्वास प्राप्त है, अर्थात यदि मंत्रिपरिषद लोकसभा में विश्वास खो देती है तो उसे सामूहिक रूप से त्यागपत्र देना पड़ता है। नीतिगत निरंतरता का अभाव: संसदीय शासन व्यवस्था में शासन की प्रकृति अस्थायी होती है, परिणामस्वरूप नीतियों में निरंतरता का अभाव रहता है। शक्तियों का अस्पष्ट विभाजन: कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन नहीं होता है। अकुशल व्यक्तियों द्वारा शासन: संसदीय शासन व्यवस्था में राजनीतिक कार्यपालिका के सदस्य लोकप्रियता के आधार पर चुने जाते हैं, उनके पास विशेष ज्ञान का अभाव होता है। गठबंधन की राजनीति: संसदीय शासन व्यवस्था ने अस्थिर गठबंधन सरकारों का भी निर्माण किया है। इसने सरकारों को सुशासन की व्यवस्था करने के बजाय सत्ता में बने रहने पर अधिक ध्यान केंद्रित करने के लिये बाधित किया है। राजनीति का अपराधीकरण: संसदीय शासन प्रणाली में अपराधी प्रवृत्ति के लोग धनबल व बाहुबल का प्रयोग कर कार्यपालिका का हिस्सा बन रहे हैं। BPSC Study Materials Prelims + Mains (GS)

अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली से तात्पर्य

लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में प्रायः राज्य का प्रमुख (राष्ट्राध्यक्ष) सरकार (कार्यपालिका) का भी अध्यक्ष होता है। अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में कार्यपालिका अपनी लोकतांत्रिक वैधता के लिये विधायिका पर निर्भर नहीं रहती है। इस प्रणाली में राष्ट्रपति वास्तविक कार्यपालिका प्रमुख होता है। अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में कार्यपालिका और विधायिका एक-दूसरे से संबंधित नहीं होते हैं। इस प्रणाली में राज्य का मुखिया तथा सरकार का मुखिया एक ही व्यक्ति होते हैं। अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली की विशेषताएँ

स्थायित्व: अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली या राष्ट्रपति शासन व्यवस्था में कार्यपालिका अपनी नीतियों एवं कार्यों के लिये विधायिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होती है, परिणामस्वरूप कार्यपालिका निर्धारित समय तक अपना कार्य करती है। नीतियों में निरंतरता: अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में कार्यपालिका निश्चित समय तक अपना कार्य करती है जिससे उसकी नीतियों में निरंतरता बनी रहती है। शक्तियों का स्पष्ट विभाजन: अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में कार्यपालिका, विधायिका तथा न्यायपालिका में शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया गया है परिणामस्वरूप लोकतंत्र के तीनों स्तंभों में एक-दूसरे का किसी भी प्रकार से हस्तक्षेप नहीं होता है। विशेषज्ञों द्वारा शासन: अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में राष्ट्रपति के द्वारा अपनी कार्यपालिका के सदस्यों को नियुक्त किया जाता है। राष्ट्रपति कार्यपालिका के सदस्यों की नियुक्ति करते समय उनकी विशेषज्ञता को अत्यधिक महत्त्व देता है। राजनीति का अपराधीकरण नहीं: अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में कार्यपालिका के सदस्यों का चुनाव लोकप्रियता, धनबल व बाहुबल के आधार पर नहीं होता है बल्कि उनकी विशेषज्ञता के आधार पर होता है, जिससे राजनीति में अपराधी प्रवृत्ति के लोग नहीं पहुँच पाते हैं। राजनीतिक प्रभाव से मुक्त न्याय निर्णयन: अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में राष्ट्रपति व उसकी कार्यपालिका राजनीतिक दबाव और गठबंधन धर्म जैसी बाधाओं से मुक्त होती है। वह अपने निर्णय स्वयं करता है और उन्हें कार्यपालिका के माध्यम से कार्यान्वित करता है। अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के दोष

उत्तरदायित्व का अभाव: अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली या राष्ट्रपति शासन व्यवस्था में कार्यपालिका अपनी नीतियों एवं कार्यों के लिये विधायिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होती है, जिससे कार्यपालिका जन सरोकार को ध्यान न देकर व्यावसायिक हितों को महत्त्व दे सकती है। निरंकुशता की संभावना: अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में राष्ट्रपति ही कार्यपालिका के सदस्यों का चुनाव करता है तथा कार्यपालिका किसी भी प्रकार से व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी भे नहीं होती है, जिससे राष्ट्रपति के निरंकुश होने की संभावना रहती है। शासन में व्यापकता का अभाव: अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में कार्यपालिका के सदस्य जनता के द्वारा नहीं चुने जाते हैं, जिससे इस व्यवस्था में संपूर्ण देश के प्रतिनिधित्व का अभाव रहता है। विधायिका एवं कार्यपालिका के बीच टकराव: चूँकि अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में विधायिका एवं कार्यपालिका के बीच सामंजस्य का अभाव होता है इसलिये लोकतंत्र के इन दो स्तंभों में टकराव की संभावना बनी रहती है। संसदीय व्यवस्था की स्वीकार्यता के कारण

व्यवस्था से निकटता: संसदीय शासन व्यवस्था ब्रिटिश काल के दौर से भारत में मौजूद थी। परिणामस्वरूप भारत संसदीय व्यवस्था से परिचित था। स्वतंत्रता के बाद यदि अन्य शासन व्यवस्था को अपनाते तो उस व्यवस्था को समझने में काफी समय लगता। उत्तरदायित्वपूर्ण व्यवस्था: प्रसिद्द संविधान विशेषज्ञ के.एम. मुंशी के अनुसार, भारत ने संसदीय व्यवस्था में उत्तरदायित्व व जवाबदेहिता के सिद्धांत का समावेश किया है, जिससे यह व्यवस्था भारतीय जन मानस के अनुकूल हो चुकी थी। विधायिका एवं कार्यपालिका में सामंजस्य का प्रावधान: संसदीय शासन व्यवस्था में विधायिका एवं कार्यपालिका में सामंजस्य का प्रावधान मौजूद था, जो स्वतंत्रता के बाद भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल था क्योंकि भारतीय शासन व्यवस्था जनता के प्रति उत्तरदायी थी। भारतीय समाज की प्रकृति: भारत विश्व में सर्वाधिक विविधता वाला समाज था। इसलिये संविधान निर्माताओं ने संसदीय व्यवस्था को अपनाया ताकि सरकार में प्रत्येक वर्ग के लोगों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके। भारतीय एवं ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था में विभेद

भारत में संसदीय व्यवस्था का स्वरूप विस्तृत रूप से ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था पर आधारित है। यद्यपि यह कभी भी ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था की नकल नहीं रही। यह उससे निम्नलिखित मामलों में भिन्न थी- ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था में ब्रिटिश राजशाही के स्थान पर भारत में गणतंत्रीय पद्धति को अपनाया गया अर्थात भारत में राज्य का प्रमुख (राष्ट्रपति) निर्वाचित होता है,जबकि ब्रिटेन में राज्य का प्रमुख (राजा या रानी) आनुवंशिक होते हैं। ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था संसद की संप्रभुता के सिद्धांत पर आधारित है, जबकि भारत में संसद सर्वोच्च नहीं है क्योंकि यहाँ लिखित संविधान, संघीय व्यवस्था और न्यायिक समीक्षा का प्रावधान है। ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था में प्रधानमंत्री को निम्न सदन (हॉउस ऑफ कॉमन्स) का सदस्य होना अनिवार्य है जबकि भारत में प्रधानमंत्री दोनों सदनों में से किसी का भी सदस्य हो सकता है। सामान्यतः ब्रिटेन में संसद सदस्य बतौर मंत्री नियुक्त किये जाते हैं, जबकि भारत में जो व्यक्ति संसद का सदस्य नहीं है उसे भी अधिकतम 6 माह तक मंत्री के पद पर नियुक्त किया जा सकता है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विरुद्ध लाए गए महाभियोग (Impeachment) प्रस्ताव[सम्पादन]

दिसंबर 2019में अमेरिकी संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा (House of Representative) में बुधवार को इस प्रस्ताव पर मतदान हुआ। अमेरिकी राष्ट्रपति के विरुद्ध महाभियोग के लिये निचले सदन में दो प्रस्ताव पेश किये गए थे। पहले में उन पर सत्ता के दुरुपयोग का आरोप लगाया गया जो 197 के मुकाबले 230 मतों से पास हुआ। दूसरे प्रस्ताव में महाभियोग मसले पर संसद के कार्य में बाधा डालने का आरोप था जो कि 198 के मुकाबले 229 मतों से पास हुआ। प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेटिक पार्टी के सभी चार भारतीय अमेरिकी सदस्‍यों ने ट्रंप पर महाभियोग चलाने के पक्ष में मतदान किया। हालाँकि राष्ट्रपति ट्रंप की सरकार को कोई खतरा नहीं है क्‍योंकि महाभियोग की प्रक्रिया निचले सदन से पास होने के बावजूद सीनेट में इसका पारित होना मुश्किल है। सीनेट में सत्तारूढ़ रिपब्लिकंस पार्टी का बहुमत है। राष्ट्रपति ट्रंप को केवल एक ही स्थिति में हटाया जा सकता है, जब उनकी पार्टी के सांसद उनके विरुद्ध मतदान करें जिसकी आशंका नहीं है। निचले सदन के बाद अब राष्ट्रपति को सत्ता से हटाने के लिये उच्च सदन यानी सीनेट में महाभियोग की प्रक्रिया चलेगी। अमेरिका के इतिहास में ऐसा तीसरी बार हैं जब किसी राष्ट्रपति के विरुद्ध महाभियोग प्रस्ताव लाया गया है। वर्ष 1868 में एंड्रू जॉनसन और वर्ष 1998 में बिल क्लिंटन के विरुद्ध महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हुई थी। हालाँकि दोनों ही बार राष्ट्रपति को सत्ता से हटाया नहीं जा सका था। वर्ष 1974 में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन पर अपने एक विरोधी की जासूसी करने का आरोप लगा था। इसे वॉटरगेट स्कैंडल का नाम दिया गया था।

अमेरिकी राष्‍ट्रपति ट्रंप पर वर्ष 2020 के राष्ट्रपति चुनाव में संभावित प्रतिद्वंद्वी जो बिडेन समेत अन्‍य नेताओं की छवि खराब करने के लिये यूक्रेन के राष्‍ट्रपति ब्लादीमेर जेलेंसकी से गैरकानूनी रूप से सहायता मांगने का आरोप है। राष्ट्रपति ट्रंप पर सत्ता के दुरुपयोग के साथ-साथ कानून निर्माताओं को जाँच से रोकने का भी आरोप हैं।

भारत और अमेरिका के संविधान की तुलना:

भारत और अमेरिका की सरकारों की कार्यप्रणालियाँ अर्थात् विधायिका, व्यवस्थापिका एवं न्यायपालिका में एक विशिष्ट प्रकार का संबंध है। भारत में जहाँ कार्यपालिका विधायिका का अंग होती है और न्यायपालिका का कार्यक्षेत्र इससे अलग होता है,वहीं अमेरिका की सरकार की कार्यप्रणाली में कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका का स्पष्ट विभाजन है अर्थात् कोई एक-दूसरे से प्रत्यक्ष संबंध नहीं रखते हैं। इस प्रकार जहाँ भारत में शक्ति के पृथक्करण का सिद्धांत पूर्णतः लागू नहीं होता है, वहीं अमेरिका में यह पूर्णतः लागू होता है। शक्ति के पृथक्करण का सिद्धांत (Theory of Separation of Power):

शक्ति के पृथक्करण का सिद्धांत इस विचार पर आधारित है कि निरंकुश शक्तियों के मिल जाने से व्यक्ति भ्रष्ट हो जाते हैं और अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करने लगते हैं।

पृष्ठभूमि:

इस सिद्धांत से संबंधित आधारभूत विचार नवीन नहीं है। राजनीतिशास्त्र के जनक अरस्तू ने सरकार को असेंबली, मजिस्ट्रेसी तथा जुडीशियरी नामक तीन विभागों में बाँटा था, जिनसे आधुनिक व्यवस्था का शासन तथा न्याय विभाग का पता चलता है। 16वीं सदी के विचारक जीन बोंदा ने स्पष्ट कहा है कि राजा को कानून निर्माता तथा न्यायाधीश दोनों रूपों में एक साथ कार्य नहीं करना चाहिये। लाॅक द्वारा भी इसी प्रकार का विचार व्यक्त किया गया है। माॅण्टेस्क्यू:

माॅण्टेस्क्यू के पूर्व अनेक विद्वानों ने इस प्रकार के विचार प्रकट किये थे, किंतु विधिवत् और वैज्ञानिक रूप में इस सिद्धांत के प्रतिपादन का कार्य फ्राँसीसी विचारक माॅण्टेस्क्यू द्वारा ही किया गया। माॅण्टेस्क्यू लुई चौदहवें का समकालीन था इसलिये उसने राजा द्वारा शक्तियों के दुरुपयोग के प्रभाव को भलीभाँति देखा। माॅण्टेस्क्यू के अनुसार “प्रत्येक सरकार में तीन प्रकार की शक्तियाँ होती हैं – व्यवस्थापन संबंधी, शासन संबंधी तथा न्याय संबंधी। इसी आधार पर उसने वर्ष 1762 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘स्पिरिट ऑफ लॉज़’ (Spirit of Laws) में शासन संबंधी शक्ति के पृथक्करण के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। सिद्धांत का प्रभाव:

शक्ति के पृथक्करण सिद्धांत का तत्कालीन राजनीति पर बहुत प्रभाव पड़ा। अमेरिकी संविधान निर्माता इस सिद्धांत से बहुत प्रभावित थे और इसी कारण उन्होंने अध्यक्षात्मक शासन व्यवस्था को अपनाया था। इसी प्रकार मैक्सिको, अर्जेंटीना, ब्राज़ील, ऑस्ट्रिया आदि अनेक देशों के संविधान में भी इसको मान्यता प्रदान की गई है। सिद्धांत के पक्ष में तर्क

निरंकुशता और अत्याचार से रक्षा। विभिन्न योग्यताओं का उपयोग अर्थात् शक्ति के पृथक्करण सिद्धांत को अपनाना इसलिये भी आवश्यक और उपयोगी है कि सरकार से संबंधित विभिन्न कार्यों को करने के लिये अलग-अलग प्रकार की योग्यताओं की आवश्यकता होती है। कार्य विभाजन से बेहतर निष्पादन। न्याय की निष्पक्षता। सिद्धांत की आलोचना:

ऐतिहासिक दृष्टि से असंगत: मांटेस्क्यू के अनुसार, उसने अपने सिद्धांत का प्रतिपादन इंग्लैंड की तत्कालीन शासन पद्धति के आधार पर किया है, लेकिन इंग्लैंड की शासन व्यवस्था कभी भी शक्ति के पृथक्करण सिद्धांत पर आधारित नहीं रही है। शक्तियों का पूर्ण पृथक्करण संभव नहीं: आलोचकों का कथन है कि सरकार एक आंगिक एकता है, उसी प्रकार की स्थिति शासन के अंगों की है। इसलिये शासन के अंगों का पूर्ण व कठोर पृथक्करण व्यवहार में संभव नहीं है। अमेरिकी संघीय व्यवस्थापिका अर्थात् काॅन्ग्रेस कानूनों का निर्माण करने के साथ-साथ राष्ट्रपति द्वारा की गई नियुक्तियों और संधियों पर नियंत्रण रखती है तथा महाभियोग लगाने का न्यायिक कार्य भी कर सकती है। इसी प्रकार कार्यपालिका के प्रधान, राष्ट्रपति को कानूनों के संबंध में निषेध का अधिकार और न्याय क्षेत्र में न्यायाधीशों की नियुक्ति करने एवं क्षमादान का अधिकार प्राप्त है। शक्ति का पृथक्करण अवांछनीय भी है: शक्ति के पृथक्करण सिद्धांत को अपनाना न केवल असंभव वरन् अवांछनीय भी है। व्यवस्थापिका कानून निर्माण का कार्य तथा कार्यपालिका प्रशासन का कार्य ठीक प्रकार से कर सके, इसके लिये दोनों अंगों के बीच पारस्परिक सहयोग अति आवश्यक है। निष्कर्ष:

शक्ति के पृथक्करण का आशय यह है कि सरकार के तीन अंगों को एक-दूसरे के क्षेत्र में अनुचित हस्तक्षेप से बचते हुए अपनी सीमा में रहना चाहिये, और इस रूप में शक्तियों के विभाजन सिद्धांत को अपनाना न केवल उपयोगी बल्कि आवश्यक भी है। भारत और अमेरिका में महाभियोग की प्रक्रिया की तुलना:

भारत में संविधान के अनुच्छेद 61 के तहत राष्ट्रपति के विरुद्ध महाभियोग की प्रक्रिया संविधान के उल्लंघन के आधार पर प्रारंभ की जा सकती है वहीं अमेरिका में देशद्रोह, रिश्वत और दुराचार जैसे मामलों के आधार पर संसद के प्रतिनिधि सदन द्वारा राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया प्रारंभ की जाती है। भारत में महाभियोग की प्रक्रिया प्रारंभ करने हेतु प्रस्ताव पर कम-से-कम एक चौथाई सदस्यों के हस्ताक्षर अनिवार्य हैं, वहीं अमेरिका में प्रतिनिधि सभा के 51% सदस्यों की सहमति पर महाभियोग की प्रक्रिया प्रारंभ की जा सकती है। भारत में महाभियोग प्रस्ताव को पेश किये गए सदन के कुल सदस्यों के दो-तिहाई सदस्यों द्वारा पारित किये जाने पर इसे दूसरे सदन में भेजा जाता है, जबकि अमेरिका में महाभियोग प्रस्ताव सदन में पारित होने के बाद एक ज्यूरी के पास भेजा जाता है जिसकी अध्यक्षता सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश करता है। इस ज्यूरी में राष्ट्रपति बचाव पक्ष के रूप में एक अधिवक्ता की नियुक्ति कर सकता है। इस ज्यूरी में प्रस्ताव पास होने के बाद उसे सीनेट में भेजा जाता है। भारत में दूसरे सदन में भी प्रस्ताव को दो-तिहाई बहुमत से पारित होना आवश्यक है जबकि अमेरिका में प्रस्ताव को 67% सदस्यों द्वारा अनुमोदित किया जाना होता है।