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सोनभद्र के पवित्र धार्मिक स्थल

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सोनभद्र के पवित्र धार्मिक स्थल

रामनाथ शिवेंद्र

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सोनभद्र में उपलब्ध पुरातात्विक साक्ष्यों की अधिकतम उपलब्धताओं ने मतभेद मूलक विचारों व संज्ञानों के कारण सोनभद्र की ऐतिहासिकता को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। गजेटियर 1974,1978 व आजादी पूर्व का गजेटियर 1911 स्पष्ट रूप से जानकारी देता है कि वनजीवी द्रविण व आर्य प्रजातियों का राजनैतिक सामाजिक व आर्थिक हस्तक्षेप सोनभद्र में रहा है जो अविवादित है किन्तु ‘‘आइए सोनभद्र चलंे’’ पुस्तिका 1992 सोनभद्र में आर्यों की उपस्थिति को साबित नहीं करता है व इसे सामान्य रूप से लेता है। इस प्रकार सोनभद्र का ऐतिहासिक सत्य विवादास्पद हो जाता है। कुछ लोग अपने फुटकर लेखों व आलेखों में सोनभद्र की प्राचीनता का सन्दर्भ नागवंशीय राजाओं व शैव मतावलम्बियों से जोड़कर सोनभद्र को परीक्षित करने का प्रयास कर चुके हैं। इसी प्रकार लोरिक की कथा को राजा मोलागत से जोड़ दिया गया है जो कि अगोरी का राजा था इतना ही नहीं मंजरी का कोहबर व डोला भी ढूंढ निकाला गया है। इतिहास की किताबंे मोलागत नामक राजा का सन्दर्भ नहीं लेतीं। दरअसल मोलागत राजा का नाम असली राज के स्थान पर छद्म जान पड़ता हैै, इसलिए कि लोरिकी की कथा अगोरी के वास्तविक क्रूर राजा के काल में ही जनप्रिय होकर गायकों के कंठ से प्रस्फुटित होने लगी रही होगी। अंग्रेजी काल में भारतेन्दु जी भी अंग्रेजों को गोरी गिट्टयों की उपमा देते हैं सीधे तौर पर अंग्रेज नहीं लिखते। लोरिकी के स्वस्फुर्त गायकों ने अगोरी के राजा का वास्तविक नाम न लेकर एक काल्पनिक नाम मोलागत चुन लिया होगा। वैसे भी असली राजा से क्या मतलब? लोरिकी का लक्ष्य तो लोरिक के संघर्षों को स्पष्ट करना था तथा वास्तविक रियासती व्यवस्था व दमनकारी सत्ता केन्द्र का विरोध करना था।

सिल्थम पटना जो रावटर््सगंज से पूरब व दक्षिण में स्थित है तथा नल राजा नामक स्थान जो पूरब व उत्तर में स्थित है, सोन नदी की उत्तरी किनारे की पहाड़ियों से गुजरते हुए रावटर््सगंज के पश्चिम तक जाने पर शायद ही कोई ऐसी जगह हो जहां मूर्ति की शिल्प-कला अतीत की क्रूर त्राशदियों को न झेल रही हो। मूर्ति-कला के दमन व उत्पीड़न का क्षेत्रा जैसा सोनभद्र है वैसा शायद कहीं और नहीं। किसी भी शिल्प व संस्कृति के दमन, विलोपीकरण, समाप्तीकरण की दृष्टि से सोनभद्र की ऐतिहासिकता को जानने-बूझने का सचेत आग्रह भी बुद्धि के खिलाड़ियों में निश्चित रूप से विकसित होना चाहिए। सोनभद्र खण्डित व अखण्डित दोनों प्रकार की मूर्तियों के शिल्प का क्षेत्रा है। गोठानी जैसे स्थान पर जो अगोरी किले के समीप है वहां मूर्ति-शिल्प-कला के केन्द्र होने का प्रमाण दिखता है। नल राजा नामक स्थान किसी राज-व्यवस्था के नगर की तरफ संकेत देता है तो शिवद्वार का क्षेत्रा किसी आध्यात्मिक केन्द्र होने की गाथा कहता है। सिल्थम व पटना में खण्डित मूर्तियां हर तरफ बिखरी हुई मिलती हैं तो मऊ में सहस्त्रामुखी शिव की प्रतिमा साबूत बची हुई है। इस प्रतिमा को स्थानीय लोगों ने अपने प्रयासों से एक मन्दिर मंे स्थापित भी कर दिया है। यही स्थिति नल राजा के शिवलिंग की है जिसे स्थानीय लोगों ने मन्दिर में स्थापित कर दिया है। रामगढ़ के ठीक उत्तर शिवाला गांव में एक पुराना शिवालय एक बड़े तालाब के किनारे स्थापित है जिसमें शिव-लिंग स्थापित है। शिवालय के निर्माण की कला वास्तु की दृष्टि से अद्भुत है जो बनारस में स्थापित प्राचीन शिवालयों से किसी मायने में कमतर नहीं है। कम से कम विजयगढ़ राज के क्षेत्रा में इस शिवालय की तुलना में पुरानी कला के रूप का कहीं भी शिवालय नहीं है, वैसे तो आधुनिक काल में तमाम ऐसे शिवालय बनाये जा चुके हैं जो गॉव गॉव है। इससे यह प्रमाणित होता है कि यह पूरा परिक्षेत्रा आध्यात्मिक रूप से ‘शैव परंपरा’ का सशक्त अनुयायी है। वैसे यहां वैश्णव परंपरा के भी संकेत मिलते हैं पर शैव परंपरा की तुलना में बहुत ही कम। एक बात और सोनभद्र में उल्लेखनीय है वह यह कि अंग्रेज सोनभद्र के जिस हिस्से को सोनभद्र का दक्षिणी हिस्सा मानते हैं, जो अंग्रेजों के जमाने में आदिवासी बहुल क्षेत्रा रहा है, उन स्थानों पर हिन्दू मतावलम्बियों के आघ्यात्मिक प्रतीक नहीं के बराबर मिलते हैं केवल अगोरी व गोठानी का ही एसा परिक्षेत्रा है जहां आध्यात्मिक प्रतीक पाये जाते हैं। बहर हाल इस विषय पर एक अलग तरह का शोधात्मक अध्ययन करके पता लगाया जा सकता है कि आदिवासी परिक्षेत्रों तक आजादी के पहले हिन्दू मतावलम्बियों के धार्मिक प्रतीक क्यों नहीं पाये जाते जब कि इतिहास साफ बताता है कि आदवासी जनजातियों का आर्यीकरण अंग्रेजों के भारत आने के पहले ही प्रारंभ हो चुका था। सो वहां भी धार्मिक प्रतीक तो होने ही चाहिए थे।

शिवद्वार- शिव पार्वती की आलिंगन बद्ध प्रतिमा

काले पत्थर पर उकेरित आलिंगन बद्ध  शिव प्रतिमा

शिवद्वार में स्थापित शिव पार्वती की आलिंगन-बद्ध प्रतिमा काले पत्थर पर उकेरित है। दस प्रतिमा की चिकनाई तथा उसका खरादिया काम आकर्षक है। पूरे सोनभद्र में कोई भी देव-प्रतिमा आलिंगन-बद्ध नहीं है। आलिंगन-बद्ध प्रतिमाओं का भारत में प्रारंभ यदि खुजराहों से मान लिया जाय तो यह प्रतिमा भी खुजराहों कला का प्रतिरूप जान पड़ती है। खुजराहो के मूर्ति-शिल्प को चन्देल राजाओं ने प्रश्रय दिया था, ज्ञातव्य है कि चन्देल राजाओं की ही शासन व्यवस्था सोनभद्र में भी रही है, इस प्रकार शिवद्वार की शिव-प्रतिमा का निर्माण उनसे कहीं न कहीं अवश्य ही जुड़ा जान पड़ता है। काले पत्थर पर उकेरित शिव-प्रतिमा की अद्वितीयता इस अर्थ में भी है कि कैमूर घाटी की आदिम व मध्य कालीन संस्कृति में जीवन जीने की जो कलायें थीं उनमें समता व भाई-चारे का पक्ष प्रबल था। स्त्राी-पुरुष के बीच अलगाव जैसा रिश्ता न था। मध्यकाल के अन्त से आधुनिक काल के पूर्व तक, स्त्राी-पुरुष के बीच सांस्कृतिक रूप से वैराग्य की आध्यात्मिक भावनाओं के कारण जो बिलगाव पैदा होने लगा था वैसी ही भावना जब भी सोनभद्र में विकसित हुई होगी संभव है उसी काल में इस आलिंगन-बद्ध शिव-पार्वती की प्रतिमा का निर्माण कराया गया होगा। पूरे सोनभद्र में कहीं भी कोई प्रतिमा स्त्राी-पुरुष की संयुक्तता बोधी नहीं हैं और न ही वैराग्य की अवधारणा का पोषक हैं। विष्णु हैं तो अकेले हैं उनके साथ धन की देवी लक्ष्मी नहीं हैं, कोई दूसरी प्रतिमा है तो वह भी अकेली है। केवल शिव ही हैं जो पार्वती के साथ हैं वह भी आलिंगनबद्ध। गांव-गांव में शिव मन्दिर का पाया जाना प्रमाणित करता है कि सोनभद्र शैव परंपरा का अनुयायी है। तप व तकलीफ, ध्यान व साधना, विचार व आत्मा, प्रकृति व पुरुष का द्वन्द सोनभद्र की कैमूर घाटी मंें हर तरफ दिखेगा। मूर्तियाँ एक तरफ आध्यात्मिक साधना के तकलीफों की तरफ संकेत करती हैं तो दूसरी ओर जीवन जीने की बहु-आयामी कलाओं की तरफ भी। जीवन जीने की कलाओं के बीच जो भी आर्थिक व सामाजिक रूप से पूरे सोनभद्र में तकलीफ व यातना व्याप्त है, उसकी सूचना इन मूर्तियों की कलाओं व स्थापनाओं से सहज ही प्राप्त हो जाती हैं पर इन तकलीफों से छुटकारा पाने के लिए संघर्ष व सार्थक प्रतिरोध के जिस तप व ताप की आवश्यकता सोनभद्र के लिए है वह कहीं भी नहीं दिखती।


मऊ- शिव की सहस्त्रमुखी प्रतिमा

मऊ की शिव प्रतिमा नंदी के साथ

मऊ गांव में स्थापित सहस्त्रा मुखी शिव प्रतिमा की पुरातात्विकता तथा उसका सांस्कतिक अर्थ-बोध बहुत ही जन-कल्याणकारी है। सहस्त्रामुखी का अर्थ सहस्त्राबाहु से है जिसका अर्थ होता है केवल मुंह ही नहीं जिसे रोटी चाहिए सहस्त्राभुजाएं भी हैं, यदि हाथ कुछ करेंगे तो रोटी मिलेगी ही। दूसरा अर्थ यह लगाया जाना चाहिए कि जितने मंुह उतनी बातें फिर जीवन का सत्य दो आंखें हैं इन्हीं दोनों आंखों से साक्षात्कार करने के लिए एक मुंह के साथ दो आंखे हैं, इन्हीं दोनांे आंखों से सत्य देखोे फिर मुंह से बोलो। इस सहस्त्रा-मुखी शिव प्रतिमा को निर्मित करने वाला कलाकार एक सोद्देश्य सांस्कृतिक कार्य भारों के तहत इसका निर्माण करता है पर सांस्कृतिक प्रदूषण होने के कारण कलाकार की भावुकता व दार्शनिकता धूमिल व प्रदूषित होने लगती है। प्रकृत व पुरुष के द्वन्द को प्रदर्शित करने वाली इन मूर्तियों का रूप कुछ इतना आध्यात्मिक हो गया है कि उसमें से सिर्फ आस्था ही शेष बचती है तर्कणा व विचारणा गायब हो जाती है। जीवन जीने के आवश्यक कार्य भारों को निपटाने के लिए जिस तप, साधना, ध्यान व आस्था की आवश्यकता होती है वह सब निरीह आस्था व विश्वास की अकर्मण्यता में विलुप्त हो जाता है तथा व्यक्ति देव-वाद का मनोवैज्ञानिक मरीज होकर पूजा पद्धतियों के तर्क-हीन कर्म-काडों में उज्जवल भविष्य का सपना देखने लगता है। व्यक्ति के जीवन में हानिकर कर्म-कांडी आचरण का प्रवेश इसी बिन्दु से प्रारंभ हो जाता है जबकि मूर्तियाँ इसके विपरीत आचरण व आस्था की संस्तुतियाँ व जागरण करती हैं कि जीवन में जीवन जीने की कलाओं का जो संषर्ष व द्वन्द है उससे विरत या मुह मोड़ कर सत्य को नहीं जाना जा सकता। वैसे तो पूरा मऊ गॉव कहीं साबूत तो कहीं टूटी हुई मूर्तियों का केन्द्र है, हर सौ डेढ़ सौ फीट की दूरी पर कोई न कोई मूर्ति अवश्य दीख जायेगी। इसी मऊ गॉव में एक पुरातात्विक संग्रहालय भी है जो आज-कल सरकारी देख-रेख की उपेक्षा का शिकार है।

बरकन्हरा- में स्थापित विष्णु प्रतिमा

विष्णु प्रतिमा
बरकन्हरा में प्राप्त विष्णु की प्रतिमा जो सफेद पत्थर पर उकेरित है तथा जिसकी ऊँचाई डेढ़ फीट होगी यह प्रतिभा भी स्थानीय लोगों द्वारा निर्मित मन्दिर में स्थापित है। मूर्ति का सफेद रंग आचरण की शुचिता तथा कर्म करने के कठोर संकल्पों की व्याख्या करता है। प्रतिमाएं चाहे जिस रूप में हों जिस कला-कौशल से निर्मित की गई हों उनका रूप उनकी संरचना अभिव्यक्ति के सार्थक संवेगों व ऊर्जाओं को प्रस्फुटित करती हैं। बरकन्हरा घोरावल से तेरह किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। घोरावल का पूरा भू-भाग बेलन व सोन जैसी नदियों के क्षेत्रों के भीतर है। ये दोनों नदियां इस क्षेत्रा की निरपेक्ष संस्कृति का निर्माण करती हैं तथा मानव जीवन जीने लायक एक ऐसा भू-भाग निर्मित करती हैं जहां आदमी अपना रहवास स्थापित करने  के लिए विवश हो जाता है। इन मैदानों पर रहने वाले रहवासियों के बीच निर्पेक्ष रिश्ता देखने लायक है तथा वे प्रकृति से सीखते हुए प्रकृति के उत्पादों का उपयोग करने की योग्यता व दक्षता संपन्न हैं। यह सब मानव विकास की निर्पेक्ष गति-शीलता के प्रति स्पष्ट संकेत हैै। विष्णु की सफेद प्रतिमा कैमूर घाटी की निर्पेक्ष संस्कृति का स्पष्ट रूप से व्याख्या करती है। कहा जा सकता है कि शिवद्वार के शिव तथा बरकन्हरा के विष्णु दोनों अलग-अलग तौर तरीकों से शैव व वैष्णव धर्म संस्कृति का अनुष्ठान रचते हैं पर ऐसा कहना सोनभद्र व कैमूर घाटी संस्कृति की निरपेक्षता पर कलंक लगाना होगा। यहां तो दोनों संस्कृतियां एक में गुत्थम गुत्था हैं समझना मुश्किल कि कौन शैव मतावलम्बी है और कौन वैष्णव मतावलम्बी। मूर्तियांे की निरपेक्षता कालान्तर में अनुकरणीय नहीं रह सकी। इनके भाव संवेगों  व संचारांे में विविधता व भिन्नताएं आईं फलस्वरूप मूर्ति-कला की समभावी व समायोजन-वादी शिक्षा मिटने लगी तथा मूर्तियों में पक्षपात पूर्ण धार्मिक आस्थाओं व विश्वासों को प्रस्थापित किया जाने लगा। जीवन जीने के तौर तरीकों की निरपेक्षता समाप्त होने लगी तथा मतावलम्बियों के हठ प्रभावी होने लगे। यहीं से मूर्तिरूपी पाषाण लिपि की जन समझदारी मतभेदों का शिकार होने लगी।


नलराजा- विशाल एवं अद्भुत शिवलिंग

विशाल शिव लिंग

नल राजा नामक स्थान पर स्थापित शिवलिंग सोनभद्र के ज्ञात शिव-लिंगों में अदभुत एवं आश्चर्यजनक है। लगभग चार फीट ऊँचा तथा लगभग इसी गोलाई का यह शिवलिंग अद्भुत है? संभवतः इस शिवलिंग पर कर्म-कांडियों की निगाह नहीं पड़ी, नहीं तो वे इसकी रचना-प्रक्रिया की शास्त्राीयता पर अवश्य प्रकाश डाले होते। बहरहाल मूर्ति कला की संप्रेषणीयता के विज्ञान के आधार पर नलराजा के शिवलिंग रचना पर विचार किया जाय तो यह स्पष्ट है कि सभी शिव-लिंग सृजन प्रक्रिया की तरफ संकेत देते हैं। हानि, लाभ, यश,अपयश, अच्छा,बुरा, शुभ,अशुभ, हार,जीत, देवता, राक्षस सभी प्रकृतिक संरचनाएं जब बची रहंेगी तथा प्रकृति की मानव रूपी संरचना जब सुरक्षित रहेगी तभी धर्म व राजनीति समाज व अर्थनीति न्याय व अपराध पर आधारित व्यवस्था व शास्त्रा बचे रह सकेंगे। शिव-लिंगों का यह सन्देश कि सृष्टि बचाओ, समाज बचाओ, आदमी बचाओ तभी भूगोल बचेगा, दुनिया बचेगी, नहीं तो जब सृजन ही समाप्त हो जाएगा फिर क्या बचेगा? शिवलिंगों की स्थापनाएं सृजन की स्थापनाओं के लिए किए जाने वाले पवित्रा प्रयास जैसा जान पड़ती हैं। लिंग-पूजा व समाज में प्रचलित लिंग-भेद दोनों एक दूसरे के विरोधी तत्व के रूप में विकसित हुए हैं जबकि जहां-जहां भी शिवलिंग पूज्यनीय व आराध्य हैं, कम से कम वहां तो लिंग-भेद नहीं होना चाहिए था। कदाचित स्त्राी-पुरुष का भेद मिट जाता तो यह दुनिया इतनी बद्रूप नहीं होती जितनी है। आमतौर पर देखा जा रहा है कि पुरुष उत्पीड़न व यातना झेलती औरतें जितना आस्थावादी व कर्म-कांडी होती हैं उतना पुरुष नहीं। वे काफी डरी हुई व भयभीत हैं, इसलिए डरों व भयों से मुक्त होने के लिए ईश्वरीय आस्थाओं में वे समाधान ढॅूढ़ती हैं और पूजा-पाठ जैसे कर्म विधानों में खुद को व्यस्त रखना धर्म का काम मानती हैं। पुरुष, पदार्थ के रिश्तों की अद्वितीयता मूर्तियों की आस्था में स्पष्ट रूप से दिखती है। मूर्तियाँ स्पष्ट रूप से पत्थर-रूपी पदार्थ होती हैं उनमें न तो जीवन होता है न ही जीवन जैसी उनमें हलचल होती है फिर भी मूर्तियाँ आस्था व विश्वास की भाषा में संवाद करती हैं तथा जन-मानस को प्रभावित करती हैं। पदार्थ व पुरुष के शाश्वत रिश्ते ने ही समाज को गतिशीलता प्रदान की है। मूर्तियाँ पदार्थ के सत्य का साक्षात्कार कराती हैं एक ऐसा साक्षात्कार जो प्रकृति से रिश्ता बनाने की कला सिखाता है, जिससे जीवन जीने के क्रम में निरन्तरता व समरूपता बनी रह सके। आज की वैज्ञानिक दुनिया में पर्यावरणवादी, जीव-जन्तुओं तथा पेड़-पौधों से मुहब्बत करने की कला सिखा रहे हैं तथा चेता रहे हैं कि यदि प्रकृति का विनाश रोका न गया तो निश्चित रूप से यह हसीन दुनिया नष्ट हो जाएगी। मूर्तियों के सत्य का साक्षात्कार इसलिए आवश्यक है कि पदार्थो का सत्य, पुरुष और प्रकृति का सत्य व अस्तित्व बचा रहे लेकिन व्यवहारतः विपरीतगामी कार्यवाहियों का संपादन किया जा रहा है तथा प्रकृति के प्रति आस्था व विश्वास को तोड़ दिया जा रहा है। राबर्ट्सगंज से कुछ दूर चुर्क के रास्ते पर अवस्थित पंचमुखी के शिवलिंग को मूर्तियों के सत्य के ज्ञान के लिए देखा जाना चाहिए। पंचमुखी पर स्थापित शिवलिंग सृजन के प्राकृतिक प्रक्रिया का बोध कराता है कि सृजन आवश्यक है। राबर्ट्सगंज से करीब आठ किलोमीटर दूर पश्चिम स्थित गौरीशंकर ग्राम में भी शिवलिंग स्थापित है तथा वहाँ मेला भी लगता है कुड़ारी देवी की मान्यता भी उल्लेखनीय है जो सोन नदी के दक्षिणी किनारे पर स्थित हैं। गोठानी व मऊ दो ऐसे स्थान है जहां पर पुरात्व विभाग की तरफ से मूर्तियों की ऐतिहासिकता सम्बन्धी कार्य किया जाना चाहिए जिससे सोनभद्र का ऐतिहासिकता का सच प्रकाश में आए तथा मतभेद के आधार समाप्त हों। क्योंकि जितने लोग उतनी बातें हैं। शिव के सहस्त्रा-मुखी प्रतिमा की तरह यहाँ का इतिहास भी सहस्त्रामुखी हो चुका है। सोनभद्र में मूर्तियों के बिखराव व पुरातात्विक साक्ष्यों की उपलब्धता के आधार पर जो निश्कर्ष निकलते हैं उनमें सबसे महत्वपूर्ण है, श्रम-सम्बन्धों वाले समाज के कर्म का दर्शन तथा पुरुष का पदार्थ, व प्रकृति के प्रति प्रेम व समर्पण। निश्चित रूप से सोनभद्र का प्रारम्भिक समाज कर्म से संबंधित धर्म की व्याख्या का रहा होगा जबकि आज धर्म से संबंधित कर्म की व्याख्या वाला हो गया है जो व्यक्ति को अन्ध-भक्त व आस्थावादी बना रहा है। पहले ऐसा नहीं था। पहले के समाजों में कर्म की प्रधानता थी तथा कर्म करने की छूट भी थी। भूमि की हकदारी का सवाल नहीं था, सम्पत्ति का मायाजाल व्यक्तिगत उपक्रमों में फंसा नहीं था, सम्पत्ति सार्वजनिक थी तथा एकाधिकारी प्रवृत्तियाँ प्रभावी नहीं हुई थीं। व्यक्ति को समाज के लिए कर्म करना था। इस कर्म के लिए जो आचरण व कार्मिक व्यवहार विकसित हुए वही धर्म के रूप में मान्य होते चले गए। कालान्तर में भाषा व लिपि का विकास हुआ जिससे शास्त्रा व शस्त्रा निर्मित हुए। शास्त्रों के पास धर्म की हिफाजत का जिम्मा था तो शस्त्रों के पास समाज व व्यक्ति को बचाने का। कृषि अर्थव्यवस्था पर आधारित समाजों में कर्म की प्रधानता के कारण शाश्वत श्रम सम्बन्धों का विकास हुआ जिससे पक्षपात रहित तथा सम-भाव समाज का आविर्भाव हुआ। कर्म का यह दर्शन मानव सभ्यता के विकास के क्रम मंे मिटने लगा, कहा जा सकता है कि धार्मिक जकड़नों ने कर्म के प्राचीन दर्शन को धर्म के कर्महीन सूत्रा ‘आस्था’ से जोड़ दिया। देव-आस्था के इस स्वरूप ने समाज में कर्म-हीनता तो उत्पादित किया ही साथ ही साथ हानि,लाभ, यश,अपयश, जीत-हार, जैसे जीवन के सारे क्रिया-भारों को ईश्वर के हवाले कर दिया...जैसा ईश्वर चाहेगा वही होगा। फलस्वरूप हमारेे समाज में खतरनाक जड़ता आई जो आज भी स्पष्ट रूप से दिखती है। मूर्तियों की निर्पेक्ष अभिव्यक्ति सांस्कृतिक रूप से प्रभावित हुई। पुरुष व पदार्थ का रिश्ता स्वार्थ पूर्ण एवं व्यक्ति केन्द्रित होकर एकाधिकार की तरफ बढ़ने लगा। सामाजिक रूप से सोनभद्र के भाई-चारे की स्थिति प्रायोजित प्रतियोगिता का रूप धारण करने लगी है। आज सोनभद्र के प्रतियोगी समाज की आर्थिक व सामाजिक स्थिति गरीबी व बेरोजगारी के कारण आक्रामक है, असमानता की खतरनाक वृद्धि है तथा मानवाधिकार पूरी तरह असुरक्षित। वैसे तो सोनभद्र में तमाम दर्शनीय स्थल हैं जिस पर अलग से लेखन किया जाना चाहिए जो यहां संभव नहीं है फिर भी हम उनका उल्लेख कर रहे हैं.


अन्य पुरातात्विक स्थल

सम्मिलित देव प्रतिमाएं
अन्य प्रतिमा एक साथ

1- ओम पर्वत- जिलामुख्यालय से दक्षिण तरफ 40 कि.मी.दूर,

2- गोमुख- जिलामुख्यालय से दक्षिण तरफ 30 कि.मी.दूर मच्छरमारा गॉव में

3- त्रिवेणी संगम-जिलामुख्यालय से दक्षिण तरफ 27 कि.मी.दूर सोन, बिजुल, रेड़ के संगम पर

4- कण्डाकोट-जिलामुख्यालय से पश्चिम तरफ 10 कि.मी.दूर

5- छिपाताली- जिलामुख्यालय से पू. उ. की तरफ 40 कि.मी.दूर

6- दिवानी चुंआं- जिलामुख्यालय से पूरब की तरफ 35 कि.मी.दूर

7- बाघेश्वर महादेव- जिलामुख्यालय से उ.पू. की तरफ तरफ 28 कि.मी.दूर

8- बरैला महादेव- जिलामुख्यालय से पश्चिम की तरफ 3 कि.मी.दूर

9- ऋणमुक्तेश्वर नाथ- जिलामुख्यालय से पू.दक्षिण की तरफ 40 कि.मी.दूर घाघर नदी के तट पर

10- सोमा की धरती माता- जिलामुख्यालय से पूरब की तरफ 40 कि.मी.दूर घाघर नदी के तट पर

11- बाबा सोमनाथ एवं वंसरा माता मन्दिर- जिलामुख्यालय से पू.दक्षिण की तरफ 40 कि.मी.दूर,

  सोन व रेणु के संगम पर 

12- अमर गुफा- जिलामुख्यालय से दक्षिण 35 कि.मी.दूर सलई बनवा में स्थित

13- भूतेश्वर दरबार की गुफा- जिलामुख्यालय से दक्षिण की तरफ 33 कि.मी.दूर

13- पिंडारी की गुफा- जिलामुख्यालय से पूरब की तरफ 50 कि.मी.दूर

14- सोनेश्वर महादेव- जिलामुख्यालय से दक्षिण की तरफ 21 कि.मी.दूर

15- कुण्डवासिनी देवी- जिलामुख्यालय से दक्षिण-पश्चिम की तरफ 40 कि.मी.दूर

16- दुर्गावती कुण्ड- जिलामुख्यालय से पूरब की तरफ 85 कि.मी.दूर

17- मॉ मुण्डेश्वरी देवी- जिलामुख्यालय से पूरब की तरफ 85 कि.मी.दूर

18- ज्वालामुखी देवी- जिलामुख्यालय से दक्षिण की तरफ 120 कि.मी.दूर

19- अमिलाधाम- जिलामुख्यालय से पूरब की तरफ 45 कि.मी.दूर