सोनभद्र शास्त्रों में
सोनभद्र शास्त्रों में
रामनाथ शिवेंद्र

मनु और सतरूपा को भारतीय समाज अपना जनक मानता है तथा इन्हें प्रमाणित रूप से शास्त्रों के द्वारा स्थापित भी किया गया है। पुराणों के कथाएं तथा मनुस्मृति दोनों ही ‘मन’ु को केन्द्र में रखकर महत्वपूर्ण ग्रन्थ की हैसियत में हैं। गीता, मनुस्मृति, वेद, हिन्दू आख्यानों के ऐसे दस्तावेज हैं जिन पर सार्थक व उपयोगी बहस करना हिन्दू होने के अस्वीकार से है यानि हिन्दू विरोधी होना है। जात-पांत वर्ण व्यवस्था ये कुछ ऐसे समाज विरोधी तत्व दर्शन हैं जो इतिहास की गतिशीलता को बाधित कर क्षयग्रस्त करते हैं। सभी जानते हैं कि शास्त्रों के संघातों को झेल पाना आसान नहीं होता। तभी तो इतिहासकार अबूतालिब ने कहा था...‘तुम इतिहास पर बन्दूक चलाओगे तो वह तुम पर तोप से गोले दागेगा’ हमें सदैव ध्यान रखना होगा कि शस्त्रों एवं शास्त्रों की द्वन्दात्मकता से उपजने वाला इतिहास अपने विमर्शो के माध्यम से ऐतिहासिक सत्य का अनुसंधान करे न कि उसका अनुगामी बन जाये। गीता, मनुस्मृति तथा वेद की विचारधाराओं के इतर जो शास्त्राीय क्रान्ति महावीर तथा बुद्ध द्वारा की गई तथा वेदों को अस्वीकार किया गया उसमें हमें देखना चाहिए कि तत्कालीन जनता का पक्ष क्या था? जाहिर है र्ई.पू. छठवी शताब्दी के पहले की आक्रान्त सामाजिक व्यवस्था का विरोध ही वह सूत्रा था जो महावीर तथा बुद्ध को प्रकाश में लाता है। इसे 1857 के स्वतंत्राता संग्राम से जोड़ कर देखना चाहिए यदि 1857 का काल विद्रोह के लिए अग्रसर न होता तो शायद हम 1947 तक की प्राप्तियों तक न पहुंचते तथा हमें गांधी जैसा विचारक न मिलता। ‘सत्पथ ब्राह्मण’ मनु तथा वैवश्वता की चर्चा करता है। ‘पद्म पुराण’ चेदी वंश के अधिपति ‘दन्तवक्र’ की चर्चा करता है कि वह महाभारत के समय कृष्ण द्वारा मारा गया। ‘दन्तवक्र’ शायद ‘करूष’ था जिसे असुर समझा जाता है। बाद में जब यह प्रमाणित हो जाता है कि ‘करूष’ मनु की नौवीं सन्तान थे तब उन्हें महाभारत के युद्ध में शामिल किया जाता है। कुछ शास्त्रा मानते हैं कि ‘करूष’ ही असुर थे तथा तत्कालीन समाज में असुरों को निरापद नहीं माना जाता था। भागवत पुराण मानता है कि ‘करूष’ लोग बहादुर तथा लड़ाकू हुआ करते थे। शास्त्रों की मतभिन्नता भी एक ऐसा कारक है जो सच्चाई को प्रकाश में नहीं लाने देती। ‘सतपथ ब्राहमण’ असुरों को बुरे अर्थो में प्रमाणित नहीं करता। उसमें अनेक ऐसे प्रसंग है जहां असुरों को सम्मानित रूप से वर्णित किया गया है। ‘सतपथ ब्राहमण’ के अनुसार असुर ‘प्राच्या’ थे तथा पूर्वी भारत में निवास करते थे। पाणिनी ने बोली के आधार पर असुरों की व्याख्या की है तथा व्याख्यायित किया है कि राक्षसों की बोली बोलने वालों को ‘असुर’ कहा जाता था। सवाल उठता है कि क्या पाणिनी के समय से ही भाषा व बोली के आधार पर अभिजात्य परंपरा के चलन का प्रारंभ हो चुका था जिसे डा.राम मनोहर लोहिया ने भाषागत शोषण का नाम दिया है। अंग्रेजों ने अंग्रेजी भाषा के माध्यम से पूरे भारत का विनाशकारी शोषण किया फलस्वरूप आज भी दो प्रतिशत अंग्रेजी दॉ लोग भारत के सामाजिक राजनीतिक आर्थिक तथा साहित्यिक क्षेत्रों का अपनी हित साधना में उपयोग करते हैं। तुर्रा यह कि उन्हें ही भारत का सर्वोत्तम व सर्वेश्रेष्ठ ज्ञान-मीमांशी (म्चपेजवउवसवहपेज) व सत्ता-मीमांसी (व्दजवसवहपेज) समझा जाय तदनुसार सम्मानित किया जाय। जहां तक सोनभद्र तथा मीरजापुर का सवाल है ये दोनों जनपद बोली के आधार पर इलाहाबाद, सीधी, रीवां, बांदा, बगैरह के जितना नजदीक हैं उतना बनारस, गाजीपुर बलिया, आजमगढ़ के नहीं सो यह भिन्नता हो सकती है। सवाल है क्या यहां के निवासी वैदिक काल के नहीं थे? फिर भी निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि यहां के निवासी आर्यो के प्रभाव में आए रहे होंगे तथा उनकी अधीनता स्वीकार किए होंगे। आर्यो के बारे में अविवादित राय है कि वे पहले सप्तसिन्धु (सात नदियों का क्षेत्रा अविभाजित पंजाब ) में आए तथा वहां बस्तियां बनाए। सिन्ध,ु बितस्ता (झेलम) आसक्री (चिनाव) परूश्ष्नी (रावी) विपासा (व्यास) शतुद्री (शतलज) और सरस्वती (राजस्थान में विलुप्त) इन्हीं सात नदियों के क्षेत्रों के आस-पास आर्यो द्वारा आवास बनाया जाना प्रमाणित है। आर्यो के प्रारंभिक कुलों के बारे में जो ज्ञात है वह पुरू, तुर्वस, यदु, अनु तथा द्रुह इन्हीं पंचकुलों के लोग थे। इसके अलावा भी एक कुल था जो ‘भरत’ कहलाता था। अब यह भी विवादित नहीं है कि आर्यो ने अपना विस्तार पूर्व की ओर किया, शतपथ ब्राहमण तो ब्राहणों तथा क्षत्रियों के राज्य विस्तार का बहुत ही रोचक व मर्मान्तक वर्णन करता है। सीमाओं के विस्तार ने नये-नये क्षेत्रों व जनपदों का सृजन किया। आर्य हमलावर समूह के नये क्षत्रापों का उदय हुआ। नये जनपदों एवं नये क्षत्रापों के उदय से सप्त-सिन्धु का महत्व कम होता गया तथा संस्कृति व राजनीति के नये केन्द्र सरस्वती व गंगा के क्षेत्रों में निर्मित होने लगे। यहां पहले से ही कुरू, काशी तथा कोशल राज थे। कुरू, काशी, कोशल राज का विस्तार प्रयाग तक था तथा यह मध्यक्षेत्रा (देश) के नाम से जाना जाता था। आज के उत्तर प्रदेश की सीमा भी यही है। काशी राज का क्षेत्रा इधर सोनभद्र तथा मीरजापुर गाजीपुर तक था तो पांचाल का क्षेत्रा बरेली,बदायूं फरूखाबाद तक जिसकी राजधानी अहिक्षेत्रा (बरेली) जिसे काम्पिल्य कहा जाता था कोशल राज का क्षेत्रा अवध तथा गोण्डा था जिसे श्रावस्ती कहा जाता था। कोशल की राजधानी साकेत (अयोध्या) में थी। आर्यो का उत्तर प्रदेश में प्रवेश करना तथा कुरू, कोश्शल तथा पांचाल पर अपना अधिकार स्थापित कर लेना इतिहास की सबसे पविर्तनकारी घटना है। रामायण तथा महाभारत जैसे हिन्दू ग्रन्थों में इस क्षेत्रा का वर्णन प्रमुखता से किया गया है। माना गया है कि इस क्षेत्राके लोग शास्त्रार्थ तथा ब्राहमणी कर्मकांड में निपुण थे तथा न केवल पूजा वरन् बलि जैसी कार्यवाहियों के निष्पादन में भी मर्मज्ञ थे। आर्यो के काल में बलि जैसी नृशंस परपंरा क्यों थी, क्या वे क्रूरता व हत्याओं की शास्त्राीयता को ईश्वर प्राप्ति का साधन मानते थे? या बलि का अर्थ कुछ दूसरा था। इतिहासकारों का मानना है पांचाल के राजा ‘जैवालि’ के बाद इतिहास की गतिशीलता पर वैदिक उपनिषदिक तथा पौराणिक ग्रन्थों का मायालोक कुछ इस तरह हावी हुआ कि इतिहास की गतिशीलता ही बाधित हो गई। छठवीं शताब्दी ई.पू. के आस-पास से इतिहास की गतिशीलता प्रकाश में आती है। वह काल बुद्ध, महावीर, मक्खलिपुत,गोशाल जैसे आधुनिक विचारकों का काल भी था जो वैचारिक व शास्त्राीय विमर्शो पर करारा प्रहार करते हुए सवाल उठा रहे थे कि क्या वेद, पुराण व उपनिषद बहस के विषय नहीं हैं? ये सारे के सारे ब्राहमण, क्षत्रिय ग्रन्थ जब समता, भाईचारा स्थापित नहीं कर सकते, ईश्वरीय प्रपंच के नाम पर मानवीयता व सामाजिकता का दोहन व शोषण करते हैं, ऐसा नहीं चलेगा। इस प्रकार से छठवीं शताब्दी ई.पू. सामाजिक सिद्धान्तों (ैवबपंस ज्ीमवतल) के साथ-साथ इतिहास को भी एक नई दिशा देता है। यदि ऐसा न होता तो मौर्य काल के अशोक व उनके पोते दशरथ व संप्रति तक बौद्ध धर्म का बोल-बाला न होता। छठवीं शताब्दी के ई.पूर्व तथा आर्यो के आगमन के बाद का काल इतिहास व समाज के विकासक्रम का संक्रमण काल रहा है। संक्रमण इस सन्दर्भ में कि सारा कुछ वैदिक व पौराणिक हो चुका था इस प्रकार से वह काल एक धारा की जड़ता का भी वह काल था। कुछ भी अपरिवर्तनीय नहीं है कुछ ऐसा ही। ऐसा नहीं है कि तत्कालीन समाज ने यूं ही अपने समाज को अपरिवर्तनीय मान लिया था। दरअसल जब कोई भी धार्मिक-व्यवस्था राजनीति, अर्थ, समाज-विज्ञान, भविष्यवाणियां, योजना, विकास, शिक्षा, कृषि-विज्ञान जैसे सभी क्षेत्रों का शास्त्रा विकसित कर लेती है तब समाज के सामने क्या शेष रहता है कि वह उस व्यवस्था के विपरीतगामी अर्थों को पकड़े। वह काल ब्राहमण धर्म के धार्मिक दमन के परिणामों का भी काल था। हिन्दू तत्ववादियों के लिए यह खुशी की बात हो सकती है कि ब्राहमण-धर्म ने किसी युग में मानवीय ज्ञान के सारे क्षेत्रों को अपने अधीन कर लिया था किसी को अपने विपक्ष में उठने, बोलने का अवसर ही नहीं दिया था। खगोलशास्त्रा से लेकर जीवशास्त्रा, शिक्षाशास्त्रा, शैन्यशास्त्रा, अर्थनीति, भू-गर्भशास्त्रा यहां तक कि चिकित्सा शास्त्रा को भी धर्म के आवरण में कैद कर लिया गया था। चिकित्सा शास्त्रा के क्षेत्रा में धन्वतरि, अर्थशास्त्रा के क्षेत्रा में कुबेर, लोक-कल्याण के क्षेत्रा में शिव, मानव सृष्टि के क्षेत्रा में ब्रह्मा, ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रा में सरस्वती, मौसम पर्यावरण, शान्ति व्यवस्था के क्षेत्रा में ईन्द्र जैसे पौराणिक व वैदिक देवों का भी सृजन कर लिया था। जाहिर है ऐसे में इतिहास की गतिशीलता जानने समझने के लिए जिस व्यास या वाल्मिकी की आवश्यकता थी वे पहले ही हो चुके थे बाद में यह कार्य बुद्ध व महावीर ही करते हैं। इसलिए छठवीं शताब्दी ई.पू. के बाद से ही इतिहास की द्वन्दात्मकता का हमें संज्ञान हो पाता है। उसके पहले तो हम किसिम किसिम के देवी-देवताओं के अधीन थे। कुल मिलाकर पुरावैदिक-काल में उत्तर प्रदेश तक का कोई उल्लेख नहीं मिलता। गंगा और यमुना जैसी पवित्रा नदियां भी आर्य देश की सीमा से बाहर जान पड़ती हैं। हां उत्तर-वैदिक काल में सप्त-सिन्धु के बाद गंगा का उल्लेख मिलता है। इतिहास की गतिशीलता पांचाल के ‘जैवालि’ तथा काशी के ‘अजातशत्राु’ से प्रारंभ होती है। उपनिषद काल के ऋषि भारद्वाज, याज्ञवल्क्य, वशिष्ठ के आश्रमों का उल्लेख यहां मिलता है। उत्तर-वैदिक काल में भी पूरा उत्तर प्रदेश वैदिक परंपराओं के प्रभाव में ही था। रामायण व महाभारत काल में भी यह क्षेत्रा वैदिक परंपराओं के समर्थन में खड़ा था। माना यह जाता है कि रामायण की कथा कोशल राज के ‘इक्ष्वाकु वंश’ से संबद्ध थी तथा महाभारत की कथा हस्तिनापुर के ‘कुरू’वंश’ से। वाल्मीकि का ब्रहमावर्त आश्रम भी कानपुर के बिठुर जिले में स्थित था। महाभारत की कथा जिसे सूत जी कहते हैं जिसे उन्होंने व्यास जी से सुना था, वह स्थान भी उत्तर प्रदेश के सीतापुर के नीमसार मिसरिख में है। स्पष्ट है कि वैदिक-काल से लेकर रामायण काल तक सोनभद्र का पूरा परिक्षेत्रा भी, काशी राज के साथ-साथ हमेशा उल्लेखनीय रहा है। पाणिनी ने बोली व भाषा के आधार पर आर्यो व अनार्यो के पहचान का जो तर्क गढ़ा था वह कम से कम सोनभद्र में तो प्रमाणित नहीं होता। सोनभद्र का रिश्ता प्रारम्भ से ही काशी से व काशी के अजातशस्त्राु से तो रहा ही है। बाद में मगध फिर पाटलिपुत्रा से। सोनभद्र की बोली तथा बनारस की बोली में स्वर भिन्नता है तो इसका अर्थ यह नहीं कि सोनभद्र में वैदिक सभ्यता का प्रवेश नहीं था। यहां की जनजातियां इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि वे आर्यों तथा सभ्य संस्कृतियों के लोगों द्वारा इतिहास के विकास क्रम में विस्थापित किये गये हैं। यह रहस्यमय नहीं है कि छठवीं शताब्दी ई.पू. का काल विभिन्न राजवंशों के अर्न्तविरोधों व झगड़ों का काल रहा है। तत्कालीन राज-घरानों का स्वरूप महाजनपदों का था। पुस्तकों में मुख्यतया निम्नलिखित महाजन पदों के उल्लेख मिलते हैं। (1) कुरू(मेरठ,दिल्ली,थानेश्वर) राजधानी दिल्ली के पास इन्द्रपाल (2) पांचाल (बरेली,बदायंू,फर्रूखाबाद) राजधानी अहिक्षेत्रा(बरेली के आसपास) (3)शूरसेन (मथुरा का क्षेत्रा) राजधानी मथुरा (4) वत्स (इलाहाबाद और आसपास) राजधानी कौशाम्बी (इलाहाबाद के पास) (5) कोशल (अवध) राजधानी साकेत (अयोध्या) और श्रावस्ती (गोंडा में )(6) मल्ल (देवरिया) राजधानी कुशीनगर (कसिया) और पावा (पडरौना) (7) काशी (वाराणसी) राजधानी वाराणसी (8) अंग (भागलपुर) राजधानी चम्पा (9) मगध (दक्षिण बिहार) राजधानी गिरिब्रज (राजगृह बिहार शरीफ के पास) (10) वज्जि (दरंभगा और मुजफ्फर) राजधानी मिथिला, जनकपुर (नेपाल सीमा पर) (11) चेदी (बुन्देल खण्ड) राजधानी शुतिमती बांदा के पास (12) मत्स्य (जयपुर) राजधानी विराट जयपुर के पास (13) अश्मक (गोदावरी घाटी) राजधानी पाण्डन्या (14) अवन्ति (मालदा) राजधानी उज्जयिनी (उज्जैन)(15) गांधार (पश्चिमोत्तर क्षेत्रा, पाकिस्तान में) राजधानी-तक्षशिला, रावलपिण्डी के पास (16) कम्बोज ( राजधानी राजापुर)। पूरे भारत में आर्य सोलह खानों में विभक्त थे तथा आपस में संघर्षरत थे। सत्तामोह तथा सर्वश्रेष्ठता दो ऐसे कारक थे जो उन्हें आपस में लड़ाते थे। जाहिर है आर्य-कालीन समाज कबीलाई झगड़ालू प्रवृत्तियों से वहुत अधिक भिन्न नहीं था। इस समाज में जनता का पक्ष कहीं भी उभर कर प्रकाश में नहीं आता। ‘राजा खुश तो जनता खुश’ की कथित अवधारणा का वह समाज एक निश्चित पड़ाव पर ठहर सा गया था। सामाजिक व राजनीतिक अन्तविरोधों के समापन तथा जनता में सहभागिता स्थापना के लिए लिए उस समाज में कोई स्थान नहीं था। इतिहास में ठहराव तभी आता है जब दमन व शोषण अभूतपूर्व हांे या कि पूरा समाज ही भाग्यवादी तथा आस्थावादी बनकर भविष्य की परिवर्तनकामी आकांक्षाओं से विमुख हो जाये, समय की जटिलताओं से संघर्ष करना भूल जाये-आम जन की कल्पनाशीलता, आकांक्षा, कामना, सपना पूरी तरह से छिन जाये। वैदिककाल तथा उत्तर-वैदिककाल का मानव ईश्वर के प्रपंचांे में ही अपने सुख-दुख अवनति-उन्नति विकास-विनाश प्रगति-दुर्गति, जीत-हार, हानि-लाभ, यश-अपयश जैसे विलोमार्थी भावों व इच्छाओं की सन्तुष्टि पाना श्रेयस्कर समझने लगा था। वहां कार्य तथा कारणता का कोई दर्शन नहीं था, एक तरह सेे वहां शून्यवाद था इसके अलावा कुछ भी नहीं है, कुछ भी नहीं था। जैसा अंग्रेज एफ.ई. पार्जिटर मानता है कि सोनभद्र किसी युग में करूषों के अधीन रहा होगा तथा वह युग आर्यांे के पूर्व का रहा होगा। वह करूष साम्राज्य का विस्तार सोन नदी से होता हुआ रींवा जनपद तक मानता है। वह पूरी कैमूर घाटी को उसमें शामिल करता है। वही इतिहासकार बी. सी. लाल करूषों का पहला स्थान रींवा मानते हैं तो दूसरा शाहाबाद। विन्ध्याचल परिक्षेत्रा को करूषों का क्षेत्रा भागवत पुराण व वायु पुराण भीें प्रमाणित करते हैं। पौराणिक आख्यानों में जिन करूषों के साम्राज्य का विवरण मिलता है उसका एक दल मालवा की ओर तो दूसरा दल भोजांे की तरफ गया होगा। उस समय भोज शाहाबाद, पलामू, सिंहभूमि में पूरी तरह व्यवस्थित थे। विष्णु पुराण के अनुसार करूष लोग मुख्यतया कसिस, मत्स्य, चेदी, पांचाल तथा भोजों से संबंधित रहे हांेगे। सोनभद्र में करूषों की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक उपस्थिति से कोई भी इतिहासकार इनकार नहीं करता। अंग्रेजों ने करूषों के इतिहास सामग्री संकलन में कूट बुद्धि का परिचय नहीं दिया है संभवतः इसलिए कि सोनभद्र की ऐतिहासिक परिस्थितियां उस समय भारतीय ऐतिहासिक राजनीति को प्रभावित नहीं कर सकती थीं। सोनभद्र में तथा मीरजापुर में पाई जाने वाली भर व चेरो की प्रजातियां ही शायद करूष रही हों क्यांेकि इनसे पूर्व की यहां किसी भी आदिवासी प्रजाति के निवास का प्रमाण नहीं मिलता। खरवार, धागर, भुइयां, जैसी प्रजातियां तब की जान पड़ती हैं जब जनजातियों का बड़े पैमाने पर आर्यी-करण प्रारंभ हो चुका था। यह ज्ञातत्व है कि दुनिया की सारी शासक प्रजातियां अन्य पिछड़ी पराजित या दलित जातियांे का विलीनीकरण अपने में करती रही हैं। ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्म परिवर्तन कराया जाने वाला कार्य संगठित प्रयासों के क्षेत्रा में स्पष्ट है। पौराणिक कथाओं तथा दन्त-कथाओं में मिलने वाले आख्यान भी सोनभद्र तथा मीरजापुर के चुनार, अगोरी, विजयगढ़, कन्तित के राजघरानों के विवरणों की जानकारी देते हैं। एक कथा के अनुसार चुनार का किला द्वापर युग के किसी आध्यात्मिक शक्ति का पद्चिन्ह है। उस महाशक्ति ने इस चुनार की पहाड़ी पर अपना पैर तब रखा था जब वे कन्याकुमारी से हिमालय की यात्रा पर थे। संयोग देखिए की चुनार किले का वह भाग जो गंगा नदी की तरफ है उसका रूप पैर के अग्रभाग की तरह ही दिखता है जिसका स्पर्श गंगा करती रहती हैं। किले का पिछला भाग पैर के पिछले भाग ऐड़ी की तरह दिखता है। पर इसे संयोग के स्थान पर आध्यात्मिक शक्ति का वरदान कहा जाय कुछ असंभव कथन जैसा ही है, आकृति विशेष की संरचना के कारण ही इसे ‘चरणदरी’ भी कहा जाता रहा है। एक दूसरी कथा भी इससे जुड़ी हुई है। इस कथा के अनुसार ‘भरतहरि’ जो उज्जयनी राज के राजा विक्रमादित्य के बड़े भाई थे उन्हांेने चुनार के किले को आध्यात्मिक साधना के लिए चुना था। इतिहास बताता है कि वे राजपाट छोड़कर योगी बन गए थे। वे एक दिन अचानक उज्जयनी से भाग निकले। विक्रमादित्य उनकी खोज करते हुए चुनार गढ़ तक आए। यहां भरतहरि अपनी साधना में रम गये और वापस नहीं लौटे। फिर विवश होकर विक्रमादित्य ने अपने भाई भरतहरि के लिए चुनार गढ़ में ही आवास का निर्माण कराया। इस दन्तकथा से यह आशय निकालना कठिन न होगा कि चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य, तीसरी तथा चौथी सदी के मध्य में चुनार गढ़ आए होंगे क्यांेकि उस समय ‘गुप्त साम्राज्य’ का वैभव विस्तार तेजी से हो रहा था। इसके पहले 275 ई. में कन्तित पर भारशिवों का अधिपत्य स्थापित हो चुका था। सोनभद्र की पौराणिकता को प्रमाणित करने वाली विश्वमित्रा की भी एक कथा है। कथा ब्राहमण व क्षत्रिय संघर्ष के उन संघातों का वर्णन करती है जो राजा त्रिशंकु को झेलनी पड़ी थी। मंत्रों, पूजा, सिद्धियों आदि के संघर्ष का एक अवैज्ञानिक व घृणित दास्तान इस कथा में मिलता है। यह कथा यह भी सन्देश देती है कि मंत्रांे व साधनाओं के लिए प्रयोग किया जाने वाला आदमी व प्रयोगकर्ता दोनों कैसे आकाश तथा हवा में लटक जाते हैं। त्रिशंकु राजा की कहानी विश्वमित्रा तथा वशिष्ठ की सिद्धि व साधना परंपरा की तरफ भी संकेत करती है तथा दोनों के विरोध की तरफ भी। विश्वमित्रा के निर्मित स्वर्ग में त्रिशकु जाकर फंस जाते हैं, ब्राहमण शक्तियां उन्हंे स्वर्गारोहण नहीं करने देतीं। विश्वमित्रा जैसे प्रयोगकर्ता का क्या हुआ? इस विन्दु पर कथा खश्मोश है पर त्रिशंकु को ब्राहमणी शक्तियों ने जमीन पर फेंक दिया फलस्वरूप उनके मुंह से ‘लार’ निकलने लगा जो विषैला था। संयोग देखिए कि वह लार ‘कर्मनाशा’ नदी में गिरा फलस्वरूप कर्मनाशा नदी का जल विषैला हो गया। सामान्य रूप से आज भी कर्मनाशा नदी बतौर पवित्रा नदी स्वीकार्य नहीं है। पौराणिक कथाओं में ब्राहमण-क्षत्रिय संघर्ष की कथा कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में अवश्य मिलती है। मीरजापुर गजेटियर 1974 के अनुसार-तत्कालीन प्रभावी साम्राज्यों करुष, नभागा, धृष्ठा, नरिश्यन्ता, प्रेमा तथा प्रिशाघ्रा के साम्राज्यों को प्रतिद्वन्दी साम्राज्यों पौरवों नहुषों तथा प्रजातियों द्वारा पराजित कर दिया गया। वासुसुधन्वा ने पौरवों का बहुत बड़ा साम्राज्य स्थापित किया। गजेटियर के अनुसार बृहद्रथ वासुसुधन्वा का पुत्रा था जो मगध का राजा बना यहां गजेटियर यह स्पष्ट नहीं करता कि वासुसुधन्वा ई.पू. के किस काल में था। बनारस के इतिहास तथा उत्तर प्रदेश वार्षिकी से स्पष्ट होता है कि वृहद्रथ, अशोक की पीढ़ी का था तथा अशोक के बाद मगध का राजा बना था। यह भी मालूम होता है कि अशोक के दो पोते दशरथ व संप्रति थे। यह भी स्पष्ट है कि वृहद्रथ की हत्या उसके सेनापति पुष्यमित्रा द्वारा की गई जो इतिहास की चौकाऊँ घटना है फिर तो न केवल राज-परंपरा के इतिहास का विलोपन हुआ वरन् बौद्ध-धर्म की जो आधार-शिला थी वह भी टूटने लगी। वृहद्रथ के बाद पुष्यमित्रा ने एक नये राजवंश की स्थापना की जिसका नाम था ‘शुंग वंश’। हालांकि यह ‘शुंग-वंश’ भी बहुत समय तक ऐतिहासिक हस्तक्षेप न कायम कर सका। राज परंपराओं की आपसी संघातिक प्रक्रियाओं में शुंग वंश के अन्तिम शासक की हत्या उसके अपने ही मंत्राी वासुदेव द्वारा ई.पू. 73 में कर दी जाती है। शंुग शासन काल में ही वासुमित्रा के समय यवन डिमिट्रियस का मगध पर हमला होता है जिसे वासुदेव विफल कर देता है लेकिन वे भागे नहीं लौटकर सियाल कोट चले गए। मथुरा बहुत समय तक ‘मैनेन्डर’ का प्रमुख नगर भी बना रहा गया। अतीत को पीछे से देखने पर हमें ज्ञात होता है कि सोनभद्र तथा मीरजापुर, काशी, कोशल के प्रभाव क्षेत्रा में सदैव से रहा है। सूक्ष्मता से विवेचन करें तो सोनभद्र का अतीत लगभग आठवीं सदी तक खामोशी का रहा है क्योंकि यहां किसी भी प्रमुख राजघराने की चर्चा उन कालों में नहीं मिलती अलबत्ता कन्तित का जिक्र आता है जिसे भारशिवों ने जीता तथा वहां निर्बाध शासन किया। शुंग वंश को समाप्त करने वाले वासुदेव ने ई.पू. 73 में ‘कण्व वंश’ की स्थापना की। ‘कण्व वंश’ लगभग 48 साल तक चला था वाद में ‘आंध्र वंश’ के संस्थापक सात वाहन के सिमुक ने ई.पू. 28 में कण्व वंश का सफाया कर दिया। वृहद्रश्थ को महाभारत के जरासन्ध से जोड़कर गजेटियर स्थापित करता है कि करूषों का मगध में विलोपीकरण ई.पू. 400 में हुआ होगा। यह बहुत ही भ्रामक तथा मनगढ़न्त जान पड़ता है क्यांेकि वृहद्रथ जिसकी राजधानी गिरिव्रजा थी उसकी हत्या पुष्यमित्रा द्वारा 194 ई.पू. में कर दी जाती है। इस प्रकार यदि वृहद्रथ अशोक के बाद का था तो वह कोई दूसरा अधिपति रहा होगा जो हो सकता है अशोक के पूर्व का रहा हो। क्यांेकि यह स्पष्ट है कि अजातशत्राु व शिशुनाग का काल 410-392 ई.पू. का है, हो सकता है गजेटियर में वर्णित वृहद्रथ कोई दूसरा हो। सोनभद्र का रिश्ता मगध से रहा था यह निर्विवाद है। चुनार में अशोक के शिला-स्तूपों की कार्यशाला थी यह मान्य है तथा इतिहासकार इस तथ्य से भी सहमत भी हैं कि अशोक के शैल-स्तंभ खासतौर से वहां अवश्य ही पाए जाते हैं जहां अशोक के साम्राज्य का अन्त होता था। रूपनाथ तथा सासाराम में पाये जाने वाले शिला-लेखों के बारे में गजेटियर बताता है कि सोनभद्र में अटावियों की भी शासन व्यवस्था थी। महाराज समक्षोवा के एक ताम्र-पत्रा से ज्ञात होता है कि यह पूरा क्षेत्रा कभी समुन्द्रगुप्त (तीसरी चौथी सदी) के आधिपत्य में भी रहा था। समुन्द्रगुप्त की चर्चा गजेटियर प्रमुखता से करता है कि समुन्द्रगुप्त ने 18 वन राज्यों का मिलाकर एक नये शक्ति केन्द्र की स्थापना की थी। इस शक्ति केन्द्र का नाम ‘जंगल राज’ दिया गया था। इसके पूर्व शक, पार्थियनों द्वारा इस क्षेत्रा को अधिशासित करने के लिए लगातार हमले किए जाते रहे थे। दूसरी तरफ ई.पू. कुषाड़ भी इस क्षेत्रा को अपने प्रभुत्व में करने के लिए प्रयासरत रहे थे। कनिष्ठ प्रथम का राज्यभिषेक 78 ई. में हुआ था तथा कुषाड़ों का शासन काल 120-144 ई. के बीच या 144 ई0 के बीच तक या 144 ई0 तक चलता रहा था। कुषाड़ों की राजधानी पुरुषपुर (पेशावर) तथा मथुरा में थी जिससे स्पष्ट होता है कि कुषाड़ों ने ही मैनेण्डर को पराजित किया था तथा मथुरा को राजधानी बनाया था। कुषाड़ों के साम्राज्य के भीतर काश्मीर गान्धार तथा गंगा नदी का मैदानी भाग था। इससे साफ हो जाता है कि काशी व कोशल दोनों ही कनिष्ठ के अधीन रहे होंगे। तीसरी सदी में उत्तर भारत पर राज्य करने वाला सबसे सशक्त राजवंश ‘नागवंश’ था जिसकी राजधानी मथुरा व कान्तिपुरी में थी। कान्तिपुरी को गजेटियर प्रमाणित करता है कि कन्तितपुरी ही कान्तिपुरी था। राजा ‘नव’ का अभ्युदय 275 ई. में होता है फिर इतिहास की धारा अचानक गुप्त साम्राज्य की तरफ बढ़ जाती है। चन्द्रगुप्त प्रथम (305-325) तथा समुन्द्रगुप्त, समुन्द्रगुप्त से लेकर स्कन्दगुप्त (455-467ई0) तक गुप्त साम्राज्य का शासन काल चलता रहा था। स्कन्दगुप्त को हूणों पर विजयश्री हासिल करने का भी श्रेय मिलता है। गुप्त साम्राज्य काल मंे शैव-धर्म अपने प्रतिद्वन्दी धर्म यक्ष-धर्म पर अधिकारिक विजय भी पाता है। लगभग पांचवी शताब्दी तक मालूम होता है कि मीरजापुर के कन्तित के साथ-साथ सोनभद्र भी कभी मौर्योंे कभी शकों कभी नागवंशियों तो कभी गुप्तों के साम्राज्यों में पेन्डुलम की तरह लगातार हिलता-डुलता रहा। किसी भी तरह का राजनीतिक, प्रशासनिक स्थायित्व यहां नहीं दिखता वैसे भी वह सत्ता-प्रबंधन के अस्थिरता का ही काल था। यह ऐतिहासिक सच्चाई है कि गुप्त साम्राज्य के प्रार्दुभाव (400 ई. से 600 ई) के बाद हर तरफ राजनीतिक एकता बनी हुई थी। पूरा उत्तर प्रदेश शानदार तरीके से समृद्धिशाली हो रहा था। गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद सत्ता विकेन्द्रित हो गई। कुछ समय तक कन्नौज पर कन्नौज के मौखरियों की ही सत्ता रही है। साथ ही साथ सत्ता बचाये रखने के लिए उस समय उन्हें मालवा के गुप्त राजाओं से कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा था। इस वंश का अन्तिम शासक ग्रहवर्मन (606) में मालवा के राजा देवगुप्त द्वारा पराजित हुआ था तथा मारा गया था। ध्यान देने की बात है कि गजेटियर मीरजापुर करुष राजा शशांक की चर्चा करता है कि ग्रहवर्मन शशांक के द्वारा ही मारा गया था। गजेटियर हर्ष चरित का संदर्भ लेता हैै। इतिहास की गतिशीलता इतिहास के पात्रों, महापात्रों के अगल-बगल लम्बे काल तक नहीं ठहरती। समय के तत्कालीन अन्तर्विरोध सदैव सक्रिय व संघर्षरत रहा करते हैं। ग्रहवर्मन के बाद कन्नौज ग्रहवर्मन के भाई हर्ष के अधीन आ गया (606-648ई) हर्श्ष के ही समय में चीनी यात्राी व्हेनसांग कन्नौज आया था। हर्ष कन्नौज के राज्याभिषेक के पूर्व थानेश्वर के अधिपति थे फलस्वरूप कन्नौज तथा थानेश्वर के राजवंश आपस में विलीन हो गए। कन्नौज इस प्रकार से उत्तर भारत का प्रमुख नगर बन गया। कई सदियों तक कन्नौज का वही स्थान था जो कभी पाटलिपुत्रा का था। कन्नौज पर काबिज होने की हिन्दू राजाओं की नियतियों का होना अस्वाभाविक नहीं था। किसी को भी जीत लेना किसी पर भी हमला कर देना यह ऐतिहासिक युद्ध-गत संस्कृति कीअनिवार्यता थी। बहुत स्वाभाविक रूप से हिन्दू ब्राहमण राजाओं की सत्ता बदल नीति के चलने के साथ-साथ उत्तर भारत अस्थिर हो गया जिसका ऐतिहासिक रूप से विवरण देना मुश्किल था, इसीलिए इतिहासकारों ने कन्नौज के पराभव के बाद का कोई खास विवरण नहीं दिया है। यही हाल हर्ष के बाद भी था तथा उत्तर भारत फिर अनिश्चतता में डूब गया। कन्नौज, मालवा, काशी, व कोशल वगैरह के राज्य ऐसा नहीं था कि पूरी तरह समाप्त हो गए थे। क्योंकि आठवीं सदी में यशोवर्मन का अभ्युदय इस तथ्य को स्पष्ट रूप से प्रमाणित करता है। कन्नौज के पतन के बाद यशोवर्मन का फिर से कन्नौज को स्थापित करना तथा उसे वैभवशाली बना देना यह इतिहास की उस मान्यताओं की कटु आलोचना करता है जिसके आधार पर कहा जाता है कि राज्य सत्ताएं या साम्राज्यवादी ताकतें जब एक बार पतनशीलता की शिकार हो जाती हैं फिर उनका स्थापित होना असंभव होता है। यही इतिहास की सांस्कृतिक दृष्टि आलोचना की पात्रा हो जाती है क्योंकि इतिहास में साम्राज्यवादी ताकतें भले ही पराजित हो जायें पर वे कहीं न कहीं सक्रिय रहती ही हैं तथा जन-आन्दोलनों के माध्यम से अपने वैभव को प्राप्त करने की योजनायें बनाती रहती हैं। इस सच्चाई को समझने के लिए यह जरूरी होगा कि हम यह समझें कि साम्राज्यवादी ताकतों का सफाया जब तक प्रशिक्षित जनता-समूहों द्वारा नहीं किया जाता तब तक उस जीत-हार का ऐतिहासिक सन्दर्भ में कोई मूल्य नहीं होता। आठवीं ंसदी तक हम पाते हैं कि राज्य-सत्ताओं के सारे संघर्ष जनता की पक्षधरता से अलग थे, गोया जनता खामोश थी, जनता समझती थी कि सत्ता परिवर्तन से जन-कल्याण का उसका लक्ष्य कभी भी पूरा नहीं हो सकता था और न हो सकता था। उस समय की सत्ता के सामने जन-कल्याण का लक्ष्य था ही नहीं। यशोवर्मन की हत्या 740ई. में काश्मीर के राजा लालितादित्य मुक्त पीड द्वारा कर दी जाती है इस प्रकार कन्नौज फिर दूसरे की पराधीनता में चला जाता है। जाहिर है ऐसे में न केवल कन्नौज वरन् मथुरा व काशी भी लालितादित्य के अधीन हो जाता है। सोनभद्र की इतिहास की गति समझने के लिए हमें सदैव यह तथ्य ध्यान में रखना होगा कि काशी, कन्तित, कोशल व मथुरा की राजनीतिक गतिविधियों से यह पूरा क्षेत्रा सदा प्रभावित होता रहा है। कन्नौज के यशोवर्मन के पराभव के बाद मध्य देश पर आधिपत्य जमाने की लालच बाहरी लोगों को कन्नौज की तरफ ले आता है। इस क्रम में हम देखतेे हैं कि बंगाल के पाल, दक्षिण के राष्ट्रकूट तथा पश्चिमी भारत के प्रतिहार (परिहार) गुर्जर मध्य देश की तरफ कूच कर देते हैं। इनमें प्रतिस्पर्धा का दौर चला तथा मध्य देश पर आधिपत्य जमाने के लिए ये आपस में संघर्ष भी कर रहे थे तथा भयंकर खून-खराबा हो रहा था। पाल, राष्ट्रकूट तथा प्रतिहारों के संघर्ष में अन्तिम सफलता प्रतिहारों को मिली तथा प्रतिहारों ने पूरे उत्तर-भारत में अपना राज्य स्थापित कर लिया। इतिहासकारों का मानना है कि प्रतिहारों का साम्राज्य किन्हीं मायनों में गुप्त वंशीय साम्राज्य से कम नहीं था। गुर्जर प्रतिहारों ने पूरी नवीं व दशवीं सदी तक उत्तर भारत पर अपना आधिपत्य कायम रखा। यह उनकी अभूतपूर्व सफलता थी। तभी अचानक लगभग इसी समय इतिहास की धारा बदलती है। महमूद गजनवी का (1018-19ई.) में हमला होता है तथा प्रतिहारों का सफाया हो जाता है। जबकि कालिंजर के चन्देल राजाओं ने महमूद गजनवी का बहादुरी के साथ मुकाबिला किया तथा कालिंजर अविजित रहा। महमूद गजनवी को खदेड़ने तथा परास्त करने का श्रेय धंग व विघाधर चन्देल राजाओं को मिलता है। सिकन्दर व मैनेण्डर के बाद महमूद गजनवी के हमले का प्रतिरोध जिस शक्ति सामर्थ्य व साहस से क्षत्रिय राजाओं ने किया था वह आज ऐतिहासिक सच्चाई है। हमें सोचना होगा कि पूरी तरह से बंटे हुए क्षत्रिय साम्राज्यों में आखिरकार वह कौन आन्तरिक शक्ति थी जो वे अपनी सुरक्षा के लिए जान देने पर तत्पर रहा करते थे तथा दूसरी तरफ एक राजा दूसरे राजा को पराजित क्यों देखना चाहता था। कही कोई वैचारिक भिन्नता थी या उस समय उन क्षेत्राीय क्षत्रापों के समक्ष पूरे भारत की तस्वीर ही न थी। गोया दिल्ली तो हर काल में उनसे बहुत दूर थी, चाहे वह वैदिक-काल का उत्तर-काल हो या पहली सदी से लेकर पूरा आदिकाल लगभग बारहवीं सदी तक। किसी भी क्षत्राप में यह चाह नहीं दिखती कि पूरा भारत अखण्ड रहे तथा एकीकृत शासन व्यवस्था की नींव रखी जाये। अशोक के कार्यकाल के अलावा सारा ऐतिहासिक परिदृश्य बिखरा-बिखरा दिखता है, अलग अलग बंटा हुआ। सातवीं आठवीं सदी के पहले का घटनाक्रमों के ऐतिहासकि विश्लेषणों से सोनभद्र पाल साम्राज्य के प्रभाव में दिखता है। पाल साम्राज्य की स्थापना हालांकि दूसरी सदी की घटना है और यह साम्राज्य बंगाल के आस-पास तक ही सिमटा हुआ था। उस काल में आज के बिहार व झारखण्ड का पूरा हिस्सा बंगाल के ही अधीन था तथा बिहार व झारखण्ड के सासाराम, रोहताश, आरा, झारखण्ड के गढ़वा, पलामू का बहुलांश मध्यदेश से जुड़ता था यानि कि सोनभद्र, चन्दौली आदि से, इसलिए यह माना जा सकता है कि पाला साम्राज्य के अधीन कभी सोनभद्र का पूर्वी व दक्षिणी भाग रहा होगा। गजेटियर बताता है कि इस साम्राज्य का संस्थापक गोपाला था। उत्तर भारत में पाला साम्राज्य का विस्तार गोपाला के पुत्रा धर्मशाला द्वारा किया गया। गजेटियर से यह भी मालूम होता है कि धर्मपाला को कुरू, यदु, अवन्ति, गान्धार, किराट, भोज, मत्स्य तथा मंडरा राजाओं द्वारा बादशाह घोषित किया गया। ज्ञातव्य है कि 1907 के पूर्व का सोनभद्र शाहाबाद (बिहार) का एक भाग था तथा भोजपुर में शामिल था। पाला गणराज्य में सोनभद्र का शामिल होना इससे भी पुष्ट होता है वैसे प्रतिहारों के भी कुछ शिलालेख गयाशरीफ में पाए गए हैं। इससे यह आशय निकाला जा सकता है कि प्रतिहार तथा पाला दोनों समानान्तर व बराबर के शक्तिशाली सत्ता समूह थे। अंग्रेजों ने अनुमान किया है कि महिपाल ने इस पाला साम्राज्य की स्थापना किया होगा जिसका कार्य-क्षेत्रा अंग (भागलपुर) कजंगला (संथाल तथा पूर्णिया) तक प्रारंभ में रहा होगा।
गजेटियर बताता है कि पाला साम्राज्य का संघर्ष चोल राजा राजेन्द्र कलचुरी से भी हुए होंगे। वैसे यह स्पष्ट है कि गांगेय देव कलचुरी की मृत्यु 1038-41 ई. के मध्य होती है तथा कर्ण कलचुरी (1047-1072 ई.) तक शासन करता है तथा अपने साम्राज्य का विस्तार वह कन्नौज ही नहीं भोजपुर तक करता है। इसका अर्थ हुआ दसवीं व ग्यारहवीं सदी का सोनभद्र कर्ण कलचुरी के अधीन रहा होगा।
ज्ञातव्य है कि प्रतिहारों के परामव के बाद का मध्यदेश अस्थिरता व अनिश्चितता के दौर से प्रभावित था। पाल वंश के रामपाला के समानान्तर ही गहदवालों (गहरवार) का वंश भी विजय अभियान पर था। मध्यदेश जो अराजकता व अशान्ति के दौर से गुजर रहा था गहरवारों के शक्ति केन्द्र बन जाने से फिर स्थिर हो जाता है। गहरवारों के अभ्युत्थान से मध्य देश फिर समृद्धि व वैभव हासिल कर लेता है। गहरवार राजाओं में दो प्रमुख राजा थे। गोविन्द चन्द्र (1104-1154 ई.) तथा जय चन्द्र (1170-1193 ई.) इतिहासकार मानते हैं कि जयचन्द्र की अदूरदर्शिता के कारण चौहान राजा पृथ्वीराज की हत्या मुहम्मद गोरी द्वारा तराई के मैदान में सन् (1192ई.) में कर दी गई। साथ ही साथ एक साल बाद छन्दवार (इटावा) में जयचन्द्र खुद भी पराजित होता है तथा मारा जाता है। जयचन्द्र की हत्या के बाद मेरठ, कोइल (अलीगढ़) असनी, कन्नौज तथा वाराणसी इस प्रकार से सारा मध्यदेश आक्रमणकारियों का शिकार हो जाता है लेकिन इस हार का प्रतिगामी प्रभाव चन्देलों पर नहीं पड़ता हालांकि उनका विस्तार रूक जाता है तथा साम्राज्य क्षेत्रा छोटा हो जाता है फिर भी दो शताब्दी से अधिक समय तक वे शासन में स्थापित थे। इस प्रकार हम देखते है कि लगभग चौदहवीं (1400ई.) तक चन्देलों का शासन काल कायम रहा जबकि जयचन्द्र के पराभव के बाद यानि (1193ई.) के बाद गहरवारों का क्या हुआ कुछ जानकारी नहीं मिलती। लगता है कि यह वही काल होगा जब गहरवार वंश के लोग विजयपुर कन्तित तथा शक्तेशगढ़ की तरफ आए हांेगे। इधर सोनभद्र का क्षेत्रा चन्देल व गहरवार राजाओं के पराभव से उस काल में अप्रभावित ही रहा होगा। गजेटियर से गहरवारों के बारे में यह प्रमाण मिलता है कि गहरवार साम्राज्य बहुत ही वीरता पूर्वक तुर्को से लड़ रहा था फलस्वरूप मध्यदेश का उत्तरी तथा दक्षिणी हिस्सा पूरी तरह से सुरक्षित बचा रह सका था। काशी की रक्षा का श्रेय गहरवार राजा चन्द्रदेव को मिलता है फलस्वरूप कन्नौज तथा कोशल भी सुरक्षित बचा रह सका था। गहरवारों के पूर्व ही कलचुरियों का बनारस, भोज, रोहतास आदि पर आधिपत्य था यह सिद्ध हो जाता है। वाद का काल गहरवारों के अधीन था। सारनाथ में पाया गया शिलालेख बताता है कि गोविन्ददेव का ही हरिनाम नाम था तथा शिलालेख वाले गोविन्द देव वही थे जिनके प्रभाव से तुर्क काशी, कोशल तथा कन्नौज तक नहीं पहुंच पाए। सासाराम में भी एक ऐसा शिलालेख बतौर प्रमाण पाया गया है कि प्रताप धवल खैरवाहा साम्राज्य के संस्थापक थे। बारहवीं सदी के आस-पास का सोनभद्र निश्चित रूप से खैरवाहा साम्राज्य के अधीन हो गया होगा। शिलालेख बताता है कि इस साम्राज्य का आधिपत्य लगभग ग्यारह वर्ष तक ही कायम रह सका था। इतिहासकार ‘रिकार्डाे’ का मानना है कि प्रताप धवल को महानायक नहीं माना गया था यह अलग बात है कि वह जमीन का देवता माना जाता था तथा पूजित था। प्रताप धवल के बारे में उल्लेख मिलता है वह निरन्तर बहारियों से लड़ता रहा था। गजेटियर साबित करता है कि घोर के सुल्तान द्वारा कोयल (अलीगढ़) हिशामुद्दीन अद्युक्त बल्क के जिम्मे लगाया गया था, यह वही हिशामुद्दीन बल्क था जिसका अभ्युदय इस क्षेत्रा में इतिहास की धारा बना जाता है और इसी हिशामुद्दीन ने मीरजापुर के भुइली व भागवत परगनों को मल्लिक इख्तियारउद्दीन इविन वख्तियार खिलजी को ग्रान्ट के रूप में दिया था। इस ग्रान्ट का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य बहुत ही दूरगामी था। तुर्को के गंगाघाटी में प्रसार के बाद उनके लिए आवश्यक लक्ष्य था चुनार का किला फतह करना तथा यहां से मगध को शिकस्त देना। तुर्को का प्रवेश हालांकि मध्यदेश में प्रारम्भ हो गया था फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि हिन्दू राजाओं के अस्तित्व मिट चुके थे। कुछ इतिहासकार जयचन्द्र के पराभव के बाद से ही मुस्लिमों का विस्तार मानते हैं पर ऐसा सच नहीं माना जा सकता। मछलीशहर में एक कापर प्लेट मिला है जो बताता है कि जयचन्द्र के लड़के हरिश्चन्द्र के कहने पर महाराज जयचन्द्र ने एक ब्राहमण को जमीन का ग्रान्ट दिया था। राजा हश्चिन्द्र उस समय स्वतंत्रा थे जबकि जयचन्द्र का 1194 में निधन हो चुका था। कापर प्लेट पर 12-53-57 की तिथि भी अंकित है। निष्कर्ष के रूप में सोनभद्र अपने आदिकाल में अपने आधिपत्य के लिए परेशान था। साफ तौर पर कहा जा सकता है कि सोनभद्र के भाग्य में कभी काशी, कोशल, मगध रहे थे तो कभी मौर्य, कुषाण, शुंभ, कण्व, गुप्त, गहरवार (गहडवार) चन्देल कभी कलचुरी तथा भोज। मुगल के पहले तक का सोनभद्र भिन्न-भिन्न सत्ता केन्द्रों के हाथ की कठ-पुतली बनता रहा था। भारशिवों के काल दूसरी सदी में यह क्षेत्रा उनके प्रभाव में था फिर बाद में लम्बे अन्तराल के बाद भरों एवं कोलों के सत्ता च्युत होने के बाद सोनभद्र तथा मीरजापुर दोनांे के ऐतिहासिक परिदृश्य बदल गए। कन्तित, विजयपुर, तथा शक्तेषगढ़ से कोलों व भरों को विस्थापित कर दिया गया तथा सोनभद्र के अगोरी व विजयगढ़ से बालन्दशाह के सत्ता प्रतिष्ठान को। लगभग बारहवीं शताब्दी के आस-पास पूरे भारत की प्रमुख रिसासतों तथा सत्ता केन्द्रों के आपसी झगड़ों तथा सत्ता केन्द्रों की स्थापनाओं के लिए चल रहे महा-समर के संघातों से यह पूरा क्षेत्रा तब स्वतंत्रा रूप से सांसे ले रहा था। सोनभद्र के इतिहास कालों को व्यवस्थित ढंग से समझने के लिए अनिवार्य होगा कि हम ऋगवेद काल 2000 से 1000 ई.पू. तक के काल को ध्यान में रखें। यह पूरा वैदिक-काल असमान वन-आर्य प्रजातियों के आगमन का काल था जो भारत के उत्तर पश्चिमी भाग से मध्यदेश में प्रवेश किए। यह काल वहीं था जब पुरातन वन आर्य-प्रजातियॉ यहां की शान्ति-प्रिय गण-राज्य, गण-ग्राम व्यवस्था वाली जनजातियों, प्रजातियों से हिसंक तथा आक्रामक लड़ाई लड़ रहीं थीं। बज्र-धारण किए हुए बज्राघात के वैज्ञानिक इन्द्र का आह्वान एक महत्वपूर्ण वैदिक संघटना है। आर्यो ने अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए उनका आह्वान किया था। इन्द्र आर्योे के निवेदन पर दस्युओं व सम्युओं (आदिवासी) का वध करते हैं। सरस्वती के आस-पास रहवास करने वाली एक जनजाति ‘पर्वत’ का उन्मूलन करते हैं इस प्रकार सिन्धु का परिक्षेत्रा पूरी तरह आदिवासी विहीन क्षेत्रा हो जाता है। इन्द्र तथा विष्णु मिलकर ‘संबराओं’ के दुर्गाे को नष्ट कर देते हैं तथा विष्णु दस्युओं का वध करते हैं। असुरों ने आर्यो के एक ऋषि ‘दमिति’ के नगर पर जब अधिकार कर लिया फिर तो इन्द्र ने असुरों का सफाया ही कर दिया। इन संघर्षों से साफ पता चलता है कि अनार्य आदिवासी जनजातियॉ आर्य-सभ्यता के साथ निरन्तर संघर्ष-शील थीं तथा उनसे दूरी बनाए रखती थीं। संयोग देखिए आज सोनभद्र तथा मीरजापुर की वन्य-जनजातियों कोल, भर, चेरों, धांगर, खरवार वगैरह के ऐतिहासिक संघर्षों का कहीं अता-पता तक नहीं है। सारा ऐतिहासिक दस्तावेज तथा साहित्य सामग्री जन-जातियों के संघर्षों के वर्णनों से विमुख हैं। यत्रा-तत्रा मात्रा इतना ही आभास मिलता है कि यहां पुरा मानव निवास करते थे जो द्रविण मूल के थे। बहुत ही दुखद है कि सोनभद्र की धरती से जुड़े धरती-पुत्रों की सामाजिकता व उनके सामाजिक संघर्षों का संदर्भ ऐतिहासिक रूप से विलुप्त कर दिया गया है। जबकि इसे संस्कृति व सामाजिकता के संविलयन के एक औजार के रूप में देखा जाना चाहिए। कमजोर हो गई या विजित तथा पराजित जनजाति समूहों का शक्तिशाली आक्रामक आर्य-समूहों में अर्न्तलयन यह एक ऐसी कार्यवाही है जो हमेशा से कमजोर जाति-समूहों को उनके सांस्कृतिक कार्यभारों से च्युत करती रही है। वाद के कालों में ईसाईकरण या इस्लामीकरण की प्रक्रिया से इस सच्चाई को बहुत ही सहजता से समझा जा सकता है कि जातियों, धर्मो का संविलयन भले ही सांस्कृतिक अनिवार्यता न रही हो पर ऐतिहासिक अनिवार्यता तो अवश्य ही रही है। सोनभद्र के अतीत के कारकों को ऐतिहासिक रूप से प्रभावित करने वाली सत्ताओं के विचलनों को हमें गंभीरता से लेना होगा कि यह पूरा क्षेत्रा अपने में कभी अधिपति के रूप में नहीं था। आर्य आए तो आर्यो का दखल हुआ, मुसलमान आए तो मुसलमानों का फिर ईसाई आए तो ईसाईयों का। बीसवीं शताब्दी के अन्त तक या इक्कीसवीं के प्रारंभ में भी हम पाते हैं कि सोनभद्र की धरती का फिल-हाल शक्तिशाली व अभिजात वर्ग बाहरी ही है जिसका सोनभद्र की न केवल जमीन पर (भू-संसाधन) वरन उघोग, शिक्षा, व्यवसाय, मीडिया, संस्कृति व साहित्य पर अधिकारिक ढंग का हस्तक्षेप है। इतिहास लेखन की परंपरा पर हम विचार करें तो हमें यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि शाषितों व शोषितों की दृष्टि तथा सामाजिक विवेचना की दृष्टि से कभी भी इतिहास का लेखन नहीं किया गया। जो कुछ भी लेखन के क्षेत्रा में किया गया उसका रूप धार्मिक साहित्य के रूप में ही हमारे यहां अतीत को समझने के लिए उपलब्ध है। इसके अलावा पहले के समय को विश्लेषित व व्याख्यायित करने वाला लेखन उपलब्ध नहीं है, हॉ बाद के समय में यानि अठारहवीं शताब्दी के बाद अतीत के बारे में बहुत कुछ लिखा गया। बिजयगढ़ राज तथा रियासत का सन्दर्भ लेकर देवकीनन्दन खत्राी जी ने एक औपन्यासिक कथा चन्द्रकान्ता सन्तति अवश्य ही लिखा है जो केवल कल्पना है कहीं भी उसमें बिजयगढ़ राज का अतीत या वर्तमान नहीं है। मजा यह कि सोनभद्र के बाहर के लोग बिजयगढ़ राज को राजकुमारी चन्द्रकान्ता के नाम से ही जानते हैं जो सर्वथा गलत है। हॉ कमलेश्वर जी ने चन्द्रकान्ता सन्तति के पटकथा लेखन में अवश्य ही कमाल कर दिया है जिससे वह टी.वी. सीरियल चल निकला और पूरे देश की युवा चेतना पर हावी हो गया।