हिंदी कथा साहित्य/कथा का समाजशास्त्र और तीसरी दुनिया
कथा का समाजशास्त्र और तीसरी दुनिया
रामनाथ शिवेंद्र

साहित्य और समाज के रिश्तों पर सवाल उठाना न तो पहले जायज था और न आज ही है पर अब सवाल उठाना जायज हो गया है, क्योंकि आज का समाज पहले वाला समाज नहीं है। आज के समाज का जो ताना,बाना है, इसे संचालित करने, निर्देशित करने की व्यवस्था है, उस व्यवस्था को कुदरती प्रबंधन से जबरिया छीन कर एक ऐसे मानवकृत प्र्रबंधन में डाल दिया गया है जिसे सामान्य रूप से राजनीतिक प्रबंधन कहा जाता है। अब समाज राजनीतिक प्रबंधन में है। यही राजनीति, समाज को चालित संचालित, निर्देशित भी कर रही है। मनुष्यों के लिए किसिम किसिम की मनमानी नीतियों को लागू करते हुए सर्वकल्याण की धोखेपूर्ण बातें भी कर रही है। फिर तो उस राजनीति को समझने के लिए हमें उस ग्रामगणराज्य समाजप्रबंधन को समझना होगा जो भारत के लिए अब अतीत का विषय हो चुका है। हमें ध्यान रखना होगा कि हमारा अतीत लोककथाओं, लोककलाओं, लोकविद्या तथा लोकसंस्कृति वाला था और उस समय का लोकसाहित्य, लोकसंगीत, समाज के सहसंबधों का दस्तावेज हुआ करता था यानि तब सहभागी समाज व्यवस्था पर किसी मानव रचित व गढ़ित राजनीति का प्रभाव नहीं था। कुल मिला कर उस दौर में मानव संसाधनों व कुदरती संसाधनों के दोहन के लिए तकनीकी कौशलों से युक्त संस्थान नहीं हुआ करते थे। सारे कुदरती संसाधन, नदी, पहाड़, जंगल, हवा, पानी सारा कुछ समाज के आधिपत्य में हुआ करता था पर अब वैसा समय नहीं रह गया है। आज तो सारे कुदरती संसाधनों पर किसी न किसी निजी कंपनी या कंपनियों को राज्याश्रित कानूनों द्वारा संरक्षित मालिकाना दे दिया गया है। मानवसभ्यता का द्वन्द यही है कि कुदरती संसाधनों पर मालिकाना किसका रहे।? मालिकाना के संस्थापन को कथित विकास के नाम पर आज के समय में कुदरती (मिथक की तरह) बना दिया गया है, जैसे विकास तथा मालिकाना दोनों एक दूसरे के अन्योन्याश्रित ही नहीं पर्याय भी हों। तो ऐसे कठिन समय में जब खुलेआम कुदरती संसाधनों पर निजी मालिकाना स्थापित कराये जा रहे हों, तकनीकी कौशलों को कुदरती संसाधनों के अधिकतम दोहन के लिए जरूरी बताया जा रहा हो, सार्वजनिक रूप से मानवजनित कौशलों व क्षमताओं को नकारा जा रहा हो फिर तो साहित्य के लिए अनिवार्य रूप से अनिवार्य है कि वह समाज को व्याख्यायित करने के लिए राजनीति की खोल में दुबकी सत्ताव्यवस्था की सारी पर्तों को खोले और राजनीतिक प्रबंधन में उगने वाली समाज की विडंबनापूर्ण स्थितियों, परिस्थितियों का खुलासा करे। क्योंकि आज के समय में चाहे मालिकाना स्थापित करने के सवाल हों या मालिकाना से बेदखल करते हुए सामान्य जन को उजाड़ने के सवाल हों, देशी विदेशी कंपनियों को कानूनी बना कर कुदरती संसाधनों के दोहन करने के अधिकार देने के सवाल हों, ये सब सत्ता के ही क्रीड़ा कौतुक हैं। तो यह जो सत्ता है, आज वही समाज को चालित संचालित कर रही है और समाज उसके प्रबंधन में रहने के लिए अभिशप्त हो चुका है। साहित्य के प्रति समर्पण के नाते हमें ऐसा करना भी चाहिए, आज के कठिन समय में हमारे साहित्य का समाजशास्त्र बदल चुका है, चाहे सवाल कथा का हो या कविता का, इतना ही नहीं आलोचना का समाजशास्त्र भी बदल चुका है। साहित्य के बदले हुए समाजशास्त्र के बारे में हम यहां बात करना चाहेंगे तथा उन जटिल परिस्थितियों की तरफ संकेत भी जो हमारे देश के साहित्य के लिए अनिवार्य रूप से अनिवार्य हैं। जाहिर है कि तकनीक की बारीक पर्तों, दर पर्तों को खोल लेने के दावे करने वाली आज की दुनिया, वसुधैव कुटुम्बकम् तो बहुत दूर चित्त और चेतना, विचार और व्यवहार, लक्ष्य और साधन, प्रकृति और पुरुष, तन और मन, समय और समाज आदि संदर्भों में मानवीय समीपता की पक्षधर तो कम से कम नहीं दीख रही है, और न ही मानवीय आदर्शों के प्रति दिखावटी ही सही आग्रही ही दीख रही है। आज की दुनिया संसाधनों व सुविधाओं की गुलामी में उलझी हुई अपनी वैयक्तिक संप्रभुता के कुत्सित फैलावों में जुटी हुई मानवीय समीपता के सर्वग्राही कुदरती नियमों को प्रतिस्पर्धाओं के बहाने निरंतर ठेंगा दिखा रही है। ‘एकला चलो’ वाली हमारी दार्शनिक संस्कृति अचानक ‘मैं’ के रूप में बदल जाएगी इसका आभास दूर दूर तक नहीं था। ‘मैं’ केवल ‘मैं’, मेरा काम, मेरा लाभ, मेरा हित ऐसा किसी भी मानव सभ्यता के अतीत में प्रस्तावित नहीं था, जो था, जो है सारा कुछ सभी का है सभी के लिए है, इसी बुनियाद पर समाज की नींव डाली गई थी, फिर कुटुम्ब बना था, कुटुम्बों के संगठन वाली सहयोगी व सहभागी संरचना से दुनिया की तस्वीर बनी थी, पर हाय रे दुनिया! आज वह दुनिया नहीं है। आज की दुनिया ‘मैं’ के घृणित आभामंडल में खुद को चॉद सितारा बना लेने के प्रयासों में सर्वसमाज की पीठ पर भाई चारे के पाठों के पोस्टर चिपका रही है। आज की दुनिया कम से कम दो खानों में तो निश्चितरूप से विभक्त है पहला खाना है एक ऐसी दुनिया का जिसमें मानव संसाधनों के समुचित व बराबरी के स्तर पर उपयोगों के बारे में सत्ता प्रबंधन की तरफ से निराशाजनक उदासीनता है तथा उपेक्षा है, तो दूसरा खाना है एक ऐसी दुनिया का जो अपने से इतर दुनिया के सारे मानव समाजों को तकनीकी संहारक कौशलों के द्वारा भयभीत कर अपने आधिपत्य को पोख्ता बनाए रखने के प्रयासों में सारे तकनीकी कौशलों को आजमा रही है। गोया आज की दुनिया का माहौल पहले वाला सर्वहितकारी, सहयोगी व सहभागितापूर्ण नहीं है जिसे वसुधैव कुटुुम्बकम्् के रूप में हम जानते हैं। आज हमारे सामने एक ऐसी कथित विकसित दुनिया है जो किसिम, किसिम के जनसंहारक हथियारों से लैश होकर अपनी संहारक क्षमताओं के प्रदर्शनों के उत्सवों को चॉद पर मनाने के लिए बेचैन है तथा इसे प्रमाणित करने के लिए हमारे जैसे देशों (तीसरी दुनिया के देशों) का चयन किया करती है तथा कर रही है। जाहिर है उसे ऐसे ही देश या भूगोल अनिवार्य रूप से चाहिए होते हैं जो अपने प्राकृतिक संसाधनों का ही नहीं, अपने मानव संसाधनों का भी समुचित प्रयोग तो दूर आंशिक प्रयोग भी अपनी जनता के हितों के लिए नहीं कर पाते हैं या कर पा रहे हैं। हमारा आशय तीसरी दुनिया के देशों से है खासतौर से उन देशों से जहां आज भी भूख और कर्ज से दबे किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं, बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं, वे पढ़ाई करने के बजाय अपने मां बाप के कामों में सहायता करने के लिए विवश हैं। एक ऐसा हताश देश जहां मतदान करने की अनिवार्यता के बारे में लोगों को सिखाने पढ़ाने की आवश्यकता पड़ रही हो, जहां आजादी के सातवंे दशक में भोजन का अधिकार, सूचना का अधिकार व शिक्षा का अधिकार दिखावटी तौर पर विधिक बनाया जा रहा हो। एक ऐसा देश जहां आज भी शिक्षा का स्तर केवल साक्षर होना हो और जीवन निर्वाह के लिए पेट की आग में झुलसती जनता को घृणित मात्रा में सरकारी संस्थानों द्वारा खाद्यान्न वितरण योजनांए चलाई जा रही हों। जहां चालीस फीसदी घरों में आज भी दो जून का खाना नहीं पक रहा हो। जाहिर है, एक ऐसा देश जहां मानव संसाधन के उपयोग को पूरी तरह से नकारा जा रहा हो तथा विकास के एकांगी लक्ष्यों को मशीनी कुशलता से पूरा करने के प्रयास किए जा रहे हों। परोक्ष रूपसे मानव संसाधन को बेरोजगार बना कर उनकी कार्य क्षमताओं को विकलांग बनाया जा रहा हो। कुल मिला कर ऐसे देश की तस्वीर पर आप चाहें भी तो कोई रंग नहीं लगा सकते, वसंती वाला, फागुन वाला या कजरी वाला कोई भी। ऐसी कुत्सित सामाजिकता पर रंग लगाने के लिए किसी खास तथा प्रिय रंग का चुनाव आप नहीं कर पायेंगे। जाहिर है हम ऐसे ही भूगोल तथा देश के लोग हैं जहां मौसम के हसीन करतबों के सहारे ही खुद को जीवित बचाए रखना है और अपने अतीत को पीठ पर बांधे हुए शौर्य तथा वलिदान के गीतों को गाते रहना है। शायद हम ऐसा कर भी रहे हैं। हम एक ऐसे देश के लोग हैं जहां एक पहाड़ी की कीमत हजारों लाखों मनुष्यों से कहीं अधिक है, नदी का पानी हमारे ऑसुओं से कीमती है क्योंकि वह कुदरती संसाधन है, पहाड़ी के भीतर छिपा खनिज हमारे कलेजे और किडनी से कीमती है। सो हम किसी शोकगाथा की तरह हताश और निराश हैं तथा मनुष्य होने के बोझ से दबे हुए विकल्पहीन हैं, हमारे लिए जीवन जीने और जीते रहने के सुलभ विकल्पों की कोई चादर नहीं है। फिर भी मनुष्य जीवन जीने और जीते रहने के संभव समाधानों से खुद को अलगिया कर अपनी इहलीला समाप्त करने की योजना नहीं बनाता। वह जीवन जीते रहने के सपने देखता है क्योंकि वह खुद कहानी होता है। इसीलिए अपनी कहानीपना की हिफाजत में नाना प्रकार के सपने भी देखा करता है, वह सपने देखता है, समाज के बारे में तो कभी खुद के बारे में कि उसे समाज के साथ किस तरह के रिश्तों का निर्वहन करना चाहिए तथा खुद को किस तरह से संवारना व दुलारना चाहिए। ऐसा करते हुए वह अपना सारा जीवन दुखों से लड़ता हुआ, रोता, चीखता, चिल्लाता हुआ या तकलीफों में गोते लगाता हुआ या सुखों के अपने रचे गढ़े मानकों को निर्मित करता हुआ गुजार देता है। पर खुद को संभाले रखने या समय के साथ टकराने के जितने कौशलों का प्रयोग वह करता रहता है, उससे कितना आश्वस्त रहता है इसका उसके पास कोई गंभीर मूल्यांकन नहीं होता। यही है तीसरी दुनिया के मनुष्यों का सच। ऐसा मनुष्य अपनी दयनीयता, निरीहता व असमर्थता को दैवीलीला मानने से भी खुद को नहीं रोक पाता, जो किस्मत में लिखा होता है वही मिलता है या उसे भोगना ही पड़ता है। इसी सारतत्व में गोते लगाता हुआ समानता, स्वतंत्रता, बन्धुत्व के नारों में फसा तीसरी दुनिया का आदमी अपना जीवन बिताने के लिए विवश है। मनोवैज्ञानिक विश्लेषणों, निष्कर्षों तथा समाधानों को परखने के आधार पर कहा जा सकता है कि मनुष्य के चेतन तथा अचेतन मन में जाने अनजाने अंखुआने वाले सपने जो कहानी की शक्लधारी होते हैं, बिना किसी प्रयास के जड़ जमाए रहते हैं। वे सपने आभासी मात्र नहीं होते, कभी कभी सकारात्मक परिणामों व उपलब्धियों के हेतु बनते भी दिख जाते हैं सवाल है कि सपनों के रूप में ये कहानियां मनुष्य के मन में कैसे प्रवेश कर जाती है? सवाल यह भी है कि क्या उन कहानियों से मनुष्य का कोई रिश्ता बनता है जो उसे प्रभावित करती हैं। शायद इस तरह से सपनों को विश्लेषित करते हुए सामाजिक सरोकारों से जोड़ने का काम मानव सभ्यता करती रही है। आज के जटिल समय में देश तथा उससे जुड़ी राष्ट्रीयता किसी सपने की तरह नहीं जान पड़ सकती है पर कभी यही राष्ट्रीयता सपना थी, इसी सपने को हासिल करने के लिए हम अपने पुरखों के परिणामकारी प्रयासों को कŸाई नहीं भूल सकते और भूलना भी नहीं चाहिए। यही राष्ट्रीयता का सपना हमें अपने अतीत की तरफ ले जाता है जो काफी संघर्षपूर्ण व उलझन भरा रहा है। हमारे पुरखों ने राष्ट्रीयता के सपने को सच करने के लिए उस समय के खतरनाक जनसंघर्षाें को जिस तरह से गतिमान किया या संचालित किया वह दुनिया के लिए किसी उदाहरण से कम नही। यानि वह वही समय था जब मनुष्य अपने सपनों को चरितार्थ करने के लिए तत्कालीन सत्ता प्रबंधन से टकाराते हुए खुद कहानी बन रहा था। यही कहानी आने वाले समय के लिए प्रेरक बन जाएगी हमारे पुरखों को पता भी था या नहीं साफ साफ नहीं कहा जा सकता। वैसे भी आने वाले समय के लिए हमारे पुरखे जो कहानी बन रहे होते थे वे आजकल के प्रायोजित मानवों की तरह होते ही नहीं थे, वे तो अपने सपनों के लिए लड़ रहे होते थे, भला ऐसे में उन्हें क्या पता होगा कि उनकी कहानी का क्या होगा? वैसे भी आज के समय में तो सारे सपने खुद की पीठ पर टंगे हुए होते हैं। समाज की राष्ट्रीयता जैसी तस्वीर रचने व गढ़ने वाले सपने अब होते ही कहां हैं? दुखद है कि हम आज ऐसे समय में है जब हम उन्हीं सपनों में गोते लगा रहे हैं जो हमें हर समय चूमते चाटते रहें तथा विपरीत परिस्थितियों में भी आज्ञाकारी बने रहें। सपनों को भी आज्ञाकारिता व अनुशासन के दायरों से बाहर न निकलने देने वाला हमारा समय कई मायनों में हमारे लिए किसी शोकगाथा से कम नहीं होता पर हमारी अभिशप्तता उसे महसूसने ही नहीं देती। आजादी के दौर वाले सपनों की बात करें तो उस समय हमारे पुरखों के सामने खुद तथा राष्ट्र को मुक्त कराने के अनिवार्य व महत्वपूर्ण कार्यभार थे पर आज हमारे सामने किस तरह के सपने हैं, और अगर सपने हैं भी तो क्या हम उसके बारे में जानते हैं? क्या हम अपने सपनों का मूल्यांकन करते हुए सपनों के साथ गतिमान रहने की कला जानते हैं? इस बारे में हमें सोचना व गुनना होगा। तो यह है आज के समय की कथा का समाजशास्त्र। ऐसा नहीं हैं कि हम आज के वैयक्तिक कुटिल प्रतिस्पर्धा वाले समय में सपने देखने की आदतें खो चुके हैं, ऐसा कŸाई नहीं है, ऐसा गुनना अप्राकृतिक होगा, ऐसा हो ही नहीं सकता। मनुष्य है तो वह सपने देखेगा ही और हम सपने देख भी रहे हैं पर आजादी के पहले वाले सपनों और आज के समय के सपनों में बेमेल घालमेल हो गया है। किसिम किसिम के वैचारिक रसायनों ने सपनों की प्रवृŸति व प्रकृति को बदल दिया है। आधी सदी गुजर चुकी है पर हम आने वाले समय से टकराने के बाबत सावधान नहीं हैं। हमें यह भी नहीं पता कि राष्ट्र के सवाल पर, केवल राष्ट्र के भूगोल को बचा लेने का काम ही राष्ट्र को बचाना नहीं होता, ठीक है बचाना तो भूगोल को भी पड़ता है पर यह भी सच है कि राष्ट्र के नागरिकों को बचाना राष्ट्र के भूगोल को बचाने से अनिवार्य रूप से अधिक जरूरी है। पर हम अपने देश के नागरिकों को बचाने के सवाल पर कितने गंभीर हैं या उत्साहित हैं इसके प्रमाण तो बिरले ही दीखते हैं। देखा जा रहा है कि हमारे वौद्धिक कारीगर भूगोल बचाने की मार्मिक सीखों के आधार पर कभी संस्कृति बचाने की बातें करते हैं तो कभी इतिहास बचाने की, वौद्धिक कारीगरों की बातों को रट, रटा कर हमारे नेता भी दिखावे के तौर पर संस्कृति बचाने लगते हैं तो कभी इतिहास बचाने लगते हैं। पर बचाना क्या है इस सवाल से वे परेशान नहीं हालांकि वे जानते होते हैं कि भूगोल, व इतिहास बचा लेने से मनुष्यों को नहीं बचाया जा सकता, मनुष्यों को तो तभी बचाया जा सकता है जब सत्ता प्रबंधन को मानवीय समीपता के सूत्रों से रचा गढ़ा जाएगा, सामाजिक संरचना की खाईं को सामाजिक बराबरी की तरफ ले जाने के लिए आर्थिक बराबरी के परिणामकारी प्रयासों को क्रियान्वित कराया जायेगा, जबकि वैसा किया नहीं जा रहा, यही तीसरी दुनिया का संकट है। सो बार बार इतिहास व संस्कृति बचाने की बातें सŸााप्रभुओं द्वारा की जाती हैं। विडंबना है कि मनुष्य बचाने की बातें नहीं की जा रहीं जो प्रकृति की अद्भुत कृति है। अरे! भाई थोड़ी शर्म करो और यह बात साफ कर लो कि इतिहास और संस्कृति से मनुष्य नहीं पैदा होता, मनुष्य से संस्कृतियां जनमती हैं, इतिहास जनमता है, तो मनुष्य बचाने की बातें क्यों नहीं करते? मनुष्य ही जब नहीं बचेगा फिर इतिहास और संस्कृति कैसे बचेगी? आज के समय में हमारे सपनों को निश्चितरूप से मनुष्य बचाने के सवालों के आधार पर ही अपनी कथा चुनना होगा। ऐसी कथाओं का समाजशास्त्र ही सŸाा विकल्पों के बन्द दरवाजों को खोलेगा तभी मनुष्य केन्द्रित सत्ता का सर्वसमाजीरूप उभार पा सकेगा फिलवक्त तो सŸााप्रबंधन पर भाषा, भूषा, भवन, भोजन पर कुंडली मारे हुए लोगों का कब्जा है। आज की संसद में कोई गरीब पहुंच ही नहीं सकता, आंकड़े बताते हैं कि करीब तीन सौ से अधिक सांसद करोड़पति हैं। समझ में नहीं आ पाता कि इन करोड़पतियों से हमें किस सत्ता विकल्प की आशा करनी चाहिए, क्या ऐसे लोग मनुष्य केन्द्रित सŸाा विकल्पों की तरफ एक कदम भी आगे चल सकेंगे? कŸाई नहीं। ये लोग तो समाज कल्याण के नाम पर कभी केशरिया, तो कभी हरा, गुलाबी, पीला रंगरोगन ही कर सकते हैं, इससे अधिक कुछ नहीं। इसलिए इनके आधार पर सिरजी गई कथाओं को किसी न किसी दिन गहरी खांई में गिरकर छटपटाना ही होगा। सो यह जो तीसरी दुनिया की बेढंगी राजनीति से उपजा समाजशास्त्र है, वह कभी भी चेतन व जागृतकथा का समाजशास्त्र नहीं हो सकता। इतिहास और संस्कृति रूपी कामधेनु से निकलने वाले दूध में नहाने वाली सŸाा के लिए तो मनुष्य केवल शासित होने के लिए होते हैं जिनकी पीठ और पेट पर कानून की धाराएं लिखी जाती हैं सो उन्हें तथा उनकी मनुष्यता बचाने की क्या आवश्यकता? वे जाएंगे कहां, रहेंगे तो शासकों के द्वारा रचे गढ़े कानूनों व भूगोलों के दायरे में ही, यही तीसरी दुनिया का संकट है। वह जो पहले वाली दुनिया है अपने द्वारा गढ़े गये सूत्रों के आधार पर खुद को सभ्यता के शिखर पर बैठा हुआ मनवाना चाहती है। उसकी मुस्कराहट से सत्ता प्रबंधन के गुर सीखने वाले तीसरी दुनिया के नीतिकार नहीं जानते कि वे गले में फासी का फन्दा डाल रहे हैं। दिक्कत सिर्फ यही नहीं है कि हमारी राजनीति उस सत्ता प्रबंधन की नकल कर रही है, जिसकी नीतियों में मनुष्य मनुष्य होता ही नहीं, वह उपभोक्ता होता है, एक वस्तु होता है, एक बाजार होता है, तथा सŸााप्रबंधन का आज्ञाकारी उत्पाद होता है, दिक्कत यह है कि हम साहित्यिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी नकल कर रहे हैं और मनुष्यता विरोधी सत्ता प्रबंधन की प्रतिलिपि बनते जा रहे हैं। जाहिर है हम तीसरी दुनिया के लोग हैं और हमारे सामने उस कथित सभ्य दुनिया की तुलना में समय, समाज एवं साहित्य के स्तर भी दूसरे तरह की चुनौतियां व विमर्श हैं सो हमारी कवितायें व कहानियां भी अलग हैं, अतीत बचाने से किसी को रोटी नहीं मिलने वाली, साबित हो चुका है कि तकनीकी कौशलों से संवरित कारखाने हमें रोटी नहीं दे सकते, हर हाथ को काम नहीं दे सकते। ये कारखाने तो व्यक्तिगत लाभ के सूत्रों पर आधारित कुदरती संसाधनों के दोहन के महज कानूनी संस्थान हैं। केन्द्रीयकृत और तकनीकी उत्पादन व्यवस्था कभी भी कुटीर उद्योगों के लक्ष्य को नहीं हासिल कर सकती। हमारे जैसे देश में जहां आबादी का घनत्व प्रति किलोमीटर पांच सौ से अधिक मनुष्यों का है, उसके लिए विशाल तकनीकी ढांचों वाले कारखानों का कोई प्रयोजन नहीं। यहां तो हर हाथ को काम चाहिए। हम चाहें तो कारखानों के उत्पादन लक्ष्यों को कुटीर उद्योगों के द्वारा भी हासिल कर सकते हैं। तीसरी दुनिया का कार्यभार होना चाहिए मनुष्य बचाने का न कि बाजार के उपभोक्ता को बचाने का। हमारे यहां मनुष्य, मनुष्य होता है, वस्तु नहीं, हम सामाजिक सहभागी कल्याणकारी सŸााप्रबंधन के लोग हैं, न कि बमों व बन्दूकों की बारूद में नहाए हुए आज्ञाकारी, दण्डित किए जा सकने वाले लोग। हम ‘पीर पराई जानने’ वाले लोग हैं, न कि पीर का मजाक बनाने वाले लोग। मानवीयता बचाने व सुरक्षित रखने का संदर्भ अन्ततः मनुष्यों को ही बचाना है, नागरिकों को ही बचाना है, पर कैसे बचेगी मनुष्यता आज के उपभोक्तावादी समय में? मनुष्य को मनुष्य बचाए रखने के लिए सत्ता के करतबों को कितना लचीला और मानवीय बनाना होगा, मनुष्य को उपभोक्ता बनने से कैसे रोकना होगा, मनुष्य को बाजार का बाजारू पोस्टर व कार्टून बनने से कैसे रोका जाये यही सारे सवाल तीसरी दुनिया के लिए विचारण के मामले हैं। सभी को पता है कि अधिक भू क्षेत्रफलों व कम आबादी वाले देशों के लिए तकनीकी कौशलों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया जाना अनिवार्य रूप से अनिवार्य है पर क्या सीमित और आधे एकड़ से भी कम प्रतिव्यक्ति भू क्षेत्रफल वाले भारत जैसे देशों के लिए भी प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के लिए मानव ऊर्जा के स्थान पर तकनीकी कौशलों की ऊर्जा का प्रयोग किया जाना चाहिए? भारत जैसे क्षेत्रों के लिए जहां आबादी का घनत्व प्रति वर्ग किलोमीटर 400 व्यक्ति से अधिक है, यहां के प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के लिए अनिवार्यरूप से मानव संसाधनों पर ही आश्रित होना चाहिए न कि तकनीकी कौशलों पर, पर हो उल्टा रहा है। हमें ध्यान रखना चाहिए कि तकनीकी कौशल के युग में आबादी के कम दबाव वाले क्षेत्र आज पूरी तरह से सुरक्षित क्षेत्र हैं तथा वीजा जैसे कानूनों के खोल में दुबके हुए हैं। समझना चाहिए कि क्या वीजा जैसा कानून मानवीयता के दर्दों को परिभाषित कर सकता है? आखिर मनुष्य तथा मनुष्य के बीच यह वीजा क्यों? आज की दुनिया एक तरफ तकनीकी कौशलों के बोझ से दब कर कराह रही है तो दूसरी तरफ मानव संसाधानों की कार्यक्षमता के उपयोग हीनता से तड़प रही है। मानव सभ्यता को आपस में बांटने का काम जिस प्रकार से जाति, गोत्र, रंग, धर्म आदि ने किया है उसी तरह आज के समय के कथित‘वीजा’ जैसे औपनिवेशी कानूनों ने भी मनुष्यता को बांटने का काम किया है। आखिर यह क्या है कि एक आदमी जो सिर्फ आदमी है वह दुनिया के इच्छित देशों में नहीं जा सकता, उसके लिए वीजा या पासपोर्ट की अनिवार्यता किस लिए, वह भी तब जब दुनिया के सारे सत्ता प्रतिष्ठान आदमी को बचाने की चिन्ताओं के रंगीन दावे करते हैं। मानव विवेक, चिंतन तथा धर्म तो सभै भूमि गोपल की मानता है पर वीजा जैसे कानून उनकी धज्जियां उड़ाते हैं। ऐसा किया जाना अनायास नहीं है अबादी के कम घनत्व व जरूरत से अधिक भू क्षेत्रफल वाले देश मानव जाति को अपने इच्छित स्थानों पर आबाद हो कर मानव सभ्यता के लिए काम करने की आजादी कभी नहीं देंगे। ऐसे सŸाा प्रतिष्ठानों की अनिवार्य चिन्ताओं में केवल भूगोल बचाना है, उनके यहां नागरिकरूपी मनुष्यता बचाने की चिन्ता ही नहीं है। मानव सभ्यता के स्तर पर मनुष्यता और नागरिकता का यही द्वन्द है। किसे नहीं पता कि नागरिकता एक खूबसूरत शब्द होते हुए भी किसी संप्रभु देश की संप्रभुता की मानव निर्मित सीमाओं में कैद होती है, जबकि मनुष्यता किसी भी जायज या नाजायज संप्रभुता संपन्न भूगोल में कैद की ही नहीं जा सकती। एक आदमी भूख से भारत में मरे चाहे कहीं भी मरे उसकी मृत्यु पर सारी दुनिया को शर्मशार होना चाहिए। इससे पूरी मानवता कलंकित व अपमानित होती है। पर ऐसी अनुभूति आज के कथित रूप से विश्वग्राम वाली अवधारणा में कहीं नहीं है। यह साफ है कि अगर भारत में भूख से मौतें हो रही है तो उन मौतों से अमेरिका जैसे सत्ता प्रतिष्ठानों से कुछ लेना देना नहीं। आज की दुनिया इतनी बेदर्द और बेरहम हो गई है कि उसने न केवल भूक्षेत्रों को वरन् भूख व जघन्य गरीबी से आहत मनुष्यता को भी भूगोलों में बांट दिया है। ऐसे मनुष्यता विरोधी कृत्यों पर तीसरी दुनिया के चिंतकों, विचारकों को चिन्तन, मनन करना चाहिए। साथ ही साथ न्यायशास्त्र पर भी गंभीर विचारण करते हुए उसे कुदरती न्याय की सार्वभौम मान्यताओं की तरफ ले जाने के लिए सार्थक पहल करना चाहिए। यह प्राकृतिक न्याय की अवधारणा ही है जो पारंपरिक रूप से जन, जन में रची बसी हुई है उसे गढ़ना या रचना नहीं होता। गढ़ना, रचना, सिरजना तो मानवरोधी कानूनों को होता है, जो लगातार जनहित, लोकहित के नाम पर गढे जा रहे हैं। कुदरती न्याय का संदर्भ आते ही कुदरती संसाधनों की उपयोगिता के बारे में भी सवाल खड़े हो जाते हैं।इस तरह हम देख रहे हैं कि आज के कठिन दौर में कथा का वांक्षित समाजशास्त्र बदल चुका है। आज पहले की तरह की कहानियों का कोई मतलब नहीं, आज की कहानियों में मनुष्य को बचाने की चिन्ता होनी चाहिए, मनुष्य बचेगा तभी कहानियां भी बचेंगी। आज भी भारतेन्दु जी के सवाल का उत्तर दिया जाना शेष है.. ‘होय मनुष्यहिं क्यों भये हम गुलाम ये भूप’ कथासाहित्य के लिए अनिवार्य है कि इसका उत्तर दंे और मनुष्य केन्द्रित कथा का समाज शास्त्र सृजित करे।