हिंदी कथा साहित्य/रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास कन्फेशन"
'कन्फेशन'उपन्यास
रामनाथ शिवेन्द्र

अपनी बात मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि इस उपन्यास के बारे में क्या लिखूं, बात कहां से शुरू करूं। यह सच है कि इस उपन्यास को मैं उस तरफ ले जाना चाहता था जहां थाने वाली महिला दारोगा से थाने पर झगड़ रही थी तथा उस तरफ भी ले जाना चाहता था जहां लौंगी थाने पर जाकर रपट लिखवाना चाहती थी पर थाने ने उसे खुद रपट बना दिया ऐसी रपट जिस पर वह सब कुछ लिख दिया गया जिसे मानव सभ्यता कभी भला नहीं मानती, पर वही हुआ जो नहीं होना चाहिए था। थाने वाली महिला जाने किस छिपी हुई ऊर्जा से दारोगा से झगड़ रही थी इसे समझना मेरे लिए मुश्किल था। मुश्किल इस लिए कि हमारा जनपद आज भी अठारहवीं सदी के अभिशापित गीतों को गा बजा रहा है। इस बाबत अनेक उदाहरण हैं, यहां आदिवासियों को विस्थापित कर कराकर ऊंची ऊंची चिमनियां खड़ी कर दी गईं पर कहीं किसी भी तरह से चूं चा नहीं किया, उनके कब्जों में हजारों एकड़ जमीन दे दी गई यह भी यहां के लिए सवाल नहीं बना बावजूद इन सबके एक आदिवासी महिला अपनी पूरी अस्मिता के साथ थाने पर ही दारोगा को नंगा कर रही है ऐसा तो अचरज भरा है। शशि जो उपन्यास का एक पात्र भर है पर उसके सारे अन्तर्विरोध जाने कैसे मेरे बन जाते हैं? मुझे पता नहीं चलता कि मैं शशि में क्या तलाश रहा था, क्या बतौर उपन्यासकार उसके अन्तर्विरोधों के बारे में मुझे पता था? ऐसा तो नहीं था। जैसे जैसे शशि की कथा आगे बढ़ती गई वैसे वैसे उसके अन्तर्विरोध भी सामने आते गये फिर तो मुझे उसके अन्तर्विरोधों से दो चार होना ही था। किसी सामाजिक कार्यकार्ता को पुलिस परेशान करे अचरज भरा लग सकता है, मेरे और शशि के संबधों को ले कर भी सवाल दागे जा सकते हैं कि क्या ऐसा संभव है? क्या शशि केवल देखने की वस्तु भर है या इससे भी कुछ अलग है, यही तो उपन्यास में सवाल है कि शशि केवल शशि नहीं है। वह अपना पक्ष है तो अपना प्रतिपक्ष भी। इस उपन्यास की रूपरेखा मेरे दिल, दिमाग में पहले से नहीं थी। ऐसा अक्सर होता है मेरे साथ कि मैं किसी भी उपन्यास के बारे में पहले से नहीं सोचता। मेरे सारे उपन्यास बिना किसी पूर्वयोजना के ही लिखे गये हैं, हां कुछ सवाल ऐसे हैं जो मुझे पहले से ही मथते रहे हैं, मेरा सारा लेखन, चाहे वह उपन्यास हो, कहानी हो, आलेख हो, उन्हीं सवालों के अगल बगल घूमते रहे हैं और ये सवाल आज के ही नहीं हैं। मानव सभ्यता के विकासक्रम से ही है। खासतौर से तीन ही सवाल हैं, पहला है नारी का सवाल, दूसरा है संपत्ति का सवाल तथा तीसरा है भूमि का सवाल। तीनों सवाल कुदरती हैं और जिन्हें बहुत ही बुरी तरह पूंजीमूल्य बोध वाली परंपरा ने उन सवालों का समाधान निकाले बिना उसे विकृत कर दिया है तथा उसे ऐसा पारंपरिक बना दिया है जैसे वे कुदरती हों। लोग महसूसते है कि संपत्ति के सवाल हों या भूमि के सवाल हों उनसे उनका क्या लेना देना? ये सवाल तो जाने कब से हैं असल सवाल है कुदरती संसधनों पर स्वामित्व देने का, सवामित्व परिभाषित करने का नहीं। स्वामित्व तो पूंजीमूल्यवोध के विद्वानों तथा न्यायशास्त्रियों ने पहले से ही परिभाषित कर दिया है वह भी देश में लोकतंत्र के स्थापित होने के बहुत पहले, मानवसभ्यता को इधर उधर टहला सकने वाली ताकतों ने पहले तो इसी स्वामित्व को परिभाषित ही नहीं आरोपित भी किया फिर राजप्रबंधन को। जाहिर है ऐसी स्थिति में हमारे समाज में स्वामित्व स्थापना का मामला धीरे धीरे कुदरती मामला बनता चला गया जो आज तक चला आ रहा है। दरअसल ऐसा ही होता है पूजीमूल्यवोधों की ताकतें अपने निर्णयों को किसी मिथक की तरह ही स्थापित कराने की तकतों से लैश होती हैं. भूमि के स्वामित्व का मामला भी पूंजी मूल्यवाधों के द्वारा रचित एक मिथक बन चुका है। नारी भी किसी मिथक से कम नहीं जब उसे योनि के कटघरे में जकड़ दिया जाता है यह योनि का कटघरा भी उन्हीं ताकतों के दिमागों का खेल है जो नारी का किसी संपत्ति की तरह परिभाषित करते हुए उनके होने तथा न होने को नकारते रहते हैं। फलस्वरूप मनुष्य तथा मनुष्य के बीच त्रासद दूरियां बतौर घृणा व नफरत बढ़ी हैं। नारी के साथ योनिशुचिता के सवाल को विमर्श की श्रेणी में खड़ा कर दिया गया है, लोग नारी की योनिशुचिता के सवालों को लेकर तरह, तरह के आख्यान रच रहे हैं, कभी श्लीलता की परिभाषा गढ़ी जाती है तो कभी अश्लीलता को कसौटी पर कसा जाने लगता है, केन्द्र में वही नारी होती है जिसे पूंजीमूल्यवोध के साधकों ने जाने कबसे पूंजी बना दिया है, सपत्ति बना दिया है, जिसे पूंजीवादी परंपरा के अनुसार बाजार में बेचा जा सकता है, खरीदा जा सकता है यानि कि नारी का एक बहुत बड़ा बाजार। पर आज की नारी पूंजीमूल्यवोधों के कटघरों से बाहर निकल कर अपनी अस्मिता के लिए संघर्ष कर रही है। कुछ ऐसा ही थाने वाली महिला करती है, शशि करती है तथा लौंगी भी करती है। लौंगी एड्स की मरीज है, यह रोग उसे कैसे मिला इसे वह नहीं जानती, जान भी नहीं सकती, उसे उसके अपने घर वालों ने ही देह के बाजार का नागरिक बना दिया है, यह लौंगी के जीवन की विडंबना है कि वह बाजार का कार्टून बन जाने के लिए विवश कर दी जाती है फिर भी वह टकराती है समय से। टकराने को तो शाशि भी टकराती है समय से, उसके समय का मुखिया उसका पति होता है, वह उससे टकराती है और अपनी एक अलग कथा का रचाव करती है। संपत्ति व भूमि के सवालों के साथ ही साथ जाति और धर्म के सवाल भी पूरी मानव सभ्यता को कई कई नाजायज खानों में विभाजित किये हुए हैं। ये ऐसे सवाल हैं जो दुनिया को बारूद की ढेर पर बैठने के लिए विवश किये हुए हैं और आज पूरी दुनिया वास्तव में बारूद की ढेर पर ही बैठी हुई है, भले ही बारूद पर बैठ कर लोकतंत्र के गीत गाये जा रहे हों, जनगण के लिए किसिम किसिम के महोत्सव कानूनों आदि के जरिए आयोजित किये जा रहे हों तथा घोषणायें की जा रही हों कि लोकतंत्र तो लोक का होता है, जनता का होता है, जनता के लिए होता है। योनि और जाति के दोनों कटघरों ने मानवीय सभ्यता के खास गुण मानवीय समीपता का जितना क्षरण किया है उतना किसी और कारकों ने नहीं। दरअसल जाति तथा योनि के दोनों कटघरे पूंजीमूल्यवोध के प्रचार प्रसार का ही काम करते हैं। डाक्टर लोहिया ने कहा था कि ‘जाति बीमा कंपनी होती है, मरना है जाति में, जीना है जाति में, बिना जाति के कुछ भी संभव नहीं, मरने के बाद कांधा देने वाले जाति के ही होते हैं, वे ही मरनी का संस्कार कराते हैं। तो इस तरह जाति के कटघरों से बाहर पूंजीमूल्यवोध किसी को भी नहीं निकलने देगा, पड़े रहो इसी में। आज तो जाति का कटघरा इतना मजबूत है कि राजनीति भी उसकी चंगुल में है। तो यह जो पूंजीमूल्यवोध वाला मामला है हमारे चित्त तथा चेतन दोनों का भी मामला है. इस मूल्यवोध ने हमारी चेतना की सारी ऊर्जा को लील लिया है। जब मानवीय चेतना में जाति तथा योनि की शुचिताएं दखल देने लगती हैं फिर तो पूरी दुनिया अपने आप कई कई खानों में विभक्त हो जाती है, फिर कुछ बांटना शेष नहीं रह जाता। यह सच है कि इस उपन्यास के सारे पात्र काल्पनिक हैं, पर इन पात्रों के चरित्र चित्रण में मेरे सामने न्यायशास़्त्र की व्यवस्था का दबाव था तो विधिव्यवस्था की जिम्मेवारी संभलने वाले वास्तविक चरित्रों का भी दबाव था। इन सभी के साथ मेरा घर परिवार भी तो था उसका भी दबाव कम नहीं था। सोनभद्र की प्रशासनिक व्यवस्था से में लगातार परिचित होता रहा हूं, यहां चाहे थाने के प्रबंधन की बात हो या दूसरे प्रशासनिक प्रबंधनों की बात हो सारा कुछ अद्भुत जैसा है। यहां अधिकारियों की उदार विनम्रता हासिल कर पाना कत्तई संभव नहीं और न ही यहां पहले के स्थापित किसी राजव्यवस्था में ऐसा रहा है। यहां जो मानसिक गुलामी पहले थी वह आज भी है। मुझे नहीं लगता कि यहां कोई भी व्यक्ति ऐसा हो सकता है जो अपनी कुदरती आजादी का इस्तेमाल कम से कम अपने लिए भी कर पाता हो। यहां सत्तावन प्रतिशत से अधिक जंगल का भू भाग है जो कुदरती है, हजारों साल से है पर यहां के लोगों में मानवीय समीपता की कुदरती शिक्षा नहीं है, सहभागिता की नहीं है। पूरे क्षेत्र को बाजार ने ऐसा डस लिया है कि हर आदमी बाजार के कार्टून का सामान बन गया है. यहां जीने की पहली शर्त है बाजारू बनना तथा दूसरी शर्त है उपभोक्ता बनना। इन्हीं दोनों शर्तों के बीच जिहें जीवित रहना है रहे नहीं तो मरे. यहां की परिस्थितियां एक नये तरह का आख्यान जनमाती है, यहां चिमनियां तो हैं पर चिमनियों के सरोकार यहां के लोगों से नहीं है, वे लगातार यहां के लोगों को बीमार बना रही हैं। जलवायु प्रदूषण के सवाल से बड़ा सवाल आर्थिक प्रदूषण है, आर्थिक कदाचार का मामला है, गोया क्या नहीं है हमारे सोनभद्र में? इस उपन्यास में मेरा प्रयास रहा है कि किसी भी बहाने सोनभद्र आये, यहां के लोग आयें तथा यहां की परिस्थितियां आयें। यह सच है कि एक संस्था ने यहां चार पांच साल पहले एड़स के प्रति जागरूकता का अभियान चलाया था पर वह अभियान तभी तक चल सका जब तक संस्था को दानदाता संस्था से फंड मिलता रहा बाद में तो वह स्वतः समाप्त हो गया। ऐसा ही होता है सोनभद्र में ‘जब तक फंड तब तक एन.जी.ओ. वाले मुस्टंड’ बाद में तो किसी का पता तक नहीं चलता। एड़स के प्रति जागरूकता वाले अभियान ने मुझे प्रभावित किया था यह सच है पर उस अभियान से एकदम अलग है शशि का कथाचरित्र। प्राथमिक शिक्षा को केन्द्र में रखकर चलाया जाने वाला एक और अभियान जिसका नाम था फंड छात्रों को, न कि स्कूलों को, उसने भी मुझे अपनी ओर खींचा था उसका लक्ष्य था प्राथमिक या माध्यमिक स्तर पर दी जाने वाली शिक्षा के लिए सरकार जितना भी धन स्कूलों को आवंटित करती है उसे छात्रों में बांट दिया जाना चाहिए तथा छात्रों को यह कुदरती अधिकार दिया जाना चाहिए कि वे खुद स्कूल का चुनाव करें जहां उन्हें बेहतर तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके, पर यह अभियान भी कुछ महीने में ही फुर्र हो गया। मुझे विश्वास है कि मेरे पहले के उपन्यासों की तरह इस उपन्यास को भी मुहब्बत मिलेगी। चलिए लौट चलें तो क्या जंगल ने शशि को खुद में आत्मसात कर लिया फिर वह जंगल की मादकता से अलग वामउग्रवाद की अगुआ बन गई? मुझे नहीं लगता कि शशि वामअतिवादी हो सकती है, पर पुलिस का मानना है कि शशि वामउग्रवादी है, इसी लिए रापटगंज से भाग गई। फिर भी मुझे यकीन नहीं आ रहा कि वामउग्रवाद से शशि का दूर दूर तक का भी नाता रहा होगा। शशि से जुड़ाव के कारण पुलिस ने मुझे पकड़ा तथा छोड़ भी दिया पर कभी भी दुबारा पकड़ सकती है। पुलिस की पकड़ से बाहर आने के बाद मुझे बीते समय का सारा कुछ साफ,साफ दीखने लगा था। उन दिनों शशि के साथ मेरे संबध मधुर रहे हैं जो मेरे दिल दिमाग से बाहर नहीं निकल सकते। हालांकि वह बीत चुका है पर उसकी महक आज भी बासी नहीं हुई है। मुझे सारा कुछ ख्याल आ रहा है कि क्या हुआ था तब, जब शशि मेरे कस्बे में आयी थी मेहमान की तरह और मेरी स्मृति में किसी कहानी की तरह छा गई थी। मुझे शशि के साथ बिताए दिन सोने नहीं दे रहे हैं, समय के एक, एक पल ताजे दिख रहे हैं.. स्मृतियों में डूबने और तैरने लायक। मेरी आंखों में आज भी शशि किसी मछली की तरह तैर रही है और मैं समझ नहीं पा रहा हूॅं कि पानी में मछली की तरह तैरने वाली महिला वामअतिवादी हो सकती है। नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। अब तो शशि यहां है भी नहीं, जाने कहां, तथा किस हाल में हो, फिर भी उसकी स्मृतियां मेरे लिए अद्भुत कथानक हैं, उसकेे एक, एक हिस्से मेरी ऑखों में तैर रहे हैं, भला मैं कैसे भूल सकता हूॅ उसके सखी, सखा वाले भाव को। शशि तथा मेरी उम्र में काफी अंतर था फिर भी शशि मेरे लिए सखी तथा सखा दोनों थी। संभव है वह फिर रापटगंज आ जाये पर नहीं, यह महज कल्पना है, वह यहां नहीं आने वाली, फिर भी मैं सोच रहा हूॅ कि वह आयेगी किसी न किसी दिन... संभव है ऐसा भी हो जब सोचा हुआ परिवेश मिल जाये और कहीं गुलाब तो कहीं चांद दिखने लगे, फिर तो उस परिवेश को किसी उत्सव में तब्दील करने की कोशिश करना बेवकूफी नहीं.. जिन्दगी में ऐसा होता कहां है यदि हो जाये तो वाह, वाह, तब तो बहादुरी, कुशलता, प्रतिभा जैसी तमाम चीजें पीठ पर चस्पा की जा सकती हैं और अपने चेहरे पर दूसरों के चेहरों की चमक खींचने वाली चमक का होना भी महसूस किया जा सकता है। परिवेश और समय की बात करें तो वह वही समय और परिवेश था और मैं उस समय अपनी आंखों में चांद डुबोने तथा बहादुरी की गाथायें लिखने की कोशिश कर रहा था, बिना परवाह किए कि मेरी उम्र गुदगुदियों वाला रिश्ता मुझसे नहीं रखती। ऑखों में गहरी झील उगाये एक दिन मैं शशि के साथ था। यह सोचते हुए कि उसकी ऑखों में भी वही झील होगी, उनमें मछलियों का तैरना, गोते लगाना व किनारों से टकराना आदि देख सकूंगा और किनारे पर बैठ कर लहरों से मीठी छेड़ छाड़ भी। पास में बैठी शशि तो मेरा साथ देगी ही, तथा मेरी ऑखों में अपना खोया हुआ चेहरा भी तलाशेगी पर.. वह तो कहीं और थी। नदी, नाले, आकाश, चॉद, तारे सभी से बाहर, किसी अनजानी सी दुनिया में, अनजानी सी धरती पर, अनजाने रास्ते पर। सुबह का वक्त था, नरम धूप हमें सहला रही थी। ऑखों के सामने बड़े बड़े दरख्त थे, उनकी प्रजाति पहचानना मुश्किल सा काम था। जरूरत भी नहीं थी कि जाना जाये पेड़ों के बारे में, तथा हिसाब लगाया जाये कि उन पेड़ों में से कितनी कुर्सियां, पलगें या इन्टीरियर डेकोरेशन के सामान बनाये जा सकते हैं? जंगल की हरियाली, पेड़ों का झूमना, पŸिायों का सरसराना, जंगल के एकान्त की गुदगुदाहटों में मैं था और सोच रहा था कि गुदगुदाहट शशि को भी हो रही होगी पर उससे पूछना कि कैसा लग रहा यहां? अभद्रता होती, वैसे भी जंगल किसे नहीं गुदगुदाता? वह तटस्थ थी, प्रतिक्रयाहीन मैंने उसे गौर से देखा ताकि जान सकूं कि वह प्रकृति के मनोरमों व उसकी धड़कनों से किस सीमा तक अविचलित रह सकती है? भीतरी तलों की अकुलाहटों को रोकने में किसी अभिनेत्री की तरह वह माहिर तो नहीं, स्वीकार को अस्वीकार में तब्दील कर देने की कलाकार। किस दिल में अदृश्य झील नहीं होती? कौन नहीं उतरना चाहता उसमें? उतर जाने के बाद लहरें खुद, बखुद हिलोरने लगती हैं, निकलने लगती हैं अतृप्त संासें। लेकिन वह चंचल हिलोरों से बाहर थी। ‘करमनासा’ नदी की तरह, पूरब से पश्चिम की तरफ हरहराती हुई बहने वाली, लेकिन बरसात के बाद पूरे छह सात महीने तक शान्त, स्थिर, कितना पाट है, कितनी रेत है, नदी में, पानी है या पानी में ही नदी है, मालूम करना मुश्किल। उसमें उतर कर ही नहीं, समा जाने के बाद भी। इससे भी मुश्किल यह हिसाब लगाना कि नदी ने कितनी बरसात पिया या धूप सोखा? वह मेरे साथ भलुआ पहाड़ी की अधिकतम ऊंचाई पर थी और वहां हिम नहीं थी फिर भी हम ठंडे थे, पहाड़ी का शिखर ऊंचा था और जिस चट्टान पर हम बैठे थे, वह उŸाुंग नहीं आयताकार था तथा चिकना भी। वहां से जंगल का झूमना व धरती की हरियाली साफ,साफ दिख रही थी फिर भी ऐसा जान पड़ रहा था कि जंगल कुछ,कुछ हमसे छिपा रहा है जिसे देखना और महसूसना अद्भुत होगा, मिलान करने में सुविधा होगी कि हमारे भीतर का जंगल अपने रहवास के लिए कितना मचल रहा है? वैसे मेरे भीतर किसी जंगल का दखल नहीं, न ही कहीं घाट, पहाड़, न ही नदी,नाले। हां हसते, खिलते फूलों का दबदबा सदैव रहा है शायद इसीलिए मैं जीवन जीते रहने के प्रति हमेशा सकारात्मक रहते हुए उसकी भीनी भीनी गंध महसूसता रहा हूॅ.. उस समय भी मैं भीनी भीनी गंध में था पर उसमें निश्क्रिय मादकता थी, सिकुड़ी, सिमटी जबकि ऐसा होना नहीं चाहिए था, चाहिए तो यह था कि जंगल के एकान्त में मुझे उस नौजवान और आकर्षक लड़की के साथ तूफानी बाढ़ बन जाना चाहिए था तथा तमाम तटबन्धों को तोड़कर धरती की गंध और जंगल के एकान्त में डूब जाना चाहिए था। लेकिन जो होता है या जो हो रहा था वैसा सोचे हुए के भीतर ही नहीं होता, उससे अलग भी होता है बहुत कुछ। मैं काल्पनिक संभावनाओं की मौज, मस्ती में था और संभावनायें थीं कि उसकी ज्योति का एक टुकड़ा भी कहीं नहीं दिख रहा था। हम विचारों से विकलांग भी न थे, न ही हमारी मुक्ततायें अपहृत हुई थीं, हम सचेतन थे, एक दूसरे को आकर्षित करने की कलायें भी हमारे पास थीं, फिर भी हम तटस्थ थे और अपनी अपनी दृढ़ताओं में जकड़े हुए थे। हमने गूंगापन तोड़ा। दुनिया के साहित्य को कभी बांए से तो कभी दांए से हिलाया, डुलाया तथा झकझोरा भी। हमें ऐसा करने में जो दिक्कतें आयीं वे हिन्दी साहित्य के बाबत थीं कि इसमें जो जम गया या जमा दिया गया उसे सदियां हिला नहीं सकतीं, कविता का क्षेत्र हो या कहानी का पुरखों का जमा होना पारंपरिक परिघटना है। कविता की बातें करते, करते हम आज की कहानियों में फस गये। अन्त में कहानियों ने हमारी सारी तार्किक ऊर्जा ही छीन ली, हम थके, हारे से बैठे रह गये कहानी के उन पात्रों की तरह जो दो जून की रोटी भी नहीं जुटा पाते। आत्महत्या करने के लिए विवश किसानों या विस्थापितों से आंखें मिला पाना अपशकुन होता। हमारी भद्रताएं प्रभावित होतीं वैसे भी जंगल में होने के हमारे सरोकार स्पष्ट थे जिस पर हमें कदम दर कदम बढ़ना था। तय भी सिर्फ यह था कि ‘जंगल की तरफ चला जाये एक दिन’। ‘जंगल में होना हम दोनों का साझा लक्ष्य था कि विज्ञान का रंगीन पोस्टर बने रापटगंज से एक दिन बाहर निकला जाये, जहां एकान्त की गुदगुदियां हों और आलोचनाविहीन वातावरण।’ इसी साझे लक्ष्य के तहत जंगल का चुनाव किया गया था कि वहां प्रकृति से सीखने का अवसर मिलेगा। प्रकृति से बहुत कुछ सीखा जा सकता है, मसलन शान्ति की अतल गहराई में उतरना, उसके भीतरी तलों को खंगालना, इस मुद्दे पर वैचारिक योद्धाओं में भी मतभेद नहीं.. हममें भी मतभेद नहीं थे पर हम मौन थे तथा कहीं गहरे में उद्वेलित भी। हमने साहित्य पर की गईं बातों को अपने से जोड़ा और आगे.. अचानक शशि ने मुझे याद दिलाया.. ‘आपने कभी कहा था कि इस जंगल के आसपास कहीं एक नदी है जो समतल मैदान को चीरकर निकली है, कितनी दूर होगी, वैसे भी जंगल है तो नदी भी होनी चाहिए, जो जंगल को आड़े तिरछे किसी भी तरह चीरती होगी, भले ही समतल से न निकली हो, चलिए उस तरफ चला जायेे पर समतल पर नदी की अंगड़ाई, ऐसा तो अचरज जैसा होगा।’ ‘बहुत दूर तो नहीं जाना होगा’ पूछते हुए शशि खड़ी हो गई। इधर तो समतल चीरने वाली कोई नदी नहीं, एक बेलन है जो काफी दूर है, पास में ‘करमनासा’ नाम की एक नदी है, यही कोई तीन चार किलामीटर दूर, उसे वैदिक नदी के रूप में भी जाना व माना जाता है पर वह समतल से नहीं निकली है। मैने शशि को बताया.. ‘कहीं त्रिशंकु वाली तो नहीं’ कहते हुए वह चौंकी फिर गंभीर हो कर बोली.. ‘वही त्रिशंकु तो नहीं स्वर्ग और नर्क के बीच लटका हुआ एक सŸााप्रभु, विश्वमित्र के याज्ञिक प्रयोगों का एक उपकरण, अपने ढंग का स्वर्ग बनाने वाला महत्वाकांक्षी।’ ‘हां वही त्रिशंकु जिसे स्वर्ग के रक्षाकर्मियों ने स्वर्ग में घुसने से रोक दिया किसी तरह वह नर्क से बाहर निकला, फिर लटक गया स्वर्ग और नर्क के बीच। उसके ऑसुओं, खखारों एवं लारों से धरती पर कर्मनाशा बह निकली किसी शोक कविता की तरह’ हम भी तो त्रिशंकु की तरह ही तो लटके हुए लोग हैं, चलिए उस तरफ चलते हैं’ शशि ने स्पष्ट किया.. पहाड़ी तथा कच्चा रास्ता पार करके करमनासा के तट पर हम शीघ्र ही पहुंच गये। कटीली झाड़ियों के बीच से गुजरना भला था जो देखने में अद्भुत था, झाड़ियों की सघनताओं के बीच होठों के खिलखिलाने व मुस्कराने माफिक। नदी काफी गहरी थी, कोई पचास साठ फीट से अधिक, नदी की तलहटी में विभिन्न आकारों प्रकारों के पत्थरों का प्रायोजित जैसा जमघट था, गोल, गोल चिकने चिकने। इन्हीं पत्थरों को चूमता, चाटता नदी का पानी बह रहा था, पानी और नदी की तलहटी की एकात्मकता देखने लायक थी, तभी तो छोटे, छोटे पत्थर भी उसके बहाव को ठहराव में बदले हुए थे। नदी के किनारे से नदी में उतरने का रास्ता नहीं था जिससे साबित था कि पास में कहीं बस्ती नहीं.. हम किसी तरह नदी में उतरे, नदी के सपाट किनारों ने हमें सामान्य नहीं रहने दिया, किनारों के सीधे करारों पर पैर टिकाने की भी जगह नहीं थी। गनीमत थी कि बिना चोटिल हुए हम नदी की गहराई में उतरे। पत्थरों के बीच फसे हुए पानी को पैरों से हिलाते हुए शशि बोली... ‘कितना साफ पानी है, पारदर्शी भी, इसमें मछलियां भी तो होंगी, भले ही बड़ी न हों छोटी ही सही। मछलियों का तैरना जब भी मैं देखती हूॅं लगता है अपनी सांसों में तैर रही हूॅं, जीवित उम्मीदों एवं संभावनाओं को सहला रही हूॅ.. बहुत अच्छा लगता है, क्षण भर के लिए ही सही, जड़तायें टूटती हैं और खुद को विश्लेषित करने का आनन्ददायक अवसर भी मिलता है पर कभी कभी तो... बुरा तथा भयानक, चीख निकल जाती है’ शशि किसी कविता सरीखा संवाद बोलकर चुप हो गई। कुछ देर बाद बोली... बोली क्या मुझसे पूछा उसने.. ‘आप भी तो सांसों में तैरते होंगे, किसी मछली की तरह, भीतरी तलों को छू, छू कर लौटने के लिए फिर आगे तैर कर छूए हुए को दुबारा, तिबारा छूने के लिए, छुअन तो कला का ही रूप है, ऐसा करने में आप अपनी प्रतिभा का अधिकतम उपयोग करते ही होंगे...’ ‘कैसा सांसों में तैरना तथा कैसी छुअन?’ क्या पूछ रही यह लड़की किसी दार्शनिक की तरह। मैं उसका उŸार दे पाता कि अचानक बिना कुछ सोचे हुए ही मैंने उससे कहा, कुछ,कुछ स्वस्फूर्त ढंग से... ‘शशि मैं भावुक नहीं, वर्तमान ने मुझे खुरदुरा बना दिया है, मैं आगे या पीछे की सोच ही नहीं सकता तथा भूत भी मेरा सहयात्री नहीं रहा है। मैं वर्तमान में ही जीता रहा हूॅ.. कुशलतापूर्वक जीने के लिए पूर्वाग्रहहीन संबध ही तो चाहिए, इससे अधिक कुछ भी नहीं। हम मनुष्य हैं, हमारे भीतर वारिश रोकने की जगह नहीं, हमारी चमड़ियां धूप सोखने की आदी हैं पर लहरें नहीं झेल सकतीं, वैसे भी मछलियों को तैरने के लिए पानी की जरूरत होती है, पानी सब जगह तो होता नहीं.. मुझे नहीं मालूम प्रतिभा किसे कहते हैं फिर उसके अधिकतम उपयोग का सवाल ही नहीं..’ मेरा प्रतिउŸार सुनकर शशि हसने लगी जैसे उसने नदी का हसना भी छीन लिया हो, थोड़ा रूक कर बोली....पूरी तरह उपेक्षात्मक... ‘पूर्वाग्रहहीन संबन्धों का निर्वाह कैसा ? किस बात का निर्वाह, निर्वाह एक आयामी तो नहीं.. मैं निर्वाह ही तो कर रही हूॅं, पहले अकेली थी, फिर साथ मिला, मॉ बाप ने मुझे ससुराल विदा किया। पांच साल गुजर गये, तीन साल तक ससुराल में ससुराल वालों के साथ रही, दो साल से अकेली हूॅं बिना तलाक के यह मान कर कि तलाक का कोई अर्थ नहीं, समझ बढ़ सकती है स्थितियों के समझने के बाबत, फिर टूटे हुए दिल मिल सकते हैं, प्रतीक्षा करना आवश्यक है। संबन्ध बहाल होने की संभावनायें तो रहती ही हैं पर क्या मैं अकेली संभावनाओं को सफल बना सकती हूॅं?’ अपना बीता बताकर शशि मौन हो गई, आगे बताना भी क्या था। कोई कहानी कितना दूर जा सकती है आखिर? लड़की से पत्नी बनने और तलाक होने तक खत्म। कहानी की आगे की यात्रा तो कई अन्तों वाली हो जायेगी, पति, पत्नी जैसे संबन्धों के बहुविकल्पों व बहुलक्ष्यों वाली। शशि पति, पत्नी के रिश्तों के अलावा प्रचलित दूसरे विकल्पों से घिन करने वाली एक पारंपरिक लड़की मुझे जान पड़ी, देहदाह को शुचिता के आग्रहों से संवारने सजाने वाली। बहुत गहरे से शशि को मैंने देखा और सहम गया मुझे जान पड़ा कि वह देह से पार है, देह में होते हुए भी देह को तपाकर रखने वाली। मैं शशि को साल भर से जानता हूॅ.. पहली बार उसे एक एन.जी.ओ. के लीगल एवेयरनेस प्रोग्राम में देखा था। प्रशिक्षुओं को लीगल जानकारी देने के लिए उस प्रोग्राम में मुझे भी आमंत्रित किया गया था। तब मैंने देखा था कि उसकी ऑखों में देह के बाबत तनाव पूर्ण संतुलन है ही नहीं.. आस है तो प्यास रहेगी ही, पर भूखी नहीं, भात, भात चिल्लाने वाली। उस प्रोग्राम के बाद तो हम अक्सर मिलने लगे थे। उस एन.जी.ओ. की तरफ से भी उसे निर्देश था कि वह मुझे हर उस कार्यक्रम में आमंत्रित करे जो जन समस्याओं से जुड़े हुए हों। वह उस एन.जी.ओ. के लिए जनपद प्रभारी का काम करती थी। निश्चितरूप से शशि मेरा सहयोग लेना कभी नहीं भूलती थी। वह साल के भीतर ही मुझसे ऐसा घुलमिल गई जैसे हम वर्षों से घुले, मिले हुए हांे.. नदी की तलहटी में इधर उधर घूम लेने के बाद हम एक समतल और चौकोर पत्थर पर बैठ गये। वहां कहू के पेड़ की सघन छाया थी जो किसी अशक्त जैसा हिलता डुलता नदी के किनारे खड़ा था। अब गिरा तब गिरा पर ऐसा नहीं था, कहू की जड़ें काफी गहरे तक जाती हैं और काफी मजबूत भी होती हैं.. जानने वाले जानते हैं कि कहू के पेड़ों तथा नदियों की अन्तरंगता अटूट होती है, नदी है तो कहू के पेड़ हैं, कहू के पेड़ नहीं तो नदी नहीं.. वहां बैठे बैठे मैं नर, नारी के रिश्तों को विश्लेषित कर रहा था। काश! नर, नारी के रिश्ते भी नदी और कहू के पेड़ की तरह होते एक दूसरे के पूरक। उस समय हम जंगल में थे, जंगल का मनोरम भी हमारे साथ था पर जाने क्या हुआ शशि की कहानी सुनते ही जंगल के मनोरम मुझे चिढ़ाते से जान पड़ने लगे। कहीं कुछ है ही नहीं, सारा कुछ जलते हुए शून्य में घिरा हुआ है। शशि मुझे किसी परछाईं सी दिखी, दृश्य भी अदृश्य भी, हवा में लटकी हुई त्रिशंकु की तरह मैंने सोचा... जाने किस स्वर्ग की वह प्रतीक्षा कर रही? उसे पाने के लिए अपना अमूल्य वर्तमान क्यों अपाहिज बना रही? मैंने एक बार फिर शशि को गौर से देखा कि उसके चेहरे पर क्या है? उसके मन के भीतर भी उतरना चाहा, वहां कुछ भी नहीं था या कुछ रहा भी हो तो मेरी समझ में नहीं आया कि वहां कुछ है भी, क्योंकि किसी के मन के भीतर उतरने की कला मुझे नहीं आती। वैसे भी एक छोटी सी और अस्पष्ट तथा अंखुआती कहानी के सहारे किसी के मन में उतरा भी तो नहीं जा सकता। फिर भी मैं शशि की कहानी में सवाल था कि काहे के लिए हरामजादों ने इसे परित्यक्ता बना दिया? आखिर क्या दोष हैं इसमंे? शशि तब तक खामोश थी, उसने मौन तोड़ा...‘पानी पी लिया जाय बिस्कुट है मेरे पास, प्यास लगी है, प्यास तो आपको भी लगी होगी, प्यास बुझाने के लिए नदी से अच्छी कोई जगह नहीं, साफ और बहता पानी, कहीं ठहराव नहीं’ मुझे भी प्यास लगी थी, मैने हां कहा और उससे पूछा... ‘बिस्कुट लेकर चली थी क्या? आने की जल्दी में मुझे तो ख्याल ही नहीं रहा कि क्या क्या लेकर चलना हैै?’ हम दोनांे बिस्कुट खाये और बहता पानी पिये, पानी मीठा था, पहाड़ी जैसा नहीं, वैसे भी वारिश का मौसम पार हो चुका था। पानी पी चुकने के बाद शशि से मैंने पूछा.. ‘कुछ और देखना है यहां वीराने में, जंगल के एकान्त में, जंगल में होना तो बहुत अच्छी बात है पर बाहर निकलो तो निकलना मुश्किल, पीछे, पीछे जंगल पीछा करता दीखता है, किसी प्रायाजित साक्षी की तरह।’ शशि ने बिना देर किए स्वस्फूर्त उŸार दिया... ‘लौटना चाहिए अब, दिन ढलान पर है, कई मील जंगल पार करना है, अब कुछ भी नहीं देखना, इससे अधिक कुछ देखा भी तो नहीं जा सकता, अधिक देखने की लालच से बचना ही सर्वोŸाम बचाव है क्योंकि फिर जंगल हमें देखने लगेगा। आप तो जानते ही हैं जब प्रकृति दिल के गहरे में उतर कर किसी को देखने, परखने लगती है फिर तो दृढ़ताएं टूट जाती हैं.. दृढ़ताएं टूट जाने पर जंगल हम पर हसने लगेगा तथा उपहास उड़ाएगा, वैसे हसियां मुझे उŸोजित नहीं कर पातीं, न ही डरा पाती हैं, फिर भी..जंगल से बाहर हमें निकलना ही है, सो जंगल का अवांक्षित उपहास लेकर निकलना ठीक नहीं, चलिए लौट चलें’ अन्धेरा गाढ़ा होते होते तक आधुनिकता में तब्दील होते रापटगंज कस्बे में हम लौट आये किसी विज्ञापन में तब्दील होने के लिए। हम भी तो विज्ञापन की तरह ही शाश्वत एकान्त पीने के लिए जंगल में पहुंचे थे पर वहां तो कोलाहल था। हमें क्या पता कि जंगल तभी कुछ देता है जब उसका मान किया जाये, नहीं तो सारा कुछ लील लेता है। तो क्या शशि जंगल की मर्यादा बचाने के लिए खुद को जंगल के हवाले कर वामउग्रवादी बन गई, घर,बार छोड़ कर, मुझे नहीं मालूम। दूसरी बात कस्बे में किसी तरह की हलचल नहीं थी, हलचल होती भी कैसे प्रदेश की सरकार किसी शान्ति दूत की तरह मुस्करा रही थी। अगर उसकी छवि चूमने लायक नहीं होती तो उसे आतंककारी बहुमत कैसे मिलता? हर छोटी बड़ी, जात पांत वालों ने उसे अपना माना, वोट का खजाना उस पर निछावर कर दिया। सरकार तो सरकार होती है, विज्ञापनों से अपना हाजमा दुरुस्त रखने वाली, सो कस्बे में सरकार द्वारा कराए गये एवं कराए जाने वाले विकास कार्यों के बाबत तमाम विज्ञापनी पोस्टर चिपके हुए थे जिसमें साफ,साफ लिखा था कि हर हाथ को काम तथा हर खेत को पानी मिलेगा। विज्ञापन की कुछ नस्लें दूसरे किस्म की थीं जो जनसंख्या नियंत्रण एवं एड्स के बाबत थीं.. उक्त विज्ञापन काफी डरावने थे, संदेश था कि देह को देह से दूर रखने में ही एड्स से बचाव है। पर कैसे? यह नहीं था। देह ताप का क्या होगा यदि यह भी उसमें बताया गया होता तो विज्ञापन काफी हसीन और चूमने लायक होते? एक दिन शशि का फोन आया.. ‘उसकी संस्था को एड्स नियंत्रण के प्रति जागरूकता फैलाने का काम मिला है जिसके लिए एक वर्कशाप आयोजित करना है, अगर आप समय देते तो वर्कशाप की रूपरेखा बना ली जाती’ मैं जानता था कि सोनभद्र प्रदूषण जोन की तरह एड्स जोन के रूप में भी चिन्हित किया गया है तथा शशि की संस्था एड्स के बाबत जागरूकता का कार्यक्रम संचालित करना चाहती है। जिसके लिए धनदाता संस्थाओं के पास उसकी संस्था की ओर से आवेदन भी किया गया है, हो सकता है कुछ सकारात्मक उŸार आया हो और शशि वर्कशाप कराने की योजना बना रही हो। पूछने पर स्पष्ट हुआ कि जैसा मैं सोच रहा था वैसा ही था। शशि ने साफ,साफ बताया। उसके प्रस्ताव को मुझे नकारना तो था नहीं, मैंने फटाका हां कह दिया। आऊंगा, अवश्य आऊंगा। दूसरे दिन शशि संस्था के मंत्री के साथ मुझसे मिली। मंत्री एक चालाक आदमी जान पड़ा और बातूनी भी, हालांकि वह बातें चबा चबाकर बोलने वाला आदमी नहीं था, शक्ल सूरत आधुनिक थी पर शरीफ जैसी, ऐसी भी नहीं जिससे संस्था का लक्ष्य परिभाषित होता हो, वहां लक्ष्य नाम की कोई चीज नहीं थी। वर्कशाप के बारे में ढेर सारी बातें हुईं, वर्कशाप क्यों तथा किसके लिए यह सुनिश्चित किया गया कि वर्कशाप तो कराया जाये पर किसके लिए यह मामला हल होने से ऊपर था, हल होता भी कैसे? देहव्यापार से जुड़े लोगों के बारे में किसे जानकारी थी? उनके नाम, पता तो मालूम हांे.. कम से कम मुझे तो जानकारी नहीं थी सो मैंने उसे साफ,साफ बता दिया कि मैं इसमें आप लोगों की सहायता नहीं कर सकता। संस्था का मंत्री मेरी ओर एकटक था मानो वह मानकर चल रहा हो कि मैं भला यह सब क्यों नहीं जानूंगा, गोया उसके दिमाग में संभावना और अपेक्षा दोनों थी कि मुझे यह सब जानना ही चाहिए। अगर मैं इतना भी नहीं जानता फिर मैं सोनभद्र के बारे में क्या जानता हूॅं? मैं था कि देह व्यवसाय से जुड़े लोगों के बारे में कुछ जानता नहीं था। अखबारों की खबरें पढ़कर ही मुझे मालूम था कि सोनभद्र एड्स जोन की संभावना वाले परिक्षेत्र के रूप में जाना जाता है। ऐसे परिक्षे़त्र जो आधुनिक विज्ञान की उपलब्धियों की मादकता में मुस्किया रहे हों और किसिम किसिम के कारखाने कथित विकास के उत्सव मना रहे हों, वहां एड्स नहीं पसरेगा तो क्या पसरेगा? सिद्धान्ततः मुझे इतना ही मालूम था। इसके आगे मुझे कुछ भी मालूम नहीं था। संस्था का मंत्री एड्स से प्रभावित लोगों के बारे में जानकारी जुटाने की जिम्मेवारी शशि पर थोप कर दूसरे दिन वापस लौट गया, यह निर्देश जारी करते हुए कि जानकारी जुटाने के काम को सात दिन के भीतर कर लिया जाना चाहिए। संस्था का मंत्री वापस तो लौट गया पर उसका भूत रापटगंज से वापस नहीं लौटा, वह शशि के अगल बगल मंडरा रहा था। तीन दिन गुजर गये, शशि ने हर संभव कोशिश की कि उसे देहव्यापार से जुड़े लोगों के बारे में आंशिक ही सही, जानकारी हो जाये पर एड्स प्रभावित किसी का भी नाम उसे सप्रमाण नहीं मिल सका। चार दिन और शेष हैं, रिपोर्ट क्या देगी मंत्री जी को? शशि के लिए परेशानी थी कि वह किससे पूछे एड्स से प्रभावित लोगों के बारे में, एक मात्र सरल उपाय था सरकारी जिला अस्पताल के एड्स विभाग के डाक्टरों या कर्मचारियों से मिलना और जानकारी जुटाना। दूसरे दिन शशि जिला सरकारी अस्पताल में थी, अस्पताल तक पहुंचना दिक्कत भरा था। पहले ठीक था, अस्पताल कस्बे के बीच में था, वहां तक पहुंचने के लिए रिक्शे की जरूरत नहीं थी, सरकार को जाने क्या सूझा कि अस्पताल को कस्बे से तीन चार किलोमीटर दूर एक वीरान पहड़ी लोढ़ी पर स्थापित करा दिया। रापटगंज से दूर अस्पताल स्थापित न किया जाये इसके लिए तमाम विरोध प्रदर्शन और घेराव आयोजित किए गये पर सरकार तो सरकार होती है। वह जनविरोध को नाजुक गंभीरता से भी लेने लगे तो तो सरकार का मतलब ही खत्म हो जाये। फिर लोकतंत्र में तो जनता विरोध प्रदर्शन, घेराव वगैरह किया ही करती है, गांधी जी के जमाने से ऐसा ही चल रहा है, उसकी चिन्ता करो तो चल चुकी सरकार। अस्पताल में शशि को मालूम हुआ कि एड्स के लिए कोई अलग से डाक्टर नहीं है.. जो डाक्टर एड्स के मरीजों की चिकित्सा कर रहा है वह चर्म रोग का डाक्टर है। दो सामाजिक कार्यकर्ता हैं, उनमें से एक अस्पताल में हाजिर है। इतना मालूम करते करते तक शशि काफी आशंकित हो चुकी थी। ‘जिससे पूछो एड्स के डाक्टर के बारे में वही उसे घूरने लगता... मानो उसे ही एड्स हो गया हो’ तथा वह हर किसी के लिए सुलभ है, पर करे क्या जानकारी तो जुटाना ही था। अस्पताल नया, नया बना था इसी लिए वहां सफाई भी थी। अन्य सरकारी अस्पतालों की तरह वहां गन्दगी नहीं थी। गन्दा होने में कुछ समय तो लगता ही है। शशि अस्पताल के मुख्य हाल में थी। हाल के अगल बगल आमने सामने डाक्टरों के कक्ष थे। ठीक पूरब की ओर एक कक्ष था। कक्ष के दरवाजे के ठीक ऊपर चर्मरोग विभाग लिखा था। उसके नीचे डाक्टर का नाम। उसके पास ही में ही जन सहायता कक्ष था जिससे साबित नहीं होता था कि किस काम के लिए सहायता? शशि उस कक्ष में दाखिल हुई, वहां एक अधेड़ किस्म का कर्मचारी बैठा था जो हसमुख स्वभाव का विनम्र आदमी था, उससे शशि ने पूछा... ‘क्या यहां एड्स के मरीजों की देख, रेख और दवा दारू होती है?’ उस विनम्र कर्मचारी ने शालीनता से शशि को बताया ‘हां होती है, कहिए मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूॅं?’ शशि ने महसूस किया कि यह आदमी उन लोगों से अलग है जो एड्स के डाक्टर के बारे में पूछते ही उसे घूरने लगे थे। उसे शालीन समझ कर शशि ने उससे अपना काम बताया कि उसे एड्स से प्रभावित रोगियों एवं सेक्स का व्यवसाय करने वालों के बारे में जानकारी चाहिए’ कर्मचारी तो कर्मचारी कितनाहूॅ विनम्र हो वह ताड़ गया कि मामला कुछ गंभीर है, शशि का सवाल सुनते ही उसने दफ्तरी गंभीरता ओढ़ ली। ‘क्या पूछा आपने? एड्स के रोगियों तथा सेक्स वर्करों के बारे में जानकारी, तो यह जान लीजिए कि ऐसी जानकारी किसी को नहीं दी जा सकती, आर.टी.आई. के तहत पूछने पर भी। क्या मैं जान सकता हूॅं कि आप कौन हैं तथा इस तरह की जानकारी किस लिए जुटा रही है?ं’ ‘हां यह तो मैंने आपको बताया ही नहीं कि मैं कौन हूॅ, आपकी विनम्रता ने मुझे इस औपचारिकता से वंचित कर दिया, नहीं तो मैं ऐसी गलती नहीं करती। हां तो मैं एक मामूली सामाजिक कार्यकर्ता हूॅ और एक गैरसरकारी संगठन से जुड़ी हुई हूॅ. हमारी संस्था एड्स जागरूकता का कार्यक्रम कई जनपदों में क्रियान्वित कर रही है, इस वर्ष से यहां भी संचालित करने की योजना है, इसी आशय से उक्त जानकारियां चाहिए थी..’ अचानक कर्मचारी भावुक हो उठा.. ‘अरे अभी तक आप खड़ी हैं, बैठिए तो’ ‘जी धन्यवाद’ फिर शशि एक कुर्सी पर बैठ गई। दूसरी ओर कर्मचारी कुछ फाइलांे को देखने लगा, कुछ देर बाद बोला ‘देखिए मैं आपकी इस काम में कुछ भी सहायता नहीं कर सकता, यह मेरे अधिकार क्षेत्र के बाहर है, हां डाक्टर साहब आ रहे हैं उनसे बात कर लीजिए फिर मैं एड्स रोगियों की फाइलें आपको दिखा दूंगा पर बिना डाक्टर के आदेश के नहीं’ तब तक आप यहां बैठ सकती है..’ ऐसे मामलों में शशि अनुभवी थी। बिना कुछ लेन देन के काम नहीं होता कानून टपक पड़ता है बीच में, लेनदेन कर लो तो सारा कानून खत्म। शशि ने उक्त कर्मचारी को सौ का एक पŸाा थमाया और धीरे से कहा... ‘कुछ और भी मिलेगा आपको, काम हो जाने के बाद।’ ‘अरे यह सब क्या है, मैं लेन, देन नहीं करता, मैं भी तो एक सामाजिक जन संगठन का सदस्य हूॅं, यहां दो साल के लिए हूॅ. पर आपने तो ऐसा कर दिया कि अब मैं आपके आग्रह को कैसे ठुकरा सकता हूॅं, समझ में नहीं आ रहा, चलिए आपका काम निपटा देता हूॅ. पर सेक्स वर्करों के बारे में मेरे पास कोई रिकार्ड नहीं है, इसकी जरूरत भी सरकार को नहीं पड़ती, मेरी जानकारी में ऐसा कोई सर्वे भी नहीं हुआ है, फिर आंकड़े कैसे मिलेंगे? शशि ने कर्मचारी को रोका....‘पर असल काम तो मेरा वही है सेक्स वर्करों का पता लगाना आखिर यह कैसे होगा?’ कर्मचारी गंभीर हो गया। कुछ सोचकर बोला.. ‘आपका काम हो सकता है, एड्स का एक मरीज जांच पड़ताल कराने के लिए अगले सप्ताह मेरे पास आयेगा, वह आपकी मदत कर सकता है, मुझे वह सेक्स व्यवसाय का दलाल लगता है।’ ‘अगले सप्ताह तक तो काफी देर हो जायेगी, उसका नाम पता तो होगा आपके पास। अस्पताल बन्द होने के बाद आप उससे मिलवा देते तो उपकार करते, वह कहीं दूर का रहने वाला तो नहीं..’ ‘नहीं वह यहां के सबसे पास वाले गांव का ही है, चलिए चलते हैं, आपके पास कोई बाहन तो होगा ही?’ ‘नहीं बाहन तो नहीं है, कोई टेम्पो ले लेंगे’। शशि ने उसे बताया कर्मचारी अस्पताल बन्द होने के बाद शशि को साथ लेकर उस मरीज के गांव के लिए निकला। मरीज का गांव रापटगंज से बहुत दूर नहीं था, आसानी से एक टेम्पो मिल गया, ढाई सौ रुपया किराया आने, जाने का तय हुआ, शशि को जानकारी जुटाने के लिए इतना तो करना ही था। शशि कर्मचारी के साथ थी। अब उसे क्या पता था कि कर्मचारी उसके होने की गन्ध में डूब जायेगा। कर्मचारी था कि शशि से सवाल दर सवाल किए जा रहा था। सवाल भी अगर एड्स के बाबत होते तो शशि को सन्देह न होता कि वह कर्मचारी के लिए देह में तब्दील होती जा रही है। पर सवाल तो रंगीन बदरियों वाले थे जिनसे शशि का दूर दूर तक नाता नहीं था। मतलब कहां की रहने वाली हैं? का पढ़ी हैं? कबसे एन.जी.ओ. में काम कर रही हैं? कितना वेतन मिलता है? रापटगंज में अकेली रहती हैं, या किसी के साथ।’ शशि ने कर्मचारी को बताया कि वह अकेली रहती है। अकेली रहती भी है जो पूरी तरह सच था। कर्मचारी उछल पड़ा जैसे किसी लड़की का अकेली रहना उसे कुछ दूसरा बनाता हो, चौंकते हुए उसने शशि से पूछा... ‘अकेली रहती हैं आप!’ उसकी आंखें अचरजांे से भर गईं ‘हां मैं अकेली रहती हूॅ’’, शशि को मजाक सूझा ‘अकेली नहीं रहना चाहिए नऽ’ ‘नहीं मेरा कहना यह नहीं है। मैं तो कह रहा था दिक्कतें होती हैं, जमाना बहुत खराब है, लोगों की आंखें अच्छा नहीं देखतीं, जाने कब लोग किस रूप में बदल जायें और..’ और क्या बलात्कार ही होगा नऽ या इससे भी कुछ अधिक, इससे भी अधिक कुछ होता है क्या? फिर पुरुष और कर ही क्या सकता है औरत के साथ? कोई कल्पना है क्या आपके दिमाग में, बता देते तो ठीक रहता’ कर्मचारी अस्पताल का था, जहां बातों में शाखायें निकालने के तमाम अवसर होते हैं। डाक्टरों के रसिया होने के बाबत किसे नहीं मालूम, देखने में सीधा सादा पर औरतों के मामलों में काफी मुखर। औरतें भी डाक्टरों की ओढ़ी सादगी पर झूमने वाली। यह बात अलग है कि सभी औरतें या डाक्टर तितलियों वाले मिजाज के नहीं होते। उन्हें अपनी मर्यादा की चिन्ता रहती है। कर्मचारी का काम भी उन्हीं मरीजों की देख, रेख करना था जो देहव्यापार से जुड़े होते थे और एड्स के शिकार थे। पर उनसे वह देह संबध तक नहीं जा सकता था, खतरा होता सावधानी बरतने के बाद भी, शक तो बना ही रहेगा फिर एड्स का मरीज सामान्य बीमारियों वाले मरीजों की तरह का तो होता नहीं, बिगड़ी हुई देह में कौतुक कहां? लहराती, इठलाती देह की बात ही दूसरी। कर्मचारी सामान्य सोच का जीव था। खुली औरतें अपनी देह की उपयोगिता में सामाजिक या कानूनी वर्जनाओं की चिन्ता नहीं करतीं.. वे देह की कथित वर्जनाओं से मुक्त अपनी इच्छाओं की मालिकिन होती हैं.. उनमें स्त्रैणता से अलग पुरुषों वाले मनोभाव होते हैं.. ‘का हो गया देह तो घिसती नहीं’ वैसे भी आज का समय देह और आत्मा के दर्शन का नहीं, का होगा तन को तपा कर?’ कर्मचारी को क्या पता था कि शशि उसे विचारों के झोंकों में बहा ले जायेगी, वह चकरा गया, लगा गिड़गिड़ाने.. कर्मचारी बलात्कार और सत्कार जानता था। औरतों के खाते में महज यही दोनों बातें होती हैं.. देवी हुई तो सत्कार, नहीं तो बलात्कार। वैसे सत्कार हमारे समाज में काफी प्रशंसित हैं और दिखावे के रूप में व्यवहृत भी। सत्कार के बाद भले ही बलात्कार हो, यह अलग बात है। जैसा कि सुना जाता है, पहले सत्कार फिर बलात्कार। बलात्कार के बाद क्या हो सकता है? उसे मालूम नहीं था। हजारों साल की हमारी सभ्यता ने बलात्कार के अपराध को अलग अलग ढंग से लिया है, औरतों के बाबत कुछ दूसरे मनोभाव और पुरुषों के बाबत कुछ दूसरे, अभी तक यह संभव नहीं हो सका है कि पुरुष मानसिक रूप से खुद को अपराधी स्वीकारे। दण्ड झेलना पड़ता है औरत को ही, बदनामी उसी के खाते मंे दर्ज होती है। कर्मचारी को अपने खोखले विचारों में डूबना था सो वह डूब गया बताता भी क्या? बलात्कार के आगे क्या हो सकता है, इस मामले में क्रूर वैचारिकों के पास भी विचार नहीं कि बलात्कार के आगे क्या? होता भी कुछ नहीं, बलात्कार घृणित मानसिक स्थिति है इससे अधिक कुछ भी नहीं.. इससे औरत की पवित्रता भला कैसे प्रभावित हो सकती है? कर्मचारी को क्या पता था कि सोच की बहुत बड़ी दुनिया होती है। उसने तो शशि को पारंपरिक ढंग से डरवाना चाहा था। जैसा कि सामान्यतया किया जाता है, डरवाने के बहाने घ्यान आकर्षित कराने की पुरानी परंपरा। कर्मचारी ने उक्त प्रंसंग को बदल दिया वैसे मरीज का गांव भी आ गया था। कुछ ही देर में शशि कर्मचारी के साथ मरीज के घर पर थी। गनीमत थी कि मरीज घर से कहीं बाहर नहीं गया था और देखने में मरीज जैसा भी नहीं दिख रहा था। कर्मचारी ने बताया कि इसका रोग अभी पहले चरण में है, उचित चिकित्सा से इसे बहुत लाभ मिलेगा, दस बीस साल तक जीवित रह सकता है। मरीज के व्यवहार की गंवई आत्मीयता देखने लायक थी। शशि तो देखती रह गई। मरीज के चेहरे पर एड्स जैसे भयानक रोग का आतंक नहीं था। वहां जीवन जीने की स्वाभाविक चपलता थी तथा आन्तरिक उत्साह भी। शशि मरीज से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी। मरीज ने शशि और कर्मचारी का भरपूर स्वागत सत्कार कर लेने के बाद पूछा.. ‘कैसे आना हुआ? कल तो मुझे अस्पताल आना ही था’ कर्मचारी ने आने का कारण संक्षिप्त में मरीज को बताया’ मरीज हसने लगा, हसते हुए ही बोला..‘क्या करिएगा यह सब जानकर, कुछ भी फर्क पड़ने वाला नहीं.. यह एक ऐसा कारोबार हो गया है, जिसे करने के लिए विशेष संसाधन की आवश्यकता नहीं होती। देह ही संसाधन और उसकी चपलता धन का निर्माण। कितना सरल है देह से रुपया बनाना। सभी जानते हैं इस रोग के बाबत फिर भी फैलता जा रहा है। अब मुझे ही क्या पता था कि मुझे क्या हुआ है? वह तो अगर बपई को खून न देना होता तो पता ही नहीं चलता। उसी दिन मालूम हुआ कि मैं एड्स में फस गया हूॅं, फिर दवाई शुरू हुई। जब से मुझे एड्स हुआ है, याद करने की कोशिश कर रहा हूॅ कि मुझे किस देह ने एड्स से जकड़ा। फिर भी याद नहीं आ रहा याद भी कैसे आयेगा? एक दो के साथ शारीरिक संबध होता तो याद आ जाता। रोग की जानकारी होते ही मैंने ढाबा का काम धाम बन्द कर उसे बेच दिया है। ढाबे का काम करते रहना अब मेरे लिए संभव नहीं, मैं ऐसा कर भी नहीं सकता, मैं सपने में भी नहीं सोच सकता कि मेरे कारण यह रोग किसी दूसरे को जकड़े। ढाबे को चलाना है तो थाली में केवल खाना ही नहीं, देह भी परोसनी होगी। डाक्टर साहब ने मुझसे ढेरों सवाल किया था इस रोग के बाबत। यह जानने के लिए कि मुझे यह रोग कहां से मिला, मैं क्या बताता कि सारी सावधानियां जो बताई जाती हैं उनका प्रयोग तो मैं करता ही रहा, फिर भी। एक दो बार ही ऐसा हुआ होगा कि निरोध फट गया होगा, लेकिन वह कहां और कब फटा याद आना संभव नहीं..।’ ‘ढाबे पर तो अक्सर ही ऐसा हो जाया करता था। लड़कियां या महिलायें आ जाया करती थीं ढाबे पर कमाई करने के लिए। उन्हें तीन चार सौ रुपये मिल जाया करते थे। इतना रुपया कमाने के लिए वे कौन काम करतीं, खंचिया ढोतीं या फावड़ा चलाती तो का मिलता? दो जून का खाना भी तो नहीं। कम नहीं होते तीन चार सौ रुपये, घंटे आधे घंटे में इतना रुपया कमा लेना, वह भी देह की अंतरंग गुदगुदियों के द्वारा, यह उनके लिए फायदे की बात थी। कभी कभी तो कोई लड़की अजीब कहानी बयान करती, सुन कर मुझे हसी आती। दुबारा जब मैं उस आदमी को ढाबे पर देखता तब उसे देखता ही रह जाता और सोचता काहे के लिए इतना रुपया लड़कियों पर फूंकता है। लकड़ी भी तो बिना जलाए नहीं जला करती, केवल सुंसुआती हैं, फूंकना पड़ता है। हवा तेज हुई तो वाह वाह, नहीं तो धुआं ही धुआ..। धुआयीं लड़की मशीन की तरह निर्जीव हो जाती है। उतनी बचत ढाबे से मुझे नहीं होती थी, जितनी की लड़कियों वाले रोजगार से। कभी कभी तो मुझे लगता था कि लड़की को मिले रुपयों में से कुछ काट लूं, कमीशन के रूप में पर मेरी आत्मा कांप कांप जाती थी। यह क्या कम है कि लड़िकयां मेरे साथ सोने और होने में खुशी महसूसती थीं..।’ शशि को समझने में देर नहीं लगी कि मरीज अपनी कहानी में उतर गया है, कहानी में आगे जाने पर बहुत देर हो जायेगी, मरीज को रोकना चाहिए। शशि ने मरीज को रोका... ‘भाई साहब! मुझे इस तरह के काम करने व कराने वालियों के नाम पते चाहिए ताकि मैं उनसे मिल सकूं और उनके बारे में जानकारी जुटा सकू.. आप मेरा विश्वाश कीजिए, उनके नाम पता का गलत प्रयोग नहीं होगा। कृपया मुझे उसकी जानकारी दीजिए। इसी काम के लिए हमलोग आपके पास आये हुए हैं’ ‘वह जानकारी तो आप को मिल जायेगी पर क्या आप वहां तक पहुंच पायेंगी?’ मरीज ने उपेक्षात्मक सवाल किया हां हां उसमें क्या परेशानी है, मैं तो कहीं भी आ जा सकती हूॅं’ शशि ने बेबाक बताया। मरीज कम नहीं था.... उसने जोड़ा... ‘आने जाने की बात नहीं है मैडम! बात दूसरी है, और यही दूसरी बात इस रोग का कारण बनती है।’ मरीज ने शशि को बताया।’ ‘दूसरी बात क्या हो सकती है, यह मुझे पता है और मैं उसके लिए तैयार हूॅं, वह तो कहीं भी संभव है, नर, नारी के रिश्तों में यह दूसरी बात तो हर जगह और हर समय मुंह बाये खड़ी है। उसके बारे में काहे की चिन्ता? मुझे सेक्सवर्करों के बारे में जानकारी जुटाना है, वह भी एड्स होने वाले कारणों के अध्ययन के लिए, उनके साथ रहवास नहीं,’ शशि ने दूसरी बात का स्पष्टीकरण दिया। ‘कोई बात नहीं आप बतायें तो, आगे जो होगा देखा जायेगा’ मरीज किसी सधे खिलाड़ी की तरह दूसरी बात की ओर मुड़ा.. ‘तो आप जानना ही चाहती हैं, फिर मुझे बताने में क्या परेशानी। उसने जो बताया शशि के लिए असुना था हालांकि कुछ पत्रिकाओं में उसने पढ़ा था कि देह बेचने का धंधा सभ्य कहे जाने वाले बड़े घरों की लड़कियां व महिलायें भी करती हैं पर केवल उसने पढ़ा ही था, किसी से मिली नहीं थी, अब मिलने का मौका भी मिल सकता है। ‘आप उन लड़कियों से तो मिल सकती हैं जो गरीबी के कारण इस तरह का काम करती हैं पर उनसे नहीं मिल सकतीं जो ऐय्याशी के कारण ऐसा करती हैं, और काफी संपन्न हैं.. उनमें से एक दो को जानता हूॅं पर वहां तक मेरी पहुंच नहीं.. कहां कहां देखेंगी आप, जिले का कोई कोना इस काम से अलग नहीं.. शक्तिनगर से लेकर बनारस तक, ढाबों के आसपास के गावों में इस तरह का काम करने वाली लड़कियां या औरतें हर ओर बिखरी हुई हैं..एक जगह नहीं, अलग अलग ठिकानों पर। उनकी जानकारी जुटाने के लिए कम से कम दो चार दिन का समय देना ही होगा आपको।’ ‘एक दो लड़कियों के गांवों के नाम तो बतायें, पूरा सोनभद्र मेरा देखा हुआ है, मेरे पास कई कार्यकर्ता हैं जो गांवों के नाम मालूम होने पर सारा कुछ पता कर लेंगे। जानकारी जुटाने की चिन्ता मेरी है, इसे अपने ऊपर न लीजिए, यह आपकी चिन्ता नहीं’ शशि ने मरीज को अपने लक्ष्य की ओर मोड़ा फिर मरीज ने शशि को लड़कियों एवं उनके गांवों के नाम नोट करा दिए। लड़कियों एवं गांवों के नाम ही तो चाहिए थे शशि को, शशि गांवों का नाम नोट करने के बाद मरीज के गांव से लौट आयी। लौटने के बाद वह आराम महसूस रही थी, अब तो मंत्री जी को बहुत कुछ बताया जा सकता है। रापटगंज आने के बाद यदि वह कर्मचारी को उसके घर पर टेम्पो से नहीं उतारती तो वह उसके कमरे पर आता। वह रास्ते में उतरना नहीं चाहता था, चाहता था कि शशि का कमरा देखे। शशि को तो काम से काम था उसे कर्मचारी से क्या लेना देना था। वह ऐसे दिलफेंकुओं को जाने कब से देख और परख रही है, बात हुई नहीं कि लट्टू हो गये। शशि जानती है कि औरत की देह, अचरज भरी देहलीला का चालू प्रस्ताव होती है। पागल घोडों के दौड़ने के लिए किसी मैदान जैसी। चाहे जहां से दौड़ शुरू कर दो कोई रोकने टोकने वाला नहीं.. बचपन से ही वह ऐसा देख रही है, हर जगह ऐसा ही है, कहीं भी औरत के लिए मर्यादा की जगह नहीं.। वह घिन करती है मर्दों की इस प्रवृŸिा से, पर करे क्या? काम के दौरान उसे मर्दों के साथ होना ही पड़ता है। औरतें सभी जगह पर तो होती नहीं, अधिकांश जगहों पर तो मर्द ही होते हैं.. अब तो वह उन तरीकों को भी जान गई है जिससे मर्दों का कान पकड़ कर सालों घुमाया जा सकता है, रेस के घोड़ों की तरह। पहले रेस तो जीतो फिर इनाम, रेस जीतना आसान तो नहीं.. मन मारकर कर्मचारी अपने आवास पर टेम्पों से उतर गया पर वह उतरना नहीं चाहता था। उतरना भी क्यों चाहता? वह तो शशि में वह सब देख रहा था जो किसी को आकर्षित करने के लिए जरूरी होता है। एक नौजवान और खुली खुली सी लड़की, दिलफेंक और आकर्षक, कर्मचारी को यही सब तो चाहिए था, अनायास ही पास में आया हुआ। उसे अफसोस हुआ कि उसने जल्दीबाजी में मरीज से लड़की को मिलवाने का निर्णय लेकर अच्छा नहीं किया। उसे लड़की से चार छह चक्कर लगवाना चाहिए था, पर वह गलती कर चुका था, उसे अपने घर पर टेम्पो से उतरते समय दुख हुआ, उसने लड़की को अपशब्द कहा... ‘साली छिनार है, केवल मुस्कियाने वाली, मुस्कराकर सारा कुछ छीन लेने वाली, खैर कोई बात नहीं, जब एड्स पर काम कर रही है फिर बच कर कहां जायेगी? किसी न किसी दिन तो उसे मेरी चंगुल में आना ही होगा।’ गद्य कविता
दूसरे दिन मैं शशि के आवास पर था, उसे फोन से पहले ही बता दिया था कि मैं आ रहा हूॅ.. शशि को कहीं काम से निकलना भी नहीं था। सर्वेयरों की रिपोर्ट आ जाने के बाद ही उसका काम शुरू होता, कार्यकर्ताओं की मीटिंग होती, सेमिनार होता, फिर अगली रणनीति बनाई जाती कि क्या, क्या कदम उठाने होंगे जिससे एड्स जैसी समस्या को किसी स्तर तक रोका जा सके और इस भयानक बीमारी के रोकथाम के लिए जागरूकता लाई जा सके। ये सब संस्था की अपनी प्रायोजित गतिविधियां हैं जो लगातार चलती रहती हैं। शशि संस्था की प्रशासनिक और वौद्धिक गतिविधियों के बारे में जरूरत से अधिक नहीं सोचती। सोचने, गुनने से लाभ भी कुछ नहीं, होगा वही जिसे संस्था का मुखिया निश्चित करेगा। वह संस्था में कुछ कमाई और अपने जीवन निर्वाह के लिए ही काम करती है तथा जानती है कि बात को बतंगड़ बना कर संस्था के मुखिया, कार्यकताओं को निकाल दिया करते हैं। जाने कितने बेचारे निकाले भी चुके हैं। पर उसका संस्था प्रमुख इस स्वभाव का नहीं जान पड़ता। अपने में गोता लगाने व मुस्कराने वाला आदमी भी नहीं जान पड़ता है। उसके भीतर छिपा आदमी काफी सक्रिय है और सचेत भी। मेरे आवाज देने पर शशि ने दरवाजा खोला। मुझे जान पड़ा कि उसके चेहरे पर उसकी स्वाभाविक चमक नहीं है, लगता था कि वह नींद में ही थी संभव है रात में नींद ही नहीं आयी हो, नींद भी तो सहज नहीं होती, जब चाहो उतार लो आंखों में और डूब जाओ या बेसुध होकर दिन में ही सो गई हो। आखिर कितना जागती? कुछ भी संभव था। ‘कल बनारस गये थे का’ उसने अतिरिक्त कोमलता से मुझसे पूछा... ‘हां बनारस गया था किताब का काम था’ मैंने भी उसकी कोमलता की नकल की। ‘काम हो गया’ उसने जानना चाहा ‘नहीं आसान नहीं होता किताब का काम, कई कई चक्कर लगाने पड़ते हैं, कभी प्रूफ देखना होता है, कभी कवर फिर कागज, छपाई और अंत में बाइन्डिंग भी। किताबंे छप जाने के बाद उन्हें नामधारियों को भेजो, समीक्षा वगैरह के लिए प्रार्थनायें करो, किताब का काम अनवरत चलने वाला काम होता है। किसी अ्रप्रत्याशित आशावाद के कारण लेखक अपनी रचनाओं में आजीवन डूबा रहता है। इस कामना के साथ कि शायद उसका कुछ लिखा हुआ जनता की खामोश जुबान पर चढ़ जाये। किसी किसी को सफलता भी मिल जाती है। लेखक के लिए पाने लायक सिर्फ एक ही चीज होती है कि उसका लिखा हुआ जनता की जुबान पर थिरकने लगे। इसे हासिल कर पाना उतना ही असंभव है जितना कि ईश्वर को पाना, उसे देखना। मैंने शशि को बहुत ही भोलेपन से बताया। यह मानते हुए कि उसके दिमाग में चर्चित या प्रचार प्रसार पाये लेखकों की तस्वीर होगी, हमारे मुल्क में नामधारियों की कमी नहीं पर उसे लेखकों के बारे में कुछ भी पता नहीं था। वह तो कुछ उन लेखकों के बारे में ही जानती थी, जो कोर्स की किताबों में थे। उनके अलावा वह आज के एक भी ऐसे लेखक के बारे में नहीं जानती थी जिनके नाम से हिन्दी साहित्य कांपा करता है। जान पड़ता है कि ये लेखक नहीं रहेंगे तो निश्चित ही हिन्दी साहित्य को डूब मरने के लिए चुल्लू भर पानी भी नहीं मिलेगा, माचिस की तीलियां तो दूर की बात है। शशि ने मेरी बातें सुन कर अचरज ओढ़ लिया.. ‘तो इतनी परेशानी होती है, बहुत ही झंझट का काम है किताब लिखना व छपवाना, फिर इस काम से लाभ क्या है, कुछ फायदा तो होगा नऽ’ उसने पूछा... यह सवाल मेरे लिए काफी दिक्कत वाला था, इसका उचित उŸार मुझे आज तक नहीं सूझा। उŸार क्या हो सकता है, इस सवाल का? क्या है लाभ, क्या है हानि? यह जो अर्थशास्त्र का कीड़ा है लाभ, हानि, और अतिरिक्त लाभ वाला, सभी के जेहन में क्यों कुलबुलाता रहता है? मैंने बहुत ही सहजता से शशि का चेहरा देखा, शायद उसके चेहरे पर अर्थशास्त्र की कोई परिभाषा चिपकी हुई हो या आज की आर्थिक मन्दी ही उस पर काबिज हो। अगर ये दोनों बातें वहां नहीं हैं फिर तो वहां बाजार का कोई स्टाल अवश्य ही होगा। मुझे अचरज हुआ शशि के चेहरे से सरकारी अर्थशास्त्र ही नहीं, मन्दी और बाजार भी गायब थे। हो सकता है विलुप्त रहे हों और मुझे दीख न रहे हों.. सच कुछ भी हो सकता है। सच का क्या है, एक तरफ से देखो तो झूठ जैसा, दूसरी तरफ से देखो तो सच जैसा। इस बहुरुपिए को जान लेना आसान नहीं.. इसे तो कोई सŸााप्रमुख ही जान सकता है तथा अपने जाने हुए को प्रमाणित भी कर सकता है। मैंने शशि को बताया क्योंकि बताना आवश्यक था, हालांकि मेरे बताने में मेरा अदृश्य अहम था, जो सच भी था। ‘देखो शशि! क्या होता है लाभ, और क्या होती है हानि, मुझे नहीं मालूम, मैं सिर्फ इतना जानता हूॅं कि जो मेरे लिए रुचिकर और आनन्द दायक है केवल वही करना है, इसके साथ यह भी चुन व गुन लेता हूॅं कि ऐसा काम नहीं करना जिससे मेरी आजादी का कोई भी कोना किसी बाड़े में कैद हो जाये। मेरे लिए आदमी होना तथा आदमियत सुरक्षित बचाए रखने का काम सबसे अनिवार्य काम रहा है। अगर लाभ, हानि के प्रचलित अर्थों को जानना चाहती हो तो उसका एक ही उŸार है कि एक भी छदाम का लाभ नहीं होता। खेती किसानी की कमाई भी इसमें स्वाहा हो जाती है।’ शशि मेरा उŸार सुन कर कहीं खो गई, वह अचरज पीने लगी कि क्या कोई ऐसा भी हो सकता है, जो लाभ हानि को ठेंगा दिखा दे, या यह बकवास है, सन्यासी बनने का सरल उपाय, वह कुछ भी सोच सकती है। वह क्या सोच रही थी, इसे वही बता सकती है पर मेरे देखने में था कि वह अचरज में थी। मेरा उŸार सुन कर उसने कहा..। ‘फिर इस काम से क्या लाभ जो खानखर्च भी न जुटा सके, ऊपर से दिन रात की मेहनत। मैं समझती हूॅं यह काम खुद को कूंए में डुबोने वाला है, इससे तो अच्छा होता कहीं पढ़ाने, लिखाने का ही काम कर लेते, कम से कम खानखर्च तो चल जाता। लगता है लिखना आपका शौक है। वैसे भी आपको कोई आर्थिक परेशानी नहीं, घर से आप ठीक हैं पर यह सब हमलोग कहां लेकर बैठ गये?’ किसी के घर जाओ तो वहां औपचारिकताएं पहले ही पहुंच जाती हैं, यह करना है, वह करना है, चाय पिलानी है, मिठाई खिलानी है। तमाम तरह की बातें, ऐसा करने में काफी समय खिंच गया फिर हमलोग विषय पर आये जिसके लिए शशि मेरे घर आयी थी। मुझसे बात करने का विषय केवल शशि के लिए ही नहीं किसी के लिए भी आवश्यक होता, चाहे जिसके साथ इस तरह के विषय चिपक जायें या चिपका दिए जायें। मुझे शशि के आवास पर काफी समय तक रुकना पड़ गया, रुकना तो था ही इस लिए नहीं कि मैं शशि में छिपी हुई कहानी तलाश रहा था। कहानी तो हर किसी में होती है, कहानी ही नहीं कविता भी। कभी कभी तो किसी को गीत की तरह गाया बजाया जा सकता हैं कुछ ऐसी प्रतिभा के भी होते हैं.. बहरहाल मैं ऐसे किसी को नहीं जानता जिसे गीत की मधुरता और लय की मादकता के साथ गाया जा सके, हां ऐसे ढेर सारे लोग मेरी जानकारी में हैं जिन्हें मैं धूमिल की गद्य कविता की तरह पढ़ सकता हूॅं, गुन सकता हूॅं और जादुई तरीके से उनके कथाचरित्र को बुन सकता हूॅ। शशि ठीक ठाक दिख रही थी पर उसके चेहरे से जंगल की यात्रा वाली चमक गायब थी। कहां उस दिन की शशि और कहां आज की शशि। मुझे जान पड़ा कि वह परेशान है। फिर मैंने उससे पूछा.. ‘कुछ परेशान सी दिख रही हो, क्या बात है, कोई दिक्क्त है क्या?’ मेरा मानना है कि परेशान आदमी के लिए प्यार भरे दो आखर दवाई का काम करते हैं, पर मैं तभी कुछ बोल पाता जब वह कुछ बताती। वह तो खामोश थी, हालांकि शशि एक सुलझी हुई महिला है वह अपनी उलझनों को स्वतः हल कर सकती है। उलझनों में तो वे ही उलझते हैं जिन्हें जीवन जीने की कला ही नहीं आती। वे जो दूसरों की संवेदनाओं, धारणाओं, अनुभूतियों का सम्मान करना जानते हैं, अगर वे उलझें तो यह अचरज है। शशि खामोश थी, फिर घीरे से बोली... कोई बात नहीं है बात तो थी ही, वह शायद बताना न चाह रही हो.. यही हो सकता है। मैंने दुबारा शशि से साफ,साफ पूछा.. ‘बताओ नऽ क्या बात है? तुम अपनी बातें मुझसे साझा कर सकती हो, संभव है मैं कुछ कर सकूं तुम्हारे लिए। फिर शशि ने मुझसे कुछ छिपाया नहीं, हालांकि वह छिपा सकती थी तथा दूसरे किस्म के कारणों को गिना सकती थी। औरतों के साथ वैसे भी तमाम कारण आगे पीछे दौड़ते रहते हैं, मारपीट, यातना, उत्पीड़न ये सब तो चर्चित कारण हैं ही पर इससे भी अलग कारण हो सकते हैं, मुझे नहीं मालूम था। शशि का बताया हुआ मुझे उद्वेलित कर गया। क्या पढ़ा लिखा संभ्रान्त पति, इतना गिर सकता है? अपनी पत्नी को ही दूसरे के सामने परोस सकता है। कथित स्वर्ग बनाने की लालसा में देह को खिलौना बना सकता है, पत्नी की देह पर पति का कैसा हक? देह को मशीन में., बदल देना, यह वृŸिा है या प्रवृŸिा है? इतना घिनौना काम। कोई भले अपने तन के ताप को प्रतापी बनाये चाहे जो करे पर पत्नी के तन को.. यह क्या है? मेरी समझ से बाहर था। शशि की बातें सुन कर मैं खुद बौना हो गया। तो यह है पुरुष का पति वाला रूप, जाने शशि मेरे बारे में क्या सोच रही हो, मैं भी तो पुरुष ही हूॅ। वह कुछ भी सोच सकती है, वैसे भी पुरुषों ने औरतों को दिया ही क्या है और वे दे भी क्या सकते हैं.. क्या होता ही है पुरुषों के पास देने लायक, सिवाय लेने के। हमारी सभ्यता के पास इस तरह के सवालों के उŸार नहीं, वर्ण, जाति, गोत्र जैसे दूसरे सवालों की तरह, औरत भी अनुŸारित सवाल ही तो है। विवाह की कथित पवित्रता के बारे में मैं शशि को क्या समझाता? कैसे समझाता कि परिवार, परिवार होता है, और पति तो पति होता ही है, पति से अलग औरत अधूरी होती है तथा कई तरह के जायज नाजायज सवालों के घेरे में भी। उसके सामने हर तरफ विषैले सवाल फन फैलाए रहते हैं.. तुम्हें शान्त मन से मनन करना चाहिए, और चिŸा को व्यवहारिक चिन्तन के द्वारा चेतन बनाना चाहिए। एक मात्र तुम ही वह माध्यम हो जो अपने पति को पतित होने से बचा सकती हो, पति को बचा लेना, उसे तन के विपथगामी तनावों से बाहर निकाल लेना, खुद को भी बचाना है। फिर यह जो बेचैन मन है उसे चमन बनने में तनिक भी देर नहीं लगेगी? मन में तो प्राकृतिक रूप से मनचाहा चमन उगा ही रहता है, खिला हुआ। यह सब सुभाषित शशि को मैं कैसे समझाता, मेरी तो बोल ही छिन गई थी, मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था कि शशि से क्या बोलूं, उसे कैसे समझाऊं। उस समय शशि कहीं खोई हुई थी, उसे खोना ही था। वह जो हो चुका है, और जो होना है, उसे खंगालने में थी। मेरी खामोशी पढ़ कर वह खुद बोलने लगी.. ‘अब आपसे क्या छिपाना, मैंने पति को समझाने का प्रयास किया पर वह तो देह की मादकता का कीड़ा निकला, वह देह की मादकता से बाहर नहीं निकल सकता। यह सच है किसी को भी पतित होने से नहीं बचाया जा सकता अगर वह खुद न बचना चाहे। बचाया उसे जाता है, जो बचा हुआ हो, खत्म न हुआ हो या कम से कम बच जाने का आकांक्षी हो। उसमें ऐसी इच्छाशक्ति ही नहीं, वह जो कुछ भी कर रहा है, चिŸा को चेतन और जागृत करके ही, वह मन की उच्छश्रृंखलताओं को मन की प्रफुल्लतांए समझता है। और उसी में गोता लगाता रहता है। उसके लिए तो केवल तन है और तन की उन्मुक्त तान है। सभी जानते हैं कि निरंकुश मन, मन नहीं होता। ऐसे आदमी को क्या बचाना, उससे खुद को बचा लेना ही बड़ी बात होगी। मैं यही चाहती हूॅं कि खुद को बचा लंू। मैं जानती हूॅं, मन को मना लेना ठीक, पर तन को मनाना बहुत ही कठिन, मेरे पास भी तन है, इसे तनेन होने में आखिर कितनी देर लगेगी? वह भी आज के माहौल में, जहां हर ओर मन से अलग तन की तिजारत हो रही हो। मैं तन को जतन से सहेज कर और मन को मना कर जीवन जीने में विश्वास करती हूॅ.’ शशि की तर्क पूर्ण बातें किसी गंभीर गद्य कविता की तरह मुझसे सवाल पूछने लगीं क्या शशि को पुनसर््थापित कराया जा सकता है? फिलहाल तो एक ही उŸार था कि नहीं, शशि अपने फैसले से डिगने वाली नहीं। पति के बारे में जान जाने के बाद शशि ने ससुराल छोड़ दिया, मायके चली आयी। पति के बारे में मायके वालों को बताया... मायके वाले तो चेतनाशून्य हो गये.. हो क्या रहा है आज के समय में, क्या आदमी इतना गिर सकता है... शशि की मॉ ने उसे समझाया कि तलाक ले लो और दूसरी शादी... शशि जानती है कि उसकी मॉ पूजा,पाठ वाली हैं, उन्हें पता है कि एक लड़की अपना जीवन अकेली नहीं गुजार सकती। मॉ के लिए शादी का मतलब जनम, जनम का बंधन है, मॉ ही नहीं उसके पिता भी यही मानते हैं पर बंधन दोनों तरफ से है केवल पत्नी की तरफ से ही नहीं. सो मॉ ने साफ साफ बोल दिया कि तलाक ले लो, यही अच्छा होगा.. जाने क्या है कि तलाक का नाम सुनते ही शशि कांप, कांप गयी. मॉ के कहने पर भी उसने न तो हॉ कहा और न ही ना. शशि के मन में कहीं न कहीं विवाह वाला बंधन नैतिकरूप से असरदार बना हुआ था, हालांकि शशि पढ़ी लिखी थी फिर भी... शशि मॉ को कैसे बताती कि वह दूसरी शादी नहीं कर सकती, फिर शादी की जरूरत भी क्या है? वह देह को तपा लेगी, मन को मना लेगी पर खुद को मिटा नहीं सकती। एक शादी में तो ऐसा हुआ, दूसरी में जाने क्या हो, कहीं दूसरा इससे भी आगे निकल गया तो... वह भी तो उसे कामाध्यात्म के प्रयागों का उपकरण बना सकता है. वह भी अंधकार तथा प्रकाश के खेल का खिलाड़ी नहीं होगा कौन बता सकता है?... अगर ऐसा हुआ फिर वह क्या करेगी, कैसे छोड़ेगी उसे, लोग क्या कहेंगे?पहले वाला तो गन्दा था तो क्या दूसरा भी गन्दा था। नहीं शाशि ही ऐसी, तो वैसी। शशि सोच नहीं सकती कि ऐसी, वैसी बन कर उसे समाज में रहना है, वह जैसी है वैसी ही बन कर रहना चाहती है। अपनी अस्मिता बचाने के लिए उसे चाहे जितना संघर्ष करना पड़े, वह करेगी। वह जानती है अपने बारे में कि वह उत्पादन वस्तु तथा उपभोक्ता वस्तु नहीं है, उसे कोई भी वस्तु की तरह कहीं परोस नहीं सकता। जीवन भर उसे मर्दों के कमीनेपन से लड़ते रहना होगा, नहीं लड़ना होता तो वह पतिव्रता का पोस्टर अपनी देह पर चिपका कर पति के पैरों पर गिर जाती पर नहीं उसने तो पति को ललकार दिया था। ‘समझ लो कि मैं खिलौना नहीं हूॅू। चाहे जब और जैसे खेलो और दूसरे को खेलने दो। उसने पति को जोरदार ढंग से बेड के किनारे धकेल दिया और चीखते हुए दुबारा कहा... ‘अच्छा होगा कि रुक जाओ और खुद को नियंत्रित कर लो, तुम सिर्फ और सिर्फ एक यंत्रमानव हो और तुम्हें उसी तरह रहना भी चाहिए। तुम्हें आज से यह बात गांठ बांध लेनी होगी कि शशि यंत्रमानव नहीं है, वह सोचती है और सोच सकती है कि उसे क्या करना चाहिए।’ ‘मैं अच्छी तरह से समझती हूॅं कि तुम्हारे लिए रिश्ते की पवित्रता का कोई अर्थ नहीं..यदि तुम सोचो कि मैं तुम्हारे घर में हूॅं, मजबूर हूॅू इसलिए तुम मेरे मन एवं तन के साथ मनमानी कर सकते हो तथा किसी से करवा सकते हो, तो ऐसा कभी नहीं सोचना। मैं अपनी सुरक्षा करना जानती हूॅ. आखिरी बार मैं तुमसे कह रही हूॅं कि मेरे कमरे से अभी और इसी समय निकल जाओ बिना देर किए, मैं तुम्हें अपने कमरे से बाहर देखना चाहती हूॅं.. पति तो पति होता है स्वअर्जित अधिकारों का अधिकारी, वह कहां मानने वाला था? ताकत के आदिम फैसले वाली क्षमता के साथ वह उठा और शशि को जकड़ लिया पर शशि सावधान थी। उसने अपना बचाव करते हुए उसे दो तीन स्थानों पर काट लिया। काटते ही वह उसकी जकड़ से बाहर निकल गई। वह चीखने लगा। घर में हड़कंप मच गया, ऐसा हड़कंप जो मुहल्ले वालों की नींद उखाड़ दे। उसी रात शशि ने ससुराल छोड़ दिया, मायके आ गयी।
मुखिया
तर्क के खेल से बाहर निकल कर हमें वास्तविक जीवन के खेल में शामिल होना था और हमारा जीवन कहां से शुरू हुआ है, कहां तक जाकर समाप्त होगा, न शशि को कुछ मालूम, न ही मुझे, हां आभासों के सहारे जैसे सभी वैसे हम भी, समय के अनुमानों एवं संभावनाओं के साथ चल रहे हैं। शशि मेरे घर काम से आयी थी। वह रापटगंज मुख्यालय पर एक सेमिनार कराना चाह रही थी, उसकी अध्यक्षता के लिए उसने जिलाधिकारी जी का नाम चुना था। यह पूरा काम जोगाड़ का था, शशि रापटगंज के लिए नई थी। हालांकि उसके पास कार्यकर्ता थे, जो मीटिंग करा सकते थे। पर डी.एम. साहब को अध्यक्षता के लिए बुला पाना उनके वश का नहीं था। डी.एम. केवल और केवल डी.एम. होता है इसके अलावा जो होता है, वह तो उसे भी नहीं पता। डी.एम. को किसी एन.जी.ओ के सेमिनार में बुलाना आसान नहीं.. कुछ अधिकारी एन.जी.ओ को सरकार विरोधी तो कुछ कमाने खाने वाली संस्था के रूप में समझते हैं सो उसके किसी कार्यक्रम में जाना नहीं चाहते। शशि भी जानती थी कि डी.एम. से व्यक्तिगत जान पहचान के द्वारा ही मीटिंग की अध्यक्षता के लिए उनकी सहमति ली जा सकती है सो वह मेरे पास आयी थी, शायद मैं डी.एम. की सहमति हासिल कर लंू। उसने बताया भी कि एड्स जागरूकता के लिए जो मीटिंग प्रस्तावित है जिसे डी.एम. साहब के अनुसार आगे, पीछे भी किया जा सकता है, इसी बीच उनसे बात चीत कर लेना चाहिए। मेरी व्यक्तिगत जान पहचान डी.एम. से नहीं थी, केवल एक दो बार सामान्य प्रार्थी की तरह मुलाकात है। एक दो बार की मुलाकात, वह भी जिले के आला अधिकारी से बतौर प्रार्थी, जिस मुलाकात का कोई अर्थ नहीं हुआ करता। मेरे जैसे सैकड़ों लोग हैं, जो ऐसे अधिकारियों से अपनी अपनी फरियाद लेकर मिलते रहते हैं.. लोगों को पहचानना और पहचान को याद रखना अधिकारियों के लिए कŸाई संभव नहीं.. मैं इतना जानता था कि हमारे डी.एम. साहब बहुत सरल हैं, मिलनसार हैं.. सोनभद्र में आते ही उन्होंने मिलने वाली पर्ची गायब कर दिया। कोई भी उनसे बिना पर्ची के मिल सकता है नहीं तो पहले पता लिखा पर्ची देना पड़ता था। डी.एम. के दफ्तर का कर्मचारी सारी पर्चियां उनके मेज पर रख दिया करता था फिर वे बारी बारी से लोगों से मिला करते थे। मौजूदा डी.एम. साहब द्वारा पर्ची की अंग्रेजी परंपरा को समाप्त करवाने की सर्वत्र प्रशंसा हो रही है। मैं भी उनके प्रशंसकों में हूॅ। पर एक बात मैं नहीं समझ पाता कि क्या डी.एम., अधिकारी वाले मनोरोग से परिवर्तित होकर जनता का आदमी बन सकता है? जनता का आदमी बनाने के लिए हमारी सरकारें इच्छाशक्ति रखती हैं क्या? मुझे तो जान पड़ता है कि अगर डी.एम. जनता का आदमी बनना चाहे और बन जाये तो उसे सरकारें, पद पर बने रहने नहीं देंगी। इसी लिए इस तरह के अधिकारी जनता से मधुर रिश्ता नहीं बनाना चाहते। दूरी बना कर चलते हैं.. कुछ बड़े अधिकारियों ने तो सरकार की इस यांत्रिकता से खिन्न और परेशान हो कर पद से त्याग पत्र भी दे दिया है और आज वे जनता के बीच में जनता की तरह रहते हुए काम कर रहे हैं.. उनके दुखों, सुखों एवं उनकी जनतांत्रिक लड़ाई के साथ। ‘डी.एम. साहब को बुलाया जा सकता है, वे आ भी सकते हैं, नहीं भी आ सकते, फिर बात कर लेने में का हर्ज है? उ.प्र. की नई सरकार के आदेश के मुताबिक जिले के आला अधिकारी अब दिन में बारह बजे तक अपने अपने कार्यालयों में नियमित रूप से बैठने लगे हैं.. डी.एम. साहब से आज ही मिल लेना ठीक होगा। अगर वे मीटिंग में आना स्वीकार कर लेते हैं तब किसी दूसरे से काहे के लिए बात करना नहीं तो किसी दूसरे अधिकारी को राजी करना होगा। करीब बारह बजे तक मैं शशि के साथ डी.एम. कार्यालय पर था। संयोग ठीक था कि डी.एम. साहब कार्यालय में थे और मनरेगा के कार्यों की समीक्षा कर रहे थे। मनरेगा के कार्यों के बारे में हाल के दिनों में अखबारों में तमाम शिकायतें प्रकाशित हुईं थीं.. शिकायतों की चर्चा जनता में भी थी, केवल आन्दोलन और धरना प्रदर्शन उस बाबत नहीं हो रहे थे। यह प्रशासन के लिए अच्छी बात थी। जिले में एक खबर यह भी थी कि कोई जांच टीम दिल्ली से भी आयी थी और उसने कई अनियमितताओं को पकड़ा है। जांच टीम ने करीब डेढ़ सौ करोड़ रुपयों के घोटाले को उजागर किया है तथा बताया है कि पचासों चेक डेम कागज पर बनाए गये हैं, तत्संबधी भुगतान भी असंवैधानिक तरीके से कर दिये गये हैं। मैं शशि के साथ डी.एम. साहब के स्टेनो के कक्ष में बैठा हुआ था, कलक्टरी में वह एक ऐसा स्थान है जहां बैठने से महसूस होता है कि देह में रूतबे का खून दौड़ रहा है। डी.एम. साहब के स्टेनो एक खुशमिजाज आदमी हैं.. हालांकि गंभीर भी बहुत हैं, खुशमिजाजी और गंभीरता दोनांे का संयोजन एक ही आदमी में कम देखने को मिलता है। फिर भी वे हैं.. यह प्रकृतिक उपहार मिला हुआ है, स्टेनो साहब को। स्टेनो साहब ने हमें आश्वस्त किया कि मनरेगा की मीटिंग के बाद वे हम दोनों को डी.एम. साहब से मिलवा देंगे। सो हम प्रतीक्षा कर रहे थे कि जल्दी से मीटिंग समाप्त हो और हम डी.एम. साहब से मिल लें.. करीब एक बजे के आस पास खबर मिली कि मीटिंग समाप्त हो गई है फिर स्टेनो साहब ने हम लोगों को डी.एम. साहब से मिलने के लिए कहा.. थोड़ी ही देर में हम लोग डी.एम. साहब के भव्य कार्यालय में थे, जो हाल ही में बन कर तैयार हुआ था। जनपद बन जाने के बाद सोनभद्र की कलक्टरी नई बनी है, जो देखने में अद्भुत है, महसूस होता है कि रुपयों की चमक अगर दिवारों पर चिपक जाये तो दिवारें भी बोलने लगती हैं.. वहां का माहौल गुदगुदाने लगता है। कुछ देर के लिए ही सही, भूख का पता नहीं चलता। कितनाहूॅ भूख हो, वह गुदगुदी और हसी के बीच झूल जाती है। फिर तो वहां पहुंचने वाला होते हुए भी नहीं होता है। मानव सभ्यता को नियंत्रित करने वाले जालों में उलझा हुआ पाता है किसी मछली माफिक छटपटाता हुआ, कर भी क्या सकता है? नये डी.एम. साहब के बारे में जोरदार चर्चा हैं कि वे लोकप्रियता के हर रेशे को गूंथ कर रखना चाहते हैं.. फिलहाल कहीं से पता नहीं चल रहा है कि डी.एम. साहब जनहित में जो कर सकते हैं, नहीं कर रहे हैं.. यह तो उन्हें ही पता होगा कि सरकारें उनसे क्या क्या करवा सकती हैं तथा उनकी प्राकृतिक प्रतिभा को कितना जनहितकारी बना रही हैं.. बहरहाल मैं शशि के साथ डी.एम. साहब के विशाल कक्ष में था। वहां दस से ऊपर लोग बैठे हुए थे। साफ दिख रहा था कि प्रार्थनाओं के कोमल व बारीक अक्षर किसी पवित्र नदी में से नहा कर निकले हुए उनके चेहरों पर चिपके हुए हैं.. वही अक्षर हम दोनों के चेहरों पर भी थे। डी.एम. साहब बारी बारी से मिल रहे थे। एक आदमी उनके सामने जाता और अपनी गरज कहता। वे उसके प्रार्थना पत्र पर कुछ लिखते फिर वह उन्हें सलाम बजाते हुए कक्ष से बाहर निकल जाता। डी.एम. साहब को उस समय देखना किसी कविता के जन्मोत्सव का आनन्द लेने जैसा था। एक ऐसी कविता जो अचानक दिमाग में लिख जाये धूमिल की कविताओं की तरह नहीं, जटिल और खाल उधेड़ने वाली, न ही मुक्तिबोध की तरह बिम्बों में नहाई हुई। डी.एम.साहब के चेहरे पर उस समय न तो समय की जटिलतायें नाच रही थीं, न ही राजनीति का वहां कोई व्याकरण था। कक्ष पूरी तरह खामोश था, वहां बैठे हुए लोग अपने अपने कामों के होने न होने में डूबे हुए थे, जाने क्या हो। काम हो भी सकता है, नहीं भी हो सकता। किसी भी काम पर कानून सदैव चढ़ा रहता है और कानून अपने आप में जितना स्पष्ट होता है, उससे अधिक अस्पष्ट भी। हमलोगों का डी.एम. साहब से मिलने का नंबर आधे घंटे बाद आया फिर हम डी.एम. साहब से मिल पाये। बहुत ही गंभीरता से उन्होंने हमारी बातें सुनीं.. ‘तो आप लोग एड्स के रोक थाम के लिए जागरूकता कार्यक्रम चलाते हैं, आप लोगों की संस्था इसके अलावा क्या क्या काम करती है? सोनभद्र में आपलोगों का काम कब से चल रहा है? आपलोगों की संस्था का सेमिनार है उसमें मेरी आवश्यकता क्या है? वैसे भी किसी संस्था के सेमिनार में मेरा जाना ठीक नहीं, आज कल की संस्थाएं सामाजिक कम, राजनीतिक भूमिकाओं पर अधिक जोर देने लगी हैं.. जहां देखो प्रदर्शन, घेराव कभी किसी सवाल पर तो कभी किसी सवाल पर। आप जानते हैं कि राजनीतिक समाज हो या धार्मिक, सवाल कभी नहीं मरते। ये सवाल ही हैं जो मानव सभ्यता को गतिशील बनाए रखते हैं.. मैं समझता हूॅं कि जिलाधिकारी को स्वयंसेवी संस्थाओं के आयोजनों से बारीक दूरी बना कर चलना चाहिए।’ बहुत ही मिठास के साथ डी.एम. साहब ने हमें नकार दिया और समझा दिया कि डी.एम. डी.एम. होता है, उसे क्या करना है, क्या नहीं करना है सबके बाबत उसके पास सधे हुए तर्क होते हैं.. वही तर्क जो संवाद को असरदार बनाते हैं, जिससे भाषा की असीमता का आभास होता है। वैसे डी.एम. भी तो असीम और अथाह होता है। पता नहीं क्या है कि जब भी मैं प्रतिभा परीक्षा के महानायकांे से मिलता हूॅं, मुझे लगता है कि मैं दफनाई जा चुकी कोई चीज हूॅ, एक ऐसी चीज जो बेवजह अपने समय में मौजूद है, किसी अवरोध की तरह जो न समय के लिए उपयोगी है और न ही अपने लिए। आखिर हर उस आदमी को जीने का क्या हक है जो अपनी उपयोगिता प्रमाणित नहीं कर सकता। वह यह भी साबित नहीं कर सकता कि वह पशुओं से कैसे अलग है? अगर पशु नहीं है फिर वह क्या है? मुझे अच्छा नहीं लगा मैंने कहा.. ‘हां सर! यह सच है कि आप की अनुपस्थिति में भी सेमिनार हो सकता है तथा वह होगा भी। पर वह सेमिनार बिना मुखिया के कैसा होगा, आप हमारे मुखिया हैं, इस लिए हम आपको आमंत्रित कर रहे हैं न कि जिलाधिकारी के नाते, हमारा सुख व दुख दोनों आप का है, भला बतायें आप सेमिनार में नहीं होंगे फिर वह सेमिनार कैसा होगा? एड्स की समस्या तो समाज के साथ साथ सरकार की भी है। डी.एम. साहब मेरी बात सुनकर अचानक गंभीर हो गये, थोड़ा ठमक कर उन्हांेने मेरा परिचय पूछा.. ‘कहां के रहने वाले हैं आप! आपकी संस्था कितनी पुरानी है?’ ‘जी मैं एक लेखक हूॅं और सोनभद्र का ही रहने वाला हूॅ। मैं इस संस्था से नहीं हूॅ। संस्था के सचिव मेरे मित्र हैं, मेरे लेखन से वे प्रभावित हैं.. उन्होंने शशि जी को निर्देशित किया हुआ है कि वे मुझे भी संस्था द्वारा चलाए जा रहे जनकार्यों से जोडं़े.. शशि जी दूसरे जनपद की निवासी हैं और इस संस्था में काम करती हैं.. यहां जब कार्य आरंभ हुआ तो शशि जी ने मुझे भी संस्था के कार्यों से जोड़ लिया, बस इतना ही।’ किसी डी.एम. से इससे अधिक अपने बारे में क्या बताया जा सकता है। इतना बता कर मैं डी.एम. साहब का चेहरा देखने लगा, उनके चेहरे पर मुझे कुछ दिखाई नहीं दिया। यह मेरी कमजोरी भी हो सकती है कि जो मुझे देख लेना चाहिए उसे नहीं देख पाता या यह भी संभव है कि डी.एम. साहब ने किसी वौद्धिक कला से उस देखने को रोक लिया हो जिससे देखना अदेखा रह जाये। बहरहाल मुझे डी.एम. साहब के चेहरे पर शून्य का फैला हुआ संसार ही दिखा, अचानक डी.एम. साहब ने मुझसे जानना चाहा..
‘आप क्या लिखते हैं? कविता, कहानी, उपन्यास, आलेख? यहां के दो तीन लोगों को मैं जानता हूॅं जो कविता से जुड़े हुए हैं, उनमें से एक जन से मैंने जानना चाहा था मुक्तिबोध जी के बारे में.’ इतना बोल कर वे रूक गये। आगे कुछ कहना चाहते थे जिसे उन्होंने सायास रोक लिया। सारा कुछ वे बोल तो नहीं देंगे, सामान्य लोगों की तरह, पर मैं तो सामान्य ही था। सामान्यों को क्या पड़ी कि वे बात बात में आचार संहिता पलटें फिर बोलेें, वे जो बोलना होगा बोल देंगे पर डी.एम. साहब तो नहीं बोलेंगे। वे प्रतिभा परीक्षा उŸाीर्ण कर के असामान्य हो चुके हैं, आखिर भेद होना चाहिए कि नहीं सामान्य और असामान्य में, मैंने तुरंत उनसे पूछा..
‘हां सर उस कवि महाशय ने क्या बताया था मुक्तिबोध जी के बारे में या कविता के बारे में, सवाल कई हो सकते थे, कविता की समकालीनता पर या कुछ भी’ ‘उसे क्या बताना लेकिन एक बात बता दूं कि वे केवल इतना जानते थे कि तुकबन्दियां कवितायें होती हैं.. कुछ कवितायें भी उन्हांेने सुनाया था जिनके आधार पर यही कहा जा सकता है। आगे उनसे क्या पूछना था। वे तो नागार्जुन, शमशेर, आदि तक का नाम भी नहीं जानते थे। वैसे मुझे इसका अनुमान था कि कविता के लोग पढ़ते नहीं, केवल अपना लिखा ही पढ़ते और सुनाते हैं.. एक बार मैं यहां की एक कविगोष्ठी में जा चुका हूॅं, वहां कई लोगों की कवितायें सुनने का अवसर मिला। मन ही मन मुझे हसी आ रही थी, जो मैं सुन रहा हूॅं अगर यही कवितायें हैं तो लतीफा किस चीज का नाम है? फिर तो हिन्दी का भला हो चुका, ऐसे ही हिन्दी विकसित होगी’ डी.एम. साहब की बातें मुझे झकझोर रही थीं, झकझोरने वाली थीं भी। एक आदमी के आधार पर सोनभद्र का साहित्यिक मूल्यांकन कर रहे हैं.. यह तो हड़िया का चावल देखने का आदिम तरीका हुआ। पका कि नहीं, पर वे मूल्यांकन करते भी तो कैसे, यहां कोई ऐसा नाम नहीं जो हिन्दी का पोस्टर हो, हर दिवार पर चिपका हुआ। ऐसा भी नहीं कि यहां का अज्ञात हिन्दी सेवी उनके दरबार में हाजिरी लगाता हो। उनके दरबार में तो वही जाते हांेगे जो प्रचार की उफनती नदी में गोता लगाने वाले होंगे या राजनीति तथा प्रशासनिक हस्तक्षेपों का भजन गाने वाले होंगे। ‘हां सर आप ठीक बोल रहे हैं पर बुरा न माने तो एक बात बोलूं, प्रशासन से जुड़े लोगों के लिए जो प्रिय हैं वैसी कविताओं का मेरे सोनभद्र में अकाल नहीं, हर ओर बिखरी पड़ी हैं.. कहीं भी देख व पढ़ लीजिए पर मुक्तिबोध और नागार्जुन यहां नहीं मिलेंगे? आप भी महसूस कर सकते हैं कि मुक्तिबोध जैसी कविताएं तो वही व्यक्ति रच सकता है जो मुक्त हो पर उन्मुक्त नहीं.. सोनभद्र आज भी गुलामी वाले सांस्कृतिक मौसम में सांसें ले रहा है। यह सच है कि अब यहां राजे, महराजे और जमीनदार नहीं हैं, पर कलक्टर और आला अफसर तो हैं ही। यहां का मौसम पहले वाला ही है, और आप जानते ही हैं कि जैसा मौसम होगा, वैसी ही कवितायें भी तो उगेंगी’। यह कृपा ही कही जायेगी कि डी.एम. साहब ने मेरी बातें सुन लीं, टोका टोकी नहीं की, नहीं तो वे रोक सकते थे, न बात करते न करने देते। उन्होने बहुत ही शालीनता से फिर कहा... ‘मिलवाइए ऐसे लोगों से जो मुक्तिबोध की परंपरा के हों, आप भी अपनी रचनायें दीजिए’ मेरे पास उस समय हाल का प्रकाशित एक कहानी संग्रह था, उसे मैंने उन्हें दिया इस निवेदन के साथ कि मैं इसे लेखकीय प्रतियों में से दे रहा हूॅं, इस लिए चाहूॅंगा कि इस पर आप की प्रतिक्रिया भी मुझे हासिल हो। आप जानते ही हैं कि प्रकाशक बतौर एहसान लेखकों को सिर्फ छह प्रतियां ही देता है। डी.एम.साहब ने संग्रह को उलटना शुरू किया, प्रारंभ से अन्त तक उन्होंने उसे पलटा फिर हमारे काम पर चले आये। कब है मीटिंग? सारा कुछ जान कर उन्हांेने स्वीकृति दे दी कि वे समय पर आ जायेंगें साथ ही साथ स्टेनो को निर्देशित किया कि वह उस दिन उन्हें मीटिंग के बारे में याद दिलायें। शशि और मेरे लिए डी.एम. साहब की स्वीकृति किसी उपलब्धि से कम नहीं थी, कलक्टरी से हम दोनों खुशियां पीते हुए लौटे।
रपट
डी.एम. साहब सेमिनार में अपनी भागीदारी के लिए स्वीकृति दे देंगे इसका अनुमान हम दोनों को नहीं था। किसी संस्था के कार्यकर्ता ने बताया था कि डी.एम.साहब संस्थाओं के कार्यक्रमों में भागीदारी नहीं करते। उसने एक बार प्रयास किया था पर उन्होंने इनकार कर दिया था। उनका कहना था कि संस्थाएं समाज के विकास के लिए नारे तभी लगाती हैं जब तक फन्ड का जोर रहता है, फन्ड खत्म, नारे भी खत्म। समाज के सर्वंगीण विकास के लिए संस्थाएं उगती हैं, विकास का वही पवित्र लक्ष्य आगे चलकर धन कमाने का उपलक्ष्य बन जाता है। आज कल संस्थाएं अपने लक्ष्यित रास्तों से भटक गई हैं.. शशि खुश,खुश थी कि वह मंत्री जी को अच्छी खबर सुना सकेगी, मंत्री जी ने डी.एम. साहब की भागीदारी के लिए खासतौर से उसे निर्देशित किया था। कहने लगी.. ‘मेरे लिए बहुत ही अच्छा हुआ कि डी.एम.साहब की स्वीकृति मिल गई। आप नहीं होते तो असंभव ही था। अधिकारी जिस आत्मीयता से बातें सुनते हैं उतनी ही कठोरता से बातों को अनसुना भी कर दिया करते हैं। उनके लिए बात जेठ की रात होती है, आयी और गुजर गई, बस इतना ही। अब सोचिए अगर आप नहीं होते तब क्या उनका कार्यक्रम मिलता? कŸाई नहीं.. इसी लिए मैं बार बार आपसे अनुरोध कर रही थी। मुझे पता है कि मैं क्या हूॅॅ और किस पर तथा किस तरह का प्रभाव छोड़ सकती हूॅ। यही तो फर्क है भाव और प्रभाव का। आप तो साफ,साफ इनकार कर दिए थे कि डी.एम. साहब के पास क्या जाना, मेरी जान पहचान नहीं.. आजकल अधिकारी किसी को घास नहीं डालते। वे पहचानते ही नहीं, सारा कुछ दबाव से चल रहा है। देखा आपने डी.एम. साहब ने कितनी आत्मीयता से आप से बातें की, बहुत ही अच्छे हैं, लगता ही नहीं कि वे जिले के आला अधिकारी हैं..’ ‘हां तुम ठीक बोल रही हो पर वे इतने सरल और तरल नहीं हैं जितना तुम सोच रही हो। उनकी सरलता में विरलता का घोल है, सामान्य भी और असामान्य भी। अच्छा हुआ तुम्हारे लिए कि उन्होंने कार्यक्रम में भागीदारी के लिए स्वीकृति दे दिया।’ कलक्टरी से हम दोनों तकरीबन तीन घंटे बाद वापस लौटे। शशि की जिद पर मुझे उसके आवास तक जाना पड़ा। उसके आवास पर उसकी संस्था के सर्वेयर आये हुए थे। शशि ने उन्हें विशेष रूप से बुलाया हुआ था। सेमिनार की तैयारी के बारे में बातें करनी थी.. सर्वेयर बाहर वाले बरामदे में बैठे हुए थे। वह कामन जगह थी, उसका उपयोग उस मकान में रहने वाले सभी लोग करते थे। मुझे भीतर वाले कमरे में बिठा कर शशि चाय बनाने चली गई। मना करने के बाद भी नहीं मानी कहने लगी...‘आज के समय में दो ही चीजें जरूरी हैं, चाय और राय, अभी दोनों को बाजार ने डंसा नहीं है। डंसा भी है तो उनमें विष का असर नहीं दिखता। राय चल रही है तो चाय भी चल रही है। कभी चाय के समय राय तो कभी राय के दौरान चाय, पर चलेंगी दोनों.. फिर एक बात और है कि मैं आपको चाय के अलावा कुछ और तो पिला नहीं सकती।’ फिर शशि चाय बनाने के लिए किचन में चली गई और मैं बाहर बैठा हुआ एक पत्रिका पढ़ने लगा’ पत्रिका खबरों वाली थी। उसमें किसिम किसिम के फोटो प्रकाशित थे, फोटो देखने से यही लग रहा था कि अब खबरों का अकाल पड़ गया है। इतिहास मरे न मरे पर खबरें अवश्य मर रही हैं.. पता नहीं पश्चिमी चिन्तकों को क्या सूझता है? उन्हें कुछ सूझ रहा होता तो वे खबरों के सिकुड़ने, मैला होने, टूटने और बिखरने पर चिन्तन करते। अपने यहां तो इन चीजों पर सोचना ही पुरातनगामी होना है। हमारे यहां सारा कुछ अतीत से जनमता है, तथा अतीत बन जाने के लिए अभिशप्त होता है। ऐसा नहीं था कि उस पत्रिका में खबरें नहीं थीं, कुछ तो थीं ही जो देश चलाने वालों की नीली पीली पगड़ियों के बाबत थीं.. उनमें कहीं कोई युवराज होता तो कहीं दूसरा युवराज होता, खबरें पूरी तरह से वंशबादी व परंपराबादी थीं.. एक में मिली हुई किसी जहरीले रसायन की तरह केवल आश्वासन था कि देश चल रहा, लोग चल रहे और इसी तरह दुनिया चलती है। थोड़ी ही देर में शशि चाय ले कर आयी। साथ बैठ कर वह भी चाय पीने लगी। चाय पीते हुए मैंने उसे देखा पर देख नहीं पाया। देख भी नहीं सकता था। जंगल वाली उमंग और रोचकता उसके चेहरे से गायब थी। जंगल में वह चमक रही थी। प्रकृति की अद्भुत लीला उसके चेहरे पर थिरक रही थी। ऐसा ही लगा था मुझे। जब हम दोनों जंगल में घूम रहे थे, मैं भला कैसे भूल सकता हूॅ उसने कहा था.. ‘चलिए लौट चलें’ जंगल का अवांक्षित उपहास ले कर यहां से निकलना ठीक नहीं’ फिर हम दोनांे लौट आये थे। रास्ते भर शशि खामोश थी। चाहती तो मदहोश हो सकती थी। उस मदहोशी को मेरे खाते में भी उलीच सकती थी पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। हम दोनों किसी निर्जीव की तरह वापस लौटे। रास्ते भर मेरे जोश और होश दोनों आपस में टकराते रहे। गुनते हुए कि विकल्प मुझे प्रस्तावित करना चाहिए था। पहल करने पर ही तो हल निकलेगा, पर मैंने पहल नहीं किया, न ही उसने। वैसे ऐसा भी हल क्या जो दिल को दहला दे। हल का मिजाज कुछ भी हो सकता है। उसके मिजाज के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता। संभव है जंगल में होने पर ही जंगल हमारे चेहरों पर प्रकृति का नृत्य करता, बिना मिलावट और बनावट वाला, बाद में अपना दिया सारा कुछ हमसे छीन व बीन लेता। इसी कारण शशि वैसा न दिख रही हो जैसा जंगल में दिख रही थी। मैं शशि में खोया हुआ था और खामोश था जबकि मुझे विचारना चाहिए था कि मैं शशि के साथ बैठा हुआ हूॅॅ बिल्कुल आस पास। बातें जारी रखनी चाहिए। अच्छा नहीं होता गुप चुप रहना और अपने में डूबा हुआ भी। बहरहाल शशि ने इस बाबत मुझे नहीं टोका, उसने ही बातें शुरू की.. ‘जानते हैं औरत होना अद्भुत और रोमांचकारी है। किताबें न भी पढ़ो तो कोई बात नहीं, बहुत कुछ पढ़ने के लिए मिल जाता है किताबों से बाहर। घर में, समाज में दफ्तरों में, आज मैं आपके साथ डी.एम. आफिस से एक नये किस्म की किताब पढ़ कर लौटी हूॅ.. वहां तो पढ़ने लायक बहुत कुछ बिखरा हुआ था, आपने पढ़ा कि नहीं.. आपने नहीं पढ़ा होगा, दो समान चीजें आपस में प्रतिक्रियाहीन होती हैं.. उनमें तटस्थता होती है, अपनी अधिकतम सीमा तक’ ‘वहां पढ़ने के लिए क्या था?’ मैंने उससे सवाल किया शशि हसने लगी, हसते हुए ही उसने बताया.. ‘यही तो बात है, आपको यह नहीं भूलना चाहिए कि वहां तो बहुत कुछ था पढ़ने के लिए। वह डी.एम. आफिस है, वहां तरह तरह की किताबंे होती हैं, वह भी बन्द नहीं खुली हुई। जिसे पढ़ना आये वह अपनी पसंद की किताब पढ़े और डी.एम. की गरिमा में डूब जाये, और जिसे पढ़ना नहीं आये वह किस्मत पर रोये। मैं तो डूब ही गई थी, इतना डूब गई थी कि निकलना मुश्किल था, किसी तरह निकली। निकल जाने पर जान पड़ा कि डी.एम. केवल डी.एम. नहीं होता, वह जीता जागता आदमी भी होता है। जिसकी पुतलियां वही नाच नाचती हैं, जैसा किसी दूसरे की। उसकी पुतलियों का नाच देखना मेरे लिए मुश्किल था। मुश्किल इसलिए कि मुझे उनमें तैरना पड़ता और आपको क्या बताऊं मुझे किसी की पुतलियों में क्या, तालाब में भी तैरना नहीं आता। भला बताइए जो तैरे ही नहीं, वह क्या डूबेगा? चाहे किसी की पुतलियों में या तालाब में ही। सच बताऊं उसकी पुतलियों के जादू से बच पाना सभी के लिए संभव नहीं.. इसी लिए मैं वहां खामोश थी, और लगातार अपने पैरों के नाखून देख रही थी। ऑखें झुकाये रखने का मेरे लिए यही सबसे बेहतर तरीका है। ऑखों के झुकाव, ऊपर के उठाव से मन को सुरक्षित रखते हैं.. नहीं तो मन का क्या कभी भी बेमन हो सकता है।’ ‘कैसी बातें कर रही, क्या तूं कमजोर तथा मूढ़ है? अपनी दृढ़ता नहीं बचा सकती। तुझे तो हर जगह और हर समय टकराना होगा, कभी खुद से तो कभी दूसरों से। और यही टकराहट तुम्हारे लिए आहट होगी फिर तूं समझ पायेगी कि तुझे क्या करना है और क्या नहीं करना है। फिर इस तरह की टकराहटों से किस लिए बचाव कर रही तूं? मैंने शशि को समझाया.. शशि भी पूरी तरह तैयार थी, उसे प्रतिउŸार देना ही था और उसने दिया.. ‘नहीं ऐसी कोई बात नहीं, मुझे समय की टकराहटें भयभीत नहीं कर सकतीं मैं उनसे कुशलता पूर्वक लड़ सकती हूॅ पर यह जो समय की लय है नऽ, कभी कभी प्रलय मचा देती है और मुझे प्रलय को लय में तब्दील करना आज तक नहीं आया। मैं उनमें से भी नहीं जिन्हें पता ही नहीं होता.... लय क्या है और प्रलय क्या है? वैसे भी लय तथा प्रलय का विलयन करने वालों से मैं काफी दूरी बना कर चलती हूॅ. अगर ऐसा न करूं फिर तो मेरे मन की लय, प्रलय में निश्चितरूप से बदल जायेगी। मन की लय ंजितना विनम्र होती है, उससे अधिक निष्ठुर भी।’ हम दोनों को बातें बीच में ही रोकनी पड़ी। शशि के कार्यकर्ता काफी देर से उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे कि कार्यशाला आरंभ हो। शशि के आग्रह पर मैं भी कार्यशाला का प्रतिभागी बन गया। नया अनुभव मिलेगा, कार्यकर्ता अपनी रिपोर्टे.. पढ़ेंगे तथा बताएंगे कि सोनभद्र में एड्स काहे बढ़ रहा है, और कहां कहां है, किस वर्ग समूह में है, कारण क्या क्या हैं..? मीटिंग प्रारंभ होने में देर नहीं लगी। कार्यकर्ता भी कुल जमा पांच ही थे। मैंने अनुमान किया कि अधिक से अधिक दो घंटे में कार्यशाला समाप्त हो जायेगी। शशि ने कुशल संयोजक की तरह करीब पांच मिनट का प्रारंभिक वक्तब्य दिया और बताया कि आज के समय में एड्स एक भयंकर बीमारी के रूप में हमारे समाज को डस रहा है। अगर इस रोग के प्रति जागरूकता नहीं पैदा की गई तो मानव सभ्यता नष्ट हो सकती है। इसलिए आवश्यक है कि हम पूरी ताकत के साथ इस रोग के रोकथाम के लिए सजगता व जागरूकता कार्यक्रम चलायंे.. इस कार्यशाला के माध्यम से सीमित साधनों के अन्तर्गत कार्य करने की प्राथमिकताओं का हमें आज ही निर्धारण करना है। कार्य क्षेत्रों का चयन करना है। इसी कार्यशाला में हम अपने अध्ययन रिपोर्टों का इसीकरण करेंगे, फिर कार्य करने की रणनीति पर विचारण भी, जिससे आगे की रणनीति बनायी जा सके। शशि के प्र्रारंभिक वक्तब्य के बाद सर्वेयरों ने अपनी रिपोर्ट इस करना आरंभ किया। सर्वेयरों की रिपोर्टंें विस्मयकारी थीं कम से कम मेरे लिए, मुझे नहीं पता था कि हमारा सोनभद्र देहलीला में इतना संलिप्त है। मुझे देहलीला के बारे में महज दैनिक समाचार पत्रों के माध्यम से ही जानकारी थी। जानकारी भी हवा में उड़ती हुई, जिस पर विश्वास करना कठिन था। एक सर्वेयर की रिपोर्ट ने मुझे हतप्रभ कर दिया। उसने बताया कि बनारस से लेकर शक्तिनगर तक हाई वे के किनारे देहलीला के कौतुक चल रहे हैं। शायद ही ऐसे ढाबे हांे, जहां इस तरह का कार्य न हो रहे हों। उसने एक ढाबे का मौजूदा हाल बताया जिसके पास में एक आदिवासी गांव था। वहां रिहन्द बांध से विस्थापित लोग बसे हुए थे। उसने उस गांव का मुकम्मल सर्वे किया हुआ था। उसके बताने के अनुसार मुझे मालूम हुआ कि उस गांव के कुछ लोग देह को बाजार की सामग्री मानते हैं, सो वे देह बेचना अनैतिक नहीं मानते। वे लोग देह को रुपया कमाने की एक वस्तु मानकर देह का सौदा करते है और बेचते हैं.. फलस्वरूप सामाजिक या पारिवारिक रोक नहीं.. उस गांव में देह का रोजगार करने वालियां काफी सम्मानित होती हैं तथा उन्हीं के हाथों में घर चलाने का मालिकाना होता है। सर्वेयर ने देहलीला में संलग्न तीन औरतों का संदर्भ भी बताया उनमें से दो औरतें एड्स से प्रभावित हैं, दोनों का सरकारी अस्पताल में इलाज चल रहा है। वे दोनों औरतें इस रोजगार में क्यों आयीं उसके कारण लगभग लगभग समान थे, अलग अलग नहीं.. उन्हें न तो किसी बाहरी व्यक्ति ने कभी भगाया था, न ही किसी गैर ने उन्हें इस घृणित रोजगार में धकेला था। उन्हें उनके संबधियों ने ही देह के रोजगार में धकेला था। उन औरतों के पास जीवन जीने की इच्छा भी नहीं है। वे जल्दी से जल्दी मर जाना चाहती हैं.. शशि उनमें एक से भी मिल चुकी थी, जिस दिन वह इलाज के लिए जिला अस्पताल आयी थी। उस औरत की कहानी किसी अश्लील उपन्यास की तरह थी जिसे कम से कम प्रकाशित तो नहीं किया जा सकता। बता भले ही दिया जाये, केवल इसलिए नहीं कि उसके रचनाकार की नैतकिता क्षीण होगी और उसे नैतिकतावादी लेखक बिरादरी से बाहर कर दिया जायेगा। माना जायेगा कि ऐसे उपन्यास का लेखक एक गिरा हुआ व्यक्ति है.. उसे सभ्यता के मानकों की जानकारी नहीं और है भी तो वह समाज को पथभ्रष्ट करने का औपन्यासिक प्रयास कर रहा है। कम से कम लेखन के क्षेत्र में तो नैतिक मूल्यों के कसाव व बचाव का काम किसी भी लेखक को करना ही चाहिए। उक्त औरत साफ बोलने वाली महिला थी। उसे इस बात की चिन्ता नहीं थी कि वह एड्स से प्रभावित है, और इलाज न होने पर मर जायेगी। इलाज भी ठीक से होता रहे फिर भी उसकी मृत्यु बहुत दूर नहीं.. शशि ने देखा कि उस औरत की ऑखों में मृत्यु के लाल लाल डरावने डोरे नहीं जो बरबस ही डराते रहते हैं.. वह निर्भीक ही नहीं आश्वस्त भी थी कि जो होगा, होगा फिर काहे के लिए डरना। उस औरत से उसकी आन्तरिक कहानी जानना शशि के लिए भी कठिन था। शशि ने मनोविज्ञान की पूरी क्षमता का प्रयोग किया किसी सधे वकील की तरह। उससे जिरह भी की, जिससे वह जान सके आखिर किन कारणों से वह इस रोजगार में आयी, पर शशि के लिए मुश्किल था, हर सवाल का नकारात्मक जबाब देकर वह बहकाने की कोशिश करती। लम्बी कोशिश के बाद शशि को सफलता मिली। शशि ने उसे आश्वस्त करके सघन विश्वास दिया कि वह किसी को उसकी कहानी नहीं बताएगी। सारी बात गुप्त रखेगी। फिर उस औरत ने वह किस्सा बताया था जिसने उसकी जिन्दगी बदल दी थी और वह सेक्स बाजार की वस्तु बन गई थी। यह सच था कि पहली बार उसकी अइया ने ही दो सौ रुपयों के लिए उसे परधान के यहां भेजा था। उसे क्या पता था कि उसकी अइया उसे परधान के पास काहे के लिए भेज रही? वह तो बाद में मालूम हुआ जब परधान ने उसे किसी जवान और गदराई औरत में तब्दील कर दिया। हालांकि वह जानती थी कि किसी न किसी दिन उसे देहलीला से गुजरना होगा। पर इस तरह से जिस तरह से परधान ने उसे अचानक और जबरी खटिया पर पटक दिया और वह सब निपटा लिया जिसे निपटाने में मर्द अपनी बहादुरी समझता है। वह चीखती चिल्लाती रही, कोई सुनने वाला नहीं.. वह देहलीला के इस घिनघिन करतब से डर कर कांपने लगी। कांपते व थरथराते हुए रोती रही। परधान उसे मनाता रहा। किसी बच्ची को फुसलाने जैसा फुसलाया। यह दूंगा वह दूंगा जाने कितनी बार गिड़गिड़ाया। वह चिल्लाती और बोलती, घर पहुंचा दो, वह और कर भी क्या सकती थी? परधान ने ही मोटर साइकिल से उसे अइया के घर पहुंचाया। रास्ते भर वह खामोश थी पर अन्दर से रोती और कराहती रही। वह परधान का विरोध करती भी तो कितना करती, कितना लड़ती उससे, पूरा छह फिटा जवान, खून से सने पंजे, ऑखों में छलकता गरम खून, वह पहले से ही काफी डरी हुई थी। उसे पता था कि वह परधान से लड़ नहीं सकती फिर भी उसने कोशिश की थी और कई जगह उसे दांतों से काटा भी था पर सारा कुछ उसका किया बेकार था। परधान ने उसे तभी छोड़ा था जब उसका पौरूष शिथिल व शून्य हो चुका था तथा वह बेहोश। कुछ समय बाद वह अइया के घर पर थी, उसे उसके वहां छोड़ कर परधान वापस लौट गया। लौटते समय परधान ने उसकी अइया को दो सौ रुपया दिया तथा और देने का आश्वाशन भी, जब भी जरूरत पड़े। वह घर में जाकर रोने लगी, रोते हुए ही उसने अइया से झगड़ा भी किया, तूंने परधान के पास काहे भेजा था? वह बहुत हरामी है, उसने मेरी इज्जत लूट ली, चल थाने पर रपट लिखा। उसकी अइया पहले तो खामोश थी पर बाद में आग उगलने लगी.. ‘यह सब तेरी करनी से हुआ तूं हल्ला करती, चिल्लाती चीखती फिर वह का कर लेता, तूं खुद पसर गई होगी। परधान तो गऊ है, उस पर काहे इल्जाम लगा रही। अब हल्ला न कर तेरी ही बदनामी होगी। जो हो गया, हो गया उसे भूल जा’ वह परेशान परेशान थी उसे अइया पर काफी गुस्सा आया, जाने का सोच कर उसने अइया को मारा नहीं, उसके मन में आया था कि पास में रखी टंगारी से अइया का माथा फाड़ दे पर उसने वैसा कुछ नहीं किया। वह खामोश हो गई कुछ देर बाद घर से बाहर निकली और सीधे थाने पर जा पहुंची। उसे पता था कि उसके साथ जो हुआ है उसका पूरा इलाज थाने पर है। वैसे भी थाना चाहे तो ऐसे मर्जों का इलाज कर सकता है पर जब इलाज करना चाहे। थाना इलाज क्यों करे, यह उसे मालूम नहीं था, मालूम होता तो थाने पर नहीं जाती। उसी की तरह बहुतों को नहीं मालूम कि थाने उसी की सुनते हैं जिसके आवाज में बारूद की आग होती है। थाने पर वह गांव से बच बचा कर पहुंची। अन्धेरा होने तक पहुंच गई थी रपट लिखाने के लिए और उसे ही रपट का लाल पन्ना बना दिया गया। बारी बारी से सिपाहियों ने उसकी देह पर रपट का मजमून बनाया। उसके एक एक हरफ को चुन व गुन कर लिखा। लिखे हुए को कई बार काटा, उसके हसीन हरफों को दुबारा तिबारा लिखा। सिपाही मजमून लिख ही रहे थे कि वह बेहोश हो गई। उदास धरती की तरह, धरती पर पसर गई। उसे धरती पर धरती की तरह पसरा हुआ देख कर दारोगा को अचरज हुआ...अरे! साली पसर गई। आदिवासी लड़कियां तो पसरती नहीं! साली काहे पसर गई? लगता है सारे सिपाहियों ने मिल कर इसे पगडंडी बना दिया है। खड़ंजा होती तो चल जाता, उसने सिपाहियों को गाली दी... ‘अरे! हरामजादों! कुछ तो विचारा होता, दो चार पार हो लिए होते, सभी के सभी पार उतर गये। यह लड़की है, कोई बेलन या कनहर नदी नहीं, कि बूंदा बादी पर भी उफना गई, तोड़ दिया किनारों को। अब तो इसे होश में लाओ नहीं तो... वह कब अइया के घर कब पहुंची, उसे पता नहीं चला, होश आने पर उसने समझा कि वह अपने अइया के घर में है। अब देर न कीजिए
सर्वेयरों की रिपोर्टें सुन कर मैं हतप्रभ था। क्या हमारा सोनभद्र देहलीला के करतबों का बाजार है? यहां के कथित औद्योगिक विकास का ऐसा चौंकाऊं प्रतिफल। नारे लगाए जा रहे हैं कि औद्योगिक विकास से साहित्य संस्कृति, कला शिक्षा एवं आर्थिक जैसे क्षेत्रों में स्वतः विकास हो जायेगा पर हो क्या रहा है? किसका विकास हुआ? जब तक सर्वेयर रिपोर्टें पढ़ रहे थे तब तक मैं सामाजिक बदलाव के दर्शनों में डूबा हुआ था। कभी उन दर्शनों के बांए जाता तो कभी दाहिने, जितना दर्शनों के चिन्तनों में डूबता उतनी ही निराशा होती। माथे में मुझे दर्द महसूस हुआ, दर्द भी सहन करने लायक नहीं असहनीय। फिर तो शशि के आवास पर ठहरना मेरे लिए असंभव हो गया। शशि से मैंने छुट्टी मांगी.. ‘मुझे छोड़ो, सर दर्द से मैं बहुत परेशान हूॅं, कार्यशाला समाप्त होने के बाद मिलना, अगर समय रहा तो..’ ‘नहीं आपको अभी नहीं जाना है, कार्यकर्ताओं के लिए लंच पैकेट आ रहा है लंच लेकर ही जाना है। कुछ देर के लिए और रुक जाइए, कार्यक्रम समाप्त ही है, सुन तो लीजिए का हो रहा है सोनभद्र में? आप भी तो आज की व्यवस्था पर कई तरह के सवाल खड़े करते हैं अपनी किताबों में.. भूमि के असमान आवंटन, बेरोजगारी, विस्थापन और यातनापूर्ण गरीबी के बाबत लेकिन इस तरह की बदलती विसंगतियों के बारे में आप क्या कहेंगे? क्या और कैसा लिखेंगे, भूख मिटाने के लिए देह के सौदों के बारे में, आज की मानव सभ्यता के पास क्या जबाब है? इस पर तो आपको विचारना ही होगा।’ शशि बातों का एक छोर मेरे हवाले कर के भीतर वाले कमरे में चली गई, कमरे से बाहर जब निकली तब उसके एक हाथ में दवाई की टिकिया थी और दूसरे हाथ में एक गिलास पानी.. ‘लीजिए दवा खा लीजिए, पांच मिनट में दर्द फुर्र’ किसी विज्ञापनी नायिका की तरह असरदार संवाद बोल कर वह कार्यकर्ताओं के पास चली गई फिर मैं उस संवाद का जीवित प्रयोग बन गया। दवा की टिकिया ने काम किया फिर मैं सामान्य हो गया केवल ऊपरी तौर पर भीतर से आन्दोलित था। आज की मानव सभ्यता और ज्ञान विज्ञान के फैलावों पर हो क्या रहा है, हमें पहुचना कहां था और हम कहां पहुंचते जा रहे हैं? वस्तुएं तो बिकती ही हैं, बदलवन वाले समाज से हम काफी आगे निकल चुके हैं।.. वह समय काफी पीछे छूट चुका है। रुपये ने अतीत की जिन अच्छाइयों को अनुकरण किया जाना चाहिए था, उसे लील लिया है, पहले व्यक्ति का चरित्र आपसी सहयोग सद्भावना, सहानुभूति, प्रेम आदि से बना करता था और आज के चरित्र पर रुपयों के क्रयशक्ति का चरित्र हाबी हो गया है, आदमी मशीन में जिस तरह से रूपान्तरित हुआ, हुआ वह रुपयों जैसा भी होता जा रहा है। रुपयों का काम है, सारी दुनिया को वस्तु में तब्दील करना, मूल्य निर्धारित करना फिर लाभ हानि के अनुसार उपयोग एवं उपभोग के लिए उसे खरीदना। मैं विचारों की यात्रा पर था, तभी शशि ने मुझे पुकारा। शशि चाहती थी कि मैं उसके कार्यकर्ताओं को संबोधित करूं, उसने ऐसा मुझसे कहा भी। मैने कार्यकर्ताओं को संबोधित किया और उनकी पीठें थपथपाईं, कि आप जितना बेहतर कर सकते हैं उतना बेहतर कर रहे हैं और आगे भी करेंगे ऐसा मुझे विश्वास है। फिर मैंने कार्यशाला के मुख्य विषय को उठाया और कहा... ‘एड्स देहलीला का दुखद परिणाम है और देहलीला कथित परमआनन्द की प्राप्ति का सुगम माध्यम, जबकि ऐसा है नहीं, परम आनन्द का केन्द्र तन नहीं, मन है। यह अलग बात है कि मन, तनधारी होता है, आनन्द, मन और तन की स्वच्छन्दता या स्वेच्छाचारिता में नहीं, तन और मन के पवित्र अनुशासन तथा उनके संतुलित विलयन में है।’ मेरे संबोधन के बाद कार्यशाला की कार्यवाही समाप्त हो गई फिर सभी ने लंच लिया। मुझे घर लौटने में काफी देर हो गई पर यह देर मेरे लिए ठीक थी, वहां अगर नहीं रुकता तो कैसे पता चलता कि हमारे जनपद में हो क्या रहा है विकास के नाम पर, चारित्रिक एवं सांस्कृतिक पतन और हम आश लगाए बैठे हैं कि जो भी होगा ठीक होगा, ठीक के अलावा कुछ नहीं होगा। वैसे मुझे पता था कि पेट की आग बुझाने के लिए तन तथा कथित शान के लिए मन बेचना दोनों विधियों में कहीं न कहीं अन्तरंगता है। दोनों के लिए खुले बाजार हैं, जो आकर्षक ही नहीं आह्लादकारी भी हैं.. गरीबी देह बेचवाती है, और अमीरी दिमाग, बिकते दोनों हैं और यह दुनिया इन्हीं दोनों के खेलों में अपने मनोरम तलाश रही है। कार्यकर्ताओं के चले जाने के बाद शशि ने मुझे रोक लिया। ‘चाय पीकर जाइएगा’ मेरे लाख मना करने पर भी वह नहीं मानी। वह मानती भी नहीं क्योंकि लंच पैकेट मैंने लिया नहीं था। बाजार की चीजें खाने का मन नहीं करता। मुझे चाय पीने तक उसके आवास पर रुकना पड़ गया। गैस चूल्हे पर चाय बनने में कितनी देर लगती है, वह भी आधुनिक किस्म के किचन में जहां सारी चीजें बहुत ही करीने से सजा कर रखी हुई हों, वैसे भी शशि खाना बनाने पकाने और खिलाने में आज के समय के लोगों से कुछ अधिक ही उत्सुक रहती है। चाय जल्दी आ गई और हम दोनों पीने भी लगे। कुछ ही देर में चाय समाप्त हो गई फिर भी मैं शशि के आवास पर बैठा ही रह गया और समझ भी नहीं पाया कि वहां मैं क्यों बैठा हुआ हूॅ। दूसरी जगहों पर कार्यक्रम समाप्त हो जाने के बाद एक मिनट के लिए भी वहां रुकना मेरे लिए कठिन हो जाता है पर शशि के आवास पर और शशि के साथ.. दो तीन महीने से ही शशि का साथ है इसके पहले तो मैं जानता ही नहीं था कि शशि कौन है, क्या करती है, कहां की रहने वाली है। शशि से हुई पहली मुलाकात और आखिरी मुलाकात के बीच के अन्तरों को अगर मुझे रेखांकित करना हो तो यह मेरे लिए बहुत ही कठिन होगा। क्योंकि मैं मनोवैज्ञानिक नहीं.. मनोवैज्ञानिक होता तो मुझे सहायता मिलती और मैं मन की गतिविधियों को विश्लेषित कर लेता। उसके एक एक रेशे को अलग करता फिर व्याख्या करके उसमें से वांक्षित हासिल कर लेता पर ऐसा कुछ मेरे लिए संभव नहीं.. मैं तो किसी सरल रेखा की तरह ही जीवन के हर मोड़ पर खिंचता और सिकुड़ता रहा हूॅं, मुझे यह भी कभी हासिल नहीं हुआ कि मैं समानांतर रेखाओं के द्वन्दों के बीच का जो रहस्य है उसे जान सकू.. शाशि से मैं क्यों प्रभावित रहता हूॅं, उसके एक एक संदेश पर दौड़ता रहता हूॅं, कोई दूसरा कार्यक्रम लगा भी रहता है फिर भी शशि के बुलावे को ही प्राथमिकता देता हूॅं, आखिर ऐसा क्यों है मेरे साथ? मै केवल अनुमान ही कर सकता हूॅं, उसे भी नहीं कर पा रहा हूॅं कि शशि मेरे लिए क्यों अनिवार्य बनती जा रही है किसी निहित कमजोरी की तरह। एक ऐसी कमजोरी जो गुप्त ही नहीं सुप्त भी हो, हो सकता है निष्ठुर तथा आक्रामक भी। क्या भावुकता का वेग इतना शक्तिशाली होता है? क्या मैं भावुकता का शिकार होता जा रहा हूॅं, उसी की धारा में बहने लगा हूॅ.. उसमें भंवरें भी तो होंगी फिर मेरी बुद्धि क्या कर रही, क्या उसकी कोई भूमिका नहीं, भावुकता इतनी शक्तिशाली है, जो मेरी बुद्धि को भी अपने साथ बहाए ले जा रही है। क्या मेरी बुद्धि कमजोर हो गई है कि वह इस तरह की अर्थहीन भावुकता को नियंत्रित नहीं कर पा रही। चाय समाप्त हो जाने के बाद ही मुझे शशि के आवास से लौट आना चाहिए था फिर भी आधे घंटे तक शशि के आवास पर रुक गया। वहां रूक कर विश्लेषित करता रहा कि मैं यहां पर किस लिए रुका हुआ हूॅ.. संभव कारण क्या हो सकते हैं, जो मुझे शशि के आवास पर रोके हुए हैं.. शशि का व्यवहार, उसकी विनम्रता, बातचीत करने की अद्भुत शैली, कहीं उसके सौन्दर्य की प्रकृति तो नहीं या आत्मिक साम्य का कोई अज्ञात प्रयोजन, जिसे जाना ही नहीं जा सकता। संभव तो यह भी है कि मैं एकपक्षीय तरीके से शशि में कुछ तलाश रहा होऊं जो अवचेतन स्तर पर दबा हुआ हो, चेतन में उसकी महज प्रतिक्रिया हो और मैं उलझा हुआ होऊं सिर्फ आभास हो रहा हो कि मैं व्यर्थ ही शशि के आवास पर हूॅं, यहां रुकने का कोई प्रयोजन नहीं.. शशि के आवास से वापस लौटते समय शशि मेरे साथ हो ली। यह कहते हुए कि ‘आपको घर छोड़ कर लौट आऊंगी’ मैं उसके लौटने के साथ था, सामान्य औपचारिकता निभाते हुए। कम से कम मुझे उससे कहना चाहिए था कि घर छोड़ने की आवश्यकता नहीं, तूं न चलो मेरे साथ। अपना काम करो, तेरे कार्यकर्ता आये हुए हैं, मैं चला जाऊंगा, घर का रास्ता भला कोई भूलता है, फिर मैं कैसे भूल जाऊंगा। कौन अजाने शहर में जाना है, एक बार तूं मुझे छोड़ो फिर मैं तुझे छोड़ने वापस लौटूं, यह चक्र कभी समाप्त नहीं होगा फिर ऐसी निरीह औपचारिकता किस लिए? ‘तूं रहने दो मैं चला जाऊंगा’ ऐसा भी मैं शशि से नहीं कह पाया बल्कि मुझे अच्छा लगा कि शशि कुछ समय के लिए और मेरे साथ रहेगी। वस्तुतः मुझे उसका साथ आना काफी अच्छा लगा। रास्ते में हम दोनों रापटगंज के बारे में बातें करते रहे। शशि ने जानना चाहा... सोनभद्र तो पहले जिला नहीं था। यह सोनभद्र कहां है? कोई न कोई जगह तो होगी ही इस नाम से। अच्छा चन्द्रकांता कौन थी? बिजयगढ़ किला कहां है? जहां की राजकुमारी चन्द्रकांता थी। इसी तरह के कई सवाल। मैने उसे संक्षेप में बताया कि रापटगंज पहले जिला नहीं था, कुछ साल पहले का नवसृजित जिला है। सोनभद्र एक कल्पित नाम है जो सोन नदी के नाम पर है। इस नाम का कोई स्थान नहीं, यह कल्पनाविदों का दिया हुआ नाम है, जिसे शासन ने स्वीकार करने की कृपा की है। राजकुमारी चन्द्रकांता तथा उसका बिजयगढ़ किले व रियासत से जुड़ाव, यह तो बहुत ही हसीन परिकल्पना है, चूमने व दुलारने लायक, इस संबध में कुछ बताना खुद को झूठा प्रमाणित करना होगा। शशि तो शशि थी, सवालों के उŸारों का निर्पेक्ष विश्लेषक, भला वह कैसे खामोश रहती तत्काल उसने पूछा.. ‘तो क्या चन्द्रकांता बिजयगढ़ की नहीं थी? यानि वह किसी कल्पना की उत्पाद थी। अच्छा यह बतायें कि बिजयगढ़ किला है कि नहीं, क्या वह भी कल्पना प्रसूत है?’ ‘शशि रहने भी दो, क्या करोगी यहां के अतीत में उतर कर। जिन सहारों के द्वारा अतीत में उतरना चाहोगी कैसे कहा जा सकता है कि वे सहारे तुम्हें अतीत की गहरी झील में उतार कर सुरक्षित वापस लौटा ले आयेंगे। वे सहारे तुम्हें छोड़ कर वापस भी तो आ सकते हैं और तुम उस झील में बिना प्रयोजन छटपटाती रह जाओ, फिर कैसे लौटोगी जीवित वर्तमान में.. जहां तुम्हारी आवश्यकता है। मुझे पता है कि हम सभी वर्तमान के लिए जरूरी हैं, अतीत के लिए नहीं.. इस बिन्दु पर खूबसूरत से खूबसूरत तथा अनिवार्य अतीत भी गैर जरूरी हो जाता है।’ अरे बताइए तो.. हमें किसी अतीत से क्या लेना देना। अतीत के बारे में जानना हमारी उत्सुकताओं का एक रूप भर है। ये उत्सुकतायें ही हैं जो हमें जानकारी के लिए प्रेरित करती हैं.. यह सच है कि सभी उत्सुकताओं में आन्दोलित करने की शक्ति नहीं होती, अगर कुछ में हुईं भी तो उससे क्या फर्क पड़ने वाला है? तो क्या चन्द्रकान्ता किसी रचनाकार द्वारा कल्पना के सहारे गढ़ी हुई हृदयग्राही रोमेन्टिक रचना भर है?’ हां कुछ ऐसा ही मान व जान लो। बिजयगढ़ रियासत और किले से इस चन्द्रकांता का दूर दूर तक नाता नहीं.. यहां का इतिहास तो कुछ दूसरा ही है जो यहीं से प्रारंभ होता है और यहीं पर समाप्त भी। यह पूरा परिक्षेत्र बारहवीं शताब्दी से ले कर अंग्रेजों के आने तक मुक्त परिक्षेत्र के रूप में वर्णित है। बतौर साक्ष्य कुछ किताबें उपलब्ध है, खासतौर से अंग्रजी गजेटियर वगैरह। यहां कभी भी मुगल नहीं आ पाये, आये तो केवल अंग्रेज ही, बहरहाल ऐसे सवालों को छोड़ो, मेरे पास कुछ गजेटियर्स हैं, उन्हें पढ़ लेना सारा कुछ साफ हो जायेगा, रजवाड़ांे से संबधित किताबें भी हैं..’ मेरा उŸार सुनते ही शशि चकरा गई.. टी.बी. सीरियल का ऐसा जादुई असर, मैं तो सोच भी नहीं सकती कि कोई कल्पना किसी ऐतिहासिक यथार्थ पर भी इस तरह हाबी हो सकती है। इस तरह तो कहीं का भी इतिहास कल्पना की वस्तु बना दिया जायेगा। फिर उस सच का क्या होगा जो कभी समय का वर्तमान था। यानि कि इतिहास बेचने का यह वौद्धिक धंधा है।’ घर लौटते समय मैं एड्स के रोगियों की वास्तविक कहानियों में था। उस समय शशि के सवाल मेरे लिए उबाने वाले जान पड़ रहे थे और मैं ऊब भी रहा था। हालांकि इतिहास मेरे लिए सदैव से ही काफी रूचिकर रहा है लेकिन अच्छा कभी भी नहीं.. हमारी सभ्यता भी अजीब रही है जो महलों में कैद थी। महलों से बाहर निकल कर खेतों खलिहानों तक पहुंची ही नहीं, सदैव डूबी रही हमलों और हमल की कहानियों मे.. उससे अच्छा तो आज का समय है जो कम से कम हर ओर टहल तो रहा है तथा उसका टहलना हम चाहें तो देख भी सकते हैं.. मेरा घर शशि के आवास से कुछ मिनटों की ही दूरी पर था और हम दोनों वहां पहुंचने वाले ही थे कि शशि ने मेरे मन की बातें छीन ली, जिसके बारे में मैं सोच रहा था। शशि ने मुझसे जानना चाहा.. ‘एड्स के रोगियों की कहानियां कैसी लगीं आपको? ‘कैसी मतलब? मैने उससे पूछा ‘कैसी यानि जैसी लगीं आपको, कुछ तो महसूस हुआ होगा आपको, हो क्या रहा है अच्छा या बुरा, उन जीवित कहानियों से आपका साहित्यिक मन प्रभावित न हुआ हो यह संभव नहीं’ क्या उन कहानियों को साहित्य के किसी रूप में ज्यों का त्यों लाया जा सकता है? आपको उस बाबत कुछ करना चाहिए’ शशि! वही तो गुन रहा हूॅं कि मैं क्या कर सकता हूॅ.. अगर उन्हें साहित्य की सामग्री बनाना हो तो मुझे क्या करना चाहिए, मुझे उन कहानियों में क्या क्या जोड़ना पड़ सकता है? क्या क्या घटाना पड़ सकता है? कल्पना और भावुकता के प्रभावों से उन्हें बचाया जा सकता है कि नहीं, सबसे बड़ी बात जीवित कहानियों में साहित्यिक हस्तक्षेप करना ठीक नहीं.. उन्हें ज्यों का त्यों ही लिखना उचित होगा। शशि को घर पर रोकना महज औपचारिकता होती सो मैंने उसे नहीं रोका। घर पर सारा कुछ यथावत था। यह मेरे लिए खुशी की बात थी। कभी कभी घर, घर की तरह नहीं होता वह बदल जाता है, और इतना बदल जाता है कि लगता ही नहीं कि घर था। पत्नी पत्नी नहीं रह जाती, बेटा बेटा नहीं रह जाता, बहू, बहू नहीं रह जाती, सारे रिश्ते एक दूसरे में उलझ जाते हैं फिर तो घर के भीतर घर देखकर लगता है कि यह जो घर है अगर नहीं होता तो ठीक होता। ऐसे घर में क्या रहना, क्या नहीं रहना और रहना भी तो किसके लिए रहना तथा क्यों रहना? घर आते ही देखा कि पत्नी प्रतीक्षा में बैठी हुई हैं, मुझे पता था कि भोजन का समय गुजर रहा है और वे तभी भोजन करेंगी जब मैं भोजन कर लूंगा। वस्तुतः वे बैठी हुईं थीं बाहर वाले लान के एक किनारे जहां धूप का असर नहीं था। उस समय उन्हंे उस रूप में देखना किसी ऐसे साहित्यिक सामग्री को देखना था, जिसकी लिपि प्रचलन से विलुप्त हो गई हो, उसे पढ़ने व समझने वाला कोई नहीं हो पर मैं उस लिपि को पढ़ सकता हूॅं तथा अर्थ भी निकाल सकता हूॅ। लगातार ऐसी ही लिपियों को पढ़ता रहा हूॅॅ, घर को पढ़ पाना कभी कभी जटिल हो जाता है। मुझे पत्नी का आहाते में बैठा देख कर खुशी हुई क्योंकि वे पठनीय थीं सहज और सरल भी। ‘बहुत देर कर दी आपने, बिना नाश्ते के ही चले गये थे, इसी लिए कहती हूॅं कि कहीं निकलते समय दो रोटी खा लिया कीजिए। शशि जी ठीक ठाक हैं नऽ’ पत्नी ने पूछा ‘हां जैसा होना चहिए वैसा तो नहीं फिर भी ठीक हैं’ मैंने पत्नी को बताया ‘का मतलब इसका? उन्हें कैसा होना चाहिए और कैसी हैं, एक औरत आखिर कैसी हो सकती है? पत्नी ने प्रतिवाद किया ‘अरे भाई! आप समझी नहीं, वह बहुत परेशान है और मानसिक रूप से टूट चुकी है, किसी तरह समय के साथ है और प्रयास में है कि समय से अपना नाता संतुलित कऱ ले और कोई दूसरा मतलब नहीं.. समय का क्या ठिकाना कब असमय में बदल जाये’ मैने स्पष्टीकरण दिया ‘बात तो ठीक कह रहे हैं आप, जहां तक हमैं मालूम है, समय समय होता है, सामानों की तरह, अच्छा बुरा नहीं, समय को आदमी और आदमी के रिश्ते नाते ही बनाते, बिगाड़ते हैं.. तोड़, फोड़ डालते हैं फिर क्या करे कोई, टूटता आदमी है, और लगता है कि समय टूट रहा है किसी कांच की तरह। खुद को रोकते हुए उन्होने कहा...‘अरे! छोडिए, बातें बहुत हैं, वैसे ही काफी देर हो चुकी है, अभी आपको नहाना और खाना भी है, अब देर न कीजिए।
घर के भीतर घर
घर आ कर घर की तरह हो जाना, मैंने अच्छी तरह सीख लिया है। उम्र के साथ मेरी समझ भी बढती गई कि घर, घर होता है, उसका अनुशासन होता हैै। बाहर वाले सेहन में मेरे लिए धूप में एक बाल्टी पानी रखा हुआ था ताकि गरम हो जाये। डाक्टरों ने मुझे ठंडे पानी से नहाने के लिए रोका हुआ है। उनका कहना है कि ठंडे पानी से नहाने पर मुझे शारीरीक परेशानी हो सकती है। अक्सर मैं सर्दी जुकाम की जकड़ में पड़ जाता हूॅ.. बाहर धूप अच्छी थी। धूप में नहाना मुझे बहुत अच्छा लगता है। पानी गरम हो चुका था, उसी से नहाया फिर खाने के लिए बैठा। अक्सर मैं बाहर पड़ी खटिया पर ही बैठ कर खाता हूॅ। कुर्सी वगैरह पर बैठ कर खाना खाना अच्छा नहीं लगता। जान पड़ता है कि मैं आसमान से टपका हुआ आदमी हूॅ। यहां की काली मिट्टी से मेरा रिश्ता नहीं, फिर मुझे असहज लगता है। वैसे मैं कोशिश करता हूॅॅ कि जमीन पर ही बैठ कर खाना खाऊं.. खटिया पर बैठ कर खाना, खाना तो विपरीत परिस्थितियों में ही होता है, जब घर में खाली जगह नहीं होती। घर में खाली जगह हो भी तो कैसे! दो कमरे के छोटे से मकान में आखिर कितनी जगह होगी? जब साथ में बहू तथा उसके बच्चे भी हों.. खाना खाने की मेरी इच्छा नहीं थी, पर मैं पत्नी को यह बताना नहीं चाहता था कि मैंने खाना खा लिया है और पेट भरा हुआ है। अगर यह बता देता तो पत्नी का खाना, खाना असंभव हो जाता। इस मामले में मेरी पत्नी निरर्थक भावुकता की शिकार हैं.. वे कई बातों में आज की महिला नहीं जान पड़ती.. उनका मानना है कि पत्नी को खाना तभी खाना चाहिए जब पति खाना खा ले और अगर पति न खाये तो उसे नहीं खाना चाहिए। शादी के लम्बे अन्तराल के बाद भी मैं यह नहीं समझ पाया कि वे ऐसा किन मनोवैज्ञानिक दबावों से करती हैं.. मैंने कई बार उनसे कहा भी है कि आप ऐसा न किया करें, पर वे साफ कहती हैं.. ‘आपको यह विसवास होना चाहिए कि हमैं अपनी जिम्मेवारियॉ मालूम हैं.. तथा हम जानती हूॅं कि हमैं का करना चाहिए और का नाही.. आप बूझ रहे होंगे कि हम पूजा, पाठ वाली मेहरारू हूॅॅ और आपको परमेश्वर समझती हूॅ पर ऐसा नाही है, मैं जानती हूॅॅ कि आप परमेश्वर नाहीं हो सकते। आप केवल आदमी हैं, जैसा कि होना चाहिए। आप मेरे लिए पूजनीय हैं, काहे से कि आपके साथ मेरी सांसे गुथी हुई हैं.. मेरी धड़कनों में आप हैं, हमैं लगता ही नाहीं कि आप हमरे से अलग हैं.. शीसे में हम आपन चेहरा देखना चाहती हूॅॅ पर हमार चेहरा तो तब देखाय जब आप न देखांय। आप ही देखाने लगते हैं, हमैं हसी आती है, यह का हो रहा है, हम खुद को काहे नाहीं देख पा रही, कहीं हम सपना तो नाहीं देख रही? अब आपै बतायें आपके बिना, का खाना, का सोना, का रहना।’ पत्नी की अनावश्यक भावुकताओं के बारे में मुझे टिप्पणी करनी चाहिए कि नहीं यह विमर्श का विषय हो सकता है पर मेरे लिए टिप्पणी करना सरल नहीं.. मैं तो बातचीत के समय उन्हें एकटक देखता रह जाता हूॅॅ और समझने की कोशिश करता हूॅॅ कि कहीं मैं आधुनिक तो नहीं हो रहा या पत्नी ही अतीत की दासी तो नहीं हो गई हैं? बहरहाल मैं इस रहस्य को अब तक नहीं जान पाया। अब तो जानने की इच्छा भी नहीं.. मैंने खुद को उनके अनुसार ढाल लिया है और समय के अनुसार सरक रहा हूॅ.. खाना खाते समय पत्नी मेरे सामने ही बैठी होती हैं.. उनका सामने बैठना मेरे लिए आनन्दायक होता है। जब वे सामने बैठी होती हैं, निश्चितरूप से एक दो रोटी अधिक खा जाता हूॅ। खाने का स्वाद बढ़ जाता है। उस समय वे उन सवालों को भी नहीं छिपा पातीं जिन्हें छिपाना चाहिए, जितना उनके मन में होता है, उसके एक एक रेशे को उघार देती हैं.. मसलन मैं कहां गया था, क्यों गया था और जहां गया था, वहां हुआ क्या, मीटिंग थी तो कैसी हुई? कौन, कौन बोला, किसका भाषण कैसा था? आप कैसा बोले, खुल कर बोले कि नाहीं, फिर खुल कर क्यों नहीं बोलते, आप खुल कर नहीं बोलंेगे फिर कौन बोलेगा? सारी जिनगी लिखने और बोलने में ही तो लगा दी आपने।’ उनके सवाल और सुझाव तथा प्यार भरी निगरानी पर मेरा दार्शनिक बन जाना असंगत नहीं होता पर मैं सामान्य ही बना रहता हूॅ। मैं नहीं कह पाता कि अरे भाई! ऐसी क्या बात है, मैं तो जब भी बोलता हूॅं, खुल कर ही बोलता हूॅं, मेरे पास बन्द, बन्द जैसा कुछ है ही नहीं, सारा कुछ खुला खुला है। पत्नी मेरे सामने बैठी हुईं थीं और मैं खाना खाने का नाटक कर रहा था जिससे उन्हें मालूम न हो कि मैंने खाना खा लिया है। खाने के लिए सिर्फ दो रोटी मांगा.. ‘काहे, केवल दो रोटी, गैस बन गई है का, इसी लिए बार बार कहती हूॅं कि समय पर खा लिया कीजिए। अच्छा! रसियाव तो खाइएगा नऽ, गंाव से नया चावल आया है, साल का पहिला अनाज, रसियाव बनाना जरूरी था, आप चले गये थे, दूध कौन लाये, बल्टा वाले ने दो किलो से अधिक दिया नाहीं, एक किलो और चाहिए था, किसी तरह मंगवाया’ हां यह तो आपने बताया ही नहीं कि शशि के यहां काहे के लिए मीटिंग थी, किसी परदर्शन वगैरह की तैयारी चल रही का?’ ‘नहीं ऐसा कुछ नहीं, वहां दूसरे किस्म की मीटिंग थी, एक रोग होता है ‘एड्स’ उसी के बाबत’ ‘हां हां जानती हूॅं एडस, वही देह वाला रोग नऽ, एडस रोक लेंगे का आप लोग, कैसे रोका जाये इसी के लिए मीटिंग हुई होगी नऽ, एडस रोकने के उपायों के बारे में आप लोगों ने का का विचारा। कोई उपाय है भी का? हम जानती हैं कि एडस देह का रोग है। एक देह से दूसरी देह में फैलता है। देह है कि ओके गुत्थम, गुत्था होना ही है, फिर किसे पता कि किस देह में यह रोग है और उस देह से गुत्थम, गुत्था नहीं होना। वैसे भी गुत्थम, गुत्था होना भी तो रोग है, फिर कैसे रुकेगा यह सब, एड्स तो तब रुकेगा जब गुत्थम, गुत्था होना बन्द हो जाये।’ पत्नी ने मुझसे पूछा.. मैं उन्हें एड्स के बारे में क्या बताता। वे सारा कुछ जानती हैं.. उनसे इस बारे में बातें करना बेकार था। उनके एक नातेदार इस रोग से कुछ साल पहले मर चुके थे। अब तो वे कहानी बन चुके हैं.. बंबई वाले हीरो के नाम से। बंबई गये थे हीरो बनने लौटे तो एड्स ले कर, पांच छह महीने बाद मर गये। गनीमत थी कि बिना बिआह शादी वाले थे नहीं तो जाने का होता। बेकार इस लिए कि वे बात को आगे तक खींच ले जातीं, अक्सर ऐसा ही होता है। मुझे अचरज होता है, एक औरत जो पढ़ाई के नाम पर जैसे तैसे प्राइमरी है, बहस को तार्किक कैसे बना देती है? मानना होगा कि अनुभव भी कोई चीज होती है। फिर मैं उन्हें क्या बताता कि ऐसे कामों में मैं क्यों रुचि लेता हूॅं जिनसे एक पैसा मिलना, जुलना नहीं, समय नष्ट करना ही तो होता है। घर पर पड़े रहो तो आराम मिलेगा, ऐसी जांगर खटाई से क्या लाभ, कभी मीटिंग तो कभी कार्यशाला, कभी ट्रेनिंग, दो दो दिन घर से दूर रहो। कभी आधी रात आओ तो कभी आने का कोई समय ही नहीं, अब घर भी पहले वाला नहीं, घर में बहू है, उसके बच्चे हैं जाने क्या सोचें गुने, वैसे ही वह अपने में खोयी रहती है, हमलोग नहीं चाहते कि उसे दुख हो.. एक बार पत्नी ने संकेत किया था शशि के बारे में.. ‘वह जो शशि आती है उसके साथ आपको देख कर मुहल्ले वाले भीतर ही भीतर कुछ बोलते हों तो किसे मालूम, हालांकि शशि वैसी नहीं जान पड़ती पर मर्द और औरत का एक साथ होना, एक विचार का होना, एक को दूसरे में देखना फिर खो जाना एक दूसरे मंे.. एक दूसरे में खोये नहीं कि मन उछाल देगा देह को? यही सब तो देह को नचाने, गवाने लगता है, एक ही बार की तो बात होती है, झिझक खतम, बहक शुरू।’ मेरे लिए पत्नी के सामने चुप बैठना बहुत ही हितकर होता है ऐसे समय में मैं गंभीर किस्म की हसियों का प्रयोग करता हूॅं जिसमें कोई नदी बहने लगती है फिर तो उन्हें तैरना पड़ जाता है। फिर घातक उलाहना... ‘आपन उमर नाहीं देखते, इस उमर में भी जवान बने हुए हैं, अरे! ऐसा भी मजाक का जो उमर से मेल न खाता हो, देह झूल गई फिर भी मन नाहीं झूला, फुदुक रहा है डार डार। देह झूल गई समझ लो मनउ झूल गया, अब तो पटेंग न मारो, मेढक की तरह टें, टें, पानी बरसे, नाहीं बरसे।’ ‘पानी तो बरसेगा ही, कहीं दूर से लाना तो नहीं, सोचो तो अगर मेढक टेंटें न करे फिर करे का?, रही बात देह की, देह कभी नहीं झूलती, झूलती नेह है, नेह झूल गई समझ लो देह झूल गई। जैसे, जैसे नेह झूलती और टूटती जाती है वैसे,वैसे देह भी अपने आप झूलती और टूटती जाती है। सारा खेल तो नेह का है। नेह है कि वह कभी झूलती नहीं, उमर बढ़ने के साथ जवान होती जाती है। तोहैं का मालूम कि तोहैं देख कर हमें कैसा जान पड़ता है?’ ‘अरे! एक रोटी और ले लीजिए, अब ई का है कि आप चार रोटी भी नहीं खा सकते। जवान बनते हैं, जवान का दो ही रोटी खाते हैं? आपको मोटापा वाला रोग भी तो नाहीं है कि खुराक कम करना जरूरी है। नाहीं, नाहीं हम समझ सकती हूॅॅ कि आप मोटे नाही हैं, आपका मन ही मोटा गया है और जब मन मोटा जाता है नऽ, सारी चीजें पातर हो जाती हैं..’ कहते हुए पत्नी ने थाली में एक रोटी और डाल दिया। उनका मानना है कि बुढौती की धमक उस पर नहीं होती जिसके पेट में अन्न की गमक होती है।’ थाली में रोटी पड़ जाने के बाद तो मुझे उसे खाना ही था। ज्योंही मैंने रोटी का टुकड़ा किया, पत्नी दही की कटोरी ले आयीं.. ‘का लीजिएगा दही में, काला नमक, जीरा या चीनी’ चीनी ही ठीक रहेगी, खाना मीठा तो बातें मीठी, बातें भी तो बहुत करनी है। फिर पत्नी कुछ नहीं बोलीं, सीधे चली गईं किचन में, वहां गांव से आये हुए आम पानी में भिगोए हुए थे, उसे काटना था फिर अचार बनाना था। किचन से बाल्टी लेकर आते हुए मैंने उन्हें देखा, बाल्टी में आम थे, आम देखते ही मुझे लगा कि गांव से कोई आया होगा, ये आम तो हमारे अपने बगीचे के दीख रहे है.. ‘गांव से कोई आया था का?’ मैंने पूछा.. ‘नाहीं तो, का मतलब? सपना देख रहे हैं का, गांव से कोई काहे आयेगा आप तो हालै में गांव से आये हैं नऽ’ ‘कहां का आम है यह?’ मैंने पूछा बजार का, काल्हु खरीदे हैं, अगल बगल वाले खरीद रहे थे, हमहूॅं खरीद लिए। एक दो दिन में गांव चले जाइए, सारा आम तोड़वा कर ले आइए नाहीं तऽ एकउ नाहीं बचेगा, सब तोड़ा जायेगा, लड़कियों के यहां भी तो भेजना होगा नऽ’, पुरबहवा अमवा तऽ खूब बउराया था, फरा है कि नाही..’ ‘ओहर हम कहां गये थे, बाबा के दुआरे से ही लौट आये’ किसी अपराधी सा मैंने जबाब दिया ‘हां हां आप ओहर काहे जायेंगे, खेत कियारी, बाग, बगइचा से आपका का मतलब? ओहर जाने से तो घिनाते हैं, खेतवा काट लेगा नऽ आपको, वइसे भी पंचाइत से फुर्सत मिले तब नऽ’। पत्नी फुसफुसाईं और ठमक कर बड़े वाले चाकू से आम काटने लगीं जैसे आम के साथ वे मेरी आदतों को भी काट रही हों। नमक, मसाला मिला कर अचार बनाने के लिए। मुझे मालूम था कि चाकू से आम काटना आसान नहीं होता, उसकी गुठली मजबूत होती है। खेत वाला अप्रत्याशित प्रसंग न उभरा होता तो मुझसे कहतीं.. ‘अमवा काट दीजिए नऽ, हमसे नाहीं कटाता है’ पर काहे कहतीं.. मेरी कुछ आदतें उन्हें काफी बुरी लगती हैं कि गांव जाने पर भी मैं खेत की ओर नहीं जाता। दिन भर दरवाजे पर ही बैठा रह जाता हूॅ। कोई न कोई आता ही रहता है। कभी किसी काम के लिए तो कभी केवल हाल अहवाल के लिए। खेत पर जाना तो मैं चाहता हूॅॅ पर वहां जाने पर भारत सरकार की तमाम योजनाएं मन में कुलबुलाने लग जाती हैं..। यह प्लाट इतना खूबसूरत, लगभग लगभग वर्गाकार है, अगर इसमें एक बड़ा कूंआ खुद जाता, एक जेनरेटर होता उसके साथ मोनोब्लाक भी तो यह प्लाट उत्पादन का भंडार हो जाता। धान वाली कुछ कियारियां समतल नहीं है, उनका समतलीकरण हो जाता, जिससे कियारियों में बराबर पानी रुकने लगता फिर तो धान की पैदावार कम से कम दस फीसदी बढ़ जाती। ऐसा नहीं है कि मैं खेत पर जाता ही नहीं, दोे महीने पहले ही तो गया था। वहां पहुंचते ही कुछ लोग अपने घरों से बाहर निकल आये, उनसे हाल अहवाल हुआ। उनमें से एक ने बताया कि मेरे खेत से कुछ लोग मिट्टी निकाल कर ले गये हैं, एक आदमी एक बांस काटकर ले गया है, कोई सूखी डार ही उठा ले गया जो दस फीट लम्बा रहा होगा। सभी की बातें सुन कर मैं खामोश रहना ही उचित समझता हूॅ। शिकायतें हैं, तो हैं, वे रहेंगी भी। बिना नाम जाने किसी को आखिर कैसे रोका जा सकता है, या किसी से पूछा जा सकता है। एक बार मैंने एक शिकायत करने वाले एक जन से पूछा था.. आपने देखा था क्या? ‘हां हां देखा था’ फिर रोकना चाहिए था, आपने उसे रोका होगा ‘नाहीं,रोका’ रोकना चाहिए था नऽ, अगर रोक देते तब मेरी लकड़ी बच जाती, मेरा नुकसान नहीं होता। ‘मैं कैसे रोकता, मालिक नहीं हूॅं, वह हमारे ऊपर टूट जाता, साफ बोलता तूं कौन है रे! फिर हम का बताते ओसे?’ ‘बोल देते मालिक ने कहा है..’ ‘हम कैसे बोलते ऐसा? आपका आदमी जो आपका खेत कियारी देख रहा है वह बोलता ही नाहीं, वह कभी बांस तो कभी लकड़ी बांटता रहता है। आपके गांव वाले डीह से भर भर झोला तरकारी लाता है, अपनी पट्टीदारी में बांटता है, हम लोगन को मांगने पर भी नहीं देता। उस आदमी से बात हो ही रही थी कि किसुन भी वहीं चला आया जो मेरे खेत की रखवाली करता है। मैंने उससे पूछा.. कौन लकड़ी उठा ले गया किसुन! और कौन मिट्टी? तोहें कुछ मालूम है का? ‘एक बांस तो इहय काटे हैं, दूसरे पर टंगारी मार दिए थे, कइसहूॅं हमने देख लिया फिर रोका। बंसवा ले जाने के लिए, हमरे से खूब झगड़ा किये, हम नाहीं जाने दिए, तब से नाराज रहते हैं हमरे पर, टोला में घूम घूम कहते हैं कि ओकरे बाप कऽ बांस तो था नाहीं, फेर काहे रोका, हम देख लेंगे ओके, मालिक को आवै तऽ दो।’ जाने कितनी बार किसुन इस तरह की शिकायतें मुझसे कर चुका है। ऐसी शिकायतों के समाधान भी तो नहीं हैं.. किसुन के ही नहीं मेरे वश का भी नहीं है कि इस तरह का काम करने वालों को तक्षशिला का विद्यार्थी बना सकंू.. वे जो कर रहे हैं, वही करेंगे पर जो विचारवान हैं वे ऐसा कभी नहीं करेंगे। किसुन से मैं साफ कह चुका हूॅॅ कि इस तरह के मामलों में कभी झगड़ा, रगड़ा नहीं करना, अगर ऐसी बातें हुआ करें तो सीधे परधान के पास चले जाया करो या जोखन दाऊ के यहां, फोन पर मुझसे बात करा दिया करो। वैसे भी किसुन काफी संतुलित और गंभीर लड़का है, किसुन की बातें सुन कर शिकायत करने वाले को तो सांप सूंघ गया। उसका चेहरा बदल गया, पहले दमक रहा था जैसा कि फर्जी वालों का होता है। किसुन के बताने के बाद मुझे शिकायत करने वाले से पूछना ही था.. ‘का हो तूं बांस काटे थे काऽ’ शिकायत कर्ता चुप तो चुप, वह का बोले, कैसे बोले कि बांस नहीं काटा था। इस बात को किसुन मुझसे पहले ही बता चुका था फिर भी मैंने शिकायतकर्ता से पूछना उचित नहीं समझा था। रही होगी कोई जरूरत, काट लिया होगा, अगर वह बांस मांगता तो मुझे देना ही था, मैं इनकार तो करता नहीं.। यह सब तो मालिकाने का रगड़ा झग़ड़ा है, और मालिकाना कभी खतम होने वाला नहीं, वह वहुरुपिए की तरह किसिम किसिम का रूप धर कर धरती पर प्रकट होता रहेगा, मेरी तरह, दाऊ की तरह। धरती रहेगी उस पर उगी या उगाई हुई चीजें भी रहेंगी पर उन चीजों का अपना कोई वजूद नहीं होगा। वे किसी न किसी मालिक के अधीन ही होंगी। जाहिर है इस धरती का कोई भी आदमी इस वहियात अधीनता से बाहर हो ही नहीं सकता। मालिकाने में स्वाधीनता की खुशबू का भ्रम है तो उसकी हिफाजत में सŸाा की संप्रभुता की अकड़। फिर भी जाने क्या है कि हमें मालिकाना चाहिए ही चाहिए। मैंने उसे सहेजा.. अगर ऐसा आप लोग ही करेंगे तो मेरा खेत खलिहान बचाएगा कौन? मैंने देखा कि शिकायत कर्ता के चेहरे पर कुछ धुआं धुआं सा है। मुहब्बत का हार
यह सच है कि गांव जाने पर अगर कोई विशेष काम नहीं हुआ तो मैं खेत की तरफ नहीं जाना चाहता। अगर खेत फसल से नहीं लह लहा रहा हो तो उस तरफ का जाना, केवल मेड़ें ही तो दिखेंगी तनतनाई और खेतों को जकड़ी हुई। फिर तो लगता है मन की हरियाली छटपटा रही है। मुझे खेतों की परवशता देख कर तकलीफ होती है। फसलें लगी होती हैं तब मन भी फसलों की तरह हिलोराता रहता है। फसलों का लहराना, भीतर तक किसी दैवीय संगीत का गुंजायित होना सारा कुछ मुझे ताजा बना देता है फिर तो कुछ समय के लिए फसलों की पैदावार का हिसाब किताब भूल जाता हूॅ। इस साल कितना लाभ हुआ खेती में, कुल कितना खर्च हुआ दोनों का हिसाब किताब अगर मन में चलता रहेगा फिर तो फसलों की सारी मादकता उड़नछू हो जायेगी। पेट और मन का झगड़ा कभी समाप्त होने वाला नहीं है। पेट को जो और जितना चाहिए उससे अलग और कुछ अधिक ही मन को चाहिए। उन दोनों को एक साथ जोड़े रखने का काम फसलें अगर न करें तब तो किसान खेती करना ही छोड़ दे, कोई दूसरा विकल्प चुन ले। कुछ हो सकते हैं जो खेती में लाभ का प्रतिशत देखें, सभी नहीं.. अगर कभी मैं फसलों से खाली खेत की ओर चला गया तो लौटते समय मैं या तो किसी गूढ़ कविता की तरह बेजान हो जाता हूॅॅ या ओबरा की उन पहाड़ियों की तरह जिन्हें बहुत ही निर्ममता से गिट्टियों में तब्दील किया जा चुका है, तथा आज तक किया जा रहा है। घर लौटते समय पत्नी को कोसना, मैं चाहूॅं भी तो नहीं भूल सकता, हर कदम पर उन्हें कोसता रहता हूॅ.. यह क्या है कि.. ‘खेत की ओर चले जाइए, धमक बनी रहती है, लोग समझते हैं कि मालिक निगरानी करते रहते हैं, कभी भी आ सकते हैं, खेत अनाथ नहीं हैं, कोई है जो इन्हें दुलारने वाला है’ मेरी समझ में नहीं आता कि यह जो मालिकों वाली धमक है, वह है का चीज? जिसे मालिक या मालिकिन धमक समझते हैं, वह महक तो नहीं जिन्हें सूंघते ही मजूर घिना जाता है। फिर भी मालिक समझता है कि उसकी धमक के कारण मजूर सहम गया है। वह सहमता नहीं, वह घिनाता है बुरी तरह। यह उसकी घिन ही है जो कहीं कहीं हादसे का रूप धर लेती है। मैं अप्रत्याशित हादसों को निमंत्रित करना बेवकूफी मानता हूॅं तद्नुसार खुद को एक ऐसे सांचे में ढालने का काम करता हूॅं जिससे किसी से दुआ सलाम न बन्द हो..। चाहे स्थिति अनुकूल हो या विपरीत। अब तक तो बिना किसी तनाव के समय पार कर चुका हूॅॅ, आगे क्या होगा सारा कुछ भविष्य के हाथ में है। मुझे यकीन है कि जीवन जीने के तरीकों में अगर विनम्रता की भूमिका हो तो विपरीतताओं को अनुकूलताओं में ढालना कुछ आसान हो जाता है। यह अलग बात है कि खेत की ओर जाने से लगता है कि मेरे पास भी है कुछ, एकदम से गया गुजरा नहीं हूॅ। खेत के स्वामित्व की गांठ इस मामले मे भली जान पड़ती है। कि मालिक हूॅं, लेकिन बुरी भी कम नहीं लगती अगर मालिक नहीं होता तो गोमटी लगाता तथा पान बेच कर भी काम भर का कमा लेता। पर मालिक हूॅं, लोग मालिक समझते भी हैं, वह तो मुझे पता है कि मैं किस तरह तथा किस बात का मालिक हूॅॅ, खानदानी जमीन का, और क्या है? मालिक साबित करने के लिए मेरे पास। खेती से साल भर का घर खर्च भी तो नहीं चलता। अगर मित्रों ने मेरी अकिंचनता पर दया नहीं की होती तो क्या मैं खेती की ताकत पर बैंक का कर्जा चुका पाता? हिसाब है उसका, पत्नी को सारा कुछ मालूम है। पांच साल में ही दस हजार का कर्ज तीस हजार हो गया। आर.सी. कट गई। आर.सी. वारंट से कम नहीं होती। तहसील का अमीन पकड़ कर तहसील के हवालात में डाल सकता है, चौदह दिन के लिए जिसकी जमानत भी नहीं होती। यह अंग्रेजों का बनाया कानून है, कोई अपराधी हो न हो, लगान का बकायेदार तो होगा ही, पकड़ कर डाल दो हवालात मंे.. जमीनदारों या अपने विरोधियों को इसी कानून के द्वारा अंग्रेज हवालात में ठूंसा करते थे। मुझे मालूम है कि किसुन की सहभागिता; खेती तथा अन्य कामों में अगर मुझे न मिल रही होती तो मेरा गांव जाकर दस पन्द्रह दिन टिकना तथा खेती के तामझाम को संभालना मुश्किल होता। गांव पहुंच जाने पर मुझे इस बात की चिन्ता नहीं रहती कि दूध कौन लाएगा, कहां से लाएगा, रामगढ़ बाजार कौन जायेगा, रसोईं का सामान खरीदने या किसी को बुलवाने के लिए। धान की फसल में यूरिया का छिड़काव कौन करेगा, मेड़ें जो वारिश के कारण टूट गईं हैं, उन्हें कौन बांधेगा? घर तथा घर के बाहर वाले मन्दिर के आस पास की सफाई कौन करेगा। किसुन के ऊपर मेरी पराश्रयिता ने एक तरह से मुझे इतना कोढ़ी बना दिया है कि मैं सोच भी नहीं सकता कि सारा काम मुझे कर लेना चाहिए। किसुन जैसे सहायकों पर आश्रित रहना खुद को मुर्दा बनाना है। कभी कभी मैं इस सवाल से परेशान हो जाता हूॅं कि किसुन की आर्थिक विवशताओं का यह जो अवांक्षित लाभ मुझे हासिल हो रहा है क्या यह मानव सभ्यता के लिए कलंक जैसा नहीं है? इतना कुछ सोचते गुनते हुए भी किसुन को मैं इन दायित्वों से अलग नहीं कर पाया। यह किसुन की आन्तरिक महानता ही है कि वह मेरे लिए मेरे जिस्म का एक हिस्सा बन चुका है, और मेरे लिए विध्वंशक आत्महीनता कि मैं उसे अपने लड़के के बराबर का दर्जा नहीं दे पाता हूॅॅ। मैं भी वैचारिकता की तमाम सीमाओं से पार जा कर केवल यह प्रमाणित कर रहा हूॅॅ कि पुत्र पुत्र होता है तथा पुत्र मोह जैसा रोग भी मालिकाने वाले रोग की कमजोर डाल ही है, वृक्ष तो मालिकाना है ही। सारी दुनिया इसी वृक्ष के नीचे बैठ कर सुस्ता कर, लेट कर अपने जीवन के उत्सवों को मना रही है। पिछली बार जब मैं गांव गया हुआ था तब मुझे किसुन का साथ कुछ दिनों के लिए नहीं मिल पाया था। किसुन अपनी ससुराल गया हुआ था। नवरात्रि का महीना चल रहा था। देहाती क्षेत्रों में यह महीना दैव आह्वान ले कर आता है, किसिम किसिम के पूजा पाठ आरंभ हो जाते हैं, कहीं किसी देवता की तो कहीं काली, भगवती की तो कहीं भूत, प्रेत, डाइन, डीहवार वगैरह की। गांवों में हर गली में तथा हर दीवार पर देवताओं के प्रति आस्थाओं के पोस्टर टंग जाते हैं.. एक तरह से वहां आस्थाओं के कौतुकों को देखा व महसूसा जा सकता है। किसुन भी उसी आस्था के कारण अपनी ससुराल गया हुआ था जिससे कि वह अपनी पत्नी की ओझइती करा सके। उसने मुझे एक बार बताया भी था.. ‘ओझा ने उसकी पत्नी की जान बचा दी, वह तो रात में पगला जाया करती थी।’ मैं केवल इतना ही जानता था कि उसकी पत्नी बीमार रहा करती है। बाद में मेरी पत्नी ने असल बात बताया। मुझे बहुत ही अचरज हुआ, क्या ऐसा भी रोग होता है जो किसी को इतना बेवश कर दे कि वह सारा कुछ भूल जाये और किसी ब्लूफिल्म का पात्र बन जाये। किसुन की पत्नी रात होते ही ब्लू फिल्म का पात्र बन जाया करती थी और किसुन था कि परेशान परेशान हो जाया करता था। वह घंटे दो घंटे भी चैन से नींद में नहीं उतर पाता था, वह ज्यों ही नींद में उतरता या उतर रहा होता उसकी पत्नी दैहिक उŸोजना की क्रीड़ा आरंभ कर देती। थका, मादा दिन भर काम पर जांगर खटा चुका किसुन उस समय बेवश होता। एक दो बार की बात कुछ और होती है, उसके लिए वह भी उत्साहित रहता ही, उमर थी, अभी अभी तो उसने जवानी की नदी में तैरना शुरू किया है, नदी है कि उफनिया गई है। उफनियायई नदी में कितना तैरे वह? देह टूटने और खंड, खंड होने तक तैरना उसके लिए मुश्किल होता। उसकी पत्नी थी कि नदी में तैरने वाली न हो कर नदी बन जाती, किसुन को लहरों में तो कभी भंवर में ही डुबोने लगती आखिर किसुन बढ़ियाई नदी में कितना तैरता? वह पगला जाता समझ न पाता कि उसकी पत्नी को का हो गया है? कुछ न कुछ तो पर्दा खुले लोगों में भी होता है, फिर वर्जनाओं की धूप तो हर जगह पसरी होती है, बदरियां भी होती हैं.. इन दोनों के भीतर जीवन के उत्सवों को आयोजित किये जाने की संभावनाएं भी रहती हैं, पर किसुन की पत्नी के लिए वर्जनाओं का कोई मतलब न था। वह तो किसुन को देखते ही बाढ़ में बदल जाती थी, और बाढ़ भी ऐसी जो बहा ले जाये या डुबो दे गहरे में.. किसुन अक्सर उस बाढ़ में डूब जाया करता था पर ओझा ने उसे बाढ़ में डूबने से बचा लिया। कथित ओझा ने किसुन को बाढ़ में डूबने से कैसे बचा लिया? मैंने पूछा था पत्नी से। उन्होंने बताया था.. मुर्गा, बकरा, तपावन तथा पूजा के लिए तीन हजार रुपया लिया, तमाम तरह की पूजा किया, ओझइती की, फिर उसका भूत भाग गया। उसे किसी पापी भूत ने पकड़ लिया था। पत्नी यह नहीं बता सकीं कि वह पापी भूत कहां का था और किसुन की पत्नी को कैसे जकड़ लिया था? क्या उसके लिए दूसरी औरतें नहीं थीं, उनमें से किसी को छांट लेता। वह बेचारी तो केवल एक औरत है, औरत की चमक तथा दमक से दूर, उसके पास मर्दाें को खींच लाने वाली चमक भी तो नहीं, देह तो उसकी हिलती डुलती तथा किकुड़ियाई रहती है, लगता ही नहीं कि वह औरत है तथा उसकी देह पर औरतों के आकर्षण थिरक रहे हैं, फिर उस हरामी भूत ने किसुन की पत्नी को ही क्यों पकड़ा? उसी समय मुझे मजाक सूझा था.. ‘मुझे मिलना है उस ओझा से, किसुन के साथ जाऊंगा उस ओझा के पास’ ‘आप काहे जायेंगे उसके यहां?’ ’उससे काम है, मुझे मिलना है भूत से। वह बहुत ही प्रतापी भूत है, इतिहास के राजाओं महाराजाओं या सम्राटों की तरह, मुझे उससे मिल कर मालूम करना है कि क्या उसकी दुनिया में कोई ऐसा भूत भी है जिसकी जाति न हो तथा मजहब न हो, अगर ऐसा हो तो बताओ, मुझे उसकी सेवायें लेनी हैं।’ ‘कैसी सेवा?’ ‘सेवा तो सेवा, सेवा की किस्में तो होती नहीं’ ‘फिर भी बताइए नऽ’ बहुत ही गंभीर हो कर भूत की सेवा शर्तों को मैंने बताया। पत्नी हसी में डूब गईं इतना डूबीं कि उनकी आंखों में लोर आ गये। साथ ही साथ मैं भी हसने लगा, हसना था ही, लोग देखते तो चकरा जाते, काहे हस रहे दोनों, वह भी ऐसी हसी। हसी खतम होने के बाद पत्नी ने सहज भाव से स्वीकारा कि आप ठीक बोल रहे हैं, उसे रोग ही था कोई, एक बार आपने कोई रोग बताया था, का नाम था ओकर? ‘हां खियाल आया हीस्टीरिया नऽ, आपके एक दोस्त की मेहरारू को हुआ था कभी, एकर मतलब हुआ कि लड़िका, बच्चा हो जायेगा रोग खतम।’ ‘तो आप उस भूत की सेवा मेरे लिए लेना चाहते हैं ताकि मैं वह हो जाऊं जो आप मुझे बनाना चाहते हैं, आप डूबना चाहते हैं नदी में, एक बुन्नी पानी तो सह नहीं सकते, नहाना भी है तो गरम पानी से, चले हैं नदी में पउड़ने, कलम ले लीजिए अउर कागज पर पउड़िए, नदी में पउड़ेंगे तो डूब जायेंगे। ये उमर में हमैं काहे नदी बना रहे हैं ? अगर बाढ़ आ गई तब का होगा मालूम है कुछो आपको..’ अरे बाढ़, बाढ़ होती है, सारा कुछ डूब जाता है ओमें, कुछ पता नहीं चलता, कि का डूब रहा है, कैसे डूब रहा है, अच्छा है किनारे पर खड़े रहिए, किनारे पर खड़े हो कर नदी देखिए, अउर आंख में देखने की जोति लेकर लौट आइए। मने में गुनिए कि पउड़ रहे हैं नदी में, इसे ही मनजाउर कहा जाता है’ अरे नहीं भाई! मैं तो मजाक कर रहा था, आपकी कूबत को भला मैं कैसे ललकार सकता हूॅं, मुझे मालूम है कि आप चाहें तो मुझे एक झोंके में ही उड़ा ले जायें, इसी लिए मन होने पर भी मैं कभी भी उड़ना नहीं चाहता। जमीन पर तथा जमीन थाम कर रहना वैसे भी मुझे काफी अच्छा लगता है। गिरने का डर नहीं रहता। मुझे नहीं उड़ना और न ही छटपटा कर गिरना। अपनी ससुराल से पांच दिन बाद किसुन वापस लौटा। लौटने के दूसरे दिन सुबह ही मेरे घर आया। किसी ने उसे बता दिया था कि मैं गांव पर हूॅ.. यह पक्की बात है कि जब मैं गांव पर होता हूॅं फिर तो वह सुबह मेरे घर आना नहीं भूलता। वह जानता है कि उसे कहीं से दूध का प्रबंध करना होगा। दूध का प्रबंध करना मेरे वश का नहीं.. दूध का ही क्यों कोई सर सामान भी चाहिए तो मेरे लिए बहुत मुश्किल। पता नहीं क्यों गांव जाने पर अपने भीतर समा जाना मुझे बहुत अच्छा लगता है, का जाना कहीं, जहां जाओ हर जगह राजनीति की काली चादर बिछी मिलती है। यह भी चल जायेगा कि चलो चादर पर नहीं बैठेंगे, बच बचा कर निकल जायेंगे पर यही तो मुश्किल है कि कहीं जाओ और चादर पर नहीं बैठो, ताने और ओरहन मिलने लगते हैं.. ‘बड़का काबिल बनता है, हम लोग घास फूस हैं का? अबही ऐंठन नाहीं गई, एकर का औकात है, जो है वह सारा कुछ जोखन सिंह का है, उनके बले फउकता है, फउक लो बेटा केतना फउकोगे?’ ऐसे तानों को कई बार मैं सुन चुका हूॅं, आज भी लगातार सुन रहा हूॅं, गांव के लोग अभी बदले नहीं हैं, अब भी उनके जेहन में जमीनदारी वाली बातें कुललबुला रही हैं, जबकि मुझे खुद नहीं मालूम कि जमीनदारी वाली बातें क्या थीं.. मैं कभी भी उन बातों तथा घटनाओं का गवाह नहीं रहा हूॅं, भला हों फिल्मों का जिनसे मुझे मालूम हुआ कि जमीनदार काफी क्रूर हुआ करते थे तथा जमीनदारी किसी अभिशाप से कम नहीं थी। जोखन दाऊ को आज भी जमीनदार माना जाता है पर दाऊ के आचरण में मैंने कभी भी फिल्मों वाले जमीनदार का रूप नहीं देखा। वे साधारण रहन सहन वाले आदमी हैं और काफी व्यवहार कुशल भी। गरीब गुरबों से भी भइया, भइया कह कर बातें करते हैं.. गांव की कथित राजनीति में उनका पहले भी दखल था और आज भी है। दिल्ली या लखनऊ की सरकारें हमेशा टूटती और बिखरती रही हैं पर गांव वाली दाऊ की सरकार जैसे पहले थी वैसे ही आज भी है और जब तक जीवित रहेंगे तब तक भी रहे शायद। या हो सकता है कि दाऊ के लिए यह आखिरी चुनाव हो, इस बार उनका प्रत्याशी चुनाव हार जाये। पर दाऊ आश्वस्त हैं.. ‘ऐसा नाहीं होगा, हमार गांव दिल्ली अउर लखनऊ नाहीं है नऽ कि जो अब तक हुआ है वह टूट जाये अउर नये नये लोग नेता बनि जांये। हम का बतायें अगर हम दिल्ली में होते नऽ तऽ देखा देते कि कैसे सरकार चलती है, तूंहय नेता हो अउर तूंहय सबको लूट रहे हो। इहो नाहीं खियाल कर रहे हो कि पहिले तोहरे पास का था। मुखमंतरी चाहे मंतरी बनते ही का का नाहीं हो गया तोहरे पास। अरे भाई! एतना तऽ सोचो कि आजु कोई मूरख नाहीं है, खाली मजबूर है, मूरख होना अलग है, अउर मजबूर होना अलग। गांन्हीं बाबा का मूरख थे जो कउनो पद नाहीं लिए, देखि लो बिना पद वाले आदमी का कद, केतना बड़हर था? अउर तूं आपन देखो.. पद तऽ बड़हर होय गया पर कद माटी में सना गया’ हम गांव मे एही से कउनो पद नाहीं लिए हमरे लिए एतनै काफी है कि हमार आदमी पद पर रहे अउर हमसे सलाह मशविरा लेता रहे। भगवान का दिया हमरे पास बहुत है, हमैं पद लेकर दौलत नाहीं कमाना है। हमैं कउनो लालच नाहीं है फिर हमार का बिगड़ेगा? हमरे गले में जब तक आदमिन के मुहब्बत का हार है, हम कउनो चुनाव नाहीं हार सकते’ दाऊ आश्वस्त हैं कि जैसा वे चाहते हैं गांव में वैसा ही होगा, मुझे भी लगता है कि सुमन्त का प्रत्याशी चुनाव नहीं जीत पायेगा, जीतेगा दाऊ का ही प्रत्याशी।
उपन्यास वाली महिला ‘माई! माई! पापा कहां हैं रे!’ कांपती हुई आवाज मेरी नींद उड़ा देती है और मैं जग जाता हूॅं, यह तो बेबी की आवाज है। कमरे में मैं अकेले हूॅं, जगरन हो गई है। सुबह जगना मेरे लिए थोड़ा मुश्किल हो गया था। रात भर अपने उपन्यास में फंसा हुआ था, दो बजे रात के बाद ही नींद आयी। समझ में नहीं आ रहा था कि उपन्यास में मैं उस आदिवासी महिला का क्या करूं जो जहां भी जाती है, नये किस्म का झगड़ा खड़ा कर देती है। उसका स्वभाव बन गया है, लड़ जाना। थाने पर वह दारोगा से लड़ जाती है। उसे जाने क्या हो गया है कि वह वर्तमान को मुठ्ठी में बांध कर रखना चाहती है। थाने के बाहर भीड़ खड़ी हो गई है और वह चिल्ला, चिल्ला कर कह रही है कि दारोगा ने उसके साथ रात भर बलात्कार किया है, लोगों को संबोधित करते हुए कह रही है कि आप भी आइए उसके साथ वही कीजिए जैसा दारोगा ने किया है, नहीं तो दारोगा से कहिए कि वह अपना जुरुम कबूले। अगर वह अपना जुरुम नहीं कबूलता है तो हम कप्तान के पास जायेंगी। ‘अब यह क्या है कि जो चाहे, जब चाहे मुझे बिछौना बना दे। दारोगा ने मेरे मरद को पकड़ कर जाने कहां गायब कर दिया है, बोलता है कि वह नक्सलाइट है। रात में ऊ हमरे साथै था। तबै दारोगा ने उसे पकड़वा लिया अउर हमैं लाकर यहां बन्द कर दिया अपनी कोठरी में..। हमारा मरद दारू चुआ रहा था और हम गाहकों को दारू पिला रही थी। किसे नाहीं मालूम कि पियक्कड़ गाहकों को संभालना आसान नाहीं होता। पता नाहीं कौन का कर बैठे, अच्छे हुए तो सब चल जाता है, नाहीं तो.... उनमें कोई कोई तो ऐसे होते हैं, जो दारू पीते, पीते देह तक नोच लेते हैं फिर हमैं उन्हें रस्ते पर लाना होता है। अरे! हम दारू चुआते हैं, पर देह थोड़ै चुआते हैं लार की तरह, अउर देह लार तो होती नाहीं कि टप टप टपकने लगे। कोई उसे चूसे। चूसना हो तो अपने घर जाओ, जेतना मन हो, ताकत हो चूसो, मेहरारू के पास तो जाते ही बरफ बन जाते होगे, उहां जोर नाहीं चलता होगा। का हमार बिआह नाहीं हुआ है? हमरो बिआह हुआ है, हम देह का सारा तमाशा जानते हैं.. हमरो मरद कभी कभी तो सांड़ बन जाता है पर अक्सर लुजुर, पुजुर ही रहता है। भहरा जाता है खटिया पर, लाश माफिक। लाश का करेगी, लाश तो फुंकाएगी ही नऽ, अउर का होगा ओकर?अरे साहब! हम दारू बेचते हैं, देह नाहीं बेचते, जो देह बेचती होंगी ओकरे इहां जाओ। हमरे इहां काहे चले आये? फिर हमरे मरद को काहे पकड़ लिए, थाने का खर्चा बर्चा तो हम कइसहूॅं देते ही थे, पूछ लो साहब हमरे गांयें के गोड़इत से, ऊ सब बतायेगा सही, सही। फिर हमार देह रात भर काहे नोचे, हम तो चिल्ला रहे थे, दरोगवा को नोच, चोथ रहे थे, दो तीन जगह हमने दरोगवा को दांत से काट भी दिया है, परपरा रहा होगा, जो चाहे देख ले दरोगवा का हांथ, मन तऽ हुआ कि उहय काट लें पर मेहरारू जाति, हम का करैं, का नाहीं करैं, कुछ बुझा नाहीं रहा था। थाने के सामने कांपती हुई भीड़ थी। भीड़ सारा कुछ सुन रही थी, देख रही थी एक महिला द्वारा किए जा रहे अभिनव किस्म का विरोध पर उसमें कोई ऐसा समर्थ नहीं था जो किसी फिल्मी हीरो की तरह आगे आता और करिश्मा करता, दारोगा को पकड़ लाता, उसे घसीटते हुए माफी मांगने के लिए विवश करता या कोई दूसरे समाधान के बारे में गुनता। वहां तो सिर्फ भीड़ थी, बेवश तथा लाचार, थाने के अत्याचारों को सुन सुन कर डरी हुई फिर भी भीड़ बुदबुदाई..। ‘बेचारी के साथ बहुत बुरा हुआ’ वैसे भी भीड़ केवल बुदबुदा ही सकती थी। भीड़ का काम ही है बुदबुदाना, इसी लिए हर जगह इस तरह की भीड़ को देखा जा सकता है। थाना, कचहरी ही नहीं, विधान सभा तथा संसद की तरफ भी भीड़ होती है जो बात बात पर बुदबुदाती रहती है। लेकिन बुदबुदाने से अलग कुछ भी नहीं.. यहां तक तो मेरा उपन्यास बढ़ चुका था, कहीं रुकावट नहीं आयी पर इसके आगे का लिखना रुक गया था। अब इसके आगे उपन्यास में मैं क्या करूं? समझ में नहीं आ रहा था कि इस तरह की परिस्थिति में मैं समाधान के किन विकल्पों को चुनू.. उस महिला को छोड़ कर दारोगा का साथ पकड़ लूं और उसे इतना प्रभावशाली गढ़ दूं कि उसका सरकार भी बाल बांका न कर सके या नारीवादियों की वाहवाही लेने के लिए महिला को ही ताकतवर बनाकर दारोगा की हत्या करा दूं और वह अपने मरद को उसके चंगुल से छुड़ा ले पर यह हिंसात्मक तथा विभत्स होता। तथा भारतीय संस्कृति के विपरीत तो होता ही। क्या करूं? कैसे उपन्यास को आगे ले चलूं? मेरा उपन्यास महिला, दारोगा, तथा महिला के मरद की त्रयी में फंस गया था। मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था कि मैं उन तीनों की भूमिका को किस तरह से रचूं? वैसे भी मै बुकर पाने के स्तर वाला उपन्यासकार भी नहीं.. रात गहरा रही थी पर मेरा लेखक मन पतला हो रहा था। मुझे कोई समाधान नहीं सूझ रहा था जो पूरी तरह से आधुनिक होता तथा मर्खेज के जादुई यथार्थ की तुलना में अनोखा तथा सर्वप्रिय भी। उपन्यास के इस प्रकरण को महत्व पूर्ण बनाने की मेरी चिन्ता ने मुझसे मेरी नींद छीन लिया था। मुझे लगा कि विशेष तथा अद्भुत किस्म के लेखन वाला चक्कर मेरे वश का नहीं। उसी कारण समाधान नहीं निकल पा रहा था। बहरहाल कुछ भी हो मैंने उपन्यास के कथानक को उसी स्थल पर सलाम किया और निश्चित किया कि अब नींद की गोद में चले जाना है, कथानक भाड़ में जाये तो जाये, मैं का कर लूंगा। मुझे नहीं बनना प्रेमचंद या मर्खेज। आज भी प्रेमचन्द का होरी का कर रहा है, उस जमाने में वह गाय के लिए परेशान था आज के समय में टी.वी., कार, मोटर साइकिल के लिए। नींद में चले जाने के बाद मुझे पता ही नहीं चलता कि यह दुनिया सिर्फ और सिर्फ कुछ लोगों की है, जो दुनिया पर राज करते हैं। कानून बनाते हैं, तोड़ते हैं, हमला करते हैं। वे ही जज हैं तो वे ही फौज हैं। वे हाकिम भी हैं और हुकूमत भी। ऐसे माहौल में मेरे लिए मुश्किल होता कानूनों वाली इस दुनिया में लोकतंत्र की मुस्कराहटों और अंगड़ाइयों को देख पाना। नींद में जाने के बाद मुझे कैसे मालूम होता कि बेबी मुझे पुकार रही है, बहरहाल मेरी नींद खुल गई फिर मैंने पूछा..। ‘का है बेबी! काहे पुकार रही?’ बेबी घबराई हुई थी। मेरे पड़ोसी के दरवाजे पर तहसीलदार सिपाहियों के साथ आया हुआ था, सरकारी जीप बाहर खड़ी थी। बेबी जानती थी कि मेरे ऊपर बैंक का कर्जा बकाया है जिसकी वसूली तहसील चली गई है। तहसीलदार पकड़ कर चौदह दिन के लिए तहसील के हवालात में बन्द करवा देगा। सो वह मुझे यह सूचना बताने के लिए परेशान परेशान थी। बेबी का घबराना जायज था। गांव के कई लोगों को तहसीलदार ने हवालात में बन्द कर दिया था, उसने सुना था। वे चौदह दिन बाद हवालात से निकले थे। घबराने को तो मैं भी सुनते ही घबरा गया पर मुझे पता था कि जो होना होगा, वह होगा ही। फिर जोखन दाऊ के चलते ऐसा हो ही नहीं सकता। वही हुआ भी, तहसीलदार आया और वापस चला गया। मेरे दरवाजे पर नहीं आया और न ही मुझे वहां बुलवाया। यह वही समय था जब मैं लगातार महसूसता था कि सरकार, सरकार होती है, वह जब चाहे जिसकी चाहे चमड़ी उतार ले। मेरी भी चमड़ी इमरजेंसी में उतर गई होती अगर दारोगा सिर्फ दारोगा होता पर वह केवल दारोगा ही नहीं था, दारोगा के अलावा भी सोचने, विचारने व गुनने वाला था। पहली बार मुझे जान पड़ा था कि कविता, कहानी लिखना पढ़ना भी आदर व सम्मान वाला काम है। दारोगा ने उस समय लोगों से मेरे बारे में पता लगाते हुए बोला था..। ‘वही नऽ लिखने पढ़ने वाला, हल्की दाढ़ी वाला, जिसकी देह हवा में लहराती रहती है, अरे! ऊ का करेगा बगावत? हम ओके नाहीं पकड़ेंगे, का होगा ओके पकड़ कर, कविता कहानी वाला आदमी जब अपने लिए ही बेकार होता है फिर ऊ जेल में जा कर का करेगा, सरकार का ओकरे ऊपर फालतू में सौ दो सौ रुपया रोज खरच ही होगा।’ दारोगा ने बहुत नाटकीय ढंग से मुझे जेल जाने से उस समय बचा लिया था और पत्नी ने महसूसा था कि बरम बाबा की मनौती ने मुझे जेल जाने से बचा लिया। हुआ यह था कि मेरी गिरफ्तारी के बारे में दारोगा ने पहले ही मुझे सूचित करवा दिया था कि सी.ओ. के साथ आकर वह मुझे गिरफ्तार करेगा सो में तत्काल ही घर छोड़ दूं। मरता का न करता। मैं भी गिरफ्तार नहीं होना चाहता था। मेरे पास उस समय साहस की बहुत बड़ी कमी थी। हालांकि मैं अब तक इस स्थिति में नहीं हो पाया हूॅं कि बता सकूं कि मैं जेल जाने से तब क्यों डर गया था? स्मृति को दुबारा रच पाना वैसे भी आसान नहीं.. ऐसा भी नहीं था कि मैंने जेल की घुटन को नहीं झेला है। अगर उस समय मैं समझ गया होता कि जेल को खेल की तरह लेना चाहिए तथा सरकार के पास दम नहीं कि वह सारे लोगों को जेल में रख कर साल दो साल तक खाना खिला सके फिर तो आज मैं साफ,साफ कहता कि मैं कायर नहीं हूॅं। मैं अपनी कायरता को अब चाहे जितना धिक्कारूं उससे कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला। हालांकि उस समय मेरी कायरता अपने घर तथा रिश्तेदारों में उतनी ही महिमामंडित हुई थी जितना मेरा लेखकीय व्यक्तित्व निन्दित हुआ था। यह क्या है कविता, कहानी में गोते लगाते रहना, जिससे एक कौर भी खाने के लिए हासिल नहीं हो सकता। एक तरह से मेरी कायरता का प्रतिफल दिखावे के तौर पर मेरे लिए सकारात्मक था पर मेरे दिल तथा दिमाग के लिए उथल, पुथल वाला। मेरा लेखक मुझे बार बार धिक्कारता, फटकारता.... ‘एक अवसर मिला था तुमको, जिसे तूंने गंवा दिया, ऐसे अवसर मिलते नहीं हैं..’ पर जो होना था हो चुका था, बीते दिन लौटते नहीं.. समय के साथ मैं अपनी रची हुई परिस्थितियों में उलझता चला गया। उलझनों ने मुझे इस कदर घेर लिया कि मैं उन्हें जितना सुलझाता उतना ही उनमें उलझता जाता। पर न तो थका न ही हारा, हाथ पैर लगातार मारता रहा। समय बढ़ता रहा और मुझे अपने साथ घसीटता रहा। कभी ऑखों में ऑसू भरकर तो कभी प्यार। प्यार उधार का नहीं बच्चों के लगाव का, पत्नी के छोह का। बच्चों को देखते ही मुझे सारे दुख दर्द भूल जाते। मैं खुद परिवर्तित हो जाता फिर मुझ पता ही नहीं चलता कि यह जो मैं उलझा हुआ हूॅं, इन उलझनों को मैंने ही रचा, गढ़ा है। समय, समय पर उन्हें दुलारा, सहलाया है, बिना जाने कि यह जो हसीन माफिक दिखने वाली दुनिया है, वह हसीन नहीं है। खुरदुरी और कटीली है। हो तो यह भी हो सकता है कि मेरी अतिरिक्त चहनाओं ने ही मुझे उलझन में डाल दिया हो और जैसे तैसे सुविधाओं व सुखों के बिस्तरों पर नाच रहे लोगों को देख देखकर मैं अन्धा हो गया होऊं.. कुछ न कुछ तो यह सच था ही। सुविधाओं की ललक मुझे लगातार कमजोर बनाती रही है और मैं किसी बेचारे की तरह अपने आत्म विश्वास की परमशक्ति को क्षीण करता रहा हूॅं.. लम्बे अन्तराल तक मेरा उपन्यास अधूरा ही रहा। थाने पर अपने स्वत्व व स्वाभिमान के लिए झगड़ रही महिला के लिए औपन्यासिक स्तर पर भी मैं कुछ नहीं कर सका। वह बेचारी मेरे उपन्यास में अधूरे जीवन वाली कथा नायिका की तरह छटपटाती रही पर मैं उसके लिए संवेदना के दो चार आखर भी नहीं ढूंढ सका। जब भी कलम उठाता, कई तरह के सवाल खड़े हो जाते। महिला का कथाचित्र बनाते ही आलोचकों की कड़ुवी और भद्दी आलोचना दिखने लगती। लगता आलोचक मेरी खाल उधेड़ देंगे और प्रकाशक तो पाण्डुलिपि देखते ही लौटा देतेे। वैसे भी मैं आलोचकों तथा प्रकाशकों का दुलरुवा नहीं हूॅं, अगर होता तब बात दूसरी थी फिर तो मैं चढ़ बैठता और उस महिला को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ संघर्षशील कथानायिका बना देता। लम्बे समय के बाद अचानक एक दिन थाने वाली महिला ने मुझे घेर लिया, रास्ता रोक कर खड़ी हो गई। मैं न बांए जा सकता था न दांए, वह ठीक सामने थी तनेन और आत्मबल से भरी हुई। एक दम वैसी ही शक्ल सूरत वाली उसके चेहरे पर किसी बदलाव के लक्षण नहीं थे, जबकि होने चाहिए थे। कोई लड़की चार पांच साल बाद वैसे भी काफी बदल जाती है, शादी वगैरह हो जाये फिर क्या कहने, बदलना ही है। उसने मुझे रोका.... ‘कहिए आप ही हैं नऽ उपन्यासकार, लेखक, का फर्क है आप में दारोगा में? दारोगा ने मुझे थाने पर रोका और जो चाहा कर लिया, एही खातिर ऊ थाने की नौकरियय किया है, अउर आपने का किया मेरे साथ? मुझे उपन्यास में गढ़ कर ऐसी जगह पटक दिया जहां पानी भी न मिले। आपने हमैं काहे पकड़ा? हमैं जस के तस रहने देते तो का फरक पड़ जाता, हमने आपका का बिगाड़ा था, अरे बोलिए नऽ काहे गुंग हो गये? हम महिलाओं पर दिखावे का दया करने वाले आप जैसों को हमने देखा है। जिसको मौका मिला उसने हमैं बिस्तरा बना दिया। आप काहे परेशान हैं हमरे खातिर? आप भी बिस्तरा बना दीजिए, कउन मना करता है आप को। हां अब समझी कि आप की उमर नाहीं है बिस्तरा बनाने वाली, आप तो खुदै कांप रहे हैं, आप न खुद खेल सकते हैं, अउर नहीं दूसरे को खेलने देंगे। अगर आप को मेरी हालत पर थोेड़ी भी हया है तो आप हमैं छोड़ दीजिए। हमैं दारोगा से ही, नहीं आप से भी नफरत है। आखिर आपउ भी तो मरद हैं, अउर हमैं मालूम है कि मरद, अउर बरद में कउनो फरक नाहीं होता। हमैं तऽ दोनों से लड़ना है, आप से भी अउर दारोगा से भी। दारोगा थाने में जबरी पटक देता है, अउर आप दुलार, दुलार किताब में उलटते, पलटते हुए पटकते हैं’ थाने वाली महिला उस समय कड़क थी और तनेन। मुझे लगा कि उससे बातें करना झगड़ा करना होगा सो मैं खामोश था। खामोश तो मैं ऐसे मौकों पर रहता ही हूॅं, और शायद इसी खामोशी के कारण हर तरफ बवाल है बावजूद इसके मैं अपनी खामोशी तोड़ नहीं पाया अगर तोड़ा होता तो मन को शान्ति मिली होती। अब मैं परेशान रहता हूॅं और सोचता रहता हूॅं अपने समाज के बारे में कि नहीं बदल रहा, जबकि बदलना चाहिए। लोग अपने अधिकारों के लिए भी संघर्ष नहीं कर रहे, लोग यथास्थितवादी होते जा रहे हैं, आत्मकेन्द्रित और अपने स्व में गोता लगाने वाले। मैं अब लेखन की दुनिया का मुल्जिम हूॅं तथा मैंने अपने लिए अभिनव किस्म का कटघरा बना लिया है, उसी रहने, बसने की सीमा रच लिया है। ऐसा करने के मेरे पास तर्क भी हैं हालांकि ऐसे तर्कों पर मुझे अब गुस्सा आता है, यह क्या बदमाशी है कि जो देखो, झेलो, भोगो, रचो, उसे अक्षरों के रंगमहल में सजा दो किसी हसीन परी की तरह और खुद बतौर लेखक रंगमहल की रखवाली करो। यही तो किया है मैंने अब तक, इस धारणा के साथ कि लेखक, लेखक होता है। अब यह क्या है कि जनता के सवाल पर लेखक थानेदार से भिड़ जाये, कलक्टर से मुंहाठूंठी कर ले, विधानसभा का घेराव करे, धरना, प्रदर्शन करे और चिल्ला कर नारे लगाये, जनता को जागरूक बनाये। यह सब काम लेखक के नहीं.. लेखक का काम है लिखना वह भी हजारों साल की सम्मानित कलम से। कलम के सहारे बीते कल तथा आने वाले कल, दोनों को चीर फाड़ कर रख देना है तथा वर्तमान के सामने, किसी गीदड़ की तरह उपस्थित रहना है, जिस्म के हर हिस्से को वर्तमान भले ही चीरता, फाड़ता और घायल करता रहे। शायद यह मेरी भावुकता ही हो कि मैं पीछे देखू बना रहा हूॅं, आगे देखू नहीं बन पाया या यह भी हो सकता है कि कथित सम्मान का कोई जहरीला कीड़ा मुझे काट रहा हो कि चलो कनफेश कर लो, स्वीकार कर लो कि तुम निहायत बौनी सोच के आदमी रहे हो तथा वर्तमान के संघर्षों के प्रति किसी गीदड़ की तरह केवल हुंआ हुंआ भूकते रहे हो या गली के उस कुŸो की तरह भू, भू करते रहो जो अपनी गली का शेर समझता है। मैं जानता हूॅं कि यह सब अचानक या अनायास नहीं हुआ था मेरी गीदड़ी वृŸिा ने मुझे ऐसा बना दिया था और आज भी कहीं न कहीं वही वृŸिा मुझे घेरे हुए है। मैं यह नहीं कहता कि बहादुरी का प्रदर्शन आग में कूदने से होगा। आग में कूदो, न कूदो पर आत्मवलिदान का साहस तो हो। अगर मेरे पास आत्मवलिदान का सहस होता तब शायद मैं कुछ और होता। थाने वाली महिला लगातार मुझे सचेत कर रही है, जागो और वलिदान के लिए तैयार रहो, समय से संघर्ष करो, केवल लिखने से कुछ नाहीं होगा। थाने पर उस महिला ने किसे गाली नहीं दी, दारोगा तो भाग गया, कहीं थाना छोड़ कर। उपचार थाने वाली महिला की कथा मेरे ताजे उपन्यास में फस गई थी। उसकी कथा को आगे बढ़ा नहीं पा रहा था। समझ नहीं आ रहा था क्या करूं? मुझे महसूस हो रहा था कि इस तरह के चरित्र को उपन्यास का विषय नहीं बनाना चाहिए था। सोनभद्र में तो एक से एक चरित्र हैं, अतीत से लेकर आज तक जिनके बारे में लिखा जा सकता है। यहां लोरिक की कहानी है तो आदिवासी राजाओं के करतब भी हैं। जिन्हें हूबहू उतार लेना चाहिए या थोड़े बहुत फेर बदल के साथ गढ़ लेना चाहिए। कभी गुनता, थाने वाली महिला को स्कैन्डल वाली महिलाओं के रूप में रच लेना चाहिए, जिन पर ब्लूफिल्में बन जाया करती हैं। किताबें लिख जाती हैं जो रातो रात बिक जाती हैं.. भला ऐसी महिलाओं को कौन भूल सकता है जिनके रिश्ते अपने समय के राजनीतिक महानायकों से रहे हैं, बाद में किसी त्रासद स्क्ैन्डल कहानी की तरह पूरी दुनिया में लोट, लोट कर पढ़े गये हैं। थाने वाली महिला के साथ तो बहुत कुछ हुआ था, दुनिया के तमाम प्रताड़ितों से भी अधिक। थाने वाली महिला के साथ तो दारोगा ने देह को ही अपनी देह में घोल लिया था जैसे दोनों की देह अलग हो ही नहीं। एक तरह से अद्भुत दैहिक करतब। देह हो भी तो उस पर केवल थाने की बन्दूकें नाचें तथा बारूदी राग अलापंे, पर थाने वाली महिला किसी विश्वविद्यालय की उत्पाद नहीं थी और नहीं वह आधुनिक थी, हलो हाय का हाईब्रीड। अगर वह हलो हाय की हाईब्रीड होती तो काम चल जाता, वह उपन्यास का एक ब्रान्ड चरित्र बन जाती। उस महिला को तन्दूर वाली भी बनाया जा सकता था पर तन्दूर वाली भी हाईब्रीड थी अत्यंत आधुनिक। खुले आकाश में चहचहाने वाली, रंगीन पत्रिका की फोटो या विज्ञापन की नायिका की तरह, पर थाने वाली महिला..। वह तो गंवार थी, घुर देहाती, गोबर, माटी से सनी और पुती, उसे तो नागार्जन या निराला ही देख सकते थे या उनके जैसे समान सोच वाले, इस तरह की महिलाएं आधुनिकता के समुन्द्र में गोता लगाने लगें फिर आधुनिकता को कौन चूमेगा? थाने वाली महिला को उपन्यास का पात्र बनाना ही मेरा गलत फैसला था पर अपने ही फैसले को कैसे बदलूं?उसमें सुधार करना भी मेरे लिए संभव नहीं था। इतना ही संभव था कि मैं उस महिला के चरित्र पर उस आदिवासी लड़की की तस्बीर चिपका देता जिसे उसके अइया, बपई ने देहलीला की वस्तु बना दिया था। वह भी तो थाने पर जा कर फस गई थी। पर मामला इतना ही नहीं था, थाने वाली महिला उस आदिवासी लड़की से आगे थी। वह कप्तान के पास जाकर सारा हाल बताया था। इतना ही नहीं उसने कचहरी जाकर हड़कंप मचा दिया था कि उसके साथ थानेदार ने जितना बुरा तथा घृणित हो सकता है, उस तरह का सलूक किया। कचहरी तो कचहरी, वहां किसिम किसिम के वकील होते हैं, कुछ अच्छे तो कुछ बुरे, पर होते सभी वकील ही हैं। उनमें कुछ राजनीतिक वायरस के शिकार भी होते हैं, उन्हें थाने वाली महिला के चेहरे पर अदालत को हिलाने डुलाने वाला मुद्दा दिखा। वकीलों ने थाने वाली महिला के प्रकरण को समय को बेहोश करने वाला राजनीतिक मुद्दा बना दिया। इस क्रम में पहला काम वकीलों ने यह किया कि थाने वाली महिला को प्रेस के सामने एक प्रेस कांफ्रेस के जरिए उपस्थित किया और थाने पर किये गये कुकर्म के बाबत उससे बयान दिलवाया। प्रेस के बाद वकीलों ने थाने वाली महिला को अदालत के सामने भी जोगाड़ लगा कर उपस्थित कराया। सारा प्रकरण लिखा पढ़ी और कानून की धाराओं का सहारा लेते हुए उठाया गया। जनपद की एक छोटी अदालत का एक अधिकारी, न्यायायिक परंपराओं से अलग, थोड़ा बहुत बांए, दांए चलने वाला आदमी था। वह उन कामों में भी रुचि लिया करता था जो जनहित के हुआ करते थे। अक्सर वह लोक अदालत के कार्यों को देखा करता था। न्यायायिक प्रशासन भी उसे जनहित के कार्यों में वहुधा लगाया करता था। उसे आनन्द आता था, वह कहता भी था ‘कि आदमी होने के नाते हमें हमेशा यह ध्यान रखना चाहिए कि हम अपनी करनी से ही अपनी मनुष्यता लील न लें, हमें मनुष्यता की सुरक्षा के लिए सदैव समर्पित रहना चाहिए।’ वह खुद भी जनता के प्रति समर्पित रहा करता था। राजनीतिक वायरस वाले वकील उस अधिकारी के मनोजगत से परिचित थे। आपसी सलाह मसविरे के बाद वकीलों ने एक प्रार्थना पत्र के जरिए उस न्यायायिक अधिकारी के सामने थाने वाली महिला को इस करने का अवसर हासिल कर लिया। न्यायायिक अधिकारी ने बहुत ही गंभीरता से महिला के मामले को सुना तथा वकीलों के तर्कों को भी। वकीलों ने तर्क पर तर्क दिया कि वह इस प्रकरण पर विचार कर सकता है, इस प्रकरण उसके क्षेत्राधिकार में है और उसे विचारण करना चाहिए। उक्त न्यायायिक अधिकारी जितना सरल और तरल था उतना ही जटिल भी। वह कानून की उलझी हुई गांठों को खोलने में माहिर था। उसने कानून की फसी हुई गांठों को खोल दिया फिर तो महिला का भला होना ही था। वकीलों के तर्क कानूनी रूप से वजनदार कम थे पर थे जनहित तथा किसी पीड़ित की सहायता के लिए। उक्त न्यायायिक अधिकारी वकीलों के तर्क सुनकर मन ही मन हसा फिर भी मन बनाया कि वह पीड़ित महिला के लिए अपने अधिकार की सीमा के अन्तर्गत जो कर सकता है करेगा, चाहे इस कार्य के लिए उसे न्यायायिक परंपराओं से इतर भी क्यों न जाना पड़े। उसे वकीलों के प्रति सहानुभूति भी हुई कि सोनभद्र के वकीलों ने कम से कम इस पीड़ित आदिवासी महिला के प्रकरण को उठाया तो....। दूसरी जगहों पर तो लोग ऐसे मामलों पर ध्यान ही नहीं देते। ऐसे प्रकरणों पर किसे फुर्सत कि ध्यान दे..। लोग तो अपने में ही डूबे हुए हैं, अपने में ही डूब कर स्वर्ग या नर्क तलाश रहे हैं..। उक्त न्यायायिक अधिकारी की संवेदनशीलता व प्रेस की जागरूकता के कारण उक्त पीड़ित आदिवासी महिला दूसरे दिन ही पूरे जिले की प्रमुख खबर बन गई। थानेदार को निलंबित कर उसके ऊपर अपराध कायम कर दिया गया। महिला का साथ देने वाले वकीलों के चहरों पर जीत की चमक उभर आयी। इतना सारा कुछ मैं अपने उपन्यास में चिपका सकता था पर नहीं चिपका सका। मैं महिला को कप्तान तक भी नहीं पहुंचा सका, किसी तरह थाने पर चिल्लाने तथा चीखने के बाद उसे रापटगंज तक ले आया कप्तान के पास चुर्क तक जाने के लिए पर उसके घर वालों ने रोक दिया यह कहते हुए कि आगे नहीं जाना। आगे जा कर का होगा? ‘हमरे घरे की इज्जत काहे बाहर लिवा जा रहे हो? वहां भी तो किसिम किसिम के लोग मिलेंगे थानेदार की तरह। देह से खलने वाले, देह महकती नहीं, देह छुआती नहीं, देह की जाति नहीं होती, मजहब नहीं होता, देह तो केवल देह होती है, बलखाती, अंगड़ाती, इठलाती।’ उसके घर वालों ने मुझे भी धूमिल वाले कटघरे में खड़ा कर दिया। जिसका सीधा अर्थ था..। ‘लेखक भी कम हरामी होते हैं का? जो तूं इसके साथ कप्तान तक जा रही, यह तुझे दारोगा की तरह भले न लीले पर चूसेगा जरूर, चूस, चूस कर आम की गुठली बना देगा’ मैं महिला के घरवालों की बातें सुन कर सुन्न हो गया, अपनी निरीहता तो जानता ही हॅू.... अरे मैं क्या हूॅं भाई? एक लेखक ही तो हूॅं, कागज कलम के साथ ही तो इसके साथ चल रहा हूॅं फिर भी आप लोग मुझे फटकार रहे हैं.. मेरा व्यक्तिगत तौर पर इस महिला से कुछ लेना देना नहीं.. आप लोगों को जानना चाहिए कि एक लेखक बहुत ही निरीह होता है वह अपने पात्रों के साथ इधर उधर कुछ भी नहीं कर सकता। मैं इसे कप्तान के पास ले जा रहा था इसे न्याय दिलाने के लिए और इसे न्याय मिलना चाहिए। दारोगा ने गलत किया है, दारोगा को दण्ड मिलना चाहिए। उसे दण्ड दिलाना मेरा ही नहीं सभी का काम है। आप लोगों को इस काम में आगे आना चाहिए, दुनिया बदल चुकी है, पहले वाला जमाना नहीं है आज। आज तो किसी को भी उत्पीड़ित नहीं किया जा सकता, सभी के समान अधिकार हैं, सभी बराबर हैं, न कोई कम न कोई अधिक। पर मेरी सुनता कौन? महिला के घर वालों ने मेरा मुह चोथ लिया.... ‘रहने दीजिए अपनी अकिल, हम आपकी अकिल लेकर का करेंगे, कर्जा की अकिल हमैं पहाड़ थोड़ै चढ़ा देगी, आप एतनै किरपा कीजिए कि इस महिला को इसके हाल पर छोड़ दीजिए। यह खुदै इस हाल से बहाल हो जायेगी, आगे जाने पर इसका जाने का हाल हो?। हमलोग नहीं चाहते कि हमलोगन की जिनगी में थाना कचहरी आये या आप नीयर लोग आयें। हमलोगन को दोनांे से डर लगता है। कुछ लोग हमैं डंडा के जोर से चूसते है तो आप जैसे लोग पीठ सहलाकर, पुचकारकर, दुलार कर, खिला पिला कर, पर चूसते सभी हैं.. हमैं छोड़ दीजिए साहब! हम लोग आपके गोड़ पड़ रहे हैं’ महिला के घर वालों की ऐसी सोच ले कर थाने वाली महिला के साथ बतौर उपन्यासकार एक कदम भी चल पाना मेरे लिए मुश्किल था। उचित यही था कि वह खुद आगे चले, अगर वह एक कदम आगे चलती तो बतौर लेखक मैं भी उसके साथ दो कदम आगे चलता पर वह भी तो आगे चले। उपन्यास में ऐसा संभव नहीं हो पा रहा था। महिला की स्वस्फूर्तता भाग्य भरोसे थी। जो होना था, हो चुका था, होता वही है जो होना होता है। उसके घर वाले तो जड़ थे ही, जो होगा अच्छा होगा के दर्शन वाले, करम बाबा हमारी रक्षा करेंगे। इस संकट पूर्ण स्थिति में उपन्यास कैसे आगे बढ़ता? आलोचकों का भय मुझे अलग से सता रहा था। थाने वाली महिला को मैं जैसे,जैसे चलना, दौड़ना सिखाता, आलोचक उसके पीछे पीछे दौड़ने कूदने लगते, थक जाने पर मुझे गरियाते.... ‘साला उपन्यासकार बनता है। एक दारू चुआने वाली आदिवासी महिला को पकड़ लिया उपन्यास में और उसे कप्तान तक पहुंचा दिया। अक्षरों की गाड़ी पर बिठा कर, दौड़ाने लगा किसी रेसर की तरह। इतना तेज किस्मत के भरोसे वाले किसी पात्र को दौड़ाया जा सकता है भला! वह भी उपन्यास में, फिल्म की बात दूसरी है, पात्रों को चाहे जितना दौड़ा दो, एक अदना सा हीरो आठ दस आदमियों को मार गिराता है। ऐसा तो केवल फिल्म में ही चलता है पर उपन्यास में... फिल्म की रील की तरह पन्नों को फड़फड़ना ठीक नहीं, संभल कर चलना होता है। उपन्यास में तो एक कदम भी गलत उठा तो शीलभंग होना निश्चित है। किसी लड़की का शीलभंग होने तथा उपन्यास के शीलभंग होने में धागे भर का भी अंतर नहीं.. लेखन की शुचिता भी तो कोई चीज होती है नऽ।’ थाने वाली महिला को कप्तान तथा कचहरी तक पहुंचाना आलोचकों के लिए गंभीर किस्म का मुद्दा बन जाता। सो मैं डर गया था कि आलोचक मेरी खाल उधेड़ देंगे। यह क्या है कि एक अदना लेखक वैसा लिखे जो परंपरा में ही न हो। किसे नहीं मालूम कि हमारे गंवई समाज में विरोध या प्रतिरोध की परंपरा ही नहीं है।.. आलोचक भी बेचारे क्या करें, वे मजबूर है अपनी जनता से। किसे नहीं मालूम कि लोकतंत्र में हर किसी की अपनी जनता होती है। वकील हों, आलोचक हों, सŸाा दल के हों, विरोधी दल के हों, लेखक, उपन्यासकार हों, चित्रकार, विमर्शकार, कलाकार चाहे जो भी हों, सभी की अपनी जनता होती है, उसी जनता में रहना, खेलना, खाना, हसना, रोना, विचारों, चिंतनों के विवाह आदि करना, कराना, सारे संस्कारों को अपनी जनता में ही तो करना होता है। वे अपनी जनता की खुशी के लिए इतना तो करेंगे ही। उक्त आदिवासी महिला को मुद्दा बना कर यह साबित कर देंगे कि भारतीय समाज घायल तथा चोटिल समाज है। इस समाज में सभ्य समाज द्वारा बनाये गये प्रचलनों के अनुसार, अपनी चोट का इलाज करने की आकांक्षा नहीं है। कम से कम भारत में तो ऐसा नहीं है कि एक बलात्कृत लड़की या महिला खुले आम बोल सके कि उसके साथ बलात्कार हुआ है। यानि कि उसकी इच्छा का अनादर हुआ है। अगर वह आदिवासी है, फिर का बोलेगी? उसे क्या पता है, आदर क्या है? अनादर क्या है? बलात्कार क्या है? या क्या है सत्कार? आज के आलोचक पहले वाले आलोचकांे की तरह राष्ट्रवाद में सिमटे, सिकुड़े तो हैं नहीं, वे वैश्विक हैं, विश्व के चिंतन मनन में रमे और जमे हुए हैं। उनके सामने विदेशी जनता होती है फिर वह मेरे इस औपन्यासिक चरित्र के पक्ष में कैसे कुछ लिखते, बोलते कि उपन्यासकार ने कुछ अनूठा किया है? उस समय मेरे पास एक ही रास्ता शेष था, उस पर कुछ दूर तक मैं चल सकता था, शायद आलोचक भी उसे आलोच्य नहीं मानते। पर मैं जोर दे कर ऐसा कह नहीं सकता क्योंकि आलोचकों की क्षणभंगुरता के बारे में किसे नहीं मालूम। फिर ऐसे आलोचकों के बारे में क्या कहना जिन्होंने परिवर्तनीयता को विचारों का औजार मान लिया हो, और साबित किया हो कि जो जड़ होते हैं, वे बदलना ही नहीं जानते, न चाहते हैं। इसे सच बना दिया गया है कि जड़ता, सभ्यता के लिए कलंक होती है, पर मुझे बचे हुए रास्ते पर चलना ठीक जान पड़ रहा था जो मेरे उपन्यास के मूल्यों से मिलता जुलता भी था। मैंने तत्काल फैसला लिया कि मुझे महिला से कप्तान तक चलने के बारे में पूछना चाहिए, उसके घर के लोग कैसे उसके जीवन के बारे में फैसला ले सकते हैं? अगर महिला कप्तान तक जाने के लिए राजी हो जाती है फिर तो काजी बने उसके घर वालों से मैं निपट लूंगा। मैने महिला से सीधे पूछा....। ‘तूं का चाहती है? कप्तान के पास चला जाये, दारोगा की शिकायत ले कर और उसे सारा हाल बताया जाये?’ महिला खामोश थी, जैसे उसने मेरा सवाल सुना ही न हो। बार बार पूछने पर भी उसने मुंह नहीं खोला, वह लगातार मुझे ही निहारती रही, जाने वह क्या देख रही थी, मेरे चेहरे पर किसी मस्तक रेखा के जानकार की तरह। जैसे वे घूर घूर कर मस्तक की आड़ी तिरक्षी रेखाओं को देखा करते हैं फिर बताने लगते हैं, भूत, वर्तमान तथा भविष्य। मेरे माथे को देख कर जाने क्या बताने वाली है यह महिला? कुछ बोल क्यों नहीं रही? मैंने उससे दुबारा पूछा.. ‘अरे तूं बोलती क्यों नहीं?’ फिर भी वह खामोश थी जैसे कुछ सुन ही न रही हो फिर जाने क्या सोच कर होठ चबाते हुए बोली..। ‘हमैं अब घर जाना है और कहीं नाहीं, अब आपन देह हमैं दुबारा से नाहीं चोथवाना, जहां भी जाऊंगी सभै पहिले देह चबाएंगे फिर बतियाएगें’। उस समय मैं उसके घर वालों के लिए हसी का पात्र बन गया था, हालांकि उस समय वे हस नहीं रहे थे, जाने किस संकोच के कारण, मैं समझ नहीं सका, वे चाहते तो हस भी सकते थे, इस तरह के मौकों पर हसने वालों की तरह। ‘का तुम्हारा यह आखिरी फैसला है..।’ आखिरी बार मैंने उससे पूछा वह खामोश थी, उसके साथ उसके घर वाले भी खामोश थे। मेरे आखिरी बार पूछने पर वे फुसफुसाये थे फिर अचानक बिना कुछ बताये कि वे कहां जा रहे मुझे अकेला छोड़ रापटगंज से निकल लिए। कहां गये नहीं मालूम हो सका, न ही मालूम करने की कोई आवश्यकता थी। दो चार दिन बाद थाने वाली महिला के गांव का एक आदमी मुझसे मिला था, उस दिन वह भी उस महिला के साथ रापटगंज था। उससे मैने थाने वाली महिला तथा उसके पति के बारे में पूछा.. ‘का हुआ उसके पति का? थाने से छूटा कि नहीं’ उसने बताया ‘अरे साहब छूटना का था, दारोगा ने उसे उसी दिन छोड़ दिया। येही बात का समझौता हुआ था दारोगा अउर उसके मरद के साथ। समझौता होने के बाद उसके मरद ने गांव के एक आदमी को हम लोगन के पीछे ओही दिन लगा दिया था। वह हमलोगन के पीछे पीछे रापटगंज तक आया अउर उसकी मेहरारू को कप्तान के पास जाने से रोक दिया। सो वह काहे के लिए कप्तान के पास जाती? उसका मरद तो थाने से ही छूट गया। येही कारण ऊ गुंग बन गई थी साहब! कहां कुछौ बोली, एक बार जो सन्नाई तो सन्ना ही गई। उसका मरद ओही दिन थाने से घर चला गया अउर दरोगा ने यह भी कहा है कि उससे दारू चुआयी, अउर बेचाई का रूपया नहीं लिया जायेगा, किसी सिपाही को एक छदाम भी न देना।’ पीड़ित महिला का थाने ने ऐसा उपचार कर दिया कि वह मेरे उपन्यास के लिए किसी ऐसे कार्टून की तरह हो गई जिसके भीतर का रखा सामान निकाल लिया गया हो और कार्टून को सड़क पर फेंक दिया गया हो। अक्षरजीवी बहरहाल मेरे लिए गांव तथा वहां की जगह जमीन का आकर्षण अब सिर्फ भावनात्मक है, कि हमारे पास भी है थोड़ा बहुत। इसके होने का कितना प्रतिशत योगदान मेरे सुखों में है या इससे मेरे दुखों का कितना निपटारा संभव है, इसका मूल्यांकन मेरे पास नहीं.. इस बाबत मैं केवल अनुमान कर सकता हूॅं, अपने कुछ मित्रों की बातों से जो मुझे सवर्ण होने के नाते अपने से काफी दूर रखते हैं। वे समझते हैं कि मैं उनका आदमी नहीं हूॅं, मेरे भीतर भी शोषण, दमन, अलगाव और न जाने कितने किटाणु हैं जो सवर्णोें के भीतर जन्मना पाये जाते हैं। कभी कभी मैं परेशान हो जाता हूॅं कि मैं ऐसा क्या कर दूं जिससे मेरी जाति मुझसे काफी दूर हो जाये। जाति अगर दूर भी हो गई फिर मैं क्या करूंगा अपने धर्म का, उसे कैसे बदल सकता हूॅं? मुझे फिलहाल कोई उपाय समझ में नहीं आता, उपाय है भी नहीं शायद। जाति और योनि के दोनों कटघरे इतने खतरनाक हैं कि इनसे पार पाना असंभव है। पत्नी भी कभी कभी मुझे योनि के कटघरे में खड़ा करके मेरा मजाक उड़ाती हैं... ‘मरद हैं नऽ, चाहे जउन कह बोल लीजिए, मेहरारू होते, तब थाह लग जाता कि का होती है जिनगी? फुनगी पर टिकी होती है जान। दुई आखर पति के परेम का अगर पत्नी सुन ले नऽ, तो मन कड़क हो जाता है, खाना, पानी मिले नाहीं मिले, परेम का दुई आखर ढेर है, पर मरद उहौ नाहीं बोलता, जब देखो तनेन रहता है।’ यह दुई आखर भी अजीब है, रहता तो मन ही में है, पर जाने कहां गायब हो जाता है और इसके गायब होते ही सारा खेल बिगड़ जाता है फिर इसका पता ही नहीं चलता, जब पता चलता है तब तक देर हो चुकी होती है। मैं समझता हूॅं कि पत्नी गलत नहीं बोलतीं, वह जो उनके भीतर मरद और मेहरारू वाला भेद है, वही सारा कुछ उनसे बोलवाता है। मैं अपने अनुभवों से कह सकता हूॅं कि यह भेद है, मैं जब मरद बन जाता हूॅं तब वे खामोश हो जाती हैं, शायद समझती हैं कि ऐसे में का बोलना बतियाना। मरद और बरद में फर्क तो होता नहीं.. इसका मुझे कई बार प्रमाण भी मिला है। उपन्यास को ले कर ही एक दिन मैंने पत्नी को उपन्यास के फसे हुए स्थल का हाल अहवाल सुनाया और अपनी विवशता भी कि मैं फस गया हूॅं, कुछ सूझ नहीं रहा कि आगे क्या करूं? थाने पर फसी महिला और उसके पति के लिए क्या करूं? उपन्यास में उनकी पात्रता को किस तरह से गढ़ूं? समझ में नहीं आ रहा। ‘तो आप फस गये है उपन्यास में, अरे ई का कम है कि आप जेहल में नाहीं फसे, अगर ओमे फसे होते तऽ बूझते, जर जमानत करानी पड़ती। पर आप फसे काहे, मरद हैं कउनो जोगाड़ लगाइए, अउर निकल भागिये। आपकी बतकही सुन कर हमार तऽ पेट फूल गया। अरे! ओइसन वाला पेट नाहीं फूला, अब ए उमर में ऊ का फूलेगा? हं एक बात है, थाने वाली मेहररुआ भी तऽ गलत नांही बोल रही थी, कप्तान का करेगा, उहो तऽ ओकर भरता ही बनाएगा नऽ। एक काम आप कर सकते हैं अपने उपन्यास में, अगर नीक लगे तब ऊ ई कि ओही मेहररुआ से दरोगवा को लतियवाय दीजिए थनवै पर, चप्पल, खरपा कुछो तऽ पहिने होगी ही। नाही तऽ एक काम अउर कर सकते हैं आप..। पर थोड़ा मुश्किल वाला काम है, अब आप के जइसन लगै।’ मैं आश्वस्त था कि पत्नी मेरे उपन्यास के बहाने दिल की भड़ास अवश्य निकालेंगी, वे भी तो मरद और मेहरारू के भेद से बाहर नहीं हैं। उनकी भड़ासों से मेेरे उपन्यास के लिए भले ही प्रत्यक्ष लाभ मिले न मिले पर उनके सुझावों से उपन्यास को आगे बढ़ानेे में मदत तो मिलेगी ही। मैने पूछा.. ‘काम तो बताइए कि मुझे का करना होगा उपन्यास में, चाहे मुश्किल हो या आसान।’ ‘हमार बात आप मानेंगे का? सोचेंगे कि चूल्हा चौका वाली मेहरारू है, ऊ का जानेगी उपन्यास अउर कहानी की बात। जौन हम बता रहे हैं ऊ कउनो मुश्किल भी नाहीं है, कउनो मेहरारू चाहे तऽ आसानी से कर भी सकती है। अरे का है ओमे? ई तऽ तय है कि मेहरारून के संगे अइसन अक्सर घरय मकान में ही होता है, खेते खरिहाने भरसक नाहीं होता है, फिर ऊ तऽ दरोगा है, ओके केकर डर? ऊहां सुनसान होगा ही, मेहररुआ के पकड कर कउनो कमरै में ले गया होगा नऽ। बस बात बन गई। मेहररुआ अइसन करै कि दरोगवा के फांस ले, अउर जब ऊ गरमा जाय तब ओकर उहै काट ले जउने से ऊ मरद बनता है। हमार तऽ कहना है कि इहै सभै मेहरारुअन के करै के चाही, पता नाहीं काहे मेहररुआ ई नाहीं करतीं हैं, अउर कचहरी पहुंच जाती है। अब आप के ई जइसन लगै, हम तऽ इहै सोचत हई’ ‘तो जैसा आप बता रही हैं वैसा ही करू..’ मैंने दुबारा पूछा ‘हं हं इहै ठीक रहेगा’ पत्नी का उŸार था। उŸार दे कर मेरे लिए चाय बनानेे के लिए वे किचन में चली गईं। मैं पत्नी का सुझाव सुन कर विचारों में उलझ गया। क्या यह एकमात्र समाधान है पीड़ित महिलाओं के लिए? और कोई विकल्प नहीं। पत्नी ने तो कभी वह समाचार भी नहीं सुना होगा कि कुछ महिलाओं ने ऐसा बदला लिया है। यह जो कानून के सुभाषित का मामला है, कि कानून अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए, इसे कौन सुनिश्चित करेगा? अदालत, सरकार, जनता या उत्पीड़ित। उत्पीड़ितों के भी तो आत्मरक्षार्थ हक हकूक होने चाहिए कि नहीं? मेरी विवशता थी कि मैं प्रतिक्रयात्मक समाधानों को बदला लेने के लिए अपने उपन्यास में स्थान नहीं दे सकता था। जो काम कानून का है उसे हाथ में ले लिया जाये, मुझे उचित नहीं जान पड़ता। सदैव इस बात का मैं पक्षधर रहा हूॅं कि किसी भी समस्या का समाधान न्यायायिक प्रक्रियाओं के द्वारा ही निकला जाये। पर आज का लेखन इन सब बातों को थोथा मानता है। अक्षरों को रच, रच कर क्रांतिकारी बनाया जा रहा है। आज के लेखन में भावनाओं के लिए रंचमात्र भी स्थान नहीं, पहले की तरह। पहले पात्रों की भावनाएं उनके नियंत्रण में हुआ करती थीं, उन्हें लेखक सहारा दिया करता था, उसकी पीड़ा को अक्षरों से सहलाया करता था। आखिर पीड़ित कहां कहां दौड़ेगा, वह न तो थाने जा सकता है,और नहीं अदालत। उसकी ऐसी सामाजिक स्थिति भी नहीं..। आज ऐसा नहीं है, अपनी पीड़ा के प्रतिकार के लिए पीड़ित को खुद आगे आना होगा तथा संभव समाधानों के बारे में निर्णय लेना होगा। माना जा रहा कि पीड़ित अपने लिए कुछ नहीं करेगा तो कोई भी उसके लिए कुछ नहीं करेगा। आज के समय के अनुसार पत्नी तो ठीक बोल रहीं, मुझे उनके द्वारा बताये गये समाधान को वैसे ही उपन्यास में चिपका देना चाहिए। लगभग दो तीन महीने तक मैं उपन्यास को ले कर अनिर्णय की स्थिति में था, कुछ रास्ता निकल नहीं रहा था। एक बार मन में आया कि उपन्यास से थाना, अदालत के झमेले को निकाल दूं और मुझे ऐसा करना भी चाहिए। बच कर रहना चाहिए इन उपक्रमों से। उपन्यास में ऐसा बदलाव करने के लिए उसे दो बार पढ़ा भी, वह भी सामान्य तरह से नहीं, किसी क्रूर संपादक की तरह से। चलो यह ठीक है कि उपन्यास से थाना और अदालत निकाल ही देना है। यह सच भी है कि लोग हर जगह जाना चाहते हैं पर थाना तथा अदालत नहीं.. भगवान से विनती करते हैं कि उन्हें थाना अदालत का चक्कर न लगाना पड़े। मैं भी थाना या अदालत क्यों जाऊं? भले ही एक कमजोर व अज्ञात लेखक हूॅं, हूॅं तो मैं भी एक आदमी ही नऽ। इसी उठा पटक के दौरान मैं एक दिन उपन्यास पढ़ रहा था कि उसे काट छांट कर आगे बढ़ाऊं पर अचानक मुझे बिजली के करंट जैसा झटका लगा। जैसे किसी ने मुझे घायल करने के लिए करेन्ट छुआ दिया हो तथा डांट रहा हो.... ‘अरे तूं यह का करने जा रहा? उपन्यास से थाना और अदालत निकाल देगा तो उसमें बचेगा क्या? यह भी सोचा है? कहीं भी देख लो थाना अदालत कहां नहीं है? तूं तो गांव का रहने वाला है, वहां की परती की तरह तुम्हारी सोच भी परती हो गई है का? वहां के बंजर की तरह तुम्हारा दिमाग बंजर हो गया है। ठीक है कि मन तुम्हारा गंवई है पर अदालत और थाना तो गंवई नहीं है, वहां आधुनिकता है, वैसे भी कानून गंवई या देहाती तो होते नहीं। गंवई होने चाहिए कि नहीं, इस पर बहस हो सकती है। अपना गांव काहे नाही देख लेते अगर तोहरे गांव में जोखन दाऊ नहीं होते तो का होता? थाना और अदालत तोहरे गांव में गली, गली घुस कर नाच नाचते कि नाहीं, फिर पिछले चुनाव में जो हुआ था तोहैं नाहीं मालूम का? मारपीट भई थी कि नाही.. कितने दिन बीत गये, जब तूं तहसील दार की पकड़ से बचा था, नहीं ंतो चौदह दिन तहसील की हवालात में सड़ना पड़ता। आखिर तूं कैसे समझ रहा है कि कोई सभ्यता ऐसी भी हो सकती है जो जेल, पुलिस तथा फौज से अलग हो, पंचाइत वाली। थाना तथा अदालत तो हर जगह रहेंगे। मान लो तूं अपने उपन्यास से थाना तथा अदालत निकाल देगा, लाभ क्या होगा? तेरे उपन्यास पर भी तो मुकदमा हो सकता है, तुझे ही जेल भेजा जा सकता है, फिर का होगा? कुल मिला कर उपन्यास से थाना तथा अदालत को नहीं निकालो, उसी को आगे बढ़ाओ। मेरे लिए मेरा उपन्यास, उस ऊसर भूमि की तरह होता जा रहा था जिसमें अनाज का एक दाना भी नहीं उग सकता। अगर सामान्य भूमि होती तब भी ठीक था भले ही सिंचाई की सुविधा होती न होतीं दैव सहारे खेती करता, उसे जोतता कोड़ता, बीज बोता, फसल तो कुछ न कुछ होती ही पर ऊसर भूमि में का उगेगा? उक्त उपन्यास अगर ओबरा की पहाड़ियों की तरह होता फिर तो मेरी किस्मत ही चमक जाती। मैं क्रशर वाला बन जाता, पहाड़ को गिट्टियों में तब्दील करता और गिट्टियों को नोटों मंे। मैं उपन्यास के साथ कल्पनाओं में उड़ने लगा था कि कल्पनाएं बहुत ताकतवर होती हैं, उनके द्वारा हर समस्या का समाधान निकाला जा सकता है। लोग कहते हैं कि कल्पनांए नहीं होतीं तो विज्ञान की चमक ऐसी नहीं होती जैसी दिख रही है। आज तो विज्ञान ही असल ज्ञान है, इसके अलावा कोई दूसरा ज्ञान ही नहीं.. मुझे लगता है कि ये जो कल्पना नाम की चीज है, वह भी सभी का साथ नहीं देती। इसके अन्दर भी वर्ग भेद वाले किटाणु होते हैं। वर्ग भेद वाले किटाणु नहीं होते तो इस कथित कल्पना ने मेरी मदत की होती, मेेरे साथ होती। मेरा उपन्यास फसा पडा नहीं होता। पर क्या कहूॅं दुर्दिन में सभी साथ छोड़ देते हैं, वह चाहे कल्पना हो या परिकल्पना। कहते हैं कल्पना सरल एवं सहज तथा सभी के लिए उपलब्ध होने वाली चीज है पर मेरे लिए तो वह हमेशा ही अप्राप्य ही रही है। थाने वाली महिला कोई यथार्थ महिला नहीं है, वह भी एक कल्पना ही है, फिर भी वह लजालु बन गई, इस बारे में मैं कुछ कह नहीं सकता। अगर दरोगा को लतिया देती तो का फर्क पड़ जाता कम से कम उपन्यास पूरा तो हो गया होता। फर्क भी पड़ता तो इतना ही कि पीड़ित महिला के पति को दारोगा नक्सली वाली कोई दफा लगा कर जेल भिजवा देता या एनकाउन्टर करवा देता। इस सभ्य एवं प्रगतिशील कल्पना ने भी मेरा साथ नहीं दिया, नहीं ंतो उपन्यास में फसने जैसी कोई बात ही नहीं थी। भला अक्षरों की दुनिया में भी कोई फस सकता है? अक्षर तो सभी की सहायता करते हैं, चाहे कोई छोटा हो या बड़ा, सभी के साथ कदम मिलाकर चलते हैं पर मैं था कि अक्षर भी मेरा साथ नहीं दे रहे थे। मेरे लिए वह सिद्धांत पूरी तरह निरर्थक होता जा रहा था कि लिखो तथा लिखते जाओ, किसी भी तरह से लिखना स्थगित नहीं होना चाहिए, जब लिखा रहेगा तभी प्रकाशक मिलेगा और जब प्रकाशित होगा तब आलोचक या समीक्षक, फिर चाहे प्रशंसा करें या निन्दा, कुछ न कुछ तो होगा ही। एक बात यह भी संभव है कि मेरी ऑखों ने ही मुझे धोखा दिया हो। जिसके कारण थाने वाली महिला के प्रशंसित तथा चर्चित रूप को मैं नहीं देख पा रहा होऊं, जिसे नामधारी उपन्यासकार वगैरह देख लिया करते हैं। यह तो निश्चित है कि सारी बातें और चीजें इसी समाज में होती हैं, पर उन्हें देखने तथा परखने में फर्क होता है, देखने का कोण होता है कि आप चीजों को किस कोण से देख रहे हैं? यह जो चीजों को देखने तथा परखने का फर्क है, उसने मुझे अन्धा बना दिया हो और मैंने मान लिया हो कि ऐसा तो होता रहता है। कोई यही महिला थोड़े ही है जो थाने पर अपना सारा कुछ खो दे रही है, उसे लूट लिया जा रहा है। ऐसा तो सदियों से होता चला आ रहा है, कब खतम होगा कुछ कहा नहीं जा सकता। अगर मैं अन्धा नहीं होता तो मुझे देख लेना चाहिए था कि उक्त महिला पहले वाली महिला नहीं है। वह आज के समय की महिला है, अपना हक हकूक छीन और बीन लेने वाली। यह उपन्यास में संभव था पर मैं था कि उपन्यास के फस जाने का बहाना बना कर रो रहा था। कम से कम मुझे तो सोचना गुनना चाहिए था कि अक्षरों से सजे धजे, उस पर थिरकने वाले कथानक आखिर कैसे फस सकते हैं जब कि किसी भाषा में अक्षरों का अकाल नहीं.. अक्षर तो गली गली भटक रहे हैं, भिखारी बने हुए हैं अपने बचाव के लिए ईश्वर से प्रार्थनाएं कर रहे हैं.. इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि अक्षरों के गुण धर्म को हर जगह हर समय उचित ढंग से मर्यादित नहीं किया जा रहा, वे अब तो अपमानित भी होने लगे हैं.. ऐसा शायद तभी से होने लगा था जब से अक्षरों को किसिम किसिम की साड़ियां पहनाई जाने लगीं, उनकी लिपियां रची जाने लगीं, लिपियों ने अक्षरों की आजादी छीन ली, नहीं ंतो पहले जब अक्षर बिना परदे के थे सिर्फ और सिर्फ लिपियों में सने पुते थे तब इनके गुण धर्म शास्वत तथा बिना मिलावट वाले थे। आज तो किसी भी भाषा में एक भी ऐसा शब्द नहीं जिसमें मिलावट तथा बनावट न हो, वैसे मैं पवित्रता के आधार पर मिलावट का विरोधी नहीं, बहरहाल मुझे इन पचड़ों में पड़ने से नुकसान ही था। पचड़े भी विविध प्रकार तथा आकार वाले होते हैं, सो मैंने निश्चित किया कि थाने वाली महिला को इन पचड़ों से बाहर निकाल कर देखूं कि क्या होता है और हकीकत में मैंने ऐसा किया भी। किया क्या करने की कोशिश की, पर कोशिश तो केवल कोशिश ही होती है, वह सफल हो जाये, संभव नहीं। थाने वाली महिला को उपन्यासों के शास्त्रीय पचड़ों से बाहर निकालने के लिए मुझे उसकी पात्रता को गंभीरता से देखना था तथा गुनना था कि उक्त महिला को उपन्यास से खदेड़ देने पर उपन्यास का विषय वस्तु कहीं किसी चालू उपन्यास का विषय तो नहीं बन रहा। जिसमें विविध किस्म के पात्र होते हैं तथा एक दूसरे को गुदगुदाते रहते हैं। जिन उपन्यासों को बड़ा से बड़ा लेखक भी अपने मुड़तारी रखता है तथा समय बिताने तथा मन को हरियाने के लिए पढ़ा करता है। यह अलग बात है कि वह इस तथ्य को छिपाता भी है कि लोग न जानें कि वह वैसी किताबें भी पढ़ता है जिससे साबित हो सके कि मन को गुदगुदाने वाली किताबें नहीं पढ़ना चाहिए, इससे ब्यंिक्तत्व में गिरावट आती है। अन्ततः मैने बहुत कुछ सोचने गुनने के बाद निश्चित किया कि मुझे जितनी समझ है उसी के अनुरूप उपन्यास को आगे बढ़ाऊं, बाद में जो होगा उसे भुगत लूंगा। आलोचक चाहें तो मेरी खाल उधेड़ें और मेरे उपन्यास को सदी का सबसे फालतू तथा खराब उपन्यास घोषित करें पर मैं किसी भी दशा में थाने वाली पीड़ित महिला को चालू उपन्यासों के गुदगुदाने वाले पात्रों की तरह नहीं गढ़ंूगा। वह गुदगुदाने वाली कथा पात्र है भी नहीं, वह तो आज के समय की प्रतिनिधि चरित्र है, जिसका कोई साथ दे न दे, पर मैं तो अक्षरजीवी हूॅं, भला मैं उसे कैसे छोड़ सकता हूॅं? मरदों को काहे छोड़ैं बहिन जी! उपन्यास को अन्तिम रूप देने के लिए मुझे निश्चित करना पड़ा कि उसके ऊपर आक्रामक वौद्धिकता का विज्ञापनी लेप नहीं लगाऊंगा। उसे सहज ही बढ़ने दूंगा, सहज ही बढ़ने वाली चीजों की तरह जिसके लिए विशेष वुद्विबल और तकनीक की आवश्यकता नहीं पड़ती। मैंने यह भी निश्चित किया कि थाने वाली पीड़ित महिला की सरल एवं सहज संवेदनाओं को किसी तटस्थ दर्शक की तरह ही देखूंगा। थाने पर दारोगा के सामने इस होने पर उसे कैसा महसूस हुआ होगा, उसने अपराध शास्त्र के विधानों को किस तरह से अपने निश्छल मन में महसूसा होगा तथा सोचा होगा कि अदालत क्या होती है? कुछ न कुछ तो अवश्य ही सोचा होगा। थाने वाली महिला कोई नाबालिग महिला तो है नहीं, बालिग है, शादी सुदा है, किसी हद तक आत्मनिर्भर भी है। उसने भी अपने सुनहरे भविष्य के लिए सोचा, गुना होगा, पति, सास, ससुर तथा बच्चों के बारे में सपने देखे होंगे। थाना, अदालत, तथा प्रशासन के बारे में भी उसे कुछ न कुछ तो मालूम होगा। कुल मिला कर जीवन जीने की कलाओं के बारे में भले ही वौद्धिकों की तरह उसकी सोच न हो पर कुछ न कुछ तो सोच होगी ही। मुझे बतौर उपन्यासकार उस महिला की उन धारणाओं, संवेदनाओं को पकड़ना चाहिए जिसमें मिलावट न हो, एक तरह से मुझे उस महिला को उसकी मौलिकताओं के साथ रचना व गढ़ना चाहिए जिससे कि वह महिला मेरे द्वारा गढ़े हुए अपने प्रतिरूप को देख कर चकरा जाये। सोचने लगे कि वह किसे देख रही, हूबहू उसी के जैसा, तन की तरह मन, तथा मन की तरह तन को देखने, परखने का जादू मुझे अपने लेखन में लाना होगा। इस प्रकार यथार्थ लेखन की जादुई चमक ने अपनी ओर मुझे खींचा, मजा यह कि मैं भी उस ओर खिंचता चला गया। यह तो बहुत बाद में मालूम हुआ कि जिसे मैं यथार्थ का जादू समझ रहा था, जिसके अनुसार लिख रहा था, वह यथार्थ का प्रतियथार्थ था, यथार्थ था ही नहीं, यथार्थ का असल जैसा दिखने वाला प्रतिरूप था। चूंकि यथार्थ तथा उसके प्रतिरूप में समरूपताओं का रसायन होता है, इसलिए मिलावट नहीं दिख रही थी। सामान्यतया मिलावट दिखा भी नहीं करती। जीवन जीने की कलाओं में शायद ही कोई समर्थ हो जो मिलावटों को देख सके या उन आहटों को पहचान सके जिससे किसी यथार्थ का विलीनीकरण एक दूसरे यथार्थ को गढ़ने के प्रयोजन से सामान्यतया हो जाया करता है। मेरे सामने एक प्रकार से नये किस्म का दुविधा पूर्ण संकट उपस्थित हो गया था, अब क्या करूं? किस ओर भागंू.. थाने वाली महिला को पूर्णरूप से देखने व जानने के लिए मैं क्या करूं? जिससे वह जैसी महिला है, जिस हाल में है, वैसी ही दिखे, उससे इतर नहीं..पर ऐसा करने में मैं समर्थ नहीं था, समर्थ होता भी कैसे उस महिला की संवेदनाएं मेरी पीठ पर लगातार मुक्के मारने लगती थीं, ताने देती थीं.... ‘तूं का लिखेगा मेरे बारे में? तूं भी तो मरद जाति का है, थूथुन वाला, कहते हैं, नाक न हो तो मैला खाने वाला, तूं का जानेगा मेहरारू के बारे में कि मेहरारू का होती है। मेहरारू को तूं जब जैसा चाहता है वैसा गढ़ देता है कभी देवी बनाता है तो जरूरत के हिसाब से रण्डी। देवी बना कर माला फूल चढ़ता है, तो रण्डी बना कर जोक की तरह चूसता है, देह को बिछौना बना देता है, खुश, हुआ तो खेत बना कर जोतने कोड़ने लगता है, बेंगा डाल देता है, खेत में जब बेंगा पड़ जाता है तो कुछ न कुछ जामेगा ही। जाम जाने के बाद दूसरा बेंगा डालने के लिए उसे फिर जोत भी देता है। देखना है तो दारोगा को देख कि वह का कर रहा? फिर दारोगा को भी तूं काहे देखेगा, खुद अपने को देख ले, तोहरे मुहें में मेहरारून के बारे में विषैला लार है कि जलता हुआ लोर है। पर तोहरे पास लोर कहां से होगा? लोर तो मेहरारून के पास होता है, जो उनके दिलों को लगातार हिलोरता रहता है।’ चाहे जो हो मैंने भी निश्चित कर लिया था कि उपन्यास को किसी तरह से पूरा करूंगा भले ही आलोचक गरियायें। थाने वाली लड़ाकू महिला को वैसे ही इस करूंगा जैसी वह है। उसे उपन्यास से नहीं निकालूंगा? मैं उस आदिवासी महिला से परिचित हूॅं जो एड्स का मरीज है, शशि ने जिस दिन कार्यशाला का आयोजन किया था उसके बारे में बातें हुईं थीं.. शशि ने बताया था कि वह अपने बारे में कुछ भी बताना नहीं चाह रही थी। शशि की कोशिश पर उसने अपने बारे में बताया था फिर मालूम हुआ था कि वह एड्स की मरीज है और निरंतर दवाइयों के सेवन से ठीक ठाक भी है। उसे देख कर कोई नहीं कह सकता कि वह एक ऐसे भयानक रोग का शिकार है जो देह क्रीड़ा का प्रतिफलन होता है। एड्स वाली महिला से मिलना सहज था क्योंकि शशि जब चाहती उससे मिलवा देती पर मैं उससे मिलना नहीं चाह रहा था। किसी और कारण से नहीं सिर्फ इसलिए कि उससे मिल लेने के बाद तो कोई भी उसे अक्षरों से नहलवा लेगा, अक्षरों की पवित्रता के लेप से उसे सजा संवार देगा या विलोमी शब्दों के मायाजाल में फसा कर घिनौना बना देगा, मैं ऐसा करना नहीं चाहता था। मुझे पता था कि उससे मिल लेने के बाद मैं बहुत ही सहजता से उसे वाक्यों में रच व गढ़ लूंगा पर उसमें मजा नहीं था। वह एक कोशिश तो होती पर बेकार और बेकार कोशिश का कोई प्रयोजन नहीं। मजा तो तब था जब उससे बिना मिले ही उसे कागज पर उतार कर अक्षरों से रचता व गढ़ता। एक कलमकार के नाते मैं द्वन्द में था, द्वन्द यह कि उससे मिल कर उसे गढ़ंू या बिना मिले ही। मिल कर उसे रचूंगा तो मेरी कल्पना आहत होगी और कल्पना को आहत करना, उसे जख्मी बनाना खुद को जख्मी बनाने जैसा होगा। आत्मवेदना का एक कठिन रूप। वेदना तो वेदना होती है, उसमें अगर मगर का दखल नहीं होता। वह तर्क के सारे क्षेत्राधिकारों से बाहर की चीज है, एकदम निर्पेक्ष। मुझे कल्पना के सहारे उड़ने का अवसर मिला था, जिसे खोना जीवन जीने ही नहीं लिखने की कलाओं को भी खोना था। सो ऐसे अवसर को मैं खोना नहीं चाहता था जो भले ही मुझे उपन्यास के बहाने मिला था। जाहिर है ऐसे अवसर मिलते ही कहां हैं? किसी पात्र को रचने, गढ़ने तथा उससे संवाद स्थापित करने का या उसके साथ हसने मुस्कराने या रोने का ही। मेरे लिए कल्पना की उड़ान भरना काफी मनोरम और चिŸााकर्षक था। मैं कल्पना की ताकत से देह के कृत्रिम या प्राकृतिक कौतुकों से खेल सकता था। देह के उŸोजक कोतुकों के स्वावलंबन तथा सक्रियता को समीप से निहार कर तन को ही नहीं मन को भी हिलते डुलते देख सकता था, चोरी से उसे निहार सकता था। यह तो तय है कि मन हिल गया तो तन अपने आप ही हिलने लगेगा। यौवन की जैविक कल्पनाओं ने मुझे जाने कितनी बार हिलाया डुलाया है। कभी कभी तो उसके भूकंप ने मुझे उखाड़ भी दिया है। यह अलग बात है कि प्रयास करके मैंने अपनी यथस्थिति बचा ली है पर उखड़ तो गया ही था। लोग जानें न जानें मेरे यथार्थ को कि कैसे उखड़ा, उखड़ा तो कहां गिरा? क्या हुआ मेरा? फिर कैसे खड़ा हुआ या जहां जमा था वहीं फिर कैसे जम गया? लोगों के लिए भले ही मैं अचरज बन गया होऊं पर मेरे लिए कुछ भी अचरज जैसा नहीं था। मैं तो सारा कुछ जानता हूॅं अपने आप के बारे में, मैं क्या हूॅं, यह जानना केवल दर्शन का विषय नहीं है बल्कि दर्शन तथा प्रदर्शन दोनों को एक दूसरे से अलग रखना भी है, तभी तो अपने बारे में जाना जा सकता है। अपने बारे में जानना अचरज नहीं? यौवन, यौवन होता है, किसे नहीं मालूम कि परिपक्व व क्रूर वर्जनाएं यौवन के छन्दों व रागों को गाने, बजाने से नहीं रोक सकतीं, यौवन तो गायेगा ही, नाचेगा थिरकेगा, झूमेगा, मुस्कराएगा, कभी खुद पर तो कभी प्रकृति पर। खुद से चिढ़ हुई तो प्रकृति की गोंद में चला जायेगा, प्रकृति का उपहार अगर उसे नहीं मिला तो खुद को उपहार बना कर यौवनोत्सव के हसीन करतबों में डूब जायेगा, खुद को प्रकृति के हवाले सौंप देगा, प्रकृति तो प्रकृति होती है, वहां नाते रिश्ते नहीं चलते, वहां वर्जनाए नहीं चलतीं, वहां न जय है न पराजय, न ही वहां वर्जनाओं की हिंसक तानाशाही ही है। लगा कि मुझे ऐसे अवसर को कस कर पकड़ लेना चाहिए तथा इसके एक एक रेशे को अलग अलग करने की कोशिश करनी चाहिए जिससे कि मानव सभ्यता की आंखों से देह के दाह और उसकी लीला के असली रूपों को देख व महसूस सकूं। ऐसा करना तन तथा मन के रसायनों का पान करना होता, पान करने से ही मालूम होता कि तन में मन के लिए कितना भूगोल सुरक्षित है तथा मन के लिए तन में कितना? मन को जांचो तो तन में ज्वाला, तन को छुओ तो मन बेमन, एक अचरज भरी स्थिति, मुस्कराती हुई सभ्यतांए भी रोने लगें, तन तथा मन दोनों सभ्यता की जकड़न से बाहर फलांगते, डांकते, कूदते। तन का मन पर नियंत्रण नहीं, मन का तन पर नहीं, दोनों अपनी अपनी स्वायतता की जंग लड़ने के लिए तैयार, दोनों एक दूसरे के आमने सामने, मरने मारने पर आमादा। इस जंग में कौन विजेता होगा, कौन पराजित कहना मुश्किल। जंग तो जय, पराजय पर ही टिकी होती है, तन तथा मन की इस जंग ने एक बार फिर मेरे लेखक मन को फसा दिया। थाने वाली महिला के पास तन था, उसी तन पर दारोगा उछल रहा था, महिला का मन उसके तन से अलग हो गया था वैसे तन भी तो एक तरह से उसका नहीं रह गया था, दारोगा ने उसे बन्दी बना लिया था, बन्दी तन तथा विस्थापित मन का खेल ही तो वहां चल रहा था। दोनों को पराजित करने का काम दारोगा कर रहा था किसी दूसरी सभ्यता को जन्माने के लिए। वैसे भी दारोगा महिला के मन पर कब्जा काहे जमाता, उसे तो अपने पुरुषार्थ का आदिम व्याकरण लिखने के लिए महिला का कामोŸोजक तन चाहिए था, वह भी कुछ समय के लिए। देहयज्ञ के बाद तो दारोगा महिला को खुद उठा कर कहीं फेंक देता। घर में सजा कर रखने के लिए उसे एन्टिक थोड़ै बनाता। इससे अलग थी एड्स वाली महिला। वह देह तथा दिमाग दोनों के बाजार में खड़ी थी। पहले उसके साथ जो हुआ था, हुआ था, सारा कुछ जबरिया था, बाद में उसने स्वतः देह से दिमाग को निकाल दिया और नंगी तथा खुली देह को बाजार के हवाले सौंप दिया। देह को बाजार के हवाले सौंपने के बाद वह हसती पर उसकी हसी दिमाग तक न जा पाती, दिमाग तक उसकी हसी जाती भी कैसे? दिमाग उसकी हसी को किसी खाली कार्टून के डिब्बे की तरह बाहर फेंक देता और चिल्लाता.... ‘अरी देह! देख तूं अपनी औकात, तूं ही तो दिखती है सभी को, गदराई, मांसल तथा यौवन की कांति से सजी संवरी, कामाध्यात्म के किरणों को बिखेरती, बाजार में नाचती थिरकती।’ अपनी देह पर वह हसती तथा उसकी सीमा समझती, आखिर, कितने समय तक बाजार में रहेगी? यौवन का बाजार तो पल, पल में अपना रूप बदलता रहता है, इसे बासी होने में देर नहीं लगती। उन्माद की मांद में कब तक यौवन के कौतुकों को सुरक्षित रखेगी? देह क्रीड़ा लायक देह नहीं, पीड़ा लायक मन नहीं, कहां जाओगी आखिर? इस रोजगार ने उसे कभी हसाया नहीं, वह हसती भी थी तो रोजगार की सुरक्षा के लिए तथा अपनी घृणा को प्रमाणित करने के लिए। अब तो वह बदले की आग में किसी के भी सामने अपनी देह परोस देती है। शशि ने उसे समझाया था..। ‘देख लौंगी, तूं जो कर रही है, वह अब न कर, तूं लोगों को अपनी तरह का रोगी बना रही है, उन्हें मौत के मुंह में धकेल रही है, जाने कितने परिवार बर्बाद हो जायेंगे, बच्चे औरतें तक मरीज हो जायेंगे, इस रोग से जकड़ा आदमी जीवित नहीं रह सकता उसे अपनी उम्र से पहले मरना होता है, भले ही दवाइयों के जोर से वह सबेरा देखता रहे, बस इतना ही’ शशि की सलाह सुन कर लौंगी खूब हसी, हसती रही काफी देर तक, शशि समझ नहीं पा रही थी कि लौंगी काहे हस रही? इसमें हसने वाली बात तो नहीं, यह तो मनन करने की बात है, फिर भी लौंगी हस रही आखिर काहे हस रही? पूछा शशि ने ‘काहे हस रही रे! इतना, इसमें हसने की का बात है?’ ‘हसने की बात ही तो है बहिन जी! इस सलाह पर हसी नहीं छूटेगी फिर किस बात पर हसी छूटेगी, लड़की हसी, बूझो फसी। हम हस रहे हैं समझ लीजिए कि आप की बात में फस गये। अरे बहिन जी! अब हमैं दुनिया जहान की का फिकिर, दुनिया रहे चाहे जाये। हमैं जब मालूम हुआ कि हमैं एहि तरह का रोग लग गया है, अब हमरे देह पर जो भी नाचेगा, कूदेगा, चोथेगा वह मरेगा। हमार मन करम बाबा पर झूम गया। वाह रे बाबा! तूंने हमार सुन लिया, एक कमजोर मेहरारू की गरज, तोहरे दरबार में सुन ली गई, अब थाना कलक्टरी हमार गरज सुनै, नाहीं सुनै, हमैं तनिको चिन्ता नाही..’ ‘मरज का नाम अउर काम सुनते ही हम अस्पताल से घर भागे, सीधे करम बाबा को माथा नवाने, घरे पहुंच कर हमने करम बाबा के नाम पर सिरनी चढ़ाया। डीहवार बाबा के चौरा पर गुड़ का परसाद चढ़ाया। मरज का नाम सुनकर हमैं तनिको डर नाहीं लगा था कि हमार जिनगी दो चार साल की है, मर जाना है, का है हमरे पास डरने के लिए, बाल, बुतरू भी नाहीं हैं, हमने जान बूझ कर बिआह नाहीं किया। बिआह करेंगे बाल, बुतरू पैदा होंगे, उहौ तऽ हमरे नीयर देहियंय बेचेंगे या जांगर खटायेंगे। हमैं शुरुवै से मरदों से घिन थी, हमने एही से जोड़ा नाहीं लगाया, अइया बपई के साथै रह गई। सारी कमाई अइया बपई के दवा दारू में खरच हो जाती है। ‘आप तऽ जनबै करती हैं बहिन जी! एहू काम में रोज गहकी तो मिलते नाहीं, गहकी पहिले देह देखते हैं फिर लार टपकाते हैं.. लार टपक गया समझ लो बहिन जी काम हो गया। अब आपसे का छिपाना बहिन जी! हमैं गहकी मिल जाते थे। कुछ तो रोजै लार टपकाते रहते थे, आगे पीछे लगे रहते थे। पर हम ओही के संगे जाते थे जेकरे संगे जाने का हमार मन करता था। सबके साथ नाही.. सबके साथ एसे नाहीं जाते थे कि रुपया देने में किच, किच करते थे, बूझते थे कि हराम का माल है, सोन का पानी है, मार डुबकी अउर फूट। हम जो कमाते हैं, वोही से पेट परदा चलता है, हं एक बात है बहिन जी! अइया भूलती नाही है पूछना कि कारे आजु कमाने नाहीं गई, घरे बैठी रहेगी तऽ खाना कैसे बनेगा, जा जा एक दो तऽ अब्बौ मिल जायेंगे।’ ‘बहिन जी ऐसा है नऽ, बुरा नाहीं मानिए तऽ एक बात कहूॅं, हमैं हर मरद ने बाघ माफिक काटा है, खाया है, पंजे से मार, मार देह फाड़ा है, चीथा है फाड,़ फाड़ कर देह की बोटी बनाया है फिर हम मरदों को काहे छोड़ें बहिन जी! अब तऽ हमैं मालूम हो गया है बहिन जी कि हमहूॅं मरदों को शमशान तक पहुंचा सकते हैं। हमरे सामने जे भी आयेगा ओकेे काट खायेंगे हम, हम ई काम काहे छोड़ें बहिन जी। हमैं तऽ करम बाबा ने वरदान दिया है कि जा अब तोहार कउनो मरद कुछ नाहीं बिगाड़ सकता जो तोहसे टकराएगा भसम हो जायेगा। परधनवा तऽ पहिलहीं भसम हो गया बहिन जी। दू, तीन साल हुआ ओके भसम हुए, हमैं नाहीं मालूम था कि ऊ काहे भसम हुआ पर अब हम बूझ रहे हैं कि ओके हमरै रोग हुआ होगा। जब चाहता था हमरे पर लोट जाता था, चाहे ओजरार हो या अन्हार।’ ‘ओकर लड़िकवन भी भसम होंगे बहिन जी, देख लेना। ओकर खानदान हमैं भसम करना है। हमैं जउने दिन मरज के बारे मे मालूम हुआ ओही दिन किरिया खाये कि परधनवा के लड़िकवन को फासना है, अब तऽ ऊ दुन्नौ फस गये हैं हमरे जाल में, हमार किरिया करम बाबा फलित कर रहे हैं, बारी बारी से। दुई ठो तऽ लड़िकवै हैं परधनवा के, दुन्नौ को देही की माया में फसाना है, ओन्हैं भी एही रोग से मारना है बहिन जी! हम खुदै ओन्हन से आंख नाही मिलाते थे, पर अब तो मिलाना ही है।’ ‘अब आप को का बतायें बहिन जी आप खुदै जान लो, मेहरारू जेके चाहय फसाय ले, मरद अउर बरद दुन्नौ पर जवानी का जूआ रखो, अउर जेहर चाहो ओहर घुमाय लो। एक दिन परधनवा के दुन्नौ लडिकवे अब उहै देखेंगे जउन हम ओन्हय देखायेंगे, उहै बोलेंगे जउन हम बोलवाएंगे। अब हमय एकय बात कऽ कसक है बहिन जी, ऊ दरोगवा मिलि जाता तऽ हम ओहू के लपेट लेते, पर जाने कहां ओकर बदली हो गई है पर ओके हम खोज रहे हैं।’
देह-दाह
लौंगी को समझाते बुझाते शशि परेशान हो गई पर लौंगी थी कि रŸाी भर भी बांए दांए नहीं हो रही थी, वह बदले की आग में थी, हर हाल में बदला लेना है, वह काहे बदला नाहीं ले? यही उसकी समझ में नहीं आ रहा था। लौंगी का मानना था कि उसके बारे में तो किसी ने नहीं सोचा। लेखपाल, अमीन, सेकरेेटरी ही नहीं स्कूल के महटरवा ने भी नहीं सोचा कि लाैंगी खिलौना नाहीं है, जब चाहा खेला और फेंक दिया। उसके साथ सभी खेलते रहे, उसकी गदराई देह पर गदर करते रहे, देह की बेमिसाल कदर। परधान तो परधान था, उसने लाैंगी की जवानी और कसी हुई देह को जैविक उर्जा का कारखाना बना दिया। कामोद्दीपन के संसाधन की तरह लौंगी परधान के इशारे पर नाचती रही। वह विरोध भी तो नहीं कर सकती थी परधान का, उसकी बपई, अइया भी चाहते थे कि लौंगी रुपयों की तरह भंजती रहे। भंजती थी लौंगी, भंज, भंज कर नोट बनती थी, उसकी अइया कहती थी..। ‘करम बाबा सबको लौंगी की तरह बिटिया दें, उसके एक, एक रोंया का मोल है, रांेया, रोंया पर उसके नोट है, लोग भौंरा बने अगल बगल घूमते रहते हैं.. सब परधान की किरपा है, नाहीं तऽ हम खाये बिन मर जाते।’ गांव में सरकारी कर्मचारियों का सरकारी काम काज के सिलसिले में आना जाना लगा रहता था। उनमें जो रसिया होता था उसके लिए परधान लौंगी को बिछावन बनवा देता था। एक बार तो लौंगी बी.डी.ओ. की गोद में थी। परधान ने उसके सामने उसे परोसा था। वह अधेड़ था, उसकी सूरत आदिवासियों की तरह थी, कोहड़ौरी की तरह उसकी नाक चेहरे पर चिपकी हुई लगती थी जैसे बेल्डिंग की गई हो। वह बी.डी.ओ. था, परधान के लिए बड़ा अधिकारी, एक तरह से पूरा देश और उसका सŸााधीश। बी.डी.ओ. के सरकारी आवास पर जाते समय पहली बार लौंगी कार पर बैठी थी, उसके पहले वह कार पर नहीं बैठी थी। कार पर बैठना उसे अच्छा लगा था। बी.डी.ओ. के अवास पर लौंगी कुछ देर में ही पहुंच गई थी। बी.डी.ओ. अकेले रहता था जबकि उसका आवास काफी बड़ा था। उसमें आठ दस लोग आराम से बस सकते थे। लाैंगी ने बी.डी.ओ. को देखा वह कुछ गुम सुम जैसा दिखा, खुद में खोया हुआ। लौंगी को बी.डी.ओ. की गुमसुमी से मतलब नहीं था, वह तो वहां देह फैलाने के लिए गई थी, बी.डी.ओ. के चेहरे को पढ़ने नहीं। वह उछलता रहे तो ठीक, भीतर भीतर रोता रहे तो ठीक। उसे याद है कि पहली बार उसकी देह परधान ने जबरन नोचा, चोथा था, उसकी अइया ने ही उसे परधान के हवाले किया था। देह फैलाने तथा बिछाने के लिए उसे कभी तीन सौ तो कभी चार सौ रुपये मिल जाते हैं, इतना कमाने के लिए उसे दो, तीन मरदों को अपनी देह पर लोटवाना तथा कुदवाना पड़ता है। पहले तो देहलीला के बाद देह ही नहीं रह पाती थी जिधर छूओ, सुन्न और सन्न, मरी हुई मछली माफिक। अब ऐसा नहीं है उसने देह साध लिया है, सामने वाला चाहे जितना छटपटाये, उछले कूदे, जो चाहे नोचे, दबाए, चूमे चाटे, लौंगी पर असर नहीं पड़ता। वह पत्थर की मूरत की तरह अबोल तथा अडोल रहती है बिना किसी संवेदना तथा उत्साह के। इस काम के लिए लौंगी खरा सौदा करती है, एक रुपया न कम न अधिक, पर अपने किसी ग्राहक को उदास या निराश नहीं करती, सोचती है कि ग्राहक खुश और मस्त रहंे। कामोŸोजक क्रियाओं के सहारे वह ग्राहक को इतना उŸोजित तथा आवेशित कर देती है कि ग्राहक अपना पुरुषार्थ पल भर में ही गवां बैठता है। बी.डी.ओ. अच्छा आदमी निकला। एक रात का पांच सौ रुपया देगा। उसने दरवाजा बन्द किया और बिस्तरे पर जा पहुंचा, लजाते हुए उसने किसी गैर पेशेवर की तरह लौंगी को अपने पास बुलाया। आओ इधर..। ‘तुम्हारा आवास बन गया है?’..। उसने पूछा। प्रशासन का कुछ तो अतिरिक्त प्रभाव पड़ेगा। ‘नाहीं’, यह लौंगी थी, अपनी शर्मीली उर्जा तथा सिकुड़ी गरीबी के साथ। ‘काहे?’ फिर सŸाा का रोब उछला बी.डी.ओ. ने लौंगी को गोद में सिकोड़ते हुए प्रेम से पूछा.. कामोत्सव के क्षण में भिन्नता कहां? लौंगी बी.डी.ओ.की बाहों में सिकुड़ी हुई थी, फिर भी उसकी देह के उŸोजक प्रदेश जस के तस़ थे तथा बी.डी.़ओ. उन पर काबिज होने की उत्सुकता में था। बी.डी.ओ. पहले जैसा नहीं दिख रहा था। कामोŸोजना की कांति से वह चमकने लगा था, पर वह चमक विनम्र नहीं थी। बी.डी.ओ. मादकता की अतिरिक्त गर्मी से मर्द बन जाने के बाद भी भद्दा दिख रहा था। लौंगी देह के रहस्यों को जानती थी कि मेहरारू देखते ही मरद का लार बहने लगता है और इतना बह जाता है कि बकाया काम के लिए लार रहता ही नहीं। जबकि काम बहुत रहते हैं..। कामोŸोजना की प्रकृतिक कांति को बचा कर खेलने की कला सभी मर्दों को नहीं आती। मरद को अहसास भी नहीं होता कि मेहरारू का लार बहेगा तब का होगा, वह बेचारी कहां जायेगी। उस समय किससे भीख मांगेगी कि हमें लार दे दो, हमें भी टपकना है ओस की बूंदों की तरह टप, टप। लोर की बात अलग है, हर मेहरारू लोर वाली होती है। कामोŸोजना की कांति को सुरक्षित रख पाने के हिसाब से उसने जाने कितने मरदों को देखा है, सभी लुज, लुज, क्षण भर की जोश और होश तो जैसे पहले से ही गायब रही हो। लौंगी को देह के कामजनित रहस्यों का ज्ञान समय की क्रूरता से हासिल हुआ था। वह इस ज्ञान का प्रयोग बहुत ही संयम से करती, तथा खुद को कामोŸोजना के ज्वार से बचाए रखती है। उसे मजा आता है सामने वाले को हांफता देख कर। कामोŸोजना के ताव के साथ दृढ़ता का बर्ताव करने में हालांकि उसे थोड़ी परेशानी होती है पर अब तो उसकी आदत बन गई है कि मरद उसकी देह से चाहे जितना खेले उसकी दृढ़ता नहीं टूटती। जब वह चाहेगी तभी उसकी दृढ़ता टूटेगी। वह अपनी इस आदत पर खुश होती है तथा उन मरदों पर हसती है जो उसकी देह पर लोट, पोट कर रहे होते हैं.. ‘का मिल रहा इन्हें? चाम से खेल व चूस कर गर्मी उतारते हैं, शायद देह की गर्मी को रोक पाना सबके वश का भी तो नहीं’ लौंगी बी.डी.ओ. की बाहों में किसी छुई मुई की तरह सिकुड़ गई, एक दम ढीली ढाली, बी.डी.ओ. जिधर चाहे उधर उसे हिलाए डुलाए, चूमे चाटे, बी.डी.ओ. ने पूरी ताकत से उसकी देह के एक एक हिस्से को अपनी देह से जोड़ा, आवश्यकतानुसार उसे तोड़ा मरोड़ा, चारो दिशाओं में उसने कामोŸोजना की लेजर किरणों को फैलाया, लौंगी थी कि दृढ़ थी हालाकि वह बी.डी.ओ. की कामक्रीड़ा में किसी बफादार सहयोगी की भूमिका निभा रही थी जिससे बी.डी.ओ. को आभास न हो कि वह किसी मुर्दे से खेल रहा है पर भीतर ही भीतर गुन भी रही थी कि उसे अपने देह ताप को भाप में उड़ाना नहीं है। काम तो करना ही है फिर तो ताप को तोप कर रखना ही होगा। एक बार उसे महसूस हुआ था कि बी.डी.ओ. की देह से उसे खेलना चाहिए, ऐसी चिकनी और सजी हुई देह गांव में मिलती नहीं.. बी.डी.ओ. के होठों को चूमना ही नहीं काट लेना चाहिए, उसके गालों पर ऐसा निशान छोड़ देना चाहिए कि वह हमेशा याद करे कि एक थी लौंगी.... उसे बी.डी.ओ. के साथ किस तरह का बर्ताव करना चाहिए, एक रखैल, पत्नी, या वह जो है, वैसा। लौंगी विचारों में थी तभी उसने महसूसा कि बी.डी.ओ. शिथिल हुआ चला जा रहा है, उसकी बाहों की जकड़ ढीली पड़ चुकी है और उसकी देह आज़ाद हो गई है। अरे यह का हुआ? का खेल खतम, नाहीं नाहीं ऐसा नहीं होना चाहिए, खेल तो अब शुरू होना है.... अरे साहब! का हुआ? का काम खतम? काहे ऐसा हो गये हैं, अपना पांच सौ रुपयवा तो वसूलिए, ऐसा कैसे चलेगा? लौंगी ने बी.डी.ओ. को कस कर जकड़ा.. अरे साहब! काम खतम करिए, काहे छोड़ रहे हैं, हमैं कउनो जल्दी नाहीं है, हम सबेरहूॅं जा सकते हैं, इहां से’ बी.डी.ओ. को पता था कि ऐसे समय में वह अशक्त हो जाता है, उसकी दैहिक अशक्तता उसे नर ही नहीं रहने देती। दैहिक संबध तो उसके लिए महज उŸोजक भावना है, तमाम दूसरी भावनाओं की तरह। औरतें उसे प्रभावित करती हैं पर उसके पास औरतों को प्रभावित कर लेने जैसे गुण नहीं.. वह देह से शिथिल नहीं है पर मन से काफी शिथिल है। मन की शिथिलता तन को भी शिथिल बना देती है। पत्नी के निधन के बाद उसके मन का भी निधन हो चुका है, खासकर इन मामलों में.. तन भूखा है तो रहा करे, उसकी भूख, मन ही तो मिटायेगा। मन का क्या है, वह तो उछलता रहता है खासतौर से कमजोर मन, उछलना उसका गुण धर्म है। उसी उछाल के कारण उसने लौंगी को बुलवाया था। लौंगी को, बुलवाना बेकार हुआ, मन और तन दोनों ने साथ नहीं दिया। दोनों ने उसकी देह छोड़ दिया, एक बांए जाता तो दूसरा दांए, एक नैतिकता का मंत्र पढ़ने लगता तो दूसरा दैहिक वर्जनाओं के सहारे मोक्ष जाने के बारे मे गुनने लगता, कम से कम अगला जनम तो ठीक ठाक हो। इस देहलीला को उसकी मृतक पत्नी देख रही होगी..। बी.डी.ओ. ने लौंगी को मुक्त कर दिया..। लौंगी तूं जा सकती है अब, इस साल तेरा आवास अवश्य बन जायेगा। ले ये पांच सौ रुपये हैं.... अरे साहब! हमैं रुपया नाहीं चाहिए, आपने काम किया ही नाहीं, फेर काहे के लिए रुपया दे रहे हैं, फोकट का रुपया हमैं नाहीं चाहिए साहब’ ‘नहीं, नहीं रख इसे, तोसे का मतलब काम हुआ कि नाहीं, तूं तो मेरे पास आयी ही, तुझे जो करना था तूंने किया, यह तो मेरा मामला है कि का हुआ, का नहीं हुआ।’ ‘नाहीं साहब! अइसन हमसे नाहीं होगा, अब हम ईहां से बिना काम के जायेंगे भी नाहीं, हम जायेंगें तभी जब काम होगा’ लौंगी अड़ गई। जाने वह कौन सी प्रेरणा थी कि लौंगी को विवश हो जाना पड़ा, लौंगी उसे कभी नहीं समझ पाई। वह सिर्फ इतना समझ पाई कि बी.डी.ओ. ऊपर से जैसा दिखता है एकदम चक चक, ताजा तथा उŸोजक भी पर भीतर से वैसा नहीं है। वह टूटा तथा बिखरा हुआ है। लौंगी को बी.डी.ओ. में पहली बार अपनापन दिखा था, उसे लगा था कि इस आदमी के साथ वह अपने को बांट सकती है तथा बंटने पर हस भी सकती है। अचानक लौंगी बदल गई, काम देवता वाले कथानक की तरह। फिर तो बी.डी.ओ. का आवास अचानक देहोत्सव का मंडप बन गया और बी.डी.ओ. तथा लौंगी दोनों एक दूसरे का रसायन। पर ऐसा यूं ही नहीं हो गया, लौंगी ने बी.डी.ओ. को काम क्रीड़ा की मौलिक क्रियाओं में काफी गहरे तक डुबो दिया, देह को ऊपर, ऊपर ही मत देखो, ऊपर क्या है, कुछ नहीं केवल मांस तथा उसके मांसल उतार चढ़ाव, झील तो नीचे है, गहरी और गहरी, देह के सारे रहस्य वहीं हैं, वहां उŸोजना के कौतुक नहीं हैं, वहां चिर शांन्ति की मादक लहरे हैं, एक को छुओ तो सारी लहरें मन को गुद गुदाने लगती हैं.. बी.डी.ओ. समझ ही नहीं पाया कि हो क्या रहा है और वह किस दुनिया का नागरिक बनता जा रहा है? जो किसी रहस्य की तरह ही नहीं, अद्भुत तथा मनोरम भी है। इस तरह की नागरिकता तो उसे कभी नसीब ही नहीं हुई। पत्नी के जमाने में भी उसे ऐसे अवसर कभी नहीं मिले। उस समय उसे आनन्द तो मिलता था पर इस तरह का आनन्द जो आनन्द के भी ऊपर हो, यह क्या है? उसे नहीं मालूम। बी.डी.ओ. डूब गया। उसने देह की ऐसी सक्रियताओं.. को कभी नहीं देखा था। विवाहित होने के बाद भी उसे देह के भूगोल में पाये जाने वाले अनमोल तथा रहस्यमय मानसिक खनिजों के बारे में पता नहीं था। देह के अंतरंग तथा बाह्य अपनत्व भरे साक्षात्कार का सामना, उसने कभी नहीं किया था। लौंगी को भी अच्छा लगा जितना किसी वैद्य को लग सकता है, जब वैद्य मरने वाले आदमी को दवाओं के द्वारा भला चंगा कर देता है। उसने बी.डी.ओ. को गंभीरता से देखा। बी.डी.ओ. के चेहरे पर पुरुष होने की कांति देख कर वह झूम उठी हालांकि उसका झूमना देह यज्ञ के दुबारा आयोजन के निमिŸा नहीं था उसका प्रयोजन सिर्फ यह था कि वह चाहे तो पुरुष को पुरुष बना सकती है जैसे कि उसने बी.डी.ओ. को बना दिया। वह मन ही मन हसी भी कि उसने आज जाना है कि स्त्रियों के लिए मर्द क्यों आवश्यक होता है? अभी तक तो वह आधी अधूरी औरत ही थी। आज उसे संपूर्ण औरत बनने का परम सुख मिला। वह भी देह यज्ञ की सामग्री बन कर खुश, खुश थी अभी तक तो केवल खिलौना थी, खिलौने की तरह बजती थी, थिरकती तथा नाचती थी। बी.डी.ओ. खुश, खुश था, उसे जान पड़ा कि वह जीवित तथा सचेत है तथा उसकी दैहिक कुशलताओं का सर्वनाश नहीं हुआ है जो उसे पुरुष बनाती हैं.. वह प्रयास करे तो वह भी दैहिक कलाओं के सुखों व अनुभूतियों में गोते लगा सकता है तथा मन की झील में उतर कर निर्वाध तैर सकता है। उसने पहले की तरह नहीं, देह यज्ञ के योगी की तरह लौंगी को गंभीरता से देखा। लौंगी, लौंगी नहीं थी, वह बदली हुई थी किसी ज्योति की तरह आमंत्रण देती तथा पास बुलाती, खींचती। उसके अगल बगल नरम धूप थी तथा मन की शीतल हवाएं.. उसने सरसराहट महसूसा यह हो क्या रहा है, वह भीतर भीतर क्यों स्पंदित हो रहा है? यह स्पंदन किस लिए? क्या वह तटस्थ नहीं रह सकता? लाैंगी तो पहले भी लौंगी ही थी जब यहां आयी थी तब तो किसी हलचल ने उसे हिलाया नहीं अब यह हलचल किस लिए? लोंगी को अपने पास तथा नजदीक पाकर उसने सोचा था कि भूख मिटा लेगा, उसने कोशिश भी किया पर भूख ही गायब हो गई थी जैसे मर गई हो। मरी हुई भूख का कोई अर्थ नहीं.. लौगी परोसी हुई थाली थी, वह देख रहा था कि थाली में उन्माद के धरोहर हैं, जो मनोहर हैं, उसे इस तरह के मनोहरों का रसपान करना चाहिए, पर मंुह खुले तब नऽ। मुंह तो सिल गये थे। पहली बार वह देह की असमर्थता तथा इनकार का सामना कर रहा था, जबकि उसकी देह न तो शिथिल थी, न ही कमजोर। शायद मन की कमजोरी उसे कमजोर तथा असमर्थ बना रही थी। भोग व संभोग के बीच आपसी सहभागिता का अभाव उसके लिए अखरने वाला था। वह देख रहा था अपनी इच्छाओं की दुखद मृत्यु तथा हताश करने वाला प्रतिफल। वैसे भी देह खुद बहुत सी बातों को स्वीकारती नहीं, वह उतना ही स्वीकार करती है जितना उसे ग्राह्य होता है। देह उल्टी करना नहीं जानती, खाया और थूक दिया, वहां यह नहीं चलता। स्वीकार तो स्वीकार, नहीं तो इनकार तथा धिक्कार भी। अब वह धिक्कार चाहे किसी को कितनाहूॅ दुख दे उससे देह पर कोई फर्क नहीं.. यही मन और तन का पवित्र द्वन्द भी है तथा उसका हासिल भी। इस लीला में द्वैत नहीं चलता मन कहीं, तन कहीं यह सिर्फ कहने की बातें हैं। लौंगी बी.डी.ओ. के लिए काम की देवी बन चुकी थी आराध्य तथा पूज्यनीय। उसने लौंगी को धन्यवाद दिया तथा उसकी प्रशंसा किया.... ‘अब मैं महसूस रहा हूॅं कि मुझे जीना चाहिए। मैं तो पत्नी कि निधन के बाद टूट गया था, मेरा मन खंड, खंड बंट गया था, होते हुए भी मैं नहीं था, मैं जो था वह दूसरा मैं था थका, हारा, टूटा तथा खंडित। मेरे लिए रंगीन मौसम या इठलाती, गुनगुनाती बदरियों का कोई अर्थ नहीं था। अर्थ तथा व्यर्थ के बीच झूले हुए आदमी की तरह मैं कभी अर्थ की तलाश करता तो कभी व्यर्थ को ही अर्थ मान लेता। मैं समय को निर्णित करने की स्थिति में नहीं था। तेरे इस क्षणिक साथ ने मुझे बहुत कुछ सिखा दिया कि जीवन जिया जा सकता है, हसते तथा खिलखिलाते हुए’ एक बात पूछंू लौंगी... ‘क्या तुम मेरा साथ दे सकती हो? मुझे तेरी सहानुभूति और दया चाहिए’ ‘का कह रहे हैं साहब? का करेंगे एक बदनाम का साथ ले कर, आपको तो जाने कितनी लौंगी मिल जायेंगी’ लौंगी ने साफ बताया ‘नहीं नहीं तूं अपनी बता, मुझे तेरा साथ चाहिए, मैं निवेदन कर रहा हूॅं, हाथ जोड़ रहा हूॅं कि तूं मेरा साथ दे, अगर तूं चाहे तो मैं तेरे साथ घर भी बसा सकता हूॅं’, बी.डी.ओ. रिरियाया ‘नाही नाही साहब! हमैं अब घर नाहीं बसाना, अब हमार देह बसाने लगी है ऐसे में घर का बसाना। घर तो साहब तबय बसता है जब देह सुवास छोड़य, दिल अउर दिमाग में फरक नाहीं रहय। ईहां तो न दिल का पता है न दिमाग का, अउर देह तो दह बन गई है। एम्में जेहर देखो ओहर दह ही दह है.. आप तऽ जनबै करते हैं साहब! दह में दाह ही दाह होते हैं, अब ऐसे में हम का करेंगे घर बसा कर।’ लौंगी ने बी.डी.ओ. के प्रस्ताव को नकार दिया, उसे नकारना ही था। बदला
कुछ लोग लौंगी को प्यार व आदर देते थे। हालांकि वे लोग भी लौंगी की देह खरीदते थे। उसे रोग हो गया है जानने के बाद लाैंगी उन लोगों के पास नहीं जाती। बी.डी.ओ. के पास तो कŸाई नहीं जाती। उसे खुशी हुई थी कि बी.डी.ओ. की बदली हो गई है और वह किसी दूसरे जिले में चला गया है। कहते हैं होनी को कौन टाल सकता है? एक दिन बी.डी.ओ. खुद उसके गांव चला आया और उसे कार में बिठा कर शक्तिनगर ले गया। पहले तो लौंगी ने इनकार किया... ‘नहीं जाना है’, बी.डी.ओ. लौंगी को अपने साथ ले जाने के लिए ही जौनपुर से सोनभद्र उसके पास आया था फिर वह काहे नहीं ले जाता उसे? लौंगी की अइया सुन रही थी कि लौंगी बी.डी.ओ. के साथ नहीं जाना चाहती थी, उसकी अइया ने उसे टोका.. ‘काहे रे! साहब के साथ काहे नाहीं जा रही? ओतना दूर से आये हैं साहब! जा चली जा, एक दू दिन की ही तो बात है, साहब तोहके घरे छोड़ ही देंगे, कमाई भी हो जायेगी। इहां आखिर छुछुआती ही रहेगी नऽ, एकरे संगे तऽ ओकरे संगे’ विवश हो कर लौंगी को बी.डी.ओ. के साथ जाना पड़ा। लौंगी नहीं चाहती थी कि बी.डी.ओ. को उसका रोग पकड़ ले। बी.डी.ओ. उसे केवल घुमाने के लिए तो नहीं ले जा रहा, वह देह का खेल खेलेगा जरूर सो वह उसके साथ नहीं जाना चाहती थी। बी.डी.ओ. को उसके बारे में कुछ नहीं मालूम कि उसे का हुआ है, नहीं तो वह खुद ही उसे साथ नहीं ले जाता। वैसे उसके रोग के बारे में किसी को कुछ भी नहीं मालूम, सो उसका कारोबार भी चल रहा है, मालूम हो जाने के बाद तो वह खेत का ढेला बन जाती एकदम बेकार। लोंगी ने अपने बैग में कुछ जरूरी सामानों के साथ कंडोम भी सहेज कर रख लिया और बी.डी.ओ. की कार पर सवार हो गई किसी अफसराइन की तरह। शक्तिनगर तक पहुंचने तथा वहां होटल में डेरा जमाने तक सिर्फ तीन घंटे लगे। वहां पहुंचते पहुंचते शाम गदराने लगी थी और सूरज भी नरम होने लगा था। उधर बी.डी.ओ. था कि ऊर्जस्वित होता जा रहा था। उसके लिए पल दर पल भारी तथा बोझिल पड़ रहे थे, उबाऊ और थकाऊ। वह देहलीला की उत्सुकता में धीरज खोता जा रहा था पर आश्वस्त था कि यह जो रौशनी का खेल है शीघ्र ही अन्धेरे में बदल जायेगा फिर तो रात आयेगी ही और राते वाले खेल जो सामान्यतया देहलीला के प्रयोजनों वाले होते हैं, आरंभ होंगे ही। देह की व्यग्र उत्सुकताओं को समय के साथ रोक लेना, उसमें ठहराव लाना, हर हाल में भला तथा सुखकर होता है। बहरहाल रात आयी, उसे आना ही था, कैसे आयी? मन की चुलबुलाहटों को बी.डी.ओ. ने कैसे संयमित किया, जिससे उसके पद तथा कद की गरिमा बची रहे इससे रात के आने तथा गुजर जाने से कोई मतलब नहीं था। मतलब था तो केवल रात के आने से कि वह मुस्कराती तथा थिरकती आये और देह को गुदगुदाए। खाना, पीना खतम हो जाने के बाद वह समय भी आ गया जिसकी बी.डी.ओ. प्रतीक्षा कर रहा था। पर लौंगी थी कि दूर हट गई। उसने समय के साथ चलने से साफ मना कर दिया। वह इस लायक नहीं कि समय को गोदी में रख कर दुलार सके। बी.डी.ओ. को अचरज लगा..क्या बोल रही लौंगी? काहे इनकार कर रही? ‘कोई बात है का?’ बात कुछ भी नहीं थी, जो थी उसे लौंगी ही जानती थी। लौंगी ने बैग खोल कर उसमें से कंडोम निकाला और बी.डी.ओ. को थमा दिया..। ‘साहब इसे चढ़ा लीजिए’ ‘यह क्या है?’ ‘इसे नहीं जानते, कैसे मरद हैं? कंडोम है, बिना इसके नाहीं’ ‘काहे?’ ‘बस ऐसे ही’ ‘ऐसे क्यों? इसकी कोई जरूरत नहीं’ ‘जरूरत है साहब! तभी तो बोल रही हूॅं, पहले ऐसा बोली थी का?’ ‘तो अब काहे ऐसा बोल रही हो?’ ‘अब आप को का बतायें साहब? का, का बतायें? बस बूझ लीजिए कि बिना कंडोम के काम नहीं होगा।’ ‘तूं बाल बुतरू से डर रही है नऽ, तो उसमें डरने की का बात है? मुझे तुमसे एक बच्चा चाहिए लौंगी, अब तूं इस काम को भी छोड़ दे और मेरे साथ रह। यहां से जाने के बाद से ही मैं इस बारे में गुन रहा हूॅं कि हमें लुका छिपी का खेल बन्द कर देना चाहिए और जो सच है उसे स्वीकार कर साथ रहना चाहिए। साथ रहने के लिए हमें शादी कर लेनी चाहिए पर जाने काहे के लिए तूं राजी ही नहीं हो रही।’ ‘अरे! का बोल रहे है साहब। हम अब बिआह करेंगे, काहे के लिए? हम आपको पहिलहीं बोल चुके हैं कि हमैं अब इस झंझट में नाही पड़ना है, अच्छा ई बोलिए कि काम करना है कि नाहीं, अइसहीं रात बितानी है का? ई लगा लीजिए नऽ, का बिगड़ जायेगा, कउनो फरक नाहीं पड़ेगा।’ पहले बता कि काहे लगा लें इसे? फिर लगा लेंगे.... बी.डी.ओ. ने उसे सुझाया। अन्ततः बी.डी.ओ. को लौंगी की बात माननी पड़ी, उसने कंडोम लगा लिया फिर रात का खेल शुरू हुआ जो काफी देर तक खेल की तरह दोनों को गुदगुदाता रहा। बाद में लौगी ने बताया कि वह कंडोम लगाने के लिए काहे बोल रही थी। बी.डी.ओ. उस समय लौंगी को देखता रह गया था किसी अचरज की तरह फिर उदास हो गया। उसके मुंह से बोल गायब हो गये थे कि का बोले? का पूछे। वह जानता था कि देहलीला में एड्स का होना अचरज नहीं.. ‘यह का हो गया रे तुझे? तूं ही मेरा सहारा थी, तूं भी साथ छोडे़गी का? ऐस मत करना लौंगी। कहने को यह दुनिया बहुत बड़ी तथा हसीन भी है पर मेरे लिए नहीं, मेरा इस दुनिया में कोई नहीं, एकदम अकेला हूॅं, अनाथ तथा हताश। तुझे पाकर मैं सपने दखने लगा था, उसी में डूबा रहता था, अब तूं है कि साथ छोड़ने की सूचना दे रही।’ ‘कैसे मालूम हुआ यह सब?’ पूछा बी.डी.ओ. ने ‘मालूम तो होता भी नाहीं, हमैं बर, बोखार भी तो नाहीं आया था, आजउ हमैं ई थोड़ै लगता है कि हमैं देह वाला रोग हो गया है, जो देह के साथ ही जायेगा। हर काम हमार ओइसहीं हो रहा है, जइसे पहिले होता था। आपउ तऽ देख लिए का फरक है हमरे में? कुछौ नाहीं नऽ’ ‘ऊ त एक दिन हम सरकारी अस्पताल में अइया की दवाई कराने के लिए रापटगंज गये थे। अइया बोखार में थी, उसकी देह तप रही थी। बोखार तऽ ओके था ही खून की कमी भी हो गई थी, डक्टरवा बोला कि खून चढ़ाना होगा कम से कम एक बोतल। अइया को खून चढ़ाने के लिए हमैं खून देना था, हमार खून की जांच हुई फिर डक्टरवा बोला कि तोहार खून नाहीं चढे़गा, तोहैं एडस हो गया है। हमहूॅं थौड़ै जानते थे कि का होता है एडस। अइया के संगे डक्टरवा ने हमार भी दर दवाई किया अउर बोला कि हमेशा जांच करवाती रहना, दर दवाई खाती रहना। तब से दर दवाई चल रही है। अउर केहू की हमैं फिकिर नाहीं है साहब! पर आपकी है, आपके संगे हमरौ मन लग गया है, लगता है कि आपसे चिपकी रहूॅं जोंक की तरह। अइसने में बोलिए हम आपके लिए किस काम के हैं? अब हमैं भूल जाइए साहब! हमार आप से हजोरी बिनती है।’ लौंगी बात करते करते रो पड़ी, इतना रोई कि बी.डी.ओ. घबरा गया। किसी तरह उसने रोना बन्द किया। शशि के लिए लौंगी की कहानी काफी दर्द भरी थी। लौंगी ने साफ,साफ बताया शशि को कि वह उन लोगों से निश्चित रूप से बदला लेगी जिन लोगों ने उसे इस हालत तक पहुंचाया है। अब तक उसने कई लोगों को अपना शिकार बना भी लिया है। परधनवा के छोटका बेटवा को शिकार बनाने के बाद वह किसी से बदला नहीं लेगी सावधानी बरतेगी, लौंगी ने शशि को बताया... अरे! ऐसा न करो लौंगी, काहे उसे मौत के मुंह में धकेलोगी, तुझे का मिलेगा?’ शशि ने उसे समझाया..
‘मिलेगा बहिन जी, बहुत कुछ मिलेगा पर परधनवा कऽ छोटका लइकवा ऑख मिचौली वाला है ही नाहीं, एही से समय बीत रहा है। ऊ बनारस पढ़ता है अउर काम से काम रखता है। कई बार फेरा डालने के बाद तऽ ओसे बतकही हुई, पहिले तऽ बोलता, बतियाता भी नाहीं था। एक दिन हम ओके छेक लिए लाज शरम छोड़ कर, अपने खरिहाने से घर लौट रहा था, कुछ अन्हार भी था..’।
अरे का बबुआ! एहर, ओहर नाहीं देखते हो का? ‘का देखना है, देख तो रहे हैं..’ ‘नाहीं बबुआ, तूं कुछौ नाहीं देखते हो, देखते तऽ कुछ बोलते बतियाते’ ‘का बतियाना है?’ उसने पूछा ‘अरे बतियाने के लिए का नाहीं है ईहां.. चलो घरे चलि कर बतियायेंगे,’ एहि उमर में ही तो बतकही होती है, बुढ़ाने पर बतकही थोड़ै होती है, जउन चाहो बतिया लो, कुछु मन की, कुछु तन की, फिर दोनों की। तन, मन दोनों जब लड़ते हैं नऽ बबुआ फिर तो पूछो नाहीं, का होता है, मन कुलबुलाता है कि नाहीं?’ पूछा लौंगी ने परधान का लड़का धीर, गंभीर बना हुआ था, वह था भी धीर, गंभीर, बीस साल का गबरू जवान, चमकता, दमकता सांवला चेहरा, चेहरे पर कौमार्य का अद्भुत खिंचाव। लौंगी उसके चेहरे के खिंचाव के कारण उससे बतिया नहीं रही थी, उसके मन में बदले की भावना थी, इसी लिए वह अपने आकर्षण में उसे फसाना चाह रही थी, चाहे जैसे फसे, उसे फसाना है। आखिर कितने समय तक परधान का लड़का औरत की जादुई ताकत से खुद को बचा पाता, देहभोग की मांग देह से जुड़ी वर्जनाओं को फलांग जाती है। परधान के लड़के का मन वर्जनाओं को फलांग गया और वह लौंगी की जाल में फंस गया। लौंगी परधान के लड़के के साथ अपने घर में थी। वहां किसी बात का डर नहीं था, सुरक्षित तथा आरक्षित स्थान था लौंगी का घर। परधान का लड़का लौंगी की देह के लिए लालायित हो उठा और लौंगी के साथ कामोŸोजना के व्याकरण को आजमाने में जुट गया। लौंगी को भी अच्छा लग रहा था, ताजी देह और उसकी ज्योति से लौंगी अविभूत थी, अब तक तो उसे बासी से ही काम चलाना पड़ता था। अचानक लाैंगी चिहुंक उठी, देह की परमावस्था तक पहुंचते पहुंचते लौंगी के मन में पाप का बोध हुआ कि वह पाप करने जा रही, अपनी तरह किसी का जीवन छीन रही है, जैसे उससे उसका जीवन छीन लिया गया ठीक उसी तरह। पहले कभी उसने इस तरह का पाप बोध नहीं महसूसा था। वह मानती थी कि पाप पुण्य जैसा कुछ होता ही नहीं, जो होता है, जितना तथा जैसा होता है, बस उतना ही होता है, उस होने के आगे, पीछे कुछ भी नहीं होता, फिर कैसा पाप? कैसा पुण्य? पर उसने महसूसा की वह पाप कर रही है, करम बाबा पूछेंगे ही वे जबाब मांगेगे कि तूंने अबोध लड़के को काहे फसाया? फिर वह का बताएगी उन्हें, बदला लेना ठीक नाही.. वह भी बाप का बदला बेटे से लेना यह तो एकदम गलत है। लौंगी ने ताकत लगा कर परधान के लड़के से अपनी देह के दबाव को छुड़ाया.... ‘नाहीं, नाहीं ई सब नाहीं होगा, बस ओतनै जेतना हो चुका है, अब आगे नाहीं, आगे न जाओ बबुआ, आगे जाओगे तो फस जाओगे’ कहते हुए लौंगी परधान के लड़के से दूर खड़ी हो गई। परधान का लड़का पाप, पुण्य के द्वन्द में नहीं था। वह उस समय आवेशित था, कामाध्यात्म के आखिरी पडाव पर पहुंचने में इतनी बेहूदी दूरी। क्या कर रही लौंगी? उसने खुद ही उसे आमंत्रण दिया और अब नफरत भरा इनकार, क्या है यह? नर, नारी के दैहिक द्वन्द का रसायन पीने से रोकना, अजीब है लौंगी। लौंगी परधान के लड़के के कसाव से छिटक चुकी थी, वह मुक्त थी। उसे लौंगी पर गुस्सा आया जो प्राकृतिक था, गुस्सा आता ही। उसने लौंगी को अपनी ओर खींचा पर नहीं खींच पाया, न ख्ंिाचने के लिए लौंगी ने जोर लगाया, वही हुआ जैसा लौंगी चाहती थी। उसे परधान के लड़के के साथ वह सब नहीं करना जिसके लिए वह छटपटा रहा है। ‘नाहीं बबुआ नाहीं, ऐसा न करो, अबहीं तोहर उमर पढ़ने लिखने की है, यह देह है बबुआ, एम्मे जे डूब गया फिर नाहीं निकल पाया, हमार बात बूझो गुनो, नाहीं तऽ एम्मे का है, हम तोहके भी सउंप देते, चाहे जउन करो, देह खियाती थोड़ै।’ परधान का लड़का सफाई चाहता था कि लौंगी अचानक ऐसा काहे कर रही? उसने लौंगी से पूछा.. ‘बता तो सही तूं अब इनकार काहे कर रही? तूंने ही तो मुझे इस जाल में फसाया नहीं तो मुझसे का मतलब था, ऐसा नहीं है कि मैं तोहरे बारे में जानता नहीं था, सारा कुछ जानता था। वैसे भी मैं इन कामों के चक्कर में नहीं रहता पर अब जब बात आगे बढ़ गई है तूं रोक रही है, मत रोक लौंगी, मत रोक।’ पर लौंगी तो अलग दुनिया में थी, पाप, पुण्य की दुनिया में.. वहां सारा कुछ सरल रेखा की तरह होता है। एक में जुड़ी रेखाकृतियों की तरह नहीं.. वर्जनाओं का एक अलग संसार, पवित्रता, अपवित्रता की कष्टकर रेखाओं से विभाजित। शुचिता मन की ही नहीं तन की भी, मन को बेमन नहीं होने देना ऐसा नियंत्रण, तन को तनेन होने से रोक लेना ऐसी दृढ़ता, हर सोच को सच के सांचे में लगातार ढालते रहना। लौगी अचानक बदल गई थी। उसे करम बाबा के श्राप का ख्याल आया। अब तक तो उसने कुछ ऐसा नहीं किया जो बाबा के परसाद लायक हो कम से कम आगे तो ऐसा वैसा न करे जिससे बाबा श्राप दे दंे.. परधान का लड़का अबोध है, उसने उसके साथ कुछ किया भी नहीं है, न हसी न ठिठोली, बगल से गुजर जाता है पर कुछ बोलता नहीं, उससे बदला लेना, जैसा कि उसने परधान से लिया। परधान ने उसे छोड़ दिया था। चार पांच साल से वह उसे नहीं बुलाता था। लौगी भी परधान के पास नहीं जाती थी पर जाने लगी जब उसे मालूम हुआ कि वह रोगी हो गई है, अब बदला ले सकती है। वही हुआ लौंगी ने बदला ले लिया और एक दिन एड्स से परधान मर गया। लौंगी जानती थी कि परधान को मरना है किसी न किसी दिन। गांव में कोई नहीं जानता कि परधान किस बेमारी से मरा, पर लौंगी जानती है कि परधान एडस की बेमारी से मरा। उसे भी वही रोग लग गया था जो लौंगी को है। परधान को तड़पता, कराहता देख कर लौंगी सिहर गई थी उसे भी इसी तरह तड़पना तथा कराहना होगा। उसका बड़का लड़का भी कराहेगा, उसे शर्म तथा हया तक नहीं कि बाप ने जिसे हवश का शिकार बनाया है उससे वह भी अपनी हवश मिटा रहा है। जानते हुए भी। जाने कितनी बार उसने देखा है बाप के साथ, तब दूध पीता थोडै था, रेखें करिया रही थीं.. वहां तक तो ठीक था पर इस लड़के के साथ..। कभी नहीं, उसने करम बाबा का ध्यान किया..। बाबा ने उसे इस पाप से बचा लिया नहीं तो वह खुद से भी मुंह दिखाने लायक नाहीं रहती, दूसरों से तो बच जाती पर अपने आप से नहीं बच पाती। परधान का लड़का भी विचार वाला था नहीं तो वह ताकत पर उतर आता और लौंगी को बेवश करने की कोशिश करता पर उसने वैसा कुछ नहीं किया। सिर झुका कर लौंगी के घर से निकला और अपने घर की तरफ चला गया। लौंगी उसका जाना देखती रही और गुनती रही कि वह उसके पीछे पीछे जा रही है। वह खुश, खुश थी कि आज जो उसे हासिल हुआ है वह कभी हासिल नहीं हो सकता। एक अबोध लड़के का अबोधपन उसने नहीं छीना, नहीं तो बदले की आग उसे भी लपेट लेती। चाहती तो उसे भी कंडोम पहिनवा देती और काम निपटा लेती पर लड़के का चिŸा देह के ताप से तपने लगता फिर वह सोने की तरह खरा नहीं होता लकड़ी की तरह जल जाता। चिŸा, चेत में रहे तो ठीक, अचेत होते ही गड़बड़.. सोनभद्र की फुकूयामा ‘हां लौंगी! तूंने उस लड़के को तन के ताप में नहीं फसाया यह बहुत अच्छा किया, अब तोहरे लिए वह लटुआता है कि नाहीं’.... लौंगी से पूछा शशि ने ‘लटुआता नाहीं बहिन जी, वह हमैं देखते ही खुनसा जाता है, वह घिन करता है हमसे, हमैं भला लगता है, चलो उसे घिन तो हुई। लेकिन एक बात है बहिन जी, हम केहू के अब फसा नाहीं रहे हैं, हमैं केहू को फसाना भी नाही है, पर इहो है बहिन जी हम केहू से नाहीं बताते हैं कि हमैं देह वाला रोग हो गया है। कैसे बतंाए बहिन जी? बता देंगे तऽ हमार खाना, पीना बन्द हो जायेगा। अइया बपई को भी तो संभालना है। अइया बुढ़ा गई हैं, कहीं काम धाम करने लायक ही नाहीं हैं, अउर बपई..। वह पहले भी कुछु नाहीं करता था अब का करेगा? करने लायक ही नाही है, झूल गया है, चाम अलग, अउर हाड़ अलग’ लौंगी शशि से बात करते हुए आश्वस्त थी कि कोई है जो उसका हाल चाल ले रहा है। लौंगी शशि को अपना समझने, बूझने लगी थी, अगर ऐसा नहीं समझती तो कम से कम बी.डी.ओ. वाली बात तो नहीं बताती। उधर शशि भी लौंगी को अद्भुत नायिका की तरह देख रही थी। इस तरह की नायिका तो उसने हिन्दी साहित्य की कहानियों में भी नहीं देखा, जाने उनमें का का भरा रहता है। नायिका तो लौंगी है, जीवट वाली, प्यार की वास्तविक रचना की तरह। चाहती तो बी.डी.ओ. के साथ घर बसा सकती थी पर उसने वैसा नहीं किया, आखिर प्यार, प्यार होता है, प्यार में तन का खेल नहीं, मन का खेल चलता है, लौंगी की तरह। वह बी.डी.ओ. के साथ तन का खेल खेल रही थी तो मन का भी। उसने कभी भी तन तथा मन को स्वायत नहीं बनने दिया, कि दोनों अलग खेलें तथा झूमें, दोनों स्वायत होते तो बी.डी.ओ. फस जाता, वह मन को तन से तथा तन को मन से अलग अलग तरीके से संतुष्ट करती रहती पर उसका चिŸा, मन की आध्यात्मिकता तथा तन की भौतिकता से संयुक्त था, उसके चिŸा तथा चेतना में दोनों के रसायन थे, एकाकार, एक में घुले मिले, किसी भी तरह से अलग होने वाले नहीं.. शशि के मुंह से स्वस्फूर्त आह निकली..। ‘धन्य हो लौंगी!’ अचानक शशि खामोशी में चली गई, लौंगी की धन्यता उसे बहुत देर तक आश्वस्त नहीं कर पाई। आश्वस्त करती भी कैसे? लौंगी अपना जीवन कभी भी खो सकती है, वह एड्स का शिकार है, गनीमत केवल इतनी है कि उसका रोग प्रथम चरण में है तथा नियमित दवाइयां ले रही है। अभी उसके लिए विशेष खतरा नहीं है पर खतरा तो उसे जकड़े हुए ही है, कभी भी बुरी खबर बन सकती है लौंगी। तब क्या होगा आगे पीछे कोई नहीं.. उसके अइया बपई का का भरोसा, कब साथ छोड़ दें, साथ है भी नहीं, दोनों लौंगी के लिए कुछ कर भी नहीं सकते। दोनों पहले से ही उस पर आश्रित हैं। शशि एड्स की कई रोगियों से अब तक मिल चुकी है पर जो बात लौंगी में है वह बात किसी में नहीं.. लौंगी उनमें से एकदम अलग तथा अद्भुत है। उसे मृत्यु का डर नहीं पर खुद अपनी देह नहीं छोड़ने वाली। शशि ने लौंगी को कई बार गंभीरता से देखा है कि लौंगी के चेहरे पर मृत्यु के डर की छाया है कि नहीं, उसे कुछ भी नहीं दीख पड़ा, जो दिखा वह तो केवल किसी साहसी महिला के चेहरे पर ही दिख सकता है, जो मुत्यु के बिछौने पर झूमती हैं, जो अपने तथा अपने काम के प्रति आश्वस्त होती हैं, जीवन के विभिन्न किस्म के सुखों दुखों से लड़ना जानती हैं तथा अपनी पूरी क्षमता का उपयोग करना भी। वे आशान्वित होती हैं, निराश नहीं।.. लौंगी शशि के लिए वर्तमान से सीधा हस्तक्षेप करने वाली महिला जान पड़ी, वह बीते दिनों में गोता लगाने वाली नहीं थी। हमेशा आने वाले कल के बारे में सोचती, गुनती। उसी कल के प्रतीक के तौर पर उसे बी.डी.ओ. मिला, उसकी देह का ग्राहक पर वह ग्राहक नहीं रह पाया उसका अपना बन गया। यह केवल संयोग नहीं हो सकता। शशि एकांत में होने पर बी.डी.ओ. के बारे में विचारती है, कैसा होगा वह आदमी? भला आदमी होगा.. नहीं, नहीं, लौंगी ने उसे भला आदमी बना दिया, नहीं तो वह मात्र ग्राहक ही रहता, नर तथा वानर के बीच की कोई चीज, रुपयों के बल पर देह तथा दिमाग दोनों खरीदने वाला। वह सही अर्थों में जिन्दा नर था आज के नरों की तरह नहीं जो वानर बन जाते हैं.. बी.डी.ओ. शशि के लिए कल्पना की वस्तु बन गया। अगर वह कभी मिला तो उससे मिल कर शशि खुश, खुश होगी, हो सकता है कभी मिलना संभव हो जाये, असंभव तो कुछ भी नहीं.. बी.डी.ओ. के बारे में लौंगी से सुन कर शाशि अपने कोलाहलों में समा गई जहां से बाहर निकलना संभव नहीं। आज भी शशि बाहर कहां निकल पाई? पहले की तरह अब तो नहीं फिर भी वह डूब जाती है बीते दिनों में, किसी से कैसे बोले कि वह विवाहित है, जनम जनम का साथ उसे मिला हुआ है। उसका पति भी नर है तथा वह उसकी नारी। वह नर, नारी के मिलन को जानती है। कुछ भी शशि नहीं बोल सकती, इस बाबत उसके पास बोल ही नहीं, वहां सारा कुछ अबोल है। बोले भी तो का बोले कि उसका पति क्या है? दैहिक उन्माद का एक विषालु कीड़ा। शशि लौंगी के गांव भी जा चुकी है उसने देखा है लौंगी के अइया बपई को। उसके गांव के बहुतों से शशि ने बातें की है पर उसे नहीं लगा कि वहां देहव्यापार बुरा माना जाता है। खास तौर से दक्षिणांचल के कुछ गरीब आदिवासियों की सोच में देह की शुचिता या वर्जना का कोई अर्थ नहीं, खाते, पीते मध्य वर्ग के लोगों की नैतिकता वाली सोच उस इलाके में पहुंच कर भोथरी हो जाती है, उसका कष्टकर तीखापन गायब हो जाता है। उस इलाके के लिए देहव्यापार एकदम खुला खुला है, उतना ही खुला हुआ है जितना कि दिमाग का व्यापार खुला हुआ है, तथा लोकप्रिय भी। ‘का फरक है दिमाग अउर देह में, दिमाग बेचकर नौकरी करो फिर काहे नाहीं देह बेचो, बिकते तो दोनों ही हैं’’ आज तो उस इलाके के लोग साफ बोल रहे हैं..। ‘जांगर बेचो, मनरेगा में काम करके पसीना बहाओ, गालियां सुनो, उससे तो बहुत अच्छा है गालियां देने वालों की देह पर लोटो, उनसे तलवे चटवाओ तथा वह सब करवाओ जिसे एक नौकर भी नहीं करेगा।’ शशि सोचती है कि देहव्यापार की बढती आदतों के बारे में सोन के कुछ आदिवासी समाज का वैज्ञानिक ही नहीं मनोवैज्ञानिक शोध कराया जाना चाहिए, पर कराएगा कौन, वहां के कारखाने वाले तो नहीं कराएंगे और नहीं सरकार कराएगी, कोई विश्वविद्यालय करा सकता है पर जाने कब होगा कुछ कहा नहीं जा सकता। वैसे उस इलाके में एक बहुत अच्छी बात हो रही है जो दूसरे इलाकों से उसे विशेष बनाती है, वह है लड़कियों के सम्मान का मामला। लड़कियां वहां सम्मानित हैं तथा घर की मुखिया भी। शशि ने उस इलाके के बारे में विशेष अध्ययन कराए जाने का एक प्रस्ताव अपनी संस्था के मुखिया को भेजा है। क्या इस क्षेत्र में औद्योगिक इकाइयों की स्थापना तथा उससे होने वाले विस्थापन के पहले भी आज की तरह ही या थोड़ा बहुत कम बेशी, देहव्यापार था। यहां का इतिहास बताता है कि पहले यहां आदिवासी ही राजा हुआ करते थे तथा उन्हीं का राज था। वैसे शशि इस क्षेत्र को विशेष रूप से देख रही है, तथा खुद को भी विश्लेषित कर रही है, न केवल नर, नारी के संबधों के बदलावों के बारे में बल्कि यहां के आर्थिक, भौमिक संबधों के बारे में भी वह जानना चाह रही है। एड्स का सर्वे चल रहा था। अस्पताल वाले कर्मचारी ने एक दिन शशि को एक नौजवान लड़की से मिलवाया था हालांकि वह एड्स की रोगी नहीं है केवल धन्धा करती है, वह भी किसी की जबरदस्ती नहीं, खुद की इच्छा से, धन्धा करने के लिए वह नेताओं या अधिकारियों को तलाशती है। वह अक्सर अस्पताल जाती है और खून की जांच कराती रहती है, उसे एड्स का डर बना रहता है। कर्मचारी ने शशि को बताया था कि वह लड़की कई ऐसी लड़कियों से मिलवा सकती है जो धन्धा करती हैं, बहुत व्यवहार कुशल लड़की है, जोगाड़ बना कर उसने सरकारी काम भी हासिल कर लिया है, अब वह सरकारी चपरासी है। शशि उस लड़की से मिलने के बाद भी अस्पताल वाले कर्मचारी की बात से आश्वस्त नहीं थी कि ऐसी लड़की देह का धन्धा करती होगी। उसके रोम, रोम से पवित्रता छलक रही थी तथा उसके चेहरे की चमक चिल्ला रही थी कि लड़की संस्कारों की प्रतिमूर्ति होगी। विनम्रता से बोलना, करीने का पहनावा, केवल अनिवार्य सिंगार, बनावट नहीं, यह लड़की देहव्यापार वाली नहीं हो सकती। अस्पताल का कर्मचारी उसे उल्लू तो नहीं बना रहा? उस कर्मचारी ने शशि का परिचय उस लड़की से कराया। शशि उससे एड्स के रोगियों के बारे में बात नहीं कर सकी, किसी से देहव्यापार के बारे में सीधे पूछा भी तो नहीं जा सकता। देहव्यापार की जानकारी में अक्सर अफवाह का हिस्सा अधिक होता है, सचाई का कम। सोनभद्र में भी अफवाहों का दौर चल रहा है। बताया जा रहा है कि सोनभद्र देह ब्यापर के मामले में किसी भी बड़े शहर से आगे निकल चुका है। यहां यह हो गया तो वहां वह हो गया, इस व्यापार के मामले में आधुनिक टेक्नोलाजी ने भी चार चॉद लगा दिया है। फलां लड़की की ब्लू फिल्म बन गई है, कुछ लड़के फलां लड़की का फोटो एम.एम.एस. कर दिए हैं, थाने सक्रिय हो गये है.ं. यानि जितने लोग उतनी बातें.. यहां बातों की वैसे भी कमी नहीं.. सरकारी काम वाली लड़की भली निकली उसने ही शशि से बातें की..। ‘तो आप एड्स के रोगियों से मिलना चाहती है पर क्यों?’ उसने पूछा इस लिए कि लोगों को जागृत किया जा सके कि एड्स से बचाव एवं लड़ाई दोनों की जा सकती है। नियमित दवाइयां लेने से होने वाली मृत्यु को टाला जा सकता है किसी दूसरे रोगों की तरह। शशि ने कर्मचारी लड़की को बताया पर वह लड़की शशि से सहमत नहीं थी..। ‘मैडम आप ठीक बोल रही हैं पर एड्स तथा गर्भ के मामलों में लड़कियां खुद गुनहगार हैं.. भला आज के जमाने में एड्स कैसे होगा तथा कैसे गर्भ रहेगा? पहले वाला जमाना तो है नहीं, गली गली दवाइयां बिक रही हैं, टी.बी. तथा रेडियो पर लगातार प्रचार आ रहे हैं.. हमैं तो लड़कियों पर गुस्सा भी आता है..। वह धारावाहिक बोलने लगी.... ‘अरे भाई परमात्मा ने तोहैं खाली देह ही नाहीं दिया है, उसने दिमाग भी दिया है। देह तबै हिलाओ, डोलाओ जब दिमाग हिला डुला लो, यह का है कि देह को बिस्तरे पर बिछाय दो अउर दिमाग पर पर्दा चढ़ाय लो, पहिले दिमाग पर से पर्दा हटाय लो फेर देह पर से परदा हटाओ। दिमाग पर का काला पर्दा हटाया नाहीं अउर देह पर लाल पीला पर्दा डाल लिया। घर दुआर वाला, का बोलते हैं मान मर्याद वाला। ‘हमैं तऽ लडकियन पर मैडम बहुत गुस्सा आता है, हमार वश चलै तऽ हम अइसन लड़कियन के गोली मरवाय दें....’ ‘अगर पेट फूल गया तऽ लड़िका को नाली में काहे फेंक रही हो, खुद जाके डूब मरो कहीं, आ ओके जनमाओ, पालो पोसो, बड़ा करो, ओही लड़िकवाा आ लड़किया से ओकरे हरामजादा बाप को मरवाओ, तूं तऽ ओकरे बाप को जानती ही हो, भले ही दूसर कोई जाने नाहीं जाने।’ हम एक बात बताएं मैडम! एड्स की जागरिति से का होगा? के के नाहीं मालूम कि दवाइयां गली, गली बिक रही हैं, जब चाहो लड़िका जनमाओ न जनमाओ, तउने पर जो हो रहा है, आप जनबै करती हैं’ वह लड़की शशि से बात कर ही रही थी कि अस्पताल वाला कर्मचारी चला गया। वह तो केवल शशि को उससे मिलवाने तथा परिचय कराने आया था। शशि उसकी बातें ध्यान से सुन रही थी तथा उसके मन का रेखाचित्र भी बना रही थी। लड़की खुली, खुली थी पर परेशान भी कम नहीं। उसकी बातों से जान पड़ा है कि समाज ने उसे दिया कुछ नहीं होगा, लील लिया होगा बहुत कुछ। लड़की गुस्से में थी तथा गुस्से के कारण ही वह लड़कियों को दोषी बता रही थी। शशि ने बहुत ही विनम्रता से उससे कहा..। ‘पर कुछ तो करना ही होगा उनके लिए, जितना आप साफ समझ वाली हैं, उतना तो उन्हंे भी होना चाहिए। आप सोचिए तो.. कहीं वे लाज शरम के मारेे अपने बचाव के बारे में जानते हुए भी बचाव नहीं कर रहीं और फस जा रही हैं..’ लड़की खिल खिलाई..। ‘ठीक बोल रहीं आप, पर खाली शरम के कारण नाहीं, डर भी बहुत बड़ा कारण है। लडकियां डरती हैं समाज से। घर परिवार की मर्यादा का डर उन्हें हरदम बना रहता है। हम तो कहते हैं काहे का डर? काहे डर रही हो भाई, डरो तो तब जब राम या सत्यवान तोहैं मिल गया हो।’ लड़की ने शशि को देखा कि वह क्या सोच रही, कहीं बोर तो नहीं हो रही? शशि बोर नहीं हो रही थी, वह नारी मुक्ति आन्दोलनों की भूमिका में उलझी हुई थी, सोनभद्र में यह फुकूयामा कैसे पैदा हो गई? सेकेन्ड सेक्स वाली। यह लड़की तो उनसे भी आगे है, कई कदम। जो करना है खुला खुला करो, काहे का डर? लड़की ने अपनी बात रोक कर शशि से पूछा ..। मैडम आप कहीं बोर तो नहीं हो रहीं? हम जाने कौन सा रामायण आपको सुनाने लगे, रामायण नाहीं मैडम, देहायण, का करेंगी रामायण सुन कर? हम जो कहना चाह रहे हैं, उसे बूझ रही है नऽ आप, आप नाहीं बूझेंगी फिर के बूझेगा? सुनिए मैडम.... ‘पेट तऽ तोहार फूला है, मां बनने का मौका परमात्मा ने तोहैं दिया है, यह उनकी किरपा है तोहरे पर, फिर काहे पेट साफ करा रही हो? लड़के को तालाब में फेंक रही हो। पुरुष मिलन के लिए जवान देह अंकड़ाने लगी पर दिमाग जहां था वहीं है मर्दों वाला, धोखे बाज अउर वादा खिलाफ। के के नाहीं मालूम कि मरद धोखेबाज होते हैं, अपने खेलते खाते हैं तनिकौ लजाते भी नाहीं, अउर चाहते हैं कि मेहरारू खंूटे से बंधी रहे गाय की तरह,दूध देती रहे, अउर लात भी न मारे। हम तो कहते हैं मैडम लड़कियों को खुला और खिला होना चाहिए, अउर मर्दों के बारे में समझना चाहिए कि वे गाड़ी मोटर, रिक्सा हैं, उन पर चढ़ो, बैठो अउर जहां मन चाहे चले जाओ, उन्हंे पीठ पर लादने की का जरूरत है?’ शशि इस तरह की लड़की से कभी नहीं मिली थी न ही उसे पता था कि ऐसी लड़की भी हो सकती है फिल्मों वाली। उससे बातें करते हुए उसे महसूस हुआ कि वह फिल्म देख रही है। वस्तुतः लड़की अपने आप में आज की फिल्म ही थी। उसने विनम्रता से उसका नाम पूछा..। ‘अपना नाम तो बताइए बहिन जी’ ‘हां हम तो भूलिए गये थे कि हमैं आपसे जान पहचान कर लेना चाहिए, हम आपन कउन नाम बताएं मैडम जी! हम समझ नाहीं पा रहे हैं, चलिए दोनों बताय दे रहे है..। हमार मतदाता पहचान वाला नाम है लाजवन्ती, अउर धन्धा वाला नाम था सन्नो। अब हम धन्धा भी नाहीं करते खाली नौकरी करते हैं.. आपका का नाम है मैडम जी?’ लाजवन्ती ने शशि से पूछा शशि ने उसे अपना नाम बताया। लाजवन्ती शशि का नाम सुन कर चहक उठी, यही नाम हमरे बड़की बहिन का भी है, आप भी तब हमारी बहिन ही हुई.. हंऽ आप तो बताईं ही नाहीं कि हमसे काहे बदे मिलीं आप? का कउनो काम है? ‘हां हां काम तो है ही’ शशि सोनभद्र की फुकूयामा से मिल कर खुश, खुश थी। लार, दुलार और धन्धा
पहली मुलाकात के दिन ही शशि ने लाजवंती से आग्रह किया था कि वह किसी दिन फुर्सत से मिले। लाजवंती ने अपनी वाचालता दिखाई.. ‘अपने इहां तो फुर्सत ही फुर्सत रहती है, तहसील से निकलने के बाद खाली ही खाली, जउने दिन आप बोलें, आ जायें आपके इहां’ रविवार को आ जाइए कहते हुए शशि ने लाजवंती को अपने आवास का पता बताया। रविवार के दिन लाजवंती शशि के आवास पर थी। लाजवंती और शशि ने खुल कर बातें की पर शशि बन्द बन्द सी थी, वह नहीं खुली, खुलती भी नहीं? लाजवंती ने उसे मौका ही नहीं दिया, वह तो अपना ही बताने में थी। वैसे भी वह लाजवंती की तरह खुल भी नहीं सकती थी, ऐसा साहस उसके पास नहीं था, केवल घुंट रही थी कि उसे भी लाजवंती के रूप में ढल कर अपने ऊपर से लोकलाज का पर्दा हटाना चाहिए, पर वह सोचती ही रह गई और लाजवंती उसकी लाज लेकर चली भी गई। लाज के अलावा लाजवंती शशि के लिए सोच का विषय भी छोड़ गई। शशि लाजवंती द्वारा छोड़े गये विषय तथा उसकी प्रवृŸिा के बारे में सोचने के लिए विवश हो गई। तो लाजवंती ऐसी है। वह धन्धा करने वालियों को प्रशिक्षित कर रही है वह भी बिना किसी लालच के जबकि वह वेतन भोगी है, तब जागरूकता का काम कर रही है। वेतन नहीं मिलता तो काहे करती ? शशि को अपना कद लाजवंती से छोटा जान पड़ा, लाजवंती तो बहुत बड़ी है। लाजवंती धन्धा करने वालियों को साफ समझाती है ‘आज का ही न देखो कल का देखो, कल जब तूं देखने लायक ही नहीं रहोगी तब का करोगी? तूं भले ही सभी को देखो पर तोहैं कोई नाहीं देखेगा।’ लाजवंती ने धन्धा करने वाली कुछ लड़कियों के नाम भी बताया शशि को जो अब धन्धा नहीं करतीं, अपनी घर, गृहस्थी संभाल रहीं हैं, कभी धन्धा करती थीं.. तीन चार लड़कियों को लाजवंती ने घर गृहस्थी से जुड़वा दिया है। दो चार को वह और जानती है तथा उनके साथ भी प्रयास कर रही है, अगर कहीं काम निकल आया तो उन्हें भी जोड़वा देगी। शशि लाजवंती से पहली मुलाकात के दिन ही जान लेना चाहती थी कि वह इस धन्धे में क्यों आयी पर पहली मुलाकात के दिन पूछना उसे अच्छा नहीं लगा, अच्छा था भी नहीं.. आवास पर आने के बाद उसने पूछ ही लिया.. लाजवंती तो जैसे तैयार हो शशि को बताने के लिए पूछो तो.. ‘का पूछना चाह रही हो? यही नऽ कि हम इस धन्धा में काहे आ गये?’ ‘अरे बहिन जी आना ही था हमें धन्धा में, धन्धा में नहीं आती तो यह सरकारी काम मिलता, धन्धा ने ही मुझे यह काम दिलाया। वैसे मैं मजबूर कन्फेशन // 96 // थी, मेरे बाप पर सरकारी कर्जा बकाया था, वसूली की डर से मेरा बाप मारा मारा फिरता था। बैंक ने वसूली का कागज तहसील भेज दिया था। तहसील की वसूली कैसे होती है, आप जनबै करती हैं..। गुंडा होता है अमीन, वह तीसरे दिन हमरे घरे आता। बाप को गाली देता, हवालात में ठंूसने की धमकी देता। एक दिन उसने हमैं देख लिया फिर का था उसका दिमाग बदल गया। अब आपको का बताना कि मरद का दिमाग जब बदलता है तब का करता है। उसने एक दिन हमैं जबरी पकड़ कर अपनी गोदी में बिठाना चाहा, हम जान बचा कर भागे, भागने में सफल भी हो गये, नाहीं त ऊ जाने का करता।’ ‘हमरे गांव का एक आदमी तहसील का चपरासी था। हमने सोचा कि तहसीलदार से मिल कर अपनी गरज कहना चाहिए, हो सकता है काम हो जाये। हम जानते थे कि तहसीलदार अमीनों का साहब होता है। गांव के चपरासी ने हमारा साथ दिया। उसने तहसीलदार से हमैं मिलवा दिया। हमार अम्मा भी हमरे साथय थी। हम दोनों साथय तहसीलदार से मिले। ‘तहसीलदार हमैं देखता ही रह गया। हम तब्बै छनके थे कि तहसीलदार हमरे चेहरा पर से आंख काहे नाहीं हटा रहा? हम ऐतना समझने लगे थे कि मरद मेहरारुन में का खोजता है। हमरे दिमाग में यह बात थी ही कि अमीन किसी न किसी दिन हमैं नंगा करेगा ही, नाहीं तऽ हमरे बाप को हवालात में ठूंसेगा। एसे अच्छा है कि तहसीलदार के यहां ही नंगा हो जाओ अउर बाप को बचा लो। वही हुआ बहिन जी। तहसीलदार भला आदमी निकला, भले ही वह हमरे देह पर लोटा, पोटा पर हमरे मन को दुखाया नाही। उसने वादा किया था कि यहां से जाते जाते हमैं काम पर लगा देगा, अउर लगा भी दिया। बस इहै हमार कहनी है बहिन जी। चाहे एके धन्धा कहो या कुछु अउर, पर इहै है एकरे से तनिकौ एहर ओहर नाही। अब ई न पूछो कि तहसीलदार ने हमैं बिस्तरा कैसे बनाय दिया? ओके आप बूझ सकती हैं.. जवान लड़की अगर चाह ले अउर अपने पर उतर आये फिर तो कउनो अइसन मरद नाहीं जो लार न टपकाने लगै। तहसीलदार भी तो मरदै था, लार टपकाने वाला, पर ओइसन मरद नाहीं था, जौने के पास खाली लार होता है, दुलार नाहीं, तहसील दार के पास दुलार भी खूब, खूब था। लाजवंती लोकलाज से बाहर थी, वह मस्त, मस्त थी और खुश कि उसने बाप के माथे पर से कर्जा उतार दिया। जब से सरकारी काम मिला है तब से धन्धा नहीं करती पर धन्धा करने वालियों में गिनी जाती है। उसे इसका अफसोस नहीं कि उसके बारे में लोग क्या सोचते हैं? लोग चाहे जो सोचें वह अपने मां बाप के साथ रहते हुए खुश है। उसे इस बात का अफसोस नहीं कि उसकी देह को किसी मरद ने छू लिया है, उसे चूमा है चाटा है। वह तो आज भी पहले की तरह ही है, उसकी देह पर तहसीलदार का पाप कहां दिख रहा है? पाप तब दिखता बहिन जी जब हम उपाय नाहीं करते, हम जानते थे बहिन जी, देह का खेल, मन से हो चाहे बेमन से, पेट उसे हजम नहीं करता। मन कोई कैसे देख पायेगा पर पेट तो सभी देखते हैं। सो पेट बचा लेना चाहिए। अउर पेट हमने बचा लिया। पढ़ाई लिखाई हुई ही नाहीं फिर लड़की के लिए का बचता है बहिन जी आप ही बोलो। एक तरफ दिमाग है, दूसरी तरफ देह, न सब दिमाग बेचाता है न सब देह बेचाती है, खरीदने वाला दोनों को छांट छांट कर खरीदता है, चाहे दिमाग हो या देह। हमरे पास देह ही तो है, वही न बेचाएगी बहिन जी! पर एक बात अउर जान लो बहिन जी..।’ ‘हमैं अब देह भी नाहीं बेचना, खरीदने वाला चाहे जउन करै।, आज कल जउन तहसीलदार है हमरे तहसील में वह हमैं बिस्तरा बनाना चाहता है। हमने साफ मना कर दिया। उसने हमारी देह सूंघ लिया था, ये मामले में मरदों की ऑखें गजब होती हैं, जाने कैसे वे कपड़े के भीतर भी ताक, झांक कर लेते हैं, ओन्है सब लउकता रहता है कि देह सोहर गा रही है कि लचारी। शशि को लाजवंती की बातें गहरे तक प्रभावित कर रही थीं.. औरतों के बारे में उसके जो पहले से बने बनाए विचार थे सबके सब टूट रहे थे। लाजवंती हो या लौंगी दोनों औरतें हैं और दोनों परिस्थितियों के कारण औरतों के सांस्कृतिक रूप से अलग हैं, वे सोच सकती हैं तथा अपने सोचे हुए पर दो कदम चल भी सकती हैं.... एक वह खुद है जो अब तक अपने समय को नहीं पहचान पा रही है, उसे पता ही नहीं कि उसका भी समय है, वह अपने समय को दुलार सकती है तथा उसकी प्रफुल्लताओं को अपने पक्ष में कर सकती है पर उसका पक्ष क्या है? पक्ष है ही नहीं शायद, वह खुद अपना प्रतिपक्ष है तथा अपने प्रतिपक्ष के साथ चल भी रही है। प्रतिपक्ष के साथ नहीं चल रही होती तो मन में कोलाहल नहीं होता, आश्वस्ति होती तथा आगे जो करना है उसे निश्चित कर चुकी होती। आज भी उसे उसका पति गुद, गुदा रहा है, उसे जान पड़ता है कि वह आज भी अपने पति के साथ है उसके घर में.. उसके माथे का सिन्दूर, बिन्दिया सभी बोल रहे हैं? शीसे के सामने होते ही उसे लगता है कि उसके देह को विवाह के सारे प्रतीक जकड़े हुए हैं, उससे उलाहना दे रहे हैं आखिर वह शादी होने के प्रतीकों को अब तक काहे ढो रही है? उन प्रतीकों का अब तो कोई प्रयोजन नहीं, उसे उन सबसे अब तो मुक्त हो जाना चाहिए। लाजवंती शशि की तरह दुविधा में नहीं है, वह अपनी तरह की सोच वाले मरद की तलाश में है, जिस दिन मिल जायेगा विवाह कर लेगी। अभी कोई नहीं मिल रहा, जो मिल रहे हैं वे उसकी देह पर उछलने वाले हैं। उछल लिए काम खतम। उन्हें सती सावित्री चाहिए वह भी तन वाली, मन चाहे जैसा हो, सौ तरह का पाप करे, उसका तन पवित्र होना चाहिए। तन को किसी ने छू दिया, बूझो अपवित्र हो गया, चाहे मन घिन घिन ही क्यों न हो। पापी हो या परतापी उससे उनका मतलब नाहीं.. अच्छा बताइए बहिन जी, आप तो पढ़ी लिखी हैं....लाजवंती ने शशि से पूछा. ‘देह पापी होती है का? ई मरद का होता है बहिन जी? जिसके छूते ही देह में पाप लग जाता है। औरत तो खेत की तरह होती है नऽ बहिन जी, खेत में का नहीं उगता, खेत तो खेत ही रहता है, वह किसी को मना थोड़ै करता है कि धान लगाओ या गेंहूॅं बोओ। खेत से का मतलब कि उसका मालिक कौन है?’ शशि हसने लगी, उसने लाजवंती को गंभीरता से देखा.... शशि उसकी ओर मुड़ी। देखने में तो देहाती लगती है, पर दिमाग देहाती नहीं है। साफ और खुला हुआ है, कहीं कोई मैल नहीं। जीवन जीने के तरीकों पर भी दुविधा नहीं। जो करना है करना है, उसमें क्या इधर उधर। लाजवंती शशि को किसी बहती नदी की तरह जान पड़ी, उसे लगा कि सोन उसके बगल से ही गुजर रही है तमाम पर्वतों, घाटियों को चीरते हुए, उसके बहाव को कोई नहीं रोक पा रहा है। वह अनवरत बिना थके अपनी गति से प्रवाहित हो रही है। लाजवंती भी वैसा ही दिख रही है, अपनी गति से प्रवाहित और चालित होने वाली। आखिर नारी इससे अधिक और कितना मुक्त हो सकती है। मर्दों द्वारा रचित वर्जनाओं को तोड़ देना तथा तन तथा मन की चपलताओं एवं दृढ़ताओं को एक सूत्र में बांध लेना ही तो मुक्तता है। कुल मिला कर अपने स्व को बचा लेना, स्व कोई राजस्व नहीं है, यह तो अपना है, किसी राज या समाज का नहीं। स्व को राजस्व बनने से रोक लेना ही तो वह काम है जो तन ही को नहीं मन को भी निर्मल बनाता है। लाजवंती किसी समाज का नहीं स्व का निर्मल उत्पाद है, एकदम प्रकृति की तरह एक जीवित तथा सजग कृति। शशि ने महसूसा कि उसे लाजवंती को चूम लेना चाहिए और उसने उसे चूम भी लिया। उसे अनुभव हुआ कि वह प्रकृति की निर्मल कृति को चूम रही है, अनुकृति को नहीं..। लाजवंती भी शशि से मिलकर गद, गद थी, पहली बार वह किसी ऐसी नारी से मिल रही थी जिसमें मिलावट नहीं, न ही खोखले आदर्शों की सजावट। उसे हर वह नारी अपनी जान पड़ती है, जो केवल नारी होती है समाज का नारा नहीं.. लाजवंती कभी भी अपनी राम कहानी शशि को नहीं बताती अगर उसे जान पड़ा होता कि शशि की ऑखों में भी वही खारा पानी है जो किसी को भी जला कर राख कर सकता है। पर शशि की ऑखों में उसे दूसरी जोति दिखाई पड़ी जो संवेदनाओं से प्रस्फुटित होती है। आहों तथा कराहों से बनी हुई, लोर की तरह ऑखों को हिलोरती हुई। लाजवंती ने देखा कि शशि की ऑखों में मन और तन दोनों की समझदार लहरें तैर रही हैं, जो खुद को बचा लेने के लिए संघर्षरत हैं। उसने बात, चीत के दौरान शशि से कहा भी था..। ‘बहिन जी! जिनकी ऑखों में लोर नाहीं, लोर हैं भी तो हिलोर नाहीं, उन्हें आप का बोलेंगी?’ लाजवंती के सवाल ने दोनों को हसा दिया था..। तंूने अच्छा जोड़ा रे लाजवंती! लोर और हिलोर, लोर केवल लोर ही नाहीं है वह हिलोर भी है। वैसे तो हिलोरें उठती नहीं और जब उठ जाती हैं नऽ फिर तो वही नारी जिसे छुई मुई समझा जाता है, वह जो कर सकती है इसका अनुमान तक नहीं लगाया जा सकता। लाजवंती ने शशि के काम में जरूरत से अधिक मदत की थी। उसने कई लड़कियों से मिलवाया था जो उसकी जान पहचान की थीं। उनमें कोई भी एड्स की मरीज नहीं थी, सभी सावधानी बरत रही थीं तथा सचेत थीं कि इसमें लापरवाही नहीं चलेगी। शशि खुश, खुश थी कि सोनभद्र में एड्स के बाबत जागरूकता है, कम से कम शहरी परिक्षेत्रों में तो ऐसा दीख ही रहा है। शशि के लिए यह एक आवश्यक खबर थी जिसके लिए उसे काम करना था। वह लाजवंती तथा दूसरी लड़कियों के बयानों को रिपोर्ट में शमिल करेगी फिर उसके अनुसार सोनभद्र के शहरी क्षेत्रों का अध्ययन करेगी। आखिर ऐसा सोनभद्र के शहरी परिक्षेत्रों तक ही सीमित क्यों है? अध्ययन से ही इसका निष्कर्ष निकलेगा। शशि के अघ्ययन के लिए नारी की पवित्रता तथा शुचिता दोनों विषय किसी प्रयोजन के नहीं थे, उसे अध्ययन का जो विषय मिला था वह जैविक आवश्यकताओं तथा भूख व गरीबी के कारण होने वाले नर, नारी के दैहिक मिलन पर केन्द्रित था जिसके फलस्वरूप एड्स जैसे भयानक रोग का जन्म होता है। यह प्रमाणित हो चुका है कि सामाजिक वर्जनांए भले ही नर, नारी के मिलन पर अंकुश लगाती हों पर उसे रोक पायें ऐसा संभव नहीं। यह मिलन जितना जैविक है उससे कम परिस्थितिक नहीं। नर, नारी दोनों अपने शरीर के अदृश्य रासायनिेक क्रियाओं की सक्रियताओं के अनुरूप एक दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं और यही आकर्षण उन्हें दैहिक मिलन तक पहुंचाता है। गरीबी दैहिक संबधों को बाजार की वस्तु बनाती है। यही तो सोनभद्र में देखा जा रहा है। उसके अध्ययन के प्रमुख बिन्दु स्पष्ट थे..। सोनभद्र में देहव्यापार के फलाव को शशि दो तरह से देख रही थी एक सोनभद्र वह है जो जंगलों में तथा कारखानों के आस पास है तथा दूसरा वह है जो मैदानी इलाकों के कस्बों से जुड़ा हुआ है। दोनों जगहों की सामाजिक तथा आर्थिक स्थितियां एक दूसरे से भिन्न ही नहीं विरोधी भी हैं.. मैदानी इलाकों में देहव्यापार का रूप मेट्रोपोलेटिन शहरों की तरह सिनेमाई है तो जंगली क्षेत्रों में उसका रूप आदिम है, वहां देहव्यापार भूख, बीमारी, गरीबी एवं कमाई के साधनों के अभाव के कारण है। मैदानी इलाकों की तरफ स्वेच्छया है। उच्च जीवन जीने के साधनों एवं संसाधनों के उपयोग तथा उपभोग की चाहना के कारण भी देहव्यापार प्रसार पा रहा है। शहरी क्षेत्रों में देह का खेल अधिकतम कमाई का विकल्प बना लिया जा रहा है। जंगल की तरफ ऐसा नहीं है, वहां जीवन जीने के सारे साधन औद्यौगिक इकाइयों एवं वन विभाग द्वारा छीन लिए गये हैं, वहां खेती के लिए न तो जमीन है और नहीं कारखानों में रोजगार के अवसर। वहां की जनता विस्थापन का दंश झेल रही है उन रिफ्यूजियों की तरह जिनका कोई क्षेत्र ही नहीं होता। ऐसी स्थिति में वहां का देहव्यापार भूख मिटाने का सुगम तरीका बनता जा रहा है। शशि के सामने सोनभद्र की तस्वीर स्पष्ट थी तथा वह इसके आधार पर ही अध्ययन कर भी रही थी। ऐसी तस्वीर उसके दिमाग में पहले नहीं थी। पहले तो वह यही समझती थी कि सोनभद्र भारत का स्वीटजर लैन्ड है, पूरी तरह से विकसित तथा आधुनिक। अब वह सोनभद्र को महिमामंडित करने वालों की तरह की आत्ममुग्धता से बाहर थी। अब उसके सामने सोनभद्र की असल तस्वीर थी आंसुओं से नहाई तथा खून से सनी हुई। धीरे धीरे उसकी समझ में आने लगा है कि सोनभद्र में वामउग्रवाद के फैलाव का कारण भी यही है। एक ओर भूख से बिलबिलाते, चीखते, कराहते मुर्झाए लोग हैं, तो दूसरी ओर तिजोरियों से खेलते लोग, नोटों के बिस्तरों पर धनी होने के धार्मिक अनुष्ठान करते लोग। अध्ययन के दौरान वह सोनभद्र के तमाम लोगों से बात, चीत कर चुकी थी। कुछ लोगों को छोड़कर उसे ऐसे लोग नहीं.. मिले जो यहां फैल रहे मारक एड्स के प्रति चिन्तित हों। उनकी चिन्ताओं में यह नहीं था। कुछ थोड़े से लोग मिले जो चिन्तित तो थे पर उनमें जनहस्तक्षेप की ताकत नहीं थी। उनमें केवल लोक ही लोक था और लोक के लोग थे कि वे अपने में ही मस्त, मस्त थे। तथा मानते हैं कि औरत जब नंगी होगी तब का होगा एड्स ही तो होगा। लाजवंती उनमें नहीं थी, वह शशि के साथ छुट्टी के दिनों में अध्ययन का कार्य करने के लिए राजी थी। शशि भी उसे उन्हीं दिनों में अपने साथ रखना चाह रही थी जब वह अवकाश पर हो। शशि के आवास पर लाजवंती काफी देर तक रूक गई थी, खाना खाने के बाद ही वापस लौटी थी। तटस्थता का अपराध शशि मेरे साथ टीवी देख रही थी। भारतीय सेना ने पाकिस्तानी आतंकी कैंपों पर सर्जिकल आपरेशन किया था, उसका वीडीओ टीवी पर दिखाया जा रहा था। बीसों पाकिस्तानी आतंकवादी मारे जा चुके थे। सेना को बड़ी सफलता मिली थी। कुछ दिन पहले पाकिस्तानी आतंकियों द्वारा उरी के भारतीय सैनिक छावनी पर किये गये जघन्य हमले को भी दिखाया जा रहा था। पूरा दृश्य कंपाने वाला था और हम कांपने लगे थे। जबकि हमें पता था कि बन्दूकें सिर्फ मौत ही देती हैं, जीवन नहीं। टीवी का दृश्य अचानक बदल गया.. दृश्य में कुछ विपक्षी नेता आरोप लगाते दिखे जो सर्जिकल आपरेशन का राजनीतिक लाभ लेने के सरकारी प्रयास की निन्दा कर रहे थे। इसी तरह बहुत कुछ टीविहा किचकिच हो रहा था जो हमलोंगों की समझ से बाहर था। तभी शशि ने मुझसे पूछा.. ‘सैनिकों को वेतन कितना मिलता है?’ मैंने टीवी बन्द कर दिया। सैनिकों का वेतन.. वह तो मुझे नहीं पता, तुम सैनिकों के वेतन के बारे में काहे पूछ रही। कहीं काम के अनुसार दाम वाले सिद्धान्त के आधार पर तो नहीं.. हां, हां, उसी आधार पर...सैनिकों का वेतन कम से कम पचास हजार तो होना ही वाहिए। सैनिकों के खून का मूल्य भला सरकार काहे समझे,, देती होगी यही कोई बीस, पच्चीस हजार, सरकारी चपरासियों से भी कम। शशि ने माथा पकड़ लिया.. हम अजीब से लोकतंत्र में हैं.. शशि गोष्ठी का कार्यक्रम नियत समय पर निपटा लेने के लिए आतुर थी। गोष्ठी के बाबत निमंत्रण पत्र छप चुके थे। शशि चाहती थी कि डी.एम. साहब को निमंत्रण पत्र देने के लिए मैं भी उसके साथ चलूं, इसी लिए वह मेरे पास आयी थी। डी.एम. साहब के बारे में मुझे पता था कि वे मनरेगा की जांच में व्यस्त हैं, उनसे तीन दिन बाद ही मुलाकात संभव है। एक दिन पहले ही एक प्रमुख दैनिक का ब्यूरोचीफ मेरे पास आया और सूचना दी कि डी.एम. साहब तीन, चार दिन मुख्यालय पर नहीं रहेंगे। पत्रकार का चेहरा खिला हुआ था लगता था कि वह प्रतिभा की नदी में से स्नान करके निकला हो तथा उसके चेहरे को नरम धूप आहिस्ता आहिस्ता सेंक रही हो। उक्त पत्रकार को अपने घर पर देख कर मैं अचंभित था आखिर यह आदमी कैसे आ गया सुबह सुबह? जब से एक प्रमुख अखबार का ब्यूरो चीफ बना है दस मिनट के लिए भी इसके पास समय नहीं कि मेरे पास आये और दुख सुख करे, पुरानी बातों को याद करे। वह सारा कुछ भूल चुका था। बीते समय में उतरने की उसे आवश्यकता ही नहीं थी। वह जान चुका था कि उसका अतीत उसका था ही नहीं, जब वह पढ़ाई, लिखाई के बाद रापटगंज में आ कर ट्यूशन किया करता था और चाहता था कि वह किसी दैनिक से जुड़ जाये। वह जुड़ गया दैनिक से और मुझ जैसों को भूल भी गया, याद रखने की जरूरत भी क्या थी? पर मुझे तो मालूम था कि उसे उक्त दैनिक का ब्यूरो चीफ बनवाने के लिए मुझे क्या क्या करना पड़ा था। चाय के बाद वह पत्रकार खुला, पहले काफी गंभीर था, शायद गुन रहा हो कि मैं उसके बारे में कुछ जानना चाहूं क्योंकि अब वह पहले की स्थिति में नहीं था, उसकी देह पर प्रशासन की चादर लिपटी हुई थी। आला अधिकारी उसे खुश रखने में कोई कसर बाकी नहीं रखते थे। पत्रकारिता के कारण वह प्रशासन का दुलरुवा था, उसकी कमाई बढ़ गई थी। वह जिस ओर अपने दैनिक के सोनभद्र कर पन्ना घुमाता उस ओर से रुपया बरसने लगता। उसे केवल गिनना होता, वेतन तो था ही। चूंकि दैनिक का नाम बड़ा था, इस लिए विज्ञापन के मामले में भी वह बड़ा था। गोया उसे चहुंओर से कमाई थी, अब वह रुपयों वालों की कतार में शामिल था। मैं तो उसे देखते ही चुप हो गया था और अर्थ निकालने लगा था कि आया क्यों है? कोई न कोई बात तो है जो सुबह सुबह ही आ धमका। बात तो थी ही। बात भी साफ,साफ थी जो उसके व्यक्तित्व को उसके अनुसार शिखर पर रखती थी कि उससे बड़ा पत्रकार सोनभद्र में कोई नहीं..। किसी पत्रकार में साहस नहीं कि वह मनरेगा में हुई धांधली के बारे में अपने अखबार में छाप सके, उसने छापा और फटाका कार्यवाही भी हो गई। जांच चल रही है। पत्रकार ने एक फाइल निकाला जिसमें उसके अखबार की कई कतरनें थीं। उसने उन कतरनों को एक, एक करके दिखाना शुरू किया, जैसे,जैसे वह कतरनें दिखाता उसके चेहरे पर मार्क्सवादियों की क्रांतिकारी चेतना वाली अतिरिक्त चमक पसर जाती, उसे लगता कि वह आज के समय में भी साहसी है, जो प्रशासन से टकराने की हिम्मत रखता है। मुझे उसके बारे में अच्छी तरह से मालूम था कि विश्वविद्यालय की पढ़ाई के दौरान वह मार्क्सवादियों की जमात में रहा करता था तथा गोरख पाण्डेय को अगुआ मानता था। पत्रकार के पास दर्जनों कतरने थीं जिसे उसने बहुत ही व्यवस्थित ढंग से रखा हुआ था। उसने सारी कतरनों को दिखाया। कतरनों में दम था, उन कतरनों की तरह कुछ छपना या छापना सोनभद्र की परंपरा नहीं। यहां तो वही छपता है जिसे अधिकारी छपवाना चाहता है या विज्ञप्ति में जो लिखा होता है। मुझे क्या किसी को भी उक्त कतरनें प्रभवित करतीं जो उन्हें देख लेता पर मै उनसे अप्रभावित था क्योंकि मुझे पता था कि पत्रकार ने स्थानीय प्रशासन को अपने अखबार का निशाना क्यों बनाया है? पहली बात तो यही थी कि कलक्टर अखबार के हर ब्यूरोचीफों से उतना ही रिश्ता रखता था जितना रखना चाहिए। वह पत्रकारों को अतिरिक्त खुशियों तथा उत्सुकताओं से लबालब करने वाला नहीं था। उसे अंग्रेजों का वह सूत्र याद था कि प्रशासनिक अधिकारी को जनता तथा जनता से जुड़े लोगों से दूरी बना कर चलना चाहिए। कुछ इतनी दूरी जिससे प्रशासन का ताप व प्रताप दोनों सुरक्षित रह सके। कलक्टर ने सोनभद्र की भाषा में पत्रकार को घांस नहीं डाला अगर वह चारा फेंकता होता तो पत्रकार उसकी भी वाहवाही करता तथा उसे जनता का हीरो बना देता पर उसने वैसा नहीं किया। दूसरे कारण आर्थिक थे। एक तरह से कलक्टर ने पत्रकारों की अतिरिक्त कमाई पर रोक लगा दिया था, वह कहता था.... ‘अखबारों में छपा पढ़ता ही कौन है? अखबार में अगर किसी प्रशासनिक अधिकारी की आलोचना प्रकाशित नहीं हुई तो जान लो वह अधिकारी ही नहीं, अधिकारी तो वह होता है जो अखबार की सुर्खियों में होता है’ पत्रकार खुश, खुश था कि सोनभद्र में मनरेगा के कार्यों की उच्चस्तरीय जांच चल रही है, ऐसा उसके कारण हुआ। उसी ने मनरेगा के कार्यों में हुए भ्रष्टाचार के तथ्य पूर्ण विवरणों को अपने अखबार के माध्यम से उठाया। दूसरी तरफ कलक्टर था कि वह मनरेगा में हुई धांधली को किसी साधारण मामले की तरह देख रहा था। ‘ऐसा तो होता रहता है, इसमें विचारणीय क्या है? काम होंगे तो धांधली भी होगी, उसकी जांच होगी, जो दोषी होगा उसे दण्डित किया जायेगा’ पत्रकार की खुशियों में मैं इसलिए शामिल हो गया क्योंकि वह मेरे घर पर था। पत्रकार की खुशियों की चादर में फैल कर मैने उसे धन्यवाद दिया और अपनी राय जाहिर की जो उसके व्यक्तित्व को काफी गरिमा प्रदान करती थी....। ‘यार तूं ही तो यहां पत्रकार हो, औरों को तो पत्रकारिता का कखग भी नहीं मालूम पर ऐसा तूंने पहले नहीं किया जबकि सोनभद्र में पहले भी कई ऐसे मामले हो चुके हैं जिनमें करोड़ों का घपले हो चुके हैं, चेक डैमों के निर्माण के मामले हों या स्वजल धारा वाली योजना हो, सभी तो कागज पर ही किए कराए गये पर तेरे अखबार में उसके बारे में कभी कुछ नहीं प्रकाशित हुआ पर अब क्या हो गया कि तूं एकदम से क्रान्तिकारी बन गया है। हां कभी तूंने एक प्रकरण प्रकाशित किया था जो फर्जी मुठभेड़ के बाबत था पर उसके बाद तो कुछ भी नहीं.. उस फर्जी मुठभेड़ वाले प्रकरण को पहली बार छाप कर तूं भी तो ठंडा ही हो गया था। उसमें आगे क्या हुआ उसके बारे में फिर कुछ नहीं प्रकाशित हुआ, आखिर ऐसा क्यों किया था तूंने? पत्रकार ने मुझे गुस्से से देखा और आग उगलने लगा..। ‘भाई साहब! आप किसी को आगे बढ़ता हुआ नहीं देख सकते। सोनभद्र में दूसरे भी हैं जो आम जन के प्रति समर्पित हैं, केवल आप ही नहीं हैं। और आप भी तो समझौतांे में जीने वाले आदमी हैं। मुझे नहीं मालूम है क्या कि आपने कई समझौते प्रशासन से किए हैं, पर मैं आपका सम्मान करता हूॅं इसी लिए कुछ नहीं बोलता। मैं जानता व मानता हूॅं कि सोनभद्र में रहने की शर्त ही है प्रशासन से समझौते करना।’ ‘भाई साहब। मै साफ,साफ कह रहा हूॅं कि आपकी यही आदत आपको बौना बनाती है कि आप दूसरों को उसके काम के अनुसार मान, सम्मान नहीं देते। पीछे क्या हुआ था भूल जाइए, आप इस प्रकरण को अखबार में उठाने से खुश हैं कि नहीं? सवाल यही है, इस पर आप नहीं बोल रहे हैं।’ मैं पत्रकार को सुनने व गुनने में था और उसे मौका भी दे रहा था कि उसके भीतर का कालापन बाहर निकले ताकि मैं समझ सकूं कि मुझे यहां के लोगों के द्वारा मिलने वाले मान, सम्मान में कितना वजन है? इस पत्रकार की तरह सोनभद्र में तमाम वुद्धिजीवी हैं जो मुझे मौखिक रूप से मर्यादा के शिखर पर बैठाए हुए हैं, गोष्ठियों आदि में तरीफ करते थकते नहीं पर भीतर से उनके दिलों में मेरे लिए केवल गालियां ही गालियां हैं। ऐसा नहीं है कि मैं इस सच को जानता नहीं, जानता हूॅं, इसी लिए यहां के लोगों से वाजिब दूरी बना कर चलता हूॅं, मैं जानता हूॅं कि यहां सच बोलना अपराध है। बाहरी मित्रों का आग्रह होता है स्थानीय लोगों को मैं अपनी पत्रिका के माध्यम से प्रकाश में लाऊं पर किसे लाऊं? यहां तो लोग अपने द्वारा निर्मित उजाले में फुदक रहे हैं। उनके आस, पास अन्धेरा फटक ही नहीं सकता। अन्धरे में तो केवल मैं ही हूॅं और मैं मानता हूॅं कि मुझे अन्धेरों के खेलों से ही दो चार होना है। पत्रकार के गुस्से ने मुझे कŸाई विचलित नहीं किया क्योंकि मैं जानता हूॅं कि यहां के लोगों की अधिकतम सीमा है गुसिया जाना और गुस्से में कुछ भी बोल देना। मैंने पत्रकार को फिर भड़काया..। ‘अजीब आदमी हो, तूंने मुझे निशाना बना लिया। बिना सोचे समझे बोले जा रहा है, मैंने क्या किया, कब तथा किस बात पर प्रशासन से समझौता किया? प्रशासन से मेरा क्या लेना, देना और फिर मैं पत्रकार तो हूॅं नहीं। मैं ठहरा कविता, कहानी लिखने वाला, कविता कहानी वाले का प्रशासन से क्या लेना देना। बेमतलब तूं मुझे घसीट रहा। तुझे अपने बारे में तो कुछ पता नहीं कि तूं है क्या? अरे यार! तूं एक प्रमुख दैनिक का ब्यूरोचीफ है। तुझे नहीं मालूम कि ब्यूरोचीफ होना कितना कठिन है, कठिन है कि नहीं। तेरी गरिमा है, रोब है, प्रशासन के लोग तेरे सामने अदब से खड़े रहते हैं। और तूं है कि मेरे जैसे निर्जीव से अपनी तुलना कर रहा। अगर मैं ही तेरा आदर्श हूॅं फिर तो तूं छोड़ दे पत्रकारिता और कविता कहानी लिखना शुरू कर दे’ पत्रकार मेरी बातें सुन कर चकरा गया, शायद उसे मालूम नहीं था कि बात, चीत में भाषा के चमत्कार अपना प्रभाव रखते हैं.. पत्रकार अचानक पलट गया और फिर उसी फर्जी मर्यादा की खोल में दुबक लिया..। ‘भाई साहब मैं आपको कुछ नहीं कह रहा हूॅं, आपका तो मैं बहुत ही सम्मान करता हूॅं. मै यहां के पत्रकारों की बात कर रहा हूॅं और वही आपको बताने के लिए आया भी हूॅं कि यहां के अधिकांश पत्रकार मनरेगा में हुए भ्रष्टाचार के मामले में प्रशासन के साथ हो गये हैं। कुछ ही दिन में केन्द्र सरकार की एक जांच समिति यहां जांच के लिए आने वाली है और मैं चाहता हूॅं कि यहां के पत्रकार उस समिति के सामने उपस्थित होकर मनरेगा में हुए भ्रष्टाचार के बारे में एक स्वर से बतायें। मैंने इसके लिए प्रयास भी बहुत किया। सभी ने कहा कि जांच समिति के सामने उपस्थित होना चाहिए पर अब वे बदल गये हैं। केवल मैं ही अकेला रह गया हूॅं। पत्रकारों में से कोई भी प्रशासनिक अधिकारियों के सामने नहीं आना चाहता। मैं चाहता हूॅं कि आप इस कार्य में पहल करें, आपकी तरह के दूसरे वौद्धिक भी। पत्रकारों की एक बैठक बुला ली जाये, और क्या करना है इस पर बात चीत हो। अगर पत्रकार नहीं राजी हो रहे तो जांच समिति के सामने यहां के वौद्धिक ही जनता का पक्ष रखें.. जांच समिति का क्या बताना है इस बाबत सारे प्रमाणित दस्तावेज मैं अपने साथ ले आया हूॅं, आप उन्हें देख लें’ पत्रकार अपनी बातें इस करने में अपने समाचारों की तरह कुशल था। मैंने देखा कि उसका वाकचातुर्य काफी सीमा तक बढ़ चुका है तथा वह अपनी बातचीत से दूसरे को प्रभावित भी कर सकता है। पर मुझे तो उसके ऊपर पहले से ही सन्देह था। मेरा सन्देह अनावश्यक नहीं था, उसने कभी भी मेरे विश्वास को जीवित रखने का काम ही नहीं किया था। जाने कितनी बार मैंने देखा है कि वह जो कहता है, उसे करता नहीं, और जो करता है उसे कहता नहीं, उसकी कथनी और करनी में कभी भी एकरूपता नहीं रही है, वह हमेशा विश्वास के विचलनों का यात्री रहा है। पत्रकार की बातों का दूसरा पक्ष जो मनरेगा के भ्रष्टाचार के बाबत था उसने मुझे प्रभावित किया और मैंने निश्चित किया कि पत्रकार के साथ दो कदम चलना चाहिए तथा जांच समिति के सामने उपस्थित होना चाहिए। पत्रकार की बातों के प्रमाण मेरे पास नहीं थे पर जनश्रुति थी कि सोनभद्र में मनरेगा के कार्यों में बहुत बड़े घपले हुए हैं। पत्रकार ने घपलों से संबधित सारे कागजातों को मुझे दिखाया। उनमें कुछ सूचना के अधिकार के तहत हासिल किए गये थे जो पक्के प्रमाण थे तथा कुछ कागजातों की फोटो कापियां थीं जिन्हें देख कर प्रथम द्रष्टया गलत या अपुष्ट नहीं कहा जा सकता था। सो उन कागजातों ने मुझे प्रभावित किया और मैंने पत्रकार से सीधे बोल दिया कि मैं तुम्हारे साथ हूॅं। तुम यहां के वौद्धिकों की एक मीटिंग बुला लो, मीटिंग मेरे आवास पर ही बुला लो मैं सभी से बातें कर लेता हूॅं कुछ पत्रकारों को फोन से बोल दूंगा, पत्रकार जांच समिति के सामने जायेंगे ऐसा विश्वास तुम्हें रखना चाहिए। मेरी स्वीकृति के बाद पत्रकार आत्मविश्वास से भर उठा, कहने लगा...‘मैं जानता था कि आपके यहां से मुझे निराश हो कर नहीं लौटना होगा, आप कुछ न कुछ अवश्य करेंगे। आपके पहले मैं एक बड़े साहित्यकार के पास गया था सोचा था कि उनसे काम चल जायेगा। आपके यहां आने पर जाने क्या, क्या सुनना पड़े, आप तो मानने वाले हैं नहीं, जो भी मन में होगा बोल देंगे। मैं इससे बचना चाहता था पर आना ही पड़ा आपके पास। उस बड़े साहित्यकार ने मुझे साहित्य की परिभाषा में ऐसा फंसा दिया कि मैं उससे बाहर निकल ही नहीं सकता था। साहित्यकार के पास गरिमा की मजबूत तथा आधुनिक जाल थीं, उसी जाल में वह अधिकारियों तक को फसाया करता था, जाने कितने अधिकारी उसमें फस भी चुके थे। सामान्य लेखकों, पत्रकारों आदि को फसाना उसके लिए सामान्य सी बात थी। साहित्यकार कहने लगा..। ‘जांच समितियों के सामने इस होना, घपलों के बारे में शिकायतें करना, प्रशासन की निन्दा करना या आलोचना करना यह सब साहित्यकार के काम नहीं.. यह सब तो राजनीति करने वालों के काम हैं। साहित्यकार तो केवल साहित्य का आदमी होता है। वह साहित्य में ही पैदा होता है, उसी में जीता तथा मरता है। साहित्य के इतर उसकी कोई दूसरी दुनिया नहीं। आप लोग पत्रकार हैं, आपका काम है अखबार में छाप देना उसके लिए व्यक्तिगत स्तर पर लड़ना नहीं.. जिनको लड़ना हो लड़ें, झगड़े.ं.’ ‘मैं तो आपको सुझाव दूंगा कि आप भी प्रशासन के विरोध में कुछ न करें। कोई आपका साथ नहीं देगा। आगे आप जानें। मैं इस काम में आपकी सहायता नहीं कर सकता।’ उस प्रतापी साहित्यकार ने साफ मना कर दिया कि वह कुछ नहीं कर सकता। पत्रकार को हताश हो कर मेरे पास आना पड़ा था। वैसे मैंने भी उसे मना कर दिया था, पर मुझे पता है कि तटस्थता अपराध है सो मैंने तय किया कि पत्रकार का साथ देना चाहिए और मैंने हां कह दिया था। मैं भीतर भीतर बहुत खुश था कि तटस्थता का अपराधी बनने से बच गया। शशि को पहले ही बता दिया था कि डी.एम. साहब के आने की सूचना पक्की कर लेने के बाद ही उनके पास निमंत्रण देने के लिए चलना उचित होगा। शाम तक खबर मिल सकती है कि डी.एम. साहब किस दिन मुख्यालय पर रहेंगे। मैंने पत्रकार से हुई बात, चीत का संदर्भ भी शशि को बताया था कि सोनभद्र में बहुत ठीक ठाक नहीं चल रहा, इस जनपद का नाम मनरेगा के भ्रष्टाचार के मामले में अब शीर्ष पर है। ‘तो आप पता करके डी.एम. साहब के मुख्यालय पर होने की सूचना मुझे दीजिएगा, उसी के अनुसार प्रोग्राम बनेगा’ मुझसे बोल कर शशि मेरे घर से चली गई थी।
परछांई
दो दिन गुजर गये फिर भी गोष्ठी के लिए निमंत्रण पत्र डी.एम. साहब को नहीं दिया जा सका। डी.एम. साहब मनरेगा की जांच में व्यस्त थे, जांच के बाद सीधे लखनऊ चले गये। उनके दफ्तर के लोगों ने बताया कि साहब दो दिन बाद ही मुख्यालय पर आयेंगे । मैंने फोन से शशि को बता दिया कि दो दिन बाद ही डी.एम. साहब से मुलाकात हो सकती है। सरकारी अधिकारियों वह भी डी.एम. जैसे अधिकारियों को कार्यक्रमों में बुलाना भले ही सहज और सरल हो पर वे कार्यक्रम में शामिल हो जायें यह सरल नहीं, जाने कब और कहां उनके जरूरी प्रशासनिक कार्यक्रम लग जायें और फोन से खबर आ जाये कि वे कार्यक्रम में भाग नहीं ले सकेंगे। अगर भलमानुष हुए तो किसी अन्य अधिकारी को अपने स्थान पर भेज देंगे। नहीं तो नहीं..। अक्सर मैंने देखा है कि बड़े अधिकारियों के साथ ऐसा ही हुआ करता है। जबकि आयोजक आयोजन का सारा तामझाम जितना बेहतर बनाना संभव होता है उनके नाम पर बनाता है कि डी.एम. साहब आ रहे हैं। कार्यक्रम की चमक बाहर तक जानी चाहिए, नाश्ते वगैरह से महिमा फूटनी चाहिए। और अगर ऐसे में डी.एम. नहीं आये तो निराशा फैल जाती है, लगता है कि कार्यक्रम हो ही नहीं रहा, जबकि हो रहा होता है, जिसे होना ही होता है। गोष्ठी की तारीख जैसे,जैसे नजदीक आ रही थी, वैसे,वैसे खबर फैल रही थी कि डी.एम. साहब के मुख्य आतिथ्य में एड्स की गोष्ठी होगी। गोष्ठी होने की खबर अखबारों में भी प्रकाशित हुई थीं। मनरेगा का विरोध करने वाले पत्रकार ने भी खबर सूंघ लिया और दूसरे दिन ही मेरे पास आ धमका। ‘भाई साहब! आप डी.एम. साहब को अपने कार्यक्रम में बुला रहे हैं?’ ‘हां तो..। पर वह कार्यक्रम मेरा नहीं है, शशि का है, शशि बुला रही है, मैं उन्हें काहे के लिए बुलाऊंगा, मेरा कोई कार्यक्रम नहीं..’ ‘शशि और आप में फर्क क्या है? शशि तो आपकी ही साथिन है या कहिए शिष्या है। सोनभद्र में किसे नहीं पता कि आप हैं तो शशि है, शशि है तो आप हैं, फिर तो वह कायर्यक्रम भी आपका ही हुआ नऽ।’ ‘हां हुआ तो..। पर फर्क भी बहुत है जैसे तुम्हारा कार्यक्रम जो मनरेगा के विरोध वाला है, क्या वह मेरा है? मैं उसमें भी तो तेरे साथ हूॅं, साथ होने से का होता है? पर तूं कहना क्या चाहता है? यह तो बताओ, घुमा कर कान काहे पकड़ रह होे, सीधे पकड़ो।’ पत्रकार मेरे कहने के बाद अपने असली तेवर में आ गया..। जो उसका अपना था, गिरगिट की तरह रंग बदलने वाला। बोला... ‘आपको ऐसे भ्रष्ट डी.एम. को कार्यक्रम में नहीं बुलाना चाहिए।’ उसकी राय से मैं चौंक गया.. ‘इसे भी भ्रष्ट की पहचान हो गई है।’ ‘यानि कि भ्रष्ट लोगों के साथ पत्रकारों तथा साहित्यकारों को नहीं होना चाहिए, एक तरह से उनका बहिष्कार करना चाहिए। कुछ ऐसा ही कहना चाह रहे हो नऽ।’ मैने पत्रकार से पूछा..। ‘हां हां ऐसा ही।’ पत्रकार ने खुशियां ओढ़़ ली, जैसे उसने किसी बड़े रहस्य को खोलने में सफलता हासिल कर लिया हो। मुझे तो पहले का एक कार्यक्रम याद था जिसे पत्रकार ने अपने घर का कार्यक्रम बना लिया था। अपने मन और चाह से जो कर सकता था उसने वही किया किसी को घास तक नहीं डाला। पहला वांक्षित काम तो उसने यह किया कि उसने उन सारे लोगों को कार्यक्रम की समितियों से निकलवा दिया जिन्हें वह पसंद नहीं करता था। तब वह डी.एम. का दुलरुवा था। डी.एम. की सह पर स्थानीय प्रशासन ने उसे सोनभद्र का बड़ा ही नहीं अनिवार्य पत्रकार बनाया हुआ था जैसे उसके बिना सोनभद्र चल ही नहीं सकता। बाद में जाने क्या हुआ कि प्रशासन के लोगों की आंखें पत्रकार को देखते ही परपराने लगीं। डी.एम. साहब की आंखें तो उसे देख कर सूज ही गईं थीं.. कई दिन तक खुल ही नहीं रही थीं। जाने किस तरह से उन्होंने आंखों का इलाज किया। लोगों का कहना है कि योगाभ्यास से उन्हें लाभ मिला। किसी योगगुरू ने उन्हें योगाभ्यास की ट्रेनिंग दी। यौगिक क्रियाओं के अभ्यास से उन्हें कुछ ही दिन में परिवर्तन दिखा, सारा कुछ अप्रत्याशित जैसा था। उनकी आंखें पूरी तरह से खुलने लगीं तो उन्होंने सोनभद्र को देखा कि यहां क्या है? यहां के लोग कैसे हैं? और वे क्या चाहते हैं? उस योगाभ्यास ने उन्हें अर्न्तज्ञान उपलब्ध करा दिया था कि प्रशासनिक अधिकारी को धृतराष्ट्र की तरह संजय जैसों पर आश्रित नहीं होना चाहिए। वैसे भी आज के जमाने में कोई संजय हो ही नहीं सकता पर संभावना है कि लोग धृतराष्ट्र बन जायें। अधिकारी अगर धृतराष्ट्र बन गया, वह भी जिले स्तर का, फिर तो जिले को खतम होने से कोई नहीं बचा सकता। विचारों की भैंस लड़ाई नहीं थी, अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी था। डी.एम. के लिए तमाम ऐसे कार्य थे जिसे निपटा कर वे साबित कर सकते थे कि उनका पक्ष सोनभद्र की जनता है न कि कोई खास आदमी। ऐसी समझ बन जाने के बाद डी.एम. साहब ने पत्रकार को ठेंगा दिखा दिया और साफ कह दिया कि तुम किसी के नहीं हो सकते और तुम्हारी भलाई इस बात में है कि सिर्फ पत्रकारिता करो तथा अपने काम से काम रखो। पत्रकार को डी.एम. के दरबार से खारिज किया जाना सोनभद्र के लिए बड़ी खबर थी। यहां के लिए यह खबर दिल्ली की खबरों से कम नहीं थी। दिल्ली में भी तो ऐसा ही होता है, पर वहां पत्रकारों का स्वर्ग डी.एम. का कार्यालय नहीं, प्रधान मंत्री का कार्यालय होता है। उसकी गंध में डूबने के लिए अधिकांश पत्रकार आतुर रहते हैं। गंध भी अचरज भरी होती है, उस गंध में गरिमा, व महिमा की मादकता होती है। उसमें डूबते ही विदेश दिखने लगता है, पत्रकारों को पंख लग जाते हैं, वे हवा में प्रधानमंत्री के साथ उड़ने लगते हैं फिर तो जहां, जहां प्रधानमंत्री वहां वहां पत्रकार। वैसे भी हवा में उड़ना, तैरना, गरिमा की मादकता में लहराना किसे अच्छा नहीं लगता। एक बार जो इस मादकता में डूब गया फिर तो उसका नशा पत्रकार से उसे साहित्यकार बना देता है। चाहे उसका रिश्ता साहित्य से कभी रहा हो न रहा हो। प्रधानमंत्री के साथ एक दो बार की विदेश यात्रा सर्वगुण संपन्नता का लोकतांत्रिक प्रमाण है फिर विपन्नता उनके पास फटकती तक नहीं। वैसे भी विपन्नता क्षीण करने के तमाम साधन आज कल हर ओर फैले हुए हैं। विपन्नता दूर करने के साधन और तंत्र धीरे धीरे पत्रकार के करीब पहुंच जाते हैं फिर पता चलता है कि पत्रकार की एक किताब जो यात्रा संस्मरण के रूप में है, छप जाती है तथा पूरी दुनिया में तहलका मचा देती है। दिल्ली में निवास करने वाले प्रकाशकों की जमात एकाएक उस पत्रकार को पत्रकार से लेखक बना देती है। यह माना हुआ सच है कि प्रकाशक जिसे चाहें उसे रातों रात बड़ा ही नहीं अनिवार्य लेखक बना सकते हैं, उनके पास क्या नहीं है, प्रेस हैं, अखबार हैं, पत्र पत्रिकाएं हैं, अब क्या चाहिए किसी को बड़ा तथा अनिवार्य बनाने के लिए? साहित्य तथा लेखन से जुड़ी जनता तो वही पढ़ेगी तथा उसी के सहारे बढ़ेगी जो उसे पढ़ने के लिए मिलेगा, अलग से कुछ तो गढ़ेगी नहीं। उसे लगातार जो सामग्री मिलेगी उसे पढ़ कर अपना मन बना लेगी कि फलां पत्रकार जो केवल पत्रकार ही था बड़ा लेखक भी है। बेचारे आलोचक भी ऐसे आदमी के पीछे चलने के लिए विवश हैं, विवश क्यों नहीं हों वे आलोचना के लिए किसका चुनाव करें? वे भी तो चुनाव उसी का करेंगे नऽ जिसका कुछ प्रकाशित हो। प्रकाशित तो ऐसे लोगों के ही होते हैं जो राजधानियों के दुलरुवा होते हैं। किताब प्रकाशित हो जाने के बाद गरिमा का एक ही खेल बाकी रह जाता है और वह खेल सबसे भारी होता है किसी भी सभ्यता में। वह सभ्यता चाहे पूर्बी हो, पश्चिमी हो फर्क नहीं पड़ता। इस खेल में पदक मिल जाने के बाद सारे विश्वविद्यालय भी अपने बन्द मुहों को खोल देते हैं.. साहित्य की गरिमा के इस खेल ने सारी दुनिया को आत्मिक मनोरंजनों से ओतप्रोत कर दिया है। जिससे प्रभावित हो कर साहित्य की जनता ने भी अपने अपने सुखों को सुरक्षित रखना शुरू कर दिया है। साहित्य की गरिमा का आखिरी और अन्तिम खेल पूरी तरह लोकतांत्रिक होता है, जिसे दुनिया प्यार से सम्मान के नाम से जानती है या पुरस्कार के नाम से। दोनों का एक ही वजन होता है, समय और परिस्थिति के अनुसार इनका प्रयोग थोड़ा इन्हें अलग, अलग कर देता है। बहुत ही बारीक फर्क होता है, उतना ही जितना अश्लीलता तथा शीलता में होता है। मानों तो शील नहीं तो अश्लील। ऐसा फर्क नहीं, जो किसी दरार माफिक हो जिसमें कोई सभ्यता घुस जाये। ऐसे दरारों में सभ्यताएं घुसती भी नहीं, सभ्यतायें तो खुद अपनी दरारों में घुसा करती हैं। अचानक एक दिन ऐसे पत्रकार को सम्मान या पुरस्कार मिलने की घोषणा हो जाती है, सारे अखबारों में पत्रकार की फोटो चमक जाती है। फिर तो साहित्य की जनता एक नये साहित्य दूत का अभिनन्दन करने के लिए मुग्धता की गुफा से बाहर निकल पड़ती है। गरिमा हासिल करने वाली दिल्ली की साहित्यक सभ्यता सोनभद्र में भी जस के तस है। उसे यहां जस के तस अपना लिया गया है, अब माना जा रहा है कि इसमें स्थानीयता का पुट दे कर थोड़ा हेर, फेर किया जाना चाहिए। हेर, फेर किया भी जाता है। कुछ हेर, फेर के साथ सोनभद्र के साहित्य को बचाने व सम्मानित करने के योग व संयोग का बाकायदा अभियान चलाया गया जिसका नेतृत्व मनरेगा वाले पत्रकार ने किया। उस अभियान को यहां की साहित्यिक जनता ने अच्छा माना या बुरा इसका कुछ पता नहीं चला, सरकार के अन्य कामों की तरह जिसका पता नहीं चला करता। सोनभद्र के मनरेगा वाले पत्रकार के लिए डी.एम. साहब के आफिस का दरवाजा बन्द हो जाना कोई साधारण खबर नहीं थी, बहुत बड़ी खबर थी। सोनभद्र की शाकाहारी साहित्यिक जनता अचरज में पड़ गई..। हर ओर सवाल ही सवाल..। अरे यह क्या सुनने में आ रहा है, कल तक जो प्रशासन के लिए चमकता, दमकता सितारा था उसे यहां के आदिवासियों की तरह बहुत ही बेरहमी से विस्थापित कर दिया गया, आखिर क्यों? ‘इस क्यों’ का जबाब किसी के पास नहीं था। जबाब किसी के पास अपने आप तो चला नहीं आता फिर किसी का लेना, देना भी तो कुछ नहीं था जो पता लगाता और अपना समय पता लगाने में खर्च करता। सो जो हुआ, हुआ, माना गया ऐसा तो होता रहता है। पर जब मनरेगा वाले पत्रकार के बारे में खबर फैली कि पत्रकार के लिए प्रशासन के दरवाजे ही नहीं सारी खिड़कियां तक बन्द कर दी गई हैं तथा ऐलान कर दिया गया है कि कोई भी अधिकारी पत्रकार से रिश्ता नहीं रखे तब साहित्यिक जनता सुगबुगाते हुए कनफुसवा करने लगी। लिखने, पढ़ने वालों की ही नहीं दूसरे पत्रकारों के कान आपस में गुंथने लगे फिर भी कोई खबर के बारे में चर्चा नहीं करता था जाने क्या सच हो, सभी के मुंह तब भी सिले हुए थे। प्रशासन का मामला है, कभी भी प्रशासन अपनी दिव्यदृष्टि से जान सकता है कि उसका मजाक उड़ाया जा रहा है। मनरेगा वाला पत्रकार तो बहाना होगा, असल बात होगी प्रशासन का मजाक उड़ाना। सोनभद्र जैसे ठंडे दिल वाले जनपद में प्रशासन का मजाक उड़ाना यह प्रशासन की गरिमा के खिलाफ तथा विनम्रता भंजक होता। आज कल वैसे भी प्रशासन की विनम्रता तोड़ना अपराध है। सो किसी ने पत्रकार को प्रशासन के दरवाजों से खदेड़े जाने की ऐतिहासिक घटना को अपने सिर माथे पर नहीं उठाया। कोई सिर माथे पर उठाता भी नहीं, किसे पड़ी थी कि वह जान बूझ कर जेल जाये, सभी को पता था कि एक दूसरे पत्रकार पर भी प्रशासन की आंखे लाल हैं, उसे दो तीन दिन के भीतर ही जेल भेज कर उसकी मुहफट्टई बन्द की जा सकती है। प्रशासन ने कानूनी ही नहीं कागजी तैयारी भी कर लिया है, उसे केवल क्रियान्वित करना बाकी है। दो तीन दिन तो दूर की बात थी, उसे दूसरे दिन ही फौजदारी की कई दफाएं लगा कर जेल भेज दिया गया। प्रशासन ने बहुत ही कुटिलता से अपनी हनक दिखा दिया जो दूसरे लोगों को भयभीत करने के लिए पर्याप्त थी। तीसरे दिन प्रशासन ने एक और कानूनी खेल खेला, वह खेल गलत था या सही था यह कौन मालूम करे। लोग तो केवल खेल ही देख सकते हैं और लोगों ने देखा भी कि एक जमे जमाए पत्रकार की मान्यता रद्द करा दी गई है जो बीसों साल से पत्रकार होने की दबदबों का बेताज बादशाह था। वह जब अपनी कार पर बैठता था तथा कटी हुई मूंछो के भीतर मुस्कियाता था तब जान पड़ता था कि पत्रकारिता रूपी चौथे खंभे की धमक से सोनभद्र का प्रशासन ही नहीं यहां की पहाड़ियां भी हिल रही हैं। जंगल अपने बचे रहने की भीख मांग रहा है। रिहंद बांध का क्षेत्रफल सिकुड़ चुका है तथा सोन की चमक फीकी पड़ गई है। लगातार बीसों साल से जो पत्रकारिता की बादशाहत कर रहा था उसकी अपनी सधी तथा साधी हुई जनता थी। उसे प्रशासन का यह काम काफी बुरा तथा क्रोध भड़काने वाला लगा। जनता आगे आयी, उसने खुद शान्ति से अशान्ति की ओर चलने का फैसला लिया, जिसका अर्थ था प्रशासन का विरोध। पर पत्रकारिता के बादशाह को यह भला व समयानुकूल नहीं जान पड़ा। उसने अपनी जनता को विनम्रता से समझाया..। ‘सभी का तथा सभी काम का विरोध नहीं किया जाता। इतना मैं जानता हूॅं कि मैं पत्रकार हूॅं और मरते दम तक पत्रकार ही रहूॅंगा। प्रशासन मुझे पत्रकार माने या नहीं माने, कुछ फर्क नहीं पड़ता। विरोध तो वे करें जो बिना मान्यता पाये पत्रकार हो ही नहीं सकते, मुझे तो पूरा जनपद जानता है कि मैं क्या हूॅं, पत्रकार की मान्यता मेरे लिए बहुत छोटी तथा घिनघिन चीज है, सो आप लोग विरोध न करें, विरोध करना भी नहीं चाहिए।’ मेरी मजबूरी थी कि मैं मनरेगा वाले पत्रकार की सलाह को न मानूं, उसे मानने का कुछ औचित्य भी नहीं था, मैं जानता था कि किसी दिन भी यह खबर मिल सकती है कि मनरेगा वाले पत्रकार ने दुबारा से डी.एम. कार्यालय में अपनी जगह बना ली है, सो मैंने उससे साफ,साफ कह दिया... ‘देखो भाई यह कार्यक्रम मेरा नहीं है शशि का है, शशि का भी नहीं उसकी संस्था का है, और संस्था के लिए डी.एम. को बुलाना अनिवार्य है क्योंकि एड्स जागरूकता वाला कार्यक्रम सरकारी है। सरकार ही इस पर फन्ड दे रही है तथा डी.एम. को ही कार्यक्रम की सफलता तथा असफलता के बाबत रिपोर्ट देना है। ऐसी परिस्थिति में संभव नहीं है कि डी.एम. की उपेक्षा कर दी जाये, सो डी.एम. को तो निमंत्रण दिया ही जायेगा, यह अलग बात है कि वे आयें या न आयें। इस मामले में मैं कुछ नहीं कर सकता।’ मनरेगा वाला पत्रकार मेरे घर से उदास ही नहीं मुझ पर नाराज हो कर लौटा। बाद में मालूम हुआ कि वह मेरे बारे में गालियों जैसी समानधर्मी बातें करने लगा है..जिसका आशय मुझे बदनाम करने का था कि मैं एक पतित आदमी हूॅं और खुद को बेचकर अपना अस्तित्व बचाने का आदी भी। मैं प्रशासन को सलाम करने तथा अपने फायदों के लिए किसी के पैर पर गिरने में तनिक भी शर्म नहीं महसूसता, गोया मैं एक घिनघिन आदमी हूॅं जिसे आदमी कहा ही नहीं जाना चाहिए।’ गोष्ठी होने की तारीख के दो दिन पहले एक दूसरे पत्रकार ने जो मेरी किताबों का अच्छा पाठक था उसने खबर दी कि मनरेगा वाले पत्रकार को दुबारा से डी.एम. कार्यालय में जगह मिल गई है तथा उसने प्रशासन की सफाई वाला समाचार भी अपने अखबार में प्रकाशित कर दिया है। मनरेगा में किसी प्रकार की यहां धांधली की ही नहीं गई। इस बाबत उसने जांच समितियों के प्रमुखों के नामों का संदर्भ भी दिया है। खबर पक्की थी सो मैंने तय किया कि मनरेगा वाले पत्रकार को गोष्ठी में अवश्य बुलाना चाहिए। मैंने तत्काल उसका नंबर मिलाया.... उसका नंबर मिल गया, मैंने कहा.... तुम्हें गोष्ठी में आना है, तुम्हारा निमंत्रण पत्र मेरे पास पड़ा हुआ है, उसे भिजवा रहा हूॅं, साफ बताना कि तूं आ रहा है कि नहीं.... उसने कहा.... ‘आपके कार्यक्रम में मैं न आऊं यह कैसे संभव है, निश्चित रूप से आऊंगा।’ उसने जोड़ा मैं मनरेगा वाले पत्रकार से बात कर ही रहा था कि मेरी किताबों का पाठक पत्रकार जो मेरे साथ बैठा हुआ था, उसने टोका..। किससे बात कर रहे हैं? मनरेगा वाले पत्रकार से, उसे क्या निमंत्रण देना वह तो डी.एम. साहब के साथ आयेगा ही। जहां डी.एम. वहां मनरेगा वाला पत्रकार। वह पत्रकार ही नहीं प्रशासन की परछांई भी है और परछांई को क्या बुलाना, क्या नहीं बुलाना? एक थी लौंगी वही हुआ जिसका संदेह था, डी.एम. साहब गोष्ठी में नहीं आ सके, मालूम हुआ कि सरकार ने प्रदेश के सारे जिलाधिकारियों को लखनऊ तलब कर लिया है। सरकार ने अधिकारियों को क्यों तलब कर लिया है यह तो नहीं पता चल पाया, पर लगता है कि प्रदेश का नया चुनाव कुछ महीनों में ही होने वाला है। प्रदेश की सरकार नहीं चाहती कि नये चुनाव में उसका प्रदर्शन किसी भी तरह से खराब हो। सरकार चाहती है कि उसके लोकप्रिय कार्यक्रमों की जानकारी हर हाल में अधिकारी जनता तक पहुचायें तथा कार्यक्रमों का अनुपालन भी सुनिश्चित करायें। गोष्ठी की सफलता पर शशि ही नहीं उसकी संस्था का मंत्री भी मगन था पर मैं थोड़ा दुखी था हालांकि मेरे हिस्से में प्रसन्नता कम नहीं थी फिर भी..मेरा दुख लौंगी को ले कर था, लौंगी नहीं आयी थी। वह बीमार थी तथा बनारस अस्पताल में पड़ी थी, दुखी शशि भी कम नहीं थी पर वह कार्यक्रम क्रियान्वयन के दबावों में उलझी हुई थी, लौंगी के नहीं आने के कारण कार्यक्रम रोका नहीं जा सकता था। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद शशि का चेहरा बदल गया। वह लौंगी से मिलने तथा उसे देखने के लिए तुरंत बनारस जाना चाहती थी जो संभव नहीं था। बनारस चली जाती तो गोष्ठी के लिए मंगवाए गये सामानों को कौन भिजवाता, बकाया लेन, देन कौन करता फिर संस्था का मंत्री भी तो रापटगंज में ही जमा हुआ था उसे कार्यकर्ताओं की दूसरे दिन ही मीटिंग लेनी थी। शशि के लिए बनारस जा पाना दूसरे दिन ही संभव हो पाया। संस्था के मंत्री को दूसरे दिन दोपहर तक लखनऊ के लिए निकलना था। वह गोष्ठी की भव्यता तथा रम्यता से गदगद था। उसने अपने भाषण में ऐसा बोला भी था कि इस तरह के कार्यक्रम में उसे अब तक भाग लेने का अवसर नहीं मिला है। सोनभद्र के लोगों की सहभागिता देख कर वह अचंभित था। वैसे भी कार्यक्रम बहुत ही अच्छे से निपट गया पर मुझे कार्यक्रम में लौंगी का उपस्थित नहीं होना अखर रहा था। मैं बार बार शशि से जानना चाह रहा था.. ‘आखिर लौंगी क्यों नहीं आयी?’ वह तो बिना किसी गंभीर कारण के रुकती नहीं’ शशि को भी लौंगी के बारे में कुछ नहीं पता था। लौंगी के क्षेत्र की तरफ से जो कार्यकर्ता गोष्ठी में भाग लेने आये थे उन्हें भी लौंगी के बारे में कुछ नहीं मालूम था। उन्हें केवल इतना ही पता था कि लौंगी कार्यक्रम में भाग लेने के लिए अवश्य आयेगी इससे अधिक कुछ भी नहीं.. कार्यक्रम प्रारंभ होने के कुछ पहले लौगी के गांव के एक आदमी ने बताया कि लौगी बीमार
है और बनारस अस्पताल में भर्ती है, तब मालूम हुआ कि लौगी कार्यक्रम में भाग लेने क्यों नहीं आयी?
लौगी की बीमारी अप्रत्याशित नहीं थी। उसे तो बीमार होना ही था। समय जितना आगे सरक रहा था, सरक रहा था। उसे एक दिन रुक जाना था। शशि तथा मुझे भी मालूम था कि लौंगी का समय उससे दूर बहुत दूर खड़ा है। कुछ ही समय बाद जो दिन में भी कैद हो सकता है महीने तथा वर्ष में भी, वह समय से बहुत दूर हो जायेगी किसी कल्पना की तरह। कल्पना में लौंगी का समय लाैंगी के लिए नहीं होगा और न ही लौंगी समय के लिए होगी। वहां केवल हताश करने वाली कहानी होगी जिसकी शुरुवात होगी....
‘एक थी लौगी’
पर लौंगी कम से कम मेरे लिए तो ‘एक थी लौंगी’ नहीं थी, वह इससे अधिक थी, वह होने नहीं होने की व्याख्या थी तथा वह सुकुमार अभिव्यक्ति भी जो शब्दों को मरने नहीं देते। संभव है उसकी बीमारी उसे छीन ले और वह हमलोगों की स्मृतियों में शामिल हो जाये। संभव है ऐसा ही हो, पर हमारी कल्पनाओं में वह जीवित रहेगी, मरेगी नहीं। उन शब्दों की तरह जिनसे हम जीने की ऊर्जा हासिल करते हैं।
मैं कल ही शशि के साथ लौंगी के पास जा पाऊंगा, ऐसा ही होने वाला है अगर मैं तुरंत जाना चाहूॅं तो शशि रोक देगी ‘का फर्क पड़ता है आज और कल में’ ऐसा ही बोलेगी। उसे ऐसा बोलना भी चाहिए पर मैं कसमसा रहा था कि सभी के लिए तथा सभी समय में कल नहीं होता वहां केवल आज होता है, आज ही नहीं केवल अब होता है, लौंगी कल नहीं है, वह आज और अब है। कल तक जाने का हो? उसका कल उससे छिन चुका है, वह वर्तमान की धरोहर है, उसका कल स्मृति बनने वाला है, याद करने लायक चीजों की तरह। पर मैं शशि से का बोलंू....?
कैसे बोलूं कि मुझे आज ही जाने दो, तूं कल आ जाना। नहीं बोल पाऊंगा। मैं जानता हूॅं कि लौंगी, शशि की भावुकता की उत्पाद है पर अब यथार्थ बन चुकी है। वह जब उसकी भावुकता थी तब थी, आज नहीं है।
बहरहाल मुझे कल तक के लिए रुकना ही था। कल आने में देरी भी कितनी थी? कुछ घंटों की उससे अधिक नहीं.. शशि ने गोष्ठी से जुड़ी हुई जिम्मेवारियों को जैसे तैसे निपटाया और सात, आठ बजे रात तक खाली हो गई। सारे सामान भेजे जा चुके थे, लोगों के लेन देन निपट गये थे। देर रात तक शशि मेरे पास आयी, उसे मैंने पहले ही बोल दिया था कि रात का खाना तुझे मेरे साथ खाना है, आवास पर जा कर खाना पकाना नहीं..
शशि मेरे आवास पर गोष्ठी में बची हुई मिठाइयों के साथ आयी, उसे याद था कि बाबू उसे छेड़ेगा। बाबू यानि मेरे लड़के का लड़का। वह कुछ मामलों में बहुत ही शरारती है, खास तौर से खाने पीने की चीजों के मामलों में, लेकिन सभी के साथ उसका समान व्यवहार नहीं है, सभी को नहीं छेड़ता, वह समतावादी नहीं है, वह अपने चुनाव को प्राथमिकता देता है तथा उन्हीं लोगों से शरारत करता है, जिन्हें वह जानता ,पहचानता है, उसकी शरारतें जिन्हें प्यारी लगती हैं, शशि उन्हीं लोगों में से है।
कुछ देर बीत जाने के बाद शशि ने बाबू के बारे में पूछा..।
‘बाबू नहीं दिख रहा?’
‘वह सो गया है’
‘फिर मिठाइयां किसे दूं?’
‘मुझे दे दो’
बुढ्ढे तथा बच्चे में फर्क नहीं होता, मुझे चाहो तो बाबू मान सकती हो।
‘बाबू आप नहीं हो सकते। बाबू, बाबू है, वह जीवित वर्तमान का सफल उपयोगकर्ता है, और आप! खैर जाने दीजिए’
‘आखिर क्यों? क्या मैं वर्तमान का उपयोग करना नहीं जानता?’ मैंने पूछा
‘हां, हां आप जानते हैं, पर भूत की पूंछ पकड़े रहते हैं जिससे कि भविष्य के महासागर में डूब न जायें। और श्रीमान! आपका वर्तमान तो वहीं पड़ा मुस्कराता रहता है, वह भी दूसरे पर नहीं, आप पर ही। आप हैं कि वर्तमान का मुस्कराना भी नहीं महसूस कर पाते। अगर आप वर्तमान का मुस्कराना पकड़ लेते नऽ, तो बात दूसरी होती, फिर तो मुझे कुछ कहना ही नहीं पड़ता।’
मेरी समझ में कुछ भी नहीं आया कि शशि का बोल रही? वह किस वर्तमान के मुस्कराने के बारे में बोल रही? मैं नहीं जानता कि वर्तमान मुस्कराता भी है, मुझे तो हर ओर रोता तथा सिसकता हुआ ही दिख रहा है। किसी दूसरे का क्यों? शशि का वर्तमान का कर रहा है? अकेले वर्तमान कर भी क्या सकता है? वर्तमान जैसी विकलांगता तो कुछ हो ही नहीं सकती। शशि अपने वर्तमान की विकलांगता आखिर क्यों नहीं देख रही? या देख रही हो तो उसे छिपा रही कि दूसरे न देख लंे.. इच्छा हुई कि शशि से पूंछू....
‘तूं सामान्य नहीं रह सकती क्या? यह क्या है कि बात बात में दर्शन की बातें, इन बातों से तूं क्या प्रदर्शित करना चाह रही? यह जो व्यतीत तथा प्रतीत का चक्कर है नऽ, यह तेरे मन को न तो शीतल कर सकता है और न ही ऊर्जस्वित, क्योंकि भावुकता में अगर, मगर होता ही नहीं.. व्यतीत तथा प्रतीत दोनों सहारा के रेगिस्तान की तरह होते हैं, जहां अनाज का एक दाना भी नहीं उग सकता। इन सब को छोड़ो, आगे बढ़ो, इसी बढ़ाव से खुद को गढ़ो, जितना गढ़ सको, हो सके तो गढ़े हुए को भी दुबारा तिबारा गढ़ो। यह जो समय है नऽ, इसे खाली तथा उन्मुक्त कभी न छोड़ो, इसे आवारा नहीं बनने दो, इससे लड़ो, लड़, लड़ कर इसे कमजोर बनाने की कोशिश करो ताकि तुझे देखते ही तेरा समय तुझे सलाम करे तथा अदब से तेरे सामने नतमस्तक रह,े फिर देखो..। आगे क्या होता है?’
‘आगे न तो व्यतीत दिखेगा नहीं प्रतीत, कुछ दिखेगा ही नहीं, दिखेगी केवल कोशिश, जिस पर चाहो तो मुस्कराओ या रोओ, समय को कमजोर बनाने की तुम्हारी कोशिश ही तुम्हें साहसी बनाएगी, और यही साहस तेरी दौलत है। तो क्या मैं बाबू से कम हूॅं जो तूं मेरी उपेक्षा कर रही?’
शशि कुछ नहीं बोली। उसे बोलना भी नहीं था, वह चिन्तित थी। लौगी को ले कर परेशान थी। खाना खाने के बाद शशि अपने आवास पर चली गई। यह निश्चित हो गया था कि सुबह सात बजे वाली बस से हम दोनों बनारस जा रहे हैं।
बनारस के लिए हम दोनों सुबह सात बजे निकल लिए। सरकारी बस में भीड़ भाड़ नहीं थी, सीट मिल गई। प्राइवेट बस से जाना खुद को बोरे की तरह बना कर एक दूसरे के नीचे दब जाना होता है। भीड़ पर भीड चंपी होती है जो एक दूसरे को दबाती रहती है, जबकि आराम किसी को नहीं मिलता। सभी कसमसाते रहते हैं..। आवागमन के हृदय बिदारक दृश्यों की खोज के लिए प्राइवेट बसों से यात्रा करने का सुझाव खोजी व्यक्ति को दिया जाना गलत नहीं होगा फिर वह साफ अन्तर निकाल सकेगा कि पदयात्राओं तथा आधुनिक यात्राओं में कितना फर्क है?
करीब दस बजे तक हमलोग बनारस पहुंच गये। लौंगी बी.एच.यू. अस्पताल में भर्ती थी। वहां तक पहुंचना आसान था और हमलोग पैदल ही चल दिए वैसे भी रिक्से की जरूरत नहीं थी। लौंगी वार्ड के कोने में थी। वार्ड की नर्स ने लौंगी कहां है? इसके बारे में हमें सही सही बताया था। लौंगी बिस्तरे पर दुबकी पड़ी थी, उसके पास एक पुरुष भी था जो देखने में पढ़ा लिखा जान पड़ता था। वह लौंगी के लिए बाहर से चाय ले कर आया था और उसे पिलाने के लिए प्रबंध में जुटा था। लौंगी थी कि चाय पीना नहीं चाह रही थी। बोल रही थी कि उसे चाय नहीं पीना।
लौंगी के पास जो पुरुष था, वह कौन था? हम दोनों को नहीं मालूम। लेकिन देखने में लगता था कि लौंगी का कोई आत्मीय ही होगा, जो कहीं गहरे तक लौंगी से जुड़ा होगा। वह जुड़ाव कैसा था, कितना था, यह तो बाद में पता चलता फिलहाल वहां केवल अनुमान था। हमलोगों के अनुमान से वह पुरुष एक भला और नेक आदमी लग रहा था।
लौंगी के साथ वाले पुरुष का नाम हमें नहीं मालूम था। वह भी हम दोनों को नहीं पहचानता था। लौंगी ने हम दोनों को देखा और खुद को संभालने लगी, दर असल वह अस्तव्यस्त थी। उसकी साड़ी भी इधर उधर सरक गई थी, अपनी जगह पर नहीं थी। उसने उसे ठीक किया और बैठ गई....
‘अरे लेटी रहो, बैठने में तकलीफ होगी’ मैंने लौंगी से कहा
‘नहीं, नहीं, ठीक है, कल रात से ही मुझे बहुत आराम है।’
लौंगी देखने में भी ठीक ही लग रही थी पर लग रहा था कि वह बीमार है, उसकी आंखों की चमक तथा चेहरे की दमक छिन चुकी थी। वह काफी ढीली हो चुकी थी जैसे कई दिनों से बीमार हो तथा अपने शरीर से लड़
रही हो। वस्तुतः वह लड़ भी रही थी, उसे पता था कि वह एक ऐसे रोग की जकड़ में है जो उसे उसके अवसान तक ले जायेगा। ऐसा तो हमें भी पता था। लौगी की बीमारी की खबर सुन कर हम निराश हो चुके थे कि शायद अब हम लौंगी का खिलखिलाना न सुन सकें।.. अमूमन लोग एड्स के रोग से नहीं बच पाते, पर इतना जल्दी भी नहीं।
लौंगी के साथ वाला पुरुष हम दोनों को लौंगी के पास छोड़ कर कहीं निकल गया। हम लोग लौंगी से बातें करते रहे। लौंगी अच्छी तरह से बोल रही थी हालांकि उसके बोलने में बीमारी का भारीपन था, उसकी बोल कांप कांप, जाती थी। शशि ने कुछ देर बाद लौंगी से पूछा....
‘ऐसा कब हो गया, कोई खबर तक नहीं दिया तंूने’
‘खबर कैसे देती बहन जी! खबर देने का टाइम ही कहां था हमरे पास, हम तो साहब के साथै थे, साहब भी अचानक आ गये थे हमरे से मिलने। आ ही जाते हैं, जाने का है कि साहब हमैं छोड़ ही नाहीं रहे हैं। अब आप से का बतायें हम लोग साथै सोए थे अउर....। अचानक हमारी होश ही खतम हो गई फिर हमैं का मालूम कि का हुआ? का नहीं हुआ, जब मालूम हुआ तब हम अस्पताल में थे। दो दिन बाद हमैं जान पड़ा कि हम अस्पताल में हैं, अउर साहब हमरे साथे हैं.. ई सब साहब ने ही बाद में हमैं बताया।’
‘साहब की कार साथ में थी, साहब ने फटाका हमैं कार में लादा अउर बनारस ले आये। यहां आने पर साहब ने अपनी छुट्टी बढ़ाई। अइया बपई भी साथ आ रहे थे, पर साहब ने उन्हें रोक दिया का होगा, वहां जा कर। साहब को हमरे रोग के बारे में मालूम है। बार बार हम ओन्हैं समझाते भी हैं कि साहब हमैं छोड़ो, रोगिहा मेहरारू के साथ आपका रहना, सोना ठीक नाहीं है, आपउ को रोगवा हो जायेगा। आप कउनो अउर रहता खोज लो, पर साहब हैं कि मानते ही नाहीं, हमैं लगता है बहिन जी नऽ कि साहब पगला गये हैं या कउनो पुरुब जनम का खेल हो, हमैं का मालूम।’
लौगी बातें कर ही रही थी कि उसका साहब आ गया, उसके हाथ में केटली थी तथा एक पैकेट भी। उसने प्लास्टिक की गिलासें हमें थमाया और उसमें चाय दिया तथा समोसे भी।
‘इसकी जरूरत नहीं थी हम लोगों ने नाश्ता कर लिया है’ शशि ने कहा
‘फिर भी इतना चल जायेगा, यही सब तो बचा रहेगा हम लोगों के बीच, नहीं तो क्या बचेगा।’ लौंगी ने नाश्ता करने के दौरान ही अपने साहब का परिचय कराया हम दोनों से।
लौंगी का साहब खिलखिलाया.... ‘मुझे मालूम है। आप लोग जब लौंगी के पास यहां आये तभी मैं समझ गया था कि आप लोग कौन हैं.. लौंगी बात बात में आपका तथा शशि जी का नाम लेती रहती है। हम लोग जब मिलते है तब बातेें ही बातें होती हैं, उन्हीं बातों के सहारे खाना, पीना तथा सोना होता है। बातें नहीं हों तो भूख, प्यास सारा कुछ गायब समझिए। जाने क्या है कि मैं लौंगी की बातों में मैं खोकर खुद को भूल जाता हूॅं कि मैं भी हूॅं, खैर छोड़िए आप लोग कब चले रापटगंज से?’
‘हां लौंगी बार बार बोल रही थी कि कल आप लोगों की कोई मीटिंग होने वाली थी, का हुआ? कैसी हुई मीटिंग?’
लौंगी ने मीटिंग का प्रसंग आते ही, अपने साहब के सवाल को छीन लिया....
‘हां बहिन जी, बताइए नऽ कैसी हुई मीटिंग? आप बोल रही थीं कि कलक्टर साहब को भी मीटिंग में आना था। मेरी तरफ इशारा करते हुए लौंगी ने मुझे टोका..।
‘आप तो कुछ बोल ही नहीं रहे हैं, बताइए नऽ मीटिंग के बारे में’
शशि ने मीटिंग के बारे में बताया कि सारा कुछ बहुत ही बढ़िया से निकल गया, तेरी कमी खल रही थी, तूं होती तो एड्स के फैलाव के बारे में बताती, वहां इस रोग के बारे में बताने वाला कोई भुक्तभोगी नहीं था। हां कलक्टर साहब नहीं आये, उन्हांेने दुद्धी के एस.डी.एम. को भेजा था। तेरा मीटिंग में न होना अखर गया, तूं होती तो बहुत अच्छा होता।
‘हम तो यहां बेड पर पड़े पड़े घबरा रही थी कि बहिन जी हमरे बारे में जाने का गुन रही हों, गुन रही होंगी कि बोल कर भी नहीं आयी’
वार्ड से खबर आयी कि सभी मुलाकाती वार्ड से बाहर निकल जांयें, डाक्टर आ रहे हैं।
हम सभी लौंगी वाले साहब के साथ वार्ड से बाहर निकल आये। बाहर एक चौड़ा गलियारा था, जिसपर मरीजों के मुलाकातियों ने कब्जा जमा लिया था। वह एक सुरक्षित जगह थी, वहां रोग तथा रोगी के बारे में ढेर सारी बातें की जा सकती थीं, एड्स के बारे में गलियारे में भी बातें जारी थीं....
‘एक पल का दैहिक सुख कितने बड़े दुख में बदल जाता है, जो बूझ ले उसे यहां न आना पड़े।’
गलियारे में जमे लोग इसी मुद्दे पर बतिया रहे थे। सभी के चेहरे पर एड्स की भयावहता नाच रही थी। लौंगी का साहब गभीर आदमी था, उसने हमें बताया..
‘फिलहाल तो लौंगी खतरे से बाहर है पर आगे कुछ नहीं कहा जा सकता। वैसे डाक्टर बोल रहा है कि जिस तरह से लौंगी दवाइयों का सेवन करते हुए सावधानियां बरत रही है अगर आगे भी बरतती रही तो खतरे की बात नहीं है। यह लगातार ध्यान रखना है कि लौंगी की दवाइयां बन्द नहीं हों, खून की बराबर जांच होती रहे, अस्पताल ही अब इसके लिए मन्दिर है।
लौगी के साहब की बातें सुन कर मुझे खुशी हुई और उस दर्द से मुक्ति भी। ‘एक थी लौंगी’ की भयावहता से मुझे गुजरना नहीं होगा। लौंगी मरेगी नहीं, जिन्दा रहेगी उसे बी.डी.ओ. का सहारा मिल गया है।
क्यों बे लेखक! मेरे लिए ‘एक थी लौंगी’ की अनुभूति कंपा, कंपा देने वाली थी। मैंने महसूस किया है कि किसी को खो देना तथा खोए हुए को भुला देना मेरे वश का नहीं, वह भी लौंगी जैसी अक्खड़ लड़की को। अस्पताल में लौंगी की हालत अच्छी देख कर मुझे खुशी हुई कि चलो बेचारी बच गई। उसके साथ बी.डी.ओ. को देखना मेरे लिए थोड़ी हैरानी की बात थी। यह साहबनुमा आदमी लौंगी के प्रति समर्पित क्यों है? क्या है इन दोनों में? डाक्टर की विजिट कुछ मिनटों के लिए थी। वह वार्ड में घुसा और सभी मरीजों से मिल कर निकल गया। जब वह वार्ड से बाहर निकलने वाला था तभी मैंने उसे रोका, रोका क्या उसके आगे खड़ा हो गया। डाक्टर को शायद उसके सामने मेरा खड़ा होना अच्छा नहीं लगा, जाने कौन है कि रास्ता रोक लिया? बहरहाल उसने मुझसे कुछ कहा नहीं, सिवाय गुर्राहट के.... ‘क्या है?’ ‘जी मैं लौंगी के बारे में जानना चाह रहा हूॅं’ मैंने अति विनम्रता से पूछा, इससे अधिक विनम्र मैं हो भी नहीं सकता था, वह विनम्रता की अधिकतम सीमा थी। ‘कौन लौंगी?’ डाक्टर ने पूछा बेड नंबर तेरह वाली’ मैंने उसे बताया वही जो चार दिन पहले भर्ती हुई थी, बेहोशी की हालत में’ डाक्टर बोला ‘हां, हां सर वही’ ‘वह तो अब ठीक है, दो तीन दिन में उसे डिस्चार्ज कर देंगे’ डाक्टर ने बताया साथ ही साथ एक अजीब सा सवाल भी पूछा.... सवाल उसका अजीब भले ही न रहा हो पर मुझे अजीब जान पड़ा। ‘आप कौन हैं उसके? एक आदमी तो और हैं उसके साथ। हां सर, बी.डी.ओ. साहब हैं, उसके साथ, वही उसे भर्ती कराने लाए थे। मैं तो आज ही आया हूॅं सिर्फ उसे देखने तथा हाल अहवाल लेने। ‘अच्छा तो हाल अहवाल लेने आये हैं आप! अच्छी बात है, पर आप हैं कौन उसके? कोई रिश्तेदार वगैरह....।’ डाक्टर ने पूछा पता नहीं क्यों डाक्टर यह सब पूछ रहा था, उसे यह सब पूछने की जरूरत क्या थी, वह मरीज देखे और निकल ले, अब यह क्या है कि पूछता फिरे, कौन आया, कौन नहीं आया? यह डाक्टर का काम नहीं.. मुझे डाक्टर का रोगियों का हाल अहवाल लेने आने वालों के बारे में पूछना उचित नहीं जान पड़ा, मैंने भी उसे वैसा ही जबाब दिया..। ‘जी मैं उसका बाप हूॅं’......मैंने डाक्टर को बताया फिर डाक्टर मुझे घूरने लगा। उसकी आंखें मुझे देख कर सहम गई.. यह कैसे संभव है? लौंगी तो अदिवासी है, मोटे होंठ तथा गोल व चपटी नाक वाली, मेरी शक्ल, सूरत उससे भिन्न, प्रजातियों का विलीनीकरण डाक्टर को क्या पता? ‘नहीं, नहीं, आप उसके बाप नहीं हो सकते।’ पर डाक्टर ने दुबारा कुछ नहीं पूछा। पूछने के बजाय उसने कुछ अतिरिक्त संवेदना से समझाया.. ‘लौंगी का ध्यान रखिएगा, इस समय उसे अतिरिक्त प्यार व मुहब्बत की जरूरत है। ऐसे रोगियों के साथ अलगाव ठीक नहीं। लोग छुआछूत का रोग समझ कर रोगी को अलग कर देते हैं। दवाइयां तो चलेंगी ही। मैंने आपसे इसी लिए पूछा था कि आप लौंगी के कौन हैं? मुझे तो इसकी जरूरत नहीं.. पर ऐसे मरीजों के लाभ के लिए जरूरत होती है। फिर मुझे शक भी था....’ ‘शक यह कि ऐसे मरीजों का कोई अपना नहीं होता। जो अपना होता भी है नऽ, वह भी नहीं बताता कि वह अपना है। लोग बोल देते हैं कि मैं नहीं जानता। आप तो जानते हैं, लौंगी के रोग के बारे में कि वह देह धरे का अभिशाप झेल रही है। इस तरह के अभिशाप समाज में जन्मते हैं पर समाज उसे नहीं मानता कि उसने जन्माया है। बहरहाल लौंगी अब ठीक है, परमात्मा चाहेगा तो उसे कुछ नहीं होगा। आप लोगों को उसके साथ देख कर मेरा भरोसा बढ़ा है।’ डाक्टर की बातें अनायास नहीं थीं। मैं वार्ड में था और एड्स के मरीजों को छटपटाता हुआ देख रहा था। वहां उनकी देख, भाल के लिए नर्सों.. के अलावा उनके अपने नहीं थे। केवल दो तीन मरीज ही ऐसे थे जिनके पास अपने लोग थे जिनके चेहरों पर एड्स की भयावहता नाच रही थी। बाकी तो बेचारे भाग्य भरोसे थे। उन्हें कोई पूछने वाला तक नहीं था। डाक्टर मुझसे बतिया कर चला गया। मेरे साथ बी.डी.ओ. और शशि थे। बी.डी.ओ. मेरी ओर था, वह जानता था कि मैं लौंगी का बाप नहीं हूॅं, वह लौंगी की अइया बपई से मिल चुका है फिर मैंने क्यों कहा कि मैं लौंगी का बाप हूॅं, वह इसमें उलझा हुआ था। ‘आपने तो गजब बताया डाक्टर को’..। बी.डी.ओ. ने सीधा सवाल किया और क्या बताता यार? उसके बाप की उमर का नहीं हूॅं क्या? मेरी बड़ी बेटी लौंगी की उमर की होगी। बाप बताने से सारे शक सुबहे खतम हो जाते हैं फिर कोई शक नहीं करता, इसी लिए। यह एड्स के रोगियों का वार्ड है, यहां रोगी ही नहीं आते, उनकी दैहिक विडंबनाओं की कहानियां भी आती हैं.. कहानियां भी किसिम किसिम की, जो रोगियों की देह पर उछलती, कूदती रहती हैं, लड़कियों के मामलों में तो खास तौर से कहानियों को उछलना पड़ता है। इस वार्ड में रोग नहीं, रोगी की देह ज्यादा देखी जाती है, वह भी अनुमानों के सहारे कि ऐसे हुआ होगा एड्स। रोगी ने देह को बाजार में फेंक दिया होगा, सर सामान खरीदने के लिए और देह के दूकानदारों ने एड्स को खूबसूरत पैकैट में बन्द कर रोगी को थमा दिया होगा। उछलती, मटकती, कूदती, फलांगती देह को क्या पता कि उसे क्या मिल रहा है? जब पता चलता है तब देह, देह ही नहीं होती, वह महज रोग से जकड़ी लाश होती है और लाश होने का मतलब किसे नहीं मालूम? डाक्टर के जाने के बाद हम लोग लौंगी के पास पहुंच गये। लौंगी लेटी हुई थी, उसकी आंखें खुली थीं.. डाक्टर ने दवाइयां नहीं बदली थीं, नर्स से बोला था कि पिछली दवाइयां ही चलेंगी। लौंगी ने देखा था कि हम लोग डाक्टर से बतिया रहे थे, सो उसने पूछा..। ‘डाक्टर साहब का बोल रहे थे, कुछ कह रहे थे का?’ लौंगी ने संशयात्मक सवाल पूछा.. ‘हां डाक्टर बोल रहे थे कि दो तीन दिन में तुम्हें छोड़ देंगे’ ‘यानि मैं ठीक हो जाऊंगी!’ हां और नहीं तो क्या? शशि ने बात आगे बढ़ाई ‘तुम ठीक ही नहीं, पूरी तरह ठीक हो जाओगी और पहले की तरह ही चहकोगी, जैसे चहका करती थी।’ ‘हम कहां कभी चहक आ महक पाये बहिन जी! आप का बोल रही हैं.. लोगों को लगता है कि लौंगी चहकती है पर लौंगी हमेशा दरकती रही है। जैसे मकान दरकता है बहिन जी, बरसात का पानी पड़ते ही भहरा जाता है। देखिए हम भी तो भहरा गये, अगर साहब नहीं होते तब जाने का होता.. साहब को जाने का देखाता है खंडहर में, हमार देह तो खंडहरै हो गई है नऽ, एम्मे तो खाली सांप बिच्छी ही रह सकते हैं, बाकी साहब को का कहैं...आप लोग इन्हें समझाइये, बुझाइये नऽ, मै तो साहब से बार बार बोलती हूॅं, पर साहब हैं कि ओनके हमरे में सरग देखाता है, एकौ महीना नाहीं होता कि धमक पड़ते हैं’ लौंगी बोल, बोल कर हवा में लहरा गई, जैसे वह पहले लहराया करती थी, लहर तो उसके भीतर आज भी है पर गहरी निराशाओं के साथ। उसे मौका ही कहां था कि वह प्रकृति के नियमों के तहत चल पाती, उसे तो ठेला गया था, उसे जवान बनाया गया था, वह मन से जवान कहां थी? जब उसने महसूसा कि वह जवान है तथा जवानी उसे चूम रही है तब वह देह का खिलौना बन चुकी थी, जो बिकता है बाजार में, लोग उसे खिलौना समझ कर खरीदने भी लगे थे। साहब से मिलने के बाद वह महसूसने लगी है कि वह खिलौना नहीं, उसमें भी जीता और हसता हुआ जीवन है, जो फुदक सकता है, लहरा सकता है, उड़ सकता है तथा मन हरियाने पर नाच, गा सकता है। लौगी लोगों के साथ होती थी, लोग भी उसके साथ होते थे, वह उनके साथ सोती थी, उसकी देह पर किसिम किसिम के दैहिक उत्सव आयोजित होते थे पर उसे कुछ भी पता नहीं होता था कि हो क्या रहा है? लोगों के साथ होते ही वह सौ, पचास की नोट बन जाती थी। उसे जान पड़ता कि वह सिर्फ नोट है, जो बाजार में भंजता है, वह भी तो भंज ही रही है। पर भंज कहां रही है, नोट के बदले तो कुछ मिलता है, कुछ खरीदा जाता है, पर वह किसे खरीद सकती है, देह के बदले कुछ नहीं मिलता। छिः इतनी चोट बदले में सिर्फ सिर्फ नोट। वह सिसक जाती है, कांपने लगती है। उसे समझ में नहीं आता कि वह इस सोच से बाहर कैसे निकले? उसे जहां जहां जाना पड़ता है, जाती है, लौटते समय रोती हुई घर आती है और अइया को नोट थमा देती है, जो उसे मिला होता है देह बेचने पर। अइया तो अइया, चीख पड़ती है.... ‘आजु का ऐतनै, खाली सौ ठे रुपल्ली, तूं एहर ओहर खरचती है का रे! तूं संझै से गई है काम पर, रात अउर सांझ भर का ऐतनै मिला’ लौंगी सहम जाती है, वह गंहकी कहां से पकड़े, निकल भी गये तो केतने के साथ सूतेगी? खाली सूतना ही नाहीं है नऽ, सूतने के लिए वहां मौका ही कहां है, लोग तनतनाए होते हैं, टूट पड़ते हैं देह पर, देह का एक एक हिस्सा निपोर देते हैं, रुपया खरचने का हिसाब वसूलना होता है फिर वे का बूझेंगे कि देह, देह होती है, कोई परती खेत नाहीं कि गहरे से जोत लिया, झर, झंखाड़ उखाड़ दिया। अब अइया को कउन बताए कि अइया ई सब अब हमरे से नाहीं होगा। कई बार उसने अइया से कहा भी कि वह मजूरी कर लेगी पर देह नाहीं बेचेगी, पर अइया कहां मानने वाली थी? मारने पीटने लगती है, खुद मनचलों को बुलाती है, उनके सामने परोस देती है। वह असहाय की तरह छटपटाती रह जाती है। अगर उसे मन का सुख मिलता तो तन को खुला छोड़ देती, पर उसके मन की बात कौन जाने? सभी तन देखते हैं, मन तो किसी को देखाता ही नाहीं, देखायेगा भी नाहीं, मन का आकार, परकार ही नहीं होता। जिस तन का वह जतन करती रही है, वह ओकर नाहीं है। जिस किसी ने उसके तन पर नोट चिपका दिया उसने तन को उसके हवाले कर दिया, वह जो चाहे, जैसा चाहे करे, सजाये संवारे, बनाये या अपनी तरह से गढ़े। लौंगी को तो पता भी नहीं चलता कि यह जो मन है, है क्या चीज? साहब से अगर नहीं मिली होती तो उसे कुछ पता ही नहीं चलता। मन के बारे में कि मन का गढ़न तो तन से खूबसूरत है। वो तो साहब हैं कि बात बात पर गुदगुदाते रहते हैं, वह किसी लतर की तरह साहब को कस लेती है और....फिर तो उसे एक अलग तरह की दुनिया देखाने लगती है, चांद तारों वाली, जहां पता ही नहीं होता कि तन और मन दोनों अलग अलग हैं.. मन के उछलने के साथ वह उछलने लगती है। लौंगी शशि से बतिया रही थी और मैं लौंगी को देख रहा था। लौंगी वही लौंगी है, जिससे मैं मिल चुका हूॅं और इस समय भी मैं उसके साथ हूॅ.. नारी मुक्ति का मामला सिर्फ पढ़ी, बढ़ी और खुद को गढ़ लेने वाली नारियों के साथ ही नहीं है, लौंगी के साथ भी है। लौंगी तन की आजादी को अगर आजादी मानती होती तो ऐसा काहे बोलती, काहे कुढ़ती, वह तो खुशियां पीती कि उसने जैसे चाहा वैसे अपनी देह को नचाया, गवाया, देह पर देहोत्सव की किसिम किसिम की कहानियां लिखीं, वैज्ञानिकों की तरह तन के एक एक हिस्से को परीक्षित किया। तन मुक्ति को अस्मिता का सवाल बनाने वाली नारियों की तरह वह भी खुश खुश होती तथा अपनी पीठ पर दैहिक क्रान्ति के नारों के गोदने गोदवाती। मैंने लौंगी को समझाने की कोशिश की.... ‘लौगी! तूं तो बहादुर लड़की है, फिर काहे निराश व हताश हो रही है। जो होना होता है वह होता ही है। उसे होने से रोका भी नहीं जा सकता। तूं जानती थी क्या? कि तेरे साथ तेरे साहब जैसा भी कोई होगा।’ बी.डी.ओ. की तरफ इशारा करते हुए मैने लौंगी से कहा.... ‘बी.डी.ओ. साहब जब तेरे साथ हैं फिर काहे की चिन्ता कर रही है, डाक्टर भी बोल रहा है कि तुम्हें कुछ नहीं होगा, तुम स्वस्थ हो, पहले की तरह, लगातार दवाइयां खाते रहना है। दवाइयां नहीं छोड़नी है..’ बी.डी.ओ. बीच में बोल पड़ा.. ‘यही तो मैं भी इससे कहता हूॅं साहब! पर मानती नहीं.. हमेशा कुढ़ती रहती है। कुढ़ने से क्या मिलने वाला है, आराम से रहो और हसते हुए समय से लड़ो। मैं जानता हूॅं जब आदमी अपने भीतर उतर कर भला बुरा तलाशने लगता है फिर बाहर कुछ भी नहीं दिखता, वैसे भी बाहर अन्धेरा ही अन्धेरा है, उजाला तो उसे ही दिखेगा जो खुली ऑखों से खुद को देखना चाहेगा। यही जीवन है और जीवन का आधार भी कि ऑखें खुली रखो। आदमी की ऑखें जिस दिन खुल जायें, समझ लो सूरज का जन्म उसी दिन हुआ है। खुली ऑखों से सूरज को देखो, उसके उजाले को चूमो, चूसो.. अंधेरों की ओर क्या भागना, क्या दौड़ना साहब!’ बी.डी.ओ. ने मुझे संबोधित किया।’ बी.डी.ओ. भावुक हो चुका था, उसकी भावुकता गहरे से लौंगी से जुड़ी थी। वह नहीं बोल रहा था उसके भीतर जो लौंगी बसी हुई थी वह बोल रही थी। बी.डी.ओ. की भावुकता मुझे प्रभावित कर रही थी कि कविता मरी नहीं है, एक आदमी जिसे कविता का क ख ग नहीं पता वह भी कविता की भाषा को मातृभाषा की तरह बिना मिलावट बोल सकता है। बी.डी.ओ. की भावुकता अचानक नहीं थी, मैं अनुमान कर सकता था कि बी.डी.ओ. कहीं गहरे में संवेदनाओं को जीने वाला आदमी है तभी तो वह उगते सूरज को देख रहा है, और विगत को लतिया रहा है, नहीं तो कुछ लोग होते हैं जो विगत में गोते लगा लगा कर खुद को डुबो लेते हैं फिर पता ही नहीं चलता कि उनके लिए क्या विगत है, क्या आगत है। बी.डी.ओ. मुझे जीवित आदमी जान पड़ा, वह जीवित आदमी था भी। नहीं तो लौंगी को छोड़ चुका होता। कुछ समय बाद तो लौंगी के पास वह देह भी नहीं रहेगी, जो मनचलों को चाहिए होती है, फिर आज भी लौंगी उनकेे लिए क्या है? पर बी.डी.ओ. मनचलों में नहीं। उसका रिश्ता केवल देह से होता तो उसे उसने कभी का हासिल कर लिया था। खरीदे हुए रिश्ते बनते बिगड़ते रहते हैं, इस तरह के रिश्तों में स्थायित्व तो होता नहीं फिर भी बी.डी.ओ. लौंगी के साथ था, खरीदे हुए रिश्ते को वह स्थाई बना चुका था, यह आज के समय के लिए किसी अचरज से कम नहीं था। बी.डी.ओ. एक अधिकारी था, अधिकारी सŸाा की अतिरिक्त मादकता में गहरे तक डूबे होने के कारण संवेदनाओं का मूल्य जानते हुए भी नहीं जानते हैं.. सŸाा की क्रूर मादकता के कारण वे सŸााविहीनों को अछूत समझते हैं तथा उन्हें वे मनुष्य ही नहीं समझते। लौंगी तो वैसे भी अछूत थी तथा सŸााविहीन तो थी ही। मैं बी.डी.ओ. से मिलकर अपनी ही धारणाओं को तोड़ मरोड़ रहा था, ‘सभी वैसे नहीं होते’ जैसा उनके बारे में गुना जाता है। अस्पताल में हम लोग करीब चार बजे शाम तक रुके रह गये, बनारस में कहीं जाना नहीं था केवल लौंगी को देखने तथा उससे मिलने का ही कार्यक्रम था। बी.डी.ओ. को लौंगी के साथ रुकना था, उसके डिस्चार्ज होने के बाद ही वह लौटता। बी.डी.ओ. मुझमें कम शाशि में अधिक रुचि ले रहा था, वह मर्दाना मिजाज में जकड़ा हुआ था, वही मिजाज जो सामान्यतया मर्दों में पाया जाता है कि शशि महिला है और पुरुष के साथ। नर, मादा के व्याकरण में उसे उलझा देख कर मुझे हसी आयी। चलो ठीक है कुछ तो हो रहा है। शशि ने लौटते समय लौंगी को दो हजार रुपये दिए यह कहते हुए कि रख लो काम देंगे। लौंगी ने इनकार कर दिया..। ‘का होगा रुपया बहिन जी, कउनो काम नाहीं है।’ बी.डी.ओ. पास में ही था उसने देख लिया कि शशि लौंगी को रुपया दे रही है, उसने मना किया..।‘बहिन जी रुपया हैं मेरे पास, कल ही ए.टी.एम.से दस हजार रुपया निकाला है, का होगा रुपया? लौंगी है तो बहुत रुपये आयेंगे, रहने दीजिए, दुआ कीजिए कि लौंगी जल्दी अच्छी हो जाये।’ अस्पताल से लौटते समय हम लौंगी की कहानी के साथ थे, हम पीछे, पीछे थे, उसकी कहानी हमारे आगे, आगे। उजालों के तिराहे पर कहानी ने हमें रोक कर पूछा..। क्यों बे लेखक अब आगे क्या लिखना है लौंगी के बारे में? बी.डी.ओ. है उसके साथ। अनाम रिश्ते बी.एच.यू. अस्पताल से हम लोग रापटगंज लौट आये, अस्पताल में रुकने की कोई जरूरत नहीं थी। लौंगी ने कहा भी था.. ‘यहां साहब हैं ही फिर आप लोग काहे के लिए रुकेंगे, कोई काम भी नाही है, अस्पताल में रुपइया हो तो किसी की जरूरत नाही..’ वापस आने में काफी देर हो गई। रोडवेज की बस रास्ते में खराब हो गई जब दूसरी बस आयी तब हम लोग आ पाये। रास्ते भर लौंगी की कहानी में हमलोग उलझे हुए थे। शशि लौंगी के साथ बी.डी.ओ. को देख कर भावुक हो चुकी थी, बी.डी.ओ. तथा लौंगी की अंतरंगता उसे जकड़े हुए थी। उसने मुझसे कहा..। ‘देखा आपने, यह होता है रिश्ता। बी.डी.ओ. तथा लौंगी के रिश्ते को आप क्या नाम देंगे? कोई नाम भी नहीं है शायद। इस तरह के रिश्ते अनाम होते हैं जो संवेदना तथा आत्मिक भावुकता से उपजते हैं, जो समाज द्वारा गढ़े तथा रचे हुए रिश्तों से प्रवृŸिा तथा विषय दोनों में अलग होते हैं.. इसी रिश्ते में वह मनुष्य भी दीखता है जो केवल मनुष्य होता है, प्रकृति का बेहतर उत्पाद, परिस्थितियों का गढ़ा तथा रचा नहीं..’ लौंगी तथा बी.डी.ओ. को साथ देख कर शशि खुद को विश्लेषित करने लगी थी कि उसके साथ ऐसा नहीं है। समाज द्वारा रचा हुआ रिश्ता भी टूट गया और वह पूरी तरह से अकेली हो गई, उसका हाल अहवाल लेने वाला कोई नहीं.. मैंने अनुमान लगाया कि लौंगी के बहाने शशि खुद को विश्लेषित कर रही है । मैंने शशि से कहा जो उसे समझाने जैसा था.... ‘संयोग भी होता है शशि, समाज द्वारा रचे व गढ़े हर रिश्ते को हम एक ही कोटि में नहीं रख सकते, यह सच है कि विद्रूपताएं उनमें हैं पर यह भी सच है कि तमाम कोलाहलों से दूर वहां आत्मिक शांति है, एक दूसरे पर विश्वास के मजबूत आधार भी होते हैं। बी.डी.ओ. तथा लौंगी का मामला संयोग का खेल भी हो सकता है जिसे हम देख रहे हैं.. संयोग की विशेषता होती है कि वह योग को मनोनुकूल या विपरीत बना देता है, इसमें भी तो योग ही होता है, बिना योग के कुछ नहीं होता। संयोग का योग अचानक होता है जिसे कोई प्रायोजित नहीं करता। कुछ फर्क नहीं होता समाज द्वारा प्रायाजित रिश्ते तथा खुद से बने रिश्ते में। दोनों में योग ही होता है और दोनों ही अचानक होते हैं.. इसलिए हमें लोंगी तथा बी.डी.ओ. के रिश्ते को एक प्यारा संयोग ही कहना चाहिए। ‘हां ठीक बोल रहे हैं आप, सारा खेल संयोग का ही है पर चर्चा तो उसी की होती है जिसमें विद्रूपताएं न हों या हों भी तो नगण्य हों, जिन्हें आपसी सहमति से दूर किया जा सके, शायद उसी को शुभ, शुभ कहते हैं..’ शशि ने स्पष्ट किया और खामोश हो गई। शशि मेरे पास वाली सीट पर बैठी थी, वह जुड़वा सीट थी। बस पर बैठते समय ही हम लोगों ने जुड़वा सीट तलाशा था। अलग अलग बैठने का कोई अर्थ नहीं। यह संयोग ही था कि एक जुड़वा सीट खाली थी। हम दोनों पास, पास थे पर पास होने के अहसास से कोसों दूर थे। वह अहसास भी नहीं था जो हमें कभी जंगल की यात्रा के दौरान हासिल हुआ था। जाने कैसे सारा कुछ फुर्र हो गया था और हम किसी शून्य में भटक रहे थे, जहां कुछ होता नहीं। लम्बे समय के बाद मैं अब महसूस करता हूॅं कि शशि वह नहीं है जो पहले थी या मैं ही बदल गया हूॅं और पहले की तरह नहीं हूॅ, शशि में वह सब नहीं देख पा रहा जो पहले देख रहा था। पहले तो शशि चहकती, दमकती, महकती जान पड़ती थी। पहले लगता था कि हवा भी हमें सहला रही है तथा जीवन की गुदगुदियां बिना हमारे जीवित नहीं रह सकतीं पर अब ऐसा नहीं है। मुझे लगता है कि शशि की आत्मिक शुचिता ने मुझे परिवर्तित कर दिया है। जैसे,जैसे मैं शशि के करीब होता गया वैसे,वैसे शशि मुझे किसी सरंक्षक की तरह गढ़ती गई और मैं महसूस करने लगा कि शशि वह नहीं जो मैं समझ रहा था या जो मैं उसके होने में तलाश रहा था। ‘वैसे शशि अब भी महकती है, दमकती है, चहचहाती है। वह वही है जो पहले थी पर इसकी गंध दूसरी है। इस गंध में मादकता नहीं, उन्माद नहीं इसमें स्नेह है, आदर है, तथा रिश्तों की पवित्र कोमलता है। मैं लगातार ऐसा ही महसूस कर रहा हूॅं और देख रहा हूॅं कि मैं परिवर्तित हो गया हूॅं। मेरे भीतर का वह आदमी जो मुझे दैहिक गुदगुदियों की ओर ले जा रहा था, वह मर चुका है, वह है ही नहीं या वह कभी था ही नहीं। वह केवल कल्पना की बात थी। पहले मेरी सहजता मुझसे छिन गई थी और मैं शशि की देह के आस, पास मडराने लगा था। अब मैं उसके मन के आस, पास हूॅं। शशि के मन के आस, पास मैं किस तरह पहुंचा, इसे मैं अब तक नहीं जान पाया और नहीं जानना चाहता हूॅं। मेरे लिए वैसे भी शशि के मन के आस, पास ही जगह होनी चाहिए, उसकी देह के पास नहीं। संभव है ऐसा परिवर्तन इस लिए हुआ हो कि मैं अब खुद देह से बाहर होता जा रहा हूॅं, लगता ही नहीं कि देह भी है मेरे पास। हालांकि मैं विदेह नहीं हो सकता फिर भी विदेह होने की पवित्र अनुभूतियों का मालिक तो हो ही सकता हूॅं। लौंगी के बारे में बातें करके शशि कुछ देर के लिए खामोश हो गई थी। मैं तो खामोश था ही। हम दोनों उस समय शून्य में थे। हम दोनों के शून्य शायद एक ही थे, जैसे हमारे पास बोलने,बतियाने के लिए विषय ही नहीं हों और अगर हों भी तो हम बतियाना ही नहीं चाह रहे हों.. उस समय की संवाद हीनता कुछ ऐसी जान पड़ रही थी जैसे हम दोनों अपने भीतर कहीं गहरे में गोता लगाने लगे हों.. शशि के बारे में मैं ऐसा नहीं कह सकता पर मैं तो अपने भीतर काफी गहरे में उतर गया था। कभी वहां जोखन दाऊ फुफकार रहे होते तो कभी सुमन्त जोखन दाऊ से लड़ रहा होता, चिल्ला कर बोल रहा होता कि....। ‘देख लूंगा आपको, अब हम पहले वाले नहीं हैं, जमाना बदल गया है’ सुमन्त की चीखें मुझे झकझोर देतीं, चरण राम की विनम्रता मुझे प्रभावित करती। बेचारे परधानी का चुनाव हार गये, वे हमारे क्षेत्र के दलितों में काफी पढ़े लिखे तथा अनुभवी हैं, वे मुझे संबोधित करते.... ‘भाई साहब आप मेरे ऊपर कोई कहानी लिखिए कि मैं, मैं, मैं नहीं हूॅं मैं तो सुमन्त या जोखन दाऊ सरकार का आदमी हूॅं, मेरा कोई व्यक्तित्व नहीं’ भीतर की झील गहरी होती है उसमें जाने कौन कौन उतर जायें कोई लेखा नहीं होता, किसुन भी उतर जाता तथा उसकी पत्नी भी जो ओझा के जाल में फसी पड़ी है। पहले के साथियों की बात ही अलग है, वे भी कभी कभी गुदगुदाते रहते हैं, चिढ़ाते रहते हैं.. बस में मेरा विगत मेरे सामने होता जा रहा था और मैं उसमें डूबता जा रहा था हालांकि उसका कोई प्रयोजन नहीं था। दूसरी ओर शशि भी खामोश थी शायद नींद में जाना चाह रही हो पर ऐसा नहीं था। नींद में जाना चाहती तो चली जाती, हवा नरम थी, बस के बाहर फुहारें थीं, कभी कभी फुहारे बस की खिड़कियों से अन्दर आकर हमें भी फुहारा बनातीं, अच्छा लगता, ऐसे में शशि सोना चाहती तो सो लेती पर वह सो नहीं रही थी, वह कहीं और थी, कहां थी नहीं मालूम। अहरौरा आने के पहले वह पहाड़ी मुझे दिखी जहां कभी बौद्ध बिहार हुआ करता था। तत्काल मैंने शशि को सचेत किया.... ‘नींद में चली गई क्या?’ ‘नहीं तो’ ‘वह पहाड़ी देखो, सामने वाली, दिख रही है नऽ’ ‘हां दिख रही है’ ‘वह सिर्फ पहाड़ी नहीं है, वहां कुछ नव निर्माण जैसा दिख रहा होगा’ ‘हां हां दिख रहा है’ वह छोटा सा संग्रहालय है, इस पहाड़ी पर पाई गई पुरातात्विक धरोहरों को उसमें संरक्षित किया गया है। उसके पास ही में वह बौद्ध बिहार भी है। उसके निर्माण के बारे में अनुमान लगाया गया है कि वह बौद्ध धर्म के उत्थान काल का होगा। माना जाता है कि इस दक्षिणांचल में भी बौद्ध धर्म का जोर था। इसी तरह रापटगंज से पन्द्रह बीस किलामीटर पूरब, धंधरौल बांध के आस पास पांचवी, छठवीं शताब्दी का निर्मित विजयगढ़ किला है जिसके बारे में मैंने तुम्हें पहले कभी बताया था, उसके पहले एक गांव है,जिसका नाम मऊ है वहां बहुत अधिक पुरातात्विक धरोहर हैं जिन्हें उसी गांव में एक संग्रहालय बना कर सरंक्षित किया गया है। वहां भी बौद्ध कालीन धरोहर है..’ ‘एक बात बहुत खास है, जो मुझे हसाती है तो रुलाती भी है। खैर छोड़ो उसे, वह बताना कोई आवश्यक नहीं, उस बात का आज के वर्तमान से कुछ भी लेना देना नहीं, वे पुरानी बातें हैं जो खतम हो चुकी हैं।.’ सायास मैंने खुद को रोका पर शशि उत्सुक हो चुकी थी.. उसने कहा..। ‘क्या आपके पास ऐसी भी बातें है जो इतिहास से जुड़ी हुई हों जिन्हंे आप नहीं बता सकते, कहीं यह मन का आपातकाल तो नहीं कि अभिव्यक्ति ही प्रतिबंधित हो गई, भय के मारे कुछ नहीं बोलना, बोलना भी तो संभल कर’ ‘नहीं नहीं ऐसा नहीं है, बात बहुत गंभीर नहीं, ऐसी भी नहीं जिसे बताया न जा सके पर आज के समय के लिए हास्यास्पद अवश्य है।’ ‘फिर बताइए नऽ क्या कहना चाहते थे जिसे कहने से जबरन आपने रोक लिया, आपको मालूम है नऽ कि बातों की स्वस्फूर्तता नहीं रोकनी चाहिए।’ ‘सो तो है..। दर असल यह है कि एक समय था जब बुद्धिस्टों ने मठों के दरवाजे नर तथा नारी दोनों के लिए खोल दिए थे, पहले प्रतिबंधित था, केवल नर ही मठों में प्रवेश पाया करते थे। नर, नारी यानि भिक्षु व भिक्षुणी जब दोनों साथ, साथ मठों में रहवास करने लगे फिर उनकी अंतरंगता भी बढ़ी और उस अंतरंगता ने दैहिक वर्जनाओं को तोड़ दिया। जिसे मठों की गरिमा को निन्दित करने वाला कार्य माना गया। शशि तो सचेत थी, उसने तुरंत टोका..। ‘कैसी गरिमा, कैसी निन्दा? मैं समझी नहीं’ ‘यही तो विकट है, गरिमा मतलब उनमें दैहिक वर्जनांए समाप्त हो गईं और वे एक दूसरे में दैहिक कौतुक तलाशने लगे जो उन्हें प्राकृतिक रूप से उपलब्ध थे फिर तो मठों के सारे नियम ही घ्वस्त हो गये। उनका भिक्षु होना, भिक्षुणी होना, उनसे छिन गया। जबकि माना जाता था कि वे लोग दैहिक शुचिता के लोग हैं, दैहिक दाह जिनमें होता ही नहीं’ ‘तो यही बताना चाहते थे आप! यह कौन सी बात है जिसे नहीं बताया जा सकता, यह तो मालूम ही है कि पहले दैहिक वर्जनाओं पर काफी जोर दिया जाता था, जबकि यह भी सच है कि वर्जनांए निर्मूल हुआ करती थीं। सच कहिए तो नर, नारी के अंतरंग संबधों को दैहिक वर्जनांए कभी भी किसी काल में नहीं रोक पाईं.. दिखती थीं रोकी हुई पर खुली, खुली थीं, चोरी चोरी सारा कुछ होता रहा है जो आज भी हो रहा है। पहले घुटन तथा निराशा में हुआ करता था और आज खुले में साफ,साफ हो रहा है। आज भी ऐसा नहीं है कि देह हर किसी के सामने पसरी हुई है, जो जब चाहे उस पर कहानी लिखे या कविता। ऐसा नहीं है, आज भी चॉद वरीयता का प्रथम विकल्प नहीं है, भले ही खूबसूरत तथा आकर्षक दिखे। विचारों की दृढ़ताएं आज भी जस की तस हैं, उससे उपजी वर्जनांए भी वैसी ही हैं, भले ही आज का माहौल पहले जैसा नहीं है।’ शशि अधिकतर मामलों में साफ,साफ बोलती है। उसकी इसी साफगोई ने मुझे उसके प्रति आकर्षित किया था। मैने उसकी बात का समर्थन किया..। ‘तूं ठीक बोल रही’ अचानक मुझे याद आया उसके तलाक वाले मुकदमे का फिर मैंने उससे पूछा..। ‘हां शशि देखो व्यस्तताएं भी अजीब होती हैं, लम्बा समय खिंच गया और मैं पूछ भी नहीं पाया कि तलाक वाले मामले में क्या हुआ? ‘उतने पर ही सारा कुछ रुका हुआ है जितना आप जानते हैं.. हमारी ओर से आपने प्रतिवाद दाखिल करवा दिया था, उसका जबाब मेरे वकील को अब तक नहीं मिला। तारीख पर तारीख पड़ती जा रही है, कल ही तो वकील से बात हुई थी, उसने बताया कि चिन्ता की कोई बात नहीं, उन्हें साबित करना है कि तलाक क्यों मंजूर किया जाये? रही बात तलाक स्वीकार करने के कारणों की तो वकील बता रहा था कि उधर से दावे में जो निन्दात्मक आरोप लगाए गये हैं उनके संबध में प्रमाण नहीं इस किया गया है, जिसके बिना दावे को दाखिल ही नहीं किया जा सकता, पर क्या कहा जा सकता है अदालती प्रक्रियाओं के बारे में, अदालतें भी तो आजकल अपनी मर्यादाओं का ध्यान नहीं रख पा रही.ं.’ ‘तो मामला वहीं रुका हुआ है जहां तक मुझे पता था। लगता है कि आगे कुछ होगा भी नहीं.. आरोप लगाना अलग बात है तथा आरोप को साबित करना अलग। वे कभी अपने आरोपों को साबित भी नहीं कर सकते, ऐसे आरोप साबित भी नहीं होते जो दैहिक शुचिता से जुड़े होते हैं.. तमाम तरह की जिरह होती हैं तथा गवाह टूट जाते हैं, किसी टूटने वाली चीज की तरह। पर तूं क्या चाहती है उस बाबत? अभी भी पहले वाली धारणा पर द्ढ़ है क्या या कुछ बदलाव आया?’ मैंने बहुत ही सहजता से पूछा ‘मुझे क्या चाहना, क्या नहीं चाहना, क्या बदलना क्या नहीं बदलना, मेरे पास चाहने तथा बदलने के विकल्प हैं ही नहीं, उन लोगों के दिमाग में मैं कोई पक्ष ही नहीं, वे लोग तो अपने पक्ष भी हैं तथा मेरे भी। फिर ऐसे में कोई दूसरा रास्ता कहां है.. सो मैं इस मामले में स्थिर तथा जड़ बन गई हूॅं। मुझे कुछ भी नहीं सोचना, सोचें गुनें वे लोग। मैं केवल इतना कह सकती हूॅं कि जो होना हो जल्दी हो जाये, मुकदमे का चक्कर बेकार है।’ देखो शशि दुनिया बहुत बड़ी है और समय भी काफी जटिल है। पहले भी मैं चाहता था कि तुमसे अपने मन की बातें साफ,साफ बता दूं पर तेरे गुस्से ने मेरी बातों को लील लिया फिर मैं तेरे से कुछ नहीं बोल पाया। अगर तूं बुरा न मान तो मैं एक बात बोलूं हो सकता है कि तूं इसे उचित न मानो पर समय की भाषा में मेरी बात के लिए स्थान है, वह भी हासिए पर नहीं, अच्छी जगह पर।’ शशि ने मुझे बीच ही में रोक दिया..। ‘जाने क्या है कि आप सीधी बात नहीं करते, उसे घुमा कर बोलते हैं, मुझसे तो साफ,साफ बोल दिया कीजिए या किसी से भी, सामने वाला माने तो ठीक न माने तो ठीक, आपका जो काम है उसे कीजिए, सामने वाले के मानने या नहीं मानने से क्या फर्क पड़ने वाला?’ प्रतिरोधों का आदमी लेनिन ने कभी कहा था कि खराब सुलह भी झगड़े से बेहतर होती है, हो सके तो तूं भी सुलह के मुद्दांे पर विचार कर, सुलह की संभावनाओं पर सोच, यही तेरे लिए उचित होगा, अगर तूं अपनी अस्मिता के प्रति रंच मात्र भी व्याकुल है तो तेरी अस्मिता तभी सुरक्षित रह सकती है जब तूं अपने घर की परिस्थितियों को सुधार ले।’ शशि मेरी बात पर आक्रामक हो उठी.... ‘यह क्या बोल रहे हैं आप? कैसी सुलह? सुलह तो पक्षों में होती है, आपको नहीं लगता कि मैं अपनी ससुराल वालों के लिए कोई पक्ष ही नहीं हूॅ फिर किनके बीच होगी सुलह? सुलह कोई हवा में लहराने या एकांत में गाने वाली चीज नहीं’ शशि से उस समय तलाक के बारे में बातें करना मुझे समयोचित नहीं जान पड़ा, मैंने खुद को रोक लिया..। शशि उचित बोल रही, वह तो अब कोई पक्ष ही नहीं.. प्यार की उमर बी.एच.यू. अस्पताल से लौगी अपने गांव नहीं लौटी, उसे बी.डी.ओ. अपने साथ लिवा ले गया। लौंगी स्वस्थ हो चुकी थी। डाक्टर ने उसे आराम करने के लिए कहा था। कम से कम एक महीने तक कोई काम नहीं करना है। लौंगी बी.डी.ओ. के साथ जाने तथा नहीं जाने के बाबत तटस्थ थी, उसने बी.डी.ओ. को रोका भी.... ‘आप नाहीं बूझ रहे हैं कि आपकी कितनी बदनामी होगी, लोग का कहेंगे? हमैं एक दूसरे के साथ देख कर, जाने कहां से उढ़ार लाया किसी उड़िहारिन को, मैं आपके साथ नहीं जाऊंगी, हमैं हमरे घरे छोड़ दीजिए, एतना किरिपा कीजिए..। आप जेतना हमरे संघे कर रहे हैं एतना तो बिहउता भी नाहीं करता, आपने हमैं मान दिया, इहय हमरै बदे काफी है’ बी.डी.ओ. भी लौंगी से कम नहीं था..। ‘का बोल रही लौंगी तूं, अरे ओतनै बोल जेतना बोलना चाहिए, अब ई सब का है, आपने मान दिया, एतना तऽ कोई बिहउती के संघे भी नाहीं करता, तूं नाहीं जानेगी हमरे मने की बात कि हमरे मने में तूं का है, मने में हमरे तूं कैसे रहती है? हम मन उघार के तोहैं दिखा नाहीं सकते’ बी.डी.ओ. लौंगी की बात नहीं माना और उसे अपने साथ लिवा ले गया, उसे पता था कि लौंगी भले ही बीमार है पर उसका दिल बीमार नहीं है। बीमारी चाहे जैसी हो उसका इलाज हो सकता है पर दिल की बीमारी का इलाज नहीं हो सकता, उसके लिए कोई दवाई नहीं है।’ मुझे अच्छा लगा कि कोई न कोई तो लौंगी का सहारा है, वह अब अकेली नहीं.. प्यार के लिए कोई उमर नहीं होती, किसी भी उमर में किसी का किसी के साथ प्यार हो सकता है जो प्यार की मर्यादा निभाने वाला हो। रापटगंज में सब ठीक ठाक चल रहा था। किसी काम और बात की हल- चल नहीं थी। साहित्य के क्षेत्र में नरम गर्मी थी जिसमें हम सभी डूबे हुए थे। एक रचनाकार के गीतों के संकलन का विमोचन होना था जिसकी तिथि निश्चित थी। रचनाकार के गीतों को अधिकांश स्थानों पर श्रोता मिल जाया करते थे जिससे रचनाकार में आत्मिक बदलाव के लक्षण उभरने शुरू हो गये थे जो उसे प्रभावकारी बनाते थे वैसे भी रचनाकार कम प्रभावकारी नहीं था। विमोचन के बारे में जगह जगह पर किसिम किसिम की चर्चा थी, पहली यही कि उसके कुछ गीतों को फिल्म में लिया जा रहा है। यह खबर रापटगंज के लिए बहुत बड़ी थी और खबर को बड़ी बनाने के लिए रचनाकार के हितैषी प्रयासरत भी थे। हितैषियों के प्रयासों ने खबर पर इतना रंग चढ़ाया कि रचनाकार का कद खबर से छोटा हो गया। जिस दिन विमोचन हुआ था उस दिन रचनाकार छोटा दिखने लगा था। उसे छोटा दिखना ही था क्योंकि फिल्म का नाम उससे काफी बड़ा था और विमोचन का विशिष्ट अतिथि तो सब पर भारी था। विमोचन बहुत ही अच्छे ढंग से निपट गया यह रापटगंज के लिए खुशखबरी की बात थी। मुझे विमोचन के दिन अनुमान था कि शशि अवश्य मिलेगी, कहीं भी होगी। विमोचन के कार्यक्रम में अवश्य आयेगी पर शशि उस दिन नहीं आयी। हां वह अक्खड लड़की लाजवन्ती, उस दिन मिली थी जो राजस्व विभाग में काम करती थी। विमोचन कार्यक्रम में स्थानीय साहित्यकारों की उपस्थिति देखने लायक थी जबकि ऐसा होता नहीं है। इसका कारण शायद वह फिल्मी महापुरुष था जो कार्यक्रम का मुख्य अतिथि था। फिल्मों की जनप्रियता का दबदबा साहित्यक कार्यक्रम में मुझे पहली बार देखने को मिला। रापटगंज में अधिकारियों का दबदबा तो देखता रहा हूॅं, पहली बार फिल्मी पुरुष का दबदबा देख रहा था। वैसे फिल्मी महापुरुष एक साधारण किस्म का आदमी था, उसकी यही साधारणता उसे असाधारण बना रही थी। उसने अपने संबोधन में पहले खुद की गांठों को खोला, उसके एक एक रेशे को अलंकारिक ढंग से अलग किया जिससे उसके बीते दिनों का गहन सामाजीकरण हो जाये और ऐसा हुआ भी। उसके जीवन के सारे रेशे जिन्हें उस मुख्य अतिथि ने खोला था विमोचन की गरिमा से चिपक गये जो मन को छूने वाले थे कि कभी भी परिस्थितियां किसी को भी शिखर पर बैठा सकती हैं.. कार्यक्रम समाप्त होने के बाद जैसे ही वहां से मैं निकलने वाला था जाने कैसे लाजवन्ती ने मुझे देख लिया और सीधे सामने आ कर खड़ी हो गई.. ‘सर! प्रणाम।’ मैंने लड़की को देखा, जानी पहचानी जान पड़ रही थी पर उसे ठीक से नहीं पहचान पाया सो उसके प्रणाम का जबाब दे कर आगे बढ़ गया पर लड़की ने रोक लिया..। ‘लगता है आप पहचान नहीं रहे हैं सर..। अरे! मैं लाजवन्ती हूॅं, शशि जी के साथ आपसे मिल चुकी हूॅं, राजस्व विभाग में काम करती हूॅ.. अब पहचाने सर!’ उसने दुबारा पूछा हां, हां, अरे लाजवन्ती, तूं तो काफी बदल गई है रे! मुझे थोड़ा भ्रम हो गया था, अब पहचान गया.... वस्तुतः वह बदल भी गई थी। उसके रंगरूप में आकर्षक निखार आ गया था पहले से बहुत अधिक। वह खिली, खिली दिख रही थी, उसका खिलना उसे आकर्षक बना रहा था। नहीं सर! लाजवन्ती तो पहले वाली ही है सर! एकदम वैसहीं ठस्स अउर ठोस, लाजवन्ती को का बदलना सर!‘ लाजवन्ती ने अपनी चपलता दिखाया। लाजवंती के साथ एक नौजवान लड़का भी था, उससे लाजवंती ने परिचय कराया. ‘सर! इन्हें आशीर्वाद दीजिए! अब इन्हीं के साथ रह रही हूॅं सर! ये न होते तो मैं संभल न पाती।’ लाजवन्ती का पति मेरे पांवों की तरफ झुका, मैंने तत्काल उसे उठा लिया..। ‘अरे! नहीं नहीं, ऐसा न करो, दुआ सलाम ही काफी है, यही बहुत है। लाजवन्ती के पति को मैंने अपना पैर छूने नहीं दिया जबकि उसने पूरी कोशिश की कि वह मेरे पैरों का स्पर्श कर ले और विलुप्त होती पुरातन परंपरा को दुहरा ले।’ लाजवन्ती का पति आधुनिक लिवाश में था पर आधनिक नहीं दिख रहा था। ऐसा दिख रहा था जैसे वह काफी अनुभवी हो और समय ने उसे बहुत कुछ सिखा पढ़ा दिया हो। कुल मिला कर वह सुशील जान पड़ रहा था जो कि आधुनिक होने का प्रतिपक्ष है। लाजवंती उसके साथ रह रही है, इसका मतलब उसने विवाह कर लिया... ‘लाजवंती, तूंने शादी कब किया, हाल ही में क्या?’ ‘अरे नहीं सर, शादी, फादी का करना, अइसहीं एकै साथ रह रहे हैं, का होगा शादी करके, हमैं बाल, बुतरू जनमाना नाहीं है, फेर हमार एनसे शादी होती भी नाहीं, ई दूसर बिरादरी से हैं, एनकर जाति हमसे छोटी है, अब जाति न पूछिएगा सर!’ फिर मैंने उस लड़के से पूछा..।‘का करते हो भाई? ‘जी मैं संगीतकार हूॅं, गीत लिखता हूॅं, उसे गाता हूॅं और उसकी प्रस्तुति लोगों को सुनाता हूॅं’ उसने संक्षिप्त उŸार दिया पर उसके उŸार की संक्षिप्तता प्रभावकारी थी। मैंने तत्काल सवाल किया..। ‘संगीत से खर्च चल जाता है क्या?’ ‘हां अब चल जाता है, पहले नहीं चल पाता था। अब काफी कार्यक्रम मिलने लगे हैं। समझ लीजिए महीने में कम से कम तीन चार कार्यक्रम मिल ही जाते हैं। तीन चार हजार भी एक एक कार्यक्रम के मिल गये तो समझ लीजिए बीस हजार हो गये।’ ‘तब तो बहुत अच्छा है, नहीं तो संगीत को कौन पूछता है, वैसे भी यह कोई रोजगार तो है नहीं, यह तो केवल मन का शौक है।’ भाई मुझे भी अपने दो चार गीत सुनाना जिसे तुमने कंपोज किया हो, जो देशी हों, स्वर, लय और धुन के हिसाब से। मैंने उससे आग्रह किया..। ‘हां हां सर, क्यों नहीं, भला आपको क्यों नहीं सुनाऊंगा, जरूर सुनाऊंगा सर! लाजवन्ती तो आपके बारे में अक्सर बातें करती रहती है और शशि जी के बारे में भी, किसी दिन एक कार्यक्रम रख देते हैं सर!’ ‘हां तूं जिस समय खाली रहो मेरे यहां ही कार्यक्रम रख दो पर सप्ताह भर पहले बता देना कि कब कार्यक्रम रखना है?’ ‘हां सर यही करूंगा।’लाजवन्ती का पति अपने बारे में बता कर खामोश हो गया, पहली मुलाकात में इससे अधिक बोलता भी क्या? लाजवन्ती उसके पास ही में खड़ी थी। उसने मुझसे शशि के बारे में पूछा जबकि शशि के बारे में मैं ही उससे पूछने वाला था। मुझे शशि के बारे नहीं मालूम था वह बनारस से लौटने के बाद से ही नहीं मिली वैसे भी मैं रापटगंज में था भी नहीं। मैं अपने ताजे उपन्यास के प्रकाशन को ले कर प्रकाशकों के चक्कर में था। पहले वाला प्रकाशक जिसने मेरे कई उपन्यास प्रकाशित किए थे, उसका व्यवहार लेखकों के प्रति असंतोष जनक था। वह लेखकों को सरकार की तरह कूड़ा समझता था तथा मानता था कि लेखक जायेगा कहां? घूम फिर कर उसे प्रकाशक के तलवे चाटना है। वह कहता भी था..। ‘कौन ऐसा लेखक है जो प्रकाशक के पास खुद को नहीं बेच देता, प्रकाशक के सहयोग के बिना कोई चाहे कितनाहू प्रतिभाशाली हो, लेखक बन ही नहीं सकता’ रौ में आकर वह इस तरह का सूत्र बोलता..। ‘लेखक को प्रकाशक गढ़ता है, जैसे नेताओं को बनिया गढ़ता है, दोनों को गढ़ने की प्रविधियां समान हैं..’ एक दिन उसने मुझे भी अपने ज्ञान से संस्कारित करना चाहा पर मैंने उसे उसके अन्दाज में ही बहस से बाहर कर दिया और साफ,साफ बोल दिया..। ‘आप प्रकाशक हो और प्रकाशक की तरह रहो। प्रकाशक की चमक आपके चेहरे से जैसे फूटती रहती है उसी तरह से फूटे तो आपके लिए अधिक अच्छा होगा, दूसरी चमकों के चक्कर में पड़ेंगे तो आपके लिए अनुकूल नहीं होगा।’ साल भर भी नहीं बीते होंगे कि एक दिन प्रकाशक का फोन आया..। ‘आप इधर कोई किताब नहीं दे रहे प्रकाशित करने के लिए, आपसे तो मैं प्रकाशन खर्च भी नहीं लेता, बल्कि रायल्टी भी देता हूॅं, कुछ नाराजगी है क्या? अगले सप्ताह आप मिलने का कार्यक्रम बना लेते तो ठीक होता, मैं मिलना चाहता हूॅं आपसे। वामउग्रवादियों पर जो उपन्यास लिख रहे थे उसे भेज दीजिए या आते समय लेते आइएगा।’ फोन पर वह बहुत ही शालीन था, मेरी समझ में नहीं आया कि वह इतना शालीन कैसे हो गया। बहरहाल मैंने प्रकाशक की बातों पर घ्यान नहीं दिया। घ्यान देना भी नहीं था। मन में ठान लिया था कि उपन्यास प्रकाशित हो या नहीं हो ऐसे प्रकाशक के यहां प्रकाशित होना ठीक नहीं.. मुझे दिल्ली वाला प्रकाशक भला जान पड़ता है जिसके पास मेरा एक उपन्यास प्रकाशित होने के लिए दो साल से पड़ा है। कुछ दिन पहले मैंने दिल्ली वाले प्रकाशक से पूछा था उपन्यास के प्रकाशन के बारे में.... ‘क्या हुआ इतना समय गुजर गया, प्रकाशन में अभी कितना समय और लग सकता है?’ ‘इस माह में उपन्यास प्रकाशित हो जायेगा सर! चिंता न करें..’ जाने क्या हो? हो सकता है वह किताब प्रकाशित कर दे या नहीं भी करे पर बोलता है बहुत ही मीठा, मन को छूने वाला। मैंने लाजवन्ती से पूछा..। ‘क्या तुमसे भी शशि नहीं मिली इधर? ‘हां सर! शशि दीदी के आवास पर मैं गई थी, लौंगी दीदी का हाल, चाल लेने, मकान मालिक ने बताया कि शशि जी बीसों दिन से यहां नहीं हैं, कुछ बता कर भी नहीं गईं हैं कि कब तक आयेंगी। तूने फोन तो किया होगा शशि को..। ‘हां सर किया था पर उनका फोन स्वीच आफ चल रहा है, फोन तो आज भी किया था, यहां आने से पहले, पर उनके माबाइल का स्वीच आफ है, जाने काहे लोग फोन का स्वीच आफ रखा करते हैं।.’ मैंने वहीं खड़े, खड़े शशि का फोन मिलाया....। फोन का स्वीच आफ था। शशि के बारे में मुझ वैसे भी कुछ नहीं मालूम था। मैंने अनुमान किया...... हो सकता है उसके मोबाइल में ही कुछ गड़बड़ी हो, या मोबाइल ही कहीं खो गया हो, कुछ भी संभव है। विमोचन का कार्यक्रम समाप्त हो चुका था सो वहां रुकना ठीक नहीं था, लाजवन्ती नहीं मिली होती तो मैं सीधे अपने घर चला आता। शशि के बारे में पूछ लेने के बाद लाजवन्ती ने लौंगी के बारे में पूछा.... ‘अब लौंगी कैसी है सर!’ ठीक है, उसे काफी आराम हो गया है और अब वह बी.डी.ओ. के साथ है। बहुत पहले ही उसे अस्पताल से छोड़ दिया गया है। लाजवन्ती बी.डी.ओ. के बारे में नहीं जानती थी सो उसने तत्काल जानना चाहा..। मुझसे पूछा..। ‘कौन बी.डी.ओ. सर!’ एक हैं जो पहले सोनभद्र में ही पोस्ट थे, अब यहां नहीं हैं। मैंने संक्षिप्त उŸार दिया जिससे लाजवन्ती संतुष्ट नहीं हुई। मैं समझ सकता था कि वह चकराई हुई थी। उसे चकराना ही था। ‘भला लौंगी और बी.डी.ओ. के बीच आपस में कैसे रिश्ता हो सकता है? दोनों दो किनारे हैं, कहां बी.डी.ओ. कहां लौंगी, एक आदिवासी, वह भी गली गली बिछी हुई, जो चाहे उसे ओढ़े बिछाए। बी.डी.ओ. उसे अपने साथ काहे रखेगा?’ लाजवन्ती आपनी चकराहट नहीं रोक पाई, वह नहीं समझ पाई कि जीवन संयोगों का खेल होता है, जिसमें गहन अंधेरा होता है तो मुलायम उजाला भी, जो कभी मन गुदगुदाता है तो कभी तन। इस तरह की गुदगुदाहटें किसी के जीवन में आ सकती हैं.. लौंगी के जीवन में भी ऐसा ही हुआ होगा, उसके बारे में अधिक क्या जानना, सुनना। लाजवन्ती ने अपनी चकराहट मेरे सामने परोसा.... ‘मैं नहीं समझ पा रही सर! आप जो कह रहे हैं वह कैसे संभव हो सका, ऐसा कब हुआ? कुछ बतायें सर!’ मुझे भी बी.डी.ओ. तथा लौंगी के रिश्ते के बारे में थोड़ा बहुत ही मालूम है, कोई विशेष नहीं। बहुत पहले शशि ने ही मुझे उस बी.डी.ओ. के बारे में बताया था कि वह भावुक आदमी है, लौंगी को बहुत मानता है। दोनों एक दूसरे को बहुत प्यार करते हैं। शशि भी उन दोनों के रिश्तों को लेकर चकराहटें पी रही थी तथा नहीं समझ पा रही थी कि उन दोनों में प्यार कब और कैसे हुआ। लौंगी कोई साधारण महिला भी नहीं, उसे एड्स हुआ है, हालांकि एड्स का रोग संक्रामक नहीं है फिर भी बी.डी.ओ. लौंगी में अपने जीवन के उत्सवों तथा मनोरमों को देख रहा है। बी.डी.ओ. के लिए लौंगी हासिल करने वाली जैसी नहीं, उसके लिए तो हर ओर दरवाजे ही दरवाजे हैं, कहीं से भी वह रास्ता बना लेता। कुछ न कुछ बात तो है उन दोनों के रिश्तों में जो सार्वजनिक नहीं है। मुझे भी लौंगी के बारे में कुछ विशेष नहीं मालूम था। केवल इतना जानता था कि बी.डी.ओ. लौंगी के काफी करीब है जितना कि एक पुरुष को किसी नारी के साथ होना चाहिए। वह इस मामले में उन पुरुषों की तरह नहीं जान पड़ता जो रिश्तों को छिपाते हैं फिर भी रिश्ता बनाना चाहते हैं और बना भी लेते हैं.. मैंने लाजवन्ती को साफ,साफ बताया.... ‘मैं नहीं जानता लाजवन्ती कि वे दोनों आपस में कैसे अन्तर्लयित गये? मैं तो उन दोनों के प्यार की सघनता, अस्पताल में देख कर चकित था। लगता ही नहीं था कि वे दोनों एक दूसरे से अलग हैं। उनकेे बीच विवाह जैसे रिश्ते नहीं हैं, फिर भी एक दूसरे में विलीन हैं, पहचाना मुश्किल, कौन लौंगी है, कौन बी.डी.ओ.’ घर लौटते समय मैं शशि के बारे में सोच रहा था..। आखिर कहां चली गई, महीने भर से वह यहां नहीं है, इतने दिनों तक वह बाहर तो कभी रहती नहीं थी। शशि को लेकर मैं आश्ंाकाओं में घिरता जा रहा था, सोचता शायद ननिहाल गई हो या ससुराल..। पर ससुराल तो वह जायेगी नहीं, और ननिहाल.. चाहे जहां भी गई हो, कम से कम उसे फोन तो करना चाहिए था। पागल है पागल..। वैसे जहां भी होगी कुशल से होगी, वह खुद को संभालना जानती है, कोई बात होगी जिससे फोन नहीं कर रही होगी, कहीं उसका मोबाइल ही तो नहीं खो गया? अगर मोबाइल खो गया होगा और उसके पास अलग से लिखे नंबर नहीं होंगे फिर कैसे करेगी संयोग का खेल
घर पहुंव कर शशि की संस्था के मंत्री को मैंने फोन मिलाया, निश्चितरूप से शशि के बारे में उसे मालूम होगा। कुछ पल बाद मोबाइल ने खबर दी कि ‘डायल किया गया नंबर अब सेवा में नहीं है’। शशि से जुड़ाव रखने वाले दूसरे लोगों के नंबर मेरे पास नहीं थे, सो शशि का हाल अहवाल जानने के लिए मैं किसे फोन मिलाता। मैंने शशि के बारे में पत्नी को बताया कि उसका फोन नहीं मिल रहा, जाने कहां चली गई है, मैं समझता था कि रापटगंज में ही है, आज मालूम हुआ कि वह यहां महीने भर से नहीं है। पत्नी को आश्चर्य हुआ कि कहां चली गई शशि ? बोलीं....। ‘मैं तो आपसे पूछने वाली थी कि शशि नहीं दिख रही। पांच, छह दिन बीतते बीतते आ जाया करती थी। फिर मैंने सोचा कि हो सकता है उल्टा सीधा बोल कर आप उसे गुसिया दिए हों। आपका का ठिकाना, कब किसे का बोल दें, आखिर कहां गई होगी? का संस्था वाला काम छोड़ दिया है।’ ‘मुझे नहीं मालूम, संस्था के मंत्री का भी फोन नहीं मिल रहा..’ मैं शशि को ले कर काफी चिन्तित था, कहां होगी, सुरक्षित तो होगी नऽ। तरह तरह के विकल्प उभरते, यहां होगी, वहां होगी, पर हर विकल्प खुद मिट जाते और मैं आश्ंाकाओं में घिर जाता। समय पर विश्वास करना मुझे नहीं आता, मैं निराश रहता हूॅं समय से। समय कब असमय में बदल जाये उसका क्या ठिकाना। कई दिनों तक शशि के साथ बिताए दिनों में मैं डूबा रहा। शशि से जुड़े प्रसंग आंखों में तैरने लगते, कभी कोई, तो कभी कोई। करमनासा की यात्रा वाला प्रसंग तो आंखों से ओझल ही नहीं हो रहा था..। कितने भोलेपन से शशि ने कहा था.... ‘चलिए लौट चलें, जंगल का अवांक्षित उपहास ले कर लौटना ठीक नहीं’ उस दिन मैंने महसूसा था कि शशि भावुकताओं को अनियंत्रित नहीं होने देना चाहती। यह तो ठीक है पर अवांक्षित उपहासों को वह कैसे नियंत्रित कर सकेगी जो कदम, कदम पर व्यक्तित्व को खरोंचा व चोथा करते हैं। उस दिन मैं शशि को देखता ही रह गया था फिर भी नहीं समझ पाया था कि शशि अपनी भावनाओं कैसे नियंत्रित कर सकेगी। अगर ऐसा कर भी लेती है तो काहे के लिए? भावनाओं को नियंत्रित करने का प्रयोजन मेरी समझ से बाहर था, कहीं इसका कारण शुचिता की दृढ़ता तो नहीं....।’ करमनासा वाले प्रसंग के बाद एक दिन शशि ने दुबारा मेरे पूरे व्यक्तित्व को हिला दिया था फिर तो मैं उससे जब भी मिलता अतिरिक्त सावधानी बरतता, कहीं कोई गड़बड़ न हो जाये, शशि ने मुझे तोलते हुए कहा था....
‘ऑखों का देखा ही तो सच होता है, और आप मुझे देख रहे हैं। अब यह अलग बात है कि आप मुझे कितना और कैसे देख रहे हैं। देखने को परिणामकारी बना पा रहे हैं कि नहीं, मैं तो ठीक, ठाक हूॅं और वैसी ही हूॅं जैसी पहले थी, प्रकृति की एक संरचना।’
मेरी और शशि की उम्र में समानुपातिक अंतर का नैतिक दबाव नहीं होता तो मैं उससे कहता, अरे भाई! मैं भी प्रकृति की ही एक संरचना हूॅं, इसी लिए तुझे देख रहा हूॅं कि पूरा देख लूं जो भावुक तो हो ही, यथार्थ भी हो।’ इधर कुछ दिनों से शशि को फोन मिलाने की मेरी आदत पड़ गई है, जिस दिन नहीं मिलाता हूॅं, लगता है कुछ भूल सा गया है। फोन लगाते ही वही पुराना उŸार आ धमकता है कि ‘यह नंबर सेवा में नहीं है,’ कभी कभी नहीं भी आता, फोन गूंगा बना रहता है। करीब एक सप्ताह गुजरे होंगे कि कोतवाली का एक सिपाही मेरे घर आ धमका, उसकी धमक ने मेरे घर वालों को चौंका दिया खासतौर से पत्नी को। पत्नी एकाएक छŸाीस साल पीछे आपात काल वाले दौर में चली गईं तब मैं गांव पर रहा करता था। गांव पर भी उस समय आज वाली ही पुलिस आयी थी, पुलिस ने मेरा घर ही नहीं पूरा गांव घेर लिया था। पुलिस हर ओर मुझे तलाश रही थी और मैं था कि पुलिस की पकड़ में नहीं आ रहा था। परेशान हो कर पुलिस ने मेरे घर की कुर्की कर लिया और जब्त सुदा सारे सामानों को गांव के एक आदमी की सुपुर्दगी में दे दिया। घर की तलाशी लेते समय अपने आचरण के अनुरूप पुलिस के जवान मेरे घर के अन्दर घुसना चाह रहे थे पर दारोगा की मनुष्यता ने जवानों को घर में घुसने नहीं दिया। उसने सिपाहियों को आदेशित किया.. ‘तुम सभी लोग बाहर ठहरो, मैं घर के अन्दर जा कर देख आता हंू..’ एक सिपाही ने अतिरिक्त उत्साह दिखाया..। ‘साहब आपका अकेले घर के अन्दर जाना ठीक नहीं’ ‘काहे? का हो जायेगा? घर में अकेले जाने से। किसी अपराधी के घर में जाना है क्या?। अगर सी.ओ. नहीं आया होता तो मैं इस गांव में कभी आता ही नहीं, पता नहीं क्या कर रही है सरकार,? देश के विपक्षी नेताओं को बन्द करा दिया है, यह भी कोई राजनीति है, अरे कुछ तो कानून होना चाहिए, यह क्या है कि जिसे जब चाहो अन्दर कर दो।‘ दारोगा जिस समय मेरे घर में घुसा था, पत्नी घर में ही थीं। मॉ तथा भाभी तो पुलिस का नाम सुनते ही होश खो बैठी थीं। पत्नी सचेत थीं, उन्हें पता था कि मुझे किसी भी समय गिरफ्तार किया जा सकता है। उन्होंने ही दारोगा को घर के कुल कमरों को दिखाया, उनमें मैं कहीं नहीं था। पत्नी शीघ्र ही सचेत हो गईं और विचारा कि हो सकता है कुछ काम हो, जिसके लिए आज सिपाही आया हो, वैसे भी पुलिस त्योहारों आदि के मौकों पर मुझे भी बुला लिया करती है, खासतौर से त्योहारों के मौकों पर विचार जानने के लिए कि सांप्रदायिक सौहार्द कैसे कायम रखा जा सकता है? शायद उसी लिए बुलाया हो। उन्होंने सोचा और मुझे सूचना दी कि बाहर बरामदे में एक सिपाही जी बैठे हैं, वे आपसे मिलना चाहते हैं.. मुझे अचरज हुआ सिपाही और मुझसे मिलने..‘कोई त्योहार आ गया क्या?’ क्या बोल रही हो भाई! मैं कुछ समझा नहीं..। ‘हां, हां सिपाही ही आया है, बाहर बैठा हुआ है..।’पत्नी ने बताया फिर मैं बरामदे में आया। दुआ, सलाम के बाद मैंने सिपाही जी से पूछा.... ‘मेरे लायक कोई सेवा।’ ‘जी सेवा नहीं, कोतवाल साहब ने आपको याद किया है, वे आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं..’ सिपाही जी ने बताया ‘यह तो अचरज जैसा है, कोतवाल साहब ने काहे याद किया भाई? कुछ तो बताएं.. कोई मीटिंग है क्या?’ मैंने अचरजा कर सिपाही जी से पूछा.. ‘जी मैं कुछ नहीं जानता, कोई काम हो शायद’ श्रीमती जी सवाल जबाब के दौरान चाय ले आयीं, साथ में एक गिलास पानी भी। हम दोनों चाय पीने के बाद कोतवाली के लिए निकले। सिपाही जी मोटर साइकिल से थे। उन्हीं के साथ मैं भी कोतवाली पहुंच गया। कोतवाली पर कोतवाल साहब वस्तुतः मेरी ही प्रतीक्षा कर रहे थे। वहां मुझे मीटिंग जैसा नहीं लगा। फिर मुझे डर लगा जाने कौन काम हो, पुलिस किसी को बिना काम के तो बुलाती नहीं। उनके काम भी अपराध से जुड़े होते हैं। किसी अपराधी को पकड़वाने के अलावा किसी से उनके क्या काम हो सकते हैं या तो वे मुझे ही अपराधी समझ रहे हों। किसी ने किसी अपराध के सिलसिले में मेरा नाम बता दिया हो, कुछ भी संभव था। मैंने खुद को आश्वस्त किया कि जो होना होगा वह होगा ही, फिर काहे के लिए सोचना, अब कोतवाली आ ही गया हूॅं.. सिपाही मुझे कोतवाल साहब के कक्ष तक ले गया। कोतवाल साहब एक आरामदेह कुर्सी पर बैठे हुए थे। उनका वह कक्ष पुलिसिया आफिस के बजाय किसी बैठका जैसा था। मुझे अपने सामने खड़ा देख कर कोतवाल साहब ने बैठने के लिए कहा.. ‘अरे आप खड़े क्यों हैं, बैठिए नऽ’ कोतवाल से ऐसी विनम्रता का मुझे अनुमान नहीं था कि कोतवाल मुझे बैठने के लिए बोलेगा, पर उसने बोला, मुझे अच्छा लगा। मेरा डर भी थोड़ा कम हुआ। लगता है यहां सब कुछ ठीक ही होगा। कुछ अशुभ नहीं.. मेरे बैठ जाने के बाद कोतवाल साहब ने दुबारा मेरे पूर्वाग्रह को तोड़ा, उन्होंने किसी से चाय लाने के लिए बोला फिर मुझसे सवाल पूछा..। ‘शशि को आप जानते हैं नऽ’ ‘कौन शशि? क्या संस्था वाली..?’ मैंने पूछा ‘हां, हां वही संस्था वाली..’ कोतवाल साहब ने पुष्ट किया
‘हां जानता हूॅं, पूरब मोहाल में रहती भी हैं पर आज कल यहां नहीं हैं। उसका मोबाइल स्वीच आफ चल रहा है, कहां गई हैं मुझे नहीं मालूम।’
‘कहां की रहने वाली हैं, आप जानते होंगे..।’ कोतवाल ने पूछा जी नहीं, यह मैं नहीं जानता, न ही मुझे जानने की जरूरत पड़ी। वे यहां पर एक संस्था का काम करती हैं, एड्स जागरूकता का, उसी सिल सिले में मेरी उनसे मुलाकात हुई थी। हम लोग एक साथ डी.एम. साहब से भी मिले थे, उन्हें एक गोष्ठी की अध्यक्षत करने के लिए निमंत्रण भी दिया था हालांकि उस गोष्ठी में डी.एम. साहब नहीं आ पाये थे। शशि के बारे में जितना जानता था मैंने कोतवाल साहब को बता दिया, इसके आगे मुझे कुछ पता नहीं था। कोतवाल साहब खामोश थे शायद कुछ विचार रहे थे। मैं भीतर ही भीतर खलबला रहा था, आखिर कोतवाल शशि के बारे में क्यों जानना चाह रहा है, कुछ हुआ है क्या? मैं अनुमान करने में असमर्थ था। तलाक वाले मामले में पुलिस का कोई काम नहीं फिर पुलिस शशि के बारे में काहे जानना चाह रही? कोई न कोई बात है। मैंने साहस करके कोतवाल से पूछा.. ‘कोई बात है क्या सर?’ ‘हां बात है तभी तो..।’ ‘क्या बात है सर?’ मैंने पूछा मेरे पूछने पर कोतवाल मुस्कराया और बोला..। ‘वह तो मैं नहीं बता सकता आपको। केवल इतना बता सकता हूॅं कि एस.पी.साहब आपसे मिलना चाहते हैं, वही बताएंगे कि शशि के बारे में पुलिस क्यों पूछ,गछ कर रही है। आइए एस.पी. साहब के यहां चलते हैं, वे कार्यालय में आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं..।’ कुछ ही देर में हम लोग एस.पी. कार्यालय में थे। एस.पी. आकर्षक व्यक्तित्व वाला कम उमर का नौजवान था। उससे मेरी पहली मुलाकात हो रही थी। एस.पी. पुलिस के मिजाज से अलग किसी नेता की तरह दिख रहा था। औपचारिकताओं के बाद उसने मुझे मेरे नाम से ही संबोधित किया। उसे मेरा नाम मालूम था....। ‘तो आप उपन्यासकार हैं, कहानियां लिखते हैं, जाहिर है आर्टिकल्स भी लिखते होंगे, क्या आपने अपने बारे में कोई कहानी या उपन्यास लिखा है? लिखे हों तो बतायें, नहीं तो लिखना शुरू कर दें, क्योंकि आप खुद एक उपन्यास बन गये हैं..’ मैं तो घबरा गया, क्या बोल रहा है एस.पी. कोई न कोई गंभीर बात है जो शशि से जुड़ी हुई है। मैंने कातर भाव से पूछा..। ‘सर! मैं समझ नहीं पा रहा कि आप का बोल रहे है, मैं बहुत घबरा रहा हूॅं, रहस्यों को ओढ़ना, बिछाना मेरे वश का नहीं, कृपया साफ,साफ बतायें’ एस.पी. मुस्करा दिया संभवतः उसने मेरा घबराना पढ़ लिया था या चेहरे पर छलछलाये पसीने को देख लिया था, हालांकि मैंने बहुत ही सतर्कता से पसीना पोछ लिया था। ‘हां साफ,साफ बताने के लिए ही तो आपको तकलीफ दिया है। आप कहानियां गढ़ते हैं, पर लोग किस तरह आपको गढ़ते हैं शायद यह आपको नहीं मालूम। आपको जानना चाहिए कि लोगों के पास भी कहानियां गढ़ने की कला होती है, कहानीकार की तरह, और आपको गढ़ा जा चुका है, फिर भी नहीं जानते कि शशि कौन थी? कहां की रहने वाली थी? सोनभद्र में क्यों आयी थी? यह भी कि उसने आपकी मूरत किस तरह से गढ़ा?’ ‘शशि के बारे में जो कुछ आपको मालूम हो बतायें?’ एस.पी. ने मेरी तरफ इशारा किया। मैं खमोश था। उसने फिर बातें करना शुरू किया..। ‘मैं जानता हूॅं कि आपको कुछ भी शशि के बारे में नहीं पता, सिवाय इसके वह रापटगंज में एक संस्था के जरिए एड्स जागरूकता का काम करती थी। अच्छा हुआ कि वह पकड़ ली गई नहीं तो सोनभद्र में जाने क्या करती और हम सभी उसमें फसते और आप तो फसते ही क्योंकि आप ही यहां उसके गाडफादर हैं..’ थोड़ा रूक कर उसने बातें शुरू की.... ‘आप यह नहीं जानते होंगे कि मैं आपको जानता हूॅं.. जब से आपका नाम शशि प्रकरण में आया है, आपका नाम सुनते ही चौकन्ना हो गया। कहीं वही उपन्यासकार तो नहीं जिनके एक उपन्यास की समीक्षा मैंने किया था। उस समय मैं जे.एन.यू. में पढ़ रहा था। वहां आपके एक मित्र हिन्दी विभाग में थे, उनसे मेरी घनिष्ठता थी, उन्होंने ही मुझे सुझाया था कि मैं आपके ताजे उपन्यास को पढ़ंू जो भूमि बन्दोबस्ती के सवालों पर है और उसकी समीक्षा करूं। वह समीक्षा दिल्ली की एक प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका में प्रकाशित भी हुई थी। शशि का प्रकरण उभरने के बाद आपका नाम आया तब से मैं पता लगा रहा था कि कहीं आप वही तो नहीं जिन्हें मैं जानता हंॅू। यहां के एक दो साहित्यकारों से आपके बारे में पूछा भी, जो मेरे यहां अक्सर आया करते हैं, फिर मालूम हुआ कि मेरी सोच सही थी, आप वहीं हैं जिनके बारे में मैं सोच रहा था।’ एस.पी. बतिया रहे थे और मैं घबरा रहा था आखिर मामला क्या है? शशि ने ऐसा क्या कर दिया जो पुलिस द्वारा पकड़ ली गई, मेरी समझ में नहीं आ रहा था। अवश्य ही कोई बड़ा अपराध होगा जिसके बारे में मैं सोच नहीं सकता पर क्या शशि अपराधी हो सकती है? एक मासूम सी महिला, नहीं कुछ थोपा और गढ़ा हुआ जान पड़ता है। हो सकता है उसकी ससुराल वालों ने उसे फसा दिया हो और कोई फर्जी मुकदमा कर दिया हो। मुकदमे का क्या है, रोज ही तो फर्जी ढंग से रचे व गढ़े जा रहे हैं, अब यह किसे नहीं मालूम कि एक फर्जी मुकदमा कायम कराने के लिए सिर्फ दो गवाह ही तो चाहिए होते हैं जो आसानी से मिल जाया करते हैं, मेडिकल वगैरह भी हो जाता है। एस.पी. करना क्या चाहता है? मुझे किस लिए बुलाया है मैं समझ नहीं पा रहा था। अगर वह मेरे उपन्यास से प्रभावित है फिर तो उसे मेरे घर आना चाहिए था। यह कैसा प्रभाव है कि मुझे कोतवाल के द्वारा अपने पास बुला लिया, प्रभाव वगैरह कुछ भी नहीं है, बात कोई गंभीर है। मैने साहस बटोर कर उससे पूछा.... ‘आखिर आपने मुझे यहां क्यों बुलवाया है? उपन्यास की बात तो सामान्य तरीके से भी हो सकती थी, आप मुझे जानते हैं, मेरे उपन्यास के अच्छे पाठक हैं, घर पर ही चले आते। पुलिसिया तरीके से बुलाने का क्या मतलब? घर पर सभी घबरा रहे होंगे। मेरे घर में कोई ऐसा नहीं जो पुलिस की धमक को मीठी महक में बदल कर उसकी मादकता में डूब जाये। पुलिस के नाम से सभी बेहोश होने वाले हैं..’ एस.पी. अपने तरीके से मुस्कराया.... ‘यही मैं देखना चाहता था कि एक उपन्यासकार जो पात्रों को रचता है, गढ़ता है, पात्रों की सुरक्षा के लिए घटनाओं का सहारा लेता है, वह अपनी पात्रता बचाने के लिए क्या कर सकता है? वह भी तो एक पात्र ही होता है बिल्कुल यथार्थ वाला, खुद की गढ़न व कहन वाला?’ ‘तो देख लिया आपने..। दर असल अन्य उपन्यासकार अपनी पात्रता सुरक्षित रखने की कला जानते हैं कि नहीं, मैं नहीं जानता पर मैं अपने बारे में जानता हूॅं कि मुझे इस तरह की कला का ज्ञान नहीं। मैं मानता हूॅं कि पुलिस, पुलिस होती है जिसके तन, बल के सामने किसी की पात्रता पल भर भी नहीं ठहर सकती। जहां तक मेरी बात है, मैं तो लिखा पढ़ी वाले शाकाहारी अक्षरों से भी डरने वाला आदमी हूॅं। इस लिए पुलिस से ही नहीं, सभी से डरता हूॅं। अब पुलिस के सामने कैसी पात्रता, कैसी कुपात्रता, उसे क्या बचाना? क्या खोना?’ एस.पी.कार्यालय से मैं काफी समय बाद घर लौटा, कोतवाल ही मुझे घर छोड़ गया। घर पर सभी के चेहरों पर पुलिस नाच रही थी, जेल, थाना, कचहरी, मार, पीट जाने क्या हो? मैं खुश था कि पुलिस के झमेले से बच गया, अचानक मुझे यह सब दैवी कृपा जैसा जान पड़ा जिस पर मैं यकीन नहीं करता फिर तो यह संयोग का खेल होगा। चुनौती
वस्तुतः शशि के साथ जुड़ना मेरे लिए संयोग का खेल था। बीते सारे प्रसंग अब याद आ रहे हैं। जिस संस्था में शशि काम कर रही थी अगर उसके मंत्री से मेरी मुलाकात नहीं हुई होती तो मैं शशि को जानता तक नहीं। उसी मुलाकात ने शशि को मुझसे जोड़ा जो एक संयोग था। फिर तो शशि मुझे संस्था द्वारा कराए जाने वाले कार्यक्रमों में अवश्य आमंत्रित किया करती और मैं उसमें सहर्ष भाग लिया करता था। धीरे धीरे हम दोनों अपनी अपनी सीमाओं में रहते हुए काफी करीब होेते चले गये। शशि भी सीमाओं को फलांगने से परहेज करती थी और मैं भी। हम दोनों की दृढ़ताएं एक ही क्षेत्रफल, नापतौल तथा वजन वाली थीं जो हमारे लिए किसी चुनौती की तरह मनोरम थीं पर मुझे क्या पता था कि शशि के साथ होने का अर्थ है तमाम तरह की खुरदुरी चुनौतियों को आमंत्रित करना तथा पुलिस के डंडों से अपनी पीठ अभिमंत्रित करवाना। वैसे पुलिस ने मुझे छोड़ दिया था पर आशंका थी कि कभी भी पकड़ सकती है और अपराधशास्त्र की यातनापूर्ण धाराएं मुझ पर लाद सकती है। जैसा कि एस.पी. ने बताया था कि शशि का जुड़ाव एक वामपंथी अतिवादी संगठन से है जिसके लिए वह परोक्ष रूप से काम करती है। शशि यहां एड्स जागरूकता कार्यक्रम के बहाने वामअतिवादी संगठन के फैलाव के लिए आयी थी। एड्स जागरूकता का कार्यक्रम तो महज एक बहाना था। उसका असल काम था अतिवादी संगठन को बढ़ाना, उसके लिए जमीन तलाशना, यहां वामअतिवाद के लिए जनजागरूकता बढ़ाना फिर संगठन की बुनियाद रखना। एस.पी. ने मुझे पूरे यकीन से बताया था कि वह विवाहित नहीं है, उसका कोई घर, बार भी नहीं, जो घर था भी, उससे उसका कोई रिश्ता नहीं.. उसके मॉ बाप ने उसका साथ छोड़ दिया है। मैं तो एकदम घबरा गया, का बोल रहा एस.पी.? एस.पी. ने मजाकिया लहजे में मुझसे पूछा था..। ‘क्या शशि से मिलना चाहेंगे आप?’ एस.पी. का पूछना था कि मेरी बोल ही मुझसे छिन गई, हां या ना कुछ भी बोल पाना मेरे लिए संभव नहीं था। ‘हां’ बोलता तो एस.पी. जाने क्या करता? गंुजाइश थी केवल ‘ना’ बोलने की और मैंने साफ बोल दिया.... ‘जी नहीं, अगर आप शशि के बारे में सच बोल रहे हैं तो मैं उससे नहीं मिलना चाहूॅंगा, अगर झूठ बोल रहे हैं तो मिलना चाहूॅंगा, अब आप बताएं कि आप क्या बोल रहे हैं सच या झूठ’। ‘नहीं मैं सच बोल रहा हूॅं शशि बिहार में अपने एक कामरेड मित्र के साथ पकड़ी जा चुकी है। उसकी जांच चल रही है पुलिस पता लगा रही है कि क्या उसका जुड़ाव अतिवादी संगठनों से है? और उसने अपाराधिक गतिविधियों में हिस्सा लेती रही है या केवल जुड़ाव ही है। अभी जांच पूरी नहीं हो पाई है। शशि ने अपनी सफाई में बताया था कि वह आपको जानती है और वह अतिवादी नहीं है फिर मुझे आदेशित किया गया है कि मैं आपके बारे में जांच करूं, कहीं आप भी अतिवादी संगठन से जुड़े तो नहीं, इसी लिए आपको तकलीफ दी पर आप तो कुछ और निकले। इसलिए लगता है कि शशि भी निर्दोष हो।’ एस.पी. ने बताया शशि कहां है, जेल में या जेल से बाहर, यह मालूम करना मेरे लिए मुश्किल था। केवल एक ही रास्ता था जो एस.पी. से हो कर शशि तक जाता था। मुझे उस रास्ते पर चलना चाहिए फिर तो मैंने एस.पी. से निवेदन किया....। ‘सर! मेरी सहायता कीजिए और शशि के बारे में बताइए कि वह कहां है? क्या उसके जुड़ाव वामअतिवादियों से हैं?’ एस.पी. गंभीर था, हो सकता है पुलिस प्रशासन के काम में मेरे सवाल से दखल हुआ हो, पुलिस किसी वांक्षित के बारे में तो बताती नहीं और मैं वही पूछ रहा था। वह मुस्कराया.... मेरी समझ में आया कि वह मेरी मूर्खता का मूल्यांकन कर रहा..। कुछ देर में बोला..। ‘मैं जानता था कि शशि को ले कर आप परेशान होंगे। मैं अनुमान कर सकता हूॅं कि आप शशि को वामअतिवादी धारा की राजनीति से अलग मान रहे हैं, क्यों ऐसा ही है नऽ।’ उसने मुझसे पूछा..। ‘हां सर! ऐसा ही है, मैं सोच भी नहीं सकता कि शशि का जुड़ाव वामअतिवादियों से होगा।’ एस.पी. मुस्कराया.... ‘नहीं ऐसा नहीं है, उसका जुड़ाव ही नहीं वह खुद भी सक्रिय अतिवादी है और इस समय जेल में है। बिहार तथा झारखंड की वह प्रभारी है। लोग बताते हैं कि उसने ही वहां अतिवादी संगठन को स्थापित कराया है। शायद यह भी आपको नहीं मालूम उसके बारे में कि वह उच्च शिक्षा प्राप्त महिला है और सरकारी नौकरी में भी थी।’ बहरहाल शशि के बारे में मुझे इससे अधिक कुछ जानना नहीं था। उससे जेल में मिलना भी मेरे लिए संभव नहीं था। इस भावुकता को रोकना ही मेरे लिए हितकर था। एस.पी. ने मुझे अपराधियों के घेरे में नहीं लिया यह बहुत बड़ी बात थी वर्ना कुछ भी संभव था। वह मुझे जेल में भी डलवा सकता था। मैं प्रशासन का क्या बिगाड़ लेता? यह उसकी वौद्धिक उदारता थी। मैं एकदम डरा हुआ था, किसे नहीं पता कि अक्षरों को चूमने चाटने वाला हथियारों के प्रयोगों से बचता है। पवित्रता में नहाये अक्षर उसे कंपाते रहते हैं और कांपता हुआ आदमी सिर्फ कांपने का ही काम कर सकता है, भला हथियार कैसे चला सकता है? दर असल मैं कांप रहा था, कांपना ही था, कभी भी मैं सोच नहीं सकता कि मेरी स्वतंत्रताएं मुझसे छीन ली जायेंगी और मुझे बन्दी बना लिया जायेगा। एस.पी. सामान्य नहीं था। मेरा मजाक उड़ाते हुए एस.पी. अपने दफ्तर में ही कलात्मकता के साथ मेरे ही तर्कों से मुझे घायल कर रहा था....जिससे कि मुझे बन्दी बना कर मेरी स्वतंत्रताएं छीन ले। ‘क्षमा करें, तो एक बात बोलूं’.... मैंने आतर भाव से पूछा ‘भला मैं क्या कर सकता हूॅं आपका? क्षमा तो वह करेगा जो आपको दण्डित कर सके।’ ‘कैसी बातें कर रहे हैं आप? ऐसा नहीं है, हर एस.पी. वैसा नहीं होता जैसा आप सोच रहे हैं.. आप भी तो अपनी कहानियों की तरह नहीं हैं, कहां आपकी कहानियां और कहां आप? आपकी कहानियां स्वतंत्रता तथा वैयक्तिक संप्रभुता की सीख देती हैं.. उस सीख का असर रंच मात्र भी आप पर नहीं दिख रहा। लगता है आप जीवन जीने के लिए संतुलनवादी की भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं जबकि आपकी कहानियों में खुला प्रतिरोध है। संतुलन है ही नहीं, इस पार या उस पार की बात है। आपके द्वारा लिखी कहानियों के विषय तथा वस्तु में तथा आप में इस जो खुली भिन्नताएं हैं, यह तो शोध का विषय हो सकता है। रचनाकार को तो साहसी होना चाहिए अगर वह कांपता रहेगा फिर तो रचनाकार होने के सरोकार ही खतम हो जायेंगे।’ वैसे यह सच है कि शशि ने मुझे प्रभावित किया था और मैं उसके करीब होता चला गया था पर यह नहीं जान पाया था कि शशि जो समझ में आ रही है, वह नहीं है। कुछ और है। किसी को जाना भी नहीं जा सकता अगर ऐसा होता तो मैं भी शशि को जान गया होता। पर जाने क्या है कि मुझे लगता है कि शशि वामअतिवाद का पक्षधर तो हो सकती है पर वामअतिवादियों का सहयोगी या साथी नहीं हो सकती। बन्दूक उठाने वालों के साथ वह एक कदम भी नहीं चल सकती। लौंगी तथा दूसरे लोगों के प्रति उसकी चिन्ताओं का सारा दृश्य मेरी ऑखों में तैरने लगा। लौंगी के प्रति वह काफी संवेदनशील थी और उसकी हर तरह से सहायता करती थी। कोई नहीं समझ सकता था कि वह लौंगी के साथ अपनेपन का दिखावा कर रही है जैसा कि एन.जी.ओ वाले किया करते हैं।.. एन.जी.ओ वालों का अपनापा महज धोखा होता है। जब तक प्रोजक्ट चल रहा होता है तब तक ही वे अपनापा दिखाते हैं, लगता है उनसे बड़ा कोई शुभचिन्तक हो ही नहीं सकता, बाद में वे किसी को पूछते तक नहीं, अपनापा निभाने की बात तो दूर की कौड़ी है। लाजवन्ती से भी शशि गहरे संवेदन के साथ जुड़ी थी, कामचलाऊ रिश्ते के लिए नहीं, तभी तो लाजवन्ती परेशान है कि दीदी नहीं दीख रहीं। उनका फोन भी नहीं मिल रहा। संस्था के सर्वेयर भी शशि के लिए परेशान हैं, वे शशि के बारे में पूछ रहे हैं कि दीदी कहां हैं? संस्था का काम आगे चलेगा कि नहीं? वैसे मैं भी शशि के लिए काफी चिन्तित था, तथा अपने अनुभवों को गरिया रहा था। मुझे अपने अनुभव पर घमंड हुआ करता था कि मैं होने और न होने के बीच के फासले को समझ सकता हूॅं और मैंने शशि को समझ लिया है। अगर एस.पी. सच बोल रहा, कोई धोखा नहीं कर रहा फिर तो मैं शशि को नहीं समझ पाया। लगभग साल भर गुजर गये उसके साथ, हसियां, गुदगुदियां पीते, एक दूसरे को बूझते, उनसे उपजी संवेदनाओं से जूझते। भला मैं कैसे भूल सकता हूॅं तलाक की नोटिस वाले उस एक पृष्ठ के कागज को जो अदालत से आया हुआ था। तो क्या वह नोटिस भी गलत थी जिसे शशि ने मुझे दिखाया था जिसका जबाब दिया जाना था। जब वह विवाहित ही नहीं, फिर तलाक की नोटिस किस लिए? क्या इतनी धोखेपूर्ण तैयारी.... नहीं, नहीं ऐसा नहीं हो सकता। एस.पी. झूठ बोल रहा। हो सकता है एस.पी. सच बोल रहा हो और तलाक वाली वह नोटिस सच हो और शशि का नाम भी कुछ दूसरा हो। यानि शशि वह नहीं है जिस नाम से मैं उसे जानता हूॅं फिर क्या नाम है शशि का? पुलिस ने पता लगा लिया होगा! ऐसा होता तो एस.पी. बताता पर उसने इस बारे में कुछ बताया नहीं.. छिपा लिया होगा, मुझे किस लिए बताता? बहरहाल रापटगंज की पुलिस ने मुझ पर उदारता दिखाते हुए पुलिस उत्पीड़न के योग्य नहीं समझा यानि कि मैं आजाद था तथा अपनी स्वतंत्रताओं की पवित्र नदी में अपने ढंग से गोते लगा सकता था। दो दिन भी नहीं गुजरे होंगे कि यहां बाहर से आने वाले दैनिकों ने पुलिस पर सवाल खड़ा कर दिये कि पुलिस नक्सलवाद के उन्मूलन के नाम पर साहित्यकारों तक को अपमानित कर रही है। मैंने भी अखबारों को देखा, अखबारों में पुलिस के खिलाफ प्रकाशित था, इस संदर्भ में मेरा बयान भी प्रकाशित किया गया था, गनीमत थी कि अखबार वालों ने मेरे बयान में फेर बदल नहीं किया था। करीब दस बजे के आस पास एस.पी. का फोन आया..। यह सब क्या हो रहा है? अखबार में ऐसा कैसे प्रकाशित हो गया कि पुलिस आपको अपमानित कर रही? ‘मुझे उसके बारे में कुछ भी मालूम नहीं था। अखबार वालों से मैंने केवल पूछ,गछ के बारे में बताया था कि कोतवाल ने मेरी पेशी एस.पी. के सामने कराया और एस.पी. ने सम्मानजनक ढंग से शशि के बारे में पूछ,गछ की। केवल इतना ही अखबार वालों से मैंने कहा है साथ ही साथ यह भी कि कोतवाल ने मुझे मेरे घर पर छोड़ दिया, बस इतना ही। मैंने एस.पी. को बताया.... ‘मैं नहीं जानता जो कुछ अखबारों में प्रकाशित है, वह कैसे प्रकाशित हो गया पर इतना जानता हूॅं कि वह सब मेरा बताया हुआ नहीं है, आप इसकी जांच करा लें’। एस.पी. चालाक निकला उसने उसी दिन कोतवाली पर प्रेस कांफ्रेस बुला लिया, प्रेस कांफ्रेस में मैंने वही कहा जो अखबार वालों से कहा था फिर एस.पी. ने अपने तरीके से अखबार वालों को नसीहत दी.... ‘आपलोगों को बहुत अधिक नहीं तो कम से कम कुछ तो सच के आस पास होना चाहिए। पुलिस ने ऐसा कुछ भी नहीं किया है जो अपमान की श्रेणी का हो, हां पूछ, गछ की गई है और उसे करना भी चाहिए। क्या सच तक पहुंचने के लिए पूछ, गछ भी नहीं की जानी चाहिए?’ एस.पी. ने पत्रकारों से पूछा.... पत्रकार क्या बताते सिवाय इसके कि पूछ, गछ तो करनी ही चाहिए। समय के साथ शशि के प्रकरण का जो बवंडर उठा था वह कुछ दिनों तक ही बवंडर बना रह सका बाद में स्वतः ही समाप्त हो गया पर मेरे लिए समाप्त नहीं हुआ था। मैं आज भी उसी बवंडर में फसा हुआ हूॅं, और शशि का कहीं अता पता नहीं है। शशि वामअतिवादी रूझान वाली थी, नहीं थी, यह मेरे लिए चिन्ता की बात तो थी पर उससे अधिक चिंता की बात थी उसने मुझसे इस तथ्य को छिपाया। मुझे पता था कि शशि का प्रकरण पत्नी को बताना मेरे लिए घातक होगा सो मैने उन्हें शशि के बारे में कुछ नहीं बताया कि वह कहां है, रापटगंज में क्यों नहीं है। अगर बता देता तो मेरी रचनाकारिता की चमड़ी उघड़ जाती.. ‘हां हां और कुछ तो कर नहीं पाये, अब जाइए जेहल और खेलिए वहीं अक्षरों का खेल।’ उम्र के ढलान पर मैं एक बार फिर असहाय तथा असमर्थ दुनिया का आदमी बन चुका था। जिसके सामने तो होती है पूरी दुनिया पर अपने में डूबने और उतराने के सिवाय करने तथा सोचने के लिए कुछ नहीं होता। मैं वस्तुतः अपने में डूब गया था फिर तो.... शशि के अलावा मेरे गांव के लोगों के साथ, लौंगी, बी.डी.ओ. लाजवंती ही नहीं वह महिला भी मुझे नोचने, चोथने लगी जो मेरे उपन्यास में फसी पड़ी थी। इन सभी की अलग, अलग दुनिया थी। अपने पुरखों की दुनिया मुझे कभी रास नहीं आयी पर मैं उससे अलग नहीं हो सका किसी न किसी तरह उससे जुड़ा ही रहा। जिन लोगों में मैंने समाज बदल की उमंग देखी थी पर वहां भी केवल छलावा ही था और वह खुद को बदल लेने को ही समाज बदल साबित करना चाहता थे। मेरे गांव की खेती किसानी देखने वाला किसुन था जो मुझसे घर बनाने के लिए एक बिस्वा जमीन मांग रहा था। उसके लिए ‘इन्दिरा आवास’ मैंने ही मंजूर करवाया था जिसे बनवाने के लिए उसके पास जमीन नहीं थी। उसे जमीन देना जरूरी था और मैंने उसे दिया भी पर वह देना, न देना था क्योंकि एक बिस्वा जमीन देने की क्षमता भी अब मेरे पास नहीं थी। जिसे सहज रूप से मैं किसुन को दे देता, जमीन तो उसे दे दिया पर बहुत माथा पच्ची के बाद यह जानते हुए कि जमीन किसी के बाप नहीं होती फिर भी मैं डूबा हुआ था वसीयत और मालिकाने की गणित में। प्राकृतिक संसाधनों में सभी की हिस्सेदारी होनी चाहिए, इस बाबत मेरे विचार मुझे छल रहे थे फिर भी हसीन लग रहे थे। हालांकि मैं जानता था कि जो जगह, जमीन मेरे पास विरासत के जरिए आयी है, जिसका मैं मालिक बना बैठा हूॅं वह मेरी नहीं, प्रकृति की है। उस पर सारी दुनिया का प्राकृतिक हक है फिर भी उसे मैं किसुन को बहुत ही सहजता से नहीं दे पाया। जबकि दे देना चाहिए था, उसमें सोचने गुनने जैसी कोई बात ही नहीं थी। समय का हेर फेर कहा जाये या और कुछ, अपने में गोता लगाना भी सहज नहीं होता, अगर सहज होता तो मैं भी मुस्करा रहा होता। वैसे मेरे पास मुस्कराहटों में डूबने के लिए मौके थे और मैं उनमें डूब भी सकता था पर मुस्कराहटें मुझसे काफी दूर चली जाती थीं.. लगता था कि छिन गई हैं.. मुझे क्या पता था कि उम्र के उतराव पर मेरे लिए हर ओर बिडंबनाएं बिछ जायेंगी। मैं ही नहीं लौंगी तथा लाजवंती भी शशि के लिए परेशान थीं, शशि से लगाव रखने वालों के फोन आते और मैं हर बार उन्हें एक ही जबाब देता, मुझे नहीं मालूम कि शशि कहां है और कब तक आयेगी, आयेगी भी या नहीं आयेगी। पुलिस चाहे जो कहे मुझे यकीन नहीं हो रहा कि शशि वामउग्रवादी थी तथा सोनभद्र में वामउग्रवाद के फैलाव के लिए आयी थी। वह जंगल को जंग का मैदान नहीं बना सकती, वह तो जंगल का हरापन देख कर हरा हो जाती थी, ओबरा की टूटती पहाड़ियां देखकर सिसक पड़ती थीं, पेड़ों का खुत्थ देखते ही रोने लगती थी मानों उसे ही दो हिस्सों में काट दिया गया हो। वह तो खुद एक कविता थी, भला कविता उग्रवादी कैसे हो सकती है? वह दिन भला मैं कैसे भूल सकता हूॅ, शशि मेरे साथ जंगल घूमने गई थी, अंधेरा होते ही उसने मुझसे कहा था... ‘लौटना चाहिए अब, दिन ढलान पर है, कई मील जंगल पार करना है, अब कुछ भी नहीं देखना, इससे अधिक कुछ देखा भी तो नहीं जा सकता, अधिक देखने की लालच से बचना ही सर्वोŸाम बचाव है क्योंकि फिर जंगल हमें देखने लगेगा। आप तो जानते ही हैं जब प्रकृति दिल के गहरे में उतर कर किसी को देखने, परखने लगती है फिर तो दृढ़ताएं टूट जाती हैं.. दृढ़ताएं टूट जाने पर जंगल हम पर हसने लगेगा तथा उपहास उड़ाएगा। वैसे हसियां मुझे उŸोजित नहीं कर पातीं, न ही डरा पाती हैं, फिर भी..जंगल से बाहर हमें निकलना ही है, सो जंगल का अवांक्षित उपहास लेकर निकलना ठीक नहीं, ‘चलिए लौट चलें’ फिर हम जंगल से लौट आये थे।
कन्फेसन
शशि के बारे में कोई खबर नहीं थी। एक महीना बीत गया फिर भी शशि के साथ बिताए दिन मुझे सोने नहीं दे रहे थे। ऐसा भला कैसे हो सकता है मेरे साथ, शशि तो मेरे लिए केवल एक खूबसूरत दृश्य भर थी। दृश्य का स्मृति बन जाना मेरे लिए अचरज भरा है। मेरे लिए इस अचरज को समझ पाना मुश्किल है। शशि की स्मृतियों के एक, एक पल ताजे दिख रहे हैं मानों उनमें मैं डूब ही नहीं, तैर भी रहा हूॅ। मेरी आंखों में आज भी शशि किसी मछली की तरह तैर रही है और मैं समझ नहीं पा रहा हूॅं कि पानी में मछली की तरह तैरने वाली सुकुमार व सुघड़ महिला वामअतिवादी हो सकती है। नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। अब तो शशि यहां है भी नहीं, जाने कहां, तथा किस हाल में हो, फिर भी उसकी स्मृतियां मेरे लिए अद्भुत कथानक जैसी लग रही हैं, उसकेे एक, एक हिस्से मेरी ऑखों में तैर रहे हैं. उसके सखी, सखा वाले भाव को मैं भूल नहीं पा रहा हूॅ, पता नहीं क्या हो गया है मुझे। संभव है वह फिर रापटगंज आ जाये पर नहीं, यह महज कल्पना है, वह यहां नहीं आने वाली, पर मैं सोच रहा हूॅ... क्या शशि वस्तुतः वामउग्रवादी थी? यह सवाल मुझे लगातार परेशान करता रहा है। भले ही वह वामउग्रवादी रही हो पर मेरा मन नहीं मानता। वह कहां है? क्या कर रही है? कोई सूचना भी तो नहीं मिल रही। उसके मूल निवास का पता होता तो वहां जाकर उसकी खोज खबर लेता पर वह भी नहीं पता। विवश होकर मैं खुद में गोते लगाने लगा था। सोच रहा था इस साल गॉव की खेती कराने के बारे में, पत्नी भी तैयार थीं कि अपनी खेती कराना हर हाल में ठीक रहेेगा। खेती कराने न कराने के बाबत हमलोग आपस में बातें कर ही रहे थे कि शशि के संस्था के मंत्री का फोन आया.. संस्था के मंत्री का फोन...निश्चित ही कुछ विशेष होगा, मैने फोन उठाया... दुआ सलाम के बाद मंत्री जी नेे मुझे बताया कि ‘शशि जी के पति का निधन हो गया है। इस समय वह अपनी ससुराल में हैं, कर्मकांड बीत जाने के बाद रापटगंज जायंेगी, शशि के मकान का किराया संभव हो तो आप चुकता कर दीजिएगा।’ मैं तो सूचना सुनते ही सहम गया, यह क्या हुआ? सहमकर मैंने उनसे पूछा. ‘जी, क्या बोल रहे हैं? कैसे निधन हुआ शशि के पति का? का हुआ था उन्हें, क्या शशि ससुराल में है?’ एक ही सांस में कई सवाल मैंने उनसे पूछा.. ‘जी उन्होंने आत्महत्या कर लिया था, इस समय शशि जी ससुराल में हैं’ मैं चौंक उठा... ‘आत्महत्या, काहे, का बात थी, वे तो अलमस्त मिजाज के थे। उधर से जबाब आया...
‘जी थे तो अलमस्त, पर...’ संस्था के मंत्री चुप हो गया
‘पर क्या? ..ऐसी कौन सी बात थी, साफ, साफ बतायें’ मैंने पूछा ‘उन्हें एड्स हो गया था, इसकी जानकारी होते ही उन्होंने आत्महत्या कर लिया।’ ‘क्या एड्स! कैसे जानकारी हुई कि उन्हें एड्स हो गया है?’ मैंने पूछा संस्था के मंत्री ने जो बताया वह मुझे अचरज में डालने वाला था। ‘जानकारी काहे नाहीं होती, वे देह के करतबों का एक क्लब चलाते थे, जिसमें उनके कुछ मित्र तथा उनकी पत्नियां मेम्बर थीं। उनके मित्र तथा उसकी पत्नी को एड्स हो गया है तथा दोनों एड्स का इलाज करा रहे हैं। अस्पताल में भर्ती़ हैं। उनके मित्र को दो बोतल खून चढ़ाया जाना था। वे खून देना चाहते थे। उनके खून की जांच हुई तब पता चला कि वे भी एड्स की जकड़ में हैं तथा एड्स आखिरी चरण में है। उनके रोग के बारे में उनके तथा मित्र के घर वालों को भी जानकारी मिल गई, वे अस्पताल में ही थे। किसे नहीं पता कि एड्स काहे होता है? शर्म के मारे उसी दिन वे सदमें में चले गये। किसी तरह उन्होंने दिन बिताया और रात में जहर खा लिया। घर के लोग उन्हें अस्पताल ले गये पर वे तो रास्ते में ही मर चुके थे। ‘शशि का फोन नहीं मिल रहा...’ मैंने फिर पूछा ‘नहीं मिलेगा फोन, शशि ने अपना मोबाइल तोड़ दिया है, इस समय उसकी दिमागी हालत ठीक नहीं है। मुझे भी कुछ न मालूम होता। मुझे तो शशि के बारे में मेरे एक मित्र ने बताया, जिन्होंने शशि को मेरी संस्था से जुड़वाया था। खबर सुनते ही मैं शशि के घर गया, उसे समझाया बुझाया, आज आपको फोन कर रहा हूॅ, संभव हो तो आप भी उससे मिल लें’ मैं तो खबर सुनते ही चेतनाशून्य हो गया, यह का हुआ शशि के साथ, पति से अनबन थी तो का हुआ, किसी न किसी दिन बात बन जाती पर पति का निधन, कैसे सहन करेगी शशि? कहीं उसे भी एड्स न हो गया हो। बहरहाल उसके घर चलना चाहिए। पत्नी भी अवाक... उन्होंने पूछा... ‘का शशि के पति ने आत्महत्या कर लिया? काहे, का बात थी? ‘उन्हें एड्स हो गया था’ एड्स हो गया था, तो का हो गया, यह तो पहले गुनना चाहिए था, फेर आत्महत्या से रोग खतम होगा का। लौंगी को भी तो एडस हुआ है, वह तो आत्महत्या नहीं कर रही, लड़ रही है समय से...उन्हें लड़ना चाहिए था रोग से।’ मैंने तत्काल लौंगी तथा लाजवंती को सूचित किया। लाजवंती रापटगंज में ही थी, लौंगी भी देर रात तक रापटगंज आ गयी उसके साथ बी.डी.ओ. भी था। लौंगी तो शशि के पति की मृत्यु के बारे में सुनते ही बेहोश जैसी हो गयी.. उसने माथा पकड़ लिया.. ‘का हो गया बहिन जी के साथ, ठीक है पति से शशि बहन जी नाराज थीं, पर किसी न किसी दिन तो सब ठीक हो ही जाता।’ ‘का उनके पति को एडस हो गया था?’ लौंगी व लाजवंती दोनों ने चकराकर पूछा.. ‘हां शशि की संस्था का मंत्री तो यही बता रहा था, अब तो वहां चलने पर ही पता चलेगा।’ लाजवंती मुखर थी.. ‘पता नाहीं कइसे लोगन को एडस हो जाता है, वह भी आज के जमाने में, देहीं पर लोटना है तो लोटो पर कुछ जोगाड़ तो कर लो, एक से एक जोगाड़ हैं। पढ़े लिखे तो हम अनपढ़ों से भी गंवार हैं। बाऊजी चलिए हमलोग शशि बहिन जी के इहां चलेंगे..’ लौंगी भी..बोल उठी.. हां, हां बाऊजी, चलिए हम भी चलेंगें। लौंगी ने तत्काल अपने साहब से पूछा..... ‘का साहब! आपउ चलेंगे शशि बहिन जी के इहां? देखिए एही से हम आपउ को रोकते हैं कि हमय साहब छोड़ो, कहीं कुछौ आपउ को हो गया तो...’ बी.डी.ओ. लौंगी की बात पर मुस्करा दिया, ‘जो होना होगा, हो जायेगा, ओसे काहे डरना?’ लौंगी तथा लाजवंती नहीं जानती थीं कि शशि के पति ने देह का कल्पित स्वर्ग बना लिया था। उस स्वर्ग में उसके कुछ मित्र तथा मित्राणियां किसी पर्व की तरह देहोत्सव मनाया करते थे। उस उत्सव में पूरे उन्माद के साथ देह बोलती थी, गुर्राती थी। शशि ने पति के कथित स्वर्ग का पूरी क्षमता के साथ विरोध किया था, पर उसका पति तो स्वर्ग का आकांक्षी था। उसी ने उस स्वर्ग को बनाया था, सो काहे मानता? उसने शशि के विरोध को नपंुसक नैतिक काम मान कर कुचल दिया। अन्ततः शशि ने उसे तथा उसके घर को छोड़ दिया और रापटगंज चली आयी। लौंगी तथा लाजवंती दोनों औरतें थीं, दोनों सदमें में थीं। लौंगी तथा लाजवंती दोनों ने विवाह नहीं किया था पर दोनों शशि के विधवा होने से दुखी थीं उन्हें लग रहा था कि एक रिश्ते की मृत्यु हो गयी है। रिश्ता जब टूटता है तो बहुत कुछ टूट जाता है। बी.डी.ओ. की कार से हमलोग सुबह ही शशि से मिलने के लिए निकल पड़े थे। पांच घंटे की यात्रा के बाद हमलोग शशि के आवास पर थे। तेरही दो दिन दिन बाद होनी थी। घाट वाला कार्यक्रम निपट गया था। छुरी लोटा शशि के ससुर ने लिया था। उन्हें ही मृत्यु संस्कार कराना था। शशि का परिवार खुला, खुला था। सभी मिलनसार थे। हमलोगों के पहुचने की खबर शशि को मिल चुकी थी। कुछ देर बाद शशि घर में से बाहर निकली। ऐसे समय में घर से बाहर निकलना सहज भी तो नही होता वह भी घर की बहू के लिए। वह मुर्झा चुकी थी, वैधव्य ने उसे जकड़ लिया था। मैं तो उसे देखते ही सुन्न... शशि हमलोगों को देखते ही रोने लगी...वह मेरे पांवों पर गिर पड़ी... ‘बाऊजी! यह सब का हो गया, चले गये हमैं छोड़कर, थे तो भरोसा था कि मिलेंगे एक न एक दिन, अब का करें हम। हम आपको भी कुछ नाहीं बता सके इसके बारे में, ससुर जी का फोन मिला भागे चले आये इहां। मुझे बताया भी नहीं गया कि वे अस्पताल में हैं। वे दस दिन तक अस्पताल में पड़े थे। ऐसा नहीं था कि मैं उनकी सेवा नहीं करती, पति के नाते कुछ करती न करती मित्र के नाते तो करती ही, उनके लिए कुछ भी बाकी न उठा रखती। एक चिठ्ठी छोड़ गये हैं मेरे नाम, चिठ्ठी क्या है, मृत्युशय्या पर पड़े आदमी का कनफेसन है, एक तरह से वह चिठ्ठी मृत्यु का दस्तावेज है...उसके एक, एक शब्द रो रहे हैं। उसे पढ़ पाना मेरे वश का नहीं....’ लौंगी तथा लाजवन्ती भी शशि के साथ रोने लगीं, रोने को तो मैं भी रो रहा था पर बाहर से नहीं, अन्तर्मन से। मुझे तो समझ ही नहीं आ रहा था कि शशि से का बोलें, मैं खुद भी सुन्न था, मुझे यकीन था कि किसी न किसी दिन शशि अपने पति से जुड़ेगी जरूर, दोनों के बीच की दूरियां खत्म हो जायेंगी पर सब गड़बड़ हो गया, अनहोनी के खेल ने सब कुछ बिगाड़ दिया। किसी तरह मैंने शशि को समझाया... ‘धीरज से काम लो शशि, होनी को भला कौन टाल सकता है? तूं तो साहसी है, साहस न तोड़ो, फिर हम लोग तेरे साथ हैं ’ लौंगी तथा लाजवंती ने भी शशि को समझाया बुझाया.. ‘हमैं देखो बहिन जी, का है हमरे पास, रोग लेके घूम रहे हैं, अब मरे तब मरे की हालत है बहिन जी! पर लड़ रहे हैं जिनगी से, अउर अन्त तक लड़ेंगे बहिन जी।’ लाजवंती ने भी शशि को समझाया.. ‘अब न रोइए बहिन जी आगे देखिए, अबही बहुत काम करना है आपको’ कुछ देर बाद हमलोग वहां से रापटगंज के लिए निकल लिए। रास्ते भर मैं शशि की बातों में था...मुझे याद है कि शशि ने अपने पति को चेताया था... ‘समझ लो कि मैं खिलौना नहीं हूॅू। चाहे जब और जैसे खेलो और दूसरे को खेलने दो। उसने पति को जोरदार ढंग से बेड के किनारे धकेल दिया और चीखते हुए दुबारा कहा... ‘अच्छा होगा कि रुक जाओ और खुद को नियंत्रित कर लो, तुम सिर्फ और सिर्फ एक यंत्रमानव हो और तुम्हें उसी तरह रहना भी चाहिए। तुम्हें आज से यह बात गांठ बांध लेनी होगी कि शशि यंत्रमानव नहीं है, वह सोचती है और सोच सकती है कि उसे क्या करना चाहिए।’ ‘मैं अच्छी तरह से समझती हूॅं कि तुम्हारे लिए रिश्ते की पवित्रता का कोई अर्थ नहीं..यदि तुम सोचो कि मैं तुम्हारे घर में हूॅं, मजबूर हूॅू इसलिए तुम मेरे मन एवं तन के साथ मनमानी कर सकते हो तथा किसी से करवा सकते हो, तो ऐसा कभी नहीं सोचना। मैं अपनी सुरक्षा करना जानती हूॅ. आखिरी बार मैं तुमसे कह रही हूॅं कि मेरे कमरे से अभी और इसी समय निकल जाओ बिना देर किए, मैं तुम्हें अपने कमरे से बाहर देखना चाहती हूॅं..’ अगर शशि के पति ने उसकी चेतावनियों से सबक लिया होता तो शायद संभल जाता पर नहीं, वह तो अपने मन का मालिक था। शशि दस दिन बाद रापटगंज आयी। एड्स जागरूकता के कार्यक्रम को छोड़ना उसने उचित नहीं समझा। उसके ससुर ने भी संस्था का काम करते रहने के लिए अनुमति दे दिया था, फिर बिना कुछ कमाई के बेरोजगार रहना भी तो ठीक नहीं। एक दिन हमलोग एस.पी. के कार्यालय पर थे। एस.पी. को मेरा नाम याद था, बिना देर किये उसने मुझे बुला लिया। ‘कहिए कैसे आना हुआ?’ एस.पी. ने विनम्रता से पूछा ‘बस आपसे मिलने।’ ‘नहीं, ऐसा तो नहीं, बिना किसी प्रयोजन के तो आप नहीं आने वाले, वह भी रापटगंज से सात किलोमीटर दूर। बताइए मेरे लायक कोई काम..’ ‘जी काम कुछ भी नहीं है। ये शशि जी हैं, जिनके बारे में जांच पड़ताल के लिए आपने मुझे तलब किया था।’ ‘तो उस प्रकरण को आप अभी भूले नहीं हैं, भूल जाइए उसे।’ ‘जी उस प्रकरण को भला कैसे भूला जा सकता है, उसे तो मैं कभी नहीं भूल सकता।’ ‘अरे, उसमें क्या है, बात आई, गई खतम हो गई, विभाग को भी मालूम हो गया है कि शशि नाम की वह दूसरी महिला थी जो दिल्ली की रहने वाली थी। वह वामउग्रवादी थी, उसे पुलिस ने पकड़ लिया है। जांच हो चुकी है।’ ‘इतनी बड़ी बात को भी आपने मुझे बताना जरूरी नहीं समझा?’ मैंने एस.पी. से कहा ‘जरूरी तो समझा था, पर बता नहीं पाया, क्षमा करें, मुझे ध्यान ही नहीं पड़ा।’ महोदय! आपसे एक निवेदन है, अगर बुरा न मानें तो कहें...’ ‘बोलिए निवेदन नहीं, आदेश कीजिए’ ‘नहीं महोदय! आदेश नहीं निवेदन। निवेदन है कि जिस तरह आपने मुझे कोतवाल के द्वारा पकड़वा लिया एक ऐसी सूचना पर जिससे मेरा कोई जुड़ाव नहीं था, कृपया कभी भी मेरे जैसे अक्षबटोर को ऐसी सूचनाओं पर न पकड़वाइएगा। आप तो जहां रहेंगे आला अधिकारी ही रहेंगे। पुलिस की धमक से मेरे घर की दीवारंे आज भी कांप रही हैं, आंगन, बारामदा तथा सेहन हिल रहे हैं, मेरे पोता, पोती का बचपन खंडित हो चुका है और पत्नी तथा बहू तो जैसे संज्ञाशून्य हो गये हैं। शशि जी भी आहत हैं, इनके पति का स्वर्गवास हो गया है। दो दिन पहले ही ये अपने घर से वापस आई हैं और आपके सामने हैं... इन्हें देख व परख लीजिए...’ ‘जी आप ठीक बोल रहे हैं, हमलोगों की विवशता है कि हम सूचनाओं पर चलें, उसकी जांच पड़ताल करें। यह जो सूचनाओं का जाल है नऽ, वह हमें मनुष्य ही नहीं रहने देता। एक अधिकारी सूचनाओं का गोदाम होता है और गोदाम में तो चूहे भी लगते हैं, बस यही समझ लीजिए चूहे लग गये थे इसीलिए मुझसे गलती हो गयी। शशि ने उसी समय मुझसे धीरे से कहा... ‘चलिए लौट चलें,’ बात हो गई नऽ’ फिर हम पोस्टर बनते अपने कस्बे रापटगंज में लौट आये। लौंगी तथा लाजवंती दोनों शशि के कार्यालय पर हमलोगों की प्रतीक्षा कर रही थीं.। हम लोग जब कार्यालय पर पहंुचे तब वहां शशि के कुछ कार्यकर्ता भी आ चुके थे, बात पूरे रापटगंज में पसर गई थी कि शशि के पति का देहावसान हो गया है। सभी अपने अपने तरीके से दुख व्यक्त कर रहे थे शशि थी कि गुमसुम थी, खुद में डूबी। सभी लोगों के जाने के बाद लौंगी ने शशि को पकड़ लिया और.. ‘बहिन जी एक बात बोलें बुरा नहीं मानिएगा, चलिए अजुअय खूने कऽ जांच करा लीजिए।’ शशि को भी लौंगी का सुझाव अच्छा लगा। लौंगी व लाजवंती के साथ शशि खून जांच कराने के लिए अस्पताल चली गई। जॉच से पता चला कि शशि एड्स से मुक्त है। काश! शशि के पति ने पहले ही कन्फेश कर लिया होता कि वह जो वांक्षित स्वर्ग बना रहा है, वह स्वर्ग नहीं यमराज का घर है तो वह जीवित रहता, पर देह के मनोरमों ने उसे पागल बना दिया था।...फिर तो वही होना था जो उसके साथ हुआ। शशि एड्स से तो मुक्त है फिर भी संबधों की यातनाओं से मुक्त नहीं हो पायी है। मुक्त होती तो चेहरे की चमक गायब न होती, अब उसके चेहरे पर वह चमक नहीं जिसे मैंने कभी देखा था। उसके चेहरे पर देहात की अनगढ़ पगडंडियों का कब्जा हो चुका है, और उसकी चहचहाहटों को समय न निगल लिया है। एक दिन मैंने शशि से कहा था... ‘देखो शशि जितना जरूरी होता है समय से टकराना, उससे कम जरूरी नहीं होता समय को दुलारना, संभव हो तो बीच का रास्ता निकाल लो, वह तुम्हारे लिए उचित होगा? बीती घटनाओं को पीठ पर लाद कर चलना ठीक नहीं’शशि रोने लगी थी। ‘कैसे भूल जाऊं, भूलना आसान भी तो नहीं’ कहते हुए शशि और रोने थी, और मैं अवाक... किसी तरह मैंने उसे समझाया था... ‘देखो शशि मुझे अपना ही समझो, मेरा घर तुम्हारे लिए सदैव खुला रहेगा, जो तुमसे छिन चुका है उसका कोई विकल्प नहीं पर उस छिने हुए को सहेजते हुए तुम बहुत आगे बढ़ सकती हो और तुम्हें बढ़ना भी चाहिए, मैं तुम्हारे साथ हूं’ अब तो शशि को देखते ही मैं संज्ञाशून्य हो जाता हूं, एक शशि वह थी जिसके साथ मैं जंगल की तरफ गया था और एक शशि यह है जिसे में रोज ही देख रहा हूं...एक ही देह और एक ही मन फिर भी बदल गया सारा कुछ, एक ही कविता, एक ही पाठ फिर भी अर्थ अलग, अलग, अचानक मेरे मन में अचरज उछल पड़ा... शशि तुम तो देहधारी कविता हो, कविता हो शशि, खुद में खुद को तलाशती, गाती, गुनगुनाती अब बिलापती।