हिंदी कविता (आदिकालीन एवं भक्तिकालीन) सहायिका/दोहे/(1)गोरी सोवे सेज पर, मुख पर डारे केस।

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सन्दर्भ[सम्पादन]

प्रस्तुत 'दोहा' खड़ी बोली के प्रवर्तक आदिकालीन कवि अमीर खुसरो द्वारा रचित हैं।

प्रसंग[सम्पादन]

गोरी सोवे सेज पर...रैन भई चहुं देस।।

यह दोहा खुसरो ने अपने गुरु निजाम की मृत्यु पर बोला था, जिसमें उन्हें काल का ज्ञान भी हुआ तथा गुरु की मृत्यु की पीड़ा भी महसूस हुई। वे कहते हैं-

व्याख्या[सम्पादन]

गोरी सोवे सेज पर...रैन भई चहुं देस।।

खुसरो अपने प्रियतम की मृत्यु-शय्या पर बैठकर बोले मेरे निजाम ऐसे लग रहे है।, जैसे कोई गोरी सुख की सेज़ पर अपने मुख पर केश-राशि डाले सो रही हो अर्थात् उनका अपने प्रियतम से मिलन हो गया है। इस दशा को देख वो स्वयं को कहते हैं, खुसरो अब अपना भी अपने प्रियतम के घर चलने का समय आ गया है। बहुत रात हो गई है। इस संसार में बहुत समय बीत गया है, अब चलने का समय है।

विशेष[सम्पादन]

1. खड़ी बोली है। 2. उर्दू के शब्द भी आए हैं। 3. गुरु निज़ामुद्दीन औलिया की वंदना की है। 4. रहस्य-भावना है। 5. अद्वैत-भावना है। 6. अमीर निर्गुणोपासक हैं। 7. प्रसाद-गुण है। 8. 'सौवे सेज' अनुप्रास अलंकार है। 9. दोहा छंद है। 10. प्रसाद-गुण है। 11. प्रतीकात्मकता है। 12. शांत रस है। 13. आध्यात्मिकता है।

शब्दार्थ[सम्पादन]

सेज - शय्या डारे - डाले केस - बल रैन - रत चहुँ - चारो