हिंदी कविता (आदिकालीन एवं भक्तिकालीन) सहायिका/भ्रम विघौसण कौ अंग/(१)कबीर पाँहन केरा पूतला......।

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सन्दर्भ[सम्पादन]

प्रस्तुत दोहा 'कबीरदास' द्वारा रचित है। यह उनके 'कबीर ग्रंथावली' में ' भ्रम विद्यौसण को अंग' से अवतरित है।

प्रसंग[सम्पादन]

इसमें वे कहते हैं कि लोग भ्रम में अपना जीवन जीते हैं। वे अंधविश्वास से ग्रसित हैं। वे अपनी अक्ल से काम नहीं लेते हैं। इसीलिए वे बाद में पछताते हैं। वे इसी बात को इसमें कहते हैं-

व्याख्या[सम्पादन]

पाहण केरा पूतला......ते बूड़े काली धार।।

हे मूर्ख मनुष्य ! तू अपने दिमाग से काम क्यों नहीं लेता है ? तू इस पत्थर के भगवान को पूजता है, जो पत्थर का बना हुआ है। यह अपने में निर्जीव है। इससे तुझे क्या मिलेगा? हय तो अपने में पत्थर का केवल पत्थर है। जो लोग इस विश्वास के साथ जी रहे हैं कि इसे पूजने से हमारा भला हो जाएगा वे अपने में मूर्ख हैं। इससे उन्हें कुछ भी मिलने वाला नहीं है। ऐसे लोग ही काली धारा में डूबते हैं। जिससे कोई भी उन्हें निकाल नहीं सकेगा। अर्थात् वे अंधकार-रूपी कुएँ में डूबकर अपने को नष्ट कर रहे हैं। इससे उनका कुछ भी भला नहीं हो सकेगा।

विशेष[सम्पादन]

इसमें कबीर ने बाह्यडंबर की पूजा का विरोध किया है। वे मन की आंतरिकता पर विशेष बल देते हैं। वे मूर्ति-पूजा के घोर विरोधी हैं। भाषा में स्पष्टता एवं व्यंग्य है। उपदेशात्मक शैली है। सधुक्कड़ी भाषा है। मिश्रित भाषा है। 'दोहा' छंद है। बिम्बात्मकता है।

शब्दार्थ[सम्पादन]

पाहण-पत्थर। केरा = के। पूतला = पुतले। करि = करते हैं। पूजै = पूजा भजते हैं। करतार = भगवान्, सृष्टि-कर्ता। इही = इसी। भरोसै = विश्वास। कालीधार = काली धारा। बूड़े = डूबना। धार = प्रवाह, धारा।