हिंदी कविता (आदिकालीन एवं भक्तिकालीन) सहायिका/विनय पत्रिका/(२)केशव ! कहि न जाइ का कहिये।

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सन्दर्भ[सम्पादन]

प्रस्तुत पद भक्तिकालीन सगुण काव्य-धारा के राम-भक्ति कवि तुलसीदास द्वारा विरचित 'विनयपत्रिका' से अवतरित है।

प्रसंग[सम्पादन]

कोउ' के स्थान पर आचार्य शुक्ल और पं. रामेश्वर भट्ट ने 'करि' पाठ माना है।

व्याख्या[सम्पादन]

केशव , कहि न जाइ का कहिये ।

देखत तव रचना विचित्र अति ,समुझि मनहिमन रहिये ।

शून्य भीति पर चित्र ,रंग नहि तनु बिनु लिखा चितेरे ।

धोये मिटे न मरै भीति, दुख पाइय इति तनु हेरे।

रविकर नीर बसै अति दारुन ,मकर रुप तेहि माहीं ।

बदन हीन सो ग्रसै चराचर ,पान करन जे जाहीं ।

कोउ कह सत्य ,झूठ कहे कोउ जुगल प्रबल कोउ मानै ।

तुलसीदास परिहरै तीनि भ्रम , सो आपुन पहिचानै ।

गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि हे केशव! क्या कहें, कुछ कहा नहीं जाता? तुम्हारी इस विचित्र रचना को देखकर मन में ही सभझ कर र जाता हूँ-कुछ कह नहीं पाता हूँ। इसका निर्माण किसी शरीरहीन (निराकर) चित्रकार ने किया है। वह भी बिना रंगों की सहायता के शून्य अथवा आकाश की दीवार पर (कितनी विचित्र है-यह सृष्टि?)। तात्पर्य यह है कि ब्रह्म (निराकार चित्रकार) ने माया, (शून्य, भ्रम) रूपी दीवार पर सृष्टि-रूपी चित्र ऐसा बनाया है, जिसमें रंगों का प्रयोग दृष्टिगोचर नहीं होता है। फिर भी यह मनोहर एवं आकर्षक है। अन्य चित्र धोने से मिट जाते हैं परंतु यह इतना विचित्र है कि धोने से भी नहीं मिटता। भाव यह है कि कर्म-रूपी जल से पंच भौतिक शरीर नष्ट नहीं होता और विभिन्न योनियों में घूमता रहता है। साधारण चित्र को मृत्यु का भय नहीं होता; परंतु इन चित्रों को सदैव मृत्यु का भय सताता रहता है। साधारण चित्रों को देखकर सुख प्राप्त होता है परंतु इन चित्रों (सांसारिक प्राणियों) को देख कर दुख होता है। इसका आशय यह है कि जब प्राणी को अपने भौतिक शरीर के नाश का ज्ञान होता है तो पश्चाताप होता है। और उसे तीव्र दख की अनुभूति होती है, क्योंकि वह अभी तक है। इसे सत्य समझ कर धोखे में पड़ा था।

सूर्य की किरणों से उत्पन्न म्रग-तृष्णा के जल मे एक मगर रहता है। वह मगर मुखहीन है फिर भी जड़ और चैतम्य जो भी जल पीता है उसे खा जाता है। तात्पर्य यह है कि मृग-तृष्णा मृग को वास्तव में जल प्राप्त नहीं होता है। वह जल के मोह में दौड़ता-दौड़ता थक जाता है। इसी प्रकार सांसारिक प्राणी संसार में मृगतृष्णा के समान सुख की प्राप्ति में लगा रहता है। उसे सुख तो नहीं मिलता है, परन्तु काल-रूपी मगर उसे निगल जाता है। कोई उस चित्र (सृष्टि) को सत्य कहता है, कोई मिथ्या कहता है और कोई कहता है कि सृष्टि सत्य भी है और मिथ्या भी है, परंतु तुलसी के अनुसार यह तीनों मत भ्रमात्मक हैं। जो इन पर विश्वास नहीं करेगा वही अपने आत्म-स्वरूप को पहचान सकेगा आत्म-स्वरूप को जानने के लिए भगवान की भक्ति अपेक्षित है।

विशेष[सम्पादन]

1. "तुलसिदास परिहरै तीनि भ्रम।"

(अ) पूर्व मीमांसा वाले अर्थात् द्वैतवादी और विशिष्ट-द्वैतवादी- विश्व को कर्म प्रधान मानने के कारण सत्य मानते हैं।

(ब) अद्वैतवादी वेदान्ती-इस जगत को मिथ्या कहते है।

(स) नैयायक तथा सांख्य-वालों का मत है कि संसार सत्य भी है और मिथ्या भी। निंबार्काचार्य इसी मत को मानते थे।

परंतु तुलसीदास जी किसी मत को स्वीकार नहीं करते हैं उनके अनुसार मत मतान्तर से दूर रह कर शुद्ध भाव से भगवान की भक्ति करनी चाहिए। सिद्धांत मनुष्य को सही रास्ता नहीं दिखा पाते है। दार्शनिक दृष्टि से यह पद बहुत महत्त्वपूर्ण है।

2. बदनहीन-काल अदृश्य होता है। इसी कारण काल-रूपी मगर को मुखहीन कहा गया है,

3. 'शून्य...चित्र' में व्यतिरेक और विभावना तथा 'धोये...मिटै न' में विरोधाभास की छटा दर्शनीय है।

4. गोस्वामी जी गीता के इस सिद्धांत का प्रतिपादन करते हैं-

"सर्व धर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।"

5. ब्रजभाषा है।

शब्दार्थ[सम्पादन]

तनु = शरीर। चितेरे = चित्रकार। रविकर नीर = सूर्य किरणों का जल अर्थात् मृग-तृष्ण का जल, यहां भ्रम से तात्पर्य है। मकर = मगर। चराचर = चैतन्य और जड़। जुगल = दोनों अर्थात् सत्य और मिथ्या। आपन = आत्मा।