हिंदी कविता (छायावाद के बाद)/देश है हम राजधानी नहीं

विकिपुस्तक से
Jump to navigation Jump to search
हिंदी कविता (छायावाद के बाद)
 ← पगडंडी देश है हम राजधानी नहीं पास आना मना दूर जाना मना → 
देश है हम राजधानी नहीं
शंभुनाथ सिंह

देश हैं हम
महज राजधानी नहीं ।

हम नगर थे कभी
खण्डहर हो गए,
जनपदों में बिखर
गाँव, घर हो गए,
हम ज़मीं पर लिखे
आसमाँ के तले
एक इतिहास जीवित,
कहानी नहीं ।

हम बदलते हुए भी
न बदले कभी
लड़खड़ाए कभी
और सँभले कभी
हम हज़ारों बरस से
जिसे जी रहे
ज़िन्दगी वह नई
या पुरानी नहीं ।

हम न जड़-बन्धनों को
सहन कर सके,
दास बनकर नहीं
अनुकरण कर सके,
बह रहा जो हमारी
रगों में अभी
वह ग़रम ख़ून है
लाल पानी नहीं ।

मोड़ सकती मगर
तोड़ सकती नहीं
हो सदी बीसवीं
या कि इक्कीसवीं
राह हमको दिखाती
परा वाक् है
दूरदर्शन कि
आकाशवाणी नहीं ।