हिंदी कविता (छायावाद के बाद)/पास आना मना दूर जाना मना

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हिंदी कविता (छायावाद के बाद)
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पास आना मना दूर जाना मना
शंभुनाथ सिंह

पास आना मना
दूर जाना मना,
ज़िन्दगी का सफर
कैदखाना बना!
चुप्पिओं की परत
चीरती जा रही
चीख-चीत्कार बेइंतहा दूर तक,
पत्थरों के बुतों में
बदलने लगे
सांस लेते हुए सब मकां दूर तक!
भागकर आ गये
हम जहाँ, उस जगह
तड़फड़ाना मना
सोना और आँसू
बहाना मना!

पट्टियों की तरह
जो बंधी जयं पर
रोशनी मौत की लोरियाँ गा रही,
अब दबे पाँव
तीखी हवा जिस्म पर
आग का सुर्ख मरहम लगा जा रही,
इस बिना नाम के
अजनबी देश में
सिर उठाना मना
सिर झुकाना मना
देखना और आँखें
मिलाना मना!

आँख अंधी हुई
धूल से, धुंध से
शोर में डूबकर कान बहरे हुए,
कोयले के हुए
पेड़ जो ये हरे
राख के फूल पीले सुनहरे हुए,
हुक्मरां वक्त की
यह मुनादी फिरी
मुस्कुराना मना
खिलखिलाना मना,
धूप में, चाँदनी में
नहाना मना!

भूमि के गर्भ में
आग जो थी लगी
अब लपट बन उभर सामने आ गयी,
घाटियों में उठीं
गैस की आँधियाँ
पर्वतों पर धुएँ की छटा छा गयी,
हर तरफ दीखती हैं
टंगी तख्तियां
आग का क्षेत्र है
घर का बनाना मना,
बांसुरी और मांदल
बजाना मना!