हिंदी कविता (छायावाद के बाद)/मन का आकाश उड़ा जा रहा

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हिंदी कविता (छायावाद के बाद)
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मन का आकाश उड़ा जा रहा है
शंभुनाथ सिंह

मन का आकाश उड़ा जा रहा
पुरवैया धीरे बहो।
बीती बातों पर सिर टेक कर
टेर रहा मन भूली नींद को,
धूप छाँह की गंगा-जमुना में
डुबो रहा हँस-हँस उम्मीद को।
अपना विश्वास लुटा जा रहा
पुरवैया धीरे बहो।

सूनेपन की बाँहों में फँस कर
रूक-रूक चलती दिन की साँस है,
बदरी की दीवारों में कस कर
करता कसमस फागुन मास है,
दोपहर का दीप बुझा जा रहा,
पुरवैया धीरे बहो।

हाड़-मांस की गठरी-सा जीवन
जीवित जैसे नंगी डाल है,
खड़-खड़ कर उड़ते खग से पत्ते
फैला भू पर झिलमिल जाल है,
आँखों का स्वप्न मिटा जा रहा,
पुरवैया धीरे बहो

मैं वह पतझर, जिसके ऊपर से
धूल भरी आँधियाँ गुजर गयीं,
दिल का खंडहर जिसके माथे पर,
अंधियारी साँझ भी ठहर गयी,
जीवन का साथ छुटा जा रहा,
पुरवैया धीरे बहो।