हिंदी कविता (छायावाद के बाद)/समूहगायन

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हिंदी कविता (छायावाद के बाद)
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समूह गायन
केदारनाथ सिंह

अंधेरे में गा रहे थे वे
मशाल जलाकर
कहना कठिन था कि जो छन रही थी रोशनी
अंधेरे के छिद्रों से
वह उनके कंठ से आ रही थी
या मशाल से
पर जल दोनों रहे थे

उनके गाने में
पत्थरों के टूटने की आवाजें थी
और एक नदी के सूखने की साँय-साँय
एक दबी हुई रुलाई
और एक गेहूंअन की ठनकार
एक साथ भरी थी उनके गाने में
जोकि असल में गाने
और चिल्लाने के बीच का
एक अजब संगीत था
जिसमें जितना उल्लास था
उतना ही गाढ़ा अवसाद
और एक गहरी-सी तोड़-फोड़
आत्मा के भीतर
और सारे वायुमंडल में

शायद वे गा रहे थे किसी देवता के लिए
जो किसी वृक्ष में रहता था
शायद पानी के लिए
जो किसी देवता के पास था
शायद अन्न के लिए
जो खुद एक देवता था
शायद कुछ नहीं
सिर्फ अपनी आवाज के लिए
गा रहे थे वे
जो उनकी थी
और इन मुश्किल दिनों में भी
उनके कंठ में अब भी
बची हुई थी

वह शायद सबसे बूढ़े आदमी की
आवाज थी
जो अपनी उठान में दूर से
लगती थी देवोपम
और उसी की बगल में
एक युवा आवाज की तड़प थी सुरीली
जो सारी आवाजों पर तैर रही थी
और कहीं उसी के आसपास
एक कड़क आवाज जरा भारी-सी थी
जो अपने हल्के बुसेरपन में
इतनी थी तन्मय
जैसे वही बचाए हुए हो सारी आवाजों को
अतल में गिरने से

उस गाने में
कोई भी आवाज
किसी भी आवाज से अलग नहीं थी
पर गानेवाला
जितना समूह में था
उतना ही अकेला
और जो जितना अकेला था
उतनी ही गहरी
और उदात्त लगती थी उसकी आवाज
सारे संगीत में एक विलक्षण हलचल की
सृष्टि करती हुई...