हिंदी भाषा और उसकी लिपि का इतिहास/हिंदी भाषा के विकास की पूर्व पीठिका

विकिपुस्तक से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
हिंदी भाषा और उसकी लिपि का इतिहास
 ← भूमिका हिंदी भाषा के विकास की पूर्व पीठिका भारोपीय भाषा परिवार एवं आर्यभाषाएँ → 
हिंदी भाषा के विकास की पूर्व पीठिका

'हिंदी' शब्द का संबंध संस्कृत के 'सिंधु' शब्द से माना जाता है। 'सिंध' नदी के आसपास की भूमि और वहां रहने वाले लोगों को सिंधु कहा जाता था। कालांतर में धीरे-धीरे ईरानी भारत के अधिकाधिक भागों से परिचित होते गए और इस शब्द के अर्थ में विस्तार होता गया, और उनके द्वारा यह शब्द 'हिंद' उच्चरित होने लगा। इसका परिणाम यह हुआ कि 'हिंद' शब्द धीरे धीरे पूरे भारत का वाचक हो गया। 'हिंदू' शब्द में 'ईक' प्रत्यय लगने से 'हिंदीक' बना, जिसका अर्थ है- 'हिंद का'।

यूनानी शब्द 'इंडिका' और अंग्रेजी शब्द 'इंडिया' को इसी 'हिंदीका' का विकसित रूप कहा जा सकता है। 'हिंदीका' में 'का' अक्षर का लोप होने से 'हिंदी' शब्द बनकर सामने आया।

हिंदी भाषा का उद्गम भारोपीय परिवार की भारतीय आर्य भाषा शाखा से हुआ। विश्व में भाषाओं के वर्गीकरण के दो प्रमुख आधार हैं-
१. आकृतिमुलक वर्गीकरण
२. पारिवारिक वर्गीकरण

पारिवारिक वर्गीकरण के अंतर्गत विश्व की भाषाओं को चार खंडों में विभाजित किया गया-
१. यूरेशिया खंड
२. अफ्रीका खंड
३. प्रशांत महासागरीय खंड
५. अमरीकी खंड

यूरेशिया खंड पुनः दो भागों में विभाजित हो जाता है।-
१. केंटुयत
२. 'शतम' वर्ग

'शतम' वर्ग की भारत-ईरानी शाखा तीन रूपों में विकसित हुई-
१. भारतीय आर्य भाषाएं
२. दरद या पिशाच
३. ईरानी
आज की हिंदी, भारतीय आर्य भाषा के अंतर्गत आती है।

भारतीय आर्य भाषाओं का प्रारंभ १५०० ई. पूर्व से ५०० ई. पू. तक माना जाता है तथा इनके विकास में ही हिंदी तथा उत्तर भारत की अधिकांश भाषाओं का मूल स्रोत निहित है। वह स्रोत संस्कृत भाषा है। इसके दो रूप मिलते हैं-
१. वैदिक संस्कृत- इसके अंतर्गत वेदों, ब्राह्मण ग्रंथों और उपनिषदों की रचना है। यह भाषा पाणिनि के काल से, बहुत पहले से प्रचलित थी।

२. लौकिक संस्कृत- वैदिक संस्कृत से ही लौकिक संस्कृत का जन्म हुआ। लौकिक संस्कृत में पाणिनीय संस्कृत, देवभाषा संस्कृत और क्लासिकल संस्कृत भी है। पांचवी शती ई. पू. में पाणिनि ने अपने व्याकरण द्वारा संस्कृत को एक व्यवस्थित रूप प्रदान किया तब से आज तक उसका वही स्वरूप मान्य है।

पाणिनि द्वारा संस्कृत को नियमों से बांध दिए जाने पर भी व्यवहार में स्वच्छंद उन्मुक्त भाषा भौतिक रूप में निरंतर प्रवाहित होती रही। इसी लोक भाषा का विकसित रूप प्राकृत कहलाया।

प्राकृत भाषा काल ५०० ई. पू. से १००० ई. माना गया है। इसी से आगे चलकर पाली एवं अपभ्रंश भाषा निकली। पाली भाषा में गौतम बुद्ध ने अपने उपदेश दिए। उन्हीं से संबंधित साहित्य की रचना पाली भाषा में की गई। 'पिटक' और 'अनुपिटक' में विभाजित पाली साहित्य आज भी विदेशी भाषाओं और बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए प्रेरणा स्रोत बना हुआ है। अशोक के शिलालेख भी पाली प्राकृत में लिखे गए हैं।

अपभ्रंश प्राकृत और आर्य भाषाओं के बीच की कड़ी है। आचार्य पतंजलि के महाकाव्य में अपभ्रंश का प्रयोग मिलता है, जहां उसका अर्थ परिनिष्ठित शब्द का विकृत या बिगड़ा रूप दिया गया है। भामह के 'काव्यालंकार' और चंद के 'प्राकृत लक्ष्मण' में भाषा के अर्थ में अपभ्रंश का प्रयोग मिलता है। अपभ्रंश को 'ग्रामीण भाषा', 'देसी', 'देशभाषा', 'अभीरोक्ती', 'अवहट्ट' आदि नामों से भी अभिहित किया जाता है।

अपभ्रंश से हिंदी का जन्म हुआ। आठवीं शती में सिद्धों की अवहट्ट भाषा से हिंदी अपना आकार ग्रहण करती है। अवहट्ट को पुरानी हिंदी भी कहा गया है।

सामान्यतः हिंदी का उद्भव १००० ई. के आसपास माना जाता है। इसका विकास तीन चरणों में हुआ-
१. आदिकाल
२. मध्यकाल
३. आधुनिक काल