हिंदी में विज्ञान साहित्य की वर्तमान स्थिति तथा संभावनाएं

Wikibooks से
Jump to navigation Jump to search
हिन्दी में विज्ञान साहित्य की वर्तमान स्थिति तथा संभावनाएं
डॉ.शिवगोपाल मिश्र
दसवां विश्व हिन्दी सम्मेलन, भोपाल

मैं विश्व हिन्दी सम्मेलन की तुलना भारतीय विज्ञान कांग्रेस से करना चाहूंगा। अन्तर इतना ही है कि विज्ञान कांग्रेस प्रतिवर्ष आयोजित होता है जबकि विश्व हिन्दी सम्मेलन काफी अन्तराल के बाद। दूसरा अन्तर यह है कि विज्ञान कांग्रेस भारत देश के ही विभिन्न स्थानों में आयोजित होता है जिसमें न केवल देशभर के अपितु विश्व के विभिन्न देशों के वैज्ञानिक भाग लेते हैं। विश्व हिन्दी सम्मेलन देश के बाहर विश्व के उन देशों में आयोजित होता आ रहा है जहाँ हिन्दी भाषियों की संख्या अधिक है। देश में आयोजित यह तीसरा विश्व हिन्दी सम्मेलन है। पहला सम्मेलन 1975 में नागपुर में आयोजित हुआ था। दूसरा सम्मेलन दिल्ली में और अब तीसरी बार भोपाल में दसवां विश्व हिन्दी सम्मेलन आयोजित हुआ है। विज्ञान कांग्रेस का उद्घाटन प्रधानमंत्री द्वारा होता रहा है और सौभाग्यवश इस विश्व हिन्दी सम्मेलन का उद्घाटन भी माननीय नरेन्द्र मोदी द्वारा हुआ है जो देश के प्रधानमंत्री हैं।

विश्व हिन्दी सम्मेलन का उद्देश्य विश्व पटल पर हिन्दी की उपस्थिति और महत्ता को उजागर करना होता है। शायद यह पहला अवसर है जब विज्ञान के क्षेत्र में हिन्दी की व्याप्ति पर चर्चा होने जा रही है। मुझे यह कहते हर्ष हो रहा है कि ‘विज्ञान प्रसार’ नोएडा के आह्वान पर मैं देश की 100 वर्ष पुरानी वैज्ञानिक संस्था विज्ञान परिषद् प्रयाग की ओर से विज्ञान के प्रचार प्रसार में हिन्दी की भूमिका, उसके सरोकारों एवं संभावनाओं पर विचार व्यक्त करने जा रहा हॅू। मैं विश्व हिन्दी सम्मेलन के आयोजकों,विशेषरूप से विदेश मंत्रालय को साधुवाद देना चाहूँगा कि देर से ही सही, हिन्दी वाङ्मय की समृद्धि में ज्ञान के साथ विज्ञान पर चर्चा करने का अवसर प्रदान किया।

प्रारम्भ में ही बता दूं कि मेरे व्याख्यान के तीन भाग हैं- पहले मैं हिन्दी में वैज्ञानिक साहित्य के अवतरण की बात करूंगा। दूसरे भाग में मैं हिन्दी में वैज्ञानिक साहित्य के पल्लवन, पुष्पन तथा फलन की बात करूंगा।

तीसरे भाग में मैं कुछ सुझाव प्रस्तुत करूंगा।

1800 ई. में कलकत्ता में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना हो जाने से वहाँ अन्य विषयों के अतिरिक्त भारतीय भाषाओं का भी शिक्षण शुरू हुआ। बंगाल में ईस्ट इंडिया कम्पनी के पुराने अधिकारी संस्कृत,अरबी और फारसी को शिक्षा का माध्यम बनाना चाहते थे किन्तु मुनरो तथा एलफिंस्टन जैसे प्रबुद्ध ब्रिटिश शासक बंगला, गुजराती, मराठी, तमिल आदि आधुनिक भारतीय भाषाओं को शिक्षा का माध्यम बनाने के पक्षपाती थे। मैकाले का तर्क था कि जनता में पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा देने का माध्यम केवल अंग्रेजी बन सकती है। फलस्वरूप 7 मार्च 1835 को विलियम बेंटिक ने मैकाले का समर्थन करते हुए अंग्रेजी को उच्च शिक्षा का माध्यम बना दिया। वैसे तो 1835 के पूर्व कतिपय अंग्रेजी विद्वान बंगला, हिन्दुस्तानी तथा मराठी भाषाओं का प्रयोग विज्ञान के प्रचार-प्रसार, हेतु शुरू कर चुके थे। उदाहरणार्थ 1817 ई. में स्कूल बुक सोसाइटी की स्थापना की गई और 1819 में फैनालिक्स ने बंगला में विश्वकोश तैयार किया और शरीर विज्ञान पर एक पाठ्य पुस्तक तैयार की। कुछ अन्य ऐंग्लो इंडियन शिक्षाशास्त्रियों ने भी भारतीय भाषाओं में अनुवाद कार्य शुरू किया। 1820 - 25 ई. में हिन्दुस्तानी मेडिकल स्कूल के प्रधानाध्यापक डॉ.टिटलर ने मेडिकल पुस्तकों का बंगला में अनुवाद किया। मराठी में तो 1815 से ही वैज्ञानिक पुस्तकों का अनुवाद शुरू हो चुका था। हिन्दी पट्टी में वैज्ञानिक पुस्तकों के लेखन या अनुवाद का कार्य काफी बाद में शुरू हुआ।

जब मिशनरियों ने हिन्दी क्षेत्रों में मिशन स्कूल खोले तो सर्वप्रथम उनका ध्यान पाठ्यपुस्तकें तैयार करने की ओर गया। उस समय आगरा, मिर्जापुर तथा मुंगेर मिशन के गढ़े थे। 1822 में टामसन नामक एक यूरोपियन ने ज्योतिष और गोलाध्याय नामक एक ज्योतिष विषयक महत्वपूर्ण पाठ्य पुस्तक लिखी। इसमें खगोल तथा भूगोल का वर्णन था। टामसन लल्लू लाल जी के समकालीन थे। तब लल्लू लाल जी फोर्ट विलियम कॉलेज के हिन्दी विद्वान के रूप में हिन्दी गद्य को परिष्कृत करने में लगे थे।

1837 में आगरा की स्कूल बुक सोसाइटी ने कई पुस्तकों के हिन्दी अनुवाद प्रकाशित किये। यहीं से 1847 में विज्ञान विषयक पुस्तक ‘रसायन प्रकाश प्रश्नोत्तर’ छपी। 1862 में अलीगढ़ से सर सैयद अहमद ने कई अंग्रेजी पुस्तकों का उर्दू में अनुवाद कराया। उस समय हिन्दी में राजा शिव प्रसाद सितारे हिन्द ( 1860 ), लक्ष्मी शंकर मिश्र ( 1873 - 1885 ) तथा मुंशी रतनलाल ( 1887 ) मिडिल कक्षाओं के लिए विविध विषयों के साथ गणित और विज्ञान की पुस्तकें लिख रहे थे।

पश्चिमोत्तर प्रदेश के स्कूलों में शिक्षा का माध्यम हिन्दी थी। अतः पाठ्य पुस्तकें तैयार करने पर बल था। यू.पी. में अंग्रेज अफसरों ने राजा शिव प्रसाद को हिन्दुस्तानी का पक्षधर बना लिया था। इसी तरह बिहार में राय सोहन लाल भी हिन्दुस्तानी के पक्षधर बने। केवल लल्लू लाल शास्त्रीय ज्ञानवर्धक पुस्तकों में परिमार्जित भाषा का प्रयोग कर रहे थे। उनके बाद काफी समय तक हिन्दी गद्य की स्थिति बदतर बनी रही।

राजा शिवप्रसाद काशी के ही भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के समकालीन थे और प्रारम्भिक शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे। उन्होंने बड़े ही परिश्रम से हिन्दी में प्रारम्भिक पाठ्य पुस्तकें लिखीं जिनमें भूगोल तथा विज्ञान की पुस्तकें मुख्य थीं। वे बनारस सर्किल तथा इलाहाबाद सर्किल के इंस्पेक्टर आफ स्कूल्स रहे। उन्होंने आगरा और झांसी कमिश्नरियों में भी इसी पद पर कार्य किया। उन्होंने स्कूली पाठ्यक्रम की जिन दो पुस्तकों की रचना की वे थी विद्यांकुर ( 1876 ) तथा भूगोल हस्तामलक। ‘विद्यांकुर’ प्राकृतिक और सामाजिक विज्ञानी की मिली जुली पुस्तक थी। इसमें जीव विज्ञान,वनस्पति शास्त्र, पदार्थ विज्ञान, नागरिक शास्त्र,राजनीति शास्त्र का वर्णन था। उन्होंने इसका उर्दू संस्करण ‘हकाइकुल मौजूदात’ नाम से निकाला। ‘भूगोल हस्तामलक’ का प्रथम भाग 400 पृष्ठों का था जिसमें एशिया का वर्णन था।

इन दोनों पुस्तकों के अलावा उन्होंने एक तीसरी पुस्तक भी लिखी जो हिन्दी गद्य-पद्य संग्रह ‘गुटका’ या ‘हिन्दी सेलेक्शन्स’ के नाम से 867 में बनारस के मेडिकल हाल से छपी थी। यह ‘गुटका’ ब्रिटिश शासन के जूनियर सिविल सर्वेन्टों और फैजी अफसरों की हिन्दी परीक्षा के पाठ्यक्रम के तौर पर पढाया जाता था। राजा शिव प्रसाद सितारे हिन्द ने एक पाठ्य पुस्तक की भूमिका में अपने द्वारा अपनाई गई भाषा नीति के विषय में लिखा-‘हम लोगों को जहाँ तक बन पड़े, चुनने में उन शब्दों को लेना चाहिए जो आमफहम और खासपसंद हों अर्थात् जिनको जियादह आदमी समझ सकते हैं और यहां के पढ़े-लिखे, आलिम-फाजिल, पंडित, विद्वान की बोलचाल में छोड़े नहीं गये हैं और जहाँ तक बन पड़े हम लोगों को हर्गिज गैरमुल्क के शब्द काम में न लाना चाहिए और न संस्कृत की टकसाल कायम करके नए नए ऊपरी शब्दों के सिक्के जारी करने चाहिए।’ शिव प्रसाद की ‘भाषा नीति’ अपने समय की वास्तविकता के ज्यादा करीब थी। यद्यपि उनकी भाषा पर उर्दूपरस्ती का इल्जाम लगाया जाता है किन्तु पं. रामचन्द्र शुक्ल या डॉ. लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय ने उनकी पुस्तकों की भाषा को चलती हुई सरल हिन्दी कहा है। उस समय स्कूलों में हिन्दू और मुसलमान दोनों के बच्चे पढ़ते थे। हिन्दू बच्चे हिन्दी माध्यम से पढ़ते थे और मुसलमान बच्चे उर्दू से। दोनों माध्यम की लिपि अलग अलग थी। शिव प्रसाद यह मानने को राजी नहीं थे कि लिपि अलग है तो उनकी भाषा भी अलग होनी चाहिए। उन्होंने पारिभाषिक शब्दों के लिए संस्कृत भाषा का सहारा लिया और तत्व, उद्भिज, वनस्पति, आमाशय, परमाणु, सरल रेखा, समकोण जैसे शब्द ग्रहण किये। उन्होंने एक ऐसा व्याकरण भी लिखा जो हिन्दी उर्दू दोनों का था। इसकी हॅँसी भारतेन्दु बाबू ने उड़ाई।

तभी भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने दावा किया कि 1873 में हिन्दी नई चाल में ढली। इसमें सन्देह नहीं कि यदि हिन्दी व्योम में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का उदय न हुआ होता तो शायद हिन्दी गद्य का परिष्कार न हुआ होता और जिसे हम खड़ी बोली कहते हैं वह खड़ी न हुई होती।

आज से लगभग 600 वर्ष पूर्व चाहे अमीर खुसरो रहे हों या सन्तकवि कबीर दास, इनके काव्य में खड़ी बोली के बीज थे। किन्तु खड़ी बोली को खड़ी करने का सर्वाधिक श्रेय व्रजभाषा के ही प्रसिद्ध कवि तथा राजा शिव प्रसाद सितारे हिन्द के समकालीन श्री भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को है। उन्होंने इसे गद्य की भाषा के रूप में खड़ा किया। फिर तो भारतेन्दु मण्डल के अनेक सात्यिकारों ने इसका सम्वर्धन किया। यही खड़ी बोली विज्ञान लेखन में प्रगति की परिचायक है। आगे चलकर 1900 ई. में प्रयाग से ‘सरस्वती’ पत्रिका का प्रकाशन एक युगान्तरकारी घटना है। इसके द्वारा पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी ने खड़ी बोली या हिन्दी को ज्ञान-विज्ञान की भाषा बना डाला। उत्तरभारत के वे हिन्दी भाषाभाषी जो काव्य सागर में आनन्द की हिलोरे लेने में मस्त थे,सहसा विज्ञान की तरंगों में बहने लगे। हिन्दी अब विज्ञान संचारिका बन गई। प्रारम्भ के 20 वर्षों में उसके द्वारा इतना विज्ञान साहित्य परोसा गया कि पाठकगण विश्वस्त हो गये कि वे ऐसे समुन्नत युग का सपना देख सकते हैं जिसमें संस्कृत भाषा जैसे गाम्भीर्य और प्रवाह आने से विज्ञान की बातें आम लोगों के सुलभ होती रहेंगी और सचमुच ही यह सपना साकार हुआ।

स्वतन्त्रता प्राप्ति ( 1947 ) तक हिन्दी में विज्ञान साहित्य सृजन का केन्द्र इलाहाबाद बना रहा। इलाहाबाद में 1913 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के चार मनीषियों- डॉ. गंगानाथ झा (संस्कृत), प्रो. हमीदुद्दीन (अरबी), श्री सालिगराम भार्गव (भौतिक शास्त्र) तथा श्री रामदास गौड़ (रसायन शास्त्र) ने मिलकर ‘विज्ञान परिषद्’ नामक संस्था की स्थापना की जिसका मुख्य उद्देश्य राष्टंभाषा हिन्दी के माध्यम से विज्ञान विषयों का प्रचार प्रसार करना था। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए दो वर्ष पश्चात् अप्रैल 1915 में ‘विज्ञान’ नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ किया गया और उसके सम्पादक बने पं. श्रीधर पाठक तथा लाला सीताराम। ये दोनों साहित्यिक व्यक्ति थे। इस तरह अभी तक जितने साहित्यिक जन या वैज्ञानिक रुचि वाले लोग, जो ‘सरस्वती’ में लिख रहे थे,उनके लिए ‘विज्ञान’ पत्रिका का नवीन मंच मिला और स्वतन्त्रताप्राप्ति के पूर्व तक ‘विज्ञान’ ही एकमात्र विज्ञान विषयों की पत्रिका बनी रही। इस पत्रिका से सभी विज्ञान लेखक परिचित हुए। स्वतन्त्रताप्राप्ति के बाद विज्ञान विषयक दो पत्रिकाएं, खेती ( 1948 ) तथा विज्ञान प्रगति ( 1950 ) प्रकाश में आईं। ये दोनों सरकारी पत्रिकाएं थीं। 1970 के दशक के बाद हिन्दी में विज्ञान पत्रिकाओं की धूम मच गई।

यद्यपि हिन्दी में विज्ञान लेखन भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के काल से ही शुरू हो चुका था किन्तु बीसवीं सदी के प्रारम्भ में आर्य समाज के नेता स्वामी श्रद्धानन्द जी ने जब कांगड़ी में गुरुकुल की स्थापना की तो 1907 में वहां के महाविद्यालय में वैज्ञानिक विषयों के शिक्षण हेतु पाठ्य पुस्तकों की आवश्यकता हुई। फलस्वरूप 1910 - 1912 के मध्य मास्टर गोवर्धन तथा श्री महेशचरण सिनहा ने वनस्पतिशास्त्र,भौतिकी तथा रसायन विषयक पुस्तकें लिखीं। तब तक काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने एक वैज्ञानिक कोश भी प्रकाशित कर दिया था जिससे विज्ञान लेखकों को हिन्दी के पारिभाषिक शब्दों को ग्रहण करने में सुविधा हुई। एक अनुमान के अनुसार स्वतन्त्रताप्राप्ति के पूर्व हिन्दी में लगभग 700 लोकप्रिय विज्ञान की पुस्तकें प्रकाश में आ चुकी थीं। स्वतन्त्रताप्राप्ति के बाद नये नये लेखकों तथा लेखिकाओं ने नये नये विषयों पर विज्ञान लेखन किया। अनुमान है कि इस समय 3000 से अधिक विज्ञान लेखक है जिनमें से 250 महिलाएं हैं। 1965 से लगातार विज्ञान लेखन में संलग्न लेखकों की संख्या 160 से अधिक है। सम्प्रति हिन्दी का भण्डार विज्ञान और प्रौद्योगिकी के समस्त पक्षों पर लिखी हिन्दी पुस्तकों से परिपूर्ण है। इन सबकी संख्या 7000 से ऊपर होगी। 1947 के पूर्व विज्ञान लेखक साहित्यिक पत्रिकाओं (वीणा, सुधा, माधुरी, विशाल भारत) में भी लिख रहे थे और अनेक साहित्यकार भी उन्हीं में विज्ञान विषयक लेख लिख रहे थे। यही कारण था कि विज्ञान लेखकों की गणना साहित्यकारों में की जाती थी। उन्हें हिन्दी साहित्य सम्मेलन के वार्षिक अधिवेशनों में व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया जाता था। यही नहीं, ऐसे अनेक विज्ञान लेखक हुए जिनकी रचनाओं पर हिन्दी साहित्य का सर्वोच्च पुरस्कार-मंगला प्रसाद पुरस्कार प्रदान किया गया। त्रिलोकीनाथ वर्मा को उनकी पुस्तक ‘हमारे शरीर की रचना’ पर संवत 1983 में, डॉ. गोरख प्रसाद को उनकी पुस्तक ‘फोटोग्राफी की शिक्षा’ पर सं. 1988 में,श्री मुकुन्द स्वरूप को उनकी पुस्तक ‘स्वास्थ्य विज्ञान’ पर सं. 1889 में,श्री रामदास गौड को उनकी पुस्तक ‘विज्ञान हस्तामलक’ पर सं. 1992 में तथा महावीर श्रीवास्तव को उनकी कृति ‘सूर्य सिद्धान्तः विज्ञान भाष्य’ पर सं. 1999 में मंगला प्रसाद पुरस्कार प्रदान किया गया।

स्वतन्त्रतापूर्व साहित्यिक पत्रिकाओं ने वैज्ञानिक साहित्य सृजन में जो भूमिका निभाई उसका लेखा जोखा सुरुचिपूर्ण है। उदाहरणार्थ 1900 - 1950 की अवधि में ‘सरस्वती’ में कुल 229 , विशाल भारत में 204 , वीणा में 129 , माधुरी में 46 तथा सुधा में 50 वैज्ञानिक लेख छपे जिनके लेखकों की संख्या क्रमशः 160 , 138 , 79 , 38 तथा 43 रही। ये निबन्ध स्वास्थ्य,कृषि एवं उद्योग के अतिरिक्त जीवन विज्ञान, वनस्पति विज्ञान,भौतिक शास्त्र तथा ज्योतिष जैसे विषयों पर थे। कुछ वैज्ञानिकों की जीवनियां भी प्रकाशित हुईं। अब मैं अपने व्याख्यान के दूसरे भाग में आता हूँ।

  • हिन्दी विज्ञान लेखन के 125 वर्ष पूरे हो चुके हैं। यह काफी लम्बी अवधि है। इसमें हिन्दी लोकप्रिय विज्ञान लेखकों ने विविध विषयों पर लोकप्रिय साहित्य प्रस्तुत करके अंग्रेजी साहित्य का विकल्प प्रस्तुत किया है जो सचमुच लोमहर्षक है। किन्तु अभी तक हिन्दी माध्यम से विज्ञान को लोकप्रिय बनाने में जो सेना ( 3000 लेखकों की) जुटी हुई थी,अब उसे ऐसा नायक चाहिए जो विज्ञान की विविध शाखाओं में उत्कृष्ट लेखन के लिए प्रेरित करता।

सम्प्रति सूचना प्रौद्योगिकी,जैव प्रौद्योगिकी,नैनो प्रौद्योगिकी,जीनोमिकी तथा अन्तरिक्ष विज्ञान जैसे नये नये क्षेत्र हैं जिनमें हिन्दी में प्रामाणिक वैज्ञानिक साहित्य की रचना की जानी है। इसके लिए निस्सन्देह उच्चकोटि की विशेषज्ञता चाहिए जो हमारे सामान्य लेखकों के पास नहीं है। इसके लिए मौलिक लेखन अनिवार्य है और यह कार्य चोटी के वैज्ञानिक ही कर सकते हैं। किन्तु बडे खेद के साथ यह कहना पड़ता है कि इन वैज्ञानिकों के कर्ण कुहरों में इस आवश्यकता की गुहार अभी भी प्रविष्ट नहीं हो पा रही है। उन्हें अंग्रेजी के मोह ने दिग्भ्रमित कर रखा है। शायद उन्हें राष्ट्रीयता या राष्टंभाषा की पुकार नहीं सुन पड़ती। वे दीर्घ निद्रा में हैं किन्तु यह निद्रा टूटेगी-अवश्य टूटेगी।

मौलिक लेखन[सम्पादन]

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में भारतीय भाषाओं में विज्ञान का जिस तरह लोकप्रियकरण हो रहा था,उसे वर्नाकुलराइजेशन की संज्ञा प्रदान की गई। चूंकि देश अंग्रेजी शासन के अधीन था अतः लेखकों में राष्ट्रीय भावना आन्दोलित हो रही थी। बंगाल में रामेन्द्र सुन्दर त्रिवेदी,दिल्ली में मास्टर रामचन्द्र तथा जका उल्ला और बनारस में लक्ष्मी शंकर मिश्र अपने अपने लेखन द्वारा अपने अपने क्षेत्रों में वैज्ञानिक अभिरुचि का विस्तार करने में लगे थे। उन्हें अंग्रेजी से परहेज नहीं था बल्कि हम यह कह सकते हैं कि उन्होंने आवश्यकतानुसार अंग्रेजी से अपनी अपनी भाषाओं में अनुवाद करके और स्वयं मौलिक लेखन करके देश में विज्ञान लेखन की नींव डाली। बीसवीं सदी के प्रारम्भ काल तक सैकड़ों पुस्तकें लिखी जा चुकी थीं और बीसवी सदी के पूर्वार्द्ध तक इस संख्या में गुणात्मक वृद्धि होती रही।

चूंकि हिन्दी गद्य का विकास संस्कृत ग्रंथों के अनुवाद से हुआ इसलिए हिन्दी के धुरंधर विद्वानों को भी हिन्दी में विज्ञान सामग्री अनूदित करने में कोई संकोच नहीं हुआ। यही कारण है कि हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखने वाले आचार्य पं. रामचन्द्र शुक्ल ने 1920 में जर्मनी के सुपसिद्ध जीवविज्ञानी हेकेल की सुप्रसिद्ध पुस्तक त्पककसम वि जीम न्दपअमतेम का अनुवाद ‘विश्व प्रपंच’ नाम से किया और काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने इसे सहर्ष प्रकाशित किया।

अतःचाहे मौलिक लेखन हो या अनुवाद,प्रामाणिक पारिभाषिक शब्दों की आवश्यकता अनुभव की जाती रही थी। यद्यपि पारिभाषिक शब्दावली का निर्माण कार्य कई गैर सरकारी संस्थाएं करती आ रही थीं और डॉ. रघुवीर ने तो पारिभाषिक शब्दकोष ही रच डाला था किन्तु 1950 में जब भारत सरकार ने शब्दावली आयोग का गठन किया तो गैर सरकारी संस्थाओं ने उसमें सहयोग किया और मानक शब्दावली का निर्माण कार्य सम्पन्न हुआ। चूंकि यह शब्दावली संस्कृत पर आधारित है अतः भारत के अन्य भाषाभाषियों के लिए भी उपयोगी सिद्ध हुई।

हमें कहना यह है कि आधिकारिक लेखन के अभाव में ही द्वितीय कोटि का लेखन,जिसे लोकप्रिय विज्ञान लेखन कहते हैं पल्लवित होता आया है। अनुवाद की कितनी ही बुराई क्यों न की जाय,विज्ञान लेखन में अनुवाद अनिवार्य है-उसे समाप्त नहीं किया जा सकता। वैसे लेखन कार्य एक तपस्या है। लेखकों को उसका अभ्यास करना होगा और राज्याश्रय प्राप्त करने या पुरस्कृत होने की लालसा का परित्याग करना होगा।

राष्टंभाषा हिन्दी का मुख उज्ज्वल करने के लिए सर्वथा मौलिक ग्रन्थों का सृजन करना होगा। ये ग्रन्थ उच्च पदों पर आसीन वैज्ञानिक जनों को ही लिखने हैं। तभी मौलिक साहित्य की सर्जना का स्वप्न पूरा हो सकेगा। हम इसकी प्रतीक्षा में हैं।

हिन्दी विज्ञान लेखन की कथावस्तु[सम्पादन]

विज्ञान लेखन में कथावस्तु का बहुत बड़ा हाथ है। प्रारम्भ में जो विज्ञान लेखन हुआ उसकी विषयवस्तु लेखक की इच्छानुसार होती थी किन्तु 1950 से लेकर 1970 की अवधि में अनेक नवीन खोजे हुईं। उदाहरणार्थ 1960 - 70 के दशक में कृषि में हरितक्रान्ति की दस्तक होने सें तत्सम्बन्धी रचनाएं हुईं। इसी कालखण्ड में रूस ने अपना स्पुतनिक चन्द्रलोक में भेजा। प्रतिस्पर्धावश अमरीका ने भी अन्तरिक्ष कार्यक्रम शुरू हुआ। इससे भारत को भी अन्तरिक्ष कार्यक्रम शुरू करने की प्रेरणा मिला। स्वाभाविक था कि इस दिशा में हिन्दी में विज्ञान लेखन होता। इस तरह 1970 के पश्चात् हिन्दी में पर्यावरण,कम्प्यूटर तथा अन्तरिक्ष इन नवीन विषयों पर भी प्रचुर लेखन होता रहा। सागर विज्ञान और अंटार्कटिका अभियान भी अछूते नहीं रहे।

औद्योगिक क्रान्ति के फलस्वरूप पर्यावरण का जिस तेजी से विघटन हुआ,उसकी चिन्ता सर्वप्रथम 1972 के स्टाकहोम सम्मेलन में प्रकट की गई। पर्यावरण से जुड़ा हुआ विज्ञान पारिस्थितिकी ;म्बवसवहलद्ध है। इसके अन्तर्गत पर्यावरण प्रदूषण, जैव विविधता पर पर्याप्त लेखन हुआ जिससे जनसामान्य में पर्यावरण तथा प्रकृति के प्रति जागरूकता उत्पन्न हुई और जल प्रदूषण,वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, मृदा प्रदूषण के साथ ही मानसिक प्रदूषण जैसी समस्याओं पर गम्भीरता से विचार हुआ। ओजोन परत की महत्ता,अभ्यारण्यों की आवश्यकता तथा जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग पर भी पर्याप्त साहित्य प्रकाश में आया। नैनोटेक्नालाजी तथा जीनोमिकी जैसे नवीनतम विषयों पर भी लेखन हो रहा है।

वैसे तो कम्प्यूटर युग का सूत्रपात 1984 में हुआ किन्तु हिन्दी में कम्प्यूटर की पहली पुस्तक 1970 में रमेश वर्मा ने लिख दी थी। जब स्कूलों,कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों में कम्प्यूटर शिक्षा प्रारम्भ हुई तो अनेक पाठ्यपुस्तकें भी लिखी गइंर्। जून 2001 से ‘कम्प्यूटर विविधा’ नामक पत्रिका भी प्रकाशित हो रही है। इससे सूचना प्रौद्योगिकी का पल्लवन हुआ है। भोपाल से ही प्रकाशित ‘इलेक्टांनिकी आपके लिए’ एक महत्वपूर्ण पत्रिका है।

सागरों से खनिजों के दोहन और समुद्र से ऊर्जा प्राप्त करने की सम्भावना को लेकर काफी साहित्य प्रकाश में आया है। राकेटों, प्रक्षेपास्त्रों तथा कृत्रिम उपग्रहों को लेकर भी हिन्दी में प्रचुर लेखन हुआ। यह साहित्य विशेष रूप से श्री काली शंकर द्वारा प्रणीत है जो इस क्षेत्र से सम्बद्ध विशेषज्ञ रहे हैं।

आयुर्विज्ञान यद्यपि अति प्राचीन विज्ञान है और पहले से प्रचुर साहित्य प्राप्त है किन्तु सम्प्रति कई चिकित्सक प्रामाणिक हिन्दी ग्रन्थों की रचना कर रहे हैं जिनमें डॉ. यतीश अग्रवाल तथा डॉ. जे.एल. अग्रवाल अग्रणी हैं। आयुर्विज्ञान विषयक कई पत्रिकाएं भी निरन्तर प्रकाशित हो रही है। जीनोम तथा जीनोमिकी एवं जैव सूचनिकी ;ठपवपदवितउंजपबेद्ध इन दोनों विषयों पर हाल ही में पुस्तकें प्रकाशित हैं।

विज्ञान पत्रकारिता आजकल मीडिया की चर्चा सर्वत्र हो रही हैं। यह पत्रकारिता के समतुल्य शब्द है। हिन्दी में पत्रकारिता का अर्थ होता है पत्रिका या समाचार पत्र के प्रकाशन द्वारा जनसामान्य तक ज्ञान विज्ञान की सूचनाएं पहुंचाना।

1950 में श्री वेंकट लाल ओझा ने समाचार पत्रों तथा पत्रिकाओं की एक निर्देशिका तैयार की थी जिसमें 1820 से 1925 तक के 105 वर्षों के मध्य प्रकाशित अनेक पत्र पत्रिकाओं के विवरण छपे थे। इसमें विज्ञान विषयक अनेक पत्रिकाओं की सूचना मिलती है किन्तु 1983 में सी.एस.आई.आर. ने जो विज्ञान निर्देशिका प्रकाशित की, उसमे विषयवार 321 पत्रिकाओं की सूची है। इस संख्या में परिवर्तन होता रहा है क्योंकि 2001 में जो संशोधित निर्देशिका छपी है उसमें विज्ञान पत्रिकाओं की संख्या 321 से घट कर मात्र 119 रह गई अर्थात् लगभग 200 पत्रिकाएं बन्द हुई। इस तरह कुछ पत्रिकाएं बन्द होंगी तो कुछ नई विज्ञान पत्रिकाएं प्रकाश में आती रहेंगी। हाल ही में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से ‘विज्ञान गंगा’ और उत्तराखण्ड से ‘विज्ञान परिचर्चा’ (त्रैमासिक) का प्रकाशन स्वागत योग्य है।

हिन्दी में विज्ञान के प्रचार-प्रसार का एक पक्ष और है जिसका उल्लेख आवश्यक है। विज्ञान परिषद् प्रयाग ने सन् 1958 से एक त्रैमासिक विज्ञान विषयक शोध पत्रिका-‘विज्ञान परिषद् अनुसंधान पत्रिका’ का प्रकाशन शुरू किया जो विगत 57 वर्षो से निरन्तर प्रकाशित हो रही है। यह राष्टंभाषा हिन्दी में प्रकाशित होने वाली एकमात्र पत्रिका है जिसका देश विदेश में स्वागत हुआ है। इसमें प्रकाशित शोधपत्रों की संक्षिप्तियां गण्यमान्य एजेन्सियों द्वारा प्रकाशित की जाती हैं। देखादेखी सम्प्रति अन्य क्षेत्रों में भी शोध पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही हैं। यह शुभ लक्षण है। भारतीय कृषि अनुसंधान पत्रिका (त्रैमासिक) 1973 से करनाल से प्रकाशित हो रही है। विज्ञान शोध भारती (अर्धवार्षिक) 1960 से ग्वालियर से प्रकाशित है। गणित सुधा (त्रैमासिक) 1994 से लखनऊ से प्रकाशित हो रही है।

वैज्ञानिक शोध पत्रिकाएं किसी एक व्यक्ति के उत्साह से नहीं संचालित होती अपितु उन्हें राष्टं की निधि बनना है। शोध पत्रिकाओं की जितनी ही अधिक संख्या होगी,उतने ही नवीन शोधों का प्रकाशन होकर जन जन तक उन्हें उपलब्ध कराया जा सकेगा। अभी लोकप्रिय विज्ञान लेखन अनिवार्य बना हुआ है किन्तु उसका स्तर तभी उठ सकेगा जब उसमें हिन्दी में प्रकाशित शोध पत्रों की विषयवस्तु को स्थान दिया जावेगा। अपने देश की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर जो भी शोधकार्य होगा और फिर उसका लोकप्रियकरण होगा,वह निश्चित रूप से कल्याणकारी सिद्ध होगा। इससे देश में हिन्दी प्रकाशकों को उच्चस्तरीय वैज्ञानिक साहित्य प्रकाशनार्थ प्राप्त होता रहेगा और हमारे छात्रों, अध्यापकों तथा शोधकर्ताओं को सुविधा होगी।

अब मैं अपने व्याख्यान के तीसरे भाग में आता हूँ।

मैं उन पूर्व पुरुषों का स्मरण करना चाहूंगा जिन्होंने हिन्दी में विज्ञान लेखन की नींव रखी और उसे पुष्ट बनाया। इनमें भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, बाबू श्याम सुन्दर दास, पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी,पं. रामचन्द्र शुक्ल, महापंडित राहुल सांकृत्यायन, पं. सुधाकर द्विवेदी, प्रो. फूलदेव सहाय वर्मा, डॉ. सत्यप्रकाश, डॉ. गोरख प्रसाद,डॉ. आत्माराम, डॉ. ब्रजमोहन मुख्य हैं। नई पीढ़ी में मेरे तमाम समकालिक हैं जिनका नाम मैं नहीं ले रहा- को बड़ छोट कहत अपराधू। मैंने स्वयं हिन्दी साहित्य और विज्ञान लेखन में 60 वर्ष बिताये हैं और देश की अग्रणी संस्था विज्ञान परिषद् प्रयाग का कार्यभार संभाल रहा हूँ। मेरा अहर्निश प्रयास है कि नये प्रतिभाशाली व्यक्ति विज्ञान लेखन के प्रति आकृष्ट हों क्योंकि भविष्य उन्हीं का है।

अब में अन्त में कुछ सम्भावनाओं एवं सुझावों को सूचीबद्ध करना चाहूंगा।

  • मानक पारिभाषिक शब्दावली का ही व्यवहार हो। मनमाने प्रयोग नहीं हों।
  • नये उभरते वैज्ञानिक विषयों पर अधिकारी विद्वानों से हिन्दी में लेखन को प्रोत्साहित किया जाये।
  • विज्ञान लेखन की विविध विधाओं में परिष्कृत लेखन हो।
  • यथासम्भव शीघ्र ही विज्ञान विश्वकोश की रचना हो। विज्ञान परिषद् ने कई वर्षों पूर्व ऐसा कोश तैयार करके केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय को सौंप रखा है। अनुरेध है कि उसे शीघ्र प्रकाशित किया जाये। दुर्लभ गौरव ग्रन्थों का पुनः प्रकाशन हो।
  • हिन्दी विज्ञान लेखकों के लिए नये नये पुरस्कारों की स्थापना हो।
  • हिन्दी में नवीन वैज्ञानिक शोध पत्रिकाओं के प्रकाशन को प्रोत्साहित किया जाये।

मैं अत्यन्त आशावादी हूँ। मुझे विश्वास है कि मेरे जीवन काल में ही विज्ञान की हिन्दी राष्ट्रभाषा हिन्दी बन सकेगी। निश्चय ही हिन्दी विश्वभाषा बनकर रहेगी।

जय हिन्दी, जय नागरी, जय विज्ञान।

सन्दर्भ ग्रन्थ[सम्पादन]

हिन्दी में स्वतन्त्रता परवर्ती विज्ञान लेखन : डॉ. शिवगोपाल मिश्र,

वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग, नई दिल्ली 2004

हिन्दी विज्ञान साहित्य का सर्वेक्षण : डॉ. शिवगोपाल मिश्र, हिन्दुस्तानी एकेडमी 2004

विज्ञान प्रवाह : डॉ. शिवगोपाल मिश्र, विज्ञान परिषद् प्रयाग 2006

इतस्ततः -डॉ. शिवगोपाल मिश्र, विज्ञान परिषद् प्रयाग 2015

vijnananparishad_prayag@rediffmail.com