हिन्दी-प्रसार आन्दोलन

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उन्नीसवीं शताब्दी में भारत में भावनात्मक संदर्भ की क्रांति शुरू हुई। उस समय देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति अत्यन्त दयनीय हो चुकी थी। देश में होने वाले आन्दोलनों से जन-जीवन प्रभावित हो रहा था। भारत की राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय आन्दोलन के लिए एक भाषा की आवश्यकता सामने आई। इस आवश्यकता के संदर्भ में डॉ॰ अम्बा शंकर नागर का मन्तव्य उद्धरणीय है-

”सन् 1857 का आन्दोलन दासता के विरूद्ध स्वतंत्रता का पहला आन्दोलन था। यह आन्दोलन यद्यपि संगठन और एकता के अभाव के कारण असफल रहा, पर इसने भारतवासियों के हृदय में स्वतंत्रता की उत्कट अभिलाषा उत्पन्न कर दी। आगे चलकर जब भारत के विभिन्न प्रांतों में स्वतंत्रता के लिए संगठित प्रयत्न आरंभ हुए तो यह स्पष्ट हो गया कि बिना एक समान्य भाषा के देश में संगठन होना असंभव है।“

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में समाजिक, धार्मिक ही नहीं, राजनीतिक आंदोलनों में हिंदी मुख्य भाषा सिद्ध हुईं इस प्रकार हिन्दी को व्यापक जनाधार मिला। राष्ट्रीय भावना जगाने हेतु हिन्दी को संपर्क भाषा के रूप में प्रयोग किया गया। विभिन्न व्यक्तियों और संस्थानों द्वारा हिंन्दी-प्रयोग हेतु आन्दोलन के रूप में कार्य किया गया। बिहार ने सबसे पहले अपनाई थी हिंदी को, बनाई थी राज्य की अधिकारिक भाषा बिहार देश का पहला ऐसा राज्य है, जिसने सबसे पहले हिंदी को अपनी अधिकारिक भाषा माना है। जिसके प्रमुख क्षेत्र है। दक्षिण बिहार हिंदी प्रदेश से होने के बावजूद बिहारी एक टोन बन गया है. बोलने के क्रम में किसी भी बिहारी से र और ड़ का उच्‍चारण करवा लीजिए. स और श का उच्‍चारण करवा लीजिए। बोलने के क्रम में एक बार भी बिहारी टोन में नहीं बोले तो क्‍या बोले। <

प्रमुख व्यक्तियों के योगदान[सम्पादन]

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक[सम्पादन]

लोकमान्य तिलक प्रारंभ में परम विनम्र नेता थे। परिस्थितियों ने उन्हें ओजस्वी नेता बना दिया। ”स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है“ का नारा देने वाले तिलक ‘स्वदेशी’ के प्रबल समर्थक थे। उनकी मान्यता थी कि हिन्दी ही एकमात्र ऐसी भाषा है, जो राष्ट्रभाषा की पदाधिकारी है। उन्होंने हिंदी विषय में कहा था-968o8

”हिन्दी राष्ट्रभाषा बन सकती है मेरी समझ में हिन्दी भारत की सामान्य भाषा होनी चाहिए, यानी समस्त हिन्दुस्तान में बोली जाने वाली भाषा होनी चाहिए।“

लोकमान्य तिलक देवनागरी को ‘राष्ट्रलिपि’ और हिंदी को ‘राष्ट्रभाषा’ मानते थे। उन्होंने नागरी प्रचारिणी सभा, काशी के दिसम्बर, 1905 के अधिवेशन में कहा था-

”भारतवर्ष के लिए एक राष्ट्रभाषा की स्थापना करना है, क्योंकि सबके लिए समान भाषा राष्ट्रीयता का महत्त्वपूर्ण अंग है। समान भाषा के द्वारा हम अपने विचार दूसरों पर प्रकट करते हैं। अतएव यदि आप किसी राष्ट्र के लोगों को एक-दूसरे के निकट लाना चाहें तो सबके लिए समान भाषा से बढ़कर सशक्त अन्य कोई बल नहीं है।“

उन्होंने जनसामान्य तक अपने विचार पहुँचाने के लिए ‘हिन्दी केसरी’ साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन किया। हिन्दी का यह पत्र पर्याप्त लोकप्रिय हुआ। लोकमान्य तिलक जीवन भर हिंन्दी के प्रचार-प्रसार में लगे हुए थे। उन्होने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाने के लिए बार-बार आग्रह किया था।

निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि उन्होंने अंग्रेजी में भाषण देना छोड़कर हिंन्दी सीखी और हिन्दी के प्रबल समर्थक बन गए थे, यह उनका हिन्दी और देश-प्रेम ही था।

लाला लाजपतराय[सम्पादन]

पंजाब केसरी लाला लाजपतराय प्रबल आर्य समाजी देशभक्त थे। वे महान-प्रेमी और ओजस्वी वक्ता थे। स्वदेशी वस्तुओं के समर्थक और विदेशी वस्तुओं के विरोधी थे। उन्होंने अंग्रेजी और पंजाबी पत्र के साथ ‘वन्देमातरम्’ दैनिक उर्दू पत्र का प्रकाशन किया। उन दिनों पंजाब में हिन्दी-उर्दू का विवाद चल रहा था। पंजाब में हिन्दी प्रचार-प्रसार में लाला लाजपतराय की बलवती भूमिका थी। उन्होंने सन् 1911 में पंजाब शिक्षा संघ की स्थापना की। शिक्षा में हिन्दी को समुचित स्थान दिलाने का सराहनीय प्रयास किया। सन् 1886 में लाहौर में दयानन्द ऐंग्लो-वैदिक कॉलेज की स्थापना की गई। इससे हिन्दी प्रसार का सुदृढ़ आधार मिला। इस कॉलेज में सभी विद्यार्थियों को हिन्दी पढ़ने की अनिवार्यता थी। लाला लाजपतराय के प्रयास से पंजाब विश्वविद्यालय में हिन्दी को सम्मानीय स्थान मिला। उन्हीं का प्रयास था कि पंजाब विश्वविद्यालय में रत्न और प्रभाकर के माध्यम से हिन्दी को पाठ्यक्रम में स्थान मिला। हरियाणा के विभिन्न विश्वविद्यालयों में इन परिक्षाओं का सू़त्रपात भी वहीं से हुआ।

लाला लाजपतराय विशेष उग्र और क्रान्तिकारी नेता थे। उनके द्वारा हिन्दी में भाषण देने से जनसामान्य विशेष रूप से आन्दोलित होते थे। वे हिन्दी भाषा के माध्यम से भारत को एक सू़त्र में बाँधना चाहते थे। निश्चय ही लाला लातपतराय महान हिन्दी-प्रेमी और हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के प्रबल समर्थक थे।

पं॰ मदन मोहन मालवीय[सम्पादन]

मालवीय जी महान् राष्ट्रीय नेता थे। उन्हें तीन बार हिन्दु महासभा के अध्यक्ष पद पर प्रतिष्ठित कियागया था। वे सन् 1884 से राष्ट्रीय कार्यों में समर्पित होकर लग गए थे। वे अपने क्रियाकलापों में हिन्दी का प्रयोग करते हुए औरों में भी हिन्दी-प्रेम जगाते रहे हैं। सन् 1886 के अधिवेशन में मालवीय जी के व्याख्यान से प्रभावित होकर काला कांकर के राजा ने इन्हें ‘हिन्दुस्तान’ दैनिक पत्र का संपादक बनाया था। यहीं से उनकी हिन्दी-सेवा का अनुप्रेरक रूप सामने आया है। उन्होंने 1907 ई॰ में साप्ताहिक हिन्दी ‘अभ्युदय’ का प्रारम्भ किया। यह पत्र सन् 1915 में दैनिक समाचार-पत्र बना। मालवीय जी ने हिन्दी प्रचार-प्रसार को गति देने के लिए सन् 1910 में प्रयोग (इलाहाबाद) से ‘मर्यादा’ हिंदी मासिक पत्रिका और 20 जुलाई, 1933 ‘सनातन धर्म’ हिंदी पत्र का प्रकाशन शुरू किया है। मालवीय जी हिन्दी के महान् प्रेमी थे। इनकी प्रेरणा से ‘भारत’, ‘हिन्दुस्तान’ और ‘विश्वबन्धु’ जैसे चर्चित पत्रों का प्रकाशन शुरू हुआ है।

मालवीय जी के मन में हिन्दी के लिए विशेष आदर भाव था, इसलिए उन्होंने शिक्षा में हिन्दी की अनिवार्यता पर बल दिया। सन् 1917 में बनारस हिंदु विश्वविद्यालय की स्थापना की दृष्टि से हुई है। यहाँ के सभी विद्यार्थियों के लिए हिन्दी शिक्षा अनिवार्य थी। उन्होंने हिन्दी भाषा के विषय में स्पष्ट रूप से कहा था-

”राष्ट्रीय शिक्षा अपनी उत्तमता के उच्च शिखर पर तब तक नहीं पहुंच सकती, जब तक जनता की मातृभाषा अपने उचित स्थान पर शिक्षा के माध्यम तथा सर्वसाधारण के व्यवहार के रूप में स्थापित न की जाए।“ उन्होंने उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में हिन्दी के लिए प्रबल संघर्ष किया। राजा शिवप्रसाद सितारे-हिंद के साथ न्यायालय में हिन्दी और देवनागरी के लिए जोरदार संघर्ष किया। उन्होंने कहा था कि जनता को न्याय दिलाने के लिए न्यायालय की भाषा हिन्दी ही होनी चाहिए। न्यायालयों में हिन्दी को स्थान दिलाने का श्रेय मालवीय जी को है।

नागरी प्रचारिणी सभा, काशी की स्थापना सन् 1893 में हुई। इसकी स्थापना में मालवीय जी की विशेष भूमिका रही है। हिन्दी प्रचार के अग्रणी नेता मालवीय जी 10 अक्तूबर, 1910 को सम्पन्न हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रथम अधिवेशन के अध्यक्ष थे। उनकी प्रेरणा से देश में हिन्दी के प्रति प्रबल अनुराग और राष्ट्रीयता का भाव जगा है।

महात्मा गाँधी[सम्पादन]

स्वतंत्रता आन्दोलन में महात्मा गाँधी सजग, साहसी और आदर्श नेता के रूप में सामने आये। भारतीय आदर्शों को समाज में पल्लवित कराने में गाँधी जी ने अपने जीवन का हर पल लगाया। दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद हिन्दी और हिन्दुस्तान को जगाने में लग गये। सन् 1917 में गुजरात प्रदेश के भड़ौच गुजरात शिक्षा परिषद् के अधिवेशन में उन्होंने अंग्रेजी को राष्ट्रभाषा बनाने के विरोध किया और हिन्दी के महत्त्व पर मुक्तकंठ से चर्चा की थी-

”राष्ट्र की भाषा अंग्रेजी को राष्ट्रभाषा बनाना देश में ‘एैसपेरेण्टों’ को दाखिल करना है। अंग्रेजी को राष्ट्रीय भाषा बनाने की कल्पना हमारी निर्बलता की निशानी है।“

महात्मा गाँधी ने सन् 1918 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के इन्दौर के अधिवेशन में हिन्दी-प्रेम प्रकट करते हुए आह्नान किया था :

”आप हिन्दी को भारत का राष्ट्रभाषा बनाने का गौरव प्रदान करें। हिन्दी सब समझते हैं। इसे राष्ट्रभाषा बनाकर हमें अपना कर्तव्य-पालन करना चाहिए।“

भारत वर्ष में शिक्षा के माध्यम पर दो-टूक चर्चा करते हए गाँधी जी ने 2 सितम्बर, 1921 को कहा था-

”अगर मेरे हाथों में तानाशाही सत्ता हो, तो मैं आज से ही विदेशी माध्यम के जरिए हमारे लड़के-लड़कियों की शिक्षा बन्द कर दूँ और सारे शिक्षकों और प्रोफेसरों से यह माध्यम तुरन्त बदलवा दूँ।“

गाँधी जी की दृष्टि में हिन्दी ही भारत की संपर्क भाषा के रूप में आदर्श भूमिका निभा सकती है। उन्होंने विभिन्न व्यक्तियों, पत्र-पत्रिकाओं और संस्थाओं को हिन्दी-प्रयोग की अनूठी प्रेरणा दी है। वे हिन्दी को राष्ट्रीय एकता, स्वाधीनता की प्राप्ति और सांस्कृतिक उत्कर्ष मानते थे। उन्होंने हिन्दी को साधन और साध्य दोनों रूपों में अपनाया था। महात्मा गाँधी के हिन्दी-प्रेम और प्रचार-प्रसार के विषय में डॉ॰ रामविलास शर्मा का कथन विशेष रूप में उल्लेखनीय है-

”दक्षिण भारत में गाँधी जी और उनके अनुयायियों-सहयोगियों ने जितना हिन्दी प्रचार किया, उतना और किसी नेता, राजनीतिक पार्टी या सांस्कृतिक संस्था ने नहीं किया।“

गाँधी जी हिन्दी और भारतीय भाषाओं के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने हिन्दी प्रचार-प्रसार को गति देने के लिए विभिन्न संस्थाओं का विशेष सहयोग लिया था। गाँधी सेवा संघ, चर्खा संघ, हरिजन सेवक संघर्ष आदि का सारा कामकाज हिन्दी में होता रहा है। निश्चय ही हिन्दी-प्रसार के प्रयत्न में गाँधी जी की भूमिका अग्रगण्य रही है।

राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन[सम्पादन]

राष्ट्रभाषा हिन्दी को संघ की राजभाषा बनाने का जो प्रयास राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन ने किया है, वह सदा याद किया जाता रहेगा। पं॰ मदनमोहन मालवीय के दर्शाये गए मार्ग पर चल कर इन्होंने हिन्दी की अनुपमेय सेवा की है। इनके द्वारा हिन्दी साहित्य सम्मेलन के माध्यम से की गई हिन्दी की सेवा अनपमेय रही है। टण्डन जी हिन्दी साहित्य सम्मेलन के संस्थापकों में से थे। इन्हीं की प्रेरणा से महात्मा गाँधी जी भी हिन्दी साहित्य सम्मेलन से जुड़े हैं। ये लाला लाजपतराय के साथ मिलकर भी हिन्दी के प्रसार में लगे रहे। लाला जी की मृत्यु के पश्चात् टण्डन जी ‘लोकसेवा मण्डल’ के सभापति बन कर हिन्दी प्रसार में लगे रहे। इसका कार्यालय लाहौर में था। इसलिए टण्डन जी ने वहाँ की संस्थाओं के माध्यम से हिन्दी का अनुप्रेरम प्रसार किया। ये हिन्दी के प्रबल समर्थक थे, गाँधी जी हिन्दुस्तानी के समर्थक थे।

टण्डन जी की प्ररेणा से हिन्दी साहित्य सम्मेलन आज भी हिन्दी के प्रचार-प्रसार में लगा है। यह टण्डन जी की ही देन है।

===डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद=== महात्मा गाँधी और हिन्दी के परम् भक्त डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद अखिल भारतीय काँग्रेस के सम्माननीय सदस्य थे। विभिन्न हिन्दी सम्मेलनों की अध्यक्षता और सहभागिता करते हुए इनका सहज और निकट संबंध महात्मा गाँधी, मदनमोहन मालवीय और राजर्षि पुरूषोत्तमदास टण्डन से हुआ। देश की सभी हिन्दी संस्थाओं से इनका गहरा सम्बन्ध था और ये पूरी रूचि और पूरे उत्साह से भाग लेते रहे हैं। वे हिन्दी के प्रयोग हेतु सबको प्रेरित करते रहे हैं। उनका हिन्दी के संदर्भ का विचार अनुकरणीय है-

”मैं हिन्दी के प्रचार, राष्ट्रभाषा के प्रचार को राष्ट्रीयता का मुख्य अंग मानता हूँ। मैं चाहता हूँ कि यह भाषा ऐसी हो, जिसमें हमारे विचार आसानी से साफ-साफ स्पष्टतापूर्वक व्यक्त हो सकें। राष्ट्रभाषा ऐसी होनी चाहिए, जिस केवल एक जगह के ही लोग न समझें, बल्कि उसे देश के सभी प्रान्तों में सुगमता से पहुंचा सकें।“

डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद पर महात्मा गाँधी का विशेष प्रभाव पड़ा है। हिन्दी के प्रचार-प्रसार में इनकी भूमिका विशेष उल्लेखनीय रही है। उन्होंने भारतीय भाषाओं को महत्त्व देते हुए कहा है-

”मेरा दृढ़ मत है कि कोई भी शख्स अपनी मातृभाषा के द्वारा ही तरक्की कर सकता है।..... देश भर को बाँधने के लिए, भारत के भिन्न-भिन्न हिस्से एक-दूसरे से संबंधित रहें, इसके लिए हिन्दी की जरूरत है।“

निश्चय ही डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद की हिन्दी-सेवा सदा ही याद की जाएगी। भारतीय संविधान सभा के अध्यक्ष के रूप में हिन्दी को सम्मानीय स्थान दिलाने का श्रेय डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद को है। राष्ट्रपति के रूप में हिन्दी और भारतीय भाषाओं को सम्मानजनक स्थान दिलाने का सराहनीय प्रयास किया।

काका कालेलकर[सम्पादन]

हिन्दी के प्रचार-प्रसार में अहिंदी भाषियों का नाम गौरव से लिया जाता है। ऐसे हिन्दी-प्रेमियों में काका कालेलकर का नाम विशेष श्रद्धा से लिया जाता है। इन्होंने हिन्दी के प्रसार में समर्पित होकर कार्य किया हैं उन्होंने राष्ट्रभाषा प्रचार समिति से जुड़कर और गुजरात में रहकर हिन्दी-प्रसार को नई दिशा प्रदान की है। उन्होंने कभी अंग्रेजी का विरोध नहीं किया, किन्तु प्रादेशिक भाषाओं और हिन्दुस्तानी के प्रबल हिमायती थे। यह निर्विवाद सत्य है कि काका कालेलकर ‘हिन्दुस्तानी’ के समर्थक थे। उस समय हिन्दुस्तानी का अर्थ था - हिंदी और उर्दू का मिश्रित रूप। अंग्रेजों के शासन और अंग्रेजी के शासन और अंग्रेजी के प्रभाव में ‘हिन्दुस्तान’ के प्रसार से हिंदी को ही लाभ हुआ है। इससे जन सामान्य में हिंदी के प्रति अनुराग विकसित हुआ है। गाँधी जी के अनुयायी काका कालेलकर का नाम हिंदी-आंदोलन के संदर्भ में सदा याद किया जाएगा।

सेठ गोविन्ददास[सम्पादन]

हिंदी के प्रसार के साथ इसे राजभाषा के प्रतिष्ठित पद पर सुशोभित करवाने में सेठ गोविन्ददास की अविस्मरणीय भूमिका रही है। ये उच्चकोटि के साहित्यकार हैं। आपकी नाट्यकृतियों से हिंदी साहित्य मोहक रूप में समृद्ध हुआ है। उन्होंने जबलपुर से शारदा, लोकमत तथा जयहिन्द पत्रों की शुरूआत कर जन-मन में हिंदी के प्रति प्रेम जगाने और साहित्यिक परिवेश बनाने का अनुप्रेरक प्रयास किया है।

उन्होंने सवतंत्रता आन्दोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया और हिंदी के लिए सतत प्रयास किया। भारतीय संविधान सभा में हिंदी और हिन्दुस्तानी को लेकर उठे विवाद को शांत करने में सेठ गोविन्ददास का विशेष महत्त्व रहा है। देश के मान्य सांसद और हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष रूप में हिंदी के लिए जो प्रेरक कार्य आपने किया है, वह विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

हिंदी प्रसार के आन्दोलनों में हिंदी-प्रेमियों की लम्बी नामावली है। जिनके सतत प्रयास से देश में राष्ट्रीयता का भाव विकसित हुआ, देश स्वतंत्र हुआ और हिंदी को सम्मानजनक स्थान मिला। इनमें स्वामी दयानन्द, श्रद्धानन्द, विनोबा भावे आदि के नाम श्रद्धा से लेने योग्य हैं।

प्रमुख संस्थाओं का योगदान[सम्पादन]

भारतवर्ष में स्वाधीनता संग्राम के साथ हिंदी का आन्दोलन भी चलाया जा रहा था। वास्तव में हिंदी का यह आन्दोलन अंग्रेजी के विरोध में किया गया था। स्वतंत्रता आन्दोलन के समय हिंदी या हिन्दुस्तानी ही देश की संपर्क भाषा थी। प्रत्येक आन्दोलनकारी ‘वन्देमातरम्’ या ‘जिन्दाबाद’ के नारे लगाता था। इस प्रकार भारत देश की राष्ट्रभाषा तो हिंदी ही थी। हिंदी को राजभाषा के पद पर प्रतिष्ठित करने का आन्दोलन चलाया गया है। इस आन्दोलन की सफलता पर ही 14 सितम्बर, 1949 को हिंदी राजभाषा पद पर प्रतिष्ठित किया गया है। इस आन्दोलन से हिंदी का सुन्दर परिवेश बना है, इसलिए इस आन्दोलन को ‘राष्ट्रभाषा हिंदी’ या ‘राजभाषा हिंदी’ से जोड़ सकते हैं।

हिंदी-प्रसार आंदोलन में धर्मगुरुओं, महात्माओं, राजनेताओं और हिंदी-प्रेमियों के साथ अनेक संस्थाओं की भी सराहनीय भूमिका रही हैं भारत धर्मप्रधान देश है। इसलिए हिंदी-प्रसार आन्दोलन में साहित्यिक संस्थाओं के साथ धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं का विशेष योगदान रहा है।

धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाएँ[सम्पादन]

उन्नीसवीं शताब्दी में अंग्रेजी शासन की आँच में भारतवासी तप रहे थे। ईसाई पादरियों को ईसाई धर्म-प्रचार के लिए छूट मिल चुकी थी। उनके द्वारा हिन्दु धर्म को हेय दृष्टि से देखा जाता और निन्दा की जाती थी। भारतीयों को लालच देकर धर्म-परिवर्तन कराया जाता रहा है। यह सच है कि उस समय तक भारत में जाति-पाँति, छूआ-छूत, पर्दा-प्रथा, वाल-विवाह और अनमेल विवाह आदि विकृतियाँ फैल चुकी थीं। विवश और निरीह हिन्दु विजातीय धर्म स्वीकार कर रहे थे। इस विषम क्रियाकलाप की प्रतिक्रिया पर विविध सामाजिक और धार्मिक आन्दोलनों का सू़त्रपात हुआ है। एक ओर सामाजिक और धार्मिक विकृतियों को रोकने का प्रयास शुरू हुआ, तो नैतिक मूल्यों को अनुकूलन आधार मिला। इस दिशा में ब्रह्म समाज, आर्य समाज, सनातन धर्म सभा, प्रार्थना सभा, थियोसोफिकल सोसाइटी आदि संस्थाओं की भूमिका से समाज में आशा की किरण जगमगाई है। इन संस्थाओं के द्वारा राष्ट्रीय भाव जगाने के लिए हिंदी को संपर्क भाषा के रूप में अपनाया गया।

ब्रह्म समाज[सम्पादन]

भारतीय आदर्श और संस्कृति के पुजारी राजा राममोहन राय ने सन् 1828 में कलकत्ते में ‘ब्रह्म समाज’ की स्थापना की। उन्होंने जब ईसाई धर्म-प्रचार से भारतीयों की मानसिकता पर पड़ने वाले प्रभाव को देखा और वे धर्म-परिवर्तन की प्रक्रिया से आन्दोलित हुए तब उन्होंने पुनर्जागरण के लिए ‘ब्रह्म समाज’ को चिन्तन का केन्द्र बनाया।

देश में राष्ट्रीय, सामाजिक और धार्मिक चेतना जगाने में ब्रह्म समाज की अनूठी भूमिका रही है। ब्रह्म समाज के संस्थापक राजा राममोहन राय ने युगीन संदर्भ में आधुनिक विचार-चिन्तन को स्वीकार किया। उनके व्यक्तित्त्व में पूर्व और पश्चिम का अनुपम समन्वय था। वे अंग्रेजी को एक महत्त्वपूर्ण भाषा के रूप में सम्मान देते थे, किन्तु राष्ट्रीय संदर्भ में हिंदी के सबल समर्थक थे। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि भारतवर्ष में राष्ट्रीयता के भाव से सम्पन्न अखिल भारतीय भाषा बनने की क्षमता मात्र हिंदी में है। उनकी विद्वता और राष्ट्रीयता का स्पष्ट बोध इससे होता है कि उन्होंने ‘बंगदूत’ नामक पत्र कलकत्ता से प्रकाशित किया। इसके पत्र में हिंदी, बंगला, अंग्रेजी और फारसी के पृष्ठ हुआ करते थे। वे स्वयं हिंदी में लिखते तथा हिंदी में लिखने के लिए दूसरों को भी प्रोत्साहित करते रहते थे। अहिंदी भाषा क्षेत्र बंगाल में ‘ब्रह्म समाज’ की भूमिका विशेष सराहनीय रही है। समाज-सुधार और हिंदी-प्रचार में अनेक विद्वान नेता-तन-मन से लग गए थे। इस संदर्भ में महर्षि देवेन्द्र नाथ, केशव चन्द्र सेन, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर और नवीन चन्द्र राय के नाम श्रद्धा से लेते हैं। इस समाज द्वारा अधिकांश पुस्तक हिंदी में प्रकाशित की गई। इस संस्था के सभी सदस्यों से िंहंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाने का आह्नान किया गया। नवीन चन्द्र राय ने पंजाब पहुँचकर 1867 में ‘ज्ञानप्रदायिनी’ पत्रिका निकाल कर हिंदी-आन्दोलन को गति दी। भूदेव मुखर्जी ने बिहार की शिक्षा में हिंदी को प्रतिष्ठित किया और वहाँ के न्यायालयों में हिंदी और नागरी लिपि के प्रयोग का मार्ग खोला। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘आचार-प्रबन्ध’ में हिंदी को सर्व उपयोगी गुणसम्पन्न देश की संपर्क भाषा के रूप में अपनाने का आह्नान किया।

केशव चन्द्र सेन की प्रेरणा से स्वामी दयानन्द ने हिंदी में व्याख्यान देना शुरू किया। उन्होंने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ की रचना हिंदी में की। सेन ने सन् 1875 में ‘सुलभ समाचार’ निकालकर उस आन्दोलन को अधिक मुखर रूप प्रदान किया। उनकी मान्यता थी कि हिंदी देश की सर्वाधिक प्रचलित भाषा है, इसलिए यह भाषा ही राष्ट्रीय एकता का आधार बन सकती है। हिंदी-प्रसार में ‘ब्रह्म समाज’ की भूमिका सर्वोपरि है।

आर्य समाज[सम्पादन]

भारतवर्ष के सामाजिक और धार्मिक आन्दोलनों में आर्य समाज का स्थान सर्वोपरि है। आर्य समाज की स्थापना 1875 ई. में, बम्बई में स्वामी दयानन्द द्वारा समाजोत्थान के लिए की गई थी। आर्य समाज द्वारा पूरे देश में स्वराज, धर्म और हिंदी भाषा के लिए आन्दोलन किया गया। आर्य समाज के आन्दोलनकारी हिंदी को ‘आर्यभाषा’ नाम से संबोधित कर अपना सारा कार्य इसमें ही करते थे। आर्य समाज के 28 नियमों में पाँचवां नियम हिंदी पढ़ना था। आर्य समाज के बढ़ते कदम लाहौर पहुँचे और 24 जनवरी, 1877 को लाहौर में आर्य समाज की स्थापना हुई। आर्य समाज का सत्संग और सम्मेलन हिंदी में ही होता था। इसलिए हिंदी-प्रसार को सुन्दर आधार मिला। आर्य समाज द्वारा गुरूकुलों, कन्या-पाठशालाओं और महिला-विद्यालयों की स्थापना की, जिनमें हिंदी की अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था थी। गुरूकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय में सर्वप्रथम विज्ञान की शिक्षा हिंदी में देने की सफल व्यवस्था की गई। इस विषय में श्री इन्द्रविद्यावाचस्पति का कथन उद्धरणीय है, ‘‘भारत में पहला शिक्षणालय, जिसमें राष्ट्रभाषा के माध्यम द्वारा समपूर्ण ज्ञान की शिक्षा का सफल परीक्षण किया गया, गुरूकुल काँगड़ी था।’’

आर्य समाज के द्वारा सामाजिक और सांस्कृतिक उत्कर्ष के लिए हिंदी में अनेक साप्ताहिक और मासिक पत्रिकाएँ प्रकाशित की गई। भारत की जनता स्वामी दयानन्द के विचार पढ़ना चाहती थी। इन पत्र-पत्रिकाओं में ऐसे विचार प्रकाशन से हिंदी पर्याप्त लोकप्रिय बनी। स्वामी जी पहले संस्कृत में व्याख्यान देते थे, किन्तु कलकत्ता के ब्रह्म समाज के नेता केशव सेन के आग्रह पर उन्होंने हिंदी को अपनाया है। इस प्रकार हिंदी-प्रसार को लोकप्रिय आधार मिला है। स्वामी जी के परम सहयोगी इन्द्रविद्यावाचस्पति ने स्वामी जी के हिंदी-प्रेम के महत्त्व के विषय में लिखा है-

‘‘महर्षि ने लोक-भाषा को उपदेश का साधन बनाकर न केवल अपने मिशन को लोकप्रिय और व्यापक बना दिया। भविष्य में राष्ट्रभाषा बनाने वाली आर्य को पुष्टि देकर राष्ट्र के स्वाधीनता-भवन की दृढ़ बुनियाद भी रख दी।’’

गुजराती भाषा-भाषा स्वामी जी के हिंदी-प्रेम से उनके अनुयायियों में अनुकरणीय हिंदी प्रेम जगा। श्री राम गोपाल के शब्दों में, ‘‘उनके अनुयायियों के धर्म-प्रचार से जो अधिक उत्तम चीज राष्ट्रीय जीवन को प्राप्त हुई, वह थी राष्ट्रभाषा का प्रचार।’’ आर्य समाज के माध्यम से हिंदी का प्रचार भारत से बाहर मॉरिशस, फिजी, गयाना, सूरीनाम, ट्रिनीडाड-टुबैगो, युगांडा और लंदन में हुआ।

आर्य समाज ने जैसा प्रेरक कार्य सामाजिक, धार्मिक क्षेत्रों में किया, इसी प्रकार हिंदी-प्रसार में सर्वोतम कार्य किया।

सनातन धर्म सभा[सम्पादन]

ब्रह्म समाज और आर्य समाज के द्वारा मूर्तिपूजा और बहुदेवतावाद के प्रबल विरोध की प्रतिक्रिया में सन् 1973 में ‘सनातन धर्म-रक्षिणी सभा’ की स्थापना हरिद्वार और दिल्ली में की। सन् 1900 में पं. मदन मोहन मालवीय आदि ने सभा को व्यवस्थित रूप प्रदान किया। सभा का मुख्य उद्देश्य था - हिन्दु धर्म की स्मृतियों और पुराण आदि का शास्त्रों के आधार पर सुधार कार्य। सनातन धर्म की हजारों शाखाएँ भारत वर्ष के विभिन्न प्रान्तों में खुलीं। इस सभा का अधिकांश कार्य संस्कृत और हिंदी-प्रसार को बल मिला।

सनातन धर्म सभा के माध्यम से देश के विभिन्न प्रदेशों में शिक्षण संस्थाएँ शुरू हो गई। इनमें हिन्दी को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया। उत्तर भारत क्षेत्र में इस को आशातीत सफलता मिली। पं. मदन मोहन मालवीय के प्रिय शिष्य गास्वामी गणेश दत्त इस सभा के कर्णधार थे। इनका जन्म पंजाब के लायलपुर (पाकिस्तान) में हुआ था। उन्होंने सर्वप्रथम लायलपुर में एक गुरूकुल की स्थापना की। इसमें संस्कृत-हिंदी अध्ययन-अध्यापन व्यवस्था थी। इसके पश्चात् सैंकड़ों संस्थाएँ खुली। इससे पंजाब में हिंदी का व्यापक प्रचार हुआ। गोस्वामी जी ने सन् 1940 में ‘विश्वबन्धु’ दैनिक समाचार-पत्र का श्रीगणेश किया। भारत-विभाजन के बाद इन्होंने अपना कार्यक्षेत्र हरिद्वार बनाया। सन् 1947 में दिल्ली में ‘अमर भारत’ हिंदी दैनिक का प्रकाशन किया।

गोस्वामी गणेश दत्त के साथ हिंदी-प्रसार में योगदान देने वालों में श्रद्धाराम फिल्लौरी का नाम विशेष आदर से लिया जाता है। सनातन धर्म सभा के सतत प्रयास से भारत में मुख्यतः उत्तर भारत में हिंदी जन-मानस की भाषा बनी।

प्रार्थना समाज[सम्पादन]

भारत वर्ष में सामाजिक, धार्मिक और शिक्षा में सुधार के लिए महाराष्ट्र में ‘परमहंस सभा’ की स्थापना सन् 1849 में हुई। ब्रह्म समाज के नेता श्री केशव चन्द्र सेन के बम्बई आगमन पर सन् 1867 में इस सभा को नया रूप देकर ‘प्रार्थना समाज’ के आधार पर प्रभावी कार्य शुरू किया गया। इस संस्था द्वारा समाज में व्याप्त जाति-पाँति, अछूत और नारी-समस्याओं को दूर करने का सतत् प्रयास किया गया। इस समाज का अधिकांश कार्य हिंदी में किया जाता था। साप्ताहिक प्रवचनों हिंदी-प्रयोग से महाराष्ट्र में हिंदी का प्रेरक परिवेश बना है।

इस समाज के सक्रिय नेताओं में न्यायाधीश महादेव गोविंद रानाडे और आर. जी. भण्डारकर के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। गोविंद रानाडे ने हिंदी और नागरी लिपि के प्रयोग और प्रसार का सतत् प्रयास किया है। निश्चय ही हिंदी-प्रसार आन्दोलन में प्रार्थना समाज की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

थियोसोफिकल सोसाइटी[सम्पादन]

इस सोसाइटी की स्थापना भारतीय दर्शन और संस्कृति के प्रभाव से ‘विश्व-बन्धुत्व’ भाव जगाने हेतु सन् 1875 में अमेरिका में हुई। इसके संस्थापक मदाम ब्लावत्स्की और कर्नल आलकोट थे। सन् 1897 में इसका मुख्य कार्यालय मुम्बई में स्थापित किया गया। इस संस्था पर आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द का विशेष प्रभाव पड़ा। इस संस्था ने स्वामी जी को अध्यात्म गुरु भी माना है। इसके उद्देश्य ब्रह्म समाज और आर्य समाज से बहुत कुछ मेल खाते हैं। सन् 1893 में श्रीमति एनी बेसेंट ने इस संस्था का नेतृत्व अपने हाथों में लिया। उन्होंने सन् 1898 में काशी में सेंट्रल हिंदू कॉलेज और हिंदू कन्या विद्यालय की स्थापना की। इसके साथ ही देश के विभिन्न प्रांतों में शिक्षण संस्थाएँ खोलीं। इन विद्यालयों और महाविद्यालयों में भारतीय संस्कृति की शिक्षा हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में दी जाती थी। इस सोसाइटी पर अंग्रेजी का भी प्रभाव दिखाई देता है, किन्तु इनकी जो भी प्रचारादि सामग्री छपती, वह अंग्रेजी के साथ हिन्दी में भी होती थी। इस प्रकार हिन्दी-प्रसार को सुअवसर मिला। स्वाधीनता संग्राम के प्रति विशेष लगाव होने के कारण सन् 1918 से सन् 1921 तक इन्होंने दक्षिणी भारत में घूम-घूमकर हिन्दी का प्रचार किया था। उन्होंने हिन्दी का महत्त्व अपनी पुस्तक ‘नेशन बिल्डिंग’ में लिखा है-

”हिन्दी जानने वाले आदमी संपूर्ण भारत में यात्रा कर सकता है और उसे हर जगह हिन्दी बोलने वाले मनुष्य मिल सकते हैं। हिन्दी सीखने का कार्य ऐसा त्याग है, जिसे दक्षिणी भारत के निवासियों को राष्ट्र की एकता के हित में करना चाहिए।

श्रीमति एनी बेसेंट ने सन् 1928 में मद्रास (चेन्नई) में हुए हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में हिन्दी-संदर्भ में प्रेरक वक्तव्य दिया था-

”मेरा विश्वास है कि हिन्दी भारतवर्ष की मुख्य (संपर्क) भाषा होगी। मेरा विचार है कि भारतवर्ष की शिक्षा में हिन्दी अनिवार्य होनी चाहिए।“

इस प्रकार के विचारों और गतिविधियों से हिन्दी-प्रसार को अनुकूल दिशा मिली है।

साहित्यिक संस्थाएँ[सम्पादन]

भारतवर्ष एक लम्बे समय तक दासता की बेड़ी में जकड़ा रहा। हिन्दी के प्रचार-प्रसार हेतु समय-समय पर अनेक साहित्यिक संस्थाओं की स्थापना होती रहती है। राष्ट्रीय भाव जगाने और हिंदी के प्रचार-प्रसार में इन संस्थाओं का विशेष योगदान रहा है। इनमें कुछ संस्थाओं का उल्लेख किया जा रहा है।

भारतेन्दु मण्डल[सम्पादन]

आधुनिक हिन्दी साहित्य के जन्मदाता भारतेन्दु हरिशचन्ट्ठद्र ने साहित्यकारों का एक मण्डल बनाया था। यह मण्डल हिन्दी साहित्य के माध्यम से सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन का अभिलाषी था। मण्डल के सदस्यों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं पर महत्वपूर्ण कृतियों की रचना की, पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन किया। भारतेन्दु हरीशचन्द्र ने हिन्दी पर व्याख्यान देते हुए कहा था-

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।

भारतेन्दु मण्डल की गतिविधियों से सामाजिक क्षेत्र में जागरण का परिवेश बना, तो स्वदेशी आंदोलन को प्रभावी आधार मिला है। हिन्दी-प्रेम के कारण जन-सामान्य में हिन्दी लोकप्रिय हुई। भारतेन्दु हरीशचन्द्र के साथ इस मंडल के सक्रिय सदस्य थे- पं. प्रताप नारायण मिश्र, पं. बालकृष्ण भट्ट, बदरी नारायण चौधरी, श्रीनिवास दास, बालमुकुंद गुप्त, रमाशंकर व्यास और तोताराम आदि।

नागरी प्रचारिणी सभा, काशी[सम्पादन]

इस सभा की स्थापना 10 मार्च, 1893 में हुई। इस संस्था को संरक्षक के रूप में बाबू श्यामसुन्दर दास, श्री गोपाल प्रसाद खत्री और पं. राम नारायण मिश्र आदि का आशीर्वाद मिला। इस संस्था से अन्य जुड़ने वाले गणमान्य विद्वानों में महामना मदन मोहन मालवीय, श्रीधर पाठक, श्री अम्बिका दत्त व्यास, श्री राधाचरण गोस्वामी और बदरी नारायण चौधरी आदि प्रमुख हैं। कोश-रचना, हिन्दी साहित्य के इतिहास-लेखन, हस्तलिखित गं्रथों की खोज और संगोष्ठी आयोजन में यह संस्था देश में शीर्ष स्थान पर है।

कामता प्रसाद गुरु रचित ‘हिन्दी व्याकरण’ पं. किशोरी वाजपेयी कृत ‘हिन्दी शब्दानुशासन’ के अतिरिक्त ‘हिन्दी शब्दसागर’, ‘हिन्दी साहित्य का बृहत् इतिहास’ आदि के दुर्लभ और महत्वपूर्ण प्रकाशन से इस संस्था को हिन्दी-विकास में विशेष महत्व मिला है। ‘नागरी प्रचारिणी’ शोध-पत्रिका का लगभग सौ वर्षों का गरिमामय इतिहास इस संस्था की गौरव गाथा का स्वरूप है।

इस संस्था ने नागरी लिपि के सुधार, आशुलिपि (शार्टहैंड) और टंकण (टाइप) संदर्भ में अनुकरणीय पहल की है। नागरी प्रचारणी सभा का लगभग सौ वर्षों का इतिहास हिन्दी प्रचार-प्रसार के श्रेष्ठ और प्रेरक संदर्भ को प्रस्तुत करता है। यह सभा आज भी हिन्दी के प्रचार-प्रसार के साथ हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने में लगी है।

हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग[सम्पादन]

सम्मेलन हिन्दी प्रचार-प्रसार की सर्वप्रमुख साहित्यिक संस्था है। सन् 1910 में सम्मेलन का प्रथम अधिवेशन महामना मदनमोहन मालवीय की अध्यक्षता में हुआ। राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन ने इसी समय न्यायालय में हिन्दी और देवनागरी प्रयोग पर बल दिया।

सम्मेलन द्वारा हिन्दी प्रचार-प्रसार और हिन्दी-विकास के लिए नियम बनाए गए। इनमें प्रमुख थे- राष्ट्रभाषा हिन्दी और राष्ट्रलिपि देवनागरी का प्रचार, हिन्दी भाषी प्रदेशों की शिक्षण संस्थाओं के साथ न्यायालयों में हिन्दी का प्रयोग, देवनागरी में छपाई की समुचित व्यवस्था, हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं का विकास, हिन्दी विद्वानों और साहित्यकारों का सम्मान और हिन्दी प्रचार-प्रसार हेतु हिन्दी की उच्च परीक्षाओं का आयोजन।

सम्मेलन द्वारा उक्त उद्देश्यों की पूर्ति हेतु सतत् प्रयत्न किया जाता रहा है। सम्मेलन के चतुर्थ अधिवेशन अर्थात् सन् 1913 से हिन्दी के व्यापक प्रचार हेतु प्रथमा, मध्यमा और उत्तमा आदि परीक्षाओं का आयोजन शुरू हुआ।

सम्मेलन की त्रौमासिक ‘सम्मेलन पत्रिका’ शोधपरक और गन्वेषणात्मक आलेखों के आधार पर सतत् प्रकाशित होती रही है। ‘राष्ट्रभाषा संदेश’ पत्र भी हिन्दी प्रचार-प्रसार की आकर्षक भूमिका में है। हिन्दी का चर्चित शब्दकोश ‘मानक हिन्दीकरण’ पाँच खण्डों में प्रकाशित करना गरिमा का विषय है। सन् 1963 में भारत सरकार के द्वारा लोक सभा में एक विशेष स्वीकृति कर ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ को राष्ट्रीय महत्त्व की संस्था के रूप में मान्यता दी गई है।

इस प्रकार हिन्दी प्रचार-प्रसार में सम्मेलन का सर्वोपरि महत्व है।

दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, मद्रास[सम्पादन]

महात्मा गाँधी ने हिन्दी सम्मेलन के सन् 1918 के इन्दौर के अधिवेशन में दक्षिण में हिन्दी प्रचार की योजना बनाई। उनके पुत्री श्री देवदास गाँधी दक्षिण भारत में प्रथम हिन्दी प्रचारक के रूप में गए। दक्षिण भारत में प्रचारार्थ श्री सत्यदेव परिव्राजक आदि वहाँ पहुँचे। वहाँ प्रारंभ में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के माध्यम से प्रचार हुआ। सन् 1927 में इसे दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, मद्रास नाम दिया गया। इसके संस्थापकों में चक्रवर्ती राजगोपालचारी का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

सभा के द्वारा दक्षिण के प्रांतों में हिन्दी का प्रेरक प्रचार किया गया। हिन्दी भाषा के प्रचारार्थ प्रवेशिका विशारद्, पूर्वार्द्ध, विशारद् उत्तरार्द्ध, प्रवीण तथा हिन्दी प्रचारक आदि परीक्षाओं का संचालन किया जाता है। सभा की प्रवेशिका, विशारद् और प्रवणी परीक्षाओं को केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा मान्यता मिली है। यहाँ से मासिक ‘हिन्दी प्रचार समाचार’ और ‘दक्षिणी भारत’ द्विमासिक पत्रिका का प्रकाशन होता है। केन्द्र सरकार ने सभा को श्रेष्ठ हिन्दी प्रचारक मानकर राष्ट्रीय महत्व प्रदान किया है।

राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा[सम्पादन]

हिन्दी साहित्य सम्मेलन का 25वाँ अधिवेशन सन् 1936 में नागपुर में हुआ। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सम्मेलन के अध्यक्ष थे। श्री पुरुषोत्तमदास टण्डन के प्रस्तावानुसार दक्षिण में हिन्दी प्रचारार्थ ‘हिन्दी प्रचार समिति’ का गठन किया गया। इसका प्रथम अधिवेशन सन् 1936 में वर्धा में हुआ। काका कालेलकर के सुझाव पर इसका नाम बदल कर ‘राष्ट्रभाषा प्रचार समिति’ रखा गया। इस समिति का मुख्य उद्देश्य हिन्दी-प्रचार था और इसी आधार पर समिति मानती थी ‘एक हृदय हो भारत जननी’ समिति ने हिन्दी प्रचार-प्रसार के लिए सन् 1938 से अपनी परीक्षाओं का संचालन शुरू किया समिति ने जुलाई 1943 से ‘राष्ट्रभाषा’ मासिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। इसके पश्चात् ‘राष्ट्रभारती’ पत्रिका का प्रकाशन किया गया। इस समिति के देश से बाहर लंका, स्याम, सुमात्र, मॉरिशस, इंग्लैंड आदि देशों में केन्द्र हैं।

समिति सम्मान और पुरस्कार से भी हिन्दी प्रचार-प्रसार को दिशा प्रदान करती है। इस समिति की गतिविधियों से हिन्दी को विशेष बल मिला है।

इनके अतिरिक्त हिन्दुस्तानी प्रचार सभा, वर्धा; गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबाद; हिन्दी विद्यापीठ, मुम्बई; महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा, पूना और बिहार राष्ट्रभाषा, पटना आदि की हिन्दी प्रचार-प्रसार भूमिका उल्लेखनीय है।