हिन्दी में वैज्ञानिक साहित्य सृजन की स्थिति

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डॉ. नवीन प्रकाश सिंह ' नवीन '

सूर्यांश , ए- 5, साकेत हाउसिंग कॉलोनी ,

सूसेन-तरसाली रिंग रोड , बड़ौदा- 390010


विज्ञान एवं प्रौद्यागिकी ने मानव जीवन के विकास एवं समृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। वैज्ञानिक उपलब्धियां आज हमारे सुख सुविधापूर्ण दैनिक जीवन में अनिवार्य आवश्यकता बन कर विद्यमान हैं। इस अति विशिष्ट और लोकोपयोगी ज्ञान को जन साधारण तक पहुंचाने के लिए राजभाषा हिन्दी में विज्ञान लेखन की क्या स्थिति है यही प्रस्तुत आलेख की विषय वस्तु है।

हमारे देश में 3500 से भी अधिक हिन्दी विज्ञान लेखकों का विशाल समुदाय है परन्तु प्रतिबद्ध लेखक मुश्किल से 5 या 7 प्रतिशत ही होंगे। इन लेखकों ने विज्ञान के विविध विषयों और विधाओं में 8000 से भी अधिक पुस्तकें लिखी हैं परन्तु इनमें से अधिकतर पुस्तकों में गुणवत्ता का अभाव है। मौलिक लेखन कम हुआ है और संदर्भ ग्रंथ न के बराबर हैं। लोकप्रिय विज्ञान साहित्य सृजन में प्रगति अवश्य हुई है परन्तु सरल , सुबोध विज्ञान साहित्य जो जन साधारण की समझ में आ सके कम लिखा गया है। इंटरनेट पर आज हिन्दी में विज्ञान सामग्री अति सीमित है। विश्वविद्यालयों तथा राष्ट्रीय वैज्ञानिक संस्थानों में कार्यरत विषय विशेषज्ञ अपने आलेख शोधपत्र अथवा पुस्तकें अंग्रेजी में लिखते हैं। वह हिन्दी अथवा अन्य भारतीय भाषा में विज्ञान लेखन में रुचि नहीं रखते। संभवत: भाषागत कठिनाई तथा वैज्ञानिक समाज की घोर उपेक्षा उन्हें आगे नहीं आने देती। इसके अतिरिक्त हिन्दी में विज्ञान लेखन का मानकीकरण , शोधपरक विषयों के लेखन के लिए डेटा एकत्रीकरण , शोधपत्रों आलेखो का प्रस्तुतीकरण तथा प्रकाशन आदि पर भी प्रस्तुत आलेख में चर्चा की गई है।

हिन्दी अनौपचारिक रूप से हमारे देश की सम्पर्क भाषा है। उत्तर भारत के लगभग सब लोग हिन्दी जानते हैं। दक्षिण भारत में भी लगभग 30 प्रतिशत लोग हिन्दी जानते हैं और मोटे तौर पर 80 करोड़ लोग हिन्दी से परिचित हैं फिर भी हमारे देश में हिन्दी का कोई भविष्य नहीं है क्योंकि हम अंग्रेजी मानसिकता के गुलाम हैं। जब तक सरकार द्वारा विज्ञान विषयों में उच्च शिक्षा , चिकित्सा , प्रौद्योगिकी जैसे व्यावसायिक पाठयक्रमों की पढ़ाई हिन्दी माध्यम में नहीं होती अर्थात जब तक हिन्दी को रोजी-रोटी से नहीं जोड़ा जाता तब तक हिन्दी में विज्ञान लेखन की बात करना बहुत सार्थक सिद्ध नहीं होगा।


प्रस्तावना[सम्पादन]

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी इस शताब्दी के प्रमुख एंव प्रखर स्वर हैं। आज साहित्य एवं दर्शन परिवर्तन का इतना बड़ा माध्यम नहीं जितना विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी हैं। आज के युग को विज्ञान का युग कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी परन्तु इसके साथ-साथ आज का युग जन साधारण का भी युग है। इस युग को अधिकतम उपादेय एवं प्रभावी बनाने के लिए जन साधारण को विज्ञान के साथ जोड़ देना ही आज विज्ञान लेखन का परम लक्ष्य होना चाहिए। इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु जन साधारण के बीच वैज्ञानिक दृष्टि तथा वैज्ञानिक मनोवृत्ति विकसित करने की अर्थात वैज्ञानिक जागरूकता जगाने की विशेष आवश्यकता है। वैज्ञानिक जागरूकता को विकसित करने का सबसे सशक्त तथा समर्थ माध्यम है विज्ञान लेखन। जन मानस की वैज्ञानिक मनोवृत्ति जगाने और जीवन तथा विज्ञान के बीच सार्थक समन्वय स्थापित करने के लिए यदि लेखन को एक सशक्त माध्यम मान लिया जाय तो ऐसे लेखन के माध्यम या वाहक के रूप में भाषा की महत्ता अपने आप स्थापित हो जाती है। पर आज भी हमारे पास विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी की अपनी भाषा नहीं है। यदि विज्ञान को जनमानस की संवेदना का हिस्सा बनाना है तो हमें भारतीय भाषाओं की और विशेष रूप से राजभाषा हिन्दी की महत्ता को समझना ही पड़ेगा।


' भाषा और प्रौद्योगिकी ' पुस्तक के प्राक्कथन में पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री पी.वी. नरसिंहराव ने लिखा है ' विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विदेशी भाषा से कोई राष्ट्र न तो मौलिक ढ़ंग से विकास कर सकता है न तो अपनी विशिष्ट वैज्ञानिक एंव प्रौद्योगिकीय पहचान बना सकता है। विदेशी भाषा से अनुवाद की बैसाखी का सहारा भी अधिक समय तक नहीं लिया जा सकता है। ' इसी परिप्रेक्ष्य में एक अन्य प्रसंग का उल्लेख करना अनुपयुक्त न होगा। मार्च 2004 में विज्ञान परिषद , प्रयाग तथा भारतीय भाषा संस्थान , मैसूर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित द्विदिवसीय कार्यशाला के उद्धाटन भाषण में बोलते हुए उत्तर प्रदेश के पूर्व महामहिम राज्यपाल आचार्य विष्णु कान्त शास्त्री ने कहा कि ' देश में वैज्ञानिक चेतना का विकास भारतीय भाषाओं के माध्यम से ही हो सकता है किन्तु विज्ञान का ज्ञान मातृभाषा में उपलब्ध नहीं है। स्नातक तथा उच्च स्तरों पर अंग्रेजी ही अध्ययन-अध्यापन की भाषा है। भूमंडलीकरण के इस युग में भारतीय भाषाओं का गौरव बचाने और उनके प्रामाणिक ज्ञान हर भाषा में तत्काल उपलब्ध होना जरूरी है। ' इसलिए हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में वैज्ञानिक साहित्य के मौलिक लेखन का महत्व निर्विवाद है। उधार की भाषा के सहारे वैज्ञानिक रचनाधर्मिता को विकसित नहीं किया जा सकता। इसके लिए मौलिक संवेदना का होना नितान्त आवश्यक है। यदि हम अब भी यही समझते हैं कि अंग्रेजी के पास विज्ञान के सिम सिम की कुंजी है तो हम बहुत बड़े धोखे में हैं। यह केवल अंग्रेजी के प्रभाव को बनाए रखने तथा मैकाले के मानस पुत्रों की बौद्धिक जमींदारी को बनाए रखने का निर्ला उपक्रम है। विज्ञान , कृषि , चिकित्सा , अभियांत्रिकी तथा प्रौद्योगिकी की शिक्षा हेतु भाषागत परिवर्तन ले आने के लिए स्वतंत्रता के बाद से किए जा रहे सरकारी और गैर सरकारी प्रयासों को अंधेरी गुफा में धकेलकर देश में वैज्ञानिक जागरूकता ले आने के न सपने ही देखे जा सकते हैं और न ऐसा कोई अभियान ही चलाया जा सकता है और यदि ऐसा किया भी गया तो उसकी सफलता पर प्रश् चिन्ह लगते रहेंगे। फिर भी मैं कहूंगा कि सही चिन्तन की भाषा सदा अपनी ही होती है। हम भले ही दूसरों की समृद्ध से समृद्ध भाषा को व्यवहार में लाए पर उसे मौलिक तथा स्वतंत्र चिन्तन की भाषा में कतई प्रयोग नहीं कर सकते। उधार की भाषा मौलिक चिन्तन और आविष्कार की स्वतंत्रता पर अंकुश ही लगाती है और धीरे-धीरे अपना पालतू बना लेती है। फलत: हम घिसी पिटी लकीरों पर चलते रहते हैं। '


मनुष्य के विकास एवं समृद्धि में विज्ञान का महत्वपूर्ण योगदान है। पिछले 200 वर्षों में हजारों वैज्ञानिक खोजें तथा आविष्कार हुए परन्तु उन्नीसवीं सदी के अंत से विज्ञान ने जबरदस्त रफ्तार पकड़ी और वह लगातार तेज हुई है। विद्वानों के मतानुसार इसका श्रेय विज्ञान के साथ-साथ प्रौद्योगिकी को जाता है। इसका अर्थ यह है कि सार्थक वैज्ञानिक खोजों के इस्तेमाल के लिए व्यावहारिक उपाय भी किए जाने लगे। बीसवीं सदी का विज्ञान बड़ी ऊंचाइयों तक पहुंच पाया क्योंकि इस शताब्दी को एक मजबूत आधार मिल चुका था। जर्मन वैज्ञानिक विल्हेम रांटजन को 1901 में उनकी एक्स रे की खोज पर पहला नोबेल पुरस्कार मिला। 1903 में राइट ब्रदर्स के विमान आकाश की सैर करने लगे। 1905 में आइंस्टीन ने स्पेशल थ्योरी आफ रिलेटिविटी तथा अपने अन्य सिद्धान्तों से ऊर्जा , अंतरिक्ष एवं समूचे ब्रह्मांड के रहस्यों से जैसे पर्दा उठा दिया। इसके पश्चात डिजिटल कम्य्यूटर , द्रव ईंधन से चलने वाले रॉकेट , परमाणु विखंडन , आदि अनेक महत्वपूर्ण खोजें हुई। अनेक देशों में कार्यरत न्यूक्लियर रिएक्टर आज विश्व के कुल बिजली उत्पादन का पांचवा हिस्सा उत्पादित करते हैं। सन् 1955 में परमाणु संगलन की रोमांचक खोज हुई जिसके आधार पर अब एक अंतर्राष्ट्रीय परियोजना के अंतर्गत एक इंटरनेशनल थर्मोन्यूक्लियर एक्सपेरिमेन्टल रिएक्टर फ्रांस में स्थापित किया जा रहा है जिसकी सफलता मानव समाज के लिए अनंत ऊर्जा के द्वारा खोल देगी। इस परियोजना में भारत भी सम्मिलित है। बीसवीं सदी की समाप्ति पर अनेकों विज्ञान की शाखाओं में सक्रिय खोज और विकास कार्य चल रहे थे जिनमें कम्प्यूटर विज्ञान भी सम्मिलित था।


इक्कीसवीं सदी का सवेरा हुआ है। इसमें संदेह नहीं कि परमाणु उर्जा जैसी आश्चर्यजनक खोजें हो सकती हैं। इस शताब्दी के प्रारम्भ काल से जिन अति महत्वपूर्ण खोजों पर कार्य चल रहा था वह हैं स्टेम सेल अनुसंधान , ह्यूमन जीनोम , नैनोटेक्ोलॉजी , क्लोनिंग , अद्रुत कम्प्यूटर , अंतरिक्ष में बस्तियों की निर्माण योजना , अन्य ग्रहों पर जीवन की खोज तथा कृषि क्षेत्र में नई हरित क्रान्ति। डॉ. देवकीनन्दन ने ' विज्ञान ' पत्रिका में प्रकाशित अपने लेख ' विज्ञान हमारी कल्याणकारी संस्कृति ' में लिखा है कि ' यह विज्ञान की ही देन है कि आश्चर्यजनक परिणाम हमारे समाने आ रहे हैं। आज भारतीयों की औसत आयु 63 वर्ष है जबकि पांच दशक पूर्व मात्र 40 वर्ष थी। जापान और अमेरिका में तो मनुष्य की औसत आयु 84 वर्ष हैं क्योंकि वहां वैज्ञानिक प्रगति बहुत आगे है। हार्ट स्कैनर की नई खोज का समाचार है जिससे कार्डियोलॉजिस्ट काफी कम खर्च में हृदय विकारों का निदान कर सकेंगे। स्टेम सेल अनुसंधान की सफलता से आपके लिए शायद भविष्य में नये हृदय की ही व्यवस्था हो जाये। यही नहीं वरन मनुष्य क्लोनिंग से प्रत्यारोपण के लिए अंग जुटाए जा सकेंगे। भारत भी अनेक वैज्ञानिक गतिविधियों में जैसे सेटेलाईट प्रक्षेपण , एड्स निदान वाली दवाओं की खोज , चंद्रयान कार्यक्रम आदि में सक्रिय है और उसने अंतर्राष्ट्रीय जगत में अच्छा स्थान बना लिया है। '


वैज्ञानिक उपलब्ध्यिं आज हमारे जीवन में कितनी अनिवार्य आवश्यकता बन कर विद्यमान हैं इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज अधिकांश लोग टीवी , मोबाईल , कम्प्यूटर , कूलर अथवा एयरकंडीशनर , फ्रिज , कपड़ा धोने की मशीन , रेलयात्रा , वायुयात्रा , स्वस्थ जल एवं भोजन , डॉक्टरी सहायता आदि के बिना क्या अपने सुखी दैनिक जीवन की कल्पना कर सकते हैं ? यह सब विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की देन है। महान लेखक आर्थर सी. क्लार्क के अनुसार इक्कीसवीं सदी के अंत में पैदा होने वाले लोग 200 वर्ष तक जीने की आशा कर सकते हैं। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की उक्त उपलब्धियों से यह स्पष्ट हो जाता है कि विज्ञान के बढ़ते चरण कितने प्रभावशाली और महत्वपूर्ण हैं और मनुष्य जीवन में क्रन्तिकारी परिवर्तन के लिए जिम्मेदार भी है। इस अति विशिष्ट और लोकोपयोगी ज्ञान से हमारे देशवासियों को भाषा की दीवार खड़ी करके अंधेरे में रखा जाये , क्या यह तर्क संगत है ? क्या सरकार और शिक्षण संस्थानों का यह नैतिक दायित्व नहीं कि इस स्थिति से उबरने का उपक्रम करें। राजनैतिक स्वतंत्रता मिले हुए 60 वर्ष हो गए। स्वतंत्र भारत में जन्मी पीढ़ी ' बुढ़ापे के कगार पर पहुंच गई परन्तु आज भी हमें मानसिक गुलामी से मुक्ति नहीं मिली। जब हम राजनैतिक रूप से आजाद नहीं थे तो मानसिक आजादी के बहुत करीब थे और आज वस्तुस्थिति यह है कि हम राजनैतिक आजादी पाने के बाद मानसिक गुलामी की दिशा में प्रतिदिन आगे ही बढ़ रहे हैं। '


विचारणीय प्रश्न[सम्पादन]

लोकप्रिय विज्ञान लेखन समय की मांग है। आज समाज के हर वर्ग तथा हर आयु के लोग विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के विभिन्न पक्षों के विषय में अधिक से अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए उत्सुक हैं। उनमे विशेष रूचि भी रखते हैं परन्तु उनकी अपेक्षा यह है कि उन्हे उन विषयों के संबंध में उन्हीं की भाषा में उन्ही के स्तर पर बताने और समझाने का प्रयत्न किया जाये। हिन्दी में विज्ञान लेखकों की बढ़ती हुई संख्या , लेखन में विषय वस्तु की विविधता , पत्र-पत्रिकाओं में लेखकों की बराबर उपस्थिति से विधा की लोकप्रियता का आभास होता है। डॉ. राय अवधेश कुमार श्रीवास्तव की पुस्तक ' लोक विज्ञान तथा कथा साहित्य ' के प्राक्कथन में सुप्रसिद्ध हिन्दी साहित्यकार श्री कमलेश्वर ने लिखा है ' विज्ञान के क्षेत्र में सबसे बड़ी समस्या भाषा माध्यम की है। उच्च शिक्षा में माध्यम परिवर्तन न हो पाने के कारण अभी भी विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी की पहुंच बहुसंख्यक समाज तक नहीं हो पाई है। व्यक्तिगत तथा सरकारी प्रयासों से वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली की समस्या कुछ हद तक सुलझ गई है जिसके सहारे आज ज्ञान की हर विधा में सार्थक अभिव्यक्ति सहज रूप से संभव है। माना कि अभी तक अनुवाद का सहारा अधिक लिया जाता रहा है उसमें गुण दोष भी रहे हैं पर इधर के वर्षों में विज्ञान लेखन ने जो प्रगति की है उसकी जो उपलब्धियां रही हैं वे उसके उज्ज्वल् भविष्य के प्रति हमें आश्वस्त करती हैं। विज्ञान लेखन के क्षेत्र में जो नई पौध तैयार हुई है वह मौलिकता के प्रति सजग लगती है। आज विषय विशेषज्ञ भी मौलिक विज्ञान साहित्य सृजन हेतु आगे आ रहे हैं। विज्ञान पत्रिकाओं का विस्तार हुआ है तथा प्रकाशक भी इस विधा की ओर आकर्षित हुए हैं। पाठकों की रुचि परिष्कृत हुई हैं। ' सुखद आश्चर्य है कि श्री कमलेश्वर ने विज्ञान लेखन के हर क्षेत्र को छुआ है और अपनी बेबाक राय दी है। सच पूछिए तो विज्ञान लेखन की आज वस्तुस्थिति यही है।


अपने देश में हिन्दी में विज्ञान लेखकों की कमी नहीं हैं परन्तु लेखकों के इस विशाल समुदाय का कोई राष्ट्रीय संगठन नहीं है। ये सब बिखरे हुए हैं। ' विज्ञान ' पत्रिका के सम्पादक एवं इस देश के वरिष्ठ तथा प्रतिष्ठित हिन्दी में विज्ञान लेखक डॉ. शिव गोपाल मिश्र ने विज्ञान पत्रिका के फरवरी 2006 अंक के सम्पादकीय में विज्ञान सेवी लेखकों के विषय में बड़ी महत्वपूर्ण बातें लिखी हैं। उनके अनुसार 3500 से अधिक हिन्दी में विज्ञान लेखक हैं जिनमें 150 महिलाएं हैं तथा 8000 हजार से भी अधिक विज्ञान संबंधी पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं। उन्होंने अपनी बेबाक राय देते हुए आगे लिखा है ' हम जिन्हें लोकप्रिय विज्ञान लेखक कहते हैं आजकल वे ही छाए हुए हैं। जिन्होंने हिन्दी में विज्ञान की पाठयपुस्तकें लिखी हैं और प्रतियोगिता वाली पत्रिकाओं के लिए लगातार लिखते रहते हैं , वे हाई स्कूल से लेकर महाविद्यालय और विश्वविद्यालयों के परिसरों तक व्याप्त हैं। यह कहना मुश्किल है कि इनकी संख्या कितनी होगी किन्तु एक तरह से ये भी विज्ञान लेखक ही हैं। ' आज तक हिन्दी में विज्ञान लेखकों की कोई निर्देशिका भी प्रकाशित नहीं हुई ताकि लेखकों का आपसी पत्र व्यवहार अथवा सम्पर्क स्थापित करने का क्रम प्रारम्भ हो जाता। हर्ष की बात है कि हिन्दी भाषा में विज्ञान की पत्रिकाओं का अवश्य विस्तार हुआ है जो विज्ञान को लोकप्रिय बनाने की दिशा में सक्रिय हैं। कुछ मुख्य पत्रिकाएं निम्लिखित हैं:

विज्ञान (इलाहाबाद) , संदर्भ (होशंगाबाद) , स्रोत (भोपाल) , विज्ञान चेतना (जयपुर) , विज्ञान आपके लिए (गाजियाबाद) , सामयिक नेहा (गोरखपुर) विज्ञान भारती प्रदीपिका (जबलपुर)। इसके अतिरिक्त विज्ञान प्रगति , विज्ञान लोक , विज्ञान जगत , अविष्कार तथा विज्ञान गरिमा सिंधु आदि पत्रिकाएं भी उल्लेखनीय हैं।


जैसा कि पूर्व पंक्तियों में उल्लेख किया गया है कि हिन्दी में विज्ञान साहित्य के लेखकों का एक विशाल दल अवश्य है जिनकी संख्या 3500 से भी अधिक हो सकती है परन्तु इस भीड़ में कितने ऐसे लेखक होंगे जिन्हें प्रतिबद्ध लेखक कहा जा सकता है। अधिकांश ऐसे है जो यत्र तत्र लिख कर भीड़ तो बढ़ा सकते हैं परन्तु उनका योगदान नगण्य ही होता है। प्रतिबद्ध लेखक तो सम्भवत: 5 या 7 प्रतिशत से अधिक नहीं होगे। यह अनुमान अंतिम नहीं कहा जा सकता। समय-समय पर सर्वेक्षण के आधार पर इन आंकड़ों में परिवर्तन हो सकता है। डॉ. शिव गोपाल मिश्र ने अपनी पुस्तक ' हिन्दी में स्वतंत्रता परवर्ती विज्ञान लेखन ' में लिखा है कि विज्ञान लेखन का श्री गणेश तो 1884-88 में ही हो चुका था जब ' पीयूष प्रवाह ' में अंबिका दत्त व्यास की विज्ञान कथा ' आश्चर्य वृतांत ' प्रकाशित हुई थी। डॉ. मिश्र के अनुसार 1900 में सरस्वती पत्रिका के प्रथम अंक में केशव प्रसाद सिंह की विज्ञान कथा ' चंद्रलोक की यात्रा ' छपी। तत्पश्चात 1924 में महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन की ' बाइसवीं सदी ' और फिर डॉ. संपूर्णानन्द की ' पृथ्वी से सप्तर्षि मंडल तक ' उल्लेखनीय वैज्ञानिक उपन्यास प्रकाशित हुए। वैज्ञानिक साहित्य में अपना बहुमूल्य योगदान देने वाले विज्ञान लेखन के पुरोधाओं को जैसे स्वामी सत्यप्रकाश , डॉ. गोरख प्रसाद , डॉ. फूलदेव सहाय वर्मा , डॉ. वृजमोहन , डॉ. निहालकरण सेठी , डॉ. शिवगोपाल मिश्र , गुणाकार मुले , डॉ. रमेश दत्त शर्मा आदि को कैसे भूला जा सकता है। इसके अतिरिक्त वैज्ञानिक साहित्य सृजन के अन्य सशक्त हस्ताक्षर हैं सर्वश्री प्रेमचंद श्रीवास्तव , गणेश कुमार पाठक , जगनारायण , डॉ. रमेश बाबू , राम चन्द्र मिश्र , विजय चितौरी , आइवर यूशियल , इरफान ह्यूमेन , राय अवधेश कुमार श्रीवास्तव , डॉ. दीपक कोहली , डॉ. डी.डी. ओझा , विश्वमोहन तिवारी , डॉ. विष्णु दत्त शर्मा , डॉ. देवेन्द्र कुमार राय तथा डॉ. श्रवण कुमार।


लोकप्रिय विज्ञान लेखन में कुछ प्र्रगति हो रही है और विविध विधाओं में जैसे निबंध , कहानी , कविता , जीवनी साहित्य , इन्टरव्यू , संस्मरण , रिर्पोतांज , पत्रावलियां , समीक्षा , अभिनन्दन ग्रंथ , रेडियो , टी.वी. आदि के लिए विज्ञान विषयों पर लिखा जा रहा है। यही नहीं वरन रसायन , भौतिकी , गणित , वनस्पति विज्ञान , प्राणी विज्ञान , कृषि विज्ञान , बानिकी , कम्य्यूटर विज्ञान , अंतरिक्ष विज्ञान , पर्यावरण आदि शुद्ध वैज्ञानिक विषयाें पर पुस्तक लेखन अथवा शोधपत्र लेखन हो रहा है। परन्तु भूवैज्ञानिक विषयों पर जैसे भौमिकी , भूभौतिकी , भूरासायनिकी , वैद्युत संलेखन , आगार अभियंत्रण (रिंजरवायर इंजीनियरी) , परमाणु ज्ञान आदि पर बहुत कम लिखा गया है। यहां इस बात का उल्लेख करना समीचीन होगा कि तथ्यपरक , मौलिक और उच्च स्तरीय शिक्षण हेतु कितनी पुस्तकें लिखी गई हैं तथा वह कितने विषयों पर लिखी गई है ? यही नहीं वरन ऐसी पुस्तकें हिन्दी में शायद ही लिखी गई हों जो अंग्रेजी पुस्तकों के समकक्ष हों या उन्हें पीछे छोड़ दे। कहने का तात्पर्य यह है कि हिन्दी में विभिन्न विज्ञान के विषयों पर अच्छी गुणवत्ता की सामग्री विरले ही मिलती है। मौलिक लेखन कम हुआ है। संदर्भ ग्रंथों का विशेष अभाव है।


विज्ञान लेखन में जनप्रिय विज्ञान लेखन के समानान्तर उच्चस्तरीय , शोधपरक , मौलिक , समस्यामूलक , भूवैज्ञानिक विषयोें को समर्पित तथा अन्य शुद्ध विज्ञान विषयों को समर्पित आलेख शोधपत्र पुस्तक लिखने की परम्परा को गति देने की अत्याधिक आवश्यकता है क्योंकि ऐसे शोधपत्रों आलेखों तथा पुस्तकों से विज्ञान के विभिन्न विषयों में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्र (स्नातक , परास्नातक) , शोध कर रहे छात्र तथा विभिन्न वैज्ञानिक संस्थानों के संबंधित विशेषज्ञ विशेष लाभान्वित होंगे। यही नहीं वरन उक्त शोधपत्रों आलेखों को राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़े-बड़े संस्थानों द्वारा अक्सर सेमिनार कॉन्फरेन्स आयोजित किए जाते हैं। हिन्दी भाषा में वैज्ञानिक शोधपत्र आलेख प्रस्तुत करने के लिए राष्ट्रीय स्तर के मंच भी स्थापित करने पड़ेगें क्योंकि अंग्रेजी भाषा के मंच हिन्दी को कभी अपने मंचों पर स्थान नहीं देगें। अब तो मैकाले के मानस पुत्र हिन्दी को जड़ से ही मिटाने का षडयंत्र कर रहें हैं। वह समय अब इतिहास के धुंधलके में खो गया जब महात्मा गांधी स्वभाषा हिन्दी को राष्ट्रीय ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज पर देखना चाहते थे।


वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली के सृजन में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। आज वैज्ञानिक कोष पारिभाषिक कोष विज्ञान की लगभग हर विधा के लिए उपलब्ध हैं। इसके लिए वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग , नई दिल्ली ने प्रशंसनीय कार्य किया है। परन्तु यह बात ध्यान देने योग्य है कि पारिभाषिक शब्दावली जो वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग द्वारा स्वीकृत है उसका ही अधिकतर वैज्ञानिक लेखन में प्रयोग किया जाये ताकि वैज्ञानिक विवरणों में एकरूपता बनी रहे परन्तु विज्ञान लेखक उसका समुचित प्रयोग नहीं कर रहे हैं। इस संबंध में थोड़ी आराजकता की स्थिति है। तमाम विज्ञान लेखक नित नए शब्द गढ़ रहे हैं और उन्हीं के द्वारा विज्ञान के सिद्धान्तों को परिभाषित कर रहे हैं। इस आराजक स्थिति के कारण वैज्ञानिक पुस्तकों की भाषा का मानकीकरण नहीं हो पा रहा है और पाठक को भी विषय समझने में सदा भ्रम बना रहेगा।


उच्च स्तरीय शिक्षण हेतु हिन्दी में विज्ञान की पुस्तकों का भूवैज्ञानिक जगत में विशेष अभाव है। अन्य विज्ञान के विषयों में संदर्भ ग्रंथों की न्यूनता है। उच्च स्तरीय विज्ञान लेखन में कुछ समस्यायें ऐसी हैं जिनका उचित समाधान हम आज भी नहीं कर पाए हैं। हिन्दी अथवा किसी भी भारतीय भाषा में मौलिक विज्ञान लेखन के लिए आज सबसे बड़ी समस्या है डेटा की। क्योंकि बिना आधिकारिक डेटा के विज्ञान संबंधी कोई भी ओलख शोधपत्र पुस्तक लिखना संभव नहीं है। आज देश के लगभग हर अनुसंधान संस्थान , राष्ट्रीय प्रयोगशाला तथा अन्य वैज्ञानिक एवं तकनीकी संस्थानों से जुड़े वैज्ञानिक तथा उच्चाधिकारी अपना सारा कार्य अंग्रेजी में करते हैं तथा अपने शोधकार्य को अंग्रेजी भाषा के माध्यम से रिसर्च पेपर्स के रूप में राष्ट्रीय अतंर्राष्ट्रीय सेमीनार अथवा कॉन्फरेन्स में प्रस्तुत करते हैं। अत: अधिकांश विषय विशेषज्ञ मुख्यत: चार कारणों से हिन्दी में लिखने के लिए आगे नहीं आते। एक तो उन्हें भाषागत कठिनाई होती है। दूसरे उन्हें अपने अन्य वैज्ञानिक साथियों की घोर उपेक्षा सहनी पड़ती है। तीसरे उन्हें अपने कार्य को प्रस्तुत करने के लिए मंच नहीं मिलता और चौथे प्रकाशन की भी असुविधा होती है। उक्त समस्त प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद जो विषय विशेषज्ञ हिन्दी में लिखने के लिए आगे आते हैं वे भाषा प्रेम और देश भक्ति की प्रबल भावना से ओतप्रोत होते हैं। तभी वे बिना किसी परिणाम की परवाह किए अपनी साहित्य साधना में लगे रहते हैं। ऐसे लोग कितने होंगे ? उनका प्रतिशत बहुत कम है। उक्त परिस्थितियों में वैज्ञानिक संस्थानों , राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं अथवा अन्य प्रौद्योगिकी केन्द्राें से डेटा प्राप्त करना आसमान से तारे तोड़कर लाने के बराबर है। इन स्रोतों से लोक कल्याण की सामान्य सूचनाएं तक आसानी से नहीं मिलती। फिर किसी भी जानकारी को प्राप्त करने में इतनी औपचारिकताएं तथा पेचीदगियां सामने आती हैं कि विज्ञान लेखक अथवा विज्ञान पत्रकार का सारा उत्साह ठंडा हो जाता है। जबकि ठीक इसके विपरीत विदेशी वैज्ञानिक उपलब्धियों की सूचनाओं का विशाल भंडार पत्र पत्रिकाओं , बुलेटिन , हैन्डआउट्स , प्रेसनोट , परियोजना रिपोर्ट तथा नेट पर वेबसाइटों के जरिए मुफ्त में उपलब्ध हो जाता है। ऐसे में विदेशी सूचनाएं तो मिल जाएगी जबकि अपने ही देश की वैज्ञानिक जानकारी के लिए न जाने कितनी ठोकरें खानी पड़ती हैं।


विगत एक दशक में सूचना प्रौद्योगिकी में जो प्रगति हुई है वह उल्लेखनीय है। आज हम सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में पूरी दुनिया के सिरमौर हैं। आज आई टी में हम महाशक्ति के रूप में उभरे हैं। ऐसी स्थिति में हिन्दी के माध्यम से कम्प्यूटर विज्ञान का साहित्य सृजन करने की विशेष आवश्यकता थी लेकिन इस संबंध में कोई समुचित प्रयास नहीं किया गया। कम्प्यूटर विज्ञान से जुड़ी हजारों शब्दावलियों के हिन्दी समतुल्य आज तक पूर्ण रूप से निर्मित नहीं किए जा सके। इंटरनेट जन संचार के लिए आज एक सशक्त माध्यम है। हमारा प्रयास होना चाहिए कि हम वेबसाइट और सर्च इंजिन विकसित करें। इंटरनेट पर आज हिन्दी में विज्ञान सामग्री बहुत सीमित है। आने वाले दिनों में इलेक्ट्रानिक मीडिया का प्रभुत्व बढ़ेगा। इलेक्ट्रानिक जर्नल्स , इलेक्ट्रानिक पुस्तकें तथा इलेक्ट्रानिक लेखों का जमाना आने वाला है। अत: ये ही आने वाले दिनों में हिन्दी में विज्ञान लेखन की दिशा तय करेंगी। दैनिक समाचार पत्र भी जन संचार का प्रचलित माध्यम है। अधिकांश अखबारों में विज्ञान का कोई स्तम्भ नहीं होता। यही कारण है कि अखबारों में विज्ञान संबंधी सूचनाओं का नितान्त अभाव रहता है। यदि भूले भटके किसी अखबार में कोई विज्ञान का लेख आ भी गया तो वह आधा अधूरा , भ्रामक हो सकता है क्योंकि अखबार वालों के पास विज्ञान विषयों का मूल्यांकन करने वाला विद्वान नहीं होता है।


हिन्दी अनौपचारिक रूप से हमारे देश की सम्पर्क भाषा है। उत्तर भारत के लगभग सब लोग इसको जानते हैं। दक्षिण भारत में भी लगभग 30 प्रतिशत लोग हिन्दी समझते हैं और अधिकांश लोग बोल सकते हैं। मोटे तौर पर देश में 80 करोड़ लोग इससे परिचित हैं। यही नहीं वरन हिन्दी 48 देशों में पहुंच चुकी है तथा विश्व के 150 विश्वविद्यालायों में यह पढ़ाई जाती है फिर भी हिन्दी का हमारे देश में कोई भविष्य नहीं है। जब तक सरकार द्वारा विज्ञान में उच्च शिक्षा , चिकित्सा , प्रौद्योगिकी जैसे व्यावसायिक पाठयक्रमों की पढ़ाई हिन्दी में नहीं होगी तब तक हिन्दी में विज्ञान लेखन की बात करना सार्थक नहीं होगा। हिन्दी को जब तक प्रयोजनमूलक नहीं बनाया जायेगा अर्थात इसे रोजी-रोटी से नहीं जोड़ा जायेगा तब तक विज्ञान लेखन की प्रगति पर प्रश् चिन्ह लगता रहेगा। हिन्दी प्रदेशों में आज माध्यमिक स्तर पर पढ़ाई का माध्यम हिन्दी है यद्यपि यह स्थिति भी अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की बढ़ोतरी के कारण बदल रही है। कुछ विश्वविद्यालयों में स्नातक तक के पाठयक्रम में हिन्दी की कुछ सामग्री मिल जाएगी लेकिन हिन्दी माध्यम से पढ़ने वाले क्षेत्रों को आगे चलकर प्रतियोगी परीक्षाओं में मुंह की खानी पड़ती है क्योंकि वहां अंग्रेजी माध्यम से परीक्षा देनी पड़ती है। व्यावसायिक पाठयक्रमों से लेकर आगे हर कदम पर अंग्रेजी भाषा का सामना करना पड़ता है ऐसी स्थिति में हिन्दी हाशिये पर जा रही है फलत: हिन्दी में विज्ञान लेखन अपनी सार्थकता सिद्ध करने में असमर्थ सा लगता है।kjjkk

ध्यानाकर्षण तथ्य[सम्पादन]

हिन्दी में विज्ञान लेखन की स्थिति पर प्रस्तुत आलेख के पूर्व पृष्ठों में विशद चर्चा की गई। विज्ञान लेखन की स्थिति पर प्रकाश डालने वाले प्रमुख तथ्यों का सार-संक्षेप निम्न पंक्तियों में पुन: दिया जा रहा है:

  • विज्ञान के विभिन्न विषयों पर यद्यपि हिन्दी में 8000 पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं पर अधिकांश पुस्तकों में गुणवत्ता का अभाव है। इन पुस्तकों में अच्छी गुणवत्ता की सामग्री विरले ही मिलती है। मौलिक लेखन कम हुआ है और संदर्भ ग्रंथ न के बराबर हैं।
  • लोकप्रिय विज्ञान के लिए लिखा तो बहुत कुछ जा रहा है लेकिन सरल, सुबोध विज्ञान साहित्य जो जन साधारण की समझ में आ सके ऐसे लेखन की न्यूनता है। जन संचार माध्यम के अंतर्गत विशेष तौर पर समाचार पत्रों में विज्ञान संबंधी सूचनाओं और लेखों का अभाव है। इंटरनेट पर आज हिन्दी में विज्ञान सामग्री अति सीमित है। इसे विकसित करने की आवश्यकता है।
  • सामान्यतया विषय विशेषज्ञों की हिन्दी अथवा अन्य भारतीय भाषाओं में लेखन के प्रति रुचि नहीं है। इसके प्रमुख चार कारण हैं।
    • 1. एक तो भाषागत कठिनाई
    • 2. वैज्ञानिक जगत की घोर उपेक्षा
    • 3. हिन्दी में लिखे आलेखों शोधपत्रों को प्रस्तुत करने के लिए मंचों का अभाव
    • 4. प्रकाशन की असुविधा।
  • वैज्ञानिक एवं तकनीकी पारिभाषिक शब्दावली का हिन्दी में अब अभाव नहीं है परन्तु विज्ञान लेखक इसका समुचित उपयोग नहीं कर रहे हैं और तमाम लेखक स्वयं नित नए शब्द गढ़ रहे हैं। इस अराजक स्थिति के कारण वैज्ञानिक पुस्तकों की भाषा का मानकीकरण नहीं हो रहा है।
  • हिन्दी में विज्ञान विषयक शोधपत्रों आलेखों को प्रस्तुत करने के लिए अंग्रेजी के समकक्ष विज्ञान मंचों की स्थापना की आवश्यकता है क्योंकि ऐसे राष्ट्रीय मंचों का अभाव है जो राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सेमीनार सम्मेलन आयोजित कर सकें और विज्ञान के बहुपृष्ठी चित्रात्मक शोधपत्रों का संकलन प्रकाशित कर सकें।

विज्ञान की कसौटी पर कला[सम्पादन]

आलेखः- डॉ. अशोक कुमार शुक्ला

‘‘तपस्या’’ 2-614 सेक्टर ‘‘एच’’जानकीपुरम् , लखनऊ

विज्ञान और कला के बगैर आधुनिक जीवन की कल्पना करना असंभव है। परन्तु विभिन्न कलाआंे में विज्ञान के योगदान को हम कितना याद रखते हैं ? शायद बिल्कुल भी नहीं । वास्तव में विज्ञान एकत्रित ज्ञान है जबकि कला समस्त उपलब्ध संसाधनों के आधार पर मनुष्य के मनोभावों का निरूपण । अर्थात कोई वैज्ञानिक कार्य चाहे कितना ही महान क्यों न हो समय के साथ उसके वैज्ञानिक ज्ञान का समकालीन ज्ञान में समावेश हो जाता है । सच में किसी वैज्ञानिक का कार्य तभी उपयोगी होता है जब उसके समकक्ष वैज्ञानिकेां के द्वारा उसे स्वीकार किया जाता है । परन्तु विडंवना है कि शीध्र ही उस कार्य को पीछे छोडकर नया कार्य प्रारंभ कर दिया जाता है । विज्ञान मे ज्ञान की केवल सम सामयिक स्थिति ही महत्व्पूर्ण होती है क्यों कि भूत वर्तमान में समा चुका होता है । उदाहरण के लिये हम लोग संगीत के क्षेत्र में महान संगीतकारों बडे गंलाम अली खां या उस्ताद फैयाज खंा जैसे के संगीत को आज भी सुनते और उसकी सरााहना करते हैं । लियोनार्दाे दी विंची की महान कृति मोनालिसा की अनुकृतियां संसार भर के कला प्रेमियों द्वारा आज भी बडे शौक से खरीदी जाती है । आज भी शैक्सपेयर की और कालिदास की कृतियां पढी जाती हैं। किन्तु न्यूटन के वैज्ञानिक ग्रंन्थ प्रिसिंपिया मैथेमैटिका और आइन्सटाइन के मूल विज्ञान शोध पत्रों को अब अधिकांश लोग पढने की आवश्यकता नही समझते। वास्तव में विज्ञान के लिये यह महत्वपूर्ण भी हैं । विस्तार से कला और विज्ञान मे यहां पढें ।

इन्हें भी देखें[सम्पादन]

भारत की भीषण भाषा समस्या और उसके सम्भावित समाधान कला और विज्ञान