हिन्दी साहित्य का इतिहास (आधुनिक काल )/स्वच्छन्दतावाद के उदय और विकास की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

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हिन्दी साहित्य का इतिहास (आधुनिक काल )
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स्वच्छन्दतावाद का उदय और विकास[सम्पादन]

स्वच्छंदतावाद को यदि हम परिभाषित करें तो इसके भीतर नवीनता के उन्मेष के लिए आवश्यक उर्वरता, सृजनात्मकता के साथ-साथ प्राचीनता तथा जड़ता से मुक्ति आदि का अर्थ मिलेगा। हिंदी कविता के इतिहास में विशेष देश काल की उपज है तथा इसका संबंध स्वाधीनता की चेतना पराधीनता विरुद्ध‌ तथा रीतिवादी सौंदर्यबोध संवेदना और प्रवृत्ति के विरोध से भी है। इसका संबंध राष्ट्र, मनुष्य और प्रकृति को भी पराधीनता तथा उपभोगमूलक अर्थ से मुक्त करना है। स्वच्छंदतावाद के संदर्भ में पश्चिम के रोमेंटेसिज्म का जिक्र किया जाता है किंतु इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी और इटली आदि देशों में रेनेसां के उभार की परिवर्तनकारी नीतियों के तहत उपजे मध्ययुगीन क्लासिक प्रवृत्तियों से विद्रोह के साथ वहां रोमेंटेसिज्म फलीभूत हुआ था। इन प्रवृत्तियों का मेल उन देशों की जिस स्वातंत्र्य चेतना से था उसमें हमारे देश भारत की तरह औपनिवेशिक गुलामी के अनुभव का योगदान नहीं था। भारत में स्वछंदतावाद का मूल स्वर ब्रिटिश साम्राज्यवाद विरोधी था। यह स्वातंत्र्य चेतना के भीतर देश राष्ट्र और जातीयता के प्रति प्रेम तथा सहज उत्सर्ग का प्रेरक भाव भी शामिल था।यह स्वर भारत देश की व्यापक सांस्कृतिक परंपरा से अपना संबंध जोड़कर विकसित हो रहा था। इसीलिए स्वच्छंदतावादी काव्य धारा के भीतर और सर्वाधिक प्रत्यक्ष और शक्तिशाली स्वर राष्ट्रीयता का था।स्वच्छंदतावादी काव्यधारा ने प्रकृति में स्वातंत्र्य चेतना के नैसर्गिक अर्थ का अनुभव किया। यह प्रकृति एवं इसका विस्तार इनके लिए स्वदेश में स्वाभाविक वैविध्य और विस्तार की तरह था। इसलिए प्रकृति काव्य चेतना का काव्य इसके लिए प्रमुख बनता गया।


यूरोप में रोमेंटेसिज्म का समय तीव्र आर्थिक सांस्कृतिक और राजनैतिक बदलाव का रहा है। यही वक्त नये अविष्कारों नये उद्योग-व्यापार प्रक्रियाओं तथा नये उभरते एक सामाजिक संबंधों का समय है। वहीं स्वच्छंदतावाद यूरोपीय रोमेंटेसिज्म की नकल नहीं था। इसके भीतर सामंतवाद के विरोध के साथ-साथ साम्राज्यवाद विरोध का स्वर भी था और सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यह अपनी चेतना में बहुत सक्रिय स्पष्ट और साहसिक था। स्वच्छंदतावाद के समय में नवजागरण की चेतना का स्वर,परंपरा के प्रति प्रेम, राष्ट्रीयता, प्रकृति प्रेम एवं कल्पना का प्रसार गूंज रहा था। इस परंपरा को मैथिलीशरण गुप्त,माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्रा कुमारी चौहान,रामनरेश त्रिपाठी ने अपनी रचनाओं द्वारा इसे अभिव्यक्त किया।


स्वच्छंदतावादी काव्य का जड़ अतीत, रूढ़िवादिता, सामंतवाद, और रीतिवाद से स्पष्ट तथा तीव्र विरोध है। यह विद्रोह संवेदना, काव्यभाषा और शिल्प के स्तर पर साफ दिखाई देता है। संवेदना के स्तर पर नये विषयों, क्षेत्रों, प्रश्नों और विचारधाराओं से जुड़ाव है, तो भाषा के स्तर पर हिंदी भाषा का स्वरूप बहुलतामूलक, व्यापक तथा प्रवाही होता दिखाई देता है। मैथिलीशरण गुप्त 'भारत-भारती' के भविष्यत् खंड में लिखते हैं -

"है कार्य ऐसा कौन सा साधे न जिसको एकता

देती नहीं अद्भुत अलौकिक शक्ति किसको एकता।"


माखनलाल चतुर्वेदी ने भारतीय युवा मन को बखूबी झंकृत किया। उन्होंने स्पष्ट कहा -

"अमर राष्ट्र!, उद्दण्ड राष्ट्र!, उन्मुक्त राष्ट्र !
यह मेरी बोली,
यह 'सुधार' 'समझौतों' वाली

मुझको भाती नहीं ठठोली।"


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