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हिरोशिमा

विकिपुस्तक से

सच्चिदानंद हीरानंद वात्‍स्‍यायन(अज्ञेय) का जन्म 1911 ई0 में कसया, कुशीनगर, उत्तर प्रदेश में पुरातत्व खुदाई शिविर में हुआ था इनके पिता का नाम हीरानंद शास्त्री है | इनका निधन 1987 ई0 को हुआ|[]

द्वितीय विश्वयुद्ध के अंतिम चरण में जापान के हिरोशिमा नगर पर अमेरिका ने परमाणु बम गिराकर भीषण नर-संहार किया था | कवि ने इस दुर्घटना का मार्मिक वर्णन निम्न काव्य-पंक्तियों में किया है |

एक दिन सहसा
सूरज निकला
अरे क्षितिज पर नहीं
नगर के चौक;
धूप बरसी
पर अंतरिक्ष से नहीं
फटी मिट्टी से |
छायाए-मानव-जन की
दिशाहीन
सब ओर पड़ी -- वह सूरज
नहीं उगा था पुरब में, वह
बरसा सहसा
बीचों-बीच नगर के:
काल-सूर्य के रथ के
पहियों के ज्‍यों अरे टूट कर
बिखर गए हों
दसों दिशा में।
कुछ क्षण का वह उदय-अस्‍त!
केवल एक प्रज्‍वलित क्षण की
दृष्‍य सोक लेने वाली एक दोपहरी।
फिर?
छायाएँ मानव-जन की
नहीं मिटीं लंबी हो-हो कर:
मानव ही सब भाप हो गए।
छायाएँ तो अभी लिखी हैं
झुलसे हुए पत्‍थरों पर
उजरी सड़कों की गच पर।

मानव का रचा हुया सूरज
मानव को भाप बनाकर सोख गया।
पत्‍थर पर लिखी हुई यह
जली हुई छाया
मानव की साखी है।[]

  1. अज्ञेय का जीवन परिचय ,वेदमाता
  2. हिरोशिमा कविता दिल्ली-इलाहाबाद-कलकत्ता (रेल में), 10-12 जनवरी, 1959