History of Sonbhadra
सोनभद्र प्राचीन
स्वतंत्राता पूर्व के सोनभद्र का ऐतिहासिक अघ्ययन


रामनाथ शिवेन्द्र
प्रकाशक- मनीष पब्लिकेशन 471/10, ए ब्लाक, पार्ट-2 सोनिया बिहार, दिल्ली-110090
मोबाइल- 9968762953 संस्करण: प्रथम मूल्य: आवरण: शब्द संयोजन: नितिन सिंह, असुविधा, अक्षर घर, हर्ष नगर
पूरब मोहाल, राबर्ट्सगंज, सोनभद्र, उ.प्र. मुद्रक:
समर्पण
पूज्य स्व. पिता प्रभुनारायण सिंह जी को,
जो कहा करते थे...‘खूब लिखो,
पेट काट कर लिखो, घर बेच कर लिखो,
पर ऐसा लिखो
जिससे वर्तमान के मुर्दा शब्द भविष्य
में जीवित हो उठें’ तथा
स्व.अवधनारायण राय एडवोकेट को....
जो मुझसे लगातार कहते रहे........
‘क्यों बेटा आ गये न सड़क पर’
सोनभद्र प्राचीन
अनुक्रम
‘आइए अतीत के साथ चलें पर कैसे? 11-18 अतीत-कालीन सत्ताविमर्श... इतिहास का प्रारंभ शास्त्रों में सोनभद्र 19-38 अस्तित्व की टकराहटें व सुरक्षा..इतिहास का मध्यकाल अगोरी, बड़हर, बिजयगढ रियासतों का आविर्भाव, बालन्दशाह के वंशज घाटम का बिजयगढ़ पर राज्यारोहण, चन्देल उड़नदेव का बिजयगढ़ पर आक्रमण एव अध्रिहण 39-57 युद्ध-कालीन अतीत से अलग नई सभ्यता व संस्कृति की तरफ एक छलांग, राजा बनारस बलवन्त सिंह का उदय, बिजयगढ़ अधिग्रहण अंग्रेजी जैक, बिजयबढ़, बड़हर की पुरानी रियासतों का अंग्रेजों द्वारा पुर्नस्थापन 58-69 आजादी की ओर बढ़ते कदम राजा लक्ष्मण सिंह का मुक्ति संग्राम सांसत में अंग्रेज 70-81 1857 का स्वतंत्राता-संघर्ष आजादी की ज़िद 82-93 राजस्व एवं भूमि-व्यवस्था...राजस्व निर्माण की प्रक्रिया 94-113 जनजातीय सोनभद्र 114-153 सामान्य प्रशासन एवं सोनभद्र 154-163 पुरातत्व एवं संस्कृति 164-18 धार्मिक प्रतीक व सामाजिक पक्ष 180-187 स्वतंत्राता सेनानियों की सूची 186-188 प्रमुख घटनाक्रम 189-190 सन्दर्भ 191-192
इतिहास के साथ चलते हुए वे सभ्य हेैं,इसलिए हमारे यहां आयेंगे सभ्य से सभ्यतर बन जायें इसलिए हमे उजाड़ देंगे मैने पूछा था विजयगढ़ किले की खंडहराती दीवारों से कृकृकृ पार्टनर तुम उजड़ क्यों गये तुम पुरातत्व ही नहीं इतिहास भी हो इतिहास उजड़ता नहीं कुछ पागलों को छोड़ो वे कहते है इतिहास उजड़ चुका है हँसते हुए दीवारों ने बताया था यह मुझसे नहीं वर्तमान से पूछो जो मुंह फुलाये बैठा है अतीत बनने के लिए'बोल्ड टेक्स्ट
‘आइए अतीत के साथ चलें पर कैसे? अतीत में उतरना आसान व सहज तो नहीं’ सोनभद्र का अतीत कैसा था? यह सवाल जितना चौकाऊं तथा रहस्यमय है उतना ही आवश्यक भी। अतीत का भविष्योन्मुख होना अतीत की तार्किक गतिशीलता पर निर्भर है। जाहिर है जड़ एवं जाहिल अतीत न तो भूत में सार्थक रहता है, न ही वर्तमान में उल्लेखनीय, न ही उसमें ऐसे कारक हेाते हैं जो भविष्यकी जरूरी भूमिका को निर्धारित करते हैं। सोनभद्र का अतीत सिन्धु-घाटी की सभ्यता, मोसोपोटामिया की सभ्यता,आर्यो की गतिशीलता, मुगलों व राजपूतों की हमलावर संस्कृति व ठाट-बाट या अंग्रेजों की कुटिल साम्राज्यवादी प्रवृत्तियों के आधार पर देखने से यह कत्तई भ्रम नहीं रह जाता कि यहॉ का मध्यम वर्गीय या निम्नवर्गीय समाज उन कथित इतिहास के स्वर्ण-कालों में भी काफी बुरी हालत में छटपटाते हुए अपनी मृत्यु की प्रतिक्षा में ही रहा है। सत्ता-संस्कृति अपने भिन्न-भिन्न रूपों में हर काल में लगभग एक ही तरह की रही है। हर सत्ता का साझा लक्ष्य जनता की अभिव्यक्तियों का दमन करते हुए शान्ति-व्यवस्था सुनिश्चित करने का रहा है। शान्ति-व्यवस्था की स्थापना के लिए सत्ता या सत्ता-समूहों द्वारा जिन-जिन उपायों को विधि-सम्मत या समाज-सम्मत बनाया जाता था, वे उपाय अपने मूल रूप में कमकर जनता या गरीब श्रमजीवी जनता समूहों के लिए घृणित दर्जे तक घृणित होते थे फलस्वरूप सचेतन व श्रमजीवी-सामाजिक समूहों का पशु-जीवन में बदल जाना या बदलते जाना नियति बन जाती थी। अतीत का शक्तिशाली समाज, सत्ता-समाज का रूप स्वयंभू तरीके से हासिल कर लेता था। सामान्य समाज का सत्ता-समाज में रूपान्तरण किसी चमत्कारी या दैवी-कृपाओं के आधार पर नहीं होता था। सत्ता-समाज में रूपान्तरण के लिए शक्ति सम्पन्नता आवश्यक हुआ करती थी। वैदिक-काल व पुराण-काल की सत्ता-संस्कृति भी शक्ति के विभिन्न श्रोतों की केन्द्रीयता की ही रही है। शक्ति के विभिन्न साधनों-संसाधनों की विभिन्न निर्मितियॉ इस तथ्य का स्पष्ट रूप से खुलासा करती हैं कि हमला एवं हत्या दो ऐसी कार्यवाहियों थीं जिससे साबित होता था कि कौन विजेता है तथा कौन विजित। सोनभद्र की सीमा तथा मीरजापुर की विन्ध्य पहाड़ियों के अन्तर्गत पुरामानवों द्वारा ढूॅढे गण आवासीय ठिकानों गुफाओं का अन्वेषणकर्ताओं ने पता लगाया है। उन गुफाओं के भीतर उकेरित चित्रों तथा वहॉ पाए गए पत्थरों के औजारों से यह साफ-साफ पता चलता है कि पुरा-मानव अपनी सुरक्षा के लिए सचेतन रूप से काफी चिन्तित था। पुरामानवों की सुरक्षा चिन्ताओं ने ही उन्हें इस लायक बनाया था कि वे हथियारों का निर्माण कर सकंे। चूंकि पुरामानवों की दुनिया
इक्कीसवीं सदी के लिए कल्पनीतीत थी। उनके सामने केवल प्रकृति थी तथा वे खुद भी प्रकृति के किसी दूसरे उत्पाद की तरह थे। मानव होने के कारण वे इस हद तक समझदार भी थे कि अपनी सुरक्षा के बावत सोच सकें क्योंकि उन पुरामानवों के सामने घनघोर जंगल था, जंगली जीव-जन्तुओं का बहुसंख्यक शक्तिशाली आक्रामक समूह था। पुरामानव अपने सदृश्य मानवों की सुरक्षा एवं भोजन के लिए पशु-वध को जरूरी न समझता तथा उसके लिए भिन्न-भिन्न किस्म के हथियारों का आविष्कार न करता तब शायद मानव जाति का आज इतना सर्व-ज्ञानी, सर्व-शाक्तिशाली होना मुश्किल हो जाता। मानव जाति की खुद पर आत्म-मुग्ध होने वाली आज की दुनिया संभवतः न होती। पुरा-मानव की खोजांे तथा उनके रहन-सहन के तौर तरीकों से यह स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य, बुद्धिमत्ता के क्षेत्रा में एक ऐसा प्राकृतिक उत्पाद है जो निरन्तर सक्रिय, गतिशील, व परिवर्त'न-कामी रहा है। पुरामानव यदि आज की तरह संवेदन-शीलता की प्रति तटस्थ या जड़ रहा होता तो शायद अतीत ही आज का वर्तमान होता जैसा कि आज भी सोचने विचारने वाले कथित बौद्धिक समूहों के लोग अतीत को महिमामण्डित करते हुए उसे पुनर्जीवित करने केबोल्ड टेक्स्ट प्रयासांे में सांसंे फुला रहे हैं। सांसें फुलाने वालों की सांसे इसलिए नहीं फूल रही हैं कि हमारे पुरखे 1⁄4आदिमानव1⁄2 प्रकृति के स्पष्ट उत्पाद थे 1⁄4बिना घाल-मेल1⁄2 तथा जंगल ही उनका लोक था, जीवन था। जंगल से वे भूख मिटाते थे तो जंगल से ही जीते रहने का उत्साह भी पाते थे। इन्हीं पुरखों के वनांचल में दण्डकारण्य की संस्कृति का भी विकास होता है। आर्य-समूहों के आगमन तथा उनके युद्धों की सारी कथाएं जो जीत-हार के इतिहास का निर्माण करती हैं, सबके सब वनांचल के दण्डकारण्य में ही घटित होती हैं। इतिहास ज्यों-ज्यों काल का भेद करता गया त्यों-त्यों बीते कालांे पर कालिख चढ़ाता गया। दण्डकारण्य के लोक का कालगत विलोपीकरण इतिहास की गतिशीलता का निर्णायक तत्व बनता गया तथा इसी विलोपीकरण की प्रक्रिया ने समाज को सभ्य एवं असभ्य, शिष्ट तथा अशिष्ट, जंगली एवं नागर समूहों में विख्ंाडित भी किया। अभिजात्य एवं नागर समूहों ने खुद को दण्डकारण्य संस्कृति से अलगियाते हुए अपने को कुछ विशेष श्रेणी में स्थापित कर लिया। श्रम एवं संघर्ष की दण्डकारण्य संस्कृति जो श्रम एवं संघर्ष के फलस्वरूप उपजे विवेक के प्रयोगों में गति पकड़ रही थी तथा तत्कालीन परिस्थितियों में समायोजित होने के लिए ज्ञान व तकनीक के अन्वेषण में लगी थी, ऐसे समूहों को हासिए पर धकेलते हुए नागर समूहों ने श्रम एवं संघर्ष के बजाय, परोपजीविता, शोषण, दमन एवं अत्याचार के बल पर शक्ति के श्रोतों का केन्द्रीकरण करना शुरू कर दिया। हमारे पुरखों के सामाजिक, राजनीतिक ऐतिहासिक क्षेत्रों में इस प्रकार से अवसरवादी मध्य-वर्ग व अभिजनों का प्रवेश हुआ। यह तथ्य सर्वमान्य है कि मानव का प्रकृति के साथ हर काल में द्वन्दात्मक रिश्ता रहा है। इसी खास एवं विवेक सम्मत रिश्ते
ने मानव को प्रकृति के साथ सदैव संघर्षशील रहने के लिए निर्देशित किया। इसे काल की या इतिहास की गतिशीलता भी कहा जा सकता है। प्रकृति की विडम्बनाएं मनुष्य को सदैव अचम्भित करती रही हैं। मौसम के करतब सूरज की धूप, चांद की चांदनी, वनस्पतियों, जीवों आदि के विकास व विनाश क्रम ये सभी मनुष्य के लिए विचारने के पृष्ठभूमि थे। विवेकी मनुष्य जो प्रकृति का सबसे बेहतर उत्पाद है, प्रकृति के दूसरे उत्पादों से किस तरह नाता जोड़े, उसके सामने यह बहुत बड़ा सवाल था सो वह निरन्तर संघर्ष-शील रहते हुए ज्ञान, विज्ञान के क्षेत्रा में विकसित होता चला गया। प्रकृति का अपनी आवश्यकताओं के मुताबिक अनुकूलन मानव ने श्रम एवं संघर्ष के माध्यम से ही सीखा। क्यांेकि आदिम युग शस्त्रों या शास्त्रों दोनों का नहीं था। वह युग उद्धरणहीन था वहॉ पूर्ववतीं कुछ न था। वहॉ सिर्फ वर्तमान था तथा भविष्य की आकांक्षाएं थी। आदिमकाल में मानव प्रकृति की स्वाभाविक/अस्वाभाविक उपलब्धियांे के उपयोगों के प्रति अपने विवेक की सीमा तक खड़ा था तथा कदम-कदम पर वह निर्णय कर रहा था कि प्रकृति का उपयोग अपने जीवन के क्रम में कितना कर सकता था। प्रकृति की प्रत्यक्ष उपयोगिता के कारकों ने ही मानव को श्रमशील एवं संघर्षशील बनाया। यही मूलरूप से मानव की प्रकृति को समझने तथा उपयोग करने का शुरूआती काल भी था। मानव एवं प्रकृति की इसी द्वन्दात्मकता ने मनुष्य के लिए आवास, ईधन एवं खाद्य सामग्रियों का अन्वेषण कराया। शिकार, खेती आदि की परम्पराएं तथा पत्थरों के हथियार निर्माण एवं आवास निर्माण की पुरातन कलाएं मानव ने प्रकृति के संघर्ष से ही सीखा। आदिम काल की सामाजिक संरचना पर विचार करने से मालूम होता है कि वह काल बौद्धिक प्रतिद्वन्दिता के अकेले उपयोग का काल नहीं था। श्रम एवं संघर्ष के दौरान आदिम काल के मानवों में बौद्धिक कुटिलता आ ही नहीं सकती थी। श्रम का संयोजन हमेशा समाजगत एवं समूहगत ही रहा है। श्रम के भिन्न-भिन्न उपयोगों का व्यक्तिगत हितों के लिए इस्तेमाल, यह कुटिल बौद्धिक प्रपंच है। इतना ही नहीं यही बौद्धिक प्रपंच श्रम एवं संघर्ष के क्षेत्रों में प्रतिद्वन्दिता खड़ा कर व्यक्ति को दैवीय बनाने का काम भी करता है। आदिम काल से ही बौद्धिक प्रपंचों का सिलसिला प्रारंभ हो चुका था जिसका सामाजिक स्तर पर कबीलांे की संरचना में हम एक ढांचा पाते हैं। श्रम एवं पवित्रा संघर्ष की कार्यवाहियों का कबीलाई रूप बौद्धिक प्रपंचांे द्वारा नियेाजित प्रथम विभाजन था जिसमें मूलरूप से सामाजिक सहभागिता के भाव का संकुचन हुआ तथा ‘स्व’ का बोध आया। आदिमकाल में मानवी प्रवृत्तियों ने व्यक्ति को समष्टि से अलगिया कर उसे इतना सीमित एवं कुटिल बनाया कि वह अपना कबीला के भावों से ओत-प्रोत होने लगा बाद में चल कर यह वैयक्तिक भाव अपना देश एवं अपना घर अपना परिवार तक जाकर संकुचित हो गया। समाज की सामूहिकता की संरचना में वैयक्तिकता के प्रतिद्वन्दिता का काल भी था।
पुरामानव, औजार एवं पुरातात्विक सन्दर्भ पुरामानव, औजार एवं पुरातात्विक सन्दर्भ पुरामानव, औजार एवं पुरातात्विक सन्दर्भ
सोनभद्र की धरती पर पुरामानवों की उपस्थिति रही है जिसे अंग्रेज अन्वेषकों ने
भी ईमानदारी से स्वीकारा है। उनके द्वारा ऐतिहासिक तथ्यों के स्वीकार या अस्वीकार
किए जाने का मुद्दा इतिहास लेखन के मामलों में बहस का विषय बना हुआ है।
सोनभद्र या कि मीरजापुर के बारे में बहुत कुछ पुराने गजेटियरों से मालूम होता है
तथा दूसरा श्रोत विभिन्न रजवाड़ों के इतिहासों का विश्लेषण है। सोनभद्र का आदिम
काल तो पुरातात्विक साक्ष्यों से ही स्पष्ट हो जाता है। यहॉ गुफाओं का पाया जाना
उनमें चित्रों का उकेरित होना तथा भूमि-परीक्षणों के परिणामों का यहां जीवन होने
के पक्ष में जाना, यह सब आदिम काल की तरफ ही संकेत देते हैं।
ज्ञान-विज्ञान व तकनीक के सारे क्षेत्रों की जड़ें पुरामानव काल में ही उगने लगी
थीं। ऐसा नहीं था कि पुरामानव अपने विवेक, तर्क व समझ के मामलों में कहीं
अवचेतन में था। तत्कालीन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वह पुरामानव काल
में भी काफी चिंतित था। हॉ उसके सामने आज की दुनिया की कोई तस्वीर न थी,
तस्वीर के सिर्फ दो ही हिस्से थे, एक वह खुद था तथा दूसरी प्रकृति थी। प्रकृति का
दोहन करना तो कथित विकसित मानवों ने प्रारंभ किया। पुरामानव तो जरूरतों के
हिसाब से ही प्रकृति को छेड़ता था।
पाषाण-युग में मानव इतना कुशल हो चुका था कि वह हथियार बना सकता था
तथा उस पर यकीन भी कर सकता था कि वह अपनी सुरक्षा वन्य जीवों या हमलावरों
से कर सकता है। पाषाण-कालीन औजार सोनभद्र में भी पाए गए हैं। अचरज के
रूप में यह था कि कुल्हाड़ी कहीं भी नहीं पाई गई, जब कि उस काल का मानव
खेती-बारी करने के लिए जंगल काट कर खेत बनाना सीख चुका था। इस मुद्दे पर
यह सवाल उठ सकता है कि क्या सोनभद्र की सभ्यता पाषाण-कालीन नहीं है?
क्योंकि सोनभद्र में कहीं भी ऐसे औजार नहीं पाए गए जो किसी भी तरह से कुल्हाड़ी
के समरूप हों। गजेटियर एवं अन्य किताबों में भी कुल्हाड़ी का उल्लेख नहीं मिलता।
पाषाण-काल से लेकर अंग्रेजों के काल तक सोनभद्र, शासन पद्धति, संस्कृति,
परंपरा, सभी क्षेत्रों में अजीब रहा है। कभी तो यह पूर्ण रूप से स्वतंत्रा तथा आत्मनिर्भर
था तो कभी कन्नौज तो कभी बनारस जैसी बड़ी रियासतों के अधीन भी। यह काल
गत विडम्बना थी। मुगलों, पठानों एवं अंग्रेजों के आपसी साजिशी युद्धांे के दौर में
कभी यह क्षेत्रा अकबर के अधीन चला जाता है तो कभी शेरश्शाह सूरी या जौनपुर के
शासकों के अधीन। बनारस के अधपति की मीरजापुर एवं सोनभद्र पर तो बहुत ही
नाटकीय एवं दमनकारी राज-व्यवस्था रही है। बनारसी हुकूमत के दौर में ही यहॉ पर
अंग्रेजी सेनायें कुचक्र रचती हैं।
सोनभद्र के अन्तर्गत ऐतिहासिक रूप से जिन-जिन सत्ता-प्रणालियों का पता चलता है वे बहुत मायनों में देश में चल रहे युद्धों एवं हमलावर संस्कृतियों से कतई भिन्न नहीं रही हैं, उनमें समानता के तत्व अधिक थे। अधिकतम लगान वसूली का मुद्दा प्राथमिकता पर था। लगान वसूली के बावत किया जाने वाला प्रबंध-तंत्रा उदारवादी तो कत्तई नहीं था उसमें अमानवीय क्रूरता व बर्बरता थी। अकबर व शेरशाह के जमाने की लगान वसूली व्यवस्था व भूमि-प्रबंधन अंग्रेज व बनारस के राजा द्वारा पूर्ण रूप से विकट व लुटेरी बना दी जाती है। कमोवेश लगान की वृद्धि करना सभी हुकूमतों की प्राथमिकता थी। जाहिर है लगान वसूली के प्रबंध-तंत्रा से हुकूमतों के चरित्रा का पता चलता है। लगान वसूली व लगान का निर्धारण करने का सारा तौर तरीका जनता की इच्छाओं एवं उनकी देय-क्षमता के विरूद्ध था। लेकिन वर्वरता के कारण जन-विद्रोह जैसी अभिव्यक्तियों का उभार भी नहीं हो पाता था। गजेटियर में वर्णित तथ्यों से यह पता नहीं चलता कि उस समय की जनता क्या सोचती थी? मानो जनता किसी मशीनी इन्तजाम की तरह स्थिर व पूरी तौर पर प्रतिक्रियाहीन थी। राजपूतों की शासन प्रणालियों का मुगलों की सत्ता-संस्कृतियों के अर्न्तविरोध कहीं भी स्पष्ट रूप से नहीं दिखते। फलस्वरूप यह निष्कर्ष निकालना कत्तई अप्रासंगिक न होगा कि जनता दोनों सत्ता-सस्कृतियों से परेशान व प्रताड़ित थी ऐसी सूरत में इतिहास की स्वाभाविक प्रतिक्रियात्मक या प्रतिरोधात्मक गतिविधियों कहीं नहीं दीखतीं। व्यक्ति एवं समष्टि, प्रकृति व पुरुष के द्वन्दों का आकलन करने पर पर हमें हर काल में मूलरूप से ज्ञात होता है कि भिन्न-भिन्न सत्ता संस्कृतियों ने अपने सत्तात्मक प्रबंधन के निमित्त विशेषाधिकार सम्पन्न वर्गो का निर्माण किया है। कालान्तर में इसी विशेषाधिकार सम्पन्न वर्ग को नौकरशाह, जागीरदार, जमीनदार जैसे नामों से सम्बोधित किया जाने लगा। आदिकाल से लेकर मध्यकाल तक तकनीकी व वैज्ञानिक शाहों की कोई जमात न थी, ये दोनों सत्ता-प्रजातियॉं आधुनिक काल के द्वारा उत्पादित एवं नियंत्रित हैं। पाषाण-कालीन संस्कृति के दौर में विशेषाधिकार सम्पन्न वर्गो का उत्पादन सत्तासमूहों द्वारा आरंभ हो चुका था तथा दास बनाए जाने की प्रक्रिया भी आरंभ हो चुकी थी। जाहिर है पाषाणकाल के पाए जाने वाले छोटे-छोटे औजार जिन्हें ‘पिग्मी’ श्रेणी में रखा जा सकता है, ये स्पष्ट रूप से प्रमाण देते हैं कि इन औजारों के निर्माणकर्ता पुरामानव रहे होंगे जो बतौर दास पाषाण-कालीन सत्ता-समूहों के यहॉ काम करते रहे होंगे। इतिहासकार मजुमदार एवं पुसांबेकर ने इसे स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है। इस प्रकार हम पाते हैं कि समाजगत ढांचे के अन्तर्गत निवास करने वाला मानव सत्ता-संस्कृति के दबावों व आकर्षणों से प्रभावित होकर सत्ता का समर्थक या सत्ता संचालक समूहों में बदल कर एक अलग किस्म की प्रजाति का निर्माण प्रारंभ कर देता है। विशेषाधिकार संपन्न वर्ग का निर्माण सत्ता-गत आवश्यकताओं के लिए अनिवार्य
रूप से षडयंत्रा था, उस वर्ग से समाज का कुछ लेना देना किसी भी काल में नहीं
था। वह वर्ग सत्ता-समूहों के लिए जरूरी था क्यांेकि सत्ता-व्यवस्था में व्यवस्थापक
व व्यवस्थापित के रिश्ते मानवीय आचारों के हिसाब से परस्पर विरोधी थे। दोनों के
हित एक दूसरे से टकराते थे, हितों की यही टकराहट सामाजिक संरचना में दरार
पैदा कर शोषित एवं शोषकों की प्रजातियों निर्मित करती थीं। हितांे की टकराहटें
युद्धों को आयोजित करतीं थी, समाज में अस्थिरता पैदा करती थीं तथा जीत-हार की
बदजात संस्कृति का निर्माण कर एक ऐसे कुजात सोच को जन्माती थीं जिसके
आधार पर जीत को महिमामण्डित करते हुए विजेता का दैवी-करण किया जाता था।
हितों की टकराहटों की गर्जनाएं हमें हर काल में सुनाई पड़ती हैं।
अतीत देखिए पर अपनी आँख से अतीत देखिए पर अपनी आँख से अतीत देखिए पर अपनी आँख से
अपनी ऑख से ही अतीत को देखने व उसका विश्लेषण करने का तौर-तरीका
इतिहास लेखन की कला को प्रदर्शित कर सकता है जाहिर है इस मुद्दे पर मत
समानता भी नहीं रही है। अब यह स्पष्ट है कि जिस दृष्टि से हीगेल, टायनवी, मार्क्स
आदि इतिहासकारों ने समाज का अध्ययन कर समाज का विश्लेषण प्रस्तुत किया
उसमें आंशिक रूप से ही समानताएं हैं। उनके अध्ययन का बहुलांश मत-भिन्नता
का ही है। आज की विकसित दुनिया में अतीत को देखने का काम बहुत जटिल
है। खास तौर से इसलिए कि आज के समय में अतीत की तमाम राजनैतिक,
सामाजिक, आर्थिक जटिलताएं व क्रूरताएं नहीं हैं। अतीत में तो मानव एक ऐसी
इकाई की तरह बना दिया गया था जिसकी निजता कुछ थी ही नहीं उसका जो
व्यक्तिगत था पूरी तरह शासित व शोषित था फलस्वरूप वह मनुष्य के रूप में किसी
जड़ उत्पाद की तरह था।
उस अतीत का विश्लेषण करते हुए हीगेल आत्मा के विकास-वाद पर जोर देता
है तो मार्क्स पदार्थ की भौतिकता पर। आत्म-विकास बाद एवं भौतिक विकासवाद
के अर्न्तद्वन्दों को बीसवीं शताब्दी की दुनिया ने भली-भांति देखा है तथा खुद को मौन
स्वीकृति के पक्ष में खड़ा कर लिया है कि दोनों का विकास आवश्यक है। यह
सोच-विचार की तीसरी धारा थी जो आत्म के विकासवादियों एवं भौतिकवाद के
पक्षधरों दोनों के लिए आलोचनात्मक थी। आत्म-शक्ति व इच्छा-शक्ति के बिना
केवल भौतिक सत्यों का स्वीकार या भौतिक सत्यों, द्वन्दों के बिना केवल इच्छा-शक्ति
का विस्तार, दोनांे मनुष्य को अकेले-अकेले कुछ भी हासिल न करा सकेंगे। मानव
की जैविकता के साथ उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास को भौतिक सत्यों या द्वन्दों
के साथ जोड़ कर देखने से ही मनुष्य सभ्यता के विकास की सीढ़ियों चढ़ सकेगा।
मार्क्स हीगेल के अलावा टायनवी एक ऐसा इतिहास चिन्तक हुआ जो इतिहास
में निरन्तर रूप से घटित होते रहने वाले आन्तरिक एवं वाह्य संघर्षों की बात करता
है, इस प्रकार वह इतिहास पर विचार करने के लिए तीसरी पद्धति को विकसित करता है। टायनवी के अनुसार इन्हीं वाह्य एवं आन्तरिक संघर्षों के परिणाम स्वरूप कोई भी सभ्यता या तो व्यवस्थित होकर ऊॅचाई पर पहुॅचती है या तो अव्यवस्थित होकर भहरा जाती है, कभी-कभार यथा स्थितिबादी भी हो जाती है। संघर्ष की निरन्तरता को टायनवी इस सीमा तक स्वीकारता है कि संघर्ष के माध्यम से ही सभ्यताएं यथा-स्थितिवाद का उन्मूलन करती हैं तथा विकसित होने के क्रम को संवारती हैं। टायनवी स्पष्ट रूप से वर्ग-संघर्ष के बारे में कहता है कि सभ्यताओं के आन्तरिक संघर्षों के ही वर्ग-संघर्ष परिणाम होते हैं। टायनवी के अनुसार समाज की सभ्यता का वाह्य संघर्ष उसकी जातीय 1⁄4छंजपवदंसपजलद्ध संस्कृति तथा सभ्यता में प्रगट होता है। सभ्यताओं के उत्थान-पतन का क्रम समाज के बाह्य संघर्षों से संचालित हेाता है। टायनवी ने इतिहास के अध्ययन-क्रम में यह भी जोरदार ढंग से स्थापित किया है कि इतिहास सिर्फ राजाओं के ‘जय-पराजय’ का कोई दस्तावेज नहीं है। गौरवशाली पराजय भी किसी जीत से अच्छी हो सकती है तथा घृणित तरीके से धोखा-पूर्ण जीत भी पराजय की तुलना में निन्दनीय हो सकती है। हर समाज अपनी पतनशीलता की मुक्ति के लिए हर काल में संघर्षशील रहा करता है यह अलग बात है कि उस संघर्षशील इतिहास को साजिशी तौर पर नष्ट कर दिया जाय। हमारे सामने सोनभद्र के अतीत को देखने की कई इतिहास पद्धतियॉ हैं। आत्मा के विकास-बाद के सहारे या तो टायनवी के उत्थान-पत्थान जैसी परिस्थितियों के सहारे से यहॉ के अतीत को देखा जा सकता है। मैं समझता हूॅ, सोनभद्र के बारे में या भारतीय इतिहास लेखन में उत्थान-पतन की कहानियां प्रमुख भूमिका में रही हैं। कम से कम अंग्रेजांे ने तो इसी का सहारा लिया तथा यह बताने व समझाने की पूरी कोशिश की कि किस तरह भारतीय समाज कभी भी सांस्कृतिक व धार्मिक रूप से एक नहीं था। पुरामानव काल से लेकर आजादी प्राप्त करने के बीच के काल को अंग्रेजों ने संघर्षों के काल के रूप में चित्रित व व्याख्यायित किया है तथा यह स्थापित करने का प्रबल प्रयास किया है कि भारत वर्ष की हर सभ्यता आन्तरिक संघर्षों की शिकार थी। यूरोप की तरह यहॉ भी नस्ली-भेदभाव रहा है, तद्नुसार यहॉ के अतीत की व्याख्या करता है। अंग्रेज इतिहास-कारों के साथ-साथ दूसरे सन्तुलवादी इतिहासकारों ने भी अतीत को स्वमेव घटित होने वाला घटनाक्रमों का पुंज ही माना है जैसे अतीत में ऐसा कुछ भी नहीं था जो मनुष्यता को आक्रान्त कर रहा था, वैयक्तिक एवं सामाजिक विकास के रास्तों पर अवरोध खड़ा कर रहा था। व्यक्ति एवं समष्टि में या प्रकृति व पुरुष में किसी प्रकार की सार्थक द्वन्दात्मकता थी ही नहीं। अतीत पूरी तरह जड़ एवं संघर्ष की क्षमताओं से शून्य था। अतीत की खामोशी भविष्य के रास्ते को वर्तमान की घटनाओं के लिए छुट्टा सांड़ों के लिए खुला छोड़ देती है, वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल तक समय के साथ जनता के जनप्रतिरोध का पक्ष खामोश रहा है। इतिहास सिर्फ राजाओं की ‘हमला-बाज’ कहानियों का विवरण देकर खुद
को खतरनाक चुप्पी के हवाले कर देता है। इतिहास लेखन के इस विपरीत-गामी खेल
से बचते हुए ही अतीत को जाना-बूझा व समझा जा सकता है। आइए एक प्रयास
करते हैं सोनभद्र के अतीत व व्यतीत को जानने के लिए, राजा-रजवाड़ों की रियासती
कथा से अलग जनता की गाथा की तरह।
दरअसल मानव सभ्यता में यह बहुत बड़ी विडंबना है कि हम राजनीतिक विमर्श
को समाज के आखिरी पायदान से गुंथित करके नहीं देखते और न ही कोई प्रयास
करते हैं इस बाबत। हमारा मन और चित्त दोनों सत्ता के सिंहासन से चिपका रहता
है और एक सवाल कि हमारा राजा कौन? यह हमें बार बार परेशान करता रहता है।
हमारी यही भेंड़ संस्कृति हमें कभी गुलामी की ओर ले जाती है तो कभी कहीं और।
पर अब तो लोकतंत्रा है, हमें बहुत ही सावधानी और सतर्कता से अपने सत्ताधारियों
का चयन करना होगा और साबित करना होगा कि सरकारें वही मजबूत तथा
लोकप्रिय हुआ करती हैं जो जनता के प्रति ईमानदारी से जबाबदेह हुआ करती हैं।
सोनभद्र के अतीत को जानने, बूझने का प्रयास चिंतन के इसी प्रस्थान बिन्दु से
किया गया है तथा समझने की कोशिश की गई है कि अतीत में सोनभद्र की
राजसत्तात्मक स्थिति क्या थी? यहां की आम जनता किस हाल में थी? प्रति व्यक्ति
आय तथा कमाई के साधनों की क्या स्थित थी। किसी भी सरकार का मुख्य कार्य
होता है कानून व्यवस्था का जनहितकारी प्रबंधन, वह सरकार चाहे जिस काल की
हो, काल का कोई फर्क नहीं पड़ता। कानून व्यवस्था के प्रबंधन के आधार पर ही
सत्ता-विमर्श को मूल्यांकित करने का प्रयास किया जाना चाहिए, ऐसा ही प्रयास
करने की कोशिश यहां की गई है, देखना यह है कि यह प्रयास आपको कितना
प्रभावित करता है? आइए देखते हैं कि प्रयास सफल है या असफल?
अतीत-कालीन सत्ता विमर्श... इतिहास का प्रारंभ अपने पुरखों की सभ्यता, संस्कृति, रहवास, बुद्धिमत्ता, शक्ति सम्पन्नता आदि समकालीन गुणों एवं अवगुणों के बारे में जानकारी प्रस्तुत करना ही इतिहास की प्रमुख भूमिका है। इस संदर्भ में यह विवादास्पद नहीं है कि सोनभद्र की सभ्यता व संस्कृति भारत के अन्य क्षेत्रों से कत्तई अलग नहीं है। 4 मार्च 1989 तक सोनभद्र, मीरजापुर जनपद का ही हिस्सा रहा है। मीरजापुर जनपद भी अंग्रेजी राज-व्यवस्था का एक जनपदीय विभाजन था जिसका आशय मात्रा हुकूमत का प्रबन्धन था। आज सोनभद्र, मीरजापुर से अलग जनपद का रूप पा चुका है पर सोनभद्र का जितना रिश्ता कैमूर की पहाड़ियों से है उससे कम विन्ध्याचल की पहाड़ियों से नहीं है जो मीरजापुर में स्थित है। कन्तित व विजयपुर, शक्तेषगढ़ की रियासतों का प्रभुत्व किसी न किसी तरह यहां के विजयगढ़ व अगोरी राज -यवस्था पर भी रहा है। इसलिए सोनभद्र का अतीत, मीरजापुर से उभयनिष्ठ है। सोनभद्र को समझने के लिए यहॉ की पुरातात्विक सामग्रियों एवं गुफा चित्रों का अध्ययन हमें किसी ऐतिहासिक परिणाम तक पहुॅचा सकते हैं।
पुरातात्विक सोनभद्र पुरातात्विक सोनभद्र पुरातात्विक सोनभद्र मीरजापुर का अंग्रेजी गजेटियर व देशी गजेटियर गुफाओं के बारे में बताता है कि इन से किसी सार्थक ऐतिहासिक प्रमाणों के बारे में नहीं जाना जा सकता। गजेटियरों का मानना है कि इन गुफाओं से सिर्फ इतना ही प्रमाणित होता है कि सोनभद्र में आदिमानव या पुरामानव रहवास किया करते थे। जाहिर है अपनी सुरक्षा का वे एकमात्रा साधन इन गुफाओं में खोजते थे, हिंसक पशुओं से बचाव का सवाल उनके समक्ष था। यह सर्वज्ञात है कि हमारे पुरखों को रहवास के लिए घर बनाने की कला का ज्ञान तब नहीं था। उन गुफाओं में कई तरह के जो चित्रा पाए गए हैं उनसे भी यह प्रमाणित होता है कि हमारे पुरखों का रहवास इन गुफाओं में था। सबसे महत्वपूर्ण यह तथ्य भी स्पष्ट रूप से उभरता है कि रहवास के उनके सारे केन्द्र नादियों के आस पास ही पाए गए हैं। खासतौर से सोन नदी के दोनों छोरों की पहाड़ियों पर। पुरखों के निवासों का प्रमाण नदियों के पास पाया जाना प्रमाणित करता है कि उस दौर में ‘पानी’ देख कर या तलाश कर ही रहने, निवसने के बारे में सोचा जाता था, हमारे अधिकांश पुराने शहर भी तो नदियों के किनारे ही स्थित हैं। सोन की समीपस्थ पहाड़ियों के इतर, बेलन, घाघर, रेण, विजुल या कि कर्मनाशा
जैसी नदियों के अगल-बगल किसी भी गुफा का पाया जाना प्रमाणित नहीं होता।
कर्मनाशा नदी से बहुत दूर सोनभद्र व बिहार की कैमूर पहाड़ियों में स्थित गुप्तनाथ
एक ऐसी गुफा है जो कम से कम दो तीन सौ मीटर तक पहाड़ के अन्दर है, इस
गुफा के बाद थोड़ी सी खुली जगह है जिस पर बगल की पहाड़ी छत की तरह अपने
गुरूत्व-बल पर टिकी हुई है। यहॉ पर शिव के गुप्तनाथ उपनाम की पूजा स्थली को
विकसित कर दिया गया है। गुप्तनाथ का स्थान गुफा के रूप में एक ऐसा
ऐतिहासिक साक्ष्य है जो इतिहास को 1⁄4410-392ई0पूर्व1⁄2 तक की यात्रा कराता है।
जिसकी राजधानी कभी पाटलिपुत्रा में हुआ करती थी। सोनभद्र की दूसरी गुफाएं इस
तरह का कोई संकेत नहीं छोड़तीं। वे हैं भी तो बहुत ही छोटी छोटी मुश्किल से एक
दो आदमी के बैठने व सोने की जगह वाली। वैसे उन गुफाओं की दिवारों पर पाये
जाने वाले आखेट का भाव व्यक्त करने वाले रेखा-चित्रा हमें अतीत की तरफ ले जाते
हैं, कि उस दौर के हमारे पुरखे कलम या कूची से रेखांकन किया करते थे।
शिवद्वार, सिल्थम, पटना, आदि में पाए जाने वाले शिवलिंग संभवतः दूसरी
शताब्दी के आस पास के हों जब ‘नव सात बाहनों’ की एक शाखा की अधीनता
में कन्तित चला जाता है। कन्तित पर भारशिवों की यह पहली विजय थी लगभग
सात-आठ सौ साल ईसा बाद। इस प्रकार हम पाते हैं कि सोनभद्र का अतीत एक
तरह से बौद्ध धर्म के प्रवर्धन का भी अतीत रहा है। शिश्शुनाग के वंश का समापन
लगभग तीसरी सदी में होता है फिर नया राजवंश नन्दवंश स्थापित हो जाता है जो
अशोक तक 272-232 ई0पूर्व तक निर्वाध रूप से चलता है परन्तु बीच में चन्द्रगुप्त
द्वारा ई0पूर्व 323 में नन्दवंश का सफाया कर दिया जाता है यहॉ से इतिहास का एक
नया अध्याय प्रारंभ होता है जिससे बौद्ध-धर्म के प्रचार-प्रसार व वैदिक साहित्य
संस्कृति व कला के विलोपन का सिलसिला प्रारंभ हो जाता है। इस काल में वैदिक
काल की परम्पराएं उपनिषदों की रचनाओं की व्याख्या के प्रति भी जिम्मेवार होती
हैं पूरा उपनिषद काल वैदिक काल की परंपराओं के विमर्श का काल रहा है। बौद्ध
धर्म का ‘प्रतीत्य समुत्यपाद’ यानि कि प्रत्येक वस्तु अपनी उत्पत्ति के लिए किसी
दूसरे वस्तु पर निर्भर है जिससे कार्य-कारण के कारणता संबंधी सोच का वैज्ञानिक
सूत्रा निकलता है। ‘अनित्यवाद’ जैसा दूसरा सूत्रा भी इसी काल में प्रसार पाता है कि
वेदों की यह स्थापना कि वस्तु नष्ट नहीं होती, अनित्यवाद के अनुसार हर वस्तु
नाशवान है तथा नष्ट होना उसकी प्रकृति है। बौद्ध धर्म का तीसरा सूत्रा ‘अनात्मकवाद’
भी वैदिक अवधारणाओं पर कड़ा प्रहार करता है कि स्थाई आत्मा जैसी कोई चीज नहीं
हुआ करती। छठी शताब्दी ईसा पूर्व का काल एक प्रकार से शास्त्रों के विमर्श का
महत्वपूर्ण काल था। इस काल को उस काल से भी जोड़कर देखना चाहिए जब
उपनिषदों के रचना विधानों द्वारा वैदिक मान्यताओं को अस्वीकार करने का वैचारिक
प्रयास किया जा रहा था।
पुरा वैदिक काल तथा उत्तर वैदिक काल शास्त्रों के विमर्श का काल भी था। इन्हीं
कालों में उपनिषदों की रचनाएं सृजित होती हैं जिसका मूल सत्य था कि ‘आत्मा’ व ‘ब्रवम’ दोनों अलग सत्ताएं नहीं हैं वरन् दोनों एक ही हैं प्रकारान्तर से यह दर्शन वैदिक सत्य ‘ब्रवम’ की अवधारणा पर प्रहार करता है। अम्बेडकर व लोहिया जैसे राजनीति कर्मी व समाज वैज्ञानिक इस तथ्य को भी स्वीकारते हैं कि उस युग में ब्रावमण तथा क्षत्रिय दोनों अभिजात समूहों के विशेष व महत्वपूर्ण ध्रुव थे इसलिए इन दोनों में संघर्ष भी चला करता था। डा0 अम्बेडकर ने तो ब्रावमण तथा क्षत्रिय युद्धों को वर्ग-युद्ध की संज्ञा दिया है। इन युद्धों का विवरण देते हुए डा0 अम्बेडकर ब्रावमण व राजा वेणु के युद्ध को पहला युद्ध मानते हैं। दूसरा युद्ध, राजा पुरूरवा से, तीसरा युद्ध, राजा निमि से चौथा युद्ध, वशिष्ठ और विश्वमित्रा के बीच हुआ था। इस प्रकार हम पाते हैं कि ब्रावमण तथा क्षत्रिय दोनों वैदिक काल व उत्तर वैदिक काल में अपने-अपने राजसत्तात्मक हितों के लिए संघर्ष-रत थे। बाद के समय में ब्रावमणों ने क्षत्रियों के विशेष क्षेत्रा शस्त्रों के परिचालन की दक्षता हासिल करना आरम्भ कर दिया। वशिष्श्ठ तथा विश्वमित्रा के युद्ध में शस्त्रों की उपयोगिता की ही जीत होती है तथा यह भी प्रमाणित होता है कि क्षत्रियों ने अपने पारंपरिक शस्त्रा ज्ञान के साथ-साथ शास्त्रों के ज्ञान की तरफ खुद को उन्मुख कर लिया था। इस प्रकार शस्त्रा तथा शास्त्रा दोनों प्रभुत्वशाली वर्ग ब्राह्मण तथा क्षत्रिय दोनों के लिए अध्ययन व सीख के प्रमुख विषय बन गए। सोनभद्र को समझने के लिए आवश्यक होगा कि बुद्ध, महावीर जैसों के ऐतिहासिक हस्तक्षेप को भी ध्यान में रखा जाये। बौद्ध मठ अहरौरा की सूचना सोनभद्र को भी प्रभावित करती है हालांकि सोनभद्र में किसी भी बौद्ध-बिहार का प्रमाण नहीं मिला है। सोनभद्र की प्राचीनता तो विजयगढ़ परगना के ‘नल राजा’ स्थान पर 1995-96 में पुरातत्व विभाग द्वारा हुई खुदाई से भी प्रमाणित है। पुरातत्व विभाग का मानना है कि ‘नल राजा’ के स्थान पर हुई खुदाई से चार सांस्कृतिक काल-क्रमों का पता चलता है। यहॉ से काले व लाल पात्रा के साथ-साथ काले व लाल लेपित पात्रा, पत्थर के मनके, पक्की मिट्टी के मनके, अस्थि-वाणाग्र, पत्थर के उपकरण, व लोहे के उपकरण भी प्राप्त हुए हैं। यहॉ के उत्खनन से चूल्हों तथा वृत्ताकार झोपिड़यों का भी पता चलता है। अंग्रेजों की खोज से यह तात्कालिक खोज सर्वथा अलग है क्योंकि गुफाओं की आवासीय व्यवस्था के अलवा अंग्रेजों को पहले यहॉ कुछ भी प्राप्त न हुआ था। आवासीय व्यवस्था की झोपडियां तथा चूल्हा ये दोनों प्रमाणित करते हैं कि तत्कालीन हमारे पुरखे, न केवल आवास वरन् आग की भी खोज कर चुके थे। पत्थरों के उपकरण तथा अस्थियों के बाण आदि पाषाणकाल के इतिहास गति की सूचना देते ही हैं। अंग्रेज खोजी लोगों ने सोनभद्र व मीरजापुर में प्रमुखता से पत्थरों के उपकरण पाए हैं। इनमें कुछ टुकड़े फासिल्स के भी पाए गए हैं। पत्थरों के उपकरणों में पूर्ण रूप से पत्थर के चाकुओं की पहचान की गई है। अंग्रेजों का मानना है कि सारे प्राप्त
सोनभद्र प्राचीन सोनभद्र प्राचीन
उपकरण घरेलू उपयोग के किस्मों के हैं। अधिकांश उपकरणों का निर्माण सुलेमानी
पत्थरों से किया जान पड़ा। जो कड़े पत्थर थे उनके धार काफी चिकने थे। कुछ का
अनुमान है कि ये उपकरण चेटर््ज 1⁄4ब्ीमतजे1⁄2 पत्थर के भी बने हो सकते हैं। इन
हथियारों तथा औजारों के बारे में सूचना मिलती है कि उनका उपयोग आरी, रेती तथा
कुदाल के तौर पर किया जाता रहा होगा। आश्चर्यजनक एक औजार भी पाया गया
जो सुई की तरह पतला तथा दस इंच लम्बा था इसकी नोक भी सुई की तरह थी।
कुल्हाड़ी जैसा औजार पूरे सोनभद्र तथा मीरजापुर में कहीं भी नहीं पाया गया।
इतिहासकारों का मानना है कि कृषि के विकास-क्रम में कुल्हाड़ी तथा फावड़े की
प्रमुख भूमिका होती है। कुल्हाड़ी से झाड़-झंखज्ञड़ काटा जाता हैऔर फावड़े से खेती
करने लायक खेत समतल बनाया जाता है तो क्या इससे यह निष्कर्ष निकाला जा
सकता है कि पाषाण-कालीन सभ्यता जो कृषि के विकास क्रम का प्रांरभिक काल
है वह सोनभद्र में नहीं थी? लेकिन ऐसा निष्कर्ष निकालना पूरी तरह से गलत होगा।
सोनभद्र व मीरजापुर में पाए गए पत्थरों के उपकरण व औजार छोटे-छोटे ;च्पहउल
चसपदजेद्ध थे। इन हथियारों औजारों तथा उपकरणों से यह स्पष्ट है कि ये सारे के सारे
पाषाण-कालीन थे। पाषाणकालीन ;छमवसपजीपबद्ध मानव पत्थरों को तराशने तथा
हथियार व औजारों बनाने की कलाएं सीख रहा था। इससे यह भी ज्ञात होता है कि
पाषाण-कालीन अभिजात्य समूहों द्वारा आदिमानवों 1⁄4।इवतपहपदंस1⁄2 को दास बना लिया
गया होगा तथा उनसे पत्थरों के उपकरण व औजार बनवाने का कार्य कराया जाता
रहा होगा।
अंग्रेज रिवेट कार्नाक ;त्मअमजज ब्वउंबद्ध तथा काकबर्न ;ब्वबा ठनतदद्ध ने एक
ऐसी गुफा का भी पता लगाया है जो छह फीट गहरी थी तथा इसका रूख उत्तर-दक्षिण
की दिशा में था। इस गुफा के ऊपर एक लम्बा पत्थर पड़ा हुआ था पत्थर की लम्बाई
12 फीट थी। गुफा में एक अस्थि पंजर था तथा उसके पास एक चमकीला पत्थर
भी पड़ा हुआ था जो प्रथम द्रष्टया किसी फूलदान की तरह दीखता था। पास में दूसरी
गुफा भी थी जिसका द्वार खुला हुआ था उसके भीतर पत्थरों के उपकरणों व औजार
पड़े हुए थे। इस गुफा के आधार पर मृतकों के शव-विसर्जन की प्रथा पर प्रकाश पड़ता
है। पुरा मानव मृतक के शव को दफनाते थे, फेंकते थे या जलाते थे यह इतिहास
के लिए विचारणीय रहा है। इतिहासकारों का मानना है कि मृतक के शवों को दूर
जंगल में कहीं विसर्जित कर दिया जाता था। शवों को जलाने या दफनाने की प्रथायें
इतिहास की गतिशीलता में प्रकाश में आई जिसका सीधा संबंध कर्म-काण्ड जैसी
व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। वैदिक-काल के निषेधों व समर्थनों पर आधारित जिन
कर्म-विधानों का सृजन किया गया उनमें जन्म, विवाह के साथ-साथ मृतक के शवों
के बारे में भी विधान किया गया।
पत्थरों की कलात्मकता आज भी सोनभद्र में यत्रा-तत्रा देखी जा सकती है। पूरा
सोनभद्र जनपद मूर्तियों एवं भित्ति-चित्रों के जाल से पटा हुआ है। शिवद्वार की शिव
प्रतिमा के अलावा गोठानी के छोटे-छोटे मन्दिरों के नमूने इस बात को प्रमाणित करते हैं कि चुनार की तरह यहां भी पाषाण-शिल्प की कार्यशालाएं चला करती थीं। शिल्प कलाओं के बारे में सबसे पहला अनुमान ‘काकबर्न’ ने किया था। उसने यह भी स्थापित किया कि यहां पाए जाने वाले पत्थर जो औजार या उपकरण की तरह प्रतीत होते हैं वे कलाकारिता के नमूनों की तरह थे। काकबर्न ने ही इन पाषाण उपकरणों पर लाल रंग का पता लगाया जो संभवतः ‘आयरन आक्साइड’ का होगा। गुफाओं में पाए जाने वाले उपकरणों पर जो चित्राकारी थी, उनके रंग लाल तथा पीले थे। वैसे भी आयरन आक्साइड का रंग पक्का होता है, जिस पर हवा तथा पानी का विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता। इन पत्थरों के टुकड़ों पर की गई चित्राकारिता से उस काल के लोगों के बारे में उनकी कला अभिरूचियों का ज्ञान प्राप्त होता है। सामान्य रूप से ये पत्थर ग्रेनाइड तथा कठोर पत्थर से बने थे। इनमें चमक थी तथा ये बारीकी से तराशे हुए थे। इन पर जो चित्राकारियों की गई थी उनमें शिकार का दृश्य प्रमुखता से प्रदर्शित किया गया था। काकबर्न को ये चित्राकारियॉ अवर्णनीय जान पड़ीं थीं। खोज अभियान के दौर में ही काकबर्न ने एक ऐसी गुफा की भी खोज की जो एक प्रकार से कला-संग्रह की तरह प्रतीत होता था। काकबर्न का अनुमान था कि ये सारी चित्राकारियों अशोक कालीन थीं वैसे वह दुविधा में था कि संभवतः अशोक के पहले की भी हों लेकिन उसकी दुविधा ठीक नहीं थी क्यांेकि अशोक के शिला-लेखों के निर्माण की कार्यशाला उस काल में चुनार मंे थी जो प्रमाणित है। इस सन्दर्भ में सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि सोनभद्र के चित्राकारी युक्त पाषाण औजार भले अशोक के काल के न हों पर अशोक काल के आस-पास के तो होंगे ही, हो सकता है वह काल अशोक वंश के आखिरी अधिपति ‘बृहद्रथ’ के पूर्व का हो, क्योंकि अशोक के मगध का साम्राज्य अशोक के पोतों दशरथ व सम्प्रति ने बांट लिया था। ईसा पूर्व 210 के आस-पास ‘शुंग साम्राज्य’ स्थापित हो चुका था। इस आश्चर्यजनक गुफा में काकबर्न को एक ऐसा चित्रा भी प्राप्त हुआ था जिस पर नौ ग्रह प्रदर्शित थे। हिन्दू बेदावलम्बियों के लिए नौ ग्रहों की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका है। नौ ग्रहों की इस चित्राकारिता से सहज ढंग से काकबर्न इस निष्कर्ष पर पहुंच सकता था कि इनके चित्राकार काफी सभ्य व जागरूक रहे होंगे। कहीं-कहीं लोहे के तीर वगैरह भी सोनभद्र में पाए गए हैं जिसे काकबर्न ने आधुनिक माना है। इन गुफाओं से अलग एक ऐसी गुफा की खोज भी काकबर्न ने की जिस पर एक शहर का नक्शा चित्रित था। नक्शे में नगरवासियों का जीवन उकेरित था। कपड़े आदि से सज्जित मानव का चित्रा उत्तर का जान पड़ता था जो इस तथ्य की पुष्टि करता था कि पुराकाल में मानव की सभ्यताएं उत्तर से दक्षिण की तरफ गई हांेगी। कुछ चित्रा जो शिकार के थे उनमें बाघ चित्रित था तथा मानव आकृति उसका पीछा करती हुई थी। कुछ चित्रों में रथ भी चित्रित किए गए थे। रथ का सीधा संबंध युद्ध कालीन विकसित भारत से है। एक तरह से महाभारतीय युद्ध
परिवेश। चित्राकारियों में चित्रित मानव के बाल कन्धे तक लटके हुए थे। वे घाघरा या उसी तरह के वस्त्रा धारण किए हुए थे। किसी चित्रा में स्तूप भी चित्रित किया गया था। काकबर्न का मानना है कि इस तरह के शिकार के चित्रा या मानव के चित्रा जर्मनी तथा स्विटजर लैण्ड में तलाशे गए हैं। इन विविध चित्राकारियों के अलावा कुछ ऐसे चित्रा भी पाए गए जिससे मालूम होता था कि मानव विद्रोह की अभिव्यक्ति कर रहा हो। वे चित्रा युद्धों के विवरणों से परिपूर्ण थे। रथ तथा रथ के पहिए घोड़े तथा खच्चर भी प्रदर्शित थे। काकबर्न ने पशुओं की पूछों की लम्बाई से निष्कर्ष निकाला कि वे घोड़ांे के ही चित्रा रहे होंगे। दूसरे प्रकार के चित्रों में गैंडा, हिरन तथा भालू भी चित्रित थे। एक चित्रा तो गैंडो के शिकार का भी था जिसके पीछे एक आदमी भाला लिए हुए पीछा करता हुआ दिखाया गया था। कृषि के विकास काल में पशु-पालन खेती 1⁄4कृषि-कार्य1⁄2 तथा शिकार करना तत्कालीन समाज के लिए अनिवार्य कर्म था इसलिए ऐसा आभास मिलता है कि सोनभद्र की कृषि-संस्कृति उस जमाने में विकसित थी। जहां तक गुफाओं का सबंध है उससे उस काल का पता मिलता है जब मानव घुमक्कडी वृत्ति का था, कहीं से आया तथा कहीं चला गया। ऐतिहासिक साक्ष्य इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं कि विन्ध्याचल पहाड़ी सिद्धों व सन्तों की शरण स्थली रही है। गुफा चित्रों से भ्रम नहीं रह जाता कि सोनभद्र के हमारे पुरखों ने ही इनकी रचना की होगी। सभ्यता के विकास-क्रम में आर्यों तथा द्रविणों के संघर्ष की एक निर्णायक भूमिका रही है। प्रारंभ में ही जो लोग उत्तर से होकर दक्षिण की तरफ आ गए लगता है वे यहीं के होकर रह गए फिर इनकी वापसी दक्षिण से उत्तर की तरफ नहीं हुई। उन वर्णित चित्रों का चित्रांकन लाल, पीले रंगों से या सफेद चूने के यौगिकों से किया गया है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय द्वारा कोयल नदी के 22 किमी0 दूर पथराहो नदी में मिट्टी के कुछ ढूहों का पता लगाया गया जिसमें काले व लाल रंग के कीमती पत्थर के टुकड़े पाए गए जबकि इन ढूहों में कहीं भी काली धातु नहीं पाई गई। बनारस के काकोरिया में पाए गए सामानों से इनकी समानता प्रमाणित होती है कि गंगा की काली मिट्टी की सभ्यता यहां भी थी। यह अस्पष्ट नहीं रह जाता है कि सोनभद्र की सभ्यता प्राचीन है तथा बनारस से मिलती जुलती है। काली मिट्टी की संस्कृति कृषि-समाज की उपलब्धियों में से है जो सहभागिता तथा सहकार को बढ़ावा देती है दूसरी जो व्यापारिक संस्कृतियॉ हैं वे तो केवल पक्षपातपूर्ण प्रतिस्पर्धा ही सृजित करती हैं जिससे सामाजिक समरस्ता का क्षरण होता है। मानव-सभ्यता का कृषिक सभ्यता से बाहर निकल जाना यह सर्वथा दुखद रहा है पर अब तो युग बदल चुका है हम व्यापारिक युग में प्रवेश कर चुके हैं और हमारा पुरा-काल अब केवल अध्ययन व शोध का विषय बन कर रह गया है।
शास्त्रों में सोनभद्र शास्त्रों में सोनभद्र शास्त्रों में सोनभद्र मनु और सतरूपा को भारतीय समाज अपना जनक मानता है तथा इन्हें प्रमाणित रूप से शास्त्रों के द्वारा स्थापित भी किया गया है। पुराणों के कथाएं तथा मनुस्मृति दोनों ही ‘मन’ु को केन्द्र में रखकर महत्वपूर्ण ग्रन्थ की हैसियत में हैं। गीता, मनुस्मृति, वेद, हिन्दू आख्यानों के ऐसे दस्तावेज हैं जिन पर सार्थक व उपयोगी बहस करना हिन्दू होने के अस्वीकार से है यानि हिन्दू विरोधी होना है। जात-पांत वर्ण व्यवस्था ये कुछ ऐसे समाज विरोधी तत्व दर्शन हैं जो इतिहास की गतिशीलता को बाधित कर क्षयग्रस्त करते हैं। सभी जानते हैं कि शास्त्रों के संघातों को झेल पाना आसान नहीं होता। तभी तो इतिहासकार अबूतालिब ने कहा था...‘तुम इतिहास पर बन्दूक चलाओगे तो वह तुम पर तोप से गोले दागेगा’ हमें सदैव ध्यान रखना होगा कि शस्त्रों एवं शास्त्रों की द्वन्दात्मकता से उपजने वाला इतिहास अपने विमर्शो के माध्यम से ऐतिहासिक सत्य का अनुसंधान करे न कि उसका अनुगामी बन जाये। गीता, मनुस्मृति तथा वेद की विचारधाराओं के इतर जो शास्त्राीय क्रान्ति महावीर तथा बुद्ध द्वारा की गई तथा वेदों को अस्वीकार किया गया उसमें हमें देखना चाहिए कि तत्कालीन जनता का पक्ष क्या था? जाहिर है र्ई.पू. छठवी शताब्दी के पहले की आक्रान्त सामाजिक व्यवस्था का विरोध ही वह सूत्रा था जो महावीर तथा बुद्ध को प्रकाश में लाता है। इसे 1857 के स्वतंत्राता संग्राम से जोड़ कर देखना चाहिए यदि 1857 का काल विद्रोह के लिए अग्रसर न होता तो शायद हम 1947 तक की प्राप्तियों तक न पहुंचते तथा हमें गांधी जैसा विचारक न मिलता। ‘सत्पथ ब्रावमण’ मनु तथा वैवश्वता की चर्चा करता है। ‘पद्म पुराण’ चेदी वंश के अधिपति ‘दन्तवक्र’ की चर्चा करता है कि वह महाभारत के समय कृष्ण द्वारा मारा गया। ‘दन्तवक्र’ शायद ‘करूष’ था जिसे असुर समझा जाता है। बाद में जब यह प्रमाणित हो जाता है कि ‘करूष’ मनु की नौवीं सन्तान थे तब उन्हें महाभारत के युद्ध में शामिल किया जाता है। कुछ शास्त्रा मानते हैं कि ‘करूष’ ही असुर थे तथा तत्कालीन समाज में असुरों को निरापद नहीं माना जाता था। भागवत पुराण मानता है कि ‘करूष’ लोग बहादुर तथा लड़ाकू हुआ करते थे। शास्त्रों की मतभिन्नता भी एक ऐसा कारक है जो सच्चाई को प्रकाश में नहीं लाने देती। ‘सतपथ ब्राहमण’ असुरों को बुरे अर्थो में प्रमाणित नहीं करता। उसमें अनेक ऐसे प्रसंग है जहां असुरों को सम्मानित रूप से वर्णित किया गया है। ‘सतपथ ब्राहमण’ के अनुसार असुर ‘प्राच्या’ थे तथा पूर्वी भारत में निवास करते थे। पाणिनी ने बोली के आधार पर असुरों की व्याख्या की है तथा व्याख्यायित किया है कि राक्षसों की बोली बोलने वालों को ‘असुर’ कहा जाता था। सवाल उठता है कि
क्या पाणिनी के समय से ही भाषा व बोली के आधार पर अभिजात्य परंपरा के चलन
का प्रारंभ हो चुका था जिसे डा.राम मनोहर लोहिया ने भाषागत शोषण का नाम दिया
है। अंग्रेजों ने अंग्रेजी भाषा के माध्यम से पूरे भारत का विनाशकारी शोषण किया
फलस्वरूप आज भी दो प्रतिशत अंग्रेजी दॉ लोग भारत के सामाजिक राजनीतिक
आर्थिक तथा साहित्यिक क्षेत्रों का अपनी हित साधना में उपयोग करते हैं। तुर्रा यह
कि उन्हें ही भारत का सर्वोत्तम व सर्वेश्रेष्ठ ज्ञान-मीमांशी 1⁄4म्चपेजवउवसवहपेज1⁄2 व
सत्ता-मीमांसी 1⁄4व्दजवसवहपेज1⁄2 समझा जाय तदनुसार सम्मानित किया जाय। जहां
तक सोनभद्र तथा मीरजापुर का सवाल है ये दोनों जनपद बोली के आधार पर
इलाहाबाद, सीधी, रीवां, बांदा, बगैरह के जितना नजदीक हैं उतना बनारस, गाजीपुर
बलिया, आजमगढ़ के नहीं सो यह भिन्नता हो सकती है। सवाल है क्या यहां के
निवासी वैदिक काल के नहीं थे? फिर भी निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि
यहां के निवासी आर्यो के प्रभाव में आए रहे होंगे तथा उनकी अधीनता स्वीकार किए
होंगे।
आर्यो के बारे में अविवादित राय है कि वे पहले सप्तसिन्धु 1⁄4सात नदियों का क्षेत्रा
अविभाजित पंजाब 1⁄2 में आए तथा वहां बस्तियां बनाए। सिन्ध,ु बितस्ता 1⁄4झेलम1⁄2
आसक्री 1⁄4चिनाव1⁄2 परूश्ष्नी 1⁄4रावी1⁄2 विपासा 1⁄4व्यास1⁄2 शतुद्री 1⁄4शतलज1⁄2 और सरस्वती
1⁄4राजस्थान में विलुप्त1⁄2 इन्हीं सात नदियों के क्षेत्रों के आस-पास आर्यो द्वारा आवास
बनाया जाना प्रमाणित है। आर्यो के प्रारंभिक कुलों के बारे में जो ज्ञात है वह पुरू,
तुर्वस, यदु, अनु तथा द्रुह इन्हीं पंचकुलों के लोग थे। इसके अलावा भी एक कुल
था जो ‘भरत’ कहलाता था।
अब यह भी विवादित नहीं है कि आर्यो ने अपना विस्तार पूर्व की ओर किया,
शतपथ ब्राहमण तो ब्राहणों तथा क्षत्रियों के राज्य विस्तार का बहुत ही रोचक व
मर्मान्तक वर्णन करता है। सीमाओं के विस्तार ने नये-नये क्षेत्रों व जनपदों का सृजन
किया। आर्य हमलावर समूह के नये क्षत्रापों का उदय हुआ। नये जनपदों एवं नये
क्षत्रापों के उदय से सप्त-सिन्धु का महत्व कम होता गया तथा संस्कृति व राजनीति
के नये केन्द्र सरस्वती व गंगा के क्षेत्रों में निर्मित होने लगे। यहां पहले से ही कुरू,
काशी तथा कोशल राज थे।
कुरू, काशी, कोशल राज का विस्तार प्रयाग तक था तथा यह मध्यक्षेत्रा 1⁄4देश1⁄2 के
नाम से जाना जाता था। आज के उत्तर प्रदेश की सीमा भी यही है। काशी राज का
क्षेत्रा इधर सोनभद्र तथा मीरजापुर गाजीपुर तक था तो पांचाल का क्षेत्रा बरेली,बदायूं
फरूखाबाद तक जिसकी राजधानी अहिक्षेत्रा 1⁄4बरेली1⁄2 जिसे काम्पिल्य कहा जाता था
कोशल राज का क्षेत्रा अवध तथा गोण्डा था जिसे श्रावस्ती कहा जाता था। कोशल
की राजधानी साकेत 1⁄4अयोध्या1⁄2 में थी। आर्यो का उत्तर प्रदेश में प्रवेश करना तथा
कुरू, कोश्शल तथा पांचाल पर अपना अधिकार स्थापित कर लेना इतिहास की सबसे
पविर्तनकारी घटना है।
रामायण तथा महाभारत जैसे हिन्दू ग्रन्थों में इस क्षेत्रा का वर्णन प्रमुखता से किया गया है। माना गया है कि इस क्षेत्राके लोग शास्त्रार्थ तथा ब्राहमणी कर्मकांड में निपुण थे तथा न केवल पूजा वरन् बलि जैसी कार्यवाहियों के निष्पादन में भी मर्मज्ञ थे। आर्यो के काल में बलि जैसी नृशंस परपंरा क्यों थी, क्या वे क्रूरता व हत्याओं की शास्त्राीयता को ईश्वर प्राप्ति का साधन मानते थे? या बलि का अर्थ कुछ दूसरा था। इतिहासकारों का मानना है पांचाल के राजा ‘जैवालि’ के बाद इतिहास की गतिशीलता पर वैदिक उपनिषदिक तथा पौराणिक ग्रन्थों का मायालोक कुछ इस तरह हावी हुआ कि इतिहास की गतिशीलता ही बाधित हो गई। छठवीं शताब्दी ई.पू. के आस-पास से इतिहास की गतिशीलता प्रकाश में आती है। वह काल बुद्ध, महावीर, मक्खलिपुत,गोशाल जैसे आधुनिक विचारकों का काल भी था जो वैचारिक व शास्त्राीय विमर्शो पर करारा प्रहार करते हुए सवाल उठा रहे थे कि क्या वेद, पुराण व उपनिषद बहस के विषय नहीं हैं? ये सारे के सारे ब्राहमण, क्षत्रिय ग्रन्थ जब समता, भाईचारा स्थापित नहीं कर सकते, ईश्वरीय प्रपंच के नाम पर मानवीयता व सामाजिकता का
दोहन व शोषण करते हैं, ऐसा नहीं चलेगा। इस प्रकार से छठवीं शताब्दी ई.पू. सामाजिक सिद्धान्तों 1⁄4ैवबपंस ज्ीमवतल1⁄2 के साथ-साथ इतिहास को भी एक नई दिशा
देता है। यदि ऐसा न होता तो मौर्य काल के अशोक व उनके पोते दशरथ व संप्रति तक बौद्ध धर्म का बोल-बाला न होता। छठवीं शताब्दी के ई.पूर्व तथा आर्यो के आगमन के बाद का काल इतिहास व समाज के विकासक्रम का संक्रमण काल रहा है। संक्रमण इस सन्दर्भ में कि सारा कुछ वैदिक व पौराणिक हो चुका था इस प्रकार से वह काल एक धारा की जड़ता का भी वह काल था। कुछ भी अपरिवर्तनीय नहीं है कुछ ऐसा ही। ऐसा नहीं है कि तत्कालीन समाज ने यूं ही अपने समाज को अपरिवर्तनीय मान लिया था। दरअसल जब कोई भी धार्मिक-व्यवस्था राजनीति, अर्थ, समाज-विज्ञान, भविष्यवाणियां, योजना, विकास, शिक्षा, कृषि-विज्ञान जैसे सभी क्षेत्रों का शास्त्रा विकसित कर लेती है तब समाज के सामने क्या शेष रहता है कि वह उस व्यवस्था के विपरीतगामी अर्थों को पकड़े। वह काल ब्राहमण धर्म के धार्मिक दमन के परिणामों का भी काल था। हिन्दू तत्ववादियों के लिए यह खुशी की बात हो सकती है कि ब्राहमण-धर्म ने किसी युग में मानवीय ज्ञान के सारे क्षेत्रों को अपने अधीन कर लिया था किसी को अपने विपक्ष में उठने, बोलने का अवसर ही नहीं दिया था। खगोलशास्त्रा से लेकर जीवशास्त्रा, शिक्षाशास्त्रा, शैन्यशास्त्रा, अर्थनीति, भू-गर्भशास्त्रा यहां तक कि चिकित्सा शास्त्रा को भी धर्म के आवरण में कैद कर लिया गया था। चिकित्सा शास्त्रा के क्षेत्रा में धन्वतरि, अर्थशास्त्रा के क्षेत्रा में कुबेर, लोक-कल्याण के क्षेत्रा में शिव, मानव सृष्टि के क्षेत्रा में ब्रवमा, ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रा में सरस्वती, मौसम पर्यावरण, शान्ति व्यवस्था के क्षेत्रा में ईन्द्र जैसे पौराणिक व वैदिक देवों का भी सृजन कर लिया था। जाहिर है ऐसे में इतिहास की गतिशीलता जानने समझने के लिए
सोनभद्र प्राचीन सोनभद्र प्राचीन
जिस व्यास या वाल्मिकी की आवश्यकता थी वे पहले ही हो चुके थे बाद में यह कार्य
बुद्ध व महावीर ही करते हैं। इसलिए छठवीं शताब्दी ई.पू. के बाद से ही इतिहास
की द्वन्दात्मकता का हमें संज्ञान हो पाता है। उसके पहले तो हम किसिम किसिम
के देवी-देवताओं के अधीन थे।
कुल मिलाकर पुरावैदिक-काल में उत्तर प्रदेश तक का कोई उल्लेख नहीं मिलता।
गंगा और यमुना जैसी पवित्रा नदियां भी आर्य देश की सीमा से बाहर जान पड़ती हैं।
हां उत्तर-वैदिक काल में सप्त-सिन्धु के बाद गंगा का उल्लेख मिलता है। इतिहास
की गतिशीलता पांचाल के ‘जैवालि’ तथा काशी के ‘अजातशत्राु’ से प्रारंभ होती है।
उपनिषद काल के ऋषि भारद्वाज, याज्ञवल्क्य, वशिष्ठ के आश्रमों का उल्लेख यहां
मिलता है। उत्तर-वैदिक काल में भी पूरा उत्तर प्रदेश वैदिक परंपराओं के प्रभाव में
ही था। रामायण व महाभारत काल में भी यह क्षेत्रा वैदिक परंपराओं के समर्थन में
खड़ा था।
माना यह जाता है कि रामायण की कथा कोशल राज के ‘इक्ष्वाकु वंश’ से संबद्ध
थी तथा महाभारत की कथा हस्तिनापुर के ‘कुरू’वंश’ से। वाल्मीकि का ब्रहमावर्त
आश्रम भी कानपुर के बिठुर जिले में स्थित था। महाभारत की कथा जिसे सूत जी
कहते हैं जिसे उन्होंने व्यास जी से सुना था, वह स्थान भी उत्तर प्रदेश के सीतापुर
के नीमसार मिसरिख में है। स्पष्ट है कि वैदिक-काल से लेकर रामायण काल तक
सोनभद्र का पूरा परिक्षेत्रा भी, काशी राज के साथ-साथ हमेशा उल्लेखनीय रहा है।
पाणिनी ने बोली व भाषा के आधार पर आर्यो व अनार्यो के पहचान का जो तर्क
गढ़ा था वह कम से कम सोनभद्र में तो प्रमाणित नहीं होता। सोनभद्र का रिश्ता
प्रारम्भ से ही काशी से व काशी के अजातशस्त्राु से तो रहा ही है। बाद में मगध फिर
पाटलिपुत्रा से।
सोनभद्र की बोली तथा बनारस की बोली में स्वर भिन्नता है तो इसका अर्थ यह
नहीं कि सोनभद्र में वैदिक सभ्यता का प्रवेश नहीं था। यहां की जनजातियां इस बात
का स्पष्ट प्रमाण हैं कि वे आर्यों तथा सभ्य संस्कृतियों के लोगों द्वारा इतिहास के
विकास क्रम में विस्थापित किये गये हैं।
यह रहस्यमय नहीं है कि छठवीं शताब्दी ई.पू. का काल विभिन्न राजवंशों के
अर्न्तविरोधों व झगड़ों का काल रहा है। तत्कालीन राज-घरानों का स्वरूप महाजनपदों
का था। पुस्तकों में मुख्यतया निम्नलिखित महाजन पदों के उल्लेख मिलते हैं।
1⁄411⁄2 कुरू1⁄4मेरठ,दिल्ली,थानेश्वर1⁄2 राजधानी दिल्ली के पास इन्द्रपाल 1⁄421⁄2 पांचाल
1⁄4बरेली,बदायंू,फर्रूखाबाद1⁄2 राजधानी अहिक्षेत्रा1⁄4बरेली के आसपास1⁄2 1⁄431⁄2शूरसेन 1⁄4मथुरा
का क्षेत्रा1⁄2 राजधानी मथुरा 1⁄441⁄2 वत्स 1⁄4इलाहाबाद और आसपास1⁄2 राजधानी कौशाम्बी
1⁄4इलाहाबाद के पास1⁄2 1⁄451⁄2 कोशल 1⁄4अवध1⁄2 राजधानी साकेत 1⁄4अयोध्या1⁄2 और श्रावस्ती
1⁄4गोंडा में 1⁄21⁄461⁄2 मल्ल 1⁄4देवरिया1⁄2 राजधानी कुशीनगर 1⁄4कसिया1⁄2 और पावा 1⁄4पडरौना1⁄2 1⁄471⁄2
काशी 1⁄4वाराणसी1⁄2 राजधानी वाराणसी 1⁄481⁄2 अंग 1⁄4भागलपुर1⁄2 राजधानी चम्पा 1⁄491⁄2
मगध 1⁄4दक्षिण बिहार1⁄2 राजधानी गिरिब्रज 1⁄4राजगृह बिहार शरीफ के पास1⁄2 1⁄4101⁄2 वज्जि 1⁄4दरंभगा और मुजफ्फर1⁄2 राजधानी मिथिला, जनकपुर 1⁄4नेपाल सीमा पर1⁄2 1⁄4111⁄2 चेदी 1⁄4बुन्देल खण्ड1⁄2 राजधानी शुतिमती बांदा के पास 1⁄4121⁄2 मत्स्य 1⁄4जयपुर1⁄2 राजधानी विराट जयपुर के पास 1⁄4131⁄2 अश्मक 1⁄4गोदावरी घाटी1⁄2 राजधानी पाण्डन्या 1⁄4141⁄2 अवन्ति 1⁄4मालदा1⁄2 राजधानी उज्जयिनी 1⁄4उज्जैन1⁄21⁄4151⁄2 गांधार 1⁄4पश्चिमोत्तर क्षेत्रा, पाकिस्तान में1⁄2 राजधानी-तक्षशिला, रावलपिण्डी के पास 1⁄4161⁄2 कम्बोज 1⁄4 राजधानी राजापुर1⁄2। पूरे भारत में आर्य सोलह खानों में विभक्त थे तथा आपस में संघर्षरत थे। सत्तामोह तथा सर्वश्रेष्ठता दो ऐसे कारक थे जो उन्हें आपस में लड़ाते थे। जाहिर है आर्य-कालीन समाज कबीलाई झगड़ालू प्रवृत्तियों से वहुत अधिक भिन्न नहीं था। इस समाज में जनता का पक्ष कहीं भी उभर कर प्रकाश में नहीं आता। ‘राजा खुश तो जनता खुश’ की कथित अवधारणा का वह समाज एक निश्चित पड़ाव पर ठहर सा गया था। सामाजिक व राजनीतिक अन्तविरोधों के समापन तथा जनता में सहभागिता स्थापना के लिए लिए उस समाज में कोई स्थान नहीं था। इतिहास में ठहराव तभी आता है जब दमन व शोषण अभूतपूर्व हांे या कि पूरा समाज ही भाग्यवादी तथा आस्थावादी बनकर भविष्य की परिवर्तनकामी आकांक्षाओं से विमुख हो जाये, समय की जटिलताओं से संघर्ष करना भूल जाये-आम जन की कल्पनाशीलता, आकांक्षा, कामना, सपना पूरी तरह से छिन जाये। वैदिककाल तथा उत्तर-वैदिककाल का मानव ईश्वर के प्रपंचांे में ही अपने सुख-दुख अवनति-उन्नति विकास-विनाश प्रगति-दुर्गति, जीत-हार, हानि-लाभ, यश-अपयश जैसे विलोमार्थी भावों व इच्छाओं की सन्तुष्टि पाना श्रेयस्कर समझने लगा था। वहां कार्य तथा कारणता का कोई दर्शन नहीं था, एक तरह से वहां शून्यवाद था इसके अलावा कुछ भी नहीं है, कुछ भी नहीं था। जैसा अंग्रेज एफ.ई. पार्जिटर मानता है कि सोनभद्र किसी युग में करूषों के अधीन रहा होगा तथा वह युग आर्यांे के पूर्व का रहा होगा। वह करूष साम्राज्य का विस्तार सोन नदी से होता हुआ रींवा जनपद तक मानता है। वह पूरी कैमूर घाटी को उसमें शामिल करता है। वही इतिहासकार बी. सी. लाल करूषों का पहला स्थान रींवा मानते हैं तो दूसरा शाहाबाद। विन्ध्याचल परिक्षेत्रा को करूषों का क्षेत्रा भागवत पुराण व वायु पुराण भीें प्रमाणित करते हैं। पौराणिक आख्यानों में जिन करूषों के साम्राज्य का विवरण मिलता है उसका एक दल मालवा की ओर तो दूसरा दल भोजांे की तरफ गया होगा। उस समय भोज शाहाबाद, पलामू, सिंहभूमि में पूरी तरह व्यवस्थित थे। विष्णु पुराण के अनुसार करूष लोग मुख्यतया कसिस, मत्स्य, चेदी, पांचाल तथा भोजों से संबंधित रहे हांेगे। सोनभद्र में करूषों की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक उपस्थिति से कोई भी इतिहासकार इनकार नहीं करता। अंग्रेजों ने करूषों के इतिहास सामग्री संकलन में कूट बुद्धि का परिचय नहीं दिया है संभवतः इसलिए कि सोनभद्र की ऐतिहासिक परिस्थितियां उस समय भारतीय ऐतिहासिक राजनीति को प्रभावित नहीं कर सकती थीं।
सोनभद्र में तथा मीरजापुर में पाई जाने वाली भर व चेरो की प्रजातियां ही शायद
करूष रही हों क्यांेकि इनसे पूर्व की यहां किसी भी आदिवासी प्रजाति के निवास का
प्रमाण नहीं मिलता। खरवार, धागर, भुइयां, जैसी प्रजातियां तब की जान पड़ती हैं
जब जनजातियों का बड़े पैमाने पर आर्यी-करण प्रारंभ हो चुका था। यह ज्ञातत्व है
कि दुनिया की सारी शासक प्रजातियां अन्य पिछड़ी पराजित या दलित जातियांे का
विलीनीकरण अपने में करती रही हैं। ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्म परिवर्तन कराया
जाने वाला कार्य संगठित प्रयासों के क्षेत्रा में स्पष्ट है।
पौराणिक कथाओं तथा दन्त-कथाओं में मिलने वाले आख्यान भी सोनभद्र तथा
मीरजापुर के चुनार, अगोरी, विजयगढ़, कन्तित के राजघरानों के विवरणों की जानकारी
देते हैं। एक कथा के अनुसार चुनार का किला द्वापर युग के किसी आध्यात्मिक
शक्ति का पद्चिन्ह है। उस महाशक्ति ने इस चुनार की पहाड़ी पर अपना पैर तब
रखा था जब वे कन्याकुमारी से हिमालय की यात्रा पर थे। संयोग देखिए की चुनार
किले का वह भाग जो गंगा नदी की तरफ है उसका रूप पैर के अग्रभाग की तरह
ही दिखता है जिसका स्पर्श गंगा करती रहती हैं। किले का पिछला भाग पैर के पिछले
भाग ऐड़ी की तरह दिखता है। पर इसे संयोग के स्थान पर आध्यात्मिक शक्ति का
वरदान कहा जाय कुछ असंभव कथन जैसा ही है, आकृति विशेष की संरचना के
कारण ही इसे ‘चरणदरी’ भी कहा जाता रहा है।
एक दूसरी कथा भी इससे जुड़ी हुई है। इस कथा के अनुसार ‘भरतहरि’ जो
उज्जयनी राज के राजा विक्रमादित्य के बड़े भाई थे उन्हांेने चुनार के किले को
आध्यात्मिक साधना के लिए चुना था। इतिहास बताता है कि वे राजपाट छोड़कर
योगी बन गए थे। वे एक दिन अचानक उज्जयनी से भाग निकले। विक्रमादित्य
उनकी खोज करते हुए चुनार गढ़ तक आए। यहां भरतहरि अपनी साधना में रम
गये और वापस नहीं लौटे। फिर विवश होकर विक्रमादित्य ने अपने भाई भरतहरि
के लिए चुनार गढ़ में ही आवास का निर्माण कराया। इस दन्तकथा से यह आशय
निकालना कठिन न होगा कि चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य, तीसरी तथा चौथी सदी के
मध्य में चुनार गढ़ आए होंगे क्यांेकि उस समय ‘गुप्त साम्राज्य’ का वैभव विस्तार
तेजी से हो रहा था। इसके पहले 275 ई. में कन्तित पर भारशिवों का अधिपत्य
स्थापित हो चुका था।
सोनभद्र की पौराणिकता को प्रमाणित करने वाली विश्वमित्रा की भी एक कथा
है। कथा ब्राहमण व क्षत्रिय संघर्ष के उन संघातों का वर्णन करती है जो राजा त्रिशंकु
को झेलनी पड़ी थी। मंत्रों, पूजा, सिद्धियों आदि के संघर्ष का एक अवैज्ञानिक व
घृणित दास्तान इस कथा में मिलता है। यह कथा यह भी सन्देश देती है कि मंत्रांे
व साधनाओं के लिए प्रयोग किया जाने वाला आदमी व प्रयोगकर्ता दोनों कैसे आकाश
तथा हवा में लटक जाते हैं। त्रिशंकु राजा की कहानी विश्वमित्रा तथा वशिष्ठ की
सिद्धि व साधना परंपरा की तरफ भी संकेत करती है तथा दोनों के विरोध की तरफ
भी। विश्वमित्रा के निर्मित स्वर्ग में त्रिशकु जाकर फंस जाते हैं, ब्राहमण शक्तियां उन्हंे स्वर्गारोहण नहीं करने देतीं। विश्वमित्रा जैसे प्रयोगकर्ता का क्या हुआ? इस विन्दु पर कथा खश्मोश है पर त्रिशंकु को ब्राहमणी शक्तियों ने जमीन पर फेंक दिया फलस्वरूप उनके मुंह से ‘लार’ निकलने लगा जो विषैला था। संयोग देखिए कि वह लार ‘कर्मनाशा’ नदी में गिरा फलस्वरूप कर्मनाशा नदी का जल विषैला हो गया। सामान्य रूप से आज भी कर्मनाशा नदी बतौर पवित्रा नदी स्वीकार्य नहीं है। पौराणिक कथाओं में ब्राहमण-क्षत्रिय संघर्ष की कथा कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में अवश्य मिलती है। मीरजापुर गजेटियर 1974 के अनुसार-तत्कालीन प्रभावी साम्राज्यों करुष, नभागा, धृष्ठा, नरिश्यन्ता, प्रेमा तथा प्रिशाघ्रा के साम्राज्यों को प्रतिद्वन्दी साम्राज्यों पौरवों नहुषों तथा प्रजातियों द्वारा पराजित कर दिया गया। वासुसुधन्वा ने पौरवों का बहुत बड़ा साम्राज्य स्थापित किया। गजेटियर के अनुसार बृहद्रथ वासुसुधन्वा का पुत्रा था जो मगध का राजा बना यहां गजेटियर यह स्पष्ट नहीं करता कि वासुसुधन्वा ई.पू. के किस काल में था। बनारस के इतिहास तथा उत्तर प्रदेश वार्षिकी से स्पष्ट होता है कि वृहद्रथ, अशोक की पीढ़ी का था तथा अशोक के बाद मगध का राजा बना था। यह भी मालूम होता है कि अशोक के दो पोते दशरथ व संप्रति थे। यह भी स्पष्ट है कि वृहद्रथ की हत्या उसके सेनापति पुष्यमित्रा द्वारा की गई जो इतिहास की चौकाऊँ घटना है फिर तो न केवल राज-परंपरा के इतिहास का विलोपन हुआ वरन् बौद्ध-धर्म की जो आधार-शिला थी वह भी टूटने लगी। वृहद्रथ के बाद पुष्यमित्रा ने एक नये राजवंश की स्थापना की जिसका नाम था ‘शुंग वंश’। हालांकि यह ‘शुंग-वंश’ भी बहुत समय तक ऐतिहासिक हस्तक्षेप न कायम कर सका। राज परंपराओं की आपसी संघातिक प्रक्रियाओं में शुंग वंश के अन्तिम शासक की हत्या उसके अपने ही मंत्राी वासुदेव द्वारा ई.पू. 73 में कर दी जाती है। शंुग शासन काल में ही वासुमित्रा के समय यवन डिमिटिंयस का मगध पर हमला होता है जिसे वासुदेव विफल कर देता है लेकिन वे भागे नहीं लौटकर सियाल कोट चले गए। मथुरा बहुत समय तक ‘मैनेन्डर’ का प्रमुख नगर भी बना रहा गया। अतीत को पीछे से देखने पर हमें ज्ञात होता है कि सोनभद्र तथा मीरजापुर, काशी, कोशल के प्रभाव क्षेत्रा में सदैव से रहा है। सूक्ष्मता से विवेचन करें तो सोनभद्र का अतीत लगभग आठवीं सदी तक खामोशी का रहा है क्योंकि यहां किसी भी प्रमुख राजघराने की चर्चा उन कालों में नहीं मिलती अलबत्ता कन्तित का जिक्र आता है जिसे भारशिवों ने जीता तथा वहां निर्बाध शासन किया। शुंग वंश को समाप्त करने वाले वासुदेव ने ई.पू. 73 में ‘कण्व वंश’ की स्थापना की। ‘कण्व वंश’ लगभग 48
साल तक चला था वाद में ‘आंध्र वंश’ के संस्थापक सात वाहन के सिमुक ने ई. पू. 28 में कण्व वंश का सफाया कर दिया।
वृहद्रश्थ को महाभारत के जरासन्ध से जोड़कर गजेटियर स्थापित करता है कि
करूषों का मगध में विलोपीकरण ई.पू. 400 में हुआ होगा। यह बहुत ही भ्रामक तथा
मनगढ़न्त जान पड़ता है क्यांेकि वृहद्रथ जिसकी राजधानी गिरिव्रजा थी उसकी हत्या
पुष्यमित्रा द्वारा 194 ई.पू. में कर दी जाती है। इस प्रकार यदि वृहद्रथ अशोक के बाद
का था तो वह कोई दूसरा अधिपति रहा होगा जो हो सकता है अशोक के पूर्व का
रहा हो। क्यांेकि यह स्पष्ट है कि अजातशत्राु व शिशुनाग का काल 410-392 ई. पू. का है, हो सकता है गजेटियर में वर्णित वृहद्रथ कोई दूसरा हो। सोनभद्र का रिश्ता
मगध से रहा था यह निर्विवाद है। चुनार में अशोक के शिला-स्तूपों की कार्यशाला थी यह मान्य है तथा इतिहासकार इस तथ्य से भी सहमत भी हैं कि अशोक के शैल-स्तंभ खासतौर से वहां अवश्य ही पाए जाते हैं जहां अशोक के साम्राज्य का अन्त होता था। रूपनाथ तथा सासाराम में पाये जाने वाले शिला-लेखों के बारे में गजेटियर बताता है कि सोनभद्र में अटावियों की भी शासन व्यवस्था थी। महाराज समक्षोवा के एक ताम्र-पत्रा से ज्ञात होता है कि यह पूरा क्षेत्रा कभी समुन्द्रगुप्त 1⁄4तीसरी चौथी सदी1⁄2 के आधिपत्य में भी रहा था। समुन्द्रगुप्त की चर्चा गजेटियर प्रमुखता से करता है कि समुन्द्रगुप्त ने 18 वन राज्यों का मिलाकर एक नये शक्ति केन्द्र की स्थापना की थी। इस शक्ति केन्द्र का नाम ‘जंगल राज’ दिया गया था। इसके पूर्व शक, पार्थियनों द्वारा इस क्षेत्रा को अधिशासित करने के लिए लगातार हमले किए जाते रहे थे। दूसरी तरफ ई.पू. कुषाड़ भी इस क्षेत्रा को अपने प्रभुत्व में करने के लिए प्रयासरत रहे थे। कनिष्ठ प्रथम का राज्यभिषेक 78 ई. में हुआ था तथा कुषाड़ों का शासन काल 120-144 ई. के बीच या 144 ई0 के बीच तक या 144 ई0 तक चलता रहा था। कुषाड़ों की राजधानी पुरुषपुर 1⁄4पेशावर1⁄2 तथा मथुरा में थी जिससे स्पष्ट होता है कि कुषाड़ों ने ही मैनेण्डर को पराजित किया था तथा मथुरा को राजधानी बनाया था। कुषाड़ों के साम्राज्य के भीतर काश्मीर गान्धार तथा गंगा नदी का मैदानी भाग था। इससे साफ हो जाता है कि काशी व कोशल दोनों ही कनिष्ठ के अधीन रहे होंगे। तीसरी सदी में उत्तर भारत पर राज्य करने वाला सबसे सशक्त राजवंश ‘नागवंश’ था जिसकी राजधानी मथुरा व कान्तिपुरी में थी। कान्तिपुरी को गजेटियर प्रमाणित करता है कि कन्तितपुरी ही कान्तिपुरी था। राजा ‘नव’ का अभ्युदय 275 ई. में होता है फिर इतिहास की धारा अचानक गुप्त साम्राज्य की तरफ बढ़ जाती है। चन्द्रगुप्त प्रथम 1⁄4305-3251⁄2 तथा समुन्द्रगुप्त, समुन्द्रगुप्त से लेकर स्कन्दगुप्त 1⁄4455-467ई01⁄2 तक गुप्त साम्राज्य का शासन काल चलता रहा था। स्कन्दगुप्त को हूणों पर विजयश्री हासिल करने का भी श्रेय मिलता है। गुप्त साम्राज्य काल मंे शैव-धर्म अपने प्रतिद्वन्दी धर्म यक्ष-धर्म पर अधिकारिक विजय भी पाता है। लगभग पांचवी शताब्दी तक मालूम होता है कि मीरजापुर के कन्तित के साथ-साथ सोनभद्र भी कभी मौर्यों कभी शको ं े ं कभी नागवंशियों तो कभी गुप्तों के साम्राज्यों में पेन्डुलम की तरह लगातार हिलता-डुलता रहा। किसी भी तरह का राजनीतिक, प्रशासनिक स्थायित्व यहां नहीं
दिखता वैसे भी वह सत्ता-प्रबंधन के अस्थिरता का ही काल था। यह ऐतिहासिक सच्चाई है कि गुप्त साम्राज्य के प्रार्दुभाव 1⁄4400 ई. से 600 ई1⁄2 के बाद हर तरफ राजनीति का एकता बनी हुई थी। पूरा उत्तर प्रदेश शानदार तरीके से समृद्धिशाली हो रहा था। गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद सत्ता विकेन्द्रित हो गई। कुछ समय तक कन्नौज पर कन्नौज के मौखरियों की ही सत्ता रही है। साथ ही साथ सत्ता बचाये रखने के लिए उस समय उन्हें मालवा के गुप्त राजाओं से कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा था। इस वंश का अन्तिम शासक ग्रहवर्मन 1⁄46061⁄2 में मालवा के राजा देवगुप्त द्वारा पराजित हुआ था तथा मारा गया था। ध्यान देने की बात है कि गजेटियर मीरजापुर करुष राजा शशांक की चर्चा करता है कि ग्रहवर्मन शशांक के द्वारा ही मारा गया था। गजेटियर हर्ष चरित का संदर्भ लेता है। इतिहास की गतिशीलता इतिहास के पात्रों, महापात्रों के अगल-बगल लम्बे काल तक नहीं ठहरती। समय के तत्कालीन अन्तर्विरोध सदैव सक्रिय व संघर्षरत रहा करते हैं। ग्रहवर्मन के बाद कन्नौज ग्रहवर्मन के भाई हर्ष के अधीन आ गया 1⁄4606-648ई1⁄2 हर्श्ष के ही समय में चीनी यात्राी व्हेनसांग कन्नौज आया था। हर्ष कन्नौज के राज्याभिषेक के पूर्व थानेश्वर के अधिपति थे फलस्वरूप कन्नौज तथा थानेश्वर के राजवंश आपस में विलीन हो गए। कन्नौज इस प्रकार से उत्तर भारत का प्रमुख नगर बन गया। कई सदियों तक कन्नौज का वही स्थान था जो कभी पाटलिपुत्रा का था। कन्नौज पर काबिज होने की हिन्दू राजाओं की नियतियों का होना अस्वाभाविक नहीं था। किसी को भी जीत लेना किसी पर भी हमला कर देना यह ऐतिहासिक युद्ध-गत संस्कृति कीअनिवार्यता थी। बहुत स्वाभाविक रूप से हिन्दू ब्राहमण राजाओं की सत्ता बदल नीति के चलने के साथ-साथ उत्तर भारत अस्थिर हो गया जिसका ऐतिहासिक रूप से विवरण देना मुश्किल था, इसीलिए इतिहासकारों ने कन्नौज के पराभव के बाद का कोई खास विवरण नहीं दिया है। यही हाल हर्ष के बाद भी था तथा उत्तर भारत फिर अनिश्चतता में डूब गया। कन्नौज, मालवा, काशी, व कोशल वगैरह के राज्य ऐसा नहीं था कि पूरी तरह समाप्त हो गए थे। क्योंकि आठवीं सदी में यशोवर्मन का अभ्युदय इस तथ्य को स्पष्ट रूप से प्रमाणित करता है। कन्नौज के पतन के बाद यशोवर्मन का फिर से कन्नौज को स्थापित करना तथा उसे वैभवशाली बना देना यह इतिहास की उस मान्यताओं की कटु आलोचना करता है जिसके आधार पर कहा जाता है कि राज्य सत्ताएं या साम्राज्यवादी ताकतें जब एक बार पतनशीलता की शिकार हो जाती हैं फिर उनका स्थापित होना असंभव होता है। यही इतिहास की सांस्कृतिक दृष्टि आलोचना की पात्रा हो जाती है क्योंकि इतिहास में साम्राज्यवादी ताकतें भले ही पराजित हो जायें पर वे कहीं न कहीं सक्रिय रहती ही हैं तथा जन-आन्दोलनों के माध्यम से अपने वैभव को प्राप्त करने की योजनायें बनाती रहती हैं। इस सच्चाई को समझने के लिए यह जरूरी होगा कि हम यह समझें कि साम्राज्यवादी ताकतों का सफाया जब तक
प्रशिक्षित जनता-समूहों द्वारा नहीं किया जाता तब तक उस जीत-हार का ऐतिहासिक
सन्दर्भ में कोई मूल्य नहीं होता। आठवीं ंसदी तक हम पाते हैं कि राज्य-सत्ताओं के
सारे संघर्ष जनता की पक्षधरता से अलग थे, गोया जनता खामोश थी, जनता समझती
थी कि सत्ता परिवर्तन से जन-कल्याण का उसका लक्ष्य कभी भी पूरा नहीं हो सकता
था और न हो सकता था। उस समय की सत्ता के सामने जन-कल्याण का लक्ष्य
था ही नहीं।
यशोवर्मन की हत्या 740ई. में काश्मीर के राजा लालितादित्य मुक्त पीड द्वारा कर
दी जाती है इस प्रकार कन्नौज फिर दूसरे की पराधीनता में चला जाता है। जाहिर
है ऐसे में न केवल कन्नौज वरन् मथुरा व काशी भी लालितादित्य के अधीन हो जाता
है। सोनभद्र की इतिहास की गति समझने के लिए हमें सदैव यह तथ्य ध्यान में
रखना होगा कि काशी, कन्तित, कोशल व मथुरा की राजनीतिक गतिविधियों से यह
पूरा क्षेत्रा सदा प्रभावित होता रहा है।
कन्नौज के यशोवर्मन के पराभव के बाद मध्य देश पर आधिपत्य जमाने की
लालच बाहरी लोगों को कन्नौज की तरफ ले आता है। इस क्रम में हम देखते हैं
कि बंगाल के पाल, दक्षिण के राष्टंकूट तथा पश्चिमी भारत के प्रतिहार 1⁄4परिहार1⁄2
गुर्जर मध्य देश की तरफ कूच कर देते हैं। इनमें प्रतिस्पर्धा का दौर चला तथा
मध्य देश पर आधिपत्य जमाने के लिए ये आपस में संघर्ष भी कर रहे थे तथा भयंकर
खून-खराबा हो रहा था। पाल, राष्टंकूट तथा प्रतिहारों के संघर्ष में अन्तिम सफलता
प्रतिहारों को मिली तथा प्रतिहारों ने पूरे उत्तर-भारत में अपना राज्य स्थापित कर
लिया। इतिहासकारों का मानना है कि प्रतिहारों का साम्राज्य किन्हीं मायनों में गुप्त
वंशीय साम्राज्य से कम नहीं था। गुर्जर प्रतिहारों ने पूरी नवीं व दशवीं सदी तक उत्तर
भारत पर अपना आधिपत्य कायम रखा। यह उनकी अभूतपूर्व सफलता थी। तभी
अचानक लगभग इसी समय इतिहास की धारा बदलती है। महमूद गजनवी का
1⁄41018-19ई.1⁄2 में हमला होता है तथा प्रतिहारों का सफाया हो जाता है। जबकि
कालिंजर के चन्देल राजाओं ने महमूद गजनवी का बहादुरी के साथ मुकाबिला किया
तथा कालिंजर अविजित रहा। महमूद गजनवी को खदेड़ने तथा परास्त करने का श्रेय
धंग व विघाधर चन्देल राजाओं को मिलता है।
सिकन्दर व मैनेण्डर के बाद महमूद गजनवी के हमले का प्रतिरोध जिस शक्ति
सामर्थ्य व साहस से क्षत्रिय राजाओं ने किया था वह आज ऐतिहासिक सच्चाई है।
हमें सोचना होगा कि पूरी तरह से बंटे हुए क्षत्रिय साम्राज्यों में आखिरकार वह कौन
आन्तरिक शक्ति थी जो वे अपनी सुरक्षा के लिए जान देने पर तत्पर रहा करते थे
तथा दूसरी तरफ एक राजा दूसरे राजा को पराजित क्यों देखना चाहता था। कही कोई
वैचारिक भिन्नता थी या उस समय उन क्षेत्राीय क्षत्रापों के समक्ष पूरे भारत की तस्वीर
ही न थी। गोवा, दिल्ली तो हर काल में उनसे बहुत दूर थी, चाहे वह वैदिक-काल
का उत्तर-काल हो या पहली सदी से लेकर पूरा आदिकाल लगभग बारहवीं सदी तक।
किसी भी क्षत्राप में यह चाह नहीं दिखती कि पूरा भारत अखण्ड रहे तथा एकीकृत शासन व्यवस्था की नींव रखी जाये। अशोक के कार्यकाल के अलावा सारा ऐतिहासिक परिदृश्य बिखरा-बिखरा दिखता है, अलग अलग बंटा हुआ। सातवीं आठवीं सदी के पहले का घटनाक्रमों के ऐतिहासकि विश्लेषणों से सोनभद्र पाल साम्राज्य के प्रभाव में दिखता है। पाल साम्राज्य की स्थापना हालांकि दूसरी सदी की घटना है और यह साम्राज्य बंगाल के आस-पास तक ही सिमटा हुआ था। उस काल में आज के बिहार व झारखण्ड का पूरा हिस्सा बंगाल के ही अधीन था तथा बिहार व झारखण्ड के सासाराम, रोहताश, आरा, झारखण्ड के गढ़वा, पलामू का बहुलांश मध्यदेश से जुड़ता था यानि कि सोनभद्र, चन्दौली आदि से, इसलिए यह माना जा सकता है कि पाला साम्राज्य के अधीन कभी सोनभद्र का पूर्वी व दक्षिणी भाग रहा होगा। गजेटियर बताता है कि इस साम्राज्य का संस्थापक गोपाला था। उत्तर भारत में पाला साम्राज्य का विस्तार गोपाला के पुत्रा धर्मशाला द्वारा किया गया। गजेटियर से यह भी मालूम होता है कि धर्मपाला को कुरू, यदु, अवन्ति, गान्धार, किराट, भोज, मत्स्य तथा मंडरा राजाओं द्वारा बादशाह घोषित किया गया। ज्ञातव्य है कि 1907 के पूर्व का सोनभद्र शाहाबाद 1⁄4बिहार1⁄2 का एक भाग था तथा भोजपुर में शामिल था। पाला गणराज्य में सोनभद्र का शामिल होना इससे भी पुष्ट होता है वैसे प्रतिहारों के भी कुछ शिलालेख गयाशरीफ में पाए गए हैं। इससे यह आशय निकाला जा सकता है कि प्रतिहार तथा पाला दोनों समानान्तर व बराबर के शक्तिशाली सत्ता समूह थे। अंग्रेजों ने अनुमान किया है कि महिपाल ने इस पाला साम्राज्य की स्थापना किया होगा जिसका कार्य-क्षेत्रा अंग 1⁄4भागलपुर1⁄2 कजंगला 1⁄4संथाल तथा पूर्णिया1⁄2 तक प्रारंभ में रहा होगा। गजेटियर बताता है कि पाला साम्राज्य का संघर्ष चोल राजा राजेन्द्र कलचुरी से भी हुए होंगे। वैसे यह स्पष्ट है कि गांगेय देव कलचुरी की मृत्यु 1038-41 ई. के मध्य होती है तथा कर्ण कलचुरी 1⁄41047-1072 ई.1⁄2 तक शासन करता है तथा अपने साम्राज्य का विस्तार वह कन्नौज ही नहीं भोजपुर तक करता है। इसका अर्थ हुआ दसवीं व ग्यारहवीं सदी का सोनभद्र कर्ण कलचुरी के अधीन रहा होगा। ज्ञातव्य है कि प्रतिहारों के परामव के बाद का मध्यदेश अस्थिरता व अनिश्चितता के दौर से प्रभावित था। पाल वंश के रामपाला के समानान्तर ही गहदवालों 1⁄4गहरवार1⁄2 का वंश भी विजय अभियान पर था। मध्यदेश जो अराजकता व अशान्ति के दौर से गुजर रहा था गहरवारों के शक्ति केन्द्र बन जाने से फिर स्थिर हो जाता है। गहरवारों के अभ्युत्थान से मध्य देश फिर समृद्धि व वैभव हासिल कर लेता है। गहरवार राजाओं में दो प्रमुख राजा थे। गोविन्द चन्द्र 1⁄41104-1154 ई.1⁄2 तथा जय चन्द्र 1⁄41170-1193 ई.1⁄2 इतिहासकार मानते हैं कि जयचन्द्र की अदूरदर्शिता के कारण चौहान राजा पृथ्वीराज की हत्या मुहम्मद गोरी द्वारा तराई के मैदान में सन् 1⁄41192ई.1⁄2 में कर दी गई। साथ ही साथ
एक साल बाद छन्दवार 1⁄4इटावा1⁄2 में जयचन्द्र खुद भी पराजित होता है तथा मारा जाता है। जयचन्द्र की हत्या के बाद मेरठ, कोइल 1⁄4अलीगढ़1⁄2 असनी, कन्नौज तथा वाराणसी इस प्रकार से सारा मध्यदेश आक्रमणकारियों का शिकार हो जाता है लेकिन इस हार का प्रतिगामी प्रभाव चन्देलों पर नहीं पड़ता हालांकि उनका विस्तार रूक जाता है तथा साम्राज्य क्षेत्रा छोटा हो जाता है फिर भी दो शताब्दी से अधिक समय तक वे शासन में स्थापित थे। इस प्रकार हम देखते है कि लगभग चौदहवीं 1⁄41400ई.1⁄2 तक चन्देलों का शासन काल कायम रहा जबकि जयचन्द्र के पराभव के बाद यानि 1⁄41193ई.1⁄2 के बाद गहरवारों का क्या हुआ कुछ जानकारी नहीं मिलती। लगता है कि यह वही काल होगा जब गहरवार वंश के लोग विजयपुर कन्तित तथा शक्तेशगढ़ की तरफ आए हांेगे। इधर सोनभद्र का क्षेत्रा चन्देल व गहरवार राजाओं के पराभव से उस काल में अप्रभावित ही रहा होगा। गजेटियर से गहरवारों के बारे में यह प्रमाण मिलता है कि गहरवार साम्राज्य बहुत ही वीरता पूर्वक तुर्को से लड़ रहा था फलस्वरूप मध्यदेश का उत्तरी तथा दक्षिणी हिस्सा पूरी तरह से सुरक्षित बचा रह सका था। काशी की रक्षा का श्रेय गहरवार राजा चन्द्रदेव को मिलता है फलस्वरूप कन्नौज तथा कोशल भी सुरक्षित बचा रह सका था। गहरवारों के पूर्व ही कलचुरियों का बनारस, भोज, रोहतास आदि पर आधिपत्य था यह सिद्ध हो जाता है। वाद का काल गहरवारों के अधीन था। सारनाथ में पाया गया शिलालेख बताता है कि गोविन्ददेव का ही हरिनाम नाम था तथा शिलालेख वाले गोविन्द देव वही थे जिनके प्रभाव से तुर्क काशी, कोशल तथा कन्नौज तक नहीं पहुंच पाए। सासाराम में भी एक ऐसा शिलालेख बतौर प्रमाण पाया गया है कि प्रताप धवल खैरवाहा साम्राज्य के संस्थापक थे। बारहवीं सदी के आस-पास का सोनभद्र निश्चित रूप से खैरवाहा साम्राज्य के अधीन हो गया होगा। शिलालेख बताता है कि इस साम्राज्य का आधिपत्य लगभग ग्यारह वर्ष तक ही कायम रह सका था। इतिहासकार ‘रिकार्डाे’ का मानना है कि प्रताप धवल को महानायक नहीं माना गया था यह अलग बात है कि वह जमीन का देवता माना जाता था तथा पूजित था। प्रताप धवल के बारे में उल्लेख मिलता है वह निरन्तर बहारियों से लड़ता रहा था। गजेटियर साबित करता है कि घोर के सुल्तान द्वारा कोयल 1⁄4अलीगढ़1⁄2 हिशामुद्दीन अद्युक्त बल्क के जिम्मे लगाया गया था, यह वही हिशामुद्दीन बल्क था जिसका अभ्युदय इस क्षेत्रा में इतिहास की धारा बना जाता है और इसी हिशामुद्दीन ने मीरजापुर के भुइली व भागवत परगनों को मल्लिक इख्तियारउद्दीन इविन वख्तियार खिलजी को ग्रान्ट के रूप में दिया था। इस ग्रान्ट का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य बहुत ही दूरगामी था। तुर्को के गंगाघाटी में प्रसार के बाद उनके लिए आवश्यक लक्ष्य था चुनार का किला फतह करना तथा यहां से मगध को शिकस्त देना। तुर्को का प्रवेश हालांकि मध्यदेश में प्रारम्भ हो गया था फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि हिन्दू राजाओं
के अस्तित्व मिट चुके थे। कुछ इतिहासकार जयचन्द्र के पराभव के बाद से ही मुस्लिमों का विस्तार मानते हैं पर ऐसा सच नहीं माना जा सकता। मछलीशहर में एक कापर प्लेट मिला है जो बताता है कि जयचन्द्र के लड़के हरिश्चन्द्र के कहने पर महाराज जयचन्द्र ने एक ब्राहमण को जमीन का ग्रान्ट दिया था। राजा हश्चिन्द्र उस समय स्वतंत्रा थे जबकि जयचन्द्र का 1194 में निधन हो चुका था। कापर प्लेट पर 12-53-57 की तिथि भी अंकित है। निष्कर्ष के रूप में सोनभद्र अपने आदिकाल में अपने आधिपत्य के लिए परेशान था। साफ तौर पर कहा जा सकता है कि सोनभद्र के भाग्य में कभी काशी, कोशल, मगध रहे थे तो कभी मौर्य, कुषाण, शुंभ, कण्व, गुप्त, गहरवार 1⁄4गहडवार1⁄2 चन्देल कभी कलचुरी तथा भोज। मुगल के पहले तक का सोनभद्र भिन्न-भिन्न सत्ता केन्द्रों के हाथ की कठ-पुतली बनता रहा था। भारशिवों के काल दूसरी सदी में यह क्षेत्रा उनके प्रभाव में था फिर बाद में लम्बे अन्तराल के बाद भरों एवं कोलों के सत्ता च्युत होने के बाद सोनभद्र तथा मीरजापुर दोनांे के ऐतिहासिक परिदृश्य बदल गए। कन्तित, विजयपुर, तथा शक्तेषगढ़ से कोलों व भरों को विस्थापित कर दिया गया तथा सोनभद्र के अगोरी व विजयगढ़ से बालन्दशाह के सत्ता प्रतिष्ठान को। लगभग बारहवीं शताब्दी के आस-पास पूरे भारत की प्रमुख रिसासतों तथा सत्ता केन्द्रों के आपसी झगड़ों तथा सत्ता केन्द्रों की स्थापनाओं के लिए चल रहे महा-समर के संघातों से यह पूरा क्षेत्रा तब स्वतंत्रा रूप से सांसे ले रहा था। सोनभद्र के इतिहास कालों को व्यवस्थित ढंग से समझने के लिए अनिवार्य होगा कि हम ऋगवेद काल 2000 से 1000 ई.पू. तक के काल को ध्यान में रखें। यह पूरा वैदिक-काल असमान वन-आर्य प्रजातियों के आगमन का काल था जो भारत के उत्तर पश्चिमी भाग से मध्यदेश में प्रवेश किए। यह काल वहीं था जब पुरातन वन आर्य-प्रजातियॉ यहां की शान्ति-प्रिय गण-राज्य, गण-ग्राम व्यवस्था वाली जनजातियों, प्रजातियों से हिसंक तथा आक्रामक लड़ाई लड़ रहीं थीं। बज्र-धारण किए हुए बज्राघात के वैज्ञानिक इन्द्र का आववान एक महत्वपूर्ण वैदिक संघटना है। आर्यो ने अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए उनका आववान किया था। इन्द्र आर्यो के निवेदन पर दस्युओं व सम्युओं 1⁄4आदिवासी1⁄2 का वध करते हैं। सरस्वती के आस-पास रहवास करने वाली एक जनजाति ‘पर्वत’ का उन्मूलन करते हैं इस प्रकार सिन्धु का परिक्षेत्रा पूरी तरह आदिवासी विहीन क्षेत्रा हो जाता है। इन्द्र तथा विष्णु मिलकर ‘संबराओं’ के दुर्गाे को नष्ट कर देते हैं तथा विष्णु दस्युओं का वध करते हैं। असुरों ने आर्यो के एक ऋषि ‘दमिति’ के नगर पर जब अधिकार कर लिया फिर तो इन्द्र ने असुरों का सफाया ही कर दिया। इन संघर्षों से साफ पता चलता है कि अनार्य आदिवासी जनजातियॉ आर्य-सभ्यता के साथ निरन्तर संघर्ष-शील थीं तथा उनसे दूरी बनाए रखती थीं।
संयोग देखिए आज सोनभद्र तथा मीरजापुर की वन्य-जनजातियों कोल, भर, चेरों,
धांगर, खरवार वगैरह के ऐतिहासिक संघर्षों का कहीं अता-पता तक नहीं है। सारा
ऐतिहासिक दस्तावेज तथा साहित्य सामग्री जन-जातियों के संघर्षों के वर्णनों से
विमुख हैं। यत्रा-तत्रा मात्रा इतना ही आभास मिलता है कि यहां पुरा मानव निवास
करते थे जो द्रविण मूल के थे। बहुत ही दुखद है कि सोनभद्र की धरती से जुड़े
धरती-पुत्रों की सामाजिकता व उनके सामाजिक संघर्षों का संदर्भ ऐतिहासिक रूप से
विलुप्त कर दिया गया है। जबकि इसे संस्कृति व सामाजिकता के संविलयन के एक
औजार के रूप में देखा जाना चाहिए। कमजोर हो गई या विजित तथा पराजित
जनजाति समूहों का शक्तिशाली आक्रामक आर्य-समूहों में अर्न्तलयन यह एक ऐसी
कार्यवाही है जो हमेशा से कमजोर जाति-समूहों को उनके सांस्कृतिक कार्यभारों से
च्युत करती रही है। वाद के कालों में ईसाईकरण या इस्लामीकरण की प्रक्रिया से इस
सच्चाई को बहुत ही सहजता से समझा जा सकता है कि जातियों, धर्मो का संविलयन
भले ही सांस्कृतिक अनिवार्यता न रही हो पर ऐतिहासिक अनिवार्यता तो अवश्य ही
रही है। सोनभद्र के अतीत के कारकों को ऐतिहासिक रूप से प्रभावित करने वाली
सत्ताओं के विचलनों को हमें गंभीरता से लेना होगा कि यह पूरा क्षेत्रा अपने में कभी
अधिपति के रूप में नहीं था। आर्य आए तो आर्यो का दखल हुआ, मुसलमान आए
तो मुसलमानों का फिर ईसाई आए तो ईसाईयों का। बीसवीं शताब्दी के अन्त तक
या इक्कीसवीं के प्रारंभ में भी हम पाते हैं कि सोनभद्र की धरती का फिल-हाल
शक्तिशाली व अभिजात वर्ग बाहरी ही है जिसका सोनभद्र की न केवल जमीन पर
1⁄4भू-संसाधन1⁄2 वरन उघोग, शिक्षा, व्यवसाय, मीडिया, संस्कृति व साहित्य पर
अधिकारिक ढंग का हस्तक्षेप है।
इतिहास लेखन की परंपरा पर हम विचार करें तो हमें यह स्वीकार कर लेना
चाहिए कि शाषितों व शोषितों की दृष्टि तथा सामाजिक विवेचना की दृष्टि से कभी
भी इतिहास का लेखन नहीं किया गया। जो कुछ भी लेखन के क्षेत्रा में किया गया
उसका रूप धार्मिक साहित्य के रूप में ही हमारे यहां अतीत को समझने के लिए
उपलब्ध है। इसके अलावा पहले के समय को विश्लेषित व व्याख्यायित करने वाला
लेखन उपलब्ध नहीं है, हॉ बाद के समय में यानि अठारहवीं शताब्दी के बाद अतीत
के बारे में बहुत कुछ लिखा गया। बिजयगढ़ राज तथा रियासत का सन्दर्भ लेकर
देवकीनन्दन खत्राी जी ने एक औपन्यासिक कथा चन्द्रकान्ता सन्तति अवश्य ही
लिखा है जो केवल कल्पना है कहीं भी उसमें बिजयगढ़ राज का अतीत या वर्तमान
नहीं है। मजा यह कि सोनभद्र के बाहर के लोग बिजयगढ़ राज को राजकुमारी
चन्द्रकान्ता के नाम से ही जानते हैं जो सर्वथा गलत है। हॉ कमलेश्वर जी ने
चन्द्रकान्ता सन्तति के पटकथा लेखन में अवश्य ही कमाल कर दिया है जिससे वह
टी.वी. सीरियल चल निकला और पूरे देश की युवा चेतना पर हावी हो गया।
द
‘अस्तित्व की टकराहटें एवं सुरक्षा यानि इतिहास का मघ्य-काल’ समय के संघातिक ऐतिहासिक दौर में जयचन्द्र के कन्नौज साम्राज्य का पराभव 1194 या इतिहास की वह संघटना है जिसका रूप आदिकाल से भिन्न है। 1194 इतिहास का वह दुखान्त पड़ाव एक ठहराव है जो इतिहास को दूसरे पाल्हे में डाल देता है। कहा जा सकता है कि साम्राज्यों के स्वर्गारोहण की साम्राज्यवादी विचार- धारा का विलोपन उस अर्थ में हो जाता है कि राजा गलत नहीं कर सकता चाहे हारे या जीते, शुद्ध अर्थो में राजा जब गलत करता है तब राजा से अधिक उसकी प्रजा को यातना झेलनी पड़ती है। हमें ध्यान रखना होगा तथा समझना होगा कि गहरवार 1⁄4गहड़वार1⁄2 राजा जयचन्द व चौहान राजा पृथ्वीराज के झगड़े क्यों थे, क्या थे अर्न्तविरोध? क्या उन दोनों में दोनों की अलग जनता 1⁄4प्रजा1⁄2 थी जो इतिहास के साम्राज्यवादी दांव-पंेचों को ध्वस्त कर सकती थी। कहना न होगा कि जयचन्द्र व पृथ्वीराज ये दोनों इतिहास की धारा मोड़ने वाले युद्ध के व्यवसायिक कलाकार थे क्यांेकि उस काल में युद्ध एक व्यवसाय तथा साम्राज्यशाहियों के लिए आतंककारी उद्यम था। युद्ध नहीं तो फिर क्या? यह मध्य-काल का प्रश्न था तो उत्तर भी। गंभीरता से विचार करें तो बीसवीं सदी के दोनों विश्व-युद्ध भी व्यवसाय व उद्यम की तरह ही जान पड़ते हैं। दुनिया आज जानती है कि बीसवीं सदी के दोनों विश्व-युद्ध भी व्यवसाय व उद्यम व साम्राज्यवादी हितों के लिए ही लड़े गये थे। विकसित देशों के लिए अनिवार्य था कि वे अपने उपनिवेशों की हिफाजत के लिए सारी दुनिया को युद्ध की विभिषिका में झोंक दंे। हमें इस सन्दर्भ में ध्यान रखना होगा कि दुनिया के सारे उपनिवेश चाहे वे ब्रिटिश, पुर्तगाल, स्पेन, फ्रांस किसी के भी अधीन रहे हों सभी स्वतंत्राता की पवित्रा आकांक्षाओं से छट-पटाते हुए आक्रोशित तथा आन्दोलन-रत थे। उप-निवेशों का आन्दोलन-रत होना तथा स्वतंत्राता प्राप्ति के लिए राजनीतिक विकल्पों व समाधानों की तलाश करना यह एक ऐसा जन-उभार था जिसे साम्राज्यवादी ताकतंे सत्ता-विरोध की श्रेणी में रखती हैं तथा अपने आज्ञाकारी सैनिकों पुलिसों तथा अन्य प्रशासनिक विधानों से जनता केआन्दोलन को हर हाल में दमित करने का उपक्रम करती हैं। ऐसा करना साम्राज्यवादी ताकतों के लिए बहुत आसान था, विश्वयुद्ध का रास्ता ढूंढना तथा उपनिवेशों में आपात-काल लगा कर उपनिवेशों को मिले सीमित अधिकारों को भी सीमित कर देना, नागरिक अधिकारों का समाप्त कर देना, जनता की सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक क्रिया-कलापों को बाधित करना या उसे समाप्त कर देना। ग्यारहवीं शताब्दी का भारत राज-सत्ता के संदर्भ में स्थिर और शान्त नहीं था
युद्ध की विभीषिका से जल रहा था तथा एक नया अध्याय रच रहा था, हारो या जीतो।
युद्ध की वह संस्कृति वैदिक संस्कृति से सर्वथा भिन्न थी। यह संस्कृति जीत की
आकांक्षा के साथ साथ शोषण व दमन तथा लाभ-हानि पर टिकी थी। ग्यारहवीं तथा
बारहवीं सदी के विजेताओं का लक्ष्य केवल लाभ-हानि पर टिका हुआ था जो ईस्ट
इन्डिया कंपनी के जीतों व हमलों से स्पष्ट है। कंपनी भाडे़ के सैनिकांे के सहयोग
से युद्ध लड़ने की प्रवृत्ति भी विकसित कर चुकी थी। जयवन्द के साम्राज्य के पतन
की सूचना तो तभी मिल गई थी जब बंगाल के शाशक साहिब उद्दीन घोरी का
साम्राज्य उत्तर भारत की तरफ फैलने लगा था। ‘पाला’ साम्राज्य की तरह ही घोरी
भी उत्तर भारत की ओर बढ़ रहा था पर उसका साम्राज्य सोन नदी के उत्तर की तरफ
तक बाधित था। सोन नदी के उत्तर का पूरा परिक्षेत्रा अगोरी, बड़हर, बिजयगढ़ राज
के अधीन था। एक तरफ घोरी का साम्राज्य विस्तारित हो रहा था तो दूसरी तरफ
ब्याघा्र का साम्राज्य विस्तारित हो रहा था। उसी समय ब्याघ्रा ने सोनभद्र के एक स्थान
कालपी से लेकर चुनार तक अपने अधीन घोषित कर दिया था। इस प्रकार उस समय
दो साम्राज्य गति पकड़ रहे थे एक था ब्याघ्रा साम्राज्य तथा दूसरा था रानाका विजय
कर्ण का। अभी तक ‘घोरी’ का साम्राज्य सोनभद्र तक न पहुंच पाया था जो उस
काल-खण्ड का तीसरा शक्ति प्रतिष्ठान था।
तेरहवीं सदी तक संभव है ग्यारहवीं तथा बारहवीं सदी ही के आस-पास मीरजापुर
के दक्षिण में जिसे सोनभद्र कहा जाता है राजपूतों के छोटे-छोटे राज्य स्थापित हो चुके
थे। ‘कन्तित’ भी अलग राज्य के रूप में स्थापित था तथा कन्तित राज का
‘शक्तेषगढ’़ पर आधिपत्य हो चुका था तथा कोलों व भरों को विस्थापित भी किया
जा चुका था। इधर सोनभद्र में एक नया राज समीकरण अगोरी-बड़हर तथा विजयगढ़
भी स्थापित हो चुका था। अगोरी-बडहर तथा विजयगढ़ के नये राज समीकरण के
पहले यहां बालन्दशाह के वंशजों का राज स्थापित था जिसका विस्तार घोरावल के
समीप बेलन तक, पूरब की तरफ पलामू तक, दक्षिण की तरफ सिंगरौली व मध्य
प्रदेश के ‘सीधी’ ‘रीवा’ं व ‘अम्बिकापुर’ के सीमान्त तक था। इस प्रकार ‘बालन्दशाह’
के वंशजों का सत्ता-प्रतिष्ठान हालांकि बहुत बड़ा नहीं था फिर भी बारहवीं सदी की
ऐतिहासिक स्थितियों में छोटा भी न था। गजेटियर बताता है कि यह राज काफी
समृद्धिशाली था। बालन्दशाह कौन था, उसका वंश किससे संबधित था? 1911 तथा
1974 का गजेटियर कुछ भी खुलासा नहीं करता। गजेटियर सोनभद्र या कि मीरजापुर
की व्यवस्था को न तो पूरे भारत से जोड़ कर प्रदशित करता है न ही सोनभद्र को
अलग से इसीलिए वह कुछ सूत्रों तथा भाषिक सूक्तियों के आधार पर ही विश्लेषण
करता है।
‘रानाका विजयकर्ण, ‘घोरी’ तथा ‘व्याघ्रा’ के तीनों शक्ति प्रतिष्ठानों पर अन्ततः
दिल्ली के ही अधिपति का नियंत्राण रहता है। इस हिसाब से देखा जाये तो जौनपुर
स्वतंत्रा सत्ता के रूप में उभर चुका था। हमें ध्यान रखना होगा कि 1398 में तैमूर
लंग का हमला होता है तथा भारत के प्रमुख क्षेत्रा पंजाब व दिल्ली ही नहीं मेरठ हरिद्वार, कटेहर आदि प्रभावित तथा प्रताड़ित होते हैं। आदि-काल का मैनेन्डर, गजनबी की तुलना में तैमूर लंग का हमला बहुत ही भयानक व हृदय विदारक था। तैमूर लंग इतिहास में युद्ध की सबसे घृणित व आपत्तिजनक संस्कृति के साथ भारत में दाखिल होता है। तैमूर लंग का हमला भारतीय शासकों के लिए विशेष पाठ की तरह होता है जिससे सभी आक्रान्त होते हैं पर भारतीय शासक उससे कुछ नहीं सीखते। जयचन्द्र का शासन काल 1193 में समाप्त हो जाता है तथा 1203 में चन्देल राजा परमार्दिदेव कुतुबुद्दीन ऐबक से हार जाता है इस प्रकार से इन दो महत्वपूर्ण घटनाओं से भारतीय इतिहास का पूरा परिदृश्य ही बदल जाता है। राजपूती शासन व्यवस्था की आत्म-रक्षा प्रवृत्तियां उनके लिए आत्महंत्ता साबित होती हैं। पूरा स्थानीय प्रशासन आपसी कलह व रंजिश से छिन्न- भिन्न हो जाता है। 1193 तथा 1203 दो ऐसे वर्ष हैं जो 1206 महज तीन साल आगे बढ़कर एक नये साम्राज्य को पैदा कर देते हैं। 1206 में कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली के गौरव पूर्ण सिंहासन पर पदारूढ़ होता है। यहीं से इतिहास को एक धारा मिलती है तथा सूचना भी कि युद्धों पर आधारित इतिहास की गति-विधियों का कोई भविष्य नहीं होता यदि ऐसा होता तो कुतुबुद्दीन ऐवक जो एक गुलाम था कैसे दिल्ली के सिंहासन पर आरूढ़ हो जाता तथा गुलाम वंश की स्थापना कर पाता। दुनिया के इतिहास में किसी गुलाम का सत्तारूढ़ होना इतिहास की नपी-नपाई प्रवृत्तियों पर एक लम्बी बहस तथा सार्थक निष्कर्ष की मांग करता है। सोनभद्र की स्थिति बारहवीं सदी में दिल्ली की शासन व्यवस्था से अप्रभावित रहती है क्योंकि दिल्ली के शासन व्यवस्था में अपने ही कारणों से अस्थिरता थी। इधर जौनपुर में ‘मल्लिक सरवर ख्वाजा जहां’ की शासन-व्यवस्था स्थापित हो चुकी थी तथा उसने शर्की साम्राज्य 1⁄4एक स्वतंत्रा साम्राज्य1⁄2 की स्थापना कर लिया था। सोनभद्र शर्की के ही अधीन आ गया होगा या अनिश्चतता की स्थिति में रहा होगा। गजेटियर बारहवीं सदी में बालन्दशाह के वंशजों का अगोरी विजयगढ़ पर एक समृद्ध शासन-व्यवस्था की सूचना देता है पर यह नहीं बताता कि बालन्दशाह कौन था? बालन्दशाह का वंश कहीं खैरवाह साम्राज्य की स्थापना करने वाले प्रताप धवल का ही तो नहीं था जिसका प्रभुत्व उधर पूरब में सासाराम, पलामू, भोजपुर तक था। बालन्दशाह का रीवां के अधिपतियों से भी कोई सूत्रा प्रमाणित रूप से नहीं जुड़ता। इसके अलावा कन्तित या कि बनारस के राजाओं से भी बालन्दशाह के किसी रिश्ते का स्पष्ट या धुंधला प्रमाण भी नहीं मिलता। बालन्दशाह कौन था तथा किस साम्राज्य का हिस्सा था यह जानना इतिहास की अनिवार्यता है क्योंकि विजयगढ़ व अगोरी दुर्ग दोनों न केवल पुरातत्व के नमूने हैं वरन स्पष्ट रूप से अपनी स्थिति स्पष्ट करते हैं कि इनका निर्माण किसी एक राजवंश ने कराया होगा तथा एक ही समय में कराया होगा। वास्तु-कला से यदि किलों के
बारे में निष्कर्ष निकाला जाये तो यह स्पष्ट है कि इन किलों का निर्माण किसी
छोटे-मोटे सामन्त या राजा के वश का नहीं था। ये किले आज भी खंडहर के रूप
में खड़े हैं तथा प्रमाणित करते हैं कि इनका निर्माण किसी शक्तिशाली सत्ता
प्रतिष्ठान ने ही कराया होगा।
समुद्रगुप्त ने चौथी सदी में जिस वन-राज्य की स्थापना की थी कहीं उस वन-राज
से जुड़े ये दोनों किले तो न थे। हालांकि यह भी स्पष्ट है कि इनका निर्माण लगभग
ग्यारहवीं, बारहवीं सदी के आस-पास ही हुआ होगा। एक संभावना यह भी है कि
इन वन-राज्यों के लोग चौथी सदी से लेकर लगभग जयचन्द्र व परिमार्दिदेव के पतन
तक अस्थिर ही रहे, कहीं कोई इनकी स्थिर व्यवस्था न थी सिवाय जपला के
प्रतापधवल के। गजेटियर मानता है कि बारहवीं सदी में खैरवाला साम्राज्य सोनभद्र
में स्थापित हो चुका था। इस प्रकार अब कोई सन्देह नहीं रह जाता कि बालन्दशाह
खैरवाला साम्राज्य से ही जुड़ा हुआ था, हो सकता है कि प्रताप धवल का
उत्तराधिकारी रहा हो। इस प्रकार सोनभद्र का परिक्षेत्रा व्याघ्रा, घोरी तथा रानाका
विजयकर्ण के सत्ता प्रभावों से बिल्कुल ही अप्रभावित जान पड़ता है। जौनपुर के शर्की
राजव्यवस्था से इसका जुड़ा होना भी सन्देह पूर्ण है क्योंकि सरवर ख्वाजा जहां के
अपने ही अर्न्तविरोध थे। मल्लिक सरवर की मृत्यु 1⁄413991⁄2 में होती है तथा शर्की राज
खुद दिल्ली से झगड़ रहा था, ऐसी विकट स्थिति में उसका साम्राज्यवादी होना तथा
जौनपुर से बाहर निकलना काफी मुश्किल था। 1399 में सरवर ख्वाजा जहां का पुत्रा
मल्लिक मुबारक शाह शर्की राज का उत्तराधिकारी बनता है तथा मुबारक ‘शाह’ की
उपाधि धारण करता है। मुबारक शाह को पराजित करने वाला उसका भाई इब्राहिम
था जिसकी मृत्यु 1440 में हो जाती है। इस प्रकार शर्की राज-व्यवस्था 1394 से
1440 तक चलती है लगभग 46 साल तक।
तैमूर लंग का आक्रमण 1398 में होता है तथा तुगलक वंश का अन्तिम बादशाह
महमूद तुगलक 1412 में मर जाता है। तैमूर लंग के हमले व लूट के कारण तुगलक
वंश का प्रभुत्व वैसे भी कम हो जाता है तथा झगड़े का फायदा जौनपुर के शर्की राज
को मिलता है जो 1440 तक चलता है। दिल्ली 1412 से लेकर 1526 लगातार
लगभग 14 वर्ष तक अस्थिरता तथा अनिश्चतता के दौर से गुजरती रही। 1416 से
लेकर 1526 तक दिल्ली के दो सत्ता प्रतिष्ठान ‘लोधी’ व ‘सैयद’ दिल्ली के बचे-खुचे
साम्राज्य पर शासक बने रहते हैं। दिल्ली साम्राज्य मध्यदेश तथा दूसरे महत्व पूर्ण क्षेत्रों
से सिकुड़ चुका था तथा केवल दिल्ली के आस-पास तक ही केन्द्रित हो गया था।
लोधियों में सिकन्दर लोधी ने मध्यदेश पर नियंत्राण स्थापित करने के लिए इतिहास
में पहली बार अपनी राजधानी आगरा में बनाया। सिकन्दर लोधी ने मध्यदेश के
विजय अभियान के दौरान चुनार को जीतने का लक्ष्य बनाया जिससे शर्की राज के
हुसैन को पराजित किया जा सके पर सिकन्दर के लिए चुनार का विजय लक्ष्य एक
सपना ही बना रह गया था। शर्की हुसैन ने सिकन्दर का जबरदस्त विरोध किया
फलस्वरूप सिकन्दर लोधी को ‘बघेल’ व ‘भाटा’ राज्यों की तरफ मुड़ना पड़ा। बारहवीं सदी से लेकर 1526 तक सोनभद्र लगभग पूरी तरह स्वतंत्रा सत्ता के रूप में अगोरी बड़हर व विजयगढ़ के राज समीकरण के अधीन स्थिर रहा। सोनभद्र में कही भी हमलावर स्थितियां नहीं थी। सोनभद्र में विजयगढ़,अगोरी व बड़हर राज का समीकरण किन कारणों से उभरा तथा वहां बालन्दशाह के स्थापित वंशजों का क्या हुआ यह इतिहास की समझ के लिए अनिवार्य तत्व है। विजयगढ़, बड़हर व अगोरी राज समीकरण की व्याख्या इतिहास के उन अर्न्तविरोधों में है जो जयचन्द्र व परमाद्रिदेव1⁄4चन्देल1⁄2 के पतन का कारण बनते हैं। बारहवीं सदी से लेकर बाबर के आने के पूर्व तथा इब्राहिम लोदी के 1526 में पतन के बाद यादि लगभग तीन सौ साल तक पूरा मध्यदेश, म.प्र. तथा राजस्थान का सीमान्त छोटी-छोटी स्वतंत्रा रिसायतों के अधीन था। जयचन्द्र व परमाद्रिदेव के बाद भी चन्देल व गहरवार राजाओं के अस्तित्व समाप्त न हुए थे। क्योंकि दिल्ली में उथल-पुथल था तथा कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली पर पूरी तरह नियंत्राण स्थापित करने की चिन्ता में था। लोधी व तुगलक लड़ रहे थे। ज्ञातव्य है कि गुलाम वंश के बाद खिलजियों द्वारा तथा तुगलकों द्वारा दिल्ली को नियंत्रित किया जाने लगा था। अगोरी, बड़हर तथा बिजयगढ़ रियासतों का आविर्भाव बारहवीं सदी से लेकर तेरहवीं सदी का यह,वह दौर था जब चन्देल, चौहान तथा गहरवार अपनी संप्रभुत्ता के लिए आपस में लड़ रहे थे। जाहिर है पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु दूसरे चौहानों के लिए बदला लेने का पाठ थी तथा चन्देलों की उस समय की खामोशी, चौहानों के लिए एक वर्जना कि चन्देल भी कम नहीं। चन्देल, कालिंजर से बाहर निकलने के लिए छट-पटा रहे थे तथा उन्हें यह भी गुमान था कि उन्होंने कुतुबुद्दीन ऐबक को नसीहत भी सिखा दिया है। भले ही उनके वंश के राजा परमार्दिदेव उससे पराजित हो गए थे। फिर भी यह ऐतिहासिक सचाई है कि दो सौ साल तक लगातार चन्देल राज-व्यवस्था का संचालन करते रहे थे। उसी समय चन्देलों और चौहानों की बेतवा नदी के किनारे सत्ता प्राप्ति या सत्ता समापन का युद्ध होता है, यह युद्ध भयानक तो था ही और राजपूतों के आपसी संघर्ष का भी प्रमाण था। युद्ध में चन्देलों की चौहानों से बहुत बड़ी पराजय होती है। बेतवा नदी के किनारे की चन्देलों की चौहानों से परजय कई मायनों में कुतुबुद्दीन ऐबक की हार से बड़ी थी। बेतवा नदी के आस-पास चन्देलों व चौहानों के युद्ध को हिन्दू बनाम हिन्दू के या राजपूत बनाम राजपूत के युद्ध की तरह देखने का भी प्रयास किया जाना चाहिए तथा सन्दर्भ लेना चाहिए कि दिल्ली पर कुतुबुद्दीन ऐबक स्थापित हो चुका है, तथा जौनपुर में मल्लिक सरबर ख्वाजा जहां फिर इधर चौहानों तथा चन्देलों में क्या हो रहा था ? उस समय उनकी हिन्दू राष्टंीयता कहां थी? अशोक की अद्वितीयता कहां
थी? सारा समीकरण जो आज बीसवीं सदी तथा इक्कीसवीं सदी को आन्दोलित किए
हुए है कि हम राष्टं के बारे में सोचंे। राष्टंवाद का उभार जो 1857 में था वह बारहवीं
शताब्दी में बहुत दूर की कौड़ी थी। बारहवीं शदी में तो अपना राज, अपना शासन
का भाव था भले ही टुकड़ों में हो पर अपना राष्टं हो, शासन व्यवस्था छोटी हो या
बड़ी यह महत्वपूर्ण नहीं महत्वपूर्ण था सत्ता में बने रहना। दसवीं सदी से लेकर बाबर
व अकबर तक के पहले तक का काल छोटी-छोटी सीमान्त शक्तियों का काल था।
जो जहां था वहीं स्वतंत्रा था तथा स्व-घोषित स्वतंत्राता भी हासिल किए हुए था। लगता
है अतीत में जयचन्द्र के पराभव के बाद स्वतंत्रा-सत्ताओं के अभ्युदय का काल प्रारंभ
हो गया था जो किसी काल में मगध, कन्नौज, पाटलिपुत्रा द्वारा स्थापित किया गया
था तथा उनके साम्राज्यवादी विस्तार में था।
बारहवीं सदी से लेकर बाबर के पूर्व तक हम पाते हैं कि बौने व छोटे किस्म के
सत्ता केन्द्रों में स्वतंत्राता की छट-पटाहटें तेज होने लगी थीं जिससे साम्राज्यवादी सत्ता
के अर्न्तविरोध साफ-साफ उभरने लगे थे। बेतवा नदी के किनारे चन्देलों की हार तथा
चौहानों की जीत को ही अंग्रेजों ने इतिहास का विषय बनाया तथा यह नहीं बताना
चाहा कि वे आपस में क्यों लड़ गए? उनमें किस लिए संघर्ष था? इस बिन्दु पर
अंग्रेजों का खामोश हो जाना इतिहास विवरण का षडयंत्रा है। दरअसल चन्देलों की
हार तथा चौहानों की जीत तत्कालीन परिस्थितियों के लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं थी
जितनी यह कि दिल्ली लड़ रही थी तथा आक्रान्त थी। वहां कोई शक्तिशाली राज्य
व्यवस्था न थी। चन्देल, चौहान व गहरवार अपने-अपने राज हितों को लेकर अपनी
पीठें ठोंक रहे थे कि वे बहादुर हैं तथा उनकी हुकूमतें फिलहाल दिल्ली के निशाने
पर नहीं है। यह इतिहास की वह मनोभावना है जो साम्राज्यवादी ताकतों के डरों, भयों,
आतंकों की तरफ इशारा करती हैं तथा हर सत्ता इकाई को भयग्रस्त बनाए रखती
हैं जबकि सत्ता इकाई छोटी हो या बड़ी उसका स्वरूप देशी सांचे में भले ही न ढला
हो पर बोली व भाषा की जातीय समरूपता तो उनमें पाई ही जाती है। ऐसी छोटी
या बड़ी सत्ता इकाइयां सदैव स्वतंत्राता की पवित्रा चाहना के लिए प्रयास-रत रहा
करती हैं। चन्देल चौहान तथा गहरवार राजाओं के अभ्युदय व पतन को भाषा की
जातीय एकता व भिन्नता के आधार पर भी समझने का प्रयास किया जाना चाहिए।
बेतवां नदी के पास चौहानों तथा चन्देलों के युद्ध ने विजयगढ़ अगोरी व बडहर
राज समीकरण का रास्ता प्रशस्त कर दिया। गजेटियर 1974 के मुताबिक एक ऐसी
कहानी की जानकारी मिलती है जिससे सत्ता बदल का बहुत ही भोंडा रूप स्पष्ट
होता है, सामन्यतया इतनी सहजता से सत्ता-पीठ का कोई वंश समाप्त नहीं हुआ
करता। यहां तमाम सांस्कृतिक व नैतिक अपवादों से बचने की चिन्ता करते हुए
सीधे तौर पर गजेटियर के तथ्यों का उल्लेख किया जाना अनिवार्य जान पड़ता है।
गजेटियर विजयगढ़ अगोरी, बडहर राज समीकरण का प्रारंभ दो चन्देल सैनिक
पारीमल व बारीमल से प्रमाणित करता है। बेतवां के युद्ध में चन्देल पराजित होते
हैं, अनगिनत सैनिकों का वध होता है, स्वाभाविक है कि जो चन्देल सैनिक जीवित बच गए होंगे वे युद्ध-क्षेत्रा से पलायन किये होंगे। उन पलायित सैनिकों को गजेटियर भगोड़ा ;थ्नहपजपअमद्ध मानता है। पारीमल तथा बारीमल दो चन्देल सैनिक जो भगोड़े थे, यानि कि जीवन जीने की शाश्वत अभिलाषा से पलायन किए थे, वे भाग कर किसी तरह अगोरी राज तक आ जाते हैं। उनका अगोरी राज तक आना सोनभद्र के अतीत का पूर्णतया नया अध्याय बना जाता है। वे अगोरी राज के वैभव व समृद्धि का ज्ञान हासिल करते हैं तथा राज व्यवस्था में शरण की फरियाद करते हैं। उन्हें अगोरी राज, उदारता पूर्वक शरणार्थी की हैसियत प्रदान करता है। गजेटियर पारीमल तथा बारीमल को शरणार्थी का दर्जा नहीं देता बल्कि षडयंत्राकारी भाषा का प्रयोग करता है तथा उन्हें ‘पशु-पालन’ के काम पर नियुक्त होना सिद्ध करता है। वैसे तत्कालीन राजव्यवस्था में पशुधन की देख-रेख करना एक स्वतंत्रा प्रकार का जिम्मेवारी भरा कार्य था क्योंकि सैनिकों के सारे संसाधन घोड़ों, हाथियों पर निर्भर रहा करते थे। घोड़ों की सुरक्षा व देखभाल करना एक बहुत बड़ा काम था। इस प्रकार पारीमल व बारीमल दोनों भाई अगोरी राजव्यवस्था के प्रमुख अंग बन जाते हैं। निवर्तमान बडहर राज के वंशजों का मानना है कि पारीमल व बारीमल को अगोरी राज तब विजयगढ़ सहित का मंत्राी नियुक्त किया गया था। इतिहास की जानकारी के लिए यह महत्वपूर्ण नहीं है कि वे मंत्राी थे या पशु-पालक। इतिहास आगे बढ़कर उस मोड़ पर परिवर्तित हो जाता है जहां बालन्दशाह के वंशज मदनशाह की सत्ता का अन्त हो जाता है। गजेटियर की कथा यहां बहुत ही संशय में है। गजेटियर भी सुनी सुनाई कथा का सहारा लेता है तथा वर्णन करता है कि मदनशाह बीमार था तथा उसका पुत्रा किसी युद्ध मंे हिस्सा लेने के लिए कहीं गया हुआ था। पुत्रा का नाम गजेटियर नहीं बताता न ही निवर्तमान विजयगढ़ या अगोरी बड़हर के वंशज ही मदनशाह के पुत्रा का नाम बता पाते हैं। मदनशाह चन्देल पारीमल व बारीमल को यह कार्य-भार सौंपता है कि वे उसकी बिमारी की सूचना उसके पुत्रा तक संप्रेषित करेंकृपर वे सूचना संप्रेषित नहीं करते। इस कथा से यह भ्रम पैदा होता है कि मदनशाह ने अपनी बिमारी की सूचना संप्रेषण का कार्य पारीमल व बारीमल को ही क्यों सौपा? क्या दूसरे महत्वपूर्ण अधिकारी नहीं थे? इससे स्पष्ट हो जाता है कि तब तक पारीमल व बारीमल ने अगोरी विजयगढ़ राज व्यवस्था में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप स्थापित कर लिया होगा। मदनशाह की मृत्यु हो जाती है। मरने के पूर्व वह खजाने की चाभी भी पारीमल व बारीमल को सौप देता है। पारीमल व बारीमल मदनशाह का अन्तिम संस्कार करते हैं। मदन शाह के अन्तिम संस्कार हो जाने के बाद मदन शाह का पुत्रा अगोरी के लिए वापस होता है तथा पन्डा नदी के आस-पास अगोरी से लगभग तीस मील दूर अपना पड़ाव डालता है। दन्तश्रुति है मंडवास के राजा बालन्दशाह के वंश के हैं। उनके अनुसार पारीमल व बारीमल अगोरी की सेना साथ लेकर मदन शाह के पुत्रा पंडा नदी के किनारे घेर लेते हैं तथा उसकी हत्या कर डालते हैं। इस कृत्य के पूर्व ही पारीमल व बारीमल स्वयं को स्वघोषित राजा घोषित कर चुके होते हैं। उस काल में इतिहास की ऐसी प्रवृत्ति थी भी। निश्चित रूप से पारीमल व बारीमल ने अगोरी की राजव्यवस्था में मदन शाह के जीवित रहते ही अपना हस्तक्षेप सत्ता बदल की क्षमता तक तक बढ़ा लिया होगा। चन्देल बन्धुओं ने सबसे पहले अगोरी के राजकोष पर नियंत्राण स्थापित किया फिर राजा की उपाधि स्वतः ही ग्रहण की। इस प्रकार से सोनभद्र का सर्वश्रेष्ठ अगोरी बड़हर राज पहली बार राजपूतों के अधीन हो गया। ज्ञातव्य है कि हर्षवर्धन के काल के बाद दिल्ली के तोमर,अजमेर के चौहान, कन्नौज के गहरवार, मालवा के परमार, गुजरात के सोलंकी, बुन्देलखण्ड के चन्देल, बंगाल के पाल, ये प्रभावशाली राज्यों में तब्दील होने लगे थे किन्तु पृथ्वीराज चौहान तथा जयचन्द्र के परामव के कारण राजपूत रियासतें छिन्न-भिन्न होने लगी थीं। इनका रिश्ता दिल्ली से बहुत दूर का हो चुका था। इधर पारीमल तथा बारीमल जब अगोरी पर-अपना आधिपत्य जमा लिए फिर तो बुन्देलखण्ड के चन्देलों की श्रीवृद्धि ही हो गई। यह वही साल था 1203 का जब परिमार्दिदेव कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा हराये गए थे। अगोरी विजयगढ़ राज पर चन्देल बन्धुओं का राज्यारोहण इसी साल होता है। बालन्द शाह के वंशज घाटम का अगोरी, बड़हर, बिजयगढ़ बालन्द शाह के वंशज
घाटम का अगोरी, बड़हर, बिजयगढ़ बालन्द शाह के वंशज घाटम का अगोरी, बड़हर, बिजयगढ़
राज पर आक्रमण एवं राज्यारोहण मदन शाह की मृत्यु सन् 1290 से अगोरी विजयगढ़ राज के पराभव का इतिहास एक बारगी बदल जाता है। इसे इतिहास की स्वाभाविक नियति कहा जाना चाहिए कि बारहवीं सदी में ही विजयगढ़ अगोरी राज्य को दो रूपों में तब्दील होना पड़ा। पहली बार शोकोत्सव में तो दूसरी बार विजयोत्सव में। शोक चन्देलों के लिए तो विजयोत्सव आदिवासी राजा बालन्द के वंशज ‘घाटम के लिए। घाटम बालन्दशाह तथा मदन शाह का उत्तराधिकारी था। घाटम ने मदन शाह की मृत्यु के बाद नये ढंग से किसी अज्ञात स्थान पर सेना का गठन किया। वह स्थान कहां था ? यह ज्ञात नहीं है। घाटम की सारी तैयारी कहां हो सकती थीं इसके बारे में ऐतिहासिक अनुमान किया जा सकता है कि प्रताप धवल सासाराम के रोहिताश्वगढ़ का जो खैरवाह साम्राज्य का संस्थापक था उसी के यहां घाटम ने चन्देलों से बदला लेने के बारे में सोचा होगा और उसके अनुसार तैयारी भी किया होगा। समुन्द्रगुप्त के बारे में स्पष्ट है कि उसने 18 राज्यों को मिलाकर ‘वन गणराज्य’ की स्थापना की थी। दिल्ली का परिदृश्य बहुत स्पष्ट नहीं था, कुतुबुद्दीन ऐबक 1210 में ही मर जाता है।1⁄412961⁄2 में अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली का नया सुल्तान बनता हैं स्पष्ट है कि सोनभद्र बिहार के पलामू, सासाराम,भोजपुर आदि एक तरह से दिल्ली या कि कन्नौज या बुन्देलखण्ड
की सत्ता-व्यवस्था से अप्रभावित था।कृदूसरी तरफ पलामू 1⁄4झारखंड1⁄2 पर चेरो राजवंश काबिज था। इस प्रकार से सोनभद्र का परिक्षेत्रा या तो प्रताप धवल के वंशजों के समीकरण में रहा होगा या तो ‘पाल’ वंश के। वैसे यह माना जाना चाहिए कि प्रताप धवल रोहिताश्वगढ़ के सहयोग से ही खैरवाह, घाटम ने विजयगढ़ अगोरी के चन्देल राजाओं पर हमला कर जीत हासिल किया होगा। चन्देल उड़नदेव का घाटम पर आक्रमण एवं राज्यारोहण गजेटियर ‘खैरवाह’ तथा ‘चन्देल’ युद्ध का बहुत ही भयनाक विवरण प्रस्तुत करता है। चन्देल राजवंश से जुड़े सारे लोगों की घाटम द्वारा हत्या करवा दी जाती है, कोई भी पुरुष उनमें जीवित नहीं बच पाता तथा अगोरी-विजयगढ़ पर घाटम का आधिपत्य हो जाता है। कभी-कभी संयोग भी इतिहास की पृष्ठभूमि तैयार करता है, वही हुआ अगोरी-विजयगढ़ राज के संबध में। घाटम के हमले से एक रानी सुरक्षित ढंग से किले से बाहर पलायन कर जाती है। वह गर्भवती रहती है। रानी के पलायन में उसकी दाई की महत्वपूर्ण भूमिका थी। रानी पलायन करते हुए विजयपुर राज की सीमा तक पहुंच जाती है तथा दाई के बहन के यहां रूकती है और वहीं एक बच्चे को जन्म देती है। गजेटियर बताता है कि दाई आदिवासी थी सवाल उठता है कि बारहवीं सदी में आदिवासी किसे समझा जाता था? गजेटियर इसका खुलासा नहीं करता। प्रसव के बाद रानी का निधन हो जाता है। दाई उस बच्चे को लेकर ‘विलवन’ गांव गई जो मीरजापुर व चुनार के बीच कहीं स्थित था। विजयपुर के राजा के सहयोग से उस नवजात बच्चे का पालन पोषण शाहाबाद में कहीं कराया जाने लगा जो मृतक रानी के रिश्तेदार थे। वही पुत्रा उड़नदेव जब बालिग हुआ तब उसने कन्तित के तत्कालीन राजा के सहयोग से अगोरी पर हमला किया। 1⁄413101⁄2 में। उड़नदेव अगोरी जीतने में सफल हो गया तथा बालन्दशाह के वंशज रीवां के मड़वास चले गए जहां वे आजादी के पूर्व तक शासन करते रहे, अब भी वे वहीं आबाद हैं। विजयगढ़ अगोरी राज का समीकरण यथावत अवाधित ढंग से चलता रहा। घाटम द्वारा चन्देलों को 1⁄412901⁄2 में पराजित किया जाता है महज बीस साल बाद घाटम को अगोरी की राज व्यवस्था से चन्देलों के वंशज उड़नदेव द्वारा बेदखल कर दिया जाता है। इस प्रकार सन् 1⁄413101⁄2 चन्देल व्यवस्था के राज व्यवस्था का पुर्नस्थापन काल बन जाता है। सोनभद्र का अतीत इस प्रकार 1310 से लेकर आजादी के पूर्व काल तक चन्देलों की व्यवस्था पर ही निर्भर था। 1310 से लेकर 1947 ते काल किसी भी एक वंशीय राज्य व्यवस्था के लिए अभूतपूर्व कहा जा सकता है। 437 चार सौ सैतीस साल की चन्देली राज-व्यवस्था का सोनभद्र। भारत के राज-व्यवस्था के इतिहास में कितना महत्वपूर्ण था यह बहस की मांग करता है? एक सार्थक निष्कर्ष निकालने की चेष्टा की जाय तो विजयगढ़ व अगोरी किलों के खण्डहर बताते हैं
कि ये चार पांच सौ साल पूर्व से ही वीरान व खंडहर जैसे पड़े हैं। यहां किसी जीवित
राज-व्यवस्था के चिन्ह अब नहीं दिखते।
विजयगढ़ व अगोरी के पुराने दुर्गाे का खंडहरों में तब्दील होना इतिहास की
स्वाभाविक प्रक्रिया के रूप में नहीं लिया जा सकता निश्चित रूप से कारण रहे होंगे।
हमें ध्यान रखना होगा कि दुद्धी के बाद झारखंड के पलामू का हिस्सा प्रारंभ होता
है। पलामू का राजा चेरो था जिसका नाम अंग्रेजी इतिहासकार ने अज्ञात ही रहने
दिया उसे दाउद खां ने अपने अधीन 1⁄416611⁄2 कर लिया था। इसके पूर्व सन् 1585
से 1616 ई0 में मुसलमानी सेनाओं ने छोटा नागपुर में प्रवेश कर लिया था।
मुसलमानी सेनाओं का इन जंगली क्षेत्रों पर ध्यान पन्द्रहवी सदी में जाता है जबकि
तेरहवीं सदी से लेकर पन्द्रहवी सदी का भारत-क्रमशः गुलाम वंश 1206-1210
कुतुबुद्दीन ऐबक से लेकर बलवन 1296 तक तथा खिलजी वंश 1296 से लेकर
1316 तक अलाउद्दीन खिलजी का काल तुगलवंश 1325 से लेकर 1414 तक,फिर
सैयद व लोदी वंश 1414 से 1526 तक यानि कि बाबर के पूर्व तक। बाबर 1526
से 1530 तक-दिल्ली का अधिपति था। इधर पारीमल व बारीमल का उत्तराधिकारी
उड़नदेव अगोरी विजयगढ़ पर अपने पूर्वजों का विजित राज अगोरी, बड़हर, विजयगढ़
फिर अपने अधीन कर लेता है। यहां से अगोरी विजयगढ़ का इतिहास सर्वथा नया
रूप ले लेता है।
उधर मीरजापुर का कन्तित राज, गहरवारों के अधीन था ही। कन्तित के राजवंश
के बारे में अनुमान है कि वे कन्नौज से आए रहे होगें। शक्तेषगढ़ के कोलों की
रिसायत संभवतः तेरहवी शताब्दी में यथावत रही हो, मात्रा भरों का कन्तित से
विस्थापन हुआ हो। 1310 में चन्देल वंश के उड़नदेव अगोरी व विजयगढ़ पर काबिज
होते हैं तो उधर अलाउद्दीन तब तक गुजरात पर 1299 में रणथंभौर के बहादुर राजा
हमीरदेव को 1301 में 1303 में मेवाड़ के चित्तौड़ पर विजय तथा सुविख्यात सुन्दरी
रानी पदमावति का जौहर तथा जालौद के राजा पर 1305 में अधिपत्य। समग्र रूप
में देखें तो भिन्न-भिन्न ऐतिहासिक परिस्थितियों का भारत कई तरह के वैचारिक
परिदृश्यों का सृजन कर रहा था। एक तरफ राजपूतों की पराजय हो रही थी तो दूसरी
तरफ अगोरी के विजय अभियानों के लिए खुशियां मनाई जा रही थीं। गुजरात
रणथंभौर तथा मेवाड़ का अलाउद्दीन खिलजी से पराजित व ध्वस्त हो जाना यह कहीं
न कहीं भारत की केन्द्रीय शक्ति के कमजोर होने की सूचना तो है ही जाहिर है उस
समय सत्ता-व्यवस्था के केन्द्र में कुछ ही महत्वपूर्ण रियासतें थीं जिन पर दिल्ली के
शासकों द्वारा नियंत्राण स्थापित करने की लगातार कोशिशें की जाती रही हैं।
अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु 1316 में होती है। उसके वाद ‘तुगलक’ वंश की
स्थापना मुहम्मद तुगलक 1325 में करता है। अलाउद्दीन खिलजी के बाद दिल्ली
की सल्तनत लगातार 1316 से लेकर मुहम्मद तुगलक के सिहासनारूढ़ होने तक
अनिश्चितता का शिकार रहती है। कन्नौज, मगध या कि कोशल जैसे शक्तिशाली
केन्द्र टूट चुके थे। उधर राजस्थान तथा बुन्देलखण्ड भी छोटी-छोटी रियासतों का केन्द्र बन चुका था। गहरवार वंश के लोग बनारस, कन्तित व विजयपुर तक सिमट चुके थे तथा कालिंजर के चन्देल भी स्वयं को सीमित कर लिये थे। राजपूत शासकों के लिए तेरहवीं सदी से लेकर पूरे चौदहवीं सदी तक का काल शोक पर्व जैसा ही रहा है। कुतुबुद्दीन ऐबक शायद रणथंभौर, कालिंजर, महोबा या बंगाल को कभी न जीत पाता यदि गुजरात के सोलंकी व दिल्ली के चौहान पृथ्वीराज को मुहम्मद गोरी ने षडयंत्राकारी पराजय न दिया होता। राजपूत शासकों का आपस में युद्धरत रहना भी गोरी के सत्ताशाली होने का कारण बनता है। पथ्वीराज चौहान, चन्देल परमार्दिदेव तथा गुजरात के सोलंकी भीम से भी भयानक युद्ध कर चुके थे, कन्नौज तो उनके लिए वैसे ही दुश्मनी का भाव रखता था। राजपूती शासन की बची-खुची गरिमा 1527 में समाप्त हो जाती है जब बाबर मेवाड ़शासक राणा सांगा को ‘खानवा’ में पराजित कर देता है। बाबर की मृत्यु 1530 में हो जाती है। हुमायूं बाबर की रणनीति अपनाता है तथा दिल्ली पर आधिपत्य जमाने के सफल,असफल प्रयासों में लग जाता है। हुमायूं के विरोध में एक अफगान नेता शेर खां 1⁄4शेरश्शाह सूरी1⁄2 पूरी ताकत के साथ खड़ा होता है तथा उसे शिकस्त भी देता है। शेरश्शाह 1540 में कन्नौज जीत लेता है तथा हुमायुं को लज्जापूर्ण हार झेलनी पड़ती है। इसके पूर्व इतिहास बताता है कि दिल्ली सुल्तान सिकन्दर लोदी चुनार विजय का अभियान 1493 में बना चुका था जिसे जौनपुर के शर्की-शासकों ने मुंह मोड़ने के लिए विवश कर दिया था। उस समय तक ‘कन्तित’,पन्ना रियासत के अधीन था तब पन्ना एक स्वतंत्रा शासन-सत्ता की हैसियत हासिल कर चुका था। ऐसा नहीं था कि सल्तनत का संघर्ष राजपूतों से ही चल रहा था कहीं न कहीं दोस्ती भी थी। सल्तनत के लिए कुछ स्वतंत्रा शासकों से दोस्ती तथा कुछ शासकों से दुश्मनी अनिवार्य थी। अनिवार्य इसलिए कि कोई सत्ता प्रतिष्ठान दिल्ली तक न पहुॅच जाये। शर्की शासकों में दिल्ली तक की पहुॅच क्षमता प्रत्यक्ष रूप से दिख रही थी सो दिल्ली सल्तनत का सिकन्दर लोदी, शर्की शासकों को पद्च्चुत करने की चिन्ता में था। सिकन्दर लोदी ने इस कार्य के लिए रीवां के शासक भेदचन्द्र का उपयोग किया था तथा कन्तित रींवा को दे दिया। उस समय रींवा का राज्य कन्तित से लेकर गया तक विस्तारित हो चुका था। 1495 तक भेदचन्द्र तथा उनके राजकुमार पुत्रा की मृत्यु हो गई फिर सिकन्दर का प्रभुत्व क्षेत्रा उस तरफ भी बढ़ गया। जौनपुर के शर्की शासक चुनार पर अपना अधिपत्य बनाए हुए थे तथा सिकन्दर लोदी चुनार फतेह के लिए विभिन्न योजनायें बना रहा था जैसे सालिवाहनों से समझौता आदि। सालिवाहनों से सिकन्दर लोदी का समझौता हुआ तथा शर्की शासक हुसैनशाह पराजित हुआ। हुसैनशाह के बाद इतिहास से शर्की वंश फिर विलुप्त हो गया। इतिहास की युद्ध-कालीन संस्कृतिमें भीे सोनभद्र की विजयगढ़ अगोरी रियासतें चैन की वंशी बजा रहीं थीं।
बाबर काल में बंगाल तथा बिहार का पूर्वी क्षेत्रा अफगानों के अधीन था। हालांकि
बाबर महज चार साल तक ही भारतीय इतिहास को प्रभावित कर पाया था पर अगोरी
के बाद वह पहला मुगल शासक था जिसने राजपूतों को अपना प्रमुख लक्ष्य बनाया
था तथा उन्हंे पराजित भी किया था। बाबर का ऐतिहासिक काल कटूनीति व
युद्ध-तक्नोलाजी के उपयोग का काल भी था। पहले के किसी युद्ध में ऐसी सूचना
नहीं मिलती कि तोपों व बन्दूकों का उपयोग किया गया हो पर बाबर काल में इसकी
सूचना प्राप्त होती है। उसकी सेना मंे तोपची व बन्दूकची दोनों थे। बाबर दिल्ली
के सुल्तान इब्राहिम लोदी को पराजित कर देता है फिर राणा सांगा को कोई सहयोग
नहीं देता फलस्वरूप राणा सांगा बाबर से रवानवा में लड़ते हैं तथा पराजित हो जाते
हैं। राणा सांगा की पराजय तथा दिल्ली की सल्तनत पर बाबर की उपस्थिति इतिहास
की विपरीत धारा की सूचना देती है कि सल्तनत का भारतीय राज-व्यवस्था के
विभिन्न इकाइयों से कोई राष्टंवादी रिश्ता न बनता था उस समय राष्टं की सोच काफी
सीमित तथा लक्ष्यहीन थी।
23 मार्च 1529 को बाबर चुनार तक आता है, उसका लक्ष्य होता है अफगानों
का सफाया करना। बाबर द्वारा अफगानों के सफाये की नीति 1526 से लेकर 1556
यानि कि अकबर के सत्तारूढ़ होने के 30 वर्ष तक लगातार जारी रही थी। इसी बीच
शेरश्शाह सूरी विजेताओं तथा शाहों की सुनहरी सूची में अपना हस्तक्षेप करता है तथा
1540 से लेकर 1555 तक हुमायूं की सारी संभावनायें समाप्त कर देता है। वह हुमायूं
को 1539 के चौसा युद्ध में पराजित करता है तथा कालिंजर के राजा कीरत सिंह
को 1545 में हराता है। यहां यह ध्यान रखना होगा कि 1203 में चन्देल राजा
परमादिैदेव का पतन हो जाता है तो 1545 में चन्देल राजा कीरत सिंह का। 342
साल तक कालिंजर की राजव्यवस्था स्थिर रहती है। चन्देल वंश के ही उड़नदेव की
व्यवस्था विजयगढ़ व अगोरी पर भी कायम रहती है। सोनभद्र दिल्ली तथा शर्की की
भिन्न-भिन्न व्यवस्थाओं में लगातार उलझा रहा तो कभी पूरी तरह निरंकुश व स्वतंत्रा
भी रहा था। स्वतंत्रा राज्यों के अधिपतियों की तरह विजयगढ़ व अगोरी राज पर चन्देल
वंशजों का आधिपत्य बिना किसी अवरोध व व्यवधान के स्थापित रहा था।
सोनभद्र तथा मीरजापुर के रजवाड़ों को एक साथ जोड़कर इतिहास का अवलोकन
करने से यह निष्कर्ष निकालना गलत न होगा कि कन्तित, विजयपुर तथा शक्तेषगढ़
राज से कोलों व भरों का विस्थापित हो जाना तथा विजयगढ़ व अगोरी राज से खैरवाह
1⁄4खरवाह1⁄2 वंश के राजा घाटम का विस्थापित हो जाना ही वह प्रमुख कारण था जिससे
इन रिसायतों के प्रभुत्व पर किसी तरह का विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता। दिल्ली की
सल्तनत झंझावतों में फंसी रहती है सो यहॉ पर किसी तरह का संकट नहीं होता
कि ये रियासतें किसके अफगान तुर्क या कि मुगल किसके अधीन रहें? सोनभद्र
तथा मीरजापुर के रजवाड़े क्रमशः चन्देल व गहरवार राजवंश का प्रतिनिधित्व करते
थे तथा इन्हें राज्य-व्यवस्थओं के उत्थान-पतन की जानकारियां थीं सो ये आपस मंे
सत्ता व्यवस्था की सुलह वाली समझदारी के साथ अपने-अपने प्रभुत्व क्षेत्रों पर जमे रहना तथा किसी भी तरह के अन्तरविरोधों से बच कर रहना अनिवार्य मानते थे। हालांकि कन्तित के बाहर भदोही में मौनस राजपूत स्वतंत्रा होने के लिए छट-पटा रहे थे। शक्त सिंह जो गहरवार मूल का था जिसने अपने नाम पर शक्तेषगढ़ किले का निर्माण कराया तथा वहां के कोलों को पराजित किया उसने मौनसों की लड़की से अपना विवाह करके अविवादित सन्तुलन स्थापित कर लिया। शक्तसिंह अकबर का समकालीन था तथा 1556 से लेकर 1605 तक उसने शासन किया एक लम्बा शासन काल 49 साल तक का। उस समय अगोरी, विजयगढ़ राज के लिए किसी प्रकार की बाधा न थी। रींवां का राज्य भेदचन्द्र के निधन के बाद साम्राज्यवादी विस्तार योजना के लिए सक्षम न था सो रींवा की तरफ से भी विजयगढ़ अगोरी राज के लिए खतरा न था। पलामू का राजा चेरो था जिसके तरफ से हमलों की किसी भी तरह की कोई आशंका न थी। पलामू का राजा अफगानों तथा मुस्लिमों के हमलों से डर रहा था, क्योंकि छोटा नागपुर की तरफ से वे कभी भी पलामू पर धावा बोल सकते थे। सासाराम की तरफ से शेरशाह पलामू तक आ सकता था। सो वह पड़ोसी राज अगोरी, बड़हर से दुश्मनी खरीदना नहीं चाहता था। चन्देल वंश के अन्तिम राजा केशव सरन की मृत्यु 1871 में होती है केशव सरन की मृत्यु के बाद रानी बेदशरण कुंअरि के जिम्मे शासन व्यवस्था आ जाती है। रानी की मृत्यु के बाद शासन की बागडोर चन्देल वंश के बाबू जमगांव 1⁄4अगोरी राज के परिजन1⁄2 के अधीन हो जाती है। अगोरी बड़हर राज का समीकरण लगातार पन्द्रहवी सदी तक चलता रहा था। पन्द्रहवी सदी में एक वेन वंशी राजपूत सिंगरौली में अगोरी राज-व्यवस्था से बगावत कर देता है तथा खुद को स्वतंत्रा घोषित कर देता है। तत्कालीन राजपूत वंश परंपरा में उसे हीन समझा जाता था लेकिन स्थिति तब पलटती है जब उसकी शादी रायपुर के प्रमुख राजपूतवंश में हो जाती है। रायपुर म.प्र. में पड़ता था। उस बागी वेन वंशी राजपूत का दमन अगोरी, बड़हर तथा बर्दी के संयुक्त प्रयासों से 1550 में हो जाता है पर वह चुप नहीं बैठता उसके वंश के दरियाव व दलेल दोनों भाई मिल कर पुनः सिगरौली जीत लेते हैं तथा उसके शासक बना जाते हैं। दरियाव तथा दलेल दोनांे आपसी सहमति से सिंगरौली को दो भागों में बांट लेते हैं। दलेल को सिंगरौली का वह भाग मिला जो रींवां से जुड़ता था तथा दरियाव को सोनभद्र से जुड़ने वाला भाग मिला। बाद में चल कर दरियाव, अपने भाई दलेल की हत्या कर देता है तथा खुद पूरे सिंगरौली का अधिपति बन जाता है। दरियाव के ही वंश का फकीरशाह 1700 में अपना राज तिलक करवाता है तथा राज मुकुट धारण करता है। सिंगरौली का शाहपुरा सिंगरौली राज का नाम-करण भी फकीरशाह के काल ही में होता है। उधर कन्तित का परिक्षेत्रा भी मौनस राजपूतों के विद्रोह का क्षेत्रा बना रहता है। सत्राहवीं सदी इस प्रकार से सोनभद्र व मीरजापुर के लिए अस्थिरता की सदी रही है। दन्त कथाओं के अनुसार दलेल व दरियाव दोनों पलामू के चेरो राजा से जुड़े हुए थे तथा
वे खरवार मूल के थे। चेरो व खरवार समूह ने आपस में मिलकर पन्द्रहवीं सदी में अगोरी बड़हर राज से विद्रोह कर दिया था उस विद्रोह का नेतृत्व दरियाव व दलेल ने किया था। खरवार राज वंश के लोग खुद को बेनवंशी राजपूत मानते हैं हालांकि इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता। खरवार जाति समूह के लोग वैसे आदिम वंश की किसी शाखा जैसे जान पड़ते हैं। जिसके अनुसार विजयगढ़ दुर्ग का निर्माण असुर शक्तियों ने कराया था तथा दूसरी कथा गजेटियर शेरशाह से जोड़ता है एवं स्थापित करता है कि शेरशाह का संबंध इस किले से था इस किले में कोई सुरंग थी जो रोहताशगढ़ बिहार से जुड़ती थी। अब उस सुरंग का कोई चिन्ह वहां नहीं दिखता। दन्त-कथा है कि शेरशाह के ही समय में ‘मीरानशाह’ नाम के एक अफगान सन्त बिजयगढ़ किले पर आये थे तथा यहीं से इस्लाम का प्रचार कर रहे थे। उन्हीं अफगान सन्त की मजार यहां पर स्थित है। शेरशाह के पूर्व यह किला चन्देलों के ही अधिपत्य में था तथा उसके पहले बालन्दशाह के वंशजों के अधीन था। शेरशाह के पराभव के बाद यह दुर्ग फिर चन्देलों के अधीन आ गया तथा तब तक रहा जब तक बनारस के राजा बलवन्त सिंह ने चन्देलों को यहां से विस्थापित नहीं कर दिया। सोनभद्र का दुद्धी परिक्षेत्रा अपने अतीत में जिस प्रकार भिन्न था, उसी प्रकार आज भी है। बनारस के इतिहास के आधार पर देखा जाये तो शायद सोनभद्र का विस्तार पूर्व में ‘नगर राज’ जनपद गढ़वा तक था या यह भी संभव है कि बंगाल व बिहार का हिस्सा विन्ढमगंज, म्योरपुर तक भी रहा हो। भाषाई व बोली के पहचानों के आधार पर तो यह जान पड़ता है कि दुद्धी के परिक्षेत्रा, ‘नगर राज’ या अम्बिकापुर राज के काफी करीब थे। डा0 मोती चन्द का मानना है कि दुद्धी का परिक्षेत्रा भुइयां आदिवासी समूहों के अधीन था तथा वह समूह ही खेती व जमीनदारीं से जुड़ा था। कालान्तर में उन समूहों में जागरूकता आई फलस्वरूप उनका आर्यीकरण प्रारंभ हुआ। आर्यीकरण ने उन्हें सामन्त तथा राजा भी बनाया। इस क्षेत्रा की भौगोलिक व सांस्कृतिक परिस्थितियां आज भी एक पोख्ता संकेत की तरह हैं। दुद्धी का पूरा परिक्षेत्रा रीवां के बघेलों, सरगुजा के रक्सेलों, सिगरौली के बेनवंशियों रक्सेलों के रिश्तेदार तथा अगोरी, विजयगढ़ के चन्देलों के संपर्क में रहा होगा तथा इन राजपूत राजाओं ने भुइयां के सरदारों का आर्यीकरण करके राजा की मान्यता प्रदान किया होगा। अंग्रेजी प्रभुत्व काल में दुद्धी परिक्षेत्रा को रानी विक्टोरियां राज में परिवर्तित कर दिया गया था जिसका नियंत्राण मीरजापुर के कलक्टर के अधीन रहता था तथा कलक्टर उस क्षेत्रा मंे बतौर सामन्त राजा प्रवेश करता था। बारहवीं सदी के उत्तरार्ध से लेकर सत्राहवीं सदी के अन्त लगभग पांच सौ साल तक सोनभद्र जनपद, मीरजापुर के साथ भिन्न-भिन्न तुर्क, तुगलक,खिलजी तथा मुगल साम्राज्यवादियों की रणनीति व दमन का हिस्सा बना हुआ था। इतिहास की सारी कथाएं सम्राटों तथा राजाओं व जमीनदारों की लड़ाईयों के अर्न्तविरोधों, झगड़ों, दुश्मनियों, दुश्चक्रों का गायन करती रहीं तथा उपदेशित भी कि इतिहास कभी भी
शासकों के सुरक्षित ऐश-श्गाहों से बाहर नहीं निकल सकता। इतिहास राजाओं, महाराजाओं को ऐतिहासिक पात्रा बनाने का महज लिखित दस्तावेज हुआ करता है फलस्वरूप पूरे देश की वास्तविक कथाओं का ही जब विलोपन हो गया तब सोनभद्र में कौन सी ऐसी कथा होती जिसका जिक्र इतिहासकार या गजेटियर करते। स्थानीय जन-संघर्षों का होना वर्तमान को जीवित रखने तथा इतिहास बनने के लिए अनिवार्य है। सोनभद्र के अतीत में सिर्फ राजाओं का संघर्ष दिखता है वह भी सिर्फ दो तीन बार पहली बार, मदन शाह के पतन के समय दूसरी बार चन्देल राज के पतन के समय तथा तीसरी बार खैरवाह राजा घाटम के पतन के समय। एक बार और 1550 जब अगोरी विजयगढ़ तथा वर्दी के राजा गण मिल कर सिगरौली के स्वयंभू बेन वंशी राजा को विस्थापित कर देते हैं। 1550 के बाद फिर पूरे सोनभद्र में किसी भी तरह का परिवर्तन नहीं दिखता। सत्राहवी सदी तक यह क्षेत्रा इतिहास के मौन कथा का हिस्सा बन जाता है। इस सन्दर्भ मंे ध्यान रखना होगा कि दिल्ली अस्थिर थी, कोई मजबूत शासन व्यवस्था न थी। यवन शासक 1206 से लेकर 1526 तक दिल्ली पर काबिज रहते हैं लगभग 320 साल तक पर वे सदा अपनी सुरक्षा व गद्दी बचाने की चिन्ता में ही परेशान थे। भवनों, किलों के निर्माण के अलावा उनके पास कोई दूसरा काम न था, जिससे कि तीन सौ वर्र्षो को इतिहास में स्मृति के तौर पर याद किया जाता। देश की सारी उर्जा का दोहन मस्जिद तथा किलों के निर्माण में नष्ट कर रहे थे। आज केवल शेरशाह सूरी याद किया जाता है जो जी.टी. रोड का निर्माता था जिसने रोड के किनारे वृक्ष, धर्मशाला व कूओं का निर्माण कराया था। मध्यकाल की सांस्कृतिक चेतना का स्वरूप पूरी तरह सामन्ती व अभिजात्य था। संगीत, कला, साहित्य,परंपरा सबमें अभिजात संस्कृति का बोल-बाला था। गीत, संगीत व नृत्य को ऐश् ̧यासी का साधन बना दिया गया था तथा साहित्य भी वैसा ही जो राजाओं की स्तुति करें। इसके बावजूद उसी काल में भक्ति-आन्दोलन जोर पकड़ता है। अकबर के काल में रामचरित मानस की रचना हो चुकी रहती है कबीर, नानक को उनके सुधार वादी कार्यो के लिए आम जन में प्रतिष्ठा मिल चुकी थी। भक्ति-रस के कवियों के साथ-साथ सूफी सन्तों का हस्तक्षेप भी उस काल की महत्वपूर्ण उपलब्धियां हैं। मुगल काल 1526 से प्रारंभ होता है जो अंग्रेजों आने तक भिन्न-भिन्न रूपों तथा विसंगतियों के साथ चलता रहता है। बाबर से लेकर अकबर द्वितीय तक यानि 1764 लगभग 238 साल तक मुगल काल कभी बहुत ही खूबसूरत दिखता है तो कभी इतना बदसूरत कि समझना मुश्किल। क्या शासकों की ऐसी ही नस्ल हुआ करती थी? शाहजहां बेटे के द्वारा ही गिरफ्तार किया जाता है तो कोई भाई के द्वारा परास्त किया जाता है। सम्राट के वंश का हर छोटा बड़ा शासन की बागडोर अपने अधीन करने के लिए लालायित रहता है। अकबर दिल्ली पर 49 साल तक शासन करता है तो औरंगजेब भी 49 साल तक। इतिहास में औरंगजेब को किन्हीं कारणों से इतिहास का खलनायक दिखाया जाता है जब कि अकबर को इतिहास का
नायक। वह जमे-जमाये राजपूती वैभवों, युद्धों की उन्मादी कथाओं का अन्त करता है। सबसे पहले हेमू को हराकर अकबर दिल्ली पर काबिज होता है फिर राजपूतों के अर्थहीन अभिमानों को पराजित करता है। ग्वालियर, अजमेर, जौनपुर, मालवा, गोंडावाना, मेवाड, बीकानेर, जोधपुर, जैसलमेर के महत्वाकांक्षी सत्ता-प्रतिष्ठानों को इस तरह धूल-धूसरित करता है कि सिवाय मुगल सत्ता-प्रतिष्ठान में विलयित होने के उनके पास कुछ शेष नहीं रहता। कोई उनमें ऐसा नहीं था जो महाराजा राणा प्रताप या अमर सिंह की नकल करता और पराजय को भी गरिमापूर्ण बनाता। ऐसा ही कुछ औरंगजेब के ऐतिहासिक पात्रा के साथ घटित होता है। वह भी मारवाड़ के अमरसिंह, बुन्देल खंड के छत्रासाल तथा मराठा के शिवाजी को निशाना बनाता है। विपरीत परिस्थितयों में भी शिवाजी 1674 में मराठा को स्वतंत्रा राज्य स्थापित कर ही लेते हैं। औरंगजेब तथा अकबर दोनों इतिहास की युद्धोन्मादी गति-विधियों के नियन्ता के रूप में पन्द्रहवीं से लेकर सत्राहवीं सदी तक इतिहास के आवश्यक विषय बने रहते हैं तो उनके पूर्व अलाउद्दीन खिलजी बारहवीं सदी के अन्त से लेकर तेरहवीं सदी के प्रारंभ तक युद्धों की ध्वंसात्मक रणनीति बनाने में जुटा हुआ होता है। अलाउद्दीन के युद्धों की परणति मंगोलांे के दमन के साथ-साथ गुजरात, रणथंभौर, मेवाड़ तथा जालौर के पराजय में बदलती है। साफ-साफ देखा जा सकता है कि तेरहवीं सदी के राजपूत शासक सत्राहवीं सदी तक किसी ठोस, समन्वयवादी रणनीति का सहारा नहीं लेते हैं। अलाउद्दीन, अकबर तथा औरंगजेब राजपूतों की आपसी फूट का फायदा उठाते हैं तथा जमेजमाये राजपूत शासकों को पराजित करते हैं। अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु के बाद ही तुगलक वंश, शर्की वंश तथा शेर शाह सूरी का अभ्युदय होता है जो बाबर से होते हुए हुमायूं तथा अकबर तक समाप्त हो जाता है। सोनभद्र में चन्देल राज-वंश स्थापित हो जाते हैं तो रींवा में बघेल राज-वंश, कन्तित में गहरवार राज-वंश, नगर 1⁄4गढ़वा1⁄2 में भुइयां 1⁄4परिवर्तत राजपूत सूर्यवंशी1⁄2 सिंगरौली में बेन वंशी, अम्बिकापुर में रक्सेल स्थापित हो जाते हैं जिनका रिश्ता बहुत दूर तक भी दिल्ली से नहीं जुड पा़ता। इन राजवंशों के लिए कभी भी दिल्ली अभिष्ट नहीं रहती न हीं दिल्ली वालों के लिए सोनभद्र उनके लक्ष्य में रहता है। अगर चेत सिंह राजा बनारस पलायन करके विजयगढ़ दुर्ग में शरण नहीं लिए होते तथा विजयगढ़ दुर्ग को अपना खजाना नहीं बनाए होते तो शायद वारेन हेस्टिंग्स, चेतसिंह को पकड़ने व पराजित करने के लिए लतीफपुर, पपिहटा से भागता हुआ विजयगढ़ किले तक नहीं आता। तुर्क, मुसलमान, अफगान तथा अंग्रेजों के लिए चुनार का किला सबसे महत्वपूर्ण था। वहां हुमायूं पहुंचता है तो अकबर भी, शेरशाह ने तो उसे अपना सत्ता केन्द्र ही बना लिया था। अशोक के समय वह किला शिलालेखों के निर्माण का केन्द्र ही बना हुआ था। इस प्रकार हम पाते हैं कि चुनार का किला सदैव इतिहास के लिए अनिवार्य बना रहा था। मध्यकाल का पूरा इतिहास; भारत के बड़े-बड़े शासकों के दमन तथा केन्द्रीय
सत्ता-प्रतिश्ठान की स्थापना का रहा है क्योंकि दिल्ली स्थिर नहीं रह पाती थी। दिल्ली पर स्थापित शासकों की स्थापना तत्कालीन संप्रभुओं या किस्म-किस्म के क्षेत्राीय सत्ता-प्रतिष्ठानों पर निर्भर रहा करती थी इसलिए अलाउद्दीन खिलजी से लेकर अकबर तथा औरंगजेब तक की दिल्ली की स्थिरता तभी तक बनी रह सकी थी जब तक क्षेत्राीय सत्ता-प्रतिष्ठान आपस में लड़-लड़कर दिल्ली की मोहताजगी को निमंत्रित करते रहे थे। कमोवेश यही हाल मुहम्मद गोरी के सत्ता-प्रतिष्ठान का भी था वह भी सबसे पहले मुल्तानों पर फिर गुजरात के सोलंकियों पर, फिर पृथ्वीराज चौहान पर तथा कन्नौज पर हमला करता है। पृथ्वीराज से दिल्ली छीन लेना आसान नहीं था। यदि पृथ्वीराज के संबंध सोलंकी 1⁄4गुजरात1⁄2 गहरवार 1⁄4कन्नौज1⁄2 चन्देल 1⁄4कालिंजर1⁄2 से कम से कम दोस्ताना होते। क्षेत्राीय सत्ता प्रतिष्ठानों में सहयोग सुलह तथा आपसी समझदारी या सहमति के बिन्दुओं पर एक राय जैसी मनोवैज्ञानिक रणनीति कत्तई नहीं थी। युद्धोन्माद तथा युद्ध-जनित बनावटी गरिमा के जनक क्षेत्राीय सत्ता-प्रतिष्ठान एक तरह से तानाशाही के दुर्गुणों से मदान्ध थे। दिल्ली दिखती पास थी, पर थी बहुत दूर, इतना दूर कि सोनभद्र दिल्ली के हमलों से पूरी तरह से अप्रभावित रहता है। सोनभद्र पर मात्रा कन्तित व चुनार का तो कन्तित पर दिल्ली के शासकों तथा अवध के नवाबों व जौनपुर के अधिपतियों का प्रभाव पड़ता था, सो यहां की व्यवस्था कन्तित की राज-व्यवस्थाकी तरह ही चलती रही थी। आज का सोनभद्र भी दिल्ली व लखनऊ जैसे सत्ता केन्द्रांे से काफी दूर है। यहां कलक्टर के रूप में एक ऐसा शासक पद स्थापित है जिसका प्रमुख कार्य होता है सोनभद्र से राजस्व का संग्रह करना तथा अधिकतम राजस्व इकट्ठा करना। राजस्व संकलन के कार्य को गरिमा प्रदान करने के लिए कलक्टर के जिम्मे शान्ति-व्यवस्था
- स्ंू ंदक व्तकमतद्ध स्थापित करने जैसा भी कार्य होता है। नया जनपद सृजित होने
के बाद से आज तक ऐसा कुछ भी प्रमाण नहीं मिलता कि यहां के माननीय सांसदों या विधायकों ने दिल्ली या लखनऊ की सत्ता को कभी विचलित भी किया हो। वहां की सत्ताओं को हिलाने-डुलाने की क्षमता रखना तो दूर की बात है। इस प्रकार सोनभद्र आज भी समंुद्री टापू की तरह उदास व अनाथ भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में दिखता है जिसकी अपनी कोई अवाज नहीं। मध्यकाल से लेकर आज तक सोनभद्र की इस दयनीय स्थिति के ठीक विपरीत यहां के औद्योगिक आर्थिक सत्ता-प्रतिष्ठानों की है। यहां के बिजली व अल्मुनियम के औघोगिक प्रतिष्ठान अर्थ विपणन, नियोजन, प्रबन्धन व मुनाफे में दुनिया स्तर के हैं लेकिन इनका दूसरा स्वरूप पर्यावरण श्रम-सुरक्षा, श्रम-प्रोत्साहन, श्रम-कल्याण इतने शर्मनाक हैं कि कल्याणकारी राज-व्यवस्था पर दाग की तरह हैं। जाहिर है इसके अनेक कारण हैं। श्रम-शक्ति का असंगठित होना तथा श्रम-कानूनों का श्रम-शक्ति के हितों के खिलाफ होना। भारी औद्योगीकरण, भारी मशीनरीकरण का वैज्ञानिक रूप होता है। भारी-मशीनीकरण एक ऐसा श्रम नियोजन है जो मानव-श्रम की उपयोगिता को न केवल क्षतिग्रस्त करता
है वरन् अपमानित भी करता है। सोनभद्र को अपमान झेलना उसकी किस्मत में ही लिखा हुआ है शायद। सोनभद्र का आर्थिक अध्ययन इस तथ्य को प्रमाणित कर सकता है कि यहां की बेरोजगारी व गरीबी प्रायोजित है। श्रम-कानून तथा भारी मशीनों की आमद ने यहां लाखों मनुष्यों के रोजगार के अवसर को छीन लिया है। अब यह तथ्य अज्ञात नहीं है। सोनभद्र की भौगोलिक तथा सामाजिक जटिलाएं एवं अर्न्तविरोध तो बहुत कमजोर कारण हैं हालांकि इनके कष्ट-कर प्रभावों से भी सोनभद्र काफी क्षतिग्रस्त हुआ है। मध्यकाल जैसा कि कहा जा चुका है कि युद्धों व हमलों का काल रहा है। पन्द्रहवीं सदी में यहां भी वेनवंशी राजपूतों व चन्देलों में विनाशकारी युद्ध होता है, हालंकि उस युद्ध का विवरण नहीं मिलता, कितने हाथी, घोड़े तथा सैनिक हता-हत हुए। इतिहास में प्रमुख रूप से सिकन्दर जैसे विदेशियों का आक्रमण उल्लिखित हैं जो साफ तौर से राजपूत सत्ता-प्रतिष्ठानों की कमजोरियों व अर्न्तविरोधी को स्पष्ट करते हैं। मुहम्मद बिन कासिम का आक्रमण के बाद लगभग पांच सौ साल तक भारत हमले से सुरक्षित रहता है। 1000-1026 आते-आते महमूद गजनवी का हमला सीधे राजपूती सत्ता केन्द्रों पर होता है फिर तो विदेशियों के हमलों की बाढ़ आ जाती है। मुहम्मद गोरी, चंगेज खॉ, तैमूर लंग के हमले धारावाहिक रूप से होते हैं। 1176 से 1398 तक भारत विदेशी हमलों को झेलता रहा है। चौदहवीं सदी के बाद से विनाशकारी हमलों का सिलसिलां रुकता है फिर पुर्तगालियों व अंग्रेजों के हमले जहांगीर के सत्ता नशीन होने के बाद प्रारंभ हो जाते हैं। बाद में ईस्ट इण्डिया कम्पनी, यूनियन जैक के अधीन होकर भारत में ब्रिटिश-शासन का दरवाजा खोल देती है। सत्राहवीं सदी में दिल्ली का राजनीतिक परिदृश्य बदलता है तथा मुहम्मदशाह वहां सम्राट बन जाता है। मुहम्मदशाह बनारस, जौनपुर व गाजीपुर की जागीरें मुर्तजा खान को दे देता है। यहीं से सोनभद्र, कन्तित, चुनार तथा बनारस की राजनीतिक गतिविधियां एक नये सत्ता-प्रतिष्ठान के अभ्युदय की तरफ बढ़ती हैं। बनारस की मुकम्मल व्यवस्था के लिए अवध के नवाब तथा दिल्ली के सम्राट दोनों चिन्तित रहते हैं। फलस्वरूप वे रूस्तमअली खान के जिम्मे बनारस को लगा देते हैं। राजस्व के लेन-देन की गड़बड़ी के कारण रूस्तमअली को मुर्तजा खान विस्थापित कर देता है। रूस्तम खान को यह जागीर पांच लाख वार्षिक पर मिली थी। सादत खान 1728 मंे अवध का सूबेदार भी रहा चुका था। इसलिए उसकी विश्वसीनयता असंदिग्ध थी। सादत खान शासकीय कूटनीति का सहारा लेता है तथा जागीर को रूस्तम अली के अधीन इस शर्त पर सुपुर्द कर देता है कि रूस्तम अली सबसे पहले पांच लाख मुर्तजा खान को चुका दे फिर आठ लाख सालाना सादत खान को नियमित रूप से अदा करता रहे। रूस्तम अली राजस्व का भुगतान सादत खान को नहीं कर पाता है। सादत खान रूस्तम अली से असंतुष्ट हो जाता है इस स्थिति में मुकाबिला करने की हिम्मत
रूस्तम अली में नहीं होती सो वह अपने सहायक बनारस के भुइहार गौतम ब्राहमण मनसा राम को अधिकृत करता है कि वह सादत खान व नवाब से सुलह का रास्ता निकाले। मनसा राम को कूटनीति व षडयंत्रा करने का अच्छा अवसर मिलता है 1738 में मनसा राम अपने पुत्रा बलवन्त सिंह के नाम से बनारस व चुनार की जागीरें प्राप्त करने में सफल हो जाता है। 1738 से लेकर वारेन हेस्टिंग्स की सेना के द्वारा विजयगढ़ पर आक्रमण में करने के पूर्व तक सोनभद्र बनारस सत्ता केन्द्र का एक हिस्सा बना रहता है। 1781 के बाद 1811 में चेत सिंह राजा बनारस की मृत्यु हो जाती है। इस दौरान अंग्रेजों द्वारा विजयगढ़ व अगोरी के शासकों को पुनः स्थापित कर दिया जाता है। 1700 में सिंगरौली राज की स्थापना फकीरशाह कर चुका होता है। बाद में अंग्रेजों द्वारा उसे भी मान्यता मिल जाती है। सोनभद्र की ऐतिहासिक गतिविधियों को स्पष्ट करने के लिए आवश्यक होगा कि बनारस के राजा बलवन्त सिंह तथा चेत सिंह के ऐतिहासिक काल को स्पष्ट रूप से जाना जाये। मुगलों, तुर्को अफगानों से अलग हटकर हिन्दू अधिपति राजा बनारस की नीतियों गतिविधियों एवं राजनीतिक हस्तक्षेपों का केन्द्र सोनभद्र बन जाता है। बलवन्त सिंह इतिहास के स्वनिर्मित पात्रा होते हैं तथा उन्हें पारंपरिक शासक होने की मर्यादा भी प्राप्त नहीं होतीं ऐसी स्थिति में बलवन्त सिंह अपनी ऐतिहासिक अनिवार्यता स्थापित करने के लिए भूमि-व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन करते हैं तथा ऐसे लोगों को भूमि-प्रबंधन एवं राजस्व संग्रह में नियोजित करते हैं जो उनके प्रति घाृणित दर्जे तक आज्ञाकारी बने रह सकें। इस प्रकार से सोनभद्र में बलवंत सिंह द्वारा चलाये गये भूमि-प्रबन्धन का अभूतपूर्व दौर प्रारंभ होता है जो कमोवेश चेत सिंह तक चलता रहता है। बलवन्त सिंह की भूमि-व्यवस्था व राजस्व संग्रह के तौर-तरीकों का अगोरी विजयगढ़ एवं सिंगरौली राज द्वारा कोई विरोध नहीं होता। पारंपरिक रूप से चली आ रही शासन व्यवस्था सोनभद्र में चलती रहती है यानि आधे से अधिक भू-भाग पर चन्देल राज व्यवस्था चल रही थी तो शेष सोनभद्र यानि अनपारा, सिंगरौली परिक्षेत्रा पर बेनवंशी राज-व्यवस्था। राजस्व संग्रह व नियमन के लिए बनारसी राज-व्यवस्था की नकल यहां प्रभावी थी। कुल मिला कर सोनभद्र का ऐतिहासिक मध्य-काल युद्धकालीन परंपराओं से अलग नहीं था। उस दौर में ही आदिवासियों के सत्ता-प्रबंधन की लोक-परंपरा, वन सभ्यता, राज-प्रणाली, उनकी रियासतों के उन्मूलन के साथ समाप्त कर दिया गया था। तथा आर्य-संस्कृति से प्रभावित नये किस्म की सर्वथा नई सत्ता-संस्कृति उग चुकी थी। यहां के आदिवासी तथा उनकी प्रकृतिमूलक संस्कृति जो वन सभ्यता और संस्कृति से जुड़ी हुई थी मिट
युद्ध-कालीन अतीत से अलग नई सभ्यता व संस्कृति की तरफ एक छलांग सोनभद्र की ऐतिहासिक आधुनिकता बनारसी राज-व्यवस्था से जितनी जुड़ी हुई थी, उतनी ही अंग्रेजी शासन व्यवस्था से। राजाओं-जमीनदारों के राज-गाथाओं से अलग अंग्रेजों ने सोनभद्र में नई जमीनदारी व भूमि-व्यवस्था को स्थापित किया। इस नई भूमि-व्यवस्था का उद्घोष हालांकि जन-कल्याणकारी था तथा साफ-साफ दिखता भी था पर अंग्रेजों की दृष्टि इस कार्य में अंग्रेजी सल्तनत की सुरक्षा की अधिक थी। अंग्रेजों के पहले बलवन्त सिंह सोनभद्र के विजयगढ़ व अगोरी का अधिग्रहण स्वयं को सुरक्षित रखने व मजबूत करने के लिए करते हैं क्योंकि उनके अपने स्वतः निर्मित तथा मुगलों द्वारा आरोपित अर्न्तविरोध थे। जहांगीर के समय ही अंग्रेज भारत आ चुके थे। सर टामस एक अंग्रेज अधिकारी जहांगीर से सोलहवीं सदी के प्रारंभ में ही भारत में व्यापार करने की अनुमति हासिल कर चुका था। दक्खिन के हिस्से में फ्रासीसी काबिज थे ही। बलवन्त सिंह के बनारस राज का अभ्युदय पतनशील मुगल सल्तनत के बादशाह मुहम्मद शाह के जमाने में होता हैं। उस काल में अवध की जागीरें बादशाह द्वारा मुर्तजा खान को प्रदान की जा चुकी थीं। बलवंत सिंह को 1738 में मुहम्मदशाह द्वारा राजा घोषित किया जा चुका था। उस काल में ही अवध की जागीरें बादशाह द्वारा मुर्तजा खान को प्रदान की जा चुकी थीं। बलवन्त सिंह अपनी राजधानी गंगापुर बनारस से 7 किमी उत्तर में स्थापित कर लेते हैं। एक नये ऐतिासिक नायक बलवन्त सिंह का उदय राजा बन जाने के बाद बलवन्त सिंह बादशाह के प्रति राजस्व अदायगी व वफादारी में किसी तरह की कोताही नहीं बरतते फलस्वरूप एक बड़े साम्राज्य के संस्थापक बन जाते हैं। बलवन्त सिंह को ऐतिहासिक सुयोग भी प्राप्त होता है उन्हें जागीर सौपने वाला सादत खान 1739 में मर जाता है। सादत खान की मृत्यु के बाद बलवन्त सिंह स्वयं शासक बन जाते हैं। जिनकी अपनी मनो-वाक्षित प्रभु-सत्ता होती है। महमूदशाह यानि तत्कालीन बादशाह की मृत्यु 1748 में हो जाती है। इसके पूर्व ही मुहम्मदशाह द्वारा सफदर जंग जो सादत खान का भतीजा था उसे सादत खान का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया जाता है। बादशाह अहमदशाह द्वारा 1748 में सफदर जंग को मुगल सल्तनत का वजीर भी नियुक्त कर दिया जाता है। सफदर जंग दिल्ली का वजीर होने के कारण अवध की सुपुर्दगारी व जागीरदारी की जिम्मेदारियों से दूर रहने लगा था। यह बलवन्त सिंह के लिए सोने में सुहागा था सो बलवन्त सिंह ने राज्य विस्तार करना प्रारंभ कर दिया। इसके पहले ही भदोही
के मौनस जमीनदारों ने बलवन्त सिंह को अपना संप्रभु स्वीकार कर ही लिया था। सफदर जंग की विवशता राजा बलवन्त ंिसह के लिए फायदेमन्द थी सो वे जान-बूझ कर अपने ऊपर आरोपित राजस्व की अदायगी नहीं कर रहे थे। सफदर जंग दिल्ली के अन्तविरोधों में फंसा हुआ था पर बलवन्त सिंह जानते थे कि किसी न किसी दिन सफदर जंग वापस आएगा तथा उन पर बकाया सारा राजस्व वसूल करेगा या तो रियासत तहस-नहस करेगा। चतुर- नीतिज्ञ की तरह 1751-52 में ही बलवन्त सिंह ने सोनभद्र के विजयगढ़ दुर्ग की खोज कर लिया था तथा सुनिश्चित कर लिया था कि सारे माल-असबाब विजयगढ़ दुर्ग में ही रखे जाएगें जो ऊँची पहाड़ी पर स्थित है तथा सुरक्षित भी। 1752 में बलवन्त सिंह ने इलाहाबाद के डिप्टी गवर्नर अलीकुली खान को पराजित कर दिया इसी के साथ अवध के नवाब के खजाने में राजस्व देना भी बन्द कर दिया क्योंकि सफदर जंग के दुश्मन बादशाह अहमदशाह के विरोध में उठ खड़े हुए थे सो सफदर जंग दिल्ली की सल्तनत बचाने में परेशान तथा उलझा हुआ था। सफदर जंग की उलझी हुई स्थितियां एक ऐसा अवसर थीं जिसका बलवन्त सिंह लाभ उठा सकते थे सो उनका पहला लक्ष्य था किसी भी प्रकार से बिजयगढ़ दुर्ग पर अधिकार स्थापित करना। बलवन्त सिंह का दूसरा लक्ष्य था सफदर जंग की निगरानी करना कि वह दिल्ली से कब उबरता है तथा अवध की तरफ कब वापस आता है? बलवन्त सिंह का बिजयगढ़ दुर्ग अभियान विजयगढ़ दुर्ग पर अधिकार कर पाना आसान नहीं था। इस कार्य के लिए बलवन्त सिंह को पहले चुनार व अहरौरा के मध्य में पड़ने वाले छोटे दुर्ग पटिहटा को जीतना होता फिर बनारस के 24 मील दक्षिण कुप्सा के पास वाले लतीफपुर को भी जीतना होता। लतीफपुर तथा पटिहटा के किले छोटे-छोटे सामन्तों के अधीन थे जो सीधे नवाब से जुड़े हुए थे। पटिहटा का दुर्ग जमायत खान द्वारा बनवाया गया था जो भागवत परगना का जमीनदार था। 1752 में बलवन्त सिह ने पटिहटा 1⁄4अहरौरा और चुनार मार्ग के मध्य1⁄2 पर एक बड़ी सेना के साथ आक्रमण कर दिया तथा उसे जीत लिया। पटिहटा की जीत के बाद बलवन्त सिंह ने लतीफपुर की तरफ प्रस्थान किया। लतीफपुर का किला काफी मजबूत था तथा मल्लिक फारूख के नियत्रंाण में था। मल्लिक की जमीनदारी कई मीलों में फैली हुई थी। संयोग से 1753 में लतीफपुर के शासक की मृत्यु हो जाती है। मल्लिक की मृत्यु के बाद उसका छोटा बेटा मल्लिक अहम्मद अहरौरा के पास के किले में रहने लगता है। सबसे पहले बलवन्त सिंह उसे पराजित करते हैं तथा वह मारा जाता है। मल्लिक अहमद की मृत्यु का समाचार सुनकर बड़ा भाई मल्लिक अहसन लतीफपुर को छोड़कर गाजीपुर जिले के जमानिया की तरफ पलायन कर जाता है इस तरह से बलवन्त सिंह को बिना किसी युद्ध के
लतीफपुर हासिल हो जाता है। उन्हें मात्रा मल्लिक अहमद से ही युद्ध करना पड़ता
है। इन जीतों के बाद विजयगढ़ दुर्ग का सपना बलवन्त सिंह के लिए यथार्थ बनता
जा रहा था।
सोनभद्र के स्थानीय बड़हर, बिजयगढ़, अगोरी के चन्देल शासकों व सिगरौली
के बेनवंशियों का युद्ध-कालीन भारत की युद्धगत परिस्थितियों से कभी सामना ही
नहीं हुआ था। लगातार चार सौ साल से चन्देल राजा अपनी परिस्थितियों में ही अपनी
संप्रभुत्ता की परिभाषाएं रचने में मगन थे सो वे युद्ध की अनिवार्यता से अपरिचित
थे तथा उन्हें आशंका भी न थी कि बनारस का राजा लतीफपुर व पटिहटा को पराजित
करके घनघोर जंगल की तरफ आएगा। सोनभद्र के राजाओं को कन्तित राज या कि
रींवा राज से कोई खतरा नहीं था उधर बिहार के पलामू तथा नगर के भुइंया जमीनदारों
से भी कोई आशंका नहीं थी। अचानक बनारस के राजा बलवन्त सिंह का बनारस
के दक्षिण की तरफ विजय अभियान के लिए निकलना यह एक ऐसा समय था जो
बनारस पर काबिज पुराने अधिपतियों पर सवाल खड़ा करता है। इसका उत्तर
संभवतः इस तथ्य में निहित हो कि गहरवारों का बनारस पर अधिपत्य हो जाने के
बाद मीरजापुर का कन्तित,श् शक्तेषगढ़, अगोरी, विजयगढ़, गहरवारों की कृपा से हमलों
से विमुक्त हो गए हों क्योंकि चन्देल व गहरवार कहीं न कहीं शादी-ब्याह के रिश्तों
से भी जुड़े हुए थे। बारहवीं सदी की राजपूती दुश्मनी भी उन दो शासक वंशों के लिए
एक पाठ थी दुश्मनी के कारण दोनों को कहीं न कहीं पराजित हेाना पड़ा था।
बलवन्त सिंह का किसी भी तरह से राजपूत शासकों से कोई संबध न था। वे
ब्राहमण मूल के भूमिहार थे सो उनके लिए मुसलमान शासक ही नहीं राजपूत शासक
भी एक समान थे तथा दोनों से युद्ध का रिश्ता रखने में उन्हें किसी भी प्रकार की
मनोवैज्ञानिक कुंठा न थी तथा विजयगढ़ पर अधिकार जमा कर वहां अपना माल
असबाब रखना भी उनके हित में था। किले को खजाना बनाना उनकी जरूरत थी,
क्योंकि बिजयगढ़ किले के समान सुरक्षित कोई भी दुर्ग उनके अधीन नहीं था। सो
विजयगढ़ की जीत के लिए अभियान पर निकलना उनके लिए अनिवार्य था।
सोनभद्र के चन्देल शासक बलवन्त सिंह के दक्षिण विजयअभियान से काफी डरे
हुए थे। विजयगढ़ दुर्ग पर बलवन्त सिंह को युद्ध का सामना नहीं करना पड़ता
गजेटियर बताता है कि बहुत ही सहजता से विजयगढ़ दुर्ग बलवन्त सिंह को हस्तगत
हो गया था। बलवन्त सिंह ने विजयगढ़ दुर्ग के किलेदार को कुछ रूपया घूस में देकर
किले को हासिल कर लिया था। इतिहासकार मोती चन्द्र इसे सौदा कहते हैं जो
पचास हजार रुपयों में तय हुआ था। यह पचास हजार भी बाद में बलवन्त सिंह ने
किसी को नहीं दिया। विजयगढ़, अगोरी के अलावा सिंगरौली की रियासत जो
बिजयगढ़ से काफी दूर तथा दुर्गम स्थान पर थी वहां का राजा स्वतः बलवन्त सिंह
से मिला तथा उन्हें रियासत का जरूरी राजस्व देना कबूल कर लिया। सिंगरौली की
तरफ बढ़ना बलवन्त सिंह के लिए वैसे भी अनिवार्य नहीं था क्योंकि वहां रहकर
वे बनारस की गति-विधियों की देख-रेख नहीं कर सकते थे। बनारस की देख-रेख करना तथा सफदरजंग के बारे में सूचनाएं हासिल करना यह विजयगढ़ से थोड़ा सुविधा-जनक था। बलवन्त सिंह का सोनभद्र तथा सोनभद्र के दक्षिण में साम्राज्य स्थापित हो गया, इस प्रकार सोनभद्र बलवन्त सिंह के साम्राज्य का एक निर्णायक भाग बन गया। सफदर जंग दिल्ली में जीवन तथा मृत्यु के खेल में फंसा हुआ था। दिल्ली सम्राट से जब सफदर जंग के रिश्ते सामान्य हो गए तब वह बनारस के राजा को परेशान व पराजित करने के अभियान पर निकल पड़ा। सफदर जंग 17 फरवरी 1754 को बनारस आया। बलवन्त सिंह बनारस से भाग कर चन्दौली पहुंच गए। इसी दौरान मराठांे ने दिल्ली पर हमला कर दिया दूसरी तरफ से इमादुलमल्क ने भी दिल्ली पर हमला कर दिया। सफदर जंग को दिल्ली का बुलावा आ गया तथा उसने बनारस से ही दिल्ली के लिए प्रस्थान कर दिया। यह बलवन्त सिंह के स्वयंभू शासन के लिए अच्छा सुयोग था। इस प्रकार सफदर जंग का भूत बलवन्त सिंह के लिए एक बार फिर टल गया। सफदरजंग की मृत्यु 5 अक्टूबर 1754 में हो गयी। सफदरजंग का पुत्रा शुजाउद्दौला उसका उत्तराधिकारी बना। शुजाउद्दौला के लिए बलवन्त सिंह से बकाए राजस्व की वसूली का मामला बहुत गंभीर व महत्वपूर्ण था। शुजाउद्दौला के लिए समय बहुत ही अस्थिरता का था। तमाम जागीरदारों ने राजस्व की अदायगी देना बन्द कर दिया था। ऐसी स्थिति में बलवन्त सिंह से बकाया राजस्व वसूली कर लेने का मुद्दा पूरे प्रान्त के लिए शुजाउद्दौला के राज-प्रबन्ध के पक्ष में होता फिर तो दूसरे छोटे-छोटे सामन्त तब स्वयं ही बकाया राजस्व चुकता कर देते। बनारस के राजा पर हमला करने के लिए चुनार का किला जीतना अति आवश्यक था। चुनार की आवश्यकता महसूस कर शुजाउद्दौला ने चुनार की तरफ प्रस्थान किया, बलवन्त सिंह की रणनीति थी कि नवाब शुजाउद्दौला से युद्ध न हो सिर्फ कूटनीति का सहारा लिया जाये सो बलवन्त सिंह ने चुनार के किलेदार को एक लाख रूपया देकर शुजाउद्दौला से युद्ध करने के लिए बहकाया। बलवन्त सिंह का यह योजना सफल नहीं हुई और शुजाउद्दौला चुनार किले पर काबिज हो गया। चुनार फतह के बाद शुजाउद्दौला ने बलवन्त सिंह की तरफ प्रस्थान किया किन्तु बलवन्त सिंह तब तक बनारस से लतीफपुर किले की तरफ कूच कर चुके थे। शुजाउद्दौला ने गाजीपुर के फौजदार फाजिल अली खान को निर्देशित किया कि वे बलवन्त सिंह का पीछा करे। बनारस के शेख अली हाजिर ने शुजाउद्दौला को एक अच्छी सलाह दिया कि बनारस के राजा बलवन्त सिंह से इस समय युद्ध करना सफल रणनीति नहीं होगी पर शुजाउद्दौला ने जवानी की जोश में शेख अली के प्रस्ताव को ठुकरा दिया तथा फाजिल अली से बनारस के राजा को पराजित करने का मन्सौदा बना लिया। फाजिल अली ने बनारस राजा जैसे अधिकारों को हासिल करने का अधिकार भी नवाब से मांगा। इसी बीच अहमदशाह अब्दाली के दिल्ली पर हमले ने शुजाउद्दौला को बलवन्त सिहं
से अच्छा संबंध बनाए रखने के लिए विवश कर दिया। इस प्रकार बलवन्त सिंह
फरवरी-मार्च 1757 तक के लिए नवाब के हमले से सुरक्षित बच गए।
बलवन्त सिंह कूटनीतिज्ञ साम्राज्यवादी थे। कन्तित के राजा की जमीनदारी भी
बलवन्त सिंह ने 1759-60 मंे कुली खान से हासिल कर लिया। कन्तित के राजा
विक्रम जीत सिंह राजस्व की भरपाई नहीं कर पाते थे सो कुली खान ने उन्हें गिरफ्तार
कर लिया। राजा बलवन्त सिंह ने विक्रम जीत सिंह का राजस्व चुकता करके उन्हें
भी कुली खान से छुड़वा लिया तथा कन्तित पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया।
शुजाउद्दौला की बक्सर युद्ध में हार होती है। शुजाउद्दौला के साथ शाह आलम
तथा मीर कासिम की सेनाएं भी युद्ध में हिस्सा लेती हैं। बक्सर में अंग्रेजों से पराजित
होने के बाद शुजाउद्दौला चुनार आ जाता है। वहां का रक्षक सिदी मुहम्मद बशीर
खान नवाब को सलाह देता है कि वे सैनिक संगठन बनाएं तथा अंग्रेजों से युद्ध करें।
नवाब शुजाउद्दौला को अपने उस फैसले पर काफी दुःख हुआ जिसके कारण उसने
बलवन्त सिंह को परेशान करना चाहा था तथा शेख अली हाजिर की सलाह को
खारिज कर दिया था। शुजाउद्दौला के मंत्राी बेनी बहादुर ने नवाब तथा अंग्रेजांे के
बीच सुलह कराने का प्रयास किया किन्तु वह सफल नहीं हुआ।
अंग्रेज शुजाउद्दौला की निगरानी कर रहे थे तथा बलवन्त सिंह अंग्रेज व नवाब
दोनों को देख रहे थे कि इन दोनों के संघर्ष से इतिहास की धारा किस तरफ मुड़ती
है? शुजाउद्दौला तथा अंग्रेज दोनों के लिए चुनार का किला अनिवार्य बना रहता है।
अंग्रेजांे के लिए चुनार तक पहुंचना आसान नहीं था सो अंग्रेजों ने बलवन्त सिंह से
समझौता करना चाहा। बादशाह शाहआलम तथा बलवन्त सिंह से सहयोग का
विश्वास लेकर अंग्रेज शासक मुनरो ने 29 नवम्बर 1764 को चुनार से तीन
किलोमीटर दूर एक बगीचे में कैम्प डाल दिया। मुनरों ने कैम्प करने के पहले ही
बादशाह शाहआलम से चुनार के अधि-ग्रहण अधिकार का आज्ञा पत्रा हासिल कर
लिया था। किले का रक्षक मुहम्मद वशीर खान अंग्रेज मुनरो से किला छोड़ने के लिए
सहमत भी हो गया लेकिन तब तक किले का दृश्श्य बदल चुका था। किले की रक्षक
टुकड़ी के दो सरदार सिद्वी बलाल तथा सिद्वी नासिर ने मुहम्मद वर्शीर खान से
बगावत कर दिया तथा किले से भगा दिया। उन्हें मालूम था कि अंग्रेजों ने
शुजाउद्दौला को बक्सर में हरा दिया है। इस प्रकार मुनरो चुनार पर अधिकार जमाने
में विफल हो गया।
अंग्रेजों ने चुनार फतह करने की फिर पूरी तैयारी की। बावजूद पूरी तैयारी के
पचास अंग्रेज तथा एक हजार भारतीय अंग्रेज सिपाही मारे गए इसके अलावा भी
अंग्रेजों का भारी नुकसान हुआ तब भी चुनार किले पर अंग्रेजों का अधिकार दिसम्बर
1764 तक नहीं हो पाया। उधर शुजाउद्दौला बनारस की तरफ प्रस्थान कर चुका
था लेकिन अंग्रेजों ने उसके लिए व्यवधान उपस्थित कर उसे फैजाबाद की तरफ मोड़
दिया तथा जौनपुर को जीतते हुए अंग्रेज पुनः चुनार तक चले आए। क्यांेकि चुनार
किला जीतना उनका महत्वपूर्ण व निर्णायक लक्ष्य था। चुनार का किला लम्बे समय तक अंग्रेजों के लिए सिरदर्द था। अंग्रेजों ने बादशाह शाहआलम से दुबारा प्रमाण पत्रा हासिल किया कि किला उन्हंे सौप दिया जाये पर किलेदार सिद्वी मुहम्मद बलेल ने साफ-साफ इनकार कर दिया कि ऐसा संभव नहीं है। उस समय किले में तीन हजार किले के बहादुर रक्षक सिपाही थे। किले की रक्षक टुकड़ी ने जिस इच्छा श्शक्ति व बहादुरी से अंग्रेजों का मुकाबिला किया था, उससे परेशान होकर अंग्रेज नहीं चाहते थे कि किले को हासिल करने के लिए युद्ध का सहारा लेना पड़े। अंग्रेज कूटनीतिक चालों से किले को हासिल करना चाहते थे। एक बार के पराजित अंग्रेज किसी भी तरह से किले की रक्षक सेना में विद्रोह भड़काना चाहते थे ऐसा हुआ भी। मजबूर होकर किलेदार सिद्वी बलाल को किला छोड़ना पड़ा इस प्रकार धोखा, छल व कूटनीतिक चालों से 8 फरवरी 1765 को चुनार का किला अंग्रेजों ने अपने अधीन कर लिया। चुनार का अंग्रेजों द्वारा अधिग्रहण इतिहास की महत्वपूर्ण घटना थी जिसका प्रभाव बनारस के राजा बलवन्त सिंह पर पड़ना था। शुजाउद्दौला से हालांकि बलवन्त सिंह से अच्छे संबध नहीं थे फिर भी राजा के साम्राज्यवादी विस्तार पर कोई फर्क पड़ने वाला नहीं था क्योंकि वह खुद अंग्रेजों से परेशान था तथा बच बचा कर भाग रहा था। बलवन्त सिंह की मृत्यु 23 अगस्त 1770 को हो जाती है। बलवन्त सिंह की मृत्यु के बाद भी सोनभद्र पर कोई उल्लेखनीय प्रभाव नहीं पड़ता। बलवन्त सिंह की दूसरी राजपूत रानी से जन्मे चेतसिंह बनारस के राजा बन जाते हैं। राज परिवारों में हुकूमत के लिए होने वाला पारंपरिक संघर्ष महराज बनारस के राज परिवार में भी होता है पर सारे संघर्षों का उन्मूलन कर चेतसिंह राजा की गद्दी पर बैठ जाते हैं तथा बनारस राज की प्रजा को यह एहसास भी करा देते हैं कि वे ही बलवन्त सिंह के योग्य उत्तराधिकारी हैं। वैसे भी प्रजा कभी भी राज-व्यवस्था के उत्तराधिकारी के मामलों में दखल नहीं देती। प्रजा एक तरह से राज-व्यवस्था से दूर रहने वाली इकाई होती है जिसका कत्तई काम नहीं है कि वह राज-व्यवस्था में दखल दे। वैसे भी काल कोई हो प्रजा सत्ता-प्रबंधन के प्रति खामोश ही रहा करती है प्रजा की आज भी वही पुरानी सोच है। 23 अगस्त से 10 अक्टूबर तक का समय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी समय बनारस के उत्तराधिकार का मुद्दा राज परिवार में विचाराधीन था। 10 अक्टूबर 1770 को चेत सिंह का राज्याभिषेक होता है। चेतसिंह के राज्याभिषेक के बाद सोनभद्र के चन्देल या बेनवंशी राजाओं में एक मौन सहमति रहती है कि बनारस के राज-काज पर किसी प्रकार का दखल नहीं देना है। इस प्रकार सोनभद्र के राज वंश बनारस राज का मुखा-पेक्षी होने में कत्तई शर्मिन्दित नहीं होते। बलवन्त सिंह ने विजयगढ़ व अगोरी पर अपना आधिपत्य अवश्य स्थापित कर लिया था। पर सोनभद्र की तत्कालीन राज-व्यवस्था से सिवाय राजा बनने के कत्तई छेड़-छाड़ नहीं किया था। युद्ध-कालीन भारत के सत्ता-प्रभुओं की सर्वत्रा यही नीति थी कि स्थानीय
शासन केन्द्रों को यदि कोई विशेष विपरीत परिस्थिति न हो तो उन्हें छिन्न-भिन्न या
परिवर्तित न किया जाये। बलवन्त सिंह ने भी भारत के दूसरे साम्राज्यवादी शासकों
की नकल करते हुए सोनभद्र के राज-वंशों के लिए किसी विपरीत प्रभाव का सृजन
नहीं किया उन्हें जस के तस वैसे ही बने रहने दिया।
बलवन्त सिंह के आने तथा पूरे सोनभद्र पर काबिज होने के बाद सोनभद्र की
स्थानीय व्यवस्था चन्देल व बेनवंशी राजपूतों के अधीन ही थी तथा बलवन्त सिंह द्वारा
निर्धारित राजस्व की अदायगी करना उन दोनों राजवंशांे ने स्वीकार कर लिया था।
यही कारण था कि सोनभद्र के शासक गण बनारस की तरफ आंखे गड़ाये हुए थे
कि वहां क्या होता है? बनारस पर चेत सिंह का राज्याभिषेक हो जाता है,अब बलवन्त
सिंह के स्थान पर चेत सिंह का शासन तंत्रा सोनभद्र पर प्रभावी हो जाता है। 1775
को अंग्रेजों ने चेतसिंह के अधिकारों में कटौती करते हुए उनके तमाम दीवानी व
फौजदारी अधिकारों को संकुचित कर दिया। इसका प्रभाव सोनभद्र व मीरजापुर पर
पड़ा। अंग्रेजांे द्वारा चेतसिंह के अधिकारों का संकुचित किया जाना सोनभद्र व
मीरजापुर के छोटे-छोटे सत्ता प्रभुओं के लिए अच्छी खबर थी तथा वे सोचने लगे थे
कि अंग्रेजों से सीधा रिश्ता बनाया जाये, चेत सिंह से भले अंग्रेज हैं। चेतसिंह से
अंग्रेजों ने 2266180 बाइस लाख छाछठ हजार एक सौ अस्सी सिक्कों की मांग की
थी लेकिन चेतसिंह ने उसका भुगतान नहीं किया तथा टाल-मटोल की नीति अपनाते
रहे थे। अन्त में 1781 ई को चेत सिंह ने साफ तौर से इनकार कर दिया कि वे
सिक्कों का भुगतान करने में समर्थ नहीं हैं। अंग्रेजांे ने चेतसिंह के इनकार का अर्थ
लगाया कि चेत सिंह अंग्रेजी सरकार से बगावत कर रहा है तथा अपने पिता बलवन्त
सिंह की तरह लगान अदायगी को फंसा कर रखना चाहता है। दूसरा अर्थ यह था
कि चेत सिंह का राज्य छोटा भी नहीं है उसके अनुसार 2266180 का सिक्का चुकता
करना कोई कठिन नही है।
वारेन हेस्टिंग्स तब गर्वनर जनरल था तथा दूसरे गर्वनर जनरलों से काफी भिन्न
भी था। बंगाल में मिली सफलता से वह आवेश में था। जैसे को तैसा की नीति का
अनु-पालक। वारेन हेस्टिंग्स ने बनारस राज-परिवार के अर्न्तविरोधों तथा कलहों का
पता लगाया तथा उन अर्न्तविरोधों का उभारने का काम भी किया। वारेन हेस्टिंग्स
को बनारस में अपना सत्ता केन्द्र स्थापित नहीं करना था उसे तो वफादर व आज्ञाकारी
राजा की आवश्यकता थी जो बतौर राजा का कार्य करे तथा उसे राजस्व देता रहे।
भारत में स्थानीय संप्रभुओं को सत्ता सौंपने की रणनीति अंग्रेजों ने इजाद नहीं किया
था, यह नीति तो सल्तनत काल से लेकर मुगल काल तक चलती रही थी।
अकबर,अलाउद्दीन,औरंगजेब तथा अंग्रेजों ने पुरानी नीति का अनुसरण किया तथा
क्षेत्राीय संप्रभुओं को लगान 1⁄4राजस्व1⁄2 वसूली तथा भूमि प्रबन्ध का एक तरफा व
मन-माना अधिकार दिया जिससे केन्द्रीय सत्ता-प्रतिष्ठान मालामाल रहे।
1781 से ही वारेन हेस्टिंग्स ने चेत सिंह को पराजित तथा पद स्थापित करना
अंग्रेजी व्यवस्था का प्राथमिक लक्ष्य बना लिया था। सो वारेन हेस्टिंग्स ने बनारस में डेरा डाल दिया तथा चेतसिंह को उनके बनारस स्थिति किले में कैद करवा लिया। चेतसिंह को कैद करवाना वारेन हेस्टिंग्स ने हंसी का खेल समझा था जो उसके लिए काफी भारी पड़ा। बनारस की प्रजा ने राजा का साथ दिया तथा अंग्रेजी सेना को इतना क्षतिग्रस्त किया कि अंग्रेजों को चुनार के लिए भागना पड़ा। वारेन हेस्टिंग्स को चुनार में भी शान्ति न मिली। चुनार किले की सुरक्षित टुकड़ी ने वारेन हेस्टिंग्स की सेना को वहां से भी भागने पर मजबूर कर दिया। बिजय गढ़ किले पर अंग्रेजी जैक वारेन हेस्टिंग्स ने शुजाउद्दौला की सेना को बक्सर में हराया था वही बनारस तथा चुनार आकर बुरी तरह पराजित होता है। अपनी शर्मनाक पराजय से वारेन हेस्टिंग्स चिड़-चिड़ा हो जाता है। चेतसिंह को पराजित करने के लिए वह कानपुर, इलाहाबाद आदि की अंग्रेजी सेनाओं को आमंत्रित करता है तथा चेत सिंह पर सुयक्त हमला करने की रणनीति बनाता है। चेतसिंह बनारस किला छोड़कर लतीफपुर के किले की तरफ कूच कर देते हैं। इधर वारेन हेस्टिंग्स की सेना उन्हें ढॅूढती हुई वहां पहुंचती है। लतीफपुर में चेतसिंह एक बड़ी सेना का संगठन तैयार करते हैं जिसमें स्थाई तथा अस्थाई सैनिक लगभग 22000 1⁄4बाइस हजार1⁄2 होते हैं। राजा की सुरक्षित सेना इससे अलग होती है। अंग्रेजी सेना के लिए चेतसिंह को पराजित करना प्राथमिक व अनिवार्य मुद्दा था। पर चेतसिंह इतने सरल तरीके से पराजित नहीं किए जा सकते थे। अंग्रेजों की सेना को बाधित करने के लिए सीखड़ के जमीनदार साहब खान भी मोर्चा संभाल लेते हैं तथा पटिहटा के जमीनदार भी उठ खड़े होते हैं। लेकिन अंग्रेजों की संयुक्त सेना कहीं रूकती नहीं उसे तो चेत सिंह को हर हाल में पराजित करना था। अंग्रेजों ने आक्रमण नीति के तहत एक बड़ी सेना के साथ ‘पटिहटा’ पर हमला बोल दिया ‘पटिहटा’ ध्वस्त हुआ। यहां लड़ाई महज कुछ दिनों तक चली जिसमें अंग्रेजों को कम क्षति उठानी पड़ी। 15 सितम्बर 1781 से लेकर कुछ दिन आगे तक पटिहटा में पटिहटा के जमीनदार अंग्रेजी सेना से जीवन मृत्यु का खेल खेलते रहे थे। इसी दौरान चेत सिंह विजयगढ़ किले की तरफ पलायन कर जाते हैं। अंग्रेजी सेना का मात्रा एक मकसद था विजयगढ़ किले का अधिग्रहण। चेतसिंह विजयगढ़ से होते हुए अपने माल असबाब के साथ रींवा की तरफ भाग जाते है। जहां बनारस राज को जीत लेने की पूरी कोशिश करते हैं। रींवा के महादजी सिन्धिया ने चेत सिंह को आश्वस्त भी किया था पर चेत सिंह रीवंा प्रवास के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ किसी करागर योजना को क्रियान्वित करने में सफल नहीं हो पाते। 1811 में चेत सिंह की मृत्यु हो जाती है। 1781 में ही विजयगढ़ किले पर अंग्रेज किले की खिड़की की तरफ से हमला करते हैं और जीत लेते हैं। विजयगढ़
किले पर हमला करने के पहले वारेन हेस्टिंग्स स्थानीय मतभेदों की जानकारी हासिल करता है। विजयगढ़ राज से असंतुष्ट कुछ चन्देलों ने ही वारेन वारेन हेस्टिंग्सकी सेना की पहुच किले तक करवाया था। बहुत ही सहजता से अंग्रेजों ने बिजयगढ. किले पर काबिज होने का सपना पाल लिया था किन्तु बिजयगढ़ किले पर पहुंचते ही अंग्रेजों को स्थानीय आदिवासियों से युद्ध करना पड़ा। स्थानीय आदिवासी कमाण्डर नहीं चाहते थे कि किला अंग्रेजों के अधिकार में चला जाये। आदिवासियों ने तीर धनुष से अंग्रेजों का सामना किया। दन्त कथा है कि लगभग तीन सौ धांगर व चेरो जनजाति के लोग किले की सुरक्षा करते हुए वहां शहीद हो गए। के पिछले हिस्से से हमला करती है तथा किले को ध्वस्त कर देती है तथा काफी लूट-पाट करती है। विजयगढ़ किले की पराजय सोनभद्र के लिए बहुत बड़ी हार थी फिर तो अंग्रेजों को यहां कुछ करना ही नहीं पड़ा। 1781 में विजयगढ़ किले का पतन होता है, ऐसा नहीं कि वारेन हेस्टिंग्स की सेना चोरी से यहां आती है तथा हमला करती है वह लगातार सितम्बर 1781 तक चेतसिंह का पीछा कर रही था। पहले बनारस फिर चुनार, सीखड़, पटिहटा आदि से होते हुए अंग्रेजी सेना सुकृत के रास्ते की तरफ से विजयगढ़ तक आती है सवाल है कि उस समय शक्तेषगढ़ व कन्तित या विजयगढ़ राज के शासक क्या कर रहे थे? उधर रींवा के लोग कहां थे जहंा चेत सिंह को जाकर शरण लेनी पड़ती है फिर सिंगरौली के राजा चुप क्यों थे? कोई उत्तर नहीं। इन सवालों के उत्तर सत्राहवीं सदी मंे कत्तई महत्वपूर्ण नहीं थे। दर-असल उस समय के सत्ता प्रभुओं के लिए मर्यादा या वैभव की बात न थी कि पड़ोसी राजा पराजित न हो चाहे पड़ोसी राजा भले ही पराजित हो जाये पर उनके विशेषाधिकार सुरक्षित रहें। विशेषाधिकारों की सुरक्षा तथा विशेष अवसरों की तलाश या निर्मिति ही तत्कालीन सत्ता केन्द्रों की कार्य योजना थी। एकतरफा तथा स्वान्तः सुखाय जैसा कोई भी कार्य व्यापक प्रभावों वाला नहीं होता। स्थानीय सत्ता-प्रतिष्ठानों का अपने तक ही सीमित रहना, अंग्रेजों के सत्ता केन्द्रों की स्थापनाओं का प्रमुख कारण रहा है जिसके कारण ही अंग्रेजों का प्रभुत्व भारत के अधिकांश भू-भागों पर स्थापित हो गया। सत्राहवीं सदी के अन्त तथा अठारहवीं सदी के प्रारंभ का काल सत्ता-केन्द्रों के सहयोग तथा सद्भाव का काल कत्तई नहीं था। एकोअहं की राज-व्यवस्था से निर्मित सत्ता-प्रतिष्श्ठान धड़ाधड़ टूटते जा रहे थे और अंग्रेज उन पर काबिज होते जा रहे थे। हमें बलवन्त सिंह तथा चेत सिंह के पराभव काल का सन्दर्भ अंग्रेजों की दूसरी लड़ाईयों से निश्चित रूप से लेना चाहिए। सितम्बर 1781 में विजयगढ़ किले पर अंग्रेजों का आधिपत्य हो जाता है तथा 30 सितम्बर 1781 को बनारस राज की व्यवस्था महीप नारायण सिंह के जिम्मे अंग्रेजों द्वारा लगा दी जाती है। और सोनभद तथा मीरजापुर की पुरानी राजव्यवस्था को जिसे बलवन्त सिंह ने समाप्त कर अपने बनारस राज में मिला लिया था उन्हें अंग्रेज बहाल कर देते हैं। सोनभद्र की अगोरी
बिजयगढ़ रियासतें अंग्रेजों द्वारा बहाल कर दी जाती हैं। 1781 के आस-पास भारत की दूसरी रियासतों में क्या हो रहा था? अंग्रेज राजनीतिक कौतुक करने में माहिर थे। 1746 से लेकर 1748 तक लगातार अंग्रेज दूसरी समानान्तर ताकत फ्रांन्सीसियों से युद्ध कर रहे थे। 1748 से लेकर 1754 तक दुबारा फिर अंग्रेज फ्रांन्सीसियों से युद्धरत हो गए। मामला था हैदराबाद व कर्नाटक राज्यों का पतन। दोनों चाहते थे कि उनकी सत्ता स्थापित हो जाये किन्तु 1755 में वे आपस में सुलह कर लेते हैं। सन्धि अधिक दिन तक नहीं चल पाती फिर तीसरी बार अंग्रेज तथा फ्रांन्सीसी युद्ध के लिए आमने-सामने हो जाते हैं। 1760 में अंग्रेज फ्रांन्सीसियों को ‘वांडिवाश’ के युद्ध में निर्णायक पराजय देते हैं। इस प्रकार भारत के दक्षिणी राज्य,अंग्रेजों के लिए अपने राज्य बन जाते हैं। अंग्रेज दक्षिण के बाद बंगाल पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लेते हैं। वहां के नवाब सिराजूद्दौला को अपदस्थ करने में मीरजाफर की मदत करते हैं तथा उसे बाद में बंगाल राज्य का नवाब बनाते हैं। मीरजाफर 1759 में नवाब का पद अख्तियार कर लेता है तथा सिराजूद्दौला मीरजाफर के पुत्रा द्वारा युद्ध में मारा जाता है। इसी मीरजाफर को अंग्रेजों ने 1760 में पदच्युत कर दिया तथा उसके दामाद मीर कासिम को बंगाल की नवाबी साैंप दी। मीर कासिम अंग्रेजों से सावधान था तथा वह बंगाल की प्रगति करना चाहता था इसलिए उसने सेना का एक मजूबत संगठन भी बनाया तथा उसका सेनापति एक जर्मन को नियुक्त किया। मीर कासिम अन्त तक अंग्रेजों से लड़ता रहा, सो अंग्रेजों ने उसे बंगाल की नवाबी से हटाकर दुबारा मीरजाफर को नवाब बना दिया। यह वही मीरजाफर था जो सिराजूद्दौला का सेनापति था तथा पलासी युद्ध 1757 में नवाब को धोखा दिया तथा खामोश हो गया था दूसरी तरफ अंग्रेज सैनिक एक तरफा हमला कर रहे थे फलस्वरूप सिराजूद्दौला वहीं मारा गया। अंग्रेजी सेना से लड़ने के लिए मीर कासिम ने बादशाह शाहआलम तथा अवध के नवाब शुजाउद्दौला का सहयोग लेकर एक संघ बनाया लेकिन यह संघ 1764 में बक्सर युद्ध में अंग्रेजों से हार गया। बक्सर की हार से बंगाल अंग्रेजांे के अधीन चला गया और शुजाउद्दौला का अवध भी अंग्रेजों के प्रभाव में आ गया। अवध के नवाब शुजाउद्दौला को मजबूर होकर अंग्रेजों से सन्घि करनी पड़ी इस सन्धि में बादशाह शाहआलम भी एक पक्षकार था। यह संधि ‘इलाहाबाद की सन्धि’ के नाम से ज्ञात है। मुगल सम्राट ने अंग्रेजों को बंगाल, बिहार व उड़ीसा की दीवानी 1⁄4राजस्व वसूलने का अधिकार1⁄2 अधिकार दे दिया तथा अंग्रेजों ने शाहआलम 1⁄4बादशाह1⁄2 को 26 लाख रूपये वार्षिक पेंशन तथा ‘कड़ा’ व इलाहाबाद का जिला देना स्वीकार किया। अंग्रेजों ने कड़ा तथा इलाहाबाद को अवध के नवाब शुजाउद्दौला से छीना था। 1765 में इलाहाबाद की सन्धि होती है जो अंग्रेजों के लिए इतिहास का सर्वथा नया अध्याय बन जाती है। इसके बाद अंग्रेजों ने बनारस राजा को पराजित करने की रणनीति बना ली तथा चेतसिंह पर राजस्व वसूली का कष्टकर दबाब भी बना लिया फिर ऐसा क्या था कि अंग्रेजों ने अवध के नवाब शुजाउद्दौला को बक्सर में पराजित करने के बाद अवध को बंगाल की तरह अंग्रेजी राज में क्यों नहीं मिला लिया? इतिहास के लिए एक महत्वपूर्ण सवाल है जिसका उत्तर अंग्रेजों की कूटनीतिक दूर-दर्शिता में निहित था। अंग्रेज, मराठा तथा निजाम का सहयोग लेकर दक्षिण के हैदर अली को पराजित करना चाहते थे। विजयनगर का शक्तिशाली साम्राज्य तालीकोट के युद्ध 1565 के बाद काफी छिन्न-भिन्न हो गया था। दक्षिण भारत में सिर्फ मैसूर, हैदराबाद तथा मराठा राज ही प्रभावशाली रह गये थे। अंग्रेजों ने कूटनीति का सहारा लेकर निजाम व मराठा राज से सैनिक सन्धि कर ली। मराठा सदैव अवध पर हमला किया करते थे सो अंग्रेजी राज में मिलाने के लिए मराठों से संघर्ष लेना ठीक न था तथा अवध को अंग्रेजी राज में मिलाने के लिए मराठों से भी उन्हें संघर्ष करना पड़ता। यही कारण था कि अंग्रेजों ने अवध को छोड़ दिया था। अंग्रेजों के लिए जितना बनारस की पराजय आवश्यक थी उसमें कम मैसूर की पराजय नहीं थी। विजयगढ़ किले से चेत सिंह का पलायन सितम्बर 1781 में होता है। उधर चेतसिंह के पूर्व मैसूर राज्य से अंग्रेज दो बार युद्ध कर चुके होते हैं। पहला युद्ध 1768-69 में तथा दूसरा 1780-84 में। पहले युद्ध में मराठा तथा निजाम ने हैदर अली का साथ दिया। हैदरअली ने बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से मराठा व निजाम को मिला लिया जबकि उनकी सैनिक संधि अंग्रेजों से थी। अंग्रेज व हैदर अली की ही सेनाएं युद्ध में लड़ीं। हैदर अली ने बहुत ही चुतराई तथा बुद्धिमानी से अंग्रेजों को परास्त किया। हैदर अली ने एक ऐसी ऐतिहासिक विवशता खड़ी कर दी कि अंग्रेजों को हैदर अली से सन्धि करने के लिए विवश होना पड़ा। वह सन्धि 1 अप्रैल को हुई जिसके आधार पर जीते हुए भागों को एक दूसरे को वापस करना था तथा एक दूसरे के सहयोग की भी शर्त थी कि किसी पर भी हमला होगा वे एक दूसरे का साथ देंगे। मराठों ने 1771 में हैदर अली मैसूर पर आक्रमण कर दिया तथा अंग्रेजों ने सन्धि के अनुसार हैदर अली का साथ नहीं दिया। हैदर अली को अंग्रेजों की दगाबाजी पर क्रोधित होना स्वाभाविक था सो हैदर अली ने कनार्टक 1⁄4अंग्रेजों राज्य1⁄2 पर आक्रमण कर दिया फलस्वरूप अंग्रेज भी हैदर अली के विरूद्ध हो गए। 1780 से लेकर 1782 तक लगातार हैदर अली युद्धगत सफलताएं हासिल कर रहा था इसी बीच उसकी मृत्यु 1782 में हो जाती है। हैदर अली के बाद उसके पुत्रा टीपू सुल्तान की 17 मार्च 1784 को मंगलोर में अंग्रेजों से सन्धि होती है पर यह सन्धि 1789 में अंग्रेजों द्वारा तोड़ दी जाती है। 1789 में टीपू सुल्तान त्रावणकोर के राजा 1⁄4अंग्रेजों का पक्षधर1⁄2 पर हमला कर देता है। अंग्रेज त्रावणकोर के पक्ष मंे थे सो अंग्रेजों ने टीपू सुल्तान से सन्धि की शर्ते तोड़ कर युद्ध करना आरंभ कर दिया। पहले की तरह इस बार अंग्रेजों ने मराठा तथा निजाम को अपनी ओर मिला लिया। अंग्रेजों की बड़ी ताकत से युद्ध करना संभव न था तथा हैदर अली की तरह टीपू सुल्तान निजाम व
मराठों को अपनी तरह न मिला सका सो टीपू सुल्तान ने विवश होकर अंग्रेजों से सन्धि कर लिया। 1792 तक मैसूर राज्य का पूरी तरह से पतन हो गया तथा उस राज्य के हिस्से को मराठा, निजाम व अंग्रेजी राज में मिला लिया गया। 1780-82 के आस-पास मराठा भी अंग्रेजों से लड़ रहे थे पर 1782 में ‘सालवाइर्’ की सन्धि मराठों व अंग्रेजों के बीच होती है इधर महीप नारायण सिंह का 30 सितम्बर 1781 को राज्याभिषेक होता है। जिस समय चेतसिंह का पतन होता है वह काल अंग्रेजों के साम्राज्य के अभ्युदय का काल बन जाता है। अवध के नवाब शुजाउद्दौला से सन्धि, बनारस का पतन तथा मराठों से ‘सालीबाई’ की सन्धि तथा बंगाल पर अंग्रेजी राज की स्थापना। पूरे दक्षिण भारत पर प्रभुत्व स्थापित कर लेने के बाद अंग्रेज पूरे भारत पर आधिपत्य स्थापित कर लेने का सपना देखने लगे थे। ऐसी स्थिति में बनारस के चेतसिंह का साथ कौन देता? क्या राजा रींवा या कि मराठा, कौन अंग्रेजांे से लड़ता? वैसे महाद जी सिन्धिया खुद परेशान थे हालांकि मराठा सामन्तों में सिन्धिया व होल्कर दोनों शक्तिशाली थे। होल्कर की सेना ने 1802 में पेशवा व सिंन्धिया दोनों की संयुक्त सेना को पराजित कर दिया। अब सिन्धिया विवश थे उधर पेशवा ने अंग्रेजों से सन्धि कर ली जिसके प्रयास मंे अंगेज बेलजली बहुत पहले से ही लगा हुआ था। चेतसिंह विजयगढ़ से भाग कर महादजी सिन्धिया से सलाह मशविरा कर एक बड़ी सेना का संगठन करना चाहते थे पर जब पेशवा ने अंग्रेजों से सन्धि कर ली फिर तो उनके पास कोई विकल्प न था। महादजी सिन्धिया तथा भोसले दोनों को अंग्रेज 1803 में पराजित कर देते हैं तथा इनके अलावा दूसरे मराठा सामन्त गायकवाड व होल्कर दोनों इस युद्ध के प्रति उदासीन बने रहते हैं। महादजी सिन्धिया ने भी विवश होकर 1803 में अंग्रेजों से सन्धि कर ली तथा सन्धि के अनुसार सिन्धिया को गंगा व यमुना का पूरा क्षेत्रा अंग्रेजों के लिए छोड़ना पड़ा। चेतसिंह के पास समकालीन ऐतिहासिक परिवेश में कोई राजनीतिक विकल्प न था। 1803 में सिन्धिया द्वारा अंग्रेजों से सन्धि किया जाना चेतसिंह के लिए काफी दुखद था। 1803 के आस पास अंग्रेजों ने उत्तर भारत के अलीगढ़ दिल्ली व आगरा पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। चेत सिंह की रणनीति थी कि मराठों से मिलकर तथा अवध के नवाब के साथ सन्धि करके अंग्रेजों पर हमला किया जाये पर अंग्रेज हर तरफ से जीत रहे थे। अन्ततः 1811 में चेतसिंह की मृत्यु हो जाती है। बनारस का राज अंग्रेजों की अनुकंपा से महीपनारायण सिंह के नेतृत्व में चलने लगता है। फलस्वरूप पूरा जनपद मीरजापुर, सोनभद्र के साथ उनके नियंत्राण में चला जाता है और सोनभद्र की अगोरी, बिजयगढ़ तथा बड़हर की राजव्यवस्था पहले की तरह चलने लगती है बनारस राज के अधीन। राजा महीपनारायण सिंह को अंग्रेज नाममात्रा का राज प्रमुख नियुक्त करते हैं क्योंकि पूरा प्रशासनिक दायित्व उनके पिता दुर्ग विजय सिह पर रहता है। राजा पर चालीस लाख रूपये सालना का राजस्व
निर्धारित किया गया था कि वे कपनी को देंगे। राजा के पास केवल राजस्व संग्रह
का ही काम था तथा इसके लिए भी एक नायब तथा अंग्रेज रेजिडेन्ट को नियुक्त
किया गया था। इस प्रकार बनारस का पूरा प्रशासन अंग्रेजों के अधीन हो गया था।
वारेन हेस्टिंग्स ने राजा के लिए कुछ जागीरें छोड़ दी थीं जहां राजा को दीवानी
अधिकार मिला हुआ था बाद में महीपनारायण सिंह के उत्तराधिकारी उदितनारायण
सिंह ने अंग्रेजांे को मिलाकर पर्याप्त अधिकार 1826 तक हासिल कर लिया।
1830 तक मीरजापुर बनारस का ही हिस्सा था पर 1830 में इसे एक अलग
राजस्व जिला की मान्यता प्रदान हो जाती है। अलग राजस्व प्रशासन की स्थापना के
कारण हालांकि कुछ छोटे-मोटे विरोध होते हैं पर वे उल्लेखनीय नहीं थे। वैसे भी
मीरजापुर व सोनभद्र के लोग बनारस से अलग तरह की व्यवस्था चाहते थे जो संभव
नहीं था। सोनभद्र व मीरजापुर की रियासतें कुछ कुछ बनारस के अधीन तो बहुत
कुछ अंग्रेजों के अधीन लेकिन रियासतें वही स्थापित हुई जो जिन्हें बलवन्त सिंह ने
विस्थापित कर दिया था। बनारस से अलग हो जाने के बाद भी 1830 से लेकर
1857 के पहले तक सोनभद्र में कोई उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं होता। 1830 के
पहले 3 अक्टूबर 1788 को गवर्नर जनरल की कौसिल द्वारा राजस्व एवं भूमि-
प्रबंधन के लिए एक प्रस्ताव स्वीकृत किया जाता है जिसे डक्कन ने 1788-89 या
1396 फसली में लागू करवाया था।
1857 यानिआजादी की ओर बढ़ते कदम 1857 के प्रथम स्वतंत्राता संघर्ष का दौर मीरजापुर व सोनभद्र के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण रहा है। संयुक्त मीरजापुर में क्रान्तिकारियों के जत्थे बिना किसी भय के अंग्रेजी सरकार के खिलाफ उठ खड़े हुए थे। 1857 के समय मीरजापुर के प्रशासन के लिए जिले में शान्ति-व्यवस्था बनाए रखना अत्यन्त कठिन कार्य था। मीरजापुर व राबर्ट्सगंज के व्यापारी समुदाय के लोग भी स्वतंत्राता सेनानियों के साथ एक-जुट हो गए थे। 1857 के समय मीरजापुर के जिला-मजिस्ट्ेट जार्ज टक्कर थे। उस समय टंेजरी में महज दो लाख रूपये थे जिसकी सुरक्षा के लिए फिरोजपुर रेजिमेन्ट के सिखों को नियुक्त किया गया था। जिले में मेरठ व दिल्ली के विद्रोहों की सूचना 19 मई को आग की तरह फैल गई। प्रशासन की तरफ से पूरे जिले मे सख्त पहरे लगा दिए गए तथा आवश्यक जगहों पर प्रशासननिक अवरोध खड़े कर दिये गए जिससे बाहरी स्वतंत्राता संग्राम सेनानियों का जिले में प्रवेश करना असंभव हो जाये। मेरठ तथा दिल्ली के विद्रोहों की सूचना तो थी ही इसी के साथ बनारस जौनपुर के विद्रोहों की भी सूचना पूरे जिले को उत्तेजित व आवेशित कर गई थी। 6 जून 1857 के समय मीरजापुर में सर्वत्रा स्वतंत्राता सेनानियों की धमक फैल चुकी थी तथा प्रशासन शान्ति-व्यवस्था की स्थापना के लिए हर तरह की आक्रामक व दमनकारी कार्यवाहियों करने पर उतारू
हो गया था। प्रशासन की तरफ से सैतालीसवीं बटालियन को भी सुरक्षा में लगाया गया था, उसके साथ टंेजरी का साठ हजार रूपये भी हलाहाबाद भेज दिया गया। सुरक्षा गार्डो को हिदायत दी गई कि वे अपने साथ अधिक कारतूस तथा हथियार न ले जायें क्योंकि उसे छीने जाने की संभावना बढ़ चुकी थी। सावधानी के तौर पर प्रशासन द्वारा सारे हथियार व कारतूस अंग्रेज कोलोनल पाट के आदेश से नदी में फेंक कर नष्ट कर दिए गए। बाकी खजाने को बनारस स्थान्तरित कर दिया गया। उस समय नदी का रास्ते या रोड के रास्ते कत्तई सुरक्षित नहीं थे। हर तरफ स्वतंत्राता के लड़ाकू दौड़ रहे थे तथा प्रशासन को चोटिल तथा आहत करने के प्रयासों में थे। अकोढ़ी के सशस्त्रा ठाकुरों ने मीरजापुर के सरकारी काम-काज को बाधित करने की कसमें खा रखी थीं। अकोढ़ी की तरह मांडा के ठाकुर भी विद्रोह पर उतारू थे तथा प्रशासन के काम-काज को बाधित कर रहे थे। मीरजापुर के इतिहास में 10 जून 1857 का दिन बहुत महत्वपूर्ण है। उसी दिन हजारों स्वतंत्राता संग्राम सेनानियों का दिल-दिमाग प्रशासन की दमनकारी नीतियों के कारण इतना आक्रमक हो गया कि पूर्वी रेलवे के सारे सामानों को नष्ट कर दिया गया। उस समय रेलवे का कार्य निर्माणधीन था। स्वतंत्राता संग्राम सेनानियों ने रेलवे के सामानों को दिन के साफ उजाले में नष्ट किया तथा लगातार नारा लगाते रहे कि हम आजाद हैं,‘स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है’। अंग्रेज अधिकारियों ने हजारों लोगों के इस शान्तिपूर्ण प्रदर्शन को स्थागित व दमित करने के लिए प्रदर्शनकारियों के नेतृत्व के 27 लोगों को गिरफ्तार कर लिया फिर तो प्रदर्शनकारियों की भीड़ हिंसक हो गई तथा रेलवे के सारे सामानों को देखते-देखते नष्ट कर दिया। मीरजापुर के लोगों ने स्वतंत्राता के लिए जो प्रयास किया वह इतिहास में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां के लोग सारा कुछ शान्तिपूर्ण ढंग से कर रहे थे तथा स्वतंत्राता प्राप्ति उनका निर्णायक लक्ष्य था। शान्तिप्रिय प्रदर्शनकारियों की जबरिया गिरफ्तारी ने यहां के लोगों की शान्ति-प्रियता को छिन्न-भिन्न कर दिया था। स्वतंत्राता संग्राम के जंग-जूओं में खतरनाक उत्तेजना फैल गई कि हर हाल में अंग्रेज अधिकारियों को परेशान करना है। स्वतंत्राता संग्राम के सेनानियों को कहीं से सूचना मिली कि अंग्रेजी सेना मीरजापुर में प्रवेश करने वाली है तथा उसे स्वतंत्राता के आकांक्षियों का दमन करने लिए बुलाया गया है फिर तो स्वतंत्राता के रक्षकों ने पूरी तरह क्रान्तिकारी निर्णय ले लिया। पुराने पोस्ट आफिस के बगल में देखते-देखते भयानक खाईं खोद दी गई पर अंग्रेजी सेना मीरजापुर में नहीं आई। बाद में प्रशासन काफी गंभीर हो गया तथा चुन-चुन कर स्वतंत्राता रक्षकों को फौजदारी की घृणित धाराओं मंे गिरफ्तार करने लगा। गौरा गांव के ठाकुरों द्वारा नदी व रोड दोनों तरफ से जिस भांति अंग्रेज अधिकारियों की नाके-बन्दी की गई वह महत्वपूर्ण है। गौरा गॉव के ठाकुरों ने अंग्रेजों को मीरजापुर से इलाहाबाद के लिए निकलना मुश्किल कर दिया। गौरा ही नहीं
भरपूरा व पहाड़ा के लोगों ने भी मीरजापुर से बनारस तक के रास्ते को बाधित कर
दिया। गौरा के लोगों ने बाकायदा अपना मुख्यालय रामनगर सीकरी में बनाया तथा
खुले-आम अंग्रेजों के आवागमन पर पाबन्दी लगा दी। 22 जून को गौरा के स्वतंत्राता
रक्षकों ने अंग्रेजों पर हमला किया लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। अंग्रेजों की भारी
सैनिक व पुलिसिया शक्ति से हमले को दमित कर दिया गया। इस प्रकार गंगा नदी
का दक्षिणी किनारा व इलाहाबाद के रास्ते को अंग्रेजों ने गौरा के स्वतंत्राता रक्षकों से
मुक्त करा लिया।
गंगा नदी का बायां किनारा भी उस समय सुरक्षित न था। भदोही के मौनस
राजपूतों ने वहां संगठित होकर अंग्रेज अधिकारियों के आवागमन को रोक दिया था।
वहां का विद्रोह मौनस राजपूत अदावत सिंह के नेतृत्व में चल रहा था। उनके बारे
में पहले से ही ज्ञात था कि अदावत सिंह स्वघोषित राजा हैं तथा किसी की अधीनता
उन्हंे स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने ग्राण्ड टंक रोड को बाधित कर दिया था। बनारस के
राजा के किसी एजेन्ट ने अंग्रेजों के सहयोग से मौनसों के मुखिया अदावत सिंह तथा
उनके दीवान को गिरफ्तार कर लिया। उन्हें तत्काल फांसी पर लटका दिया गया।
मुखिया की विधवा ने तत्कालीन मजिस्टेट मूर का सिर मांगा था यह एक अत्यन्त
नाटकीय उत्तेजना थी क्योंकि मूर ने ही मौनसों के मुखिया को फांसी पर लटकवाया
था। मूर चार जुलाई 1857 को तमाम गिरफ्तार किये गए लोगों के मुकदमों की
सुनावाई पाली फैक्टरी में कर रहा था। उसी दिन झूरी सिंह राजा के रिश्तेदार ने हजारों
स्वतंत्राता रक्षकों के सहयोग से मूर को घेर लिया तथा मूर के साथ फैक्टंी के दो अंग्रेज
प्रबन्धकों को भी मार गिराया। मूर के सिर को राजा अदावत सिंह की विधवा के
सामने रखा गया। लगभग दो साल बाद झूरी सिंह को गिरफ्तार किया गया तथा
फांसी पर चढ़ा दिया गया। इस प्रकार क्रान्तिकारी अदावत सिंह व झूरी सिंह की हत्या
कर अंग्रेजों ने किसी तरह जिले पर नियंत्राण स्थापित किया।
बिजयगढ़ के राजा लक्ष्मण सिंह और
1857 का मुक्ति संग्राम
अगस्त के महीने में सूचना फैली कि दीनापुर के स्वतंत्राता रक्षक राबर्ट्सगंज,
शाहगंज होते हुए मीरजापुर से इलाहाबाद के लिए प्रस्थान करेंगे। प्रश्शासनिक
तैयारियां पूर्ण की जाने लगीं तभी खबर आई कि वे लोग इलाहाबाद के लिए प्रस्थान
कर चुके हैं। इसके बाद सूचना मिली कि हजारी बाग के स्वतंत्राता रक्षकांे की एक
टोली मीरजापुर में प्रवेश करने वाली है। अंग्रेजों ने उन्हें सोन नदी पर ही रोक दिया
तथा वे लोग फिर सिंगरौली होते हुए रींवा की तरफ चले गए।
मीरजापुर तथा सोनभद्र के इतिहास में झूरी सिंह व अदावत सिंह के विद्रोह के
बाद शाहाबाद के स्वतंत्राता रक्षक वीर कुअर सिंह का रामगढ में आना सबसे महत्वपूर्ण
घटना है। कॅुअर सिंह के रामगढ़ में आने के बाद मीरजापुर का दक्षिणांचल आज का सोनभद्र स्वतंत्राता प्राप्ति की छट-पटाहट में उछलने लगा। 24 अगस्त 1857 का दिन सोनभद्र के रामगढ़1⁄4 बिजयगढ़ राज1⁄2 के लिए तथा पूरे सोनभद्र के लिए स्वतंत्राता प्राप्ति का एक सपना था तथा उस दिन के बाद से पूरा सोनभद्र जो पहले सुप्त पड़ा था, जाग उठा। हर तरफ स्वतंत्राता रक्षक अपने सीमित साधनों के साथ स्वतंत्राता संघर्ष के पक्ष मंे उठ खड़े हुए। सोनभद्र में कुॅअर सिंह लगातार पांच दिन तक प्रवास करते हैं तथा रावटर््सगंज, शाहगंज, घोरावल होते हुए 29 अगस्त को स्पतंत्राता संघर्ष अभियान के लिए इलाहाबाद की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। वैसे कॅुअर सिंह को रींवा जाना था पर सुरक्षा कारणों से वे इलाहाबाद के लिए प्रस्थान करते हैं। कॅुअर सिंह के रामगढ़ आगमन से पूरा विजयगढ़, स्वतंत्राता प्राप्ति की शाश्वत उत्तेजना से ओत-प्रोत हो गया। फिर तो विजयगढ़ वासियों के लिए अंग्रेज राक्षस जैसे दिखने लगे। विजयगढ़ जो कभी अहिंसा का पुजारी था आक्रामक हो उठा, हर तरफ मारो-काटो की जिदंे फैल र्गइं। विजयगढ़ के बाबू लक्ष्मण सिंह के नेतृत्व में चन्देल राजपूत तथा अन्य राजपूत स्वतंत्राता रक्षकों की मशाल लेकर संगठित होने लगे तथा सासाराम से आने वाले स्वतंत्राता रक्षकांे की बाट जोहने लगे। कुॅअर सिंह ने स्वतंत्राता प्राप्ति के लिये सेना के गठन की योजना बनाया था तथा रामगढ़ 1⁄4विजयगढ़1⁄2 से सैनिकों को वहां जाना था। लक्ष्मण सिंह ने कुॅअर सिंह को सहयोग देने का वादा किया था। विजयगढ़ की पूरी राज-व्यवस्था लक्ष्मण सिंह ने अपने अधीन कर लिया था, अंग्रेजों के विरोध में उठ खड़े हुए थे तथा अंग्रेजों का राजस्व देना बन्द कर दिया था। श्रुति है कि उन्होंने तत्कालीन अंग्रेजी तहसीलदार को छह महीने तक बन्दी बना लिया था और खुद को स्वतंत्रा घोषित कर लिया था। बाबू लक्ष्मण सिंह का दमन करने के लिए अंग्रेज कलक्टर टक्कर जनवरी 1858 में विजयगढ़ आया। उस समय सारे स्वतंत्राता रक्षक रोहतास के जंगल में अपना कैम्प डाले हुए थे। टक्कर ने 9 जनवरी 1858 को लक्ष्मण सिंह पर पर हमला किया। उस हमले में अनेक स्वतंत्राता रक्षक मारे गए तथा बहुत पकड़े गए जिन्हें बाद में फांसी पर लटका दिया गया। विजयगढ़ के स्वतंत्राता रक्षकों के महत्वपूर्ण नेता रींवा की तरफ भाग निकले। उन लोगों ने रींवा की तरफ से एक बार फिर स्वतंत्राता संघर्ष किया पर वह सफल न हो सका। पूरे जिले में लक्ष्मण सिंह के अंग्रेजी विरोध की घटना महत्वपूर्ण थी और चर्चित भी। क्योंकि मौनस सामन्तों के अलावा दूसरे चन्देल गहरवार या बेन वंशी सामन्त अंग्रेजों के विरोध में उस समय नहीं थे। विजयगढ़ के चन्देल तथा भदोही के मौनसों ने स्वतंत्राता संघर्ष में हिस्सा लेकर सोनभद्र व मीरजापुर के हजार साल के अतीत को नये वैचारिक पृष्ठ-भूमि में समझने का अवसर प्रदान कर दिया था। 1857 के स्वतंत्राता संघर्ष का व्यापक प्रभाव भारत के हर क्षेत्रा पर समान रूप से पड़ा था। 1857 के एक साल पहले 1856 में अंग्रेजों ने अवध की नवाबी हड़प लिया था। फलस्वरूप पूरा अवध तथा अवध की बेगम हजरत महल ने भी
स्वतंत्राता संघर्ष में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था तथा झांसी की रानी, नाना साहब, राजा
बेनी माधव सिंह, अजीमुल्ला, बख्त खॉ जैसे लोगों ने भी विद्रोह कर दिया था। इस
तरह के विद्रोहों की चर्चा पूरे देश में थी तथा इसका व्यापक प्रभाव बिजयगढ़ पर भी
पड़ा था। विजयगढ़ के चन्देल लक्ष्मण सिंह तथा भदोही के मौनस अदावत सिंह व
झूरी सिंह क्रांतिकारी रास्ते पर बढ़ निकले थे। यह भी सच है कि अंग्रेजों ने 1857
के विद्रोह को बहुत ही सख्ती व क्रूरता के साथ दमित कर दिया था फलस्वरूप
स्वतंत्राता प्राप्ति की चाहना पूरे भारतवासियों के लिए आवश्यक मांग बन गई थी।
सोनभद्र के लिए लक्ष्मण सिंह का अंग्रेजों के विरोध में उठ खड़ा होना सर्वथा एक
नई बात थी अब तक माना यही जाता था कि राजवंश के लोग अंग्रेजों से या अपने
से मजबूतों से विरोध नहीं किया करते थे। राजवंश के लोगों का प्रत्यक्ष विरोध देखकर
विजयगढ़ की जनता भी आवेशित हो उठी तथा हजारों लोग लक्ष्मण सिंह के साथ
चल निकले। स्थानीय दन्त कथा के अनुसार टक्कर ने लक्ष्मण सिंह को तथा उनके
सैकड़ों समर्थकों को गोली से भुनवा डाला था। इस प्रकार विजयगढ़ की जनता को
पूरे मीरजापुर में सबसे गंभीर क्षति उठानी पड़ी थी।
सॉसत में अंग्रेज तथा उनका राज-प्रबन्धन
1857 का विद्रोह अंग्रेजों के लिए एक सबक था। अंग्रेजों ने महसूस कर लिया
था कि भारत में लम्बे समय तक अंग्रेजी राज चलाना आसान नहीं रह गया है सो
अंग्रेजों ने पुराने कड़े कानूनों को शिथिल करने के अलावा सुधार व विकास के कार्यो
पर भी ध्यान देना प्रारंभ कर दिया। फिर भी अंग्रेजों की लुटेरी नीति का व्यापक प्रभाव
मीरजापुर व सोनभद्र पर पड़ा था। वैसे देश भर में छितराए स्वतंत्राता रक्षकों के लिए
1857 का विद्रोह एक विचारश्शील पाठ बन चुका था कि देश की स्वतंत्राता पाने के
लिए किसी मजबूत संगठन की आवश्यकता है जिससे कि स्वतंत्राता प्राप्ति की
जनतांत्रिक लड़ाई को मजबूती से लड़ा जा सके। इस सन्दर्भ मंे अच्छी बात मीरजापुर
में यह हुई कि 1890 व 1895 के मध्य मीरजापुर में कांग्रेस कमेटी की इकाई का
गठन हो गया। इस कमेटी के गठन के बाद मीरजापुर जनपद में स्वतंत्राता प्राप्ति की
चेतना व जागरूकता का प्रचार प्रसार होने लगा तथा पूरे जनपद में स्वतंत्राता रक्षकों
की इकाइयां बनाई जाने लगीं। 1905 में कांग्रेस का एक अधिवेशन बनारस में हुआ।
बनारस का अधिवेशन गोपाल कृष्ण गोखले की अध्यक्षता में आयोजित किया गया
था। इस अधिवेशन में बाल गंगाधर तिलक लाला लाजपत राय तथा मदनमोहन
मालवीय ने भाग लिया। इस प्रकार बनारस का अधिवेशन पूरे पूर्वाचल के लिए एक
आन्दोलन की तरह था जिसका व्यापक प्रभाव मीरजापुर पर भी पड़ा। मीरजापुर की
कमेटी के लोगों ने संगठन का प्रचार-प्रसार काफी तेज कर दिया वैसे भी 1905 तक
कांग्रेस पार्टी में इस जनपद की छवि बहुत ही अच्छी बन गई थी। उपेन्द्रनाथ बनर्जी
तथा बैरिस्टर युसूफ इमाम के कारण जनपद मीरजापुर स्वतंत्राता प्राप्ति के संघर्षों में
बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने लगा था। स्थानीय कांग्रेस पार्टी की अध्यक्षता उपेन्द्रनाथ बनर्जी जैसे समर्पित नेता को सौपी गई। 1910 तक पूरा जनपद कांग्रेस पार्टी के सहयोग में उठ खड़ा हुआ था। महात्मा गांधी ने 1921 में असहयोग व सविनय अवज्ञा आन्दोलन का प्रारम्भ पूरे भारत में कर दिया था। महात्मा गांधी ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की भी घोषणा की थी जिसके कारण मीरजापुर में भी हजारों लोग सड़क पर निकल आए तथा उन दुकानों का घेराव भी किया जहां विदेशी वस्तुएं बिकती थीं। सविनय अवज्ञा आन्दोलन तत्कालीन राजनीतिक वातावरण में एक अभिनव प्रयोग था। यथार्थ में गांन्धी जी महसूसते थे कि हमारा सहयोग ही अंग्रेजों को भारत पर काबिज होने में मददगार रहा है। गांधी दूरदर्शी थे तथा हजारों साल की भारतीय गुलामी के इतिहास ने उन्हें सिखा दिया था कि बिना भारतीयों के सहयोग से न तो कुतुबुद्दीन ऐबक स्थापित हो सकता था, न ही अंग्रेज या अकबर, औरंगजेब। मुगल, तुर्क अफगान,अंग्रेज सभी ने भारतीयों की आपसी फूट का नाजायज लाभ उठाया था। कभी मराठा, अंग्रेजों का साथ दे रहा था तो कभी मुगलों का, अंग्रेजों ने दोनांे को प्रताड़ित व दमित किया। ऐसी स्थिति में हमारा काम होना चाहिए अंग्रेजों से असहयोग करना तथा जब असहयोग की धारणा नीचे से ऊपर तक यानि पूरी जनता में आ जाएगी फिर किसी भी तरह से अंग्रेज भारत में नहीं रह सकता। मीरजापुर में कांग्रेस के बढ़ते प्रभाव को दबाने के लिए अंग्रेजों ने कांग्रेस कार्यालय को घेर लिया तथा उसे सीज कर दिया। वहां से प्राप्त रजिस्टर के आधार पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां की गईं। इस क्रम में उपेन्द्रनाथ बनर्जी तथा युसूफ इमाम को भी गिरफ्तार कर लिया गया। उस समय मीरजापुर में स्थापित स्कूलों में एक का नाम था ‘लन्दन मिशन स्कूल’ तथा दूसरे का नाम था सरकारी विघालय बरियाघाट जहां अंग्रेजी में पढ़ाई कराई जाती थी। स्वतंत्राता की भावना से ओत-प्रोत तमाम छात्रों ने अंग्रेजों के इन स्कूलों का बहिष्कार कर दिया इस कारण से कुछ महत्वपूर्ण छात्रों को गिरफ्तार भी कर लिया गया। जनपद में युवकों ने अपना एक अलग संगठन भी बना लिया था। व्यापारियों तथा औरतों ने भी संगठन के कार्यो में भाग लेना प्रारंभ कर दिया था। 19 फरवरी 1922 को रावटर््सगंज में व्यवसायियों की एक सभा आयोजित की गई तथा सभा में निर्णय लिया गया कि अंग्रेज अधिकारियों को रावटर््सगंज आने पर खाने-पीने का कोई सामान नहीं दिया जाएगा। जनपद का सारा आन्दोलन उस दिन स्थगित हो गया जिस दिन चौरा-चौरा की घटना के बाद गांधी जी ने आन्दोलन को वापस ले लिया। इस आन्दोलन के दौरान 38 लोगों को गिरफ्तार किया गया था पर इन गिरफ्तारियांे का जनता पर उतना व्यापक प्रभाव नहीं पड़ता था जितना कि हड़तालों, जुलूसों व प्रदर्शनों का। दर असल हजारों साल से गुम-सुम बैठी जनता के लिए हड़ताल के नारे जुलुसों के उत्साह तथा प्रदर्शनों के साहस किसी विस्मयकारी परिघटना से कम न थे। जनता कौतुक में थी तथा अपनी
कमजोरियों को परीक्षित कर रही थी कि अन्याय का विरोध किया ही जाना चाहिए।
1922 के आस-पास का सोनभद्र तथा मीरजापुर, जनतात्रिक अधिकारों तथा उनकी
प्राप्ति के लिए किए जाने वाले विरोधों के प्रति सर्वथा अनभिज्ञ था। उस काल में
विरोध का मतलब होता था हमला या सशस्त्रा संघर्ष, शान्तिपूर्ण ढंग से भी किसी
अन्यायी व्यवस्था का विरोध किया जा सकता है यह वैचारिक स्तर पर पहले स्वीकार्य
नहीं था, कमो-वेश आज भी शान्तिपूर्ण जनतांत्रिक विरोध का मुद्दा कुछ
कथितअतिबादियांे के लिए हारे हुए लोगों का काम जान पड़ता है।
मीरजापुर व सोनभद्र पर बनारस के कांग्रेसी कार्यक्रमों का प्रभाव काफी व्यापक
स्तर पर पड़ता था। बनारस में उस समय देश स्तर के स्वतंत्राता संग्राम सेनानी थे।
पंडित मदन मोहन मालवीय, भगवान दास तथा शिवप्रसाद गुप्त स्वतंत्राता की लड़ाई
में शीर्ष पर थे। इन लोगों के प्रभाव से बनारस में अंग्रेजों सरकार से असहयोग का
आन्दोलन तेजी पर था। मीरजापुर व सोनभद्र भी बनारस से प्रभावित होकर आवेशित
था।
असहयोग आन्दोलन का प्रभाव इतना पड़ा कि अंग्रेजों ने साइमन कमीशन की
स्थापना कर दी। अंग्रेजों की यह एक अदूरदर्शी दमनात्मक रणनीति थी। असहयोग
आन्दोलन स्थगित हो जाने के बाद थोड़ी सी स्थिरता आई थी तथा जन-आवेश ठंडा
हुआ था, उसमंे साइमन कमीशन ने जलती आग में घी का काम किया। 3 फरवरी
1928 जिस दिन कमीशन को भारत में आना था उस दिन भारत भर में हड़ताल
स्वस्फूर्त ढंग से आयोजित हो गई। मीरजापुर व सोनभद्र भी अप्रभावित नहीं रहा।
मीरजापुर में साइमन कमीशन के विरोध में एक बहुत बड़ा जुलूस निकाला गया जो
मीरजापुर की गलियों से गुजरता हुआ एक जगह आम सभा में तब्दील हो गया।
जुलूस में लोग काला झन्डा लिए हुए थे तथा ‘साइमन वापस जाओ’ का नारा लगा
रहे थे। इसके तत्काल बाद ही गांधी जी तथा जवाहर लाल नेहरू मीरजापुर आए।
4 मार्च 1929 को जवाहर लाल नेहरू की एक सभा चुनार में आयोजित की गई।
इस सभा को नरेन्द्र देव तथा श्री प्रकाश ने संबोधित किया था। इस सभा के कारण
मीरजापुर में स्वतंत्राता प्राप्ति के लिए जागरूकता व सक्रियता दोनों में तीव्रता आई।
आठ महीने बाद 19 नवम्बर 1929 को गांधी जी का मीरजापुर रेलवे स्टेशन पर
जोरदार स्वागत किया गया। स्वागत करने वालों में कागं्रेस व दूसरे हजारों स्वतंत्राता
प्रेमी नागरिक थे। वहीं पर गांधी जी की एक आम-सभा भी हुई जिसमें लगभग दस
हजार की जनता उपस्थित थी। गांधी जी को छह हजार से अधिक रूपयों की भंेट
भी दी गई। 1930 के कांग्रेस कार्यालय के साथ कदम मिला कर चलने के लिए
जनता का गांधी जी ने सभा में आववान किया तथा साइमन कमीशन का सार्थक
विरोध करने के लिए मीरजापुर की जनता को धन्यवाद दिया। दोपहर बाद गांधी जी
ने चुनार में एक सभा किया। चुनार की सभा में गांधी जी ने मीरजापुर की बातें दुहराई
तथा वहां उन्हंे पांच सौ रूपये भंेट किए गए।
कांग्रेस द्वारा असहयोग एवं सविनय अवज्ञा आन्दोलन 1929 में ही दुबारा प्रारंभ कर दिया गया था। गांधी जी ने 6 अप्रैल 1930 को नमक कानून का उलंघन डांडी में करके सविनय अवज्ञा तथा असहयोग आन्दोलन का प्रारंभ कर दिया था जिसका तात्कालिक प्रभाव मीरजापुर पर भी पड़ा। सभी तहसीलों में संघर्ष समितियों का गठन किया गया तथा उन्हें नमक कानून तोड़ने के लिए प्रेरित किया जाने लगा। कांग्रेस के प्रभावी नेता जे.एन.विल्सन ने नमक कानून तोड़ने के कार्यक्रम का नेतृत्व मीरजापुर में किया। नमक बनाने का काम चील्ह, विन्ध्यचल, चुनार में प्रारंभ कर दिया गया। जून 1930 में मीरजापुर में भी नमक बनाया जाने लगा। मीरजापुर में नमक बनाने के साथ-साथ विदेशी सामानों के बहिष्कार का मामला काफी जोरदार ढंग से आन्दोलन का हिस्सा बन गया तथा इस आन्दोलन के साथ जनता की भागीदारी भी आशापूर्ण थी। अंग्रेजी स्कूलों तथा अंग्रेजी शिक्षा का विरोध व बहिष्कार ये दोनों ऐसे ठोस व मनोवैज्ञानिक कार्यक्रम थे जिससे जनता काफी प्रभावित हुई तथा अंग्रेजों के प्रति घृणा से भर गई। 12 अपै्रल 1931 को हंसापुर में किसानों ने एक विशाल सभा का आयोजन किया तथा सभा ने निर्णय लिया कि लगान की अदायगी घटे हुए दर पर ही की जाएगी। उसी साल अंग्रेजी सरकार ने लगान की दरें बढ़ा दिया था। भगत सिंह को फांसी तथा मोती लाल नेहरू की मृत्यु पर मीरजापुर की एक सभा में शोक प्रस्ताव पास किया गया। सभा को टी.ए.के. सेरवानी ने संबोधित किया। 8 मई को पुरूषोत्तम दांस टंडन की सभा मीरजापुर में आयोजित की गई जिसमें लगभग छह हजार जनता उपस्थित थी। इस सभा में मदन मोहन मालवीय भी उपस्थित थे। सभा का मुख्य उद्देश्य था हर उस कार्यक्रम तथा उस कानून का जोरदार विरोध करना जो भारत को पूर्ण स्वतंत्राता देने के खिलाफ हो। सभा में मांग की गई कि हमें पूरी आजादी चाहिए खंण्डित नहीं, पूर्ण स्व-शासन, विदेशी मामला, सेना, अर्थ एवं वित्त सारा कुछ हमारा अपना होगा कुछ भी विदेशी नहीं। मीरजापुर की इस सभा की घोषणायें आने वाले दिनों में पूरे देश की मांग बन गईं। इसी सभा में सम्पूर्णनन्द जी द्वारा सम्पूर्ण अधिकार का राजनीतिक प्रस्ताव रखा गया जो सर्वसम्मत से स्वीकृत हो गया। एक प्रस्ताव किसानों की कठिनाइयों के बाबत भी पास किया गया जिसमें लगान घटाने की बात को मंजूरी दी गई तथा लगान के जन-हित कारी निर्धारण के लिए पुनर्निरीक्षण की मांग की गई। मीरजापुर का प्रशासन कांग्रेस के स्वतंत्राता रक्षकों से इतना घबरा गया कि सैकड़ों लोगों को सजा सुना दिया तथा कइयों पर जुर्माना लाद दिया। जिला प्रशासन ने कूर दमन का सहारा लेकर आजादी के संघर्ष को दबाना चाहा था परन्तु परिणाम उल्टा निकला। जनता प्रशासन की प्रतिक्रिया में अपना अखबार निकालने लगी रणभेरी नामक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ हो गया। वह कहां से छपता था तथा कौन छापता था बहुत प्रयास करने के बाद भी प्रशासन को जानकारी नहीं मिल सकी। रणभेरी
का प्रकाशन लगातार चार साल तक चलता रहा। असहयोग आन्दोलन भी बिना
किसी बाहरी उत्प्रेरणा के स्वस्फूर्त ढंग से लगातार मई 1934 तक चलता रहा। यह
तभी समाप्त हुआ जब गांधी जी ने विधान-सभाओं में कांग्रेस के लोगों का जाना
स्वीकार कर लिया तथा उसे स्थगित कर दिया।
18 जुलाई तथा 22 जुलाई 1934 को गांधी जी का रेलवे स्टेशन पर जोरदार
स्वागत किया गया जब वे कानपुर की यात्रा पर थे। स्टेशन पर लगभग पांच हजार
लोगों ने गांधी जी का स्वागत किया। 1937 के सामान्य चुनाव में जिले ने भागीदारी
किया। इस चुनाव के माध्यम से कांग्रेस का प्रभाव जनता में व्यापक हुआ। आजादी
की चाहना का घर घर प्रचार हुआ। इस चुनाव में औरतों ने भी बढ़-चढ़ कर भागीदारी
निभाया। 1939 के विश्व युद्ध में भारत के भागीदारी के सवाल पर प्रदेश की जनता
द्वारा निर्वाचित कांग्रेसी सरकार ने इस्तीफा दे दिया। कांग्रेस ने विश्वयुद्ध में भारतीय
सैनिकों के शामिल होने का विरोध किया था। कांग्रेस द्वारा सरकार से इस्तीफा दे
देने के बाद विश्व-युद्ध के लिए एकत्रा किये जाने वाले धन-सग्रह के कार्यक्रम का
विरोध जनता स्वतः करने लगी। मीरजापुर में अंग्रेजी सल्तनत का विरोध तेजी से
प्रारंभ हो गया। इस सन्दर्भ में सैकड़ों जन-सभाएं आयोजित की गईं, हजारों पंफलेट
वितरित किए गए। 1941 आते-आते तक विरोध का रूप सत्याग्रह में तब्दील हो
गया। कांग्रेस कार्यकर्ता सत्याग्रह में बढ़-चढ़ कर भाग लेने लगे। जिले में लगभग
तीन सौ लोगों को गिरफ्तार किया गया तथा उन्हें जेल भेजा गया उनके ऊपर जेल
व जुर्माना दोनों सजाएं थोपी र्गइं। रफी अहमद किदवई ने मीरजापुर की एक सभा
में पहली बार सार्वजनिक रूप से विश्व-युद्ध की अंग्रेजी नीतियों के विरोध में भाषण
दिया तथा सुभाषचन्द्र बोस ने भी मीरजापुर आकर जनमत जगाने का काम किया।
कहा जाना चाहिए कि मीरजापुर जितना पिछड़ा जनपद था आन्दोलन के मुद्दे पर
कत्तई पिछड़ा न था। आजादी की लड़ाई में यदि मीरजापुर की भागीदारी महत्वपूर्ण
न होती तो कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता यहां कभी न आते। गांधी जी से लेकर मालवीय
जी तक सभी यहां आए तथा आन्दोलन के प्रति जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किये।
मीरजापुर भले ही अपनी आर्थिक परेश्शानियों से उलझा जनपद रहा हो पर देश की
एकता व अखंडता तथा स्वतंत्राता के लिए सदैव इसकी प्रतिबद्धताएं ऐतिहासिक
महत्व की रही हैं मीरजापुर के साथ सोनभद्र का अन्तर्सबंध तो था ही।
14 जुलाई 1942 को सारा देश चिल्लाने लगा था ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ फिर 7
अगस्त 1942 को कांग्रेस पार्टी ने पूर्ण संघर्ष का नारा दिया जिसका लक्ष्य सवर्था
अहिन्सात्मक था। गांधी जी के नेतृत्व में चला यह संघर्ष कई मायनों में पहले के
जन-संघर्षों से भिन्न था। 1857 के विद्रोह की तर्ज पर यह शान्तिपूर्ण प्रजातांत्रिक
विरोध था जिसमें निचले स्तर की जनता भी संघर्ष के साथ थी। 1857 के विद्रोह
की तरह नहीं कि उसमें मध्यम वर्गीय समूह हिस्सा ले रहा था जिनके विशेष अवसर
व सुविधाएं अंग्रेजों द्वारा छीन ली गई थीं। अंग्रेजों भारत छोड़ो किसी एक आदमी का
नारा नहीं था यह छोटे बड़े सभी का साहसपूर्ण नारा था क्योंकि जनता समझ चुकी थी कि अंग्रेज बाहरी हैं तथा बाहरी हमारे ऊपर शासन नहीं कर सकते। असहयोग व सविनय अवज्ञा आन्दोलन तथा सत्याग्रह ने जनता को पूरी तरह से मानसिक रूपसे तैयार कर दिया था कि वे साहस पूर्वक अंग्रेजों का विरोध कर सकते हैं। अग्रंेजों के कानूनों की अवज्ञा करते हुए अपने विवेक व अपनी तर्कणा का उपयोग अपने व देश हित में कर सकते हैं। असहयोग व सविनय अवज्ञा आन्दोलन के राजनीतिक अर्थों को उन्नीसवी सदी की दूसरी राजनीतिक स्थितियों के सन्दर्भ में तुलनात्मक ढंग से देखा जाय तो सारी दुनिया के उपनिवेशी देश अपनी स्वतंत्राता व संप्रभुता की लड़ाई लड़ रहे थे। उपनिवेशवादी साम्राज्य-शाहियां दुनिया के तमाम देशों पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर चुकी थीं। उस समय विरोध इन्हीं साम्राज्य-शाहियों के खिलाफ था। साम्राज्यवादी अंग्रेजी व्यवस्था तथा इसी के दूसरे समरूप देशांे ने दुनिया को पूंजी के रूप में रूपान्तरित करने का प्रयास तेज कर दिया था। इसी समय चर्च व राजसत्ता का षड़यंत्रापूर्ण गठ-जोड़ भी स्थापित हो जाता है तथा शासन व्यवस्था के लिए कठोर राजदण्डों का रवाका तैयार किया जाने लगता है। कहने को तो ब्रिटेन से राजशाही का मुकुट हट गया था तथा वहां सरकार की जिम्मेदारी जन-प्रतिनिधियों पर आ गई थी पर वह मात्रा मनोवैज्ञानिक सम्मोहन था। शासन-व्यवस्था की तांत्रिक साधना पद्धति राजशाही की ही कायम रही थी। राज्यों की कमजोर इच्छाशाक्ति के कारण शक्तिशाली तथा प्रभावशाली समाज की स्थापना के बजाय दुनिया में मुनाफा-खोरी, महाजनी, धोखाधड़ी, जाल-साजी जमाखोरी, सट्टेबाजी, रिश्वतखोरी अपराध और नैतिक पतन के बादल स्वतः हर तरफ मडराने लगे थे। ऐसे ही समय में फ्रान्स की तर्कशील जनता 1789 में महान क्रान्ति कर देती है तथा सामन्ती सत्ता व सामाजिक आर्थिक बर्बर ढांचे को धूल में मिला देती है। 1789 के बाद 1799 में जब नेपोलियन फ्रांस पर सत्तारूढ़ होता है ठीक उसके बाद ही पूंजीवादी व्यवस्था का कथित जनतांत्रिक रूप दमनकारी अर्थ-प्रबंधन के रूप में बदलने लगता है। स्वतंत्राता, समानता, भ्रातृत्व का नारा धूल में मिला दिया जाता है तथा पूंजी का समाज व पूंजी का राज्य कायम कर दिया जाता है। उन्नीसवीं सदी के मध्य मार्क्स व एन्जेल भी महसूस करने लगे थे कि पंूजीवादी पश्चिमी सत्ता-व्यवस्था ने पारिवारिक व मान्य सामाजिक व्यवस्था से भावुकता को हटाकर उनमें विनाशकारी प्रतियोगिता उत्पन्न कर मनोवैज्ञानिक रूप से सारे सामाजिक संबधांे को मात्रा द्रव्य 1⁄4पूंजी1⁄2 संबधों में तब्दील कर दिया है। मार्क्स, एंजिल ने पहली बार 1844 की ‘आर्थिक दार्र्शानिक पांडुलिपियां’ में द्रव्य-संबधों के विनाशकारी परिणामों के प्रति सारी दुनिया को आगाह किया था। इसके महज चार साल बाद ही कम्युनिस्ट पार्टी का प्रसिद्ध घोषणा पत्रा 1848 प्रकाश में आया। जिसमें मार्क्स ने पूंजी के उन सूत्रों को सूत्राबद्ध किया जिससे दुनिया को पूरी तरह गर्त में धकेलने का प्रयास किया जा रहा था। ऐसा उस समय
होता है जब लड़ाकू देश एक तरफा लड़ाईयों की तरफ बढ रहे थे तथा चाहते थे कि
दूसरा देश शक्तिशाली न होने पाये। आज के सन्दर्भ में अमेरिका की यही स्थिति
है। वह चाहे तो अफगानिस्तान पर हमला करे चाहे तो ईराक पर। इजराइल भी
फिलिस्तिीन पर हमला करके संयुक्त राष्टं के औचित्य पर सवाल खड़ा कर रहा है।
दरअसल कानून में सदा दोहरे मानदंड चला करते हैं। आज भी हम देख रहे है कि
कानूनों के दोहरे मानदंड के कारण तथा भाषा के लिए अर्थो के कारण एकतरफे हमले
किए जा रहे हैं तो दूसरी ओर दुनिया को बचाने की चिन्ता का प्रचार-प्रसार भी किया
जा रहा है। मार्क्स ने सीधे रूप से माना कि पूंजीवादी व्यवस्था ने मनुष्य के वैयक्तिक
मूल्य को ‘विनिमय मूल्य’ बना दिया है। इन्हीं स्थितियांे से संक्रमित तत्कालीन
दुनिया के परिवेश में गांधी को विचारना व समझना होता है तथा निर्णाय लेना होता
है क्या भारत सशस्त्रा क्रांति के जरिए आजाद हो सकता है?
जाहिर है कि गांधी ने सशस्त्रा क्रांति की जगह अहिन्सात्मक आन्दोलन का
सूत्रापात किया जो सारी दुनिया के लिए राजनीतिक सत्ता प्राप्तियों का सर्वथा नया
दर्शन था। असहयोग व अवज्ञा आन्दोलन तत्कालिक उपलब्धियों के सिद्धांत से
अलग दूरगामी उपलब्धियों पर आधारित थे जिसका संबध मन मस्तिष्क तथा मिजाज
से था। मन बदलेगा देश बदल जाएगा, तथा बन्दूकें सृष्टि का विकास नहीं कर
सकतीं। बन्दूकें सिर्फ कुछ लोगों को मार सकती हैं पर कभी विचार की हत्या नहीं
कर सकतीं। असहयोग व अवज्ञा आन्दोलन तथा सत्याग्रह के द्वारा देश स्तर पर
स्वतंत्राता प्राप्ति की अनिवार्यता की इच्छा-शक्ति विकसित करने के लिए गांधी जी
ने प्रयास किया था। गांधी जी जानते थे कि जब पृथ्वीराज की हत्या हो रही थी तब
जयचन्द खुशियां मना रहा था। परमार्दिदेव की पराजय के समय सोलंकी मौन थे।
राणाप्रताप जब अकबर से लड़ रहे थे तब दूसरे अकबर की चाटुकारिता में संलग्न
थे। इस प्रकार युद्ध के मुकम्मल अन्तरविरोधों को गांधी जी भली भांति समझ रहे थे
तथा जानते थे कि देश की भिन्न-भिन्न सांस्कृतिक स्थितियों में सबको बन्दूकी क्रांति
के लिए एकजुट कर पाना आसान ही नहीं असंभव है। रूस की महान क्रांति भी
हो चुकी थी वहां मेन्शेविक व बोलशेविक गुटों की घृणित प्रतिद्वन्दिता को गांधी युद्ध
संस्कृति की स्वाभाविक परणति मानते थे। असहयोग व सनिवय अवज्ञा आन्दोलन
ने जिस तरह से सोनभद्र को जागृत किया यह इतिहास के लिए एक जरूरी पाठ
है क्यांेकि पूरा सोनभद्र हजारों साल की नींद में था तथा कभी भी नींद से जागने की
इसकी इच्छाशक्ति नहीं थी। 1857 का विद्रोह सैनिक तथा सशस्त्रा था, वह संघर्ष
मध्यकाल की युद्ध-संस्कृति की तर्ज पर था सो वह सशस्त्रा संगठन की मांग करता
था। उस तरह का सक्षम लड़ाकू संगठन कुंअर सिंह, लक्ष्मीबाई, बेगम हजरत महल
लक्ष्मण सिंह आदि इकठ्ठा नहीं कर पाये फलस्वरूप अंग्रेजों ने उस संघर्ष को दमित
कर दिया। रामगढ़ विजयगढ़ के लक्ष्मण सिंह के साथ सैकड़ों स्वतंत्राता रक्षकों का
बलिदान इस तथ्य का गवाह है कि हिंसा के द्वारा सत्ता परिवर्तन की बात सुनिश्चित
नहीं की जा सकती। असहयोग आन्दोलन के सन्दर्भ में गजेटियर लिखता है... ष्डपत्रंचनत ूंे वदम व िजीम मंेजमतद कमेजपबजे व िन्जजंत च्तंकमेीएूीमतम जीम तिममकवउ उवअमउमदज जववा ं अमतल ेमतपवने जनतदण्श् वस्तुतः मीरजापुर के चारों तरफ सत्याग्रह का प्रारंभ हो गया। लोग बाग सड़कों पर निकल जाते,लेट जाते, धरना प्रदर्शन करते तथा प्रशासन के कार्यो को वाधित कर देते। नरायनपुर, कछवां, वैझा, सीखड़, कैलहट, गैपुरा, जिगिना, रामगढ़, परासी, रावटर््सगंज सभी जगहों पर सत्याग्रह प्रारंभ हो गया। सत्याग्रह पूरी तरह अहिंसात्मक रूप से चलने लगा। इसके लिए हर जगह टोलियां बनाई गईं तथा इसे सुबह से लेकर अधेरा होने तक संचालित किया जाता रहा। सत्याग्रह उन्हीं जगहों पर हिंसात्मक रूप में बदल जाता जहां प्रशासन की तरफ से कांग्रेस कार्यकर्ताओं को परेशान या प्रताड़ित किया जाता। अहरौरा बाजार में सत्याग्रहियों के शान्तिपूर्ण सत्याग्रह पर पुलिस ने 13 अगस्त 1942 को गोली चला दी, जिससे दो व्यक्ति घटना स्थल पर ही मारे गए तथा ढेर सारे घायल हुए। अंग्रेजों अफसरों के तानाशाही दमन से परेशान हो कर स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने पहाड़ा स्टेशन पर आग लगा दिया जिसमें पांच लोगों की मौके पर ही हत्या कर दी गई। पूरे चुनार क्षेत्रा में 17 अगस्त 1942 के दिन को शोक दिवस के रूप में मनाया गया। ‘बैझा’ में भी अंग्रेजी पुलिस से पांच लोग गंभीर रूप से चोटिल हुए। अहरौरा, पहाड़ा तथा बैझा की घटनाएं अंग्रेजी पुलिस व सैनिकों की ऐसी दुर्दान्त कार्यवाहियों थीं जिससे शासक व शासित के परस्पर सम्बन्ध तथा राजदंड व जनता के अधिकार के दमन पर प्रकाश पड़ता है। शासन हर छोटे मोटे कार्य के लिए राजदंड का सहारा लेता है तथा जनता को दमित करने के लिए अपने हितानुसार भिन्न-भिन्न क्रूर संरचना के कानूनों का उत्पादन करता है बिना परवाह किए कि जनता का कानून के प्रति क्या पक्ष है? पूरे अगस्त माह सन् 1942 तक सोनभद्र अंग्रेजी प्रशासन द्वारा दमित व प्रताड़ित होता रहा। अंग्रेजों ने 1857 के स्वतंत्राता संघर्ष से सबक लेते हुए 1919 तक रोलेट एक्ट पास कर लिया था तथा इस एक्ट के आधार पर स्वतंत्राता संघर्ष के स्वयं सेवकों के दमन का व्यापक अधिकार भी हासिल कर लिया था। सामान्य रूप से भी देखा जाये तो अंग्रेजों द्वारा बनाए गए तमाम कानून आज भी अप्रासंगिक हैं पर भारतीय सरकार क्यों खामोश है इसके बारे में सिर्फ कुछ सन्देहों को ही पैदा किया जा सकता है। डा. राम मनोहर लोहिया तो सी.आर.पी.सी. की धारा 144,151 सी.आर.पी.सी. को मनुष्यता विरोधी माना करते थे। इतना ही नहीं व्यक्ति-स्वतंत्राता के बारे में उनका मानना था कि भौगोलिक सीमाओं में व्यक्ति तो कैद किया जा सकता है किन्तु उसका विचार नहीं कैद किया जा सकता सो भौगोलिक सीमांए विश्व-बन्घुत्व स्थापना के लिए हमेशा खुली रखनी चाहिए नहीं तो विश्ववंधुत्व का क्या मतलब? जिले में उल्लेखनीय आकड़ों के अनुसार 600 लोगों को गिरफ्तार किया गया तथा सजा दे गई। पर ये स्वतंत्राता सेनानी न तो रोए न गिड़गिड़ाए सभी ने हंसकर तथा कुछ क्रोधजन्य अभद्रता करके गिरफ्तारियों
दे दीं। 1942 में एक लाख रूपयों तक का जुर्मना भी स्वतंत्राता सेनानियों से वसूल
किया गया तथा इसी के बराबर की सरकारी सम्पत्ति की भी क्षति हुई।
1942 ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो आन्दोलन’ के बन्दी भारतीयों को जनरल चुनाव
1946 के पहले अंग्रेजों ने छोड़ दिया था। फिर कांग्रेस ने चुनाव में हिस्सा लिया।
कांग्रेस को भारी सफलता मिली। इस सफलता में स्वतंत्राता प्राप्ति की आश्वयक
खुशबू तथा गमक थी। एक बहुत बड़े दुखान्त नाटक के साथ पाकिस्तान को अंग्रेजों
ने 14 अगस्त को ही स्वतंत्रा घोषित कर दिया, 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्राता मिली।
15 अगस्त 1947 की स्वतंत्राता की तारीख में सैकड़ों साल का उत्साह मिला हुआ
था तो 14 अगस्त 1947 की तारीख को दिमाग को दिल से या दिल से दिमाग को
अलग किया जा चुका था तथा हम अंग्रेजों द्वारा खण्डित भारत को पा रहे थे। हमारी
अखंडता को जाते-जाते अंग्रेज तोड़ गए जो आज तक सिर दर्द बना हुआ है। क्या
हम आज तक अंग्रेजों की तोड़ो, बाटों, फोड़ो की राजनीति समझ पाये हैं? संभवतः
नहीं। लेकिन समझना ही होगा किसी न किसी दिन फिर वह दिन इतिहास का
सबसे खूबसूरत दिन होगा आइए उस दिन की तरफ बढं़े।
द
1857 का स्वतंत्राता-संघर्ष 1857 का स्वतंत्राता-संघर्ष 1857 का स्वतंत्राता-संघर्ष आजादी की ज़िद
‘ कितना भला लगता है चिडियों का चह-चाहना तथा फुदकना इस डाल से उस डाल पर फिर खो जाना किसी झाड़ी में तुम्हें क्या पता? कैसा लगता है किसी मोड़, किसी चौराहे पर तनेन होना... तथा मुटिठयाँ हवा में लहराना, बन्दूकों के सामने छाती खोल देना जिसमें धंस जाती हैं कई-कई गोलियाँ फिर भी बढ़ती रहती हैं टोलियाँ चिड़ियों की तरह चह-चहाते हुए इस डाल से उस डाल पर फुदकते हुए’
1857 का स्वतंत्राता-संघर्ष 1857 का स्वतंत्राता-संघर्ष 1857 का स्वतंत्राता-संघर्ष
आजादी की आक्रान्तक ज़िद
शताब्दियों बाद 1857 में पहली बार तथा प्रमुखता से इतिहास की जमी जमाई
धारा से उपजने वाली हताशा व कुण्ठा से इतर, जन-विद्रोह की जनपक्षीय चिन्ता को
दीनापुर तथा हजारीबाग के सैंनिकों के विद्रहों से प्रसार मिलता है तथा आश्वासन
भी कि अंग्रजी सरकार हिलाई जा सकती है। दीनापुर तथा हजारीबाग के सैनिकों ने
भारत की आजादी के लिए सेनाओं से विद्रोह कर दिया। अंग्रेजी-काल में सेना से
विद्रोह करना एक ऐतिहासिक परिघटना है जिसके फलस्वरूप क्र्रान्ति के अग्रदूत
मंगल पाण्डेय अंग्रजी-सत्ता के विरोध के प्रतिनिधि चरित्रा बन जाते हैं और बैरकपुर
छावनी में बगावत कर देते हैं। आखिर दीनापुर व हजारीबाग के सैनिकों ने अंग्रेजी
हुकूमत से विद्रोह क्यों किया तथा विद्रोह करने की क्रान्तिकारी चेतना कहां से
हासिल किया? जबकि वह विद्रोह न तो प्रायोजित था न ही किसी शीर्ष नामधारी
द्वारा प्रोत्सहित? इतिहास की किताबें हमें हजारी बाग व दीनापुर के सैनिकों तथा
मंगल पाण्डेय के स्वस्फूर्त विद्रोह के मनोवैज्ञानिक जन-पक्षधरता के बारे में कुछ भी
नहीं बतातीं। मंगल पाण्डेय को इतिहास की क्रांतिकारी धारा को इतिहास की
कौतुकपूर्ण भूल-भुलैया में प्रस्थापित कर दिया जाता है। इसी तरह बीसवीं सदी के
क्रांति-पुरुष भगत सिंह व चन्द्रशेखर आजाद को भी इतिहास की किताबों में
व्यवसायिक ढंग से सजा दिया जाता है। यदि यही इतिहास है कि किस तारीख को,
कहां क्या हुआ, किसने क्या किया तो शायद इतिहास का इतिहास से कोई सार्थक
संवाद नहीं। इतिहास तो समय के साथ जन-संवाद का आख्यान होता है।
मंगल पाण्डेय ने अंग्रेजी सरकार का विरोध उसकी दमनकारी नीतियों के खिलाफ
किया था। यह एक ‘वैयक्तिक स्वतंत्राता’ यानि हर व्यक्ति आजाद होता है गुलाम
नहीं’ की चाहना से उपजा हुआ संघर्ष था जिसे गांधी जी असहयोग व सविनय अवज्ञा
जैसे आन्दोलनों के माध्यम से पूरे देश में फैला पाए थे। साम्राज्यशाही के दौर में जब
व्यक्ति की सारी निजता कानूनों में कैद थी उस समय 1920 से लेकर 1935 तक
गांधी जी ने बहुसंख्यक भारतीय समाज की छोटी से छोटी इकाई को भी मंगल पाण्डेय
बना दिया था, उठो जागो, सोचो तथा अपने अधिकारों के लिए लड़ो। व्यक्ति से
समाज के स्तर पर स्वतंत्राता पाने का उत्साह जन्माना ही किसी बड़े क्रांतिकारी
आन्दोलन का लक्ष्य होता है। सोनभद्र की स्थिति 1857 में क्या थी ? मुश्श्किल से
143 साल गुजरा होगा कि आज विजयगढ़ के लक्ष्मण सिंह तथा भदोही के अदावत
सिंह व झूरी सिंह को कोई नहीं जानता। क्या 1857 के ऐतिहासिक पात्रों की हत्या
इतिहास ही करता है तथा राजनीति की कब्र में डाल देता है? इतिहास में मंगल पाण्डेय, झांसी की रानी, बेगम हजरत महल, बहादुरशाह, चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह शेष हैं तो हम इतिहास को बधाई दें तथा आत्ममुग्ध होकर खुशियां मनाएं कि बहुत कुछ बचा हुआ है, जैसे सोन, बेलन, कन्हर, कर्मनाशा, रेड़, बिजुल जैसी नदियां बची हुई हैं, विन्ध्य की पहाड़ियां बची हुई है, विजयगढ़, अगोरी के किले तथा तमाम पुरातात्विक कृतियाँ बची हुई हैं, फिर भी लक्ष्मण सिंह व अदावत सिंह तो बच ही गए हैं उन्हें लोग नहीं जानते। शायद इक्कीसवीं सदी ने बहुत कुछ बीती सदियों को भूल जाना, छोड़ देना, विलोपित करना जरूरी समझा है। बीती सदियों से पिछडेपन की निकलने वाली दुर्गन्ध नई सदी की आभा प्रदूषित न कर दे! शायद आधुनिकता सदैव डरती रहती है। इस तरह आधुनिकता में हम डरी व भयभीत मानसिक गतिविधियों का लेखा-जोखा भी पाते हैं तभी तो आधुनिक भारत इतिहास के महत्वपूर्ण मूल-प्रश्नों से संघर्ष करना आवश्यक नहीं समझता। वे प्रश्नअंग्रेजों मुगलों के जमाने में भी अनुत्तरित तथा विवादित थे तो आज भी उसी तरह यथावत हैं। पहला सवाल तो आने वाला समय यही जानना चाहेगा अपने वर्तमान सेकृकि आर्य कौन थे? तथा उनका उद्गम-स्थल कहां था? तथा दूसरा भाषायी सवाल हिन्दी जाति, हिन्दी भाषा, हिन्दुस्तान, इनके अर्न्तविरोध क्या हैं ? बेदों की प्रासंगिकता, अनिवार्यता, वर्ण-व्यवस्था, जाति-व्यवस्था जैसे सवालों से सार्थक मुठभेड़ आखिर कब किया जायेगा या मुठभेड़ की आवश्यकता ही नहीं है? इन ऐतिहासिक सवालों के अलावा इतिहास व राजनीति को प्रभावित करने वाली पूंजी की अवधारणा के बारे में भारतीय मनीषी किस स्वस्थ विचार का प्रतिपादन करते हैं यह सब भी। उपरोक्त सवालों के उत्तर दिये बिना ही इतिहास 1857 तक बढ़ जाता है। इतना ही नहीं इतिहास ने एक स्वर से नारा लगाया ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’, 1942 में, वस्तुतः अंग्रेजों ने 1947 में भारत छोड़ दिया। हमें ध्यान रखना होगा कि हिन्दी जाति, हिन्दी भाषा, आर्यो के उद्गम स्थल, वेदों तथा वर्ण-व्यवस्था की प्रासंगिता पर भारतीय चिन्तक व दार्शनिक तब खामोश रहते हैं किन्तु अंग्रेज खामोश नहीं रहता। वह प्राचीन भारतीयता की जांच पड़ताल करता है तथा उसके ऐतिहासिक अर्न्तविरोधों की पहचान करता है यह अंग्रजों की पक्षधरता की बात नहीं है। आइए इण्डिया कौन्सिल एक्ट 1⁄418921⁄2 का सन्दर्भ इस अर्थ में लें कि 1857 ने अंग्रेजों को भारतीयों के सन्दर्भ में किस तरह प्रशिक्षित किया था। कांग्रेस मांग कर रही थी कि विधान परिषदों के सदस्य निर्वाचन द्वारा चुने जायें। इण्डिया कोन्सिल एक्ट 1861 तब आया था जब महारानी के घोषणा पत्रा 1858 का भी विरोध होने लगा था जो 1857 के सन्दर्भो को समाप्त करने के लक्ष्य से लाया गया था। 1858 के घोषणा पत्रा ने प्रशासन की विभक्त नियंत्राण परिषद तथा निदेशक मंडल को समाप्त कर दिया था। शासन चलाने के लिए महारानी के प्रतिनिधि के रूप में एक मंत्राी को नियुक्त किया गया था जो इंग्लैण्ड की ससद के प्रति उत्तरदायी होता था। उसके काम को सरल बनाने के लिए 12 सदस्यों की एक
कौन्सिल बनाई गई थी। गर्वनर जनरल ही सर्वोच्च अधिकारी के पद पर होता था। गर्वनर जनरल की सहायता के लिए चार सदस्यों की एक समिति भी बनाई गई थी। घोषणा पत्रा ने राजाओं तथा नवाबों को वही हक तथा हकूक दिए थे जब वे निरकुश थे। धर्म की स्वतंत्राता सबको दी गई लेकिन यह सब दिखावा था। दमन पूर्ववत चलता रहा फिर इण्डिया कौन्सिल एक्ट 1861 आया। यह भी भाषायी जाल के अलावा कुछ भी परिवर्तित नहीं था। इण्डिया कौन्सिल एक्ट 1892 मे तो हद कर दी। इस एक्ट ने भारतीय प्रतिनिधियों को कुछ अधिकार तो दिए तथा कौन्सिल की सदस्य संख्या 12 से बढ़ाकर 16 कर दिया, पर इसी एक्ट में सुधार के लिए वायसराय लार्ड मिन्टो ने 1909 में एक प्रस्ताव रखा जिसे स्वीकार कर लिया गया। आइए इसे देखें, मिन्टो का 1909 का सुधार 1947 आते-आते क्या रंग लाता है ? केन्द्रीय विधान परिषद की संख्या 16 से बढ़ाकर 60 की गई, जिसमें 27 का निर्वाचन होने लगा। शेष अंग्रेजी कृपा पर मनोनीत होते थे। वायस राय की कार्यकारिणी में एक भारतीय को शामिल किया गया। लार्ड सत्येन्द्र प्रसाद सिन्हा पहले भारतीय थे जो वायस राय की कार्यकारिणी में कानून मंत्राी पर नियुक्त हुए। इसके अलावा जो गंभीर विनाशकारी कार्य अंग्रेजों ने किया वह था मुसलमान जन-प्रतिनिधियों का चुनाव मुसलमान मतदाताओं द्वारा किया जाने वाला नियम। यह वही अंग्रेजी समझ थी जिसकी जड़ें 12वी सदी से ही निकलनी प्रारंभ हो गई थीं। अंग्रेजों ने बीमार भारतीय मानसिकता की धार्मिक समझ को भलीभांति समझा था तथा दूरगामी रणनीति के तहत मुस्लिम प्रतिनिधि एवं मुस्लिम मतदाता का शोक गीत गाना बजाना शुरू कर दिया था। भारतीय हिन्दू व मुसलमान दो अलग जातियां हैं, दोनों की अलग बोली तथा संस्कृति है, दोनों की अपनी-अपनी ऐतिहासिक महानताएं हैं तथा अपने-अपने तरह की सामर्थ्य भी है जिससे इतिहास की धाराएं तक मुड़ती रही हैं। अंग्रेजों ने इस बीमार व जड़ मानसिकता तथा फूट डालो और राज करो की नीति के तहत यह सब किया ऐसा करने के लिए अंग्रेजों ने इतिहास लिखकर इतिहास में ही विभेद के खतरनाक ध्रुवों को स्थापित भी कराया। डा0राममनोहर लोहिया ने तो इस विभेद को वेश-भूषा तक में चिन्हित किया कि मुसलमान की शेरवानी पगड़ी दूसरी तथा हिन्दुओं की दूसरी। उस समय ‘जाति नियंत्राण अधिनियम’ भी आ गया होता किन्तु गांधी जी की तत्परता के कारण पूना पैक्ट 1932 हो गया सो वह अधिनियम नहीं आ पाया। यदि आ गया होता तो? 1932 से लेकर आज तक का भारत काफी कुछ बदल चुका है तथा कुछ अतिवादी कहने लगे हैं कि ‘जाति नियंत्राण अधिनियम’ आ गया होता तो ठीक होता ये अतिवादी खासतौर से वे लोग हैं जो जाति के आधार पर अपने राजनीतिक गढ़ों को पोख्ता करना चाहते हैं। सवाल यह है क्या हम भारतीयों ने, भारत से प्रेम करने वालों ने, भारत को समझने की कोशिश की है? इतिहास से सवाल पूछते इतिहास के मूल प्रश्न आज भी कम से कम भारत व पाकिस्तान में दोनों जगहों पर अनुत्तरित
हैं। मुसलमान के नाम पर बना पाकिस्तान आज भी शिया-सुन्नी, मुजाहिदीन के झगड़े में फंसा हुआ है तो भारत सवर्ण, पिछड़ा व दलित झगड़े के साथ-साथ हिन्दू-मुसलमान के झगड़े में फंसा हुआ है। इतिहास की शाश्वत व वैज्ञानिक समझ को यदि विकसित किया गया होता तथा गरीबी, बेरोजगारी, भूखमरी के बारे में सफल समाधान लाये गए होते तो शायद जातिगत वंदिशें व रंजिशें कम हुई होतीं। जातियां हर उस समाज में स्वतः निर्मित हो जाती हैं जहां दमन व उत्पीड़न होता है। दमित व उत्पीड़ित जातियां अपनी जातियों में उपस्थित होकर हंसती हैं, रोती हैं, शादी-ब्याह करती हैं तथा दमनकारी सत्ता के खिलाफ कई तरह की शोकातुर अभिव्यक्तियां भी करती हैं। उत्पीड़ितेां का मनोविज्ञान बहुत ही जटिल एवं संघर्ष-मय होता है तथा उनमें निरन्तर स्वतंत्राता की चाहना विकसित होती रहती है। लेकिन यह सारा कुछ प्रत्यक्षतः दीखता नहीं, दिखती है उनकी आज्ञा-कारिकता, भक्ति तथा दबी हुई प्रवृत्तियाँ ही। 1857 के जन-संघर्ष को अंग्रेजों ने गंभीरता से लिया तथा तलछट से लेकर अभिजातों तक की ऐतिहासिक मनोवृत्तियों का अनुसन्धान किया। ऐतिहासिक महान पात्रों की ऐतिहासिकता का ऐसा अर्थ-बोध प्रचारित किया कि वे इतिहास के सारे के सारे पात्रा मिट्टी के ढूहे थे। सो युद्ध-कालीन भारत को अंग्रेजों ने युद्ध व छल1⁄4कूट-नीति1⁄2 के जरिए ही जीतना अपनी रणनीति बनाया। वर्ण-व्यवस्था, जाति-व्यवस्था के अर्न्तविरोधों के साथ-साथ धार्मिक अर्न्तविरोधों को भी अंग्रेजों ने सड़क पर खड़ा करके मोजरा करवाया। एक तरफ कांग्रेस पार्टी का गठन तो दूसरी तरफ मुस्लिम लीग का गठन, दोनों संगठनों को साथ साथ उगने और पनपने का मौका दिया। एक तरफ अलीगढ़ विश्वविद्यालय की स्थापना मुस्लिमों के नाम पर करवाया तो दूसरी तरफ हिन्दू विश्वविद्यालय बनारस की स्थापना हिन्दुओं के नाम पर। कुल मिलाकर अंग्रेजों ने ऐतिहासिक अर्न्तविरोधों के साथ क्रूरतम व घृणित धार्मिक अन्तर्विरोधों व मतभेदों को फैलाने का कार्य किया।कृयह सच है कि हम अपने अतीत के प्रति न तो पहले जागरूक थे न ही अंग्रेजों के बाद भी हमने अपने पुरखों की विरासत के बारे में कुछ सकारात्मक किया। हम भूल गये उस समय विविधता में एकता के सूत्रा को। सोनभद्र के लक्ष्मण सिंह भुला दिये गए, भदोही के अदावत सिंह व झूरी सिंह को 142 साल के दिन व रात ने मिटा दिया। वैसे भी 1857 के आस-पास के सोनभद्र व मीरजापुर की रूहेलों, बघेलों, चन्देलों, सोलंकियों, नवाबों के आगे क्या औकात थी? झूरी सिंह ने जिस मूर नामक मजिस्टेट की कचहरी करते समय वध किया था तथा सार्न्डस का जो वध हुआ था हालांकि उन दोनों में वधों में समान तत्व नहीं थे पर यह तो था ही कि अदावत सिंह, राजा भदोही जिन्हें फांसी पर लटकाया गया था, जो अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्रा खड़े हुए थे तथा जी.टी. रोड को जाम कर दिया था जिससे कि अंग्रेजी सेना इलाहाबाद से बनारस या बनारस से इलाहाबाद न आ जा सके।
क्या झूरी सिंह अदावत सिंह का बदला न लेते? अंग्रेज जिसे चाहे फांसी पर लटका
दे? विजयगढ़ के लक्ष्मणसिंह ने विजयगढ़ राज पर अपना अधिकार जमा लिया था।
लगभग छः माह तक उन्होंने विजयगढ़ पर निरंकुश हुकूमत किया तथा सारे अंग्रेजी
अधिकारों को खारिज कर दिया। लक्ष्मणसिंह ने विजयगढ़ राज को स्वतंत्रा भी घोषित
कर दिया तथा अंग्रेजों को ललकारा था... यह कौन सी उत्तेजना थी जिससे प्रभावित
होकर लक्ष्मणसिंह स्वतंत्राता की रक्षा के लिए आत्मघाती निर्णय ले रहे थे? विजयगढ़
तो अपने अभ्युदय काल से लेकर 1857 तक खामोश दर्शक तथा भोक्ता की तरह
शिथिल था। कुंअर सिंह का आना विजयगढ़ के लिए ऐतिहासिक हो गया फिर तो
अकेले लक्ष्मण सिंह ही नहीं सैकड़ों दूसरे लोग भी उनके साथ हो लिए। सासाराम
के जंगल में लक्ष्मण सिंह ने अंग्रेजों से डटकर मुकाबिला किया, बहुत लोग मारे गए
और फांसी पर लटकाए गए। दमन तंत्रा का भुतहा खेल विजयगढ़ को झेलना पड़ा।
लक्ष्मण सिंह अदावत सिंह व झूरी सिंह को हमारी अगली पीढ़ी किस तरह याद
करेगी? एक स्वतंत्राता सेनानी की तरह, राजपूत शासक वंश का होने के कारणकृया
अंग्रेजों ने उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया इसलिए या इसलिए कि वे समन्वय तथा
सन्तुलनवादी नहीं थे तथा गरिमापूर्ण पराजय के योद्धा थे इसलिए! वस्तुतः लक्ष्मणसिंह
अदावत सिंह तथा झूरी सिंह को इतिहास में शामिल नहीं करना तथा उन्हें इतिहास
में निर्जीव बना देना ये दोनों बातंे अपनी फलत में समानार्थी हैं। गजेटियर इन तीनों
को इसलिए याद करता है कि ये तीनों अंग्रेजी दमन शास्त्रा व दमन योजना दोनों
के द्वारा दमित कर दिए गये थे। पूरे छः माह तक विजयगढ़-राज का शासन स्थापित
रखे रहने वाले लक्ष्मण सिंह को गजेटियर अंग्रेजी सरकार का दुश्मन तथा जबरिया
लगान 1⁄4त्मअमदनम1⁄2वसूल करने वाला शातिर अपराधी बताता है तथा कुछ सूत्रा
स्वतंत्राता संघर्ष 1857 से भी जोड़ देता है। कुछ ऐसा ही भदोही के राजा अदावत सिंह
के साथ होता है। दोनों को छल-पूर्वक इतिहास से विलुप्त कर दिया जाता है।
1857 के काल-खण्ड पर विचार करना आवश्यक है। 1857 के पूर्व अंग्रेज 1852
में ही वर्मा जीत लेते हैं, नेपाल में तथा बनारस जैसी दूसरी रियासतों में उसके रंजीडेन्ट
स्थापित कर देते हैं। अवध को अंग्रेज छीन लेते हैं, पूरा मध्य-देश अपने अधीन कर
लेते हैं, बंगाल पर उनका नियंत्राण पहले ही हो चुका होता है। दिल्ली उनके हाथ में
थी। यह समय था 1857 का। ऐसे दौर में विजयगढ़ व भदोही की बहादुर जनता
द्वारा छेड़े गए हमलावर विद्रोह का नेतृत्व लक्ष्मण सिंह करते हैं। हारना-जीतना
तत्कालीन मुद्दा नहीं था मुद्दा था विद्रोह करना तथा विद्रोह की सकारात्मक
अभिव्यक्ति करना। 1857 के समय में ही डलहौजी राज्यों के अंग्रेजी राज में
विलोपीकरण का प्रस्ताव लेकर कानून के डंडे भांज रहा था। अंग्रेजों ने गोद लेने की
राज- प्रक्रिया पर भी हमला बोल दिया था, परिवार के ही किसी व्यक्ति को गोद लिया
जा सकता था परिवार के अलावा किसी दूसरे व्यक्ति को गोद लेने पर अंग्रेजों से
पूछना तथा अनुमति लेना अनिवार्य था। इस प्रकार 1857 का दौर दोहरे शासन
व्यवस्था का था। वस्तुतः हुकूमत अंग्रेजों के अधीन ही थी नाम मात्रा की सत्ता-व्यवस्था खासतौर से लगान वसूली का कार्य देशी राजाओं के पास था। अंग्रेज जिन कानूनों के सहारे देश में अनुशासन स्थापित करना चाहते थे वे कानून ही अनुशासन के विपरीत थे। अनुशासित कानून ही अनुशाासन स्थापित कर सकते हैं। हमारा समाज उस दौर में स्वतंत्राता प्राप्ति की चाहना से ओत-प्रोत हो चुका था तथा एकबारगी अंग्रेजी-जंगल कानूनों के खिलाफ उठ खड़ा हुआ वर्ना मंगल पाण्डेय क्यों विरोध करते? कुछ चिन्तकों की स्थापना है कि मंगल पाण्डेय ने जल्दी कर दी तथा वह विद्रोह ऐतिहासिक अदूरदर्शिता थी। समझ में नहीं आता ऐसा क्यों तथा किस लिए स्थापित किया जाता है? यह ऐतिहासिक समझ की खतरनाक प्रवृत्ति है तथा उस समझ की आलोचना भी। अनियोजित विद्रोह ही शाश्वत होता है, विद्रोह करने के लिए जनता केवल तैयार होती है योजना नहीं बनाती। लेकिन उस विद्रोह में स्थायित्व तभी आता है जब ऐतिहासिक समझ मजबूत होती है कि समाज को परिवर्तित किया जाना आवश्यक है। परिवर्तन जब सभी के दिल तथा दिमाग की बात हो जाती है तभी कुछ होता है। अकेले मंगल पाण्डेय का विद्रोह पूरे मध्य क्षेत्रा, दिल्ली बंगाल, रूहेलखण्ड, बुन्देलखण्ड, इलाहाबाद, आदि को कैसे समेट लेता? 1857 के संघर्ष की महज वाह-वाही या निन्दा कर देने से ही इतिहास का महत्वपूर्ण कार्य समाप्त नहीं हो जाता। हमें ध्यान रखना होगा कि बेदों, श्शास्त्रों, गीता, रामायण आदि ग्रन्थों की अनेक व्याख्यायें कर दी गई हैं पर परिणाम सिर्फ शिफर ही रहा है। हमारा हिन्दू धर्म, कर्ज को पाप समझाता है तथा व्याख्या भी ऐसी ही है पर आज हम सारे भारतवासी कर्ज में डूबे हुए हैं। तथा कर्ज लेना व देना दोनों अपनी मान्यताओं से ऊपर उठ कर सर्व-प्रिय हो चुके हैं। हम आज के समय में पूॅजी का वाहक बनकर विनिमय मूल्य बन गए हैं तथा सेवाओं को बेचने-खरीदने लगे हैं, इसे हमें गंभीरता से समझना होगा। तथा खुद को जितना संभव हो सके उपभोक्ता बनने से रोकना होगा। अपने अतीत से सार्थक व विश्लेषणात्मक साक्षात्कार न कर पाने की हमारी कमजोरी हमें कहीं का न रहने देगी। कहा जा सकता है कि अतीत का साक्षात्कार संभव नहीं।कृदिखता केवल वर्तमान है। वर्तमान कभी भी बिना अतीत के जीवित नहीं रह सकता यह वैज्ञानिक सचाई है। वर्तमान को जीवन देना अतीत की नियोजित राजनीति है इस राजनीति को समझना ही अतीत का साक्षात्कार है जो हर कदम पर सवाल खड़ा करता है तथा हमसे पूछता है क्या हुआ ई.पू. छठवीं शताब्दी के जागरण का जब हम ‘प्रतीत्य समुत्पाद’ का दर्शन रच रहे थे। ‘अनात्मक बाद’ की तरफ बढ़ चले थे। ‘कार्य-कारण’ के आधार पर जीवन को एक घटना मानते थे तथा वर्तमान को जीवित बनाने की सार्थक चिन्ता में थे। भाई-चारा, प्रेम-सद्भाव, बन्धुत्व हमारा मंत्रा बन रहा था। यह सब तो फ्रांस में बहुत बाद में होता है लगभग दो हजार साल बाद। दो हजार साल पूर्व का भारत किन कारणों से विलोपित हो गया?
अशोक का राजतंत्रा, औरंगजेब से होते हुए अंग्रेजों तक किस सत्ता-ज्ञान की मीमांसा
कर रहा था? जाहिर है कि शस्त्रा प्रमुखता से स्थापित हो गया तथा शास्त्रा व
ज्ञान-मीमांसा के सारे केन्द्र सत्ता-मीमांसा में उलझ कर जड़ हो गए।
1857 को सत्ता मीमांसा के नियमों से संशिलस्ट कर विश्लेषित करना गलत
होगा कि 1857 के कारण ही 1947, 15 अगस्त आया। बात सिर्फ इतनी ही अगर
है तो 1857 का मतलब कम करके आंकना है यह 1857 का अवमूल्यन होगा।
1857 हमें हमेशा कुश्शासन के खिलाफ संघर्ष करने की प्रेरणा देता रहेगा यह सचाई
है। 1857 का एक रूप 1942 था जिससे आजादी मिली। 1857 का एक रूप इन्दिरा
गांधी का पतन था 1977 में,कृ1857 का एक रूप बोफोर्स था। 1857 तो
भिन्न-भिन्न रूपों में तथा भिन्न-भिन्न यथार्थो के साथ हमेशा ही इतिहास के साथ
हस्तक्षेप करता रहेगा। इसलिए 1857 को इतिहास के डंाइंग रूम में कभी भी सजाया
नहीं जा सकता। ठीक इसी तरह लक्ष्मण सिंह, अदावत सिंह व झूरी सिंह के
ऐतिहासिक हस्तक्षेप को भी भुलाया नहीं जा सकता। अतीत के इस सच के आगे
सबको नत होना ही पड़ेगा भले ही आज वे भूले विसरों में हांे।
सोनभद्र का राजसी अतीत पारीमल-बारीमल से प्रारंभ होता है तथा घाटम के
पुर्नस्थापित होने तक भिन्न किस्म के इतिहास का पाठ रचता है जो विजयगढ़, बडहर
व अगोरी के संस्थापक आदिवासी राजा मदन शाह से सर्वथा भिन्न होता है। फिर
घाटम, चन्देल वंश के उत्तराधिकारी उड़नदेव द्वारा 1310 में विस्थापित कर दिया
जाता है। यह इतिहास का बर्बर मध्यकालीन पाठ था जिसका उद्देश्य जीत-हार को
केन्द्र में रखना भर था तथा विजेता को महिमा माण्डित करने तथा पराजित को
घृणास्पद समझने की आदिकालीन समझ थी।कृसवाल तो अतीत का यह था पारीमल
व बारीमल सोनभद्र के अतीत पर किसी अधिकार व प्रक्रिया से हस्तक्षेप करते हैं।
उड़नदेव को कौन सी ऐतिहासिक सामाजिक परिस्थितियां साथ देती हैं कि वे
गर्वान्वित होकर घाटम पर हमला बोल देते हैं। इतिहास कभी नहीं मरता, इतिहास
अपनी गतिविधियों को जितना आगे तक सरकाता है उतना ही पीछे की ओर भी
मोड़ता है। 1753 आते-आते तक अगोरी, बड़हर, विजयगढ़ व सिंगरौली की रियासतों
को इतिहास की कथित आक्रामक परंपराओं के आधार पर बलवन्त सिंह राजा बनारस
अधिग्रहित कर लेते हैं जिसे वारेन हेस्टिंग्सकृचेतसिंह को पद विस्थापित कर 1781
में हथिया लेता है। हमारा राजसी अतीत एक तो घाटम वाला है, दूसरा पारीमल व
बारीमल के उत्तराधिकारी उड़नदेव वाला है तो बलवन्त सिंह, चेत सिंह फिर वारेन
हेस्टिंग्स वाला भी है। सवाल है हम सोनभद्र की जनता हैं ऐसी स्थिति में हम क्या
फैसला लें। किस अतीत पर पर विलाप करें, किस पर प्रसन्नता तथा करमा नाचें।
किस लोरिक का सन्दर्भ लें तथा अतीत के किस कथा पात्रा पर बिरहा तथा कजरी
की धुनें बनाएं?
हमारे इतिहास के नायकों में मदनशाह, पारीमल, बारीमल, घाटम, उड़नदेव,
बलवन्त सिंह, चेतसिंह तथा वारेन हेस्टिंग्स लगभग सभी जीत-हार की संस्कृति से संस्कारित लोग होते हैं तथा युद्ध को अपनी स्थापना का अनिवार्य हिस्सा बनाते हैं। हमारा युद्ध-कालीन अतीत आज की सामाजिक व राजनैतिक स्थितियों से पूरी तरह उलट तथा ‘एको अहं’ की तानाशाही प्रवृत्तियांे से संपादित होता है। सोनभद्र के अतीत से यदि आज हम बदला लेने की सोचें तो मूर्खता होगी। इसका आशय यह नहीं कि अतीत का विश्लेषण ही न किया जाय। अतीत का विश्लेषण करने से हमें ज्ञात होता है कि अंग्रेज वारेन हेस्टिंग्स अगोरी, बड़हर, विजयगढ़ के प्राचीन अतीत से कत्तई हस्तक्षेप नहीं करता वह उस समय के राज-प्रबंधन को जस के तस रहने देता है केवल राजस्व का निर्धारण अपने अनुकूल करता है, जबकि उल्टा होता है बलवन्त सिंह के काल में। बलवन्त सिंह तो यहां के राजाओं को विस्थापित कर खुद शासन-व्यवस्था संभालने लगते हैं जिसे हेस्टिंग्स समाप्त कर देता है। चूंकि हेस्टिंग्स बनारस के राजा को प्रताड़ित करना चाहता है इसलिए वह उनके स्थान पर बलवंत सिंह द्वारा विस्थापित किये गये चन्देल शासकों को पुनः स्थापित कर देता है। सोचना होगा कि यदि अंग्रेज अतीत के बारे में जानकारी रखते थे तथा उससे प्रेम करते थे तो वारेन हेस्टिंग्स ने घाटम के वंशजांे को क्यों नहीं स्थापित किया? सीधा अर्थ है अंग्रेजों को इतिहास से सिर्फ फायदा लेना था उसे अपने अनुकूल बदलना था। इसी अंग्रेजी व्यवस्था का विरोध अदावत सिंह ने तथा झूरी सिंह ने भदोही में किया था तथा लक्ष्मण सिंह ने विजयगढ़ में। वे नहीं चाहते थे कि राजा बनारस को इतिहास में खुला हस्तक्षेप करने का अधिकार मिले। अंग्रेजों ने राजा बनारस को स्थापित करके राजाओं के आधुनिक रंग मंच का जो निर्माण किया था वह सर्वथा एक तरफा था। राजा बलवन्त सिंह का तो एक तरह से राजा के रूप में तत्कालीन राजस्व परिस्थितियों ने निर्माण किया था। जिसे राज-व्यवस्था पर स्थापित होने की कला भी कहा जा सकता है। इस प्रकार 1857 का विद्रोह सत्ता-विमर्श के विभिन्न विषयों पर भी प्रकाश डालता है जिसका सीधा संबंध जनता से है। 1857 ने यह साबित कर दिया था कि हर जरूरी सत्ता-विमर्श जनता की दृढ़ इच्छाश्-शक्ति से ही उपजता है। केवल सैनिक कार्यवाहियां किसी व्यापक संघर्ष की रूप रेखा निर्मित नहीं कर सकतीं। जिसका सीधा प्रमाण हमें 1857 के देश व्यापी संघर्ष से मिलता है यदि वह जन-संघर्ष साधारण जनता द्वारा स्व-स्फूर्त होता तो शायद 1857 ही अंग्रेजों के लिए आखिरी साल होता। यदि इस सूत्रा को ध्यान में रखें तो लक्ष्मण सिंह का विद्रोह बतौर प्रमाण उघृत किया जा सकता है। लक्ष्मण सिंह के साथ विजयगढ़ की बहुसंख्यक जनता उठ खड़ी हुई थी जिसका नेतृत्व लक्ष्मण सिंह ने किया था। जबकि ऐसा अन्यत्रा संभव न हो सका था। सोनभद्र के अतीत के जन-संघर्ष में लक्ष्मण सिंह का नाम स्वतंत्राता की चाहना तथा संघर्ष के आधार पर किसी भी घाटम उड़नदेव या कि बलवन्त सिंह से बिल्कुल ही भिन्न रूप में उभरता है यह भिन्न रूप क्या समकालीन आवश्यकता थी? या इसी
भिन्न रूप को सोनभद्र के अतीत में पहले ही स्थापित होना चाहिए था? लेकिन घाटम
या उड़नदेव के काल में स्वतंत्राता के किसी संघर्ष की कल्पना की जा सकती थी?
किसको स्वतंत्रा होना था तथा किससे स्वतंत्रा हेाना था? यह सवाल तेरहवीं सदी में
कत्तई विमर्श से बाहर था। अतीत बताता है कि राजा स्वतंत्रा होता था तथा राजा
ही गुलाम होता था, जनता तो मशीन की तरह संचालित होती थी जिसका न तो
विवेक होता था न तो सम्मति या सहमति होती थी। हमारे अतीत की गलाघोटूं शिक्षा
ने हमारे पुरखों को गुलामी का एक औजार बना दिया था, जो बिकता था,श् शासित
होता था तथा उत्पीड़ित होता था। सामाजिक सिद्धांत सत्ता-सिद्धान्त की तुलना में
एक पिछड़ा हुआ विषय था तथा सिद्धांन्तों की सिद्धान्त हीनता, के द्वारा सत्ता केन्द्रांे
की स्थापनाएं हुआ करती थीं। सत्ता केन्द्रों के कानून रीति-रिवाज परंपराएं मनुष्य
की मनुष्यता से बहुत दूर मानवीय शोषण पर टिके होते थे। इस प्रकार सोनभद्र के
अतीत का एक हिस्सा राजसी परंपराओं, उनके उत्थान-पतन में छिपा हुआ है तो दूसरा
हिस्सा जनता के दमन व शोषण में छिपा हुआ है, जनता के दमन के इतिहास के
बारे में कहीं कुछ लिख-पढ़ा नहीं मिलेगा।
सोनभद्र का अतीत भी इतिहास के उन मूल प्रश्नों मंे भटका हुआ है कि क्या
यहां अतीत में आदिवासियों की शासन-व्यवस्था थी? क्या यहां भी आर्य कहीं बाहर
से आये? आर्यों का बाहरी होना या भीतरी होना चाहे अतीत में भले ही दब गया हो
पर कभी न कभी यह जलता हुआ सवाल अवश्य बनेगा। हालांकि अब यह विमर्श
पूरी तरह अनावश्यक है क्योंकि 1857 के स्वतंत्राता संघर्ष ने इसे पूरी तरह से सिद्ध
कर दिया है कि यहां केवल अंग्रेज ही बाहरी थे तथा उन्हंे भारत से खदेड़ना था।
आदिवासियों के अंग्रेजों के प्रति जन-विद्रोह भी इसे प्रमाणित करते हैं।
अंग्रेजों की ऐतिहासिक समझ थी ऐतिहासिक रूप से मुसलमानों की शासन
स्थापना को किसी पूर्व की शासन व्यवस्था से जोड देना जिसके लिए अंग्रेजों ने आर्यो
को मुसलमानों के तर्ज पर विदेशी बनाने का षड़यंत्रा किया था। मुसलमान ही नहीं
आर्य भी बाहर से आये। इस खतरनाक स्थापना से यह स्वतः तय हो जाता है कि
अंग्रेज अगर बाहरी 1⁄4विदेशी1⁄2 हैं तो यह गलत नहीं है। 1857 के संघर्ष से हमे पता
चलता है कि अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने के लिए न केवल हिन्दूओं ने वरन
मुसलमानों ने भी संघर्ष किया। हिन्दू- मुसलमान दोनों एकताबद्ध होकर अंग्रेजों से
लड़ते हैं फिर अतीत से यह पूछना कि कौन बाहरी है कौन भीतरी इसका क्या
मतलब?कृआज की बदली हुई दुनिया की परिस्थितियांे में कत्तई उपयोगी नहीं।
अतीत इसका उत्तर दे भी नहीं सकता। अतीत में तो वैसे ही तमाम अर्न्तविरोध हैं
जिसपर लगातार सदियों तक विमर्श हो सकते हैं। वर्ण-व्यवस्था, जात-पांत, छुआ-छूत,
असमानता, भेदभाव, सामाजिक अन्याय से उपजी आर्थिक, सामाजिक, विसंगतियां
गरीबी, बेरोजगारी, भूमि-आवंटन, भूमि-अधिग्रहण, विशेष साधनों व सुविधाओं को
अधिग्रहण जैसे तमाम विषय हैं जिन पर गंभीर विमर्श किया जाना चाहिए तथा भारत
की परतीय व्यवस्था पर गंभीर निर्णय भी लेना चाहिए। 1857 का संघर्ष हमें नवजागरण का रास्ता दिखाता है खासतौर से सोनभद्र के लिए। सोनभद्र के लिए यह भी आवश्यक होगा कि यहां के नवस्थापित सत्ता-केन्द्रों के बारे में सोचा जाये। सोनभद्र आज भी उत्तर प्रदेश का सबसे पिछड़ा जनपद है तथा औघोगिक प्रगति के साथ साथ जनता की प्रगति होती है इस स्थापना को धूल में मिलता हुआ सोनभद्र औघोगिक स्थापना के षडयंत्रों पर गहन विमर्श के लिए एक साधन भी बनता है। ज्ञातव्य है कि यहां औद्योगिक सत्ता केन्द्रों की स्थापना हुई तथा उन औद्योगिक इकाइयों ने प्रति व्यक्ति लाखों रूपयों का पर्यावरणीय नुकसान करना आरंभ कर दिया है पर सोनभद्र के लोगों को क्या मिला न नौकरी न व्यापार। हां विस्थापन अवश्य मिला। सोनभद्र के लिए 1857 गुजरा हुआ काल खण्ड नहीं है, वह फिर आने वाला है चाहे जिस समय जिस रूप मंे आ जाये पर आयेगा जरूर किसी न किसी दिन। हमें निराश व हताश नहीं होना चाहिए बल्कि इतिहास की कड़वी सचाइयों से सीख लेकर कदम दर कदम आगे बढ़ते रहने तथा जनतांत्रिक हस्तक्षेपों के लिए लगातार प्रयासरत रहना चाहिए। हमें निरंतर याद रखना चाहिए कि इतिहास में सजा दिए गये मंगल पाण्डेय तक ही इतिहास सिमटा हुआ नहींे है, इतिहास अपने क्षेत्रा के लक्ष्मण सिंह और जूरा महतो तक जाता है। हमें उनकी क्रान्तिकारी चेतना को सलाम करते हुए सदैव जनतांत्रिक हस्तक्षेपों के लिए तैयार रहना चाहिए। देश की माटी के प्रति वलिदान का अर्थ अपनी जन्म भूमि की माटी यानि सोनभद्र की माटी के लिए भी वलिदान माना जाना चाहिए और हमें वह वलिदान देना चाहिए। 1857 के स्वतंत्राता संघर्ष को याद करते हुए हमें सोनभद्र के आदिवासियों, दलितों व गरीबों के हितों के लिए समान अवसर उपलब्ध कराने के बारे में लगातार प्रयास करते रहना चाहिए। समान अवसर यानि काम करने की बराबरी, वेतन में बराबरी, संसाधानों की उपयोगिता में बराबरी को समाज बदल का आधार बनाना चाहिए न कि विशेष अधिकार दे कर समाज में गैर बराबरी पैदा करना चाहिए।