"कार्यालयी हिंदी/टिप्पण लेखन ( Noting)" के अवतरणों में अंतर

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६) '''अनौपचारिक टिप्पण''':- एक कार्यालय से किसी दूसरे कार्यालय अथवा एक मंत्रालय से दूसरे मंत्रालय को कुछ कार्यालीन जानकारी देने के लिए अनौपचारिक टिप्पण सीधे भेजे जाते हैं। अनौपचारिक टिप्पण में सभी कार्यालयीन नियमों तथा शर्तों आदि का सही-सही अनुपालन नहीं किया जाता है। इन टिप्पणों के उत्तर में जो टिप्पणादि प्राप्त होते हैं, उनका स्वरूप भी अनौपचारिक टिप्पण का ही होता है।
 
 
==टिप्पण की विशेषताएँ==
 
१) '''संक्षिप्तता''':- टिप्पण का उद्देश्य ही कम-से-कम शब्दों में अधिक-से-अधिक आशय व्यक्त करना होता है। अत: टिप्पण संक्षिप्त तथा सुस्पष्ट होना चाहिए। अधिकारियों के पास समय की कमी रहती है और इस बात को ध्यान में रखकर आवश्यक हो उन बातों को ही सीधे ढ़ग से प्रस्तुत किया जाना चाहिए ताकि पढ़ने वालों को अपना निर्णय तुरन्त देने में कठिनाई महसूस न हो।
 
२) '''भाषा''':- टिप्पण की भाषा सुस्पष्ट हो और उसमें वर्णनात्मकता के बजाय भावों को अभिव्यक्ति देने की तीव्र शक्ति हो। सम्प्रेषण का उचित माध्यम भाषा को बनाया जाना चाहिए। टिप्पणी में कहावतों तथा मुहावरों का प्रयोग न करके विचारों तथा तथ्यों को वास्तविक रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए । टिप्पण में ऐसे शब्दों का इस्तेमाल भी नहीं करना चाहिए जिसे कि अर्थ-विषयक भ्रम पैदा हो। टिप्पण की भाषा सरल, स्पष्ट तथा संयत होनी चाहिए।
 
३) '''क्रमबध्दता''':- टिप्पण लिखते समय विषय या तथ्यों को असम्बध्द तरीके से प्रस्तुत न करके क्रम के साथ विचारों की श्रृंखल को रखना चाहिए। आशय के आकलन के लिए टिप्पण में क्रमबध्दता होना बहुत ही आवश्यक बात है। इसी प्रकार टिप्पण यदि विस्तृत है तो उसके प्रथम अनुच्छेद को छोड़कर अन्य अनुच्छेदों को क्रम संख्या में बाँट देना चाहिए। इससे टिप्पण के निर्णय लेने वाले प्राधिकारी को विषय के आकलन में काफी सहायता मिलती है।
 
४) '''स्पष्टता''':- कार्यालयी टिप्पण प्राय: स्पष्ट ढंग से लिखे जाने चाहिए। टिप्पण लेखन में शब्दों या वाक्यों का अनुचित और भ्रामक इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। अतिशय उलझनपूर्ण, जटिल तथा कठिन विषय अथवा मामले को भी स्पष्टता के साथ बोधगम्य रीति से प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
 
५) '''तटस्थता''':- किसी भी उत्कृष्ट टिप्पण के लिए तटस्थता का होना भी निहायत जरूरी है। टिप्पण लिखते समय पदाधिकारी व्यक्ति को चाहिए कि व्यक्तिगत भावों, विचारों, अनुभूतियों तथा अच्छे बुरे पूर्वाग्रहों से नितान्त दूर रहकर केवल आवश्यक बातों एवं तथ्यों को ही टिप्पण में प्रक्षेपित करें।
 
६) '''प्रभावान्विति''':- टिप्पण का संक्षिप्त एवं बोधागम्य होना आवश्यक होता है और साथ ही साथ उसे जहाँ आवश्यक हो अनुच्छेदों में विभाजित किया जाना चाहिए। परन्तु ऐसा करते समय इस बात की ओर ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि शब्द, विचार, अनुच्छेद आदि के प्रभाव की अन्विति अस्त-व्यस्त न होकर ठीक ढ़ग से सुगठित रूप में होना चाहिए। पूरे टिप्पण का सकल प्रभाव स्पष्ट होना चाहिए।
 
७) '''शैली''':- टिप्पण लेखन में शैली की अपनी स्वतन्त्र सत्ता और महत्ता होती है। वैसे, प्रत्येक व्यक्ति की लेखन की अपनी एक विशिष्ट शैली होती है किन्तु इसके बावजूद, शैली के बारे कुछ सामान्य एवं सर्वमान्य बातों की ओर ध्यान दिया जाना चाहिए। एक बात विशेष ध्यान में रखी जानी चाहिए कि हिन्दी लेखन की शैली अंग्रेजी लेखन शैली से भिन्न होती है। अत: अंग्रेजी में सोचकर हिन्दी में अनुवाद के रूप में टिप्पण नहीं लिखा जाना चाहिए। जैसे-- Necessary action may kindly be taken at the earliest-- इसे हिन्दी में लिखते समय "कृपया तुरन्त आवश्यक कार्रवाई करें।" लिखा जाना चाहिए।
 
 
दं---१६२-१६५
 
वि---१६१

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