हिंदी भाषा और उसकी लिपि का इतिहास/भाषा और लिपि का अंतःसंबंध

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हिंदी भाषा और उसकी लिपि का इतिहास
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भाषा और लिपि का अंतः संबंध

परिचय[सम्पादन]

भाषा के माध्यम से मनुष्य अपने भावों और विचारों को अभिव्यक्त करता है। इसके साथ-साथ आंख, सिर, हाथ आदि के संकेतों से और कई बार पैरों को पटक कर एवं कई बार अपने दांतो को दिखाकर अपने भावों को प्रकट करता है। भाषा का एक निश्चित समाज होता है। दूसरे शब्दों में भाषा में वाचिक प्रतीकों का प्रयोग होता है। ये प्रतीक परंपरागत एवं यादृच्छिक होते हैं। भाषा से संप्रेषण होता है और यह संप्रेषण एक व्यवस्था के अंतर्गत होता है।

भोलानाथ तिवारी के अनुसार भाषा उच्चारण अवयवों से उच्चरित, यादृच्छिक ध्वनि प्रतीकों की वह व्यवस्था है जिसके द्वारा किसी भाषा समाज के लोग आपस में विचारों का आदान प्रदान करते हैं। इस प्रकार हजारों वर्ष तक मनुष्य वाचिक या मौखिक रूप से अपने भावों को अभिव्यक्त करता रहा। धीरे-धीरे भाषा को स्थायित्व प्रदान करने के लिए उसने चिन्ह, संकेत और चित्रों का सहारा लिया और यह चित्र ही लिपि का प्रारंभिक स्वरूप थे। लिपि अर्थात लिखावट या लेखन लिपि के कारण ही एक पीढ़ी अपने पहले के पीढ़ी के भावों और विचारों से अवगत हो पाती है। मानव संस्कृति के विकास में लिपि का महत्वपूर्ण योगदान है।

डॉ. अनंत चौधरी के शब्दों में- " भाषा को दृश्य के रूप में स्थायित्व प्रदान करने वाले यादृच्छिक वर्ण प्रतीकों की परंपरागत तरीका लिपि कहलाती है। लिपि के माध्यम से मौखिक भाषा समय और स्थान सीमाओं को पार कर चिरस्थाई बन जाती है।

भाषा और लिपि में घनिष्ठता[सम्पादन]

१. भाषा और लिपि का मूलाधार ध्वनियां हैं।

२.दोनों ही भावों और विचारों की अभिव्यक्ति का साधन है।

३. दोनों देशकाल आदि भेद से भिन्न हैं।

४. जिस प्रकार भाषा में ध्वनि और अर्थ का संबंध नहीं होता, उसी प्रकार वर्ण और ध्वनि का संबंध यादृच्छिक होता है।

५. दोनों ही सांस्कृतिक उन्नति के प्रतीक हैं।

६. भाषा को स्थाई रूप प्रदान करने में लिपि का महत्वपूर्ण स्थान है।

७. लिपि भाषा को मूर्त रूप प्रदान करती है।

भाषा और लिपि में अंतर[सम्पादन]

१. लिपि भाषा को चिरस्थाई रखने का माध्यम मात्र है।

२. भाषा की उत्पत्ति पहले हुई लिपि बाद में विकसित हुई।

३. लिपि के लिए भाषा आवश्यक है, परंतु भाषा के लिए लिपि आवश्यक नहीं है। वेद आदि प्राचीन ग्रंथ हजारों वर्षों तक मौखिक परंपरा से ही जीवित रहे हैं।

४. भाषा में उच्चरित ध्वनि संकेत रहते हैं परंतु लिपि में लिखित संकेत होते हैं।

५. भाषा का रूप मौखिक होता है लेकिन लिपि में भौतिक साधनों जैसे- शिलालेख, ताम्रपत्र, भोजपत्र, और कागज कलम की आवश्यकता होती है।

६. भाषा का संबंध श्रवण इंद्रियों (कानों) से है। जबकि लिपि का संबंध नेत्रों से है।

७. भाषा समय स्थान की सीमाओं में बंधी होती है जब की लिपि समय और स्थान के बंधनों से मुक्त होती है।

८. भाषा में अस्थायित्व होता है जबकी लिपि अधिक स्थाई होती है।

९. भाषा में बालाघात, सुर लहर आदि का महत्वपूर्ण स्थान होता है और यह अर्थ परिवर्तन में सहायक होते हैं। जैसे-
(१) रोको, मत जाने दो।
(२) रोको मत, जाने दो।
परंतु लिपि में ऐसा संभव नहीं है।