हिंदी भाषा और उसकी लिपि का इतिहास/लिपि के आरंभिक रूप

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हिंदी भाषा और उसकी लिपि का इतिहास
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लिपि के आरंभिक रूप

पहली बार गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने प्राचीन लिपि माला में, भारत में लिपि ज्ञान की प्राचीनता सिद्ध की और यह भी सिद्ध हो गया कि 4000 वर्ष पहले भी भारत में सेंधव लिपि प्रचलित थी। वास्तव में यही लिपि विश्व की प्राचीनतम ज्ञान लिपि है।

चित्र लिपि[सम्पादन]

लिपि की आरंभिक अवस्था चित्रात्मक थी। चित्रों के प्रयोग के कारण इस अवस्था की लिपि को चित्र लिपि कहा जाता है। यह चित्र सरल एवं स्थूल थे। इन चित्रों में 'जैसा पदार्थ वैसा चित्र' की प्रवृत्ति विद्वान थी। इस कारण यह चित्र सर्वग्राही थी। आदि मानव अपने भाव एवं वस्तु आदि की अभिव्यक्ति के लिए उसका चित्र बना देते थे, जैसे- सूर्य के लिए गोला, विभिन्न पशुओं के चित्र, आदमी एवं उसके अंगों के चित्र। चित्र लिपि में चित्र तो दिखाए जा सकते थे, लेकिन प्रेम, करुणा, दया जैसे भावों को दिखाना कठिन था। लेकिन कुछ स्थानों पर भावात्मक अभिव्यक्ति मिली जैसे- आंसू बहते आंखों के चित्र।

मिस्र चीन स्पेन आदि देशों में भोजपत्र चट्टानों पेड़ की छाल और मिट्टी के बर्तनों पर अंकित चित्र मिले हैं। इनसे चित्र लिपि की व्यापकता प्रमाणित होती है

भाव लिपि[सम्पादन]

भाव लिपि चित्र लिपि का हीं विकसित रूप है। इसमें मनुष्य के हृदय का भाव चित्र में अंकित किया जाता है। इस लिपि में चित्रों को सरल बनाया गया और उससे संबंधित अर्थ भी प्रस्तुत किया गया। जैसे- दुख के भाव के लिए आंख का चित्र बनाकर उससे आंसू टपकते दिखाना। इस लिपि के उदाहरण उत्तरी अमेरिका, अफ्रीका तथा चीन में मिलते हैं। इस लिपि के द्वारा एक चित्र से एकाधिक भाव प्रकट होने लगे, परंतु इसमें भी सूक्ष्म भावों की अभिव्यक्ति करना कठिन था। भाव लिपि, चित्र लिपि तथा ध्वनि लिपि के बीच की अवस्था मानी गई। चित्र लिपि में सूर्य के लिए केवल गोला बनाते पर भाव लिपि में यह गोला सूर्य के अतिरिक्त सूर्य से जुड़े भाव को भी व्यक्त करता है। जैसे- सूर्य देवता, गर्मी का दिन और प्रकाश।

ध्वनि लिपि[सम्पादन]

यह लिपि के विकास की अंतिम अवस्था है। ध्वनि लिपि से हीं लिपि का वास्तविक रूप निखर कर सामने आ सका और इसी के द्वारा मानव अपने समस्त भावों और विचारों को अत्यंत सहज एवं सुगम ढंग से व्यक्त कर सका। यह लिपि के विकास की पूर्ण अवस्था मानी जाती है।

ध्वन्यात्मक लिपि की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसमें भाषा की किसी भी ध्वनि का ठीक-ठाक अंकन करने की क्षमता रहती है। यह लिपि ध्वनि मूलक चिन्हों के आधार पर वस्तु या भाव के नाम को अंकित करता है। इसमें भाषा के प्रत्येक ध्वनि के लिए अलग-अलग वर्ण निश्चित किए गए हैं। ध्वनि लिपि को विद्वानों ने दो भागों में बांटा है--

१. वर्णनात्मक लिपि-- वर्णनात्मक लिपि के संबंध में भोलानाथ तिवारी का मानना है कि यह एक ऐसी ध्वन्यात्मक लिपि है जिसमें लिपि चिन्ह ध्वनि की लघुतम इकाई को व्यक्त करते हैं। इस प्रकार यह लिपि का सबसे विकसित रूप है। भाषा-विज्ञान की दृष्टि से यह आदर्श लिपि है। रोमन लिपि प्राय: इसी प्रकार की है।

२.अक्षरात्मक लिपि-- इस लिपि में चिन्ह ध्वनि की लघुतम इकाई नहीं अपितु अक्षर या स्वर और व्यंजन के मिले-जुले रूप को व्यक्त करते हैं। अनंत चौधरी देवनागरी को अक्षरात्मक मानते हैं। वे कहते हैं कि अक्षरात्मक लिपि वर्णनात्मक लिपि का हीं वैज्ञानिक एवं पूर्ण विकसित रूप है। जबकि कपिल देव वेदी के अनुसार देवनागरी पूर्णतः वर्णनात्मक लिपि।