हिंदी भाषा और उसकी लिपि का इतिहास/हिंदी का अंतरराष्ट्रीय सन्दर्भ

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हिंदी भाषा और उसकी लिपि का इतिहास
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हिंदी का अंतरराष्ट्रीय सन्दर्भ

हिंदी ना केवल भारत में अपितु पूरे विश्व में बोली जाती है। हिंदी एक अंतरराष्ट्रीय भाषा है। अमेरिका, कनाडा, इंग्लैंड, दक्षिण अफ्रीका, सिंगापुर आदि देशों में भी बहुत बड़ी संख्या में भारतीय रहते हैं। ये विकसित देश हैं इसलिए इन देशों में इन लोगों को हिंदी के माध्यम से काम करने के कई साधन मिल जाते हैं। पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन, रेडियो, दूरदर्शन आदि के माध्यम से हिंदी के विभिन्न कार्यक्रम तथा शिक्षा में और सांस्कृतिक धरातल पर हिंदी को व्यवहार में लाते हैं।

भारत के पड़ोसी पाकिस्तान और नेपाल जैसे देशों में भी हिंदी समझी और बोली जाती है। पाकिस्तान के लोग उर्दू बोलते हैं लेकिन भाषिक समानता के कारण वे हिंदी भाषा बखूबी समझते हैं। इस तरह हिंदी भाषा अन्तर्राष्ट्रीय जगत में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। विश्व के अनेक देशों में हिंदी अध्ययन अध्यापन का कार्य जोरो पर है। उदाहरण के लिए ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, बेल्जियम, जर्मनी, फ्रांस, हंगरी अमेरिका आदि देशों में 100 के करीब अध्ययन केंद्रों में हिंदी के अध्ययन अध्यापन की व्यवस्था है।

मॉरीशस में 1926 ई. में हिंदी प्रचारिणी सभा की स्थापना हुई जिसके द्वारा तिलक विद्यालय की स्थापना हुई और जिसका उद्देश्य था हिंदी के व्याकरण सम्मत पढ़ाई कराना और जो बाद में 1946 में हिंदी भवन के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

सूरीनाम में भारत वासियों की ओर से देशभर में हिंदी शिक्षण केंद्र स्थापित किए गए हैं। फिजी में पहली भारतीय पाठशाला की स्थापना सन 1916 में हुई। उसके बाद सनातन धर्म सभा, आर्य सभा, आर्य समाज, गुरुद्वारा कमेटी आदि ने अनेक पाठशालाएं खोलें और उनमें हिंदी शिक्षण का कार्य नियमित रूप से प्रारंभ हो गया।

नेपाल में त्रिभुवन विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर कक्षा तक हिंदी में अध्ययन की व्यवस्था है। वर्मा में 1918 में हिंदी शिक्षण आरंभ हुआ और हिंदी साहित्य सम्मेलन वर्तमान में भी सक्रिय है।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी में साहित्य सृजन भी पर्याप्त हो रहा है। मॉरीशस में सन 1976 में दूसरा विश्व हिंदी सम्मेलन हुआ और 1993 में चौथा सम्मेलन हुआ। मॉरीशस सरकार का कला एवं संस्कृति मंत्रालय हर वर्ष विभिन्न भाषाओं के नाटकिय समारोह का आयोजन करता है, जिसमें सबसे अधिक हिंदी के नाटक होते हैं।

ब्रिटेन में भारतीय विद्या भवन महालक्ष्मी मंदिर और आर्य समाज आदि ने साहित्य सृजन की दृष्टि से महत्वपूर्ण कार्य किए हैं। साहित्यकारों में अभिमन्यु अनंत, कुसुम वेदी, श्रीमती उषा राजे और तेजेंद्र शर्मा प्रमुख हैं। हिंदी साहित्य का विश्व के अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ है, जिनमें प्रेमचंद का 'गोदान', फणीश्वर नाथ रेणु का 'मैला आंचल' और तुलसीकृत 'रामचरितमानस' प्रमुख हैं। हिंदी को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप प्रदान करने में सिनेमा का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। आज हिंदी सिनेमा ने विदेशों में भी अपनी पहुंच बनाई है, और हिंदी के वैश्विक परिदृश्य को पूरा किया है।