हिंदी भाषा और उसकी लिपि का इतिहास/हिंदी के विविध रूप

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हिंदी भाषा और उसकी लिपि का इतिहास
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हिंदी के विविध रूप

बोलचाल की भाषा[सम्पादन]

किसी भी भाषा के अनेक रूप देखे जा सकते हैं। भाषा अभिव्यक्ति की मौखिक स्वरूप हीं होती है। भाषा का प्रत्येक, प्रयोग संदर्भों के अनुसार परिवर्तन होना अवश्यंभावी है।

इसी प्रकार बोलचाल की भाषा औपचारिक एवं अनौपचारिक संदर्भों में परिवर्तित होती चली जाती है।

१. औपचारिक भाषा-- समन्यतः जिस भाषा में शिष्टाचारों का प्रयोग हो वह औपचारिक भाषा कहलाते हैं। इसे शिक्षित समाज प्रयोग करता है। उदाहरण- संस्थानों में प्रयोग होने वाला भाषा।

२. अनौपचारिक भाषा-- वह भाषा जो सहज रूप से बोली जाती हो, जिसे आम बोलचाल की भाषा भी कहा जा सकता है, इसमें व्याकरण त्रुटियां भी हो सकती हैं। उदाहरण- घरों में बोली जाने वाली भाषा।

औपचारिक संदर्भ में भाषा बनावटी व बोझिल प्रतीत होती है। परन्तु अनौपचारिक संदर्भ में यह सरल एवं सहज होती है। सामान्य बातचीत और बोलचाल में इसी अनौपचारिक रूप का प्रयोग होता है, और इसे हीं बोलचाल की भाषा कहते हैं। यह भाषा हम अपने परिवेश एवं समाज के संपर्क में आने से बचपन से ही सीखने बोलने और समझने लगते हैं। बोलचाल की भाषा के लिए किसी भी प्रकार की औपचारिक शिक्षण प्रशिक्षण की कोई आवश्यकता नहीं होती। अनपढ़, शिक्षित, अशिक्षित, साक्षर सभी इसका प्रयोग अधिकार पूर्ण सफलतापूर्वक करते हैं।

हिंदी के संदर्भ में हम बोलचाल की भाषा को हिंदुस्तानी शैली के निकट पाते हैं। हिंदुस्तानी शब्द मूलतः विशेषण है, जिसका अर्थ है- 'हिंदुस्तान का' 17 वीं शताब्दी में इस रूप में हिंदुस्तानी का पहला प्रयोग स्वामी प्राणनाथ में मिलता है। सन् 1800 में कोलकत्ता में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना हुई और वहां हिंदुस्तानी विभाग की स्थापना की गई, कॉलेज के प्रिंसिपल जॉन गिल क्राइस्ट ने हिंदुस्तानी को ग्रामीण हिंदी और उर्दू दो अर्थों में ग्रहण किया। अंग्रेजों ने फूट डालो और शासन करो की नीति के आधार पर भाषाई सांप्रदायिकता फैलाने का प्रयास किया। और इस सांप्रदायिकता को दूर करने के लिए एक ऐसी भाषा की आवश्यकता महसूस हुई जिसमें ना पंडिताऊं पन हो और ना मौलवी पन, संस्कृत और अरबी फारसी की कठिनता को दूर करने के लिए हिंदी और उर्दू के बीच की इस सरल हिंदी सरल उर्दू अथवा बोलचाल की भाषा के लिए हिंदुस्तानी शब्द का प्रयोग सन् 1900 के आसपास देखा जा सकता है।

सुभाष चंद्र बोस जैसे नेताओं ने इसे सार्वदेशिक भाषा की संज्ञा दी है।

राष्ट्रभाषा[सम्पादन]

किसी भी भाषा का प्रारंभिक रूप बोली होता है, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक आदि कारणों से कोई बोली विकसित होकर भाषा का रूप धारण कर लेती है। और जब उसे स्थाई रूप मिल जाता है, और उसका एक आदर्श तथा मानक रूप भी सामने आता है तब वह उन्नत होकर राष्ट्र की सामाजिक एवं सांस्कृतिक विरासत का प्रतिनिधित्व करने लगती है और उस क्षेत्र के निवासी अन्य राष्ट्रीय प्रतीकों के समान ही उसके प्रति गौरव की भावना रखते हैं, तब उसे राष्ट्रभाषा कहा जाता है।

भारत जैसे बहुभाषी देश में हिंदी को राष्ट्रभाषा बनने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, हिंदी को उसका स्थान दिलाने में गैर हिंदी भाषी जैसे- महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, दयानंद सरस्वती, बाल गंगाधर तिलक आदि बुद्धिजीवी नेताओं का विशेष योगदान रहा है। राष्ट्रभाषा में राष्ट्र को भावनात्मक एकता के सूत्र में बांधे रखने की शक्ति होती है। भारत एक बहुभाषी देश है लेकिन सांस्कृतिक दृष्टि से वह एक है। अनेकता में एकता ही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है इस दृष्टि से हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा माना गया है। क्योंकि इसका प्रयोग भारत के अधिकांश भूभाग में किया जाता है। हिंदी भाषी क्षेत्रों जैसे-- हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार आदि के साथ-साथ आहिंदी भाषी क्षेत्रों जैसे- गुजरात, मद्रास, आंध्र प्रदेश आदि के साथ-साथ विदेशों में भी जैसे- मॉरीशस, फीजी, सुरीनाम, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया आदि में भी व्यापक स्तर पर हिंदी भाषी समाज देखा जा सकता है।

हिंदी 11 वीं शताब्दी से ही भारत के अधिकांश भूभाग में बोली जाती है। चंद्रबरदाई, अमीर खुसरो, विद्यापति, सूरदास, तुलसी, जायसी, कबीर, बौधा, बिहारी, घनानंद और भारतेंदु आदि कवियों ने हिंदी की विभिन्न बोलियों में साहित्य की रचना करके इसको समृद्ध किया है। हिंदी का प्रयोग भक्ति काल के सूफी कवियों ने भी सफलतापूर्वक किया जिनमें- जायसी, कुतुबन और मंझन का नाम प्रमुख है। भिन्न-भिन्न प्रदेशों में बंबइया हिंदी और कलकतिया हिंदी आदि के नाम से हिंदी, आहिंदी प्रदेशों में भी अपनी जड़े जमा चुकी है।

राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी के विकास को तीन कालखंडों में बांटा जा सकता है।--

१. आदिकाल (संवत 1050-1375)

२. मध्यकाल (संवत 1375-1900)

३. आधुनिक काल (संवत 1900- अबतक)

आदिकाल

हिंदी का प्रारंभिक दर्शन आठवीं शताब्दी में हिंदी की प्रथम काव्य सरहपा में मिलता है, साहित्य की दृष्टि से यह अपभ्रंश का काल था, उत्तर अपभ्रंश को कुछ विद्वानों ने पुरानी हिंदी का नाम दिया जो वास्तव में हिंदी की ही रूप थी। चंद्रधर शर्मा गुलेरी जिन्होंने माना कि उत्तर अपभ्रंश ही पुरानी हिंदी है। इतना ही नहीं चंद्रबरदाई और उनके समान अन्य चारणभाट कवियों ने जिस डिंगल भाषा में वीर काव्य रचा वह भी हिंदी ही है। इस युग में हिंदी की अन्य बोलियों में भी रचनाएं की गई जैसे- ब्रज, बुंदेलखंडी, कन्नौजिया आदि

मध्यकाल

मध्यकाल में भी संत और सूफी कवियों के द्वारा हिंदी को विकसित होने का सुअवसर प्राप्त हुआ। भक्तिकाल में एक तरफ कबीर और जायसी जैसे निर्गुण कवि थे, तो दूसरी तरफ तुलसी और सूर जैसे सगुण कवि थे। इन सभी भक्त कवियों में एक बात सामान्य थी, और वह थी लोक भाषा का प्रयोग। राम और कृष्ण की जन्मभूमि की भाषा के रूप में अवधी और ब्रज का खूब प्रचार एवं विकास हुआ। तो दूसरी तरफ कबीर जैसे संत कवियों ने सधुक्कड़ी भाषा के रूप में हिंदी को सार्वदेशिक रूप दिया। रीतिकाल में भी बिहारी, घनानंद, मतिराम, चिंतामणि, भूषण आदि कवियों ने ब्रज भाषा के रूप में हिंदी का सफल प्रयोग किया, ब्रजभाषा का जितना विकास इस युग में हुआ, उतना किसी अन्य युग में नहीं हुआ।

आधुनिक काल

आधुनिक काल में हिंदी राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक बन गई। इसी युग में हिंदी के विकास के लिए कोलकाता में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना की गई। सन् 1857 में भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम लड़ा गया। इस संग्राम में भी हिंदी ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। प्रसिद्ध बांग्ला साहित्यकार और वंदे मातरम के रचयिता बंकिम चंद्र चटर्जी ने भी हिंदी की सहायता से पूरे भारतवर्ष को एकता के सूत्र में बांधने की परिकल्पना की।

राजभाषा[सम्पादन]

राजभाषा से अभिप्राय है सरकारी कामकाज में प्रयोग होने वाली भाषा, राजभाषा के तीन प्रमुख अंग होते हैं-
१. संसद प्रशासन,
२. अदालतें, और
३. सरकार
इन तीनों अंगों का संबंध पूरे देश से है। सामान्यतः राजभाषा का प्रयोग अंग्रेजी के ऑफिशियल भाषा के प्रतिशत के रूप में किया जाता है।

राजभाषा से तात्पर्य है- राज शासक या राज्य सरकार द्वारा अधिकृत भाषा। राजभाषा देश के प्रशासक वर्ग की भाषा होती है इसका प्रयोग मुख्यतः चार क्षेत्रों-- शासन, विधान पालिका न्यायपालिका और कार्यपालिका में किया जाता है। किसी भी देश की राजभाषा में वहां की संसद की कार्यवाही चलती है। सचिवालय का कामकाज होता है और न्यायालयों तथा इकाइयों द्वारा कार्य किया जाता है।

भारतवर्ष 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुआ, उससे पहले यहां शताब्दियों तक मुगलों और ब्रिटिशों का शासन रहा इसलिए राजभाषा के रूप में अरबी, फारसी मिश्रित उर्दू और बाद में अंग्रेजी का प्रयोग होता रहा, देश की आजादी के समय राजभाषा के लिए अंग्रेजी के नाम की चर्चा चली लेकिन गांधीजी इसके विरोध में थे। उनके अनुसार अंग्रेजी कभी भी भारत की राष्ट्र या राजभाषा नहीं बन सकती। यदि हम भारत को एक राष्ट्र बनाना चाहते हैं तो केवल हिंदी ही राजभाषा हो सकती है। देश की स्वतंत्रता और उसके बाद 26 जनवरी 1950 को इसे गणतंत्र घोषित किए जाने के फलस्वरूप एक स्वतंत्र राजभाषा की आवश्यकता का अनुभव किया गया और 14 सितंबर 1949 को हिंदी को भारत की राजभाषा स्वीकार कर लिया गया। लेकिन यह भी कहा गया कि अगले 15 वर्षों तक अंग्रेजी सह राजभाषा रहेगी और तब से आज तक अंग्रेजी भारत की राजभाषा बनी हुई है।

भारतीय संविधान में राजभाषा संबंधी प्रावधान-

भारत के संविधान के 17वें भाग के अंतर्गत अनुच्छेद 343 से 351 तक राजभाषा के संबंध में विचार किया गया है।-

१. संघ की राजभाषा हिंदी होगी- संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी और सभी प्रशासनिक कार्यों में उसका प्रयोग होगा।

२. संविधान बनने के 15 वर्ष और उसके बाद भी अंग्रेजी रह सकेगी- संविधान के आरंभ से, संसद 15 वर्ष की अवधि के पश्चात भी विधि द्वारा अंग्रेजी भाषा का प्रयोग जारी रख सकती है।

३. राष्ट्रपति द्वारा आयोग का गठन- संविधान के आरंभ में 5 वर्ष की समाप्ति पर, तत्पश्चात प्रारंभ से 10 वर्ष की समाप्ति पर राष्ट्रपति आयोग का गठन करेंगे जिसमें आठवीं अनुसूची में स्वीकृत 14 भाषाओं के प्रतिनिधि नियुक्त किए जाएंगे। यह आयोग विभिन्न संदर्भ में राजभाषा हिंदी के अधिक से अधिक प्रयोग की सिफारिश करेंगे।

४. संसदीय समिति का गठन- इस संसदीय समिति में लोकसभा के 20 और राज्यसभा के 10 सदस्य होंगे। यह समिति राजभाषा आयोग की सिफारिशों पर विचार विमर्श करके अपना मत राष्ट्रपति को प्रस्तुत करेगी।

संपर्क भाषा[सम्पादन]

संपर्क भाषा से तात्पर्य है वह भाषा जो दो भिन्न भाषा-भाषी अथवा एक भाषा की दो भिन्न उप भाषाओं के मध्य अथवा अनेक बोलियों बोलने वालों के मध्य संपर्क का माध्यम होती है तथा जिसके माध्यम से विचारों का आदान-प्रदान होता है। इस दृष्टि से भिन्न-भिन्न बोली बोलने वाले अनेक वर्गों के बीच हिंदी एक संपर्क भाषा है और अन्य कई भारतीय क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न भाषाएं बोलने वालों के बीच संपर्क भाषा है।

उदाहरण के लिए जिस प्रकार हिंदी की दो उप भाषाओं ब्रज और भोजपुरी बोलने वालों के बीच हिंदी संपर्क भाषा का काम करती है। इसी प्रकार पंजाबी और बांगला भाषा बोलने वाले दो व्यक्ति भी संपर्क भाषा के रूप में हिंदी का प्रयोग करते हैं। वस्तुतः हिंदी ही वह भाषा है जो सबसे अधिक बोली और समझे जाने के कारण संपूर्ण राष्ट्र को संपर्क सूत्र में बांधने का काम करती है।

किसी भी भाषा को संपर्क भाषा बनने के लिए एक सहज और अनुकूल वातावरण की आवश्यकता होती है इस दृष्टि से हिंदी के संपर्क भाषा बनने में स्वाधीनता आंदोलन की बहुत बड़ी भूमिका रही है। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान हिंदीतर क्षेत्रों के स्वाधीनता सेनानियों, नेताओं, विचारको, साहित्यकारों आदि ने एकमत से हिंदी को राष्ट्रभाषा स्वीकार करके समस्त देशवासियों को हिंदी में काम करने के लिए प्रोत्साहित किया। इस दौरान हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए अनेक समितियों का गठन हुआ, जिन्होंने गैर हिंदी भाषी क्षेत्रों विशेषकर दक्षिण भारत में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा दिया।

संचार भाषा[सम्पादन]

प्राचीन काल में लोग छोटे-छोटे समुदायों के साथ में रहते थे तथा वे एक साथ जुड़े हुए होते थे। परंतु आज मशीनी युग में मानव विश्व भर में विख्यात हुआ है। इसलिए उनको सूचना देने के लिए संचार माध्यम का सहारा लेना पड़ता है।

संचार शब्द अंग्रेजी के 'कम्युनिकेशन' शब्द के पर्याय के रूप में प्रस्तुत है, अर्थात संदेश देना, सूचना देना, संप्रेषित करना तथा अपनी बातें दूसरों तक पहुंचाना। इस प्रकार संप्रेषण की पूर्ण क्रिया संचार है जिसके द्वारा मानव अपने विचारों और मंतव्यों का आदान प्रदान करता है। और इसी संचार माध्यमों में प्रयोग होने वाली भाषा संचार भाषा कहलाती है।

संचार माध्यमों के विभिन्न प्रकारों के अनुरूप संचार भाषा के रूप बदलते रहते हैं। कहीं यह भाषा क्लिष्ट नजर आती है, तो कहीं इसमें सरलता व सहजता का विशेष ध्यान रखा जाता है। संचार के विभिन्न माध्यम एवं उनमें प्रयोग होने वाली भाषा निम्न प्रकार की हैं।--

१.मुद्रित माध्यम (समाचार पत्र)-- समाचार पत्र के विभिन्न भाग होते हैं, और प्रत्येक भाग में विभिन्न प्रकार के भाषा का प्रयोग होता है, जैसे- मुहावरें युक्त भाषा, कठिन भाषा, अनौपचारिक भाषा, सरल व सहज भाषा रोचक शैली तथा संस्कृत निष्ठ शब्दों का प्रयोग।


२.श्रव्य संचार माध्यम (रेडियो)-- रेडियो में मुख्यतः आम बोलचाल की भाषा का प्रयोग होता है। चूंकि इस माध्यम में प्रापक, पुनः खबरों को पढ़ नहीं सकता अथवा देख नहीं सकता इसलिए वक्ता ऐसी भाषा का प्रयोग करता है, जिससे की प्रापक तक उचित संदेश सरलता से पहुंच सके


३.दृश्य श्रव्य संचार माध्यम (टेलीविजन)-- टीवी की भाषा आम बोलचाल की भाषा होते हुए भी थोड़ी भिन्न होती है। इस भाषा में उर्दू, अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं के शब्दों का भी समावेश होता है। इस भाषा में भी सरलता, सहजता एवं रोचकता का विशेष ध्यान रखा जाता है।