आधुनिक चिंतन और साहित्य/अस्तित्ववाद

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अस्तित्त्ववाद १९२० के आस-पास जर्मनी में हाइडेगर तथा हसरेल की रचना के साथ शुरु हुआ। 'यह विचारधारा मानव जीवन को निरर्थक मानती है। तर्क को अक्षम समझकर उसका त्याग करती है साथ ही परंपरागत ईश्वर में आस्था को अस्वीकार करती है। अस्तित्त्ववाद जीवन को निरुपाय, अवश तथा निरर्थक मानकर उसे एक मानवीय अर्थ तथा मूल्य प्रदान करने का प्रयास करता है।'[१]

उस युग में कीर्केगार्द की पुस्तक-'कनक्लूडिंग साइंटिफिक पोस्ट स्क्रिप्ट' के द्वारा कीर्केगार्द के विचारों का अध्ययन किया गया। फ्रेडरिक नीत्शे उनसे बहुत प्रभावित थे तथा उन्होंने 'जरथुस्त्र' की रचना की। जहाँ कीर्केगार्द आस्था को माननेवाले विचारक थे वहीं नीत्शे पूर्णतः अनास्थावादी थे। नीत्शेवाद ने हिंदी साहित्य को भी प्रभावित किया। यह मानता है कि-नकारने के साथ स्वीकारने की जिम्मेदारी भी मनुष्य की होगी। नीत्शे अपनी पु्स्तक में मनुष्य के लिए दो मुख्य रास्ते बताते हैं। उनके अनुसार-

  • मनुष्य आत्मघात करेगा या
  • विद्रोह करेगा।

क्योंकि मनुष्य ही कर्त्ता, भोक्ता तथा नियंता है। इसके परिणामों को देखकर मजबूरन मार्क्सवादी विचारकों को 'आत्महत्या के विरुद्ध'(रघुवीर सहाय) जैसी कृतियों का सृजन करने की आवश्यकता महसूस हुई।

  • 'जरथुस्त्र' में तीसरे मार्ग का भी जिक्र मिलता है, जो मानता है कि-मनुष्य अतिमानव बन जाएगा। 'अतिमानव' अर्थात् ऐसा मनुष्य जो अकेला होगा तथा अपने सभी निर्णय स्वयं लेगा। नीत्शे मानते हैं कि निर्णय लेना शौर्य की माँग करता है। इससे मानव स्वयं ईश्वर होगा, जिसकी मान्यता समाज नहीं देता है।

परिचय[सम्पादन]

"अस्तित्ववादी चिंतनका सूत्र-वाक्य है-Existence precedes essence"[२]। मानव जीवन की सबसे बड़ी चुनौती 'मृत्यु' ही इस विचारधारा का केंद्रबिंदु है।

अस्तित्त्ववादी धाराएँ[सम्पादन]

अस्तित्त्ववाद की दो धाराएँ हैं—

  • ईश्वरवादी—अस्तित्ववाद की यह धारा ईश्वर में विश्वास करती है। इस वर्ग के संदर्भ में रामस्वरूप चतुर्वेदी लिखते हैं कि—'यह वर्ग मानव-जीवनको ईश्वर से संयुक्त करके उसे उसका वास्तविक मूल्य देना चाहता है।'[३] सोरेन किर्केगार्द, गैब्रियल मार्शल आदि इसके विचारकों में हैं। इनके अनुसार संसार में निरर्थक जीवन को सार्थक व सारपूर्ण बनाने के लिए निष्ठा तथा ईश्वर में आस्था अनिवार्य है।
  • अनीश्वरवादी—यह धारा ईश्वर के अस्तित्व को मानने से इंकार करती है। मार्टिन हाइडेगर, ज्याँ पाल सार्त्र, अल्बेयर कामू ने मनुष्य को अकेला और निस्सहाय माना है। नीत्शे के अनुसार ईश्वर मर चुका है। ईश्वर नहीं है इसीलिए मनुष्य अपने प्रत्येक कर्म के लिए स्वंय उत्तरदायी है। सार्त्र संघर्ष में ही मानव जीवन की गति को स्वीकारते हैं।

अस्तित्त्ववादी विचारक[सम्पादन]

हाइडेगर, कीर्केगार्द, फ्रेडरिक नीत्शे, कार्ल यास्पर्स, दास्त्रावस्की (‘‘यदि ईश्वर के अस्तित्व को मिटा दें तो फिर सब कुछ (करना) संभव है।’’), ज्यां-पाल सार्त्र (इनके अनुसार मनुष्य स्वतंत्र प्राणी है। यदि ईश्वर का अस्तित्व होता तो वह संभवतः मनुष्य को अपनी योजना के अनुसार बनाता। सार्त्र मानता है कि-ईश्वर नहीं है अतः मनुष्य स्वतंत्र है[४]), अल्बेयर कामू तथा इंगमार बर्गमन इत्यादि अस्तित्त्ववादी विचारकों में सम्मिलित हैं।

अस्तित्त्ववाद और हिंदी साहित्य[सम्पादन]

अस्तित्त्ववाद का प्रभाव हिंदी साहित्य पर भी दिखाई देता है। अज्ञेय की 'एक बूंद' कविता में क्षण के महत्त्व पर जोर इसी विचारधारा के प्रभाव को लक्षित करता है। 'अपने अपने अजनबी' जैसी रचनाओं पर भी इस विचारधारा का प्रभाव लक्षित होता है।

संदर्भ[सम्पादन]

  1. डॉ.धीरेन्द्र वर्मा-हिन्दी साहित्य कोश भाग-१, ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी:२०००, पृ.७३
  2. डॉ.धीरेन्द्र वर्मा-हिन्दी साहित्य कोश भाग-१, ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी:२०००, पृ.७३
  3. डॉ.धीरेन्द्र वर्मा-हिन्दी साहित्य कोश भाग-१, ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी:२०००, पृ.७३
  4. अस्तित्ववाद