आधुनिक चिंतन और साहित्य/दलित विमर्श

विकिपुस्तक से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ

दलित अस्मिता को दलित विमर्श के रूप में चिह्नित करने का श्रेय डॉ॰ बी॰ आर॰ अंबेडकर को जाता है। इसके अंतर्गत समाज का वह वर्ग आता है जिसे समाज से अलगा कर देखा जाता रहा है। सवर्णों द्वारा दबाया अथवा कुचला गया यह वर्ग अपने हितों की रक्षा के लिए तथा समाज में अपनी स्थिति को सुधारने के लिए उठ खड़ा हुआ। उसने अपना एक अलग इतिहास तथा साहित्य रचा। मराठी में शरणकुमार लिंबाले, हिंदी में ओमप्रकाश वाल्मीकि सरीखे विचारकों ने दलित साहित्य के सौंदर्यशास्त्र को गढ़ा।

दलित विमर्श और हिंदी साहित्य[सम्पादन]

दलित विमर्श की शुरुआत मराठी साहित्य से मानी जाती है किंतु उसका प्रभाव हिंदी साहित्य पर भी देखने को मिलता है। सन् १९१४ की महावीरप्रसाद द्विवेदी के संपादन में निकली 'सरस्वती' में हीरा डोम की पहली दलित कविता 'अछूत की शिकायत' प्रकाशित हुई। इस कविता में पहली बार दलितों पर हो रहे अत्याचार को स्वयं दलितों द्वारा दर्शाया गया। दलितों के संपूर्ण जीवन को उनकी समस्याओं सहित विस्तार से रेखांकित करने वाली ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा 'जूठन' सन् १९९७ में प्रकाशित हुई। सवर्णों ने जूठन पर अनेकों आरोप भी लगाए। इस आत्मकथा के पश्चात् अनेकों दलित आत्मकथाएँ लिखी गईं। उपन्यास, कहानी लिखी गईं। यहाँ तक कि दलित रचनाकारों ने अपना एक सौंदर्यशास्त्र भी बनाया। मसलन- ओमप्रकाश वाल्मीकि का 'दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र', शरण कुमार लिंबाले का 'दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र' उनके इसी प्रयास का परिणाम है।

संदर्भ[सम्पादन]