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कार्यालयी हिंदी/प्रूफ पठन

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प्रूफ संशोधन का स्वरूप

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प्रूफ संशोधन मुद्रण प्रक्रिया में सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य है। कम्पोज की हुई सामग्री में अनेक त्रुटियां रह जाती हैं। अत: कम्पोज की हुई सामग्री में जो त्रुटियां होती हैं उनको चिंहिंत करके, सही कर देने का कार्य प्रफू संशोधक या प्रूफ रीडर कहा जाता हैं। किसी भी प्रकाशन संस्थान में प्रूफ रीडर बहुत ही महत्त्वपूर्ण व्यक्ति होता है। उसे भाषा, व्याकारण तथा विरामादि चिंन्हों को यथास्थान प्रयोग करने का परिपक्व ज्ञान होना आवश्यक होता है। प्रत्येक पढ़ा-लिखा व्यक्ति प्रूफ रीडिंग अर्थात् प्रूफ संशोधन का काम नहीं कर सकता। प्रूफ संशोधन कार्य करने वाले कुछ विशिष्ट व्यक्ति विशेष रूप से यह कार्य स्वतन्त्र रूप से भी करते हैं। साधारणत: बड़ी प्रकाशन संस्थाओं में जहां निरन्तर चलता रहता है, स्थायी प्रूफ रीडर नियुक्त किये जाते हैं। समाचार-पत्रों में भी स्थायी रूप से प्रूफ संशोधक नियुक्त रहते हैं।

अन्तिम रूप से मुद्रित पुस्तक या समाचार-पत्र तथा पत्रिकाओं में यदि पाठक त्रुटियां देखता है ( जो किसी भी प्रकार की हो सकती हैं, जैसे तथ्यात्मक वर्तनी सम्बन्धित, भाषात्मक) तो पाठक को बड़ी झुंझलाहट होती है। बहुत-सी त्रुटियां ऐसी भी रह जाती हैं जिन्हें पाठक भ्रम में पड़कर या अज्ञानवश शुध्द मान लेता है और यदि वह स्वंय भी किसी शब्द की वर्तनी या प्रयोग को सही जानता हो तो भी छपी हुई अशुध्दता को ही प्रामाणिक मानकर स्वंय भी गलत लिखने लगता है।

समाचार-पत्र में में प्रूफ संशोधन विभाग होता है वह प्रूफ संशोधक एक, दो या अधिक भी हो सकते हैं। सम्पादक या उप-सम्पादक के द्वारा समाचार, लेख तथा अन्य प्रकार की सामग्री को लिखकर और टाइप करवाकर कम्पोजिंग विभाग में भेज दिया जाता है। कम्पोज होने के बाद उसका प्रूफ संशोधक के पास जाता है जिसे वह उसकी काॅपी (पाण्डुलिपि) से मिलाकर गल्तियों को चिंहिंत करके शुध्द करता है और उन्हें ठीक करने के लिये पुन: कम्पोजिंग विभाग मेंंं भेज दिया जाता है। वहां वह ठीक की जाती है तथा उनका मिलान किसी तृतीय व्यक्ति द्वारा कि जाती है।

समाचार-पत्र में अशुध्दियों के लिये जितना सम्पादकीय विभाग उत्तरदायी है, उससे कम प्रूफ संशोधन विभाग भी नहीं है। प्रूफ संशोधकों की इतनी बड़ी जिम्मेदारी को ध्यान में रखते हुए प्रेस आयोग ने अपने प्रतिवेदन में उन्हें पत्रकार श्रेणी में रखने का सुझाव दिया, लेकिन प्रेस मालिकों ने उसके इस प्रतिवेदन को ठुकरा दिया। आखिल भारतीय श्रमजीवी पत्रकार संघ और उसकी अनेक शाखाओं ने सर्वोच्च न्यायालय का द्वार खटखटाया, जिसका परिणाम यह हुआ कि सर्वोच्च न्यायालय ने प्रूफ संशोधकों को पत्रकार श्रेणी मान्य कर लिया। कुशल प्रूफ संशोधक मात्र काॅपी को देखकर उसकी मक्खी पर मक्खी मारने का ही काम नहीं करते, वह सामग्री के विचारों, तथ्यों और भाषा के क्षेत्र में संपादकीय कार्य पर भी कड़ी दृष्टि रखते हैं। वह मूल काॅपी में यदि टंकण की भी कोई गलती होती है तो वह उसको भी सुधार देते हैं। यह कहना तो उचित ही है कि प्रूफ संशोधन का कार्य बहुत एकाग्रतापूर्वक करना आवश्यक है।

संदर्भ

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१. प्रयोजनमूलक हिन्दी- हरिश, प्रकाशक- हरीश प्रकाशन मन्दिर, आगरा, पृष्ठ- १३५- १३६