कार्यालयी हिंदी/रेडियो लेखन

विकिपुस्तक से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ

रेडियो का संक्षिप्त परिचय[सम्पादन]

आधुनिक युग में जनसंचार के अनेक माध्यम उपलब्ध हैं। टेलिफोन के बाद रेडियो के अविष्कार ने संचार प्रक्रिया को दूरस्थ स्थानों तक सम्भव बनाकर मनुष्य और समाज को आपस में जोड़ा है। जब पत्रकारिता रेडियो के साथ संलग्न हुई तो धीरे-धीरे इस माध्यम ने समाज को आपस में जोड़ा है। जब पत्रकारिता रेडियो के साथ संलग्न हुई तो धीरे-धीरे इस माध्यम ने समाज में एक भरोसेमन्द मित्र के रूप में अपना स्थान बना लिया। वास्तव में रेडियो ऐसा संचार-माध्यम है, जिसके द्वारा कोई संदेश व्यापक जन-समुदाय तक एक साथ पहुंचाया जा सकता है। रेडियो स्टेशन ध्वनि-तरंगों को विधुत ऊर्जा के माध्यम से काफी दूर तक एक साथ पहुंचाया जा सकता है और इन ध्वनि तरंगों को भेजने में इतना कम समय लगता है कि कालबोध की दृष्टि से इसे 'शून्य' कहा जा सकता है अर्थात् किसी रेडियो स्टेशन से जिस समय सन्देश प्रसारित होता है, ठीक उसी समय (कुछ ही सेकण्ड के अन्तराल में) वह हजारों मील दूर बैठे लोग उसे अपने रिडियो सैट पर सुन सकते हैं। ट्रांजिस्टर के अविष्कार ने तो विधुत-ऊर्जा की अनिवार्यता को भी समाप्त कर दिया है। अब सामान्य बैटरी से काम हो जाता है। ट्रांजिस्टर संचार का सस्ता, सुविधाजनक एवं लोकप्रिय साधन बन गया है। निरक्षर लोग भी इस जन-माध्यम से रूचिपूर्वक सन्देश ग्रहण कर सकते हैं। एक साथ बैठकर मनोरंजनपरक कार्यक्रम सुन सकते हैं, उन पर बातचीत कर सकते हैं, घटनाओं का विश्लेषण समझ सकते हैं, नई नई जानकारियां पा सकते हैं। रेडियो का अविष्कार १९वी. शताब्दी में हुआ। वास्तव में रेडियों की कहानी १८१५ ई. से आरम्भ होती है, जब इटली के एक इंजीनियर गुग्लियों मार्कोनीने रेेेडियो टेेेलीग्रााफी  के जरिए पहला सन्देश प्रसारित किया। यह संदेश 'मोर्स कोड' के रूप मेंं था। रेडियो पर मनुष्य की आवाज पहली बार सन् १९०६ मेें सुनााई दी। डी फोरस्ट ही था, जिसने सर्वप्रथम १९१६ ई. मेें पहला रेडियो समाचार प्रसारित किया। १९२० में अमेरिका और ब्रिटेन के अतिरिक्त भी विश्व के कई देशों में रेडियो-प्रसारण आरंभ हो गए।

भारत में रिडियो का विकास[सम्पादन]

भारतवर्ष में रिडियो-प्रसारण का इतिहास सन् १९२६ से शुरू होता है। बम्बई, कलकत्ता तथा मद्रास में व्यक्तिगत रेडियो क्लब स्थापित किए गए थे। इन क्लबों के व्यवसायियो ने एक प्रसारण कम्पनी गठित की थी। और उसके माध्यम से निजी प्रसारण सेवा आरम्भ कर दी। सन् १९२६ में ही तत्कालीन भारत सरकार ने इस प्रसारण कम्पनी को देश प्रसारण केन्द्र स्थापित करने का लाइसेंस प्रदान किया। इस कम्पनी की ओर से पहला प्रसारण २३ जुलाई, १९२७ को बम्बई से हुआ। इसे 'इण्डिया ब्राडकास्टिंग कम्पनी ने किया था। इसी के साथ बम्बई रेडियो स्टेशन का उद्घाटन तत्कालीन वाइसराय लार्ड इर्विन ने किया था। इसके बाद कलकत्ता में उद्घाटन हुआ। यह एक संघर्ष पूर्ण शुरुआत थी। कम शक्ति के माध्यम तंंरंग-प्रेेक्षक लाइसेंस की तुलना मेें कम आय तथा लागत की अधिकता आदि के काारण यह कम्पनी(इण्डिया ब्राडकास्टिंग कम्पनी) बंद होने की स्थिति में आ गई। इसी दौरान १९३० ई. में प्रसारण सेेेवा का प्रबन्ध भारत सरकार ने अपने अधिकार में ले लिया। अब इसका नाम हो गया 'इण्डिया स्टेट ब्राडकास्टिंग सर्विस । यह सरविस विकसित होती चली गई और बाद में चलकर १९३६ ई. में इसका नाम 'आल इण्डिया रेडियो' हो गया। १९३५ में मैसूर रियासत में एक अलग रेडियो स्टेशन की स्थापना हुई जिसका नाम 'आकाशवाणी रखा गया था। देश की स्वतंत्रता के बाद १९५७ मेंं भारत सरकार ने भी 'आल इंडिया रेडियो को 'आकाशवाणी' मेें बदल दिया।

भारत में यह संगठन केन्द्रीय सरकार के सूचना-प्रसारण 'मंत्रालय' के अधीन काम करता है। 'आकाशवाणी' भारतवासियों के लिए १६ मुख्य भाषाओं, २९ आदिवासी भाषाओं और ४८ उप-भाषाओं में विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम प्रसारित करती है। राष्ट्रीय कार्यक्रम नई दिल्ली में प्रसारित होकर सभी स्टेशनों द्वारा रिले किया जाता है। आकाशवाणी से संगीत, नाटक तथा मनोरंजन के विविध कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं। विशिष्ट श्रोताओं के लिए कृषि, शिक्षा, वाणिज्य, महिलाओं, औद्योगिक क्षेत्र तथा सैनिकों और बच्चों के लिए अलग से विशेष कार्यक्रम प्रसारित किए जा रहे हैं। देश के विभिन्न नगरों में आकाशवाणी के ४२ एकांश है, १०० से अधिक रेडियो स्टेशन है। आकाशवाणी की विदेश-सेवा अपने विशिष्ट कार्यक्रम प्रसारित करती है, विदेश विभाग १६ भाषाओं में प्रतिदिन २० घंटे अपने कार्यक्रम प्रसारित करता है। इससे विदेशी लोग तथा प्रवासी भारतीय लाभन्वित होते हैं।

आज रेडियो सर्वधिक लोकप्रिय और सशक्त जनमाध्य है। यह हम लोगों को परस्पर जोड़ता है पढ़ें-लिखें और अनपढ़, सबको । रेडियो सामाजिक परिवर्तन का बहुत बड़ा साधन है। सरकारी माध्यम होते हुए भी आकाशवाणी सरकार का प्रतिमुख या प्रचारक नहीं है। जनहित, समाजहित और देशहित इसका प्रमुख लक्ष्य और विश्वनियंता इसका आधार तत्व है। यह ठीक है कि टेलिविजन के पर्दापण का विस्फोटक प्रभाव हुआ। लेकिन आज भी देश की ९७% जनता रेडियो से लाभान्वित होती हैं इसलिए कहा जाता है कि रेडियो व्यक्ति के साथी रूप में घर-बाहर, काम करते समय, यात्रा में, हर जगह वह हमारे साथ रहता है।

संदर्भ[सम्पादन]

१. प्रयोजनमूलक हिन्दी- हरिश, प्रकाशक- हरीश प्रकाशन मन्दिर, आगरा, पृष्ठ- १३५- १३६

२. प्रयोजनमूलक हिन्दी (कामकाजी हिन्दी)- डां. रमेश तरूण, अशोक प्रकाशन २६१५, नई सड़क, दिल्ली-६, पृष्ठ- १९२