कृष्ण काव्य में माधुर्य भक्ति के कवि/कृष्णदास की माधुर्य भक्ति

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वृन्दावन में नित्य विहार करने वाले राधा-कृष्ण कृष्णदास के उपास्य हैं। ये उपास्य-युगल रसमय ,रसिक और नवल-किशोर हैं। नाना प्रकार की लीलाएँ करना ही इनका उद्देश्य है भक्त इन्ही लीलाओं का गान करता है और ध्यान करता है। राधा-कृष्ण की मधुर-लीलाओं का गान ही कृष्णदास की उपासना है। राधा-कृष्ण के प्रेम के अतिरिक्त गोपी-कृष्ण के प्रेम का भी वर्णन इन्होंने किया है। इसी प्रेम की पूर्वराग के पदों में कृष्ण की रूप माधुरी का सुन्दर वर्णन लक्षित होता है :

देखि जीऊँ माई नैन रंगीलो।
ले चलि सखी तेरे पाइ लागों जहाँ गोबरधन छैल छबीलो।।
रसमय रसिक रसिकनी मोहन रसमय बचन रसाल रसीलो।
नवरंग लाल नवल गुन सुन्दर नवरंग भाँति नव नेह नवीलो।।
नख सिख सींव सुभगता सींवा सहज सुभाइ सुदेस सुहीलो।
कृष्णदास प्रभु रसिक मुकुट मनि सुभग चरित रिपुदलन हठीलो।।

कृष्ण की रूप-माधुरी से मुग्ध गोपी ,कृष्ण-दर्शन के लिए सदा लालायित रहती है। किन्तु उसे लोक-लाज का भय उन दर्शनों से सदा वंचित रखता है। अन्त में जल मरने के निमित्त वह पनघट पर पहुँचती है और वहाँ कृष्ण को पाकर लोक-लाज को त्याग उन्हीं के प्रेम-रस में मग्न हो जाती है :

ग्वालिन कृष्ण दरस सों अटकी।
बार बार पनघट पर आवत सर जमुना जल मटकी।।
मनमोहन को रूप सुधानिधि पीवत प्रेम रस गटकी।
कृष्णदास धन्य धन्य राधिका लोक लाज पटकी।।

श्रीकृष्ण-मिलन पर गोपी को जिस सुख की प्राप्ति होती है उसका वर्णन भी संक्षेप में किया गया है। इस कारन उनके पदों में भाब-तल्लीनता का गुण अधिक लक्षित नहीं होता। किन्तु कुछ पदों में लीला का सुन्दर वर्णन किया गया है। नृत्य के निम्न पद में तत्कालीन सभी हाव-भाव तथा मुद्राओं का उल्लेख किया गया है:

अद्भुत जोट स्याम स्यामा बर विहरत वृन्दावन चारी।
रूप कांति बन विभव महिमा रटत बन्दि श्रुति मति हारी।।
पद विलास कुनित मनि नूपुर रुनित मेखला कुनकारी।
गावत हस्तक भेद दिखावत नाचत गति मिलवत न्यारी।।
किलकत हँसन कुरखियनि चितवत प्यारे तन प्रीतम प्यारी।
कंठ बाहु धरि मिलि गावत हैं ललितादि सखी बलिहारी।।
मूरतिवंत सिंगार सुकीरत निरखि चकित मृग अलि नारी।
कृष्णदास प्रभु गोवर्धन धर अतिसय रसिक वृषभानु कुँवारी।।