कृष्ण काव्य में माधुर्य भक्ति के कवि/गंगाबाई की माधुर्य भक्ति

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गंगाबाई के आराध्य कृष्ण हैं। कृष्ण के स्वरुप की विशेष चर्चा इनके पदों में नहीं मिलती। केवल इतना पता चलता है कि श्रीकृष्ण सुन्दर हैं और रसिक हैं। गोपियाँ इनकी रूप माधुरी से मुग्ध हो उनकी प्राप्ति के लिए व्रत-उपवास आदि का आचरण करती हैं। गोपियों के पूर्वानुराग के वर्णन में भी कृष्ण की सुंदरता का वर्णन करने की अपेक्षा उसके प्रभाव की ओर विशेष ध्यान दिया गया है:

सखी अब मो पै रह्यो न जाय।
चलि री मिल उन ही पैं जैये जहाँ चरावत गाय।।
अंग अंग की सब सुधि भूली देखत नंद किशोर।
मेरो मन हर लियो तब ही को जब चितयें यह ओर।।

गोपियों के प्रेम से प्रभावित हो श्रीकृष्ण उनकी मनो-पूर्ति का वचन दे देते है। इनका पहला रूप हमें दानलीला के पदों में लक्षित होता है। गोपियों से जब कृष्ण दान की याचना करते है तो वः तुरन्त सभी कुछ देने के लिए प्रस्तुत हो जाती हैं क्योंकि वे कृष्ण-चरणों में पहले ही आत्म-समर्पण कर चुकी हैं। अतः किसी प्रकार की अमर्यादित प्रसंग यहां लक्षित नहीं होता:

ग्वालिनि दान हमारो दीजै।
अति मनमुदित होय ब्रजसुंदरि खत लाल हसि लीजै।।
दीजे मन मेरो अब प्यारे निरखि निरखि मुख जीजे।
अति रस गलित होत वः भामिनी मनमाने सो कीजे।।
चलि न सकत अति ठठकि रहत पग रूप रासि अब पीजे।
श्री विठ्ठलगिरिधरन लाल सों नवल नवल रस भीजे ।।