कृष्ण काव्य में माधुर्य भक्ति के कवि/गोविन्दस्वामी की माधुर्य भक्ति

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गोविंदस्वामी ने आराध्य रूप में कृष्ण का स्मरण किया है। श्रीकृष्ण परम रसिक सुन्दरता के मूर्तमान स्वरुप हैं। इनका अंग-प्रत्यंग कान्ति से दीप्त है उनकी छवि को देखकर चन्द्रमा आदि की ज्योति भी तुच्छ प्रतीत होती है:

कहो न परै हो रसिक कुँवर की कुँवराई।
कोटि मदन नख ज्योति ,विलोकत परसत नव इन्दु किरण की जुन्हाई।।
कंकण वलय हारगत गत मोती देखियत अंग अंग में वह झाई।
सुघर सुजान स्वरुप सुलक्षण गोविन्द प्रभु सब विधि सुन्दरताई।।
(गोविन्दस्वामी :पद ४२८)

गोविन्दस्वामी ने कृष्ण की मधुर लीलाओं में विशेष रूप से संयोग पक्ष की लीलाओं का ही वर्णन किया है। इसमें चीरहरण पनघट लीला ,रास,जल-विहार, सुरत आदि मुख्य हैं। इन संयोग लीलाओं का आरम्भ हास-परिहास के बीच अत्यधिक स्वाभाविक ढंग से हुआ है। निम्न पद में एक ओर गोपियों में प्रथम संकोच का भाव लक्षित होता है और दूसरी ओर कृष्ण के प्रति आसक्ति का संकेत मिलता है:

क्यों निकसों इह खोरि सांकरी।
नंदनंदन ठाढ़े मग रोके भारत ताकि उरोज मांझरी।।
चंचल नैन उरज अनियारे तन मन देखियत मदन छाकरी।
जानि न दै मुसकाइनु लावत आनि देत कर टेकि लाकरी।।
बाँहि मरोरि दियो मुख चुम्बन हँसि हँसि दीनी पांइ आंकरी।
'गोविन्द'प्रभु गिरधर मदनमोहन बदन विलोकत भई रांक री।।
(गोविन्दस्वामी ;पद ४५ )

लोक-लाज वश गोपियाँ कृष्ण की इस छेड़-छाड़ का उलाहना लेकर यशोदा के पास पहुँचती हैं किन्तु वहाँ की स्थित देखकर ये चकित रह जाती हैं। अभी तक वे केवल कृष्ण की रूप माधुरी से परिचित थीं,पर यहाँ उनकी चतुराई के भी प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं:

बरजो जसोमति अपनों लाल। जमुना तट ठाढ़ो करत आल।।
मेरी बाँह मरोरी तोरी। अरु कचुकी फारी परसि गाल।।
भरन न देत जल श्री गोपाल। मुख पर डालत लै जु गुलाल।।
मेरे माथे पति हैं रिसाल। सास ननद मोहे करें जंजाल।।
सुनि चकित भए लोचन विसाल। बैठे गोद गोविंद बाल।।
(गोविन्दस्वामी ;पद १३६ )