कृष्ण काव्य में माधुर्य भक्ति के कवि/गोस्वामी हित हरिवंश की माधुर्य भक्ति

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गोस्वामी हितहरिवंश की आराध्या श्री राधा हैं किन्तु राधा-वल्लभ होने के श्रीकृष्ण का भी बहुत महत्व है। अपने सिद्धांत के छार दोहों में इन्होंने कृष्ण के ध्यान तथा नाम-जप का भी निर्देश दिया है:

श्रीराधा-वल्लभ नाम को ,ह्रदय ध्यान मुख नाम।

इस प्रकार सिद्धांततः आनन्द-स्वरूपा राधा ही आराध्या हैं। किन्तु उपासना में राधा और उनके वल्लभ श्रीकृष्ण दोनों ही ध्येय हैं। गोस्वामी हितहरिवंश के अनुसार आनन्दनिधि श्यामा ने श्रीकृष्ण के लिए ही बृषभानु गोप के यहां जन्म लिया है। वे श्रीकृष्ण के प्रेम में पूर्ण रूपेण रंगी हुई हैं। प्रेममयी होने के साथ-साथ श्रीराधा रूपवती भी हैं। इनकी सुन्दरता का वर्णन दृष्टव्य :

आवत श्री बृषभानु दुलारी।
रूप राशि अति चतुर शिरोमणि अंग-अंग सुकुमारी।।
प्रथम उबटि ,मज्जन करि , सज्जित नील बरन तन सारी।
गुंथित अलक , तिलक कृत सुन्दर ,सुन्दर मांग सँवारी।।
मृगज समान नैन अंजन जुत , रुचिर रेख अनुसारी।
जटित लवंग ललित नाशा पर ,दसनावली कृतकारी।।
श्रीफल उरज कुसंभी कंचुकी कसि ऊपर हार छवि न्यारी।
कृश कटि ,उदर गंभीर नाभि पुट ,जघन नितम्बनि भारी।।
मानों मृनाल भूषन भूषित भुज श्याम अंश पर डारी।।
जै श्री हितहरिवंश जुगल करनी गज विहरत वन पिय प्यारी।।

राधावल्लभ भी सौन्दर्य की सीमा हैं। उनके वदनारविन्द की शोभा कहते नहीं बनती। उनका यह रूप-माधुर्य सहज है ,उसमें किसी प्रकार की कृत्रिमता नहीं। उनके इस रूप का पान कर सभी सखियाँ अपने नयनों को तृप्त करती हैं।

लाल की रूप माधुरी नैननि निरखि नेकु सखि।
मनसिज मन हरन हास ,सामरौ सुकुमार राशि,
नख सिख अंग अंगनि उमंगी ,सौभग सीँव नखी।।
रंगमगी सिर सुरंग पाग , लटक रही वाम भाग,
चंपकली कुटिल अलक बीच बीच रखी।
आयत दृग अरुण लोल ,कुंडल मंडित कपोल,
अधर दसन दीपति की छवि क्योंहू न जात लखी।।
अभयद भुज दंड मूल ,पीन अंश सानुकूल,
कनक निकष लसि दुकूल ,दामिनी धरखी।
उर पर मंदार हार ,मुक्ता लर वर सुढार,
मत्त दुरद गति ,तियन की देह दशा करखी।