कृष्ण काव्य में माधुर्य भक्ति के कवि/नन्ददास की माधुर्य भक्ति

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नन्ददास के कृष्ण सर्वात्मा हैं,सब एक मात्र गति हैं अतः प्रत्येक व्यक्ति उन्हीं से प्रेम सम्बन्ध स्थापित करना चाहता है। यह वही ब्रह्म है जिसके विषय में वेद नेति नेति कहते हैं और इस प्रकार उन्हें अगम बताने की चेष्टा करते हैं। परन्तु इनकी विशेषतः यह है कि यह अगम होते हुए भी प्रेम से सुगम हैं:

जदपि अगम ते अगम अति,निगम कहत है जाहि।
तदपि रंगीले प्रेम ते,निपट निकट प्रभु आहि।। 
(रूप मंजरी :पद ५१४ )

इसीलिए कवि इनकी अगम,अनादि,अनन्त ,अबोध आदि नकार अथच नीरस शब्दों में स्तुति नहीं करता ,वरन उसके लिए कृष्ण सुन्दर आनन्दघन ,रसमय ,रसकारण और स्वयं रसिक हैं। ऐसे ही कृष्ण उसके आराध्य हैं और उसकी प्रेमाभक्ति के आलम्बन हैं। राधा इन्हीं रसमय कृष्ण की प्रिया हैं। कवि के शब्दों में-

दूलह गिरधर लाल छबीलो दुलहिन राधा गोरी।
जिन देखी मन में अति लाजी ऐसी बनी यह जोड़ी।।
(पदावली :पद ६० )

'राधा और कृष्ण एकान्त में ही स्वयं दूल्हा-दुलहिन नहीं हैं। नन्ददास ने स्याम सगाई नामक ग्रन्थ में वर-वधू दोनों पक्षों की सम्मति दिखाकर राधा के साथ कृष्ण की सगाई कराई है। सगाई के बाद जो उत्सव की धूम हिन्दू घरों की एक विशेषता है,उसका भी सुन्दर परिचय कवि ने दिया है:

सुनत सगाई श्याम ग्वाल सब अंगनि फूले,
नाचत गावत चले,प्रेम रस में अनुकूले।
जसुमति रानी घर सज्यो,मोतिन चौक पुराइ,
बजति बधाई नन्द के नन्ददास बलि जाइ।। 
(स्याम सगाई :पृष्ठ २७ )
राधा के अतिरिक्त कृष्ण अपने सौन्दर्य और रसिकता के कारण गोपियों के भी प्रियतम बन जाते हैं। श्यामसुन्दर के सुन्दर मुख को देखकर वे मुग्ध हो जाती हैं और कभी-कभी सतत दर्शनों में बाधा -रूप अपनी पलकों को कोसती हैं 
देखन दे मेरी बैरन पलकें।
नंदनंदन मुख तें आलि बीच परत मानों बज्र की सल्काइन।।
बन तें आवत बेनु बजावत गो -रज मंडित राजत अलकैं।
कानन कुंडल चलत अंगुरि दल ललित कपोलन में कछु झलकें।।
ऐसी मुख `निरखन को आली कौन रची बिच पूत कमल कैं।
'नन्ददास 'सब जड़न की इहि गति मीन मरत भायें नहिं जलकेँ।।
(नन्ददास ग्रन्थावली :सं० ब्रजरत्नदास:पदावली ७९ )