कृष्ण काव्य में माधुर्य भक्ति के कवि/नेही नागरीदास की माधुर्य भक्ति

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नागरीदास जी ने आत्म-परिचय के रूप में लिखे गए एक सवैये में अपने आराध्य ,अपनी उपासना और अपने उपासक- धर्म का सुन्दर दंग से उल्लेख किया है:

सुन्दर श्री बरसानो निवास और बास बसों श्री वृन्दावन धाम है।
देवी हमारे श्री राधिका नागरी गोत सौं श्री हरिवंश नाम है।।
देव हमारे श्रीराधिकावल्लभ रसिक अनन्य सभा विश्राम है।
नाम है नागरीदासि अली वृषभान लली की गली को गुलाम है।।
  • इस सवैये से कि नेही जी के आराध्य राधा और कृष्ण हैं। कृष्ण का महत्व राधिकावल्लभ के रूप में ही अंगीकार किया गया है। स्वयं नागरीदास जी वृषभान लली की गली को गुलाम हैं। नागरीदास जी की निष्ठां एवं अनन्यता अत्यधिक तीव्र थी। अपने राधाष्टक में आपने राधा और श्री हितहरिवंश के अतिरिक्त किसी और को स्वीकर नहीं किया है। इसी कारण राधाष्टक की राधावल्लभ सम्प्रदाय में अत्यधिक मान्यता है ~~
रसिक हरिवंश सरवंश श्री राधिका, सरवंश हरवंश वंशी।
हरिवंश गुरु शिष्य हरिवंश प्रेमवाली हरिवंश धन धर्म राधा प्रशंसी।
राधिका देह हरिवंश मन राधिका हरिवंश श्रुतावतंशी।
रसिक जन मननि आभरन हरिवंश हितहरिवंश आभरन कल हंस हंसी।।
  • राधा और हितहरिवंश में इस प्रकार की दृढ़ निष्ठां के कारण जहाँ एक ओर उन्होंने अपने पदों में बरसाने का वर्णन किया है ~
बरसानों हमारी रजधानी रे।
महाराज वृषभानु नृपति जहाँ कीरतिदा सुभ रानी रे।।
गोपी-गोप ओप सौं राजैं बोलत माधुरी बानी रे।
रसिक मुकटमणि कुँवरि राधिका वेद पुरान बखानी रे।।
खोरि साँकरी मोहन ढुक्यो दान केलि रति ठानी रे।
गइवर गिरिवन बीथिन विहरत गढ़ विलास सुख दानी रे।।