कृष्ण काव्य में माधुर्य भक्ति के कवि/बिहारिन देव की माधुर्य भक्ति

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विहारिनदेव के उपास्य श्यामा-श्याम अजन्मा ,नित्य-किशोर तथा नित्य विहारी हैं। इनका रूप, भाव और वयस समान हैं। यद्यपि इनकी विहार लीला अपनी रूचि के अनुसार होती है किन्तु उनका उद्देश्य प्रेम प्रकाशन है। अतः भक्त इन विहार लीलाओं का चिन्तन एवं भावन करके प्रेम का आस्वादन करते हैं।

  • विहारिनदेव ने अपने उपास्य-युगल राधा-कृष्ण की प्रेम लीलाओं वर्णन अपनी काव्य-रचना में बहुत सुन्दर दंग से किया है। इनमें मान, भोजन ,झूलन ,नृत्य ,विहार आदि सभी लीलाओं का समावेश है। मान का त्याग कर अपने प्रियतम को सुख देने के लिए जाती हुई राधा का यह वर्णन बहुत सरस है ;
विगसे मुखचन्द्र अनंद सने सचिहार कुचै विच भाँति अली।
उतते रस राशि हुलास हिये इत चोप चढ़ी मिलि श्याम अली।।
सुविहारी बिहारिनिदासि सदा सुख देखत राजत कुंज अली।
तजि मान अयान सयान सबै यह लाल को ललना सुख दैन चली।।

निशि-विहार के उपरान्त प्रातःकाल सखियाँ कृष्ण की दशा देखकर सब रहस्य जान गईं,किन्तु कृष्ण नाना प्रकार से उस रहस्य को छिपाने का प्रयत्न करते हैं। कवि द्वारा कृष्ण की सुरतान्त छवि का सांगोपांग चित्रण :

आज क्यों मरगजी उरमाल।
देखिये विमल कमल नयन युगल लगत न पलक प्रवाल।
अति अरसात जम्हात रसमसे रस छाके नव बाल।।
अधर माधुरी के गुण जानत वनितन वचन रस ढाल।
फबें न पेंच सुदृढ़ शिथिल अलक बिगलित कुसुम गुलाल।।
विवश परे मन मनत आपने रंग पग भूषण माल।
सखिदेत सब प्रगट पिशुन तन काहे दुरावत लाल।।
अब कछु समुझि सयान बनावत बातें रचित रसाल।
बिहारीदास पिय प्रेम प्रिया वश बसे हैं कुंज निशि ब्याल।।